नागर खण्ड · अध्याय 68
परशुराम का महीदान और समुद्र-अपसरण
श्लोक 1 (skanda.6.68.1)
सूत उवाच॥ अथ ते शबरा यत्नाद्रक्तं तद्धैहयोद्भवम्॥ तत्र निन्युः स्थिता यत्र गर्ता सा पितृसंभवा
sūta uvāca atha te śabarā yatnādraktaṁ taddhaihayodbhavam tatra ninyuḥ sthitā yatra gartā sā pitṛsaṁbhavā
सूत जी ने कहा — तब उन शबरों ने बड़े प्रयत्न से उस हैहय के रक्त को वहाँ ले जाकर, जहाँ पितृ-तर्पण के लिए वह गर्त स्थित थी, उसमें डाला।
श्लोक 2 (skanda.6.68.2)
भार्गवोऽपि च तं हत्वा रक्तमादाय कृत्स्नशः॥ ततः संप्रेषयामास यत्र गर्ताऽथ पैतृकी
bhārgavo'pi ca taṁ hatvā raktamādāya kṛtsnaśaḥ tataḥ saṁpreṣayāmāsa yatra gartā'tha paitṛkī
भार्गव ने भी उसे मारकर उसका सम्पूर्ण रक्त एकत्र कर, उसे उस पैतृक गर्त की ओर भेज दिया।
श्लोक 3 (skanda.6.68.3)
न स बालं न वृद्धं च परित्यजति भार्गवः॥ यौवनस्थं विशेषेण गर्भस्थं वाथ क्षत्रियम्
na sa bālaṁ na vṛddhaṁ ca parityajati bhārgavaḥ yauvanasthaṁ viśeṣeṇa garbhasthaṁ vātha kṣatriyam
वह भार्गव न किसी बालक को छोड़ता था, न वृद्ध को, विशेष रूप से युवावस्था में स्थित क्षत्रिय को, या फिर गर्भ में स्थित क्षत्रिय को भी नहीं।
श्लोक 4 (skanda.6.68.4)
स्वयं जघान भूपान्स तेषां पार्श्वे तथा परान्॥ विध्वंसाययति क्रुद्धः सैनिकैश्च समन्ततः
svayaṁ jaghāna bhūpānsa teṣāṁ pārśve tathā parān vidhvaṁsāyayati kruddhaḥ sainikaiśca samantataḥ
वह स्वयं राजाओं का वध करता था, तथा उनके निकट रहने वाले अन्य लोगों का भी; क्रुद्ध होकर वह सैनिकों सहित चारों ओर विनाश करता था।
श्लोक 5 (skanda.6.68.5)
तथैवासृक्प्रगृह्णाति गृह्णापयति चादरात्॥ तेषां पार्श्वैस्ततस्तूर्णं प्रेषयामास तत्र च
tathaivāsṛkpragṛhṇāti gṛhṇāpayati cādarāt teṣāṁ pārśvaistatastūrṇaṁ preṣayāmāsa tatra ca
उसी प्रकार वह स्वयं रक्त एकत्र करता था और अपने साथियों से आदरपूर्वक एकत्र करवाता था, फिर उसे शीघ्र ही वहाँ भेज देता था।
श्लोक 6 (skanda.6.68.6)
एवं निःक्षत्रियां कृत्वा कृत्स्नां पृथ्वीं भृगद्वहः॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे जगाम तदनन्तरम्
evaṁ niḥkṣatriyāṁ kṛtvā kṛtsnāṁ pṛthvīṁ bhṛgadvahaḥ hāṭakeśvaraje kṣetre jagāma tadanantaram
इस प्रकार सम्पूर्ण पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित करके, वह भृगुवंशी उसके पश्चात् हाटकेश्वर क्षेत्र में लौट आया।
श्लोक 7 (skanda.6.68.7)
ततस्तै रुधिरैः स्नात्वा समादाय तिलान्बहून्॥ अपसव्यं समाधाय प्रचक्रे पितृतर्पणम्
tatastai rudhiraiḥ snātvā samādāya tilānbahūn apasavyaṁ samādhāya pracakre pitṛtarpaṇam
तब उस रक्त से स्नान करके, अनेक तिलों को लेकर तथा यज्ञोपवीत को अपसव्य करके, उसने पितृ-तर्पण सम्पन्न किया।
श्लोक 8 (skanda.6.68.8)
प्रत्यक्षं सर्वविप्राणां तथान्येषां तपस्विनाम्॥ प्रतिज्ञां पूरयित्वाऽथ विशोकः स बभूव ह
pratyakṣaṁ sarvaviprāṇāṁ tathānyeṣāṁ tapasvinām pratijñāṁ pūrayitvā'tha viśokaḥ sa babhūva ha
समस्त ब्राह्मणों तथा अन्य तपस्वियों के समक्ष अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करके, वह तब शोकरहित हो गया।
श्लोक 9 (skanda.6.68.9)
ततो निःक्षत्रिये लोके कृत्वा हयमखं च सः॥ प्रायच्छत्सकलामुर्वीं ब्राह्मणेभ्यश्च दक्षिणाम्
tato niḥkṣatriye loke kṛtvā hayamakhaṁ ca saḥ prāyacchatsakalāmurvīṁ brāhmaṇebhyaśca dakṣiṇām
तब क्षत्रिय-रहित हुए संसार में अश्वमेध यज्ञ करके, उसने सम्पूर्ण पृथ्वी को दक्षिणा सहित ब्राह्मणों को दान कर दिया।
श्लोक 10 (skanda.6.68.10)
अथ लब्धवरा विप्रास्तमूचुर्भृगुसत्तमम्॥ नास्मद्भूमौ त्वया स्थेयमेको राजा यतः स्मृतः
atha labdhavarā viprāstamūcurbhṛgusattamam nāsmadbhūmau tvayā stheyameko rājā yataḥ smṛtaḥ
तब वह वरदान प्राप्त कर, ब्राह्मणों ने उस भृगुश्रेष्ठ से कहा — 'अब आप हमारी भूमि पर नहीं रह सकते, क्योंकि यह माना गया है कि एक ही राजा होना चाहिए।'
श्लोक 11 (skanda.6.68.11)
सोऽपि बाढमिति प्रोच्य हर्षेण महतान्वितः॥ महीपर्यंतमासाद्य प्रोवाचाथ नदीपतिम्
so'pi bāḍhamiti procya harṣeṇa mahatānvitaḥ mahīparyaṁtamāsādya provācātha nadīpatim
उसने भी 'ठीक है' कहकर अत्यंत हर्षित होकर, पृथ्वी के छोर तक जाकर तब समुद्र से यह कहा।
श्लोक 12 (skanda.6.68.12)
आरोप्य सुमहच्चापमाग्नेयास्त्रं प्रयुज्य च॥ त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा कोपेन महतान्वितः
āropya sumahaccāpamāgneyāstraṁ prayujya ca triśikhāṁ bhrukuṭīṁ kṛtvā kopena mahatānvitaḥ
अपना विशाल धनुष उठाकर तथा आग्नेयास्त्र का प्रयोग करते हुए, त्रिशिखा भौंहें चढ़ाकर, अत्यंत क्रोध से भरकर —
श्लोक 13 (skanda.6.68.13)
राम उवाच॥ मया निःक्षत्रिया भूमिः कृता शैलवनान्विता॥ ब्राह्मणेभ्यस्ततो दत्ता वाजिमेधे महामखे
rāma uvāca mayā niḥkṣatriyā bhūmiḥ kṛtā śailavanānvitā brāhmaṇebhyastato dattā vājimedhe mahāmakhe
राम ने कहा — 'मैंने पर्वतों और वनों सहित इस पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित किया है, और फिर उसे महान अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मणों को दान कर दिया है।'
श्लोक 14 (skanda.6.68.14)
तस्मात्त्वं देहि मे स्थानं कृत्वाऽपसरणं स्वयम्॥ न हि दत्त्वा ग्रही ष्यामि विप्रेभ्यो मेदिनीं पुनः
tasmāttvaṁ dehi me sthānaṁ kṛtvā'pasaraṇaṁ svayam na hi dattvā grahī ṣyāmi viprebhyo medinīṁ punaḥ
'अतः तुम स्वयं पीछे हटकर मुझे स्थान दो; क्योंकि मैंने ब्राह्मणों को जो भूमि दी है, उसे मैं पुनः वापस नहीं लूँगा।'
श्लोक 15 (skanda.6.68.15)
न करोष्यथवा वाक्यं ममाद्य त्वं नदीपते॥ स्थलरूपं करिष्यामि वह्न्यस्त्रपरिशोषितम्
na karoṣyathavā vākyaṁ mamādya tvaṁ nadīpate sthalarūpaṁ kariṣyāmi vahnyastrapariśoṣitam
'हे नदीपते! यदि तुम आज मेरे इस वचन का पालन नहीं करोगे, तो मैं अग्न्यस्त्र से तुम्हें सुखाकर स्थल-रूप में बदल दूँगा।'
श्लोक 16 (skanda.6.68.16)
सूत उवाच॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा समुद्रो भयसंकुलः॥ अपसारं ततश्चक्रे यावत्तस्याभिवांछितम्
sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā samudro bhayasaṁkulaḥ apasāraṁ tataścakre yāvattasyābhivāṁchitam
सूत जी ने कहा — उसका यह वचन सुनकर भयभीत हुए समुद्र ने, जितना उसने चाहा, उतना पीछे हटकर स्थान दे दिया।
श्लोक 17 (skanda.6.68.17)
ततश्चकार तत्रैव वसतिं स भृगूद्वहः॥ तपश्चर्यासमायुक्तः पितुर्वधमनुस्मरन्
tataścakāra tatraiva vasatiṁ sa bhṛgūdvahaḥ tapaścaryāsamāyuktaḥ piturvadhamanusmaran
तब उस भृगुवंशी ने वहीं अपना निवास बना लिया, तपस्या में संलग्न होकर तथा अपने पिता के वध का स्मरण करते हुए।
श्लोक 18 (skanda.6.68.18)
ततः सर्वान्पुलिन्दांश्च शवरान्मेदसंयुतान्॥ भूम्यन्ते धारयामास पर्वतेषु स भार्गवः
tataḥ sarvānpulindāṁśca śavarānmedasaṁyutān bhūmyante dhārayāmāsa parvateṣu sa bhārgavaḥ
तब उस भार्गव ने समस्त पुलिन्दों, शबरों तथा मेदों को उस भूमि के छोर पर, पर्वतों में बसा दिया।