नागर खण्ड · अध्याय 69
रामह्रद-माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.6.69.1)
सूत उवाच॥ ततो निःक्षत्रिये लोके क्षत्त्रिण्यो वंशकारणात्॥ क्षेत्रजान्ब्राह्मणेभ्यश्च सुषुवुस्तनया न्वरान्
sūta uvāca tato niḥkṣatriye loke kṣattriṇyo vaṁśakāraṇāt kṣetrajānbrāhmaṇebhyaśca suṣuvustanayā nvarān
सूत जी ने कहा — तब जब संसार क्षत्रियों से रहित हो गया, तब क्षत्रिय स्त्रियों ने वंश की रक्षा के लिए ब्राह्मणों द्वारा उत्पन्न श्रेष्ठ पुत्रों को जन्म दिया।
श्लोक 2 (skanda.6.69.2)
ते वृद्धिं च समासाद्य क्षेत्रजाः क्षत्रियोपमाः॥ जगृहुर्मेदिनीं वीर्यात्संनिरस्य द्विजोत्तमान्
te vṛddhiṁ ca samāsādya kṣetrajāḥ kṣatriyopamāḥ jagṛhurmedinīṁ vīryātsaṁnirasya dvijottamān
वे क्षेत्रज पुत्र, बड़े होकर क्षत्रियों के समान होकर, बलपूर्वक पृथ्वी को अपने अधिकार में ले लिया, तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणों को हटा दिया।
श्लोक 3 (skanda.6.69.3)
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे परिभूतिपदं गताः॥ प्रोचुर्भार्गवमभ्येत्य दुःखेन महतान्विताः
tataste brāhmaṇāḥ sarve paribhūtipadaṁ gatāḥ procurbhārgavamabhyetya duḥkhena mahatānvitāḥ
तब वे सभी ब्राह्मण अपमानित होकर, अत्यंत दुःखी होकर भार्गव के पास जाकर बोले।
श्लोक 4 (skanda.6.69.4)
रामराम महाबाहो या त्वया वसुधा च नः॥ वाजिमेधे मखे दत्ता क्षत्रियैः सा हता बलात्॥ तस्मान्नो देहि तां भूयो हत्वा तान्क्षत्रियाधमान्॥ कुरु श्रेयोऽभिवृद्धिं तां यद्यस्ति तव पौरुषम्
rāmarāma mahābāho yā tvayā vasudhā ca naḥ vājimedhe makhe dattā kṣatriyaiḥ sā hatā balāt tasmānno dehi tāṁ bhūyo hatvā tānkṣatriyādhamān kuru śreyo'bhivṛddhiṁ tāṁ yadyasti tava pauruṣam
'हे राम-राम, महाबाहो! जो पृथ्वी आपने हमें अश्वमेध यज्ञ में दी थी, वह क्षत्रियों द्वारा बलपूर्वक छीन ली गई है। अतः उन नीच क्षत्रियों को मारकर वह हमें पुनः दीजिए; यदि आपमें पौरुष शेष है, तो हमारे इस कल्याण-वृद्धि को सिद्ध कीजिए।'
श्लोक 5 (skanda.6.69.5)
ततो रामः क्रुधाविष्टो भूयस्तैः शवरैः सह॥ पुलिन्दैर्मेदकैश्चैव क्षत्रियांताय निर्ययौ
tato rāmaḥ krudhāviṣṭo bhūyastaiḥ śavaraiḥ saha pulindairmedakaiścaiva kṣatriyāṁtāya niryayau
तब क्रोध से भरे राम पुनः उन शबरों, पुलिन्दों तथा मेदों के साथ क्षत्रियों का अंत करने के लिए निकल पड़े।
श्लोक 6 (skanda.6.69.6)
तत्रैव क्षत्रियान्हत्वा रक्तमादाय तद्बहु॥ तां गर्तां पूरयामास चकार पितृतर्पणम्
tatraiva kṣatriyānhatvā raktamādāya tadbahu tāṁ gartāṁ pūrayāmāsa cakāra pitṛtarpaṇam
वहीं क्षत्रियों को मारकर तथा उनके प्रचुर रक्त को एकत्र कर, उसने उस गर्त को भरा और पितृ-तर्पण किया।
श्लोक 7 (skanda.6.69.7)
प्रददौ ब्राह्मणेभ्यश्च वाजिमेधे धरां पुनः॥ तैश्च निर्वासितस्तत्र जगामोदधिसंनिधौ
pradadau brāhmaṇebhyaśca vājimedhe dharāṁ punaḥ taiśca nirvāsitastatra jagāmodadhisaṁnidhau
और उसने अश्वमेध यज्ञ में पुनः पृथ्वी को ब्राह्मणों को दान कर दिया; और उनके द्वारा वहाँ से निर्वासित होकर वह पुनः समुद्र के तट पर चला गया।
श्लोक 8 (skanda.6.69.8)
एवं तेन कृता पृथ्वी सर्वक्षत्त्रविवर्जिता॥ त्रिःसप्तवारं विप्रेंद्रा द्विजेभ्यश्च निवेदिता
evaṁ tena kṛtā pṛthvī sarvakṣattravivarjitā triḥsaptavāraṁ vipreṁdrā dvijebhyaśca niveditā
इस प्रकार हे विप्रेन्द्रो! उसने इक्कीस बार पृथ्वी को समस्त क्षत्रियों से रहित किया और प्रत्येक बार उसे ब्राह्मणों को अर्पित किया।
श्लोक 9 (skanda.6.69.9)
तर्पिताः पितरश्चैव रुधिरेण महात्मना॥ प्रतिज्ञा पालिता तस्माद्विकोपश्च बभूव सः
tarpitāḥ pitaraścaiva rudhireṇa mahātmanā pratijñā pālitā tasmādvikopaśca babhūva saḥ
और उस महात्मा ने अपने पितरों को रक्त से तृप्त किया; इस प्रकार उसकी प्रतिज्ञा पूर्ण हुई और वह क्रोध-रहित हो गया।
श्लोक 10 (skanda.6.69.10)
एकविंशतिमे प्राप्ते ततश्च पितृतर्पणे॥ अशरीराऽभवद्वाणी खस्था पितृसमुद्भवा
ekaviṁśatime prāpte tataśca pitṛtarpaṇe aśarīrā'bhavadvāṇī khasthā pitṛsamudbhavā
तब जब इक्कीसवाँ पितृ-तर्पण सम्पन्न हुआ, तब आकाश से एक अशरीरी वाणी हुई, जो पितरों से उत्पन्न थी।
श्लोक 11 (skanda.6.69.11)
रामराम महाभाग त्यजैतत्कर्म गर्हितम्॥ वयं ते तुष्टिमापन्नाः स्ववाक्यपरिपाल नात्
rāmarāma mahābhāga tyajaitatkarma garhitam vayaṁ te tuṣṭimāpannāḥ svavākyaparipāla nāt
'हे राम-राम, महाभाग! अब इस निंदित कर्म को त्याग दो; अपने वचन के पूर्ण पालन से हम तुमसे संतुष्ट हो गए हैं।'
श्लोक 12 (skanda.6.69.12)
यत्त्वया विहितं कर्म नैतदन्यः करिष्यति॥ न कृतं केनचित्पूर्वं पितृवैरसमुद्भवम्
yattvayā vihitaṁ karma naitadanyaḥ kariṣyati na kṛtaṁ kenacitpūrvaṁ pitṛvairasamudbhavam
'जो कर्म तुमने किया है, वह अन्य कोई नहीं करेगा; न ही इससे पहले किसी ने पिता के वैर से उत्पन्न ऐसा कार्य किया है।'
श्लोक 13 (skanda.6.69.13)
तस्मात्तुष्टा वयं वत्स दास्यामश्चित्त वांछितम्॥ प्रार्थयस्व द्रुतं तस्माद्दुर्लभं त्रिदशैरपि
tasmāttuṣṭā vayaṁ vatsa dāsyāmaścitta vāṁchitam prārthayasva drutaṁ tasmāddurlabhaṁ tridaśairapi
'अतः हे वत्स! हम प्रसन्न हैं, और तुम्हारे मन में जो कामना है, वह प्रदान करेंगे; अतः शीघ्र माँगो, भले ही वह देवताओं के लिए भी दुर्लभ क्यों न हो।'
श्लोक 14 (skanda.6.69.14)
राम उवाच॥ पितरो यदि तुष्टा मे यच्छंति यदि वांछितम्॥ तस्मात्तीर्थमिदं पुण्यं मन्नाम्ना लोकविश्रुतम्॥ रक्तदोषविनिर्मुक्तं सेवितं वरतापसैः
rāma uvāca pitaro yadi tuṣṭā me yacchaṁti yadi vāṁchitam tasmāttīrthamidaṁ puṇyaṁ mannāmnā lokaviśrutam raktadoṣavinirmuktaṁ sevitaṁ varatāpasaiḥ
राम ने कहा — 'यदि मेरे पितर मुझसे प्रसन्न हैं और मेरी कामना पूर्ण करना चाहते हैं, तो यह पुण्य तीर्थ मेरे ही नाम से लोक में विख्यात हो, रक्त के दोष से मुक्त हो, तथा श्रेष्ठ तपस्वियों द्वारा सेवित हो।'
श्लोक 15 (skanda.6.69.15)
पितर ऊचुः॥ पितृतर्पणजा गर्ता त्वया येयं विनिर्मिता॥ रामह्रद इति ख्यातिं प्रयास्यति जगत्त्रये
pitara ūcuḥ pitṛtarpaṇajā gartā tvayā yeyaṁ vinirmitā rāmahrada iti khyātiṁ prayāsyati jagattraye
पितरों ने कहा — 'पितृ-तर्पण के लिए तुमने जो यह गर्त बनाई है, वह तीनों लोकों में रामह्रद के नाम से प्रसिद्ध होगी।'
श्लोक 16 (skanda.6.69.16)
यत्र भक्तियुता लोकास्तर्पयिष्यंति वै पितॄन्॥ तेऽश्वमेधफलं प्राप्य प्रयास्यंति परां गतिम्
yatra bhaktiyutā lokāstarpayiṣyaṁti vai pitṝn te'śvamedhaphalaṁ prāpya prayāsyaṁti parāṁ gatim
'जहाँ भक्तियुक्त होकर लोग यहाँ अपने पितरों को तृप्त करेंगे, वे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त कर परम गति को प्राप्त होंगे।'
श्लोक 17 (skanda.6.69.17)
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां मासि भाद्रपदे नरः॥ करिष्यति च यः श्राद्धं भक्त्या शस्त्रहतस्य च
kṛṣṇapakṣe caturdaśyāṁ māsi bhādrapade naraḥ kariṣyati ca yaḥ śrāddhaṁ bhaktyā śastrahatasya ca
'भाद्रपद मास की कृष्ण चतुर्दशी को जो मनुष्य शस्त्र से मारे गए किसी व्यक्ति के लिए भक्तिपूर्वक श्राद्ध करेगा —'
श्लोक 18 (skanda.6.69.18)
अपि प्रेतत्वमापन्नं नरके वा समाश्रितम्॥ उद्धरिष्यति स प्रेतमपि पापसमन्वितम्
api pretatvamāpannaṁ narake vā samāśritam uddhariṣyati sa pretamapi pāpasamanvitam
'— वह उस प्रेत का उद्धार कर देगा, चाहे वह प्रेत-योनि को प्राप्त हो चुका हो, अथवा नरक में स्थित हो, अथवा पाप से युक्त ही क्यों न हो।'
श्लोक 19 (skanda.6.69.19)
सूत उवाच॥ एवमुक्त्वा तु रामं ते विरेमुस्तदनंतरम्॥ रामोऽपि च तपस्तेपे तत्रैव क्रोधवर्जितः
sūta uvāca evamuktvā tu rāmaṁ te viremustadanaṁtaram rāmo'pi ca tapastepe tatraiva krodhavarjitaḥ
सूत जी ने कहा — राम से ऐसा कहकर वे तत्पश्चात् मौन हो गए; और राम भी क्रोध-रहित होकर वहीं तपस्या करने लगे।
श्लोक 20 (skanda.6.69.20)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्र शस्त्रहतस्य च॥ तस्मिन्दिने प्रकर्तव्यं श्राद्धं श्रद्धासमन्वितैः
tasmātsarvaprayatnena tatra śastrahatasya ca tasmindine prakartavyaṁ śrāddhaṁ śraddhāsamanvitaiḥ
अतः सम्पूर्ण प्रयत्न और श्रद्धा के साथ उस दिन वहाँ शस्त्र से मारे गए व्यक्ति के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 21 (skanda.6.69.21)
उपसर्ग मृतानां च सर्पाग्निविषबन्धनैः॥ तत्र मुक्तिप्रदं श्राद्धं दिने तस्मिन्नुदाहृतम्
upasarga mṛtānāṁ ca sarpāgniviṣabandhanaiḥ tatra muktipradaṁ śrāddhaṁ dine tasminnudāhṛtam
सर्प-दंश, अग्नि, विष तथा बंधन जैसी विपत्तियों से मरने वालों के लिए भी, उस दिन वहाँ किया गया श्राद्ध मुक्तिदायक बताया गया है।
श्लोक 22 (skanda.6.69.22)
यः पितॄंस्तर्पयेत्तत्र प्रेतपक्षे जलैरपि॥ स तेषामनृणो भूत्वा पितृलोके महीयते
yaḥ pitṝṁstarpayettatra pretapakṣe jalairapi sa teṣāmanṛṇo bhūtvā pitṛloke mahīyate
जो कोई प्रेतपक्ष में केवल जल से भी वहाँ अपने पितरों को तृप्त करता है, वह उनके ऋण से मुक्त होकर पितृलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 23 (skanda.6.69.23)
एतद्वः सर्वमाख्यातं रामह्रदसमुद्भवम्॥ माहात्म्यं ब्राह्मणश्रेष्ठाः सर्वपातकनाशनम्
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ rāmahradasamudbhavam māhātmyaṁ brāhmaṇaśreṣṭhāḥ sarvapātakanāśanam
हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! यह रामह्रद से उत्पन्न सम्पूर्ण माहात्म्य, जो समस्त पापों का नाशक है, तुम्हें बता दिया गया।
श्लोक 24 (skanda.6.69.24)
श्राद्धकाले नरो भक्त्या यश्चैतत्पठति स्वयम्॥ स गयाश्राद्धजं कृत्स्नं फलमाप्नोत्यसंशयम्
śrāddhakāle naro bhaktyā yaścaitatpaṭhati svayam sa gayāśrāddhajaṁ kṛtsnaṁ phalamāpnotyasaṁśayam
श्राद्ध के समय जो मनुष्य स्वयं भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, वह निश्चय ही गया-श्राद्ध से उत्पन्न सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।
श्लोक 25 (skanda.6.69.25)
पर्वकाले ऽथवा प्राप्ते पठेद्ब्राह्मणसंनिधौ॥ पितृमेधस्य यज्ञस्य स फलं लभते ऽखिलम्
parvakāle 'thavā prāpte paṭhedbrāhmaṇasaṁnidhau pitṛmedhasya yajñasya sa phalaṁ labhate 'khilam
अथवा जब कोई पर्वकाल आए, तब ब्राह्मणों के समक्ष इसका पाठ करने पर, वह पितृमेध यज्ञ का सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।
श्लोक 26 (skanda.6.69.26)
शृणुयाद्वापि यो भक्त्या कीर्त्यमानमिदं नरः॥ सौत्रामणौ कृते कृत्स्नं फलमाप्नोत्यसंशयम्
śṛṇuyādvāpi yo bhaktyā kīrtyamānamidaṁ naraḥ sautrāmaṇau kṛte kṛtsnaṁ phalamāpnotyasaṁśayam
अथवा जो मनुष्य कीर्तन किए जाने पर इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, वह निश्चय ही सौत्रामणि यज्ञ के सम्पन्न होने का सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।