नागर खण्ड · अध्याय 70
कार्तिकेय की उत्पत्ति
श्लोक 1 (skanda.6.70.1)
सूत उवाच॥ तथान्यापि च तत्रास्ति शक्तिः पापप्रणाशिनी॥ कार्तिकेयेन निर्मुक्ता हत्वा वै तारकं रणे
sūta uvāca tathānyāpi ca tatrāsti śaktiḥ pāpapraṇāśinī kārtikeyena nirmuktā hatvā vai tārakaṁ raṇe
सूत जी ने कहा — वहाँ एक और भी पापनाशिनी शक्ति है, जिसे कार्तिकेय ने युद्ध में तारकासुर का वध करने के बाद वहीं त्याग दिया था।
श्लोक 2 (skanda.6.70.2)
तथास्ति सुमहत्कुण्डं स्वच्छोदकसमावृतम्॥ तेनैव निर्मितं तत्र यः स्नात्वा तां प्रपूजयेत्॥ स पापान्मुच्यते सद्य आजन्ममरणांति कात्
tathāsti sumahatkuṇḍaṁ svacchodakasamāvṛtam tenaiva nirmitaṁ tatra yaḥ snātvā tāṁ prapūjayet sa pāpānmucyate sadya ājanmamaraṇāṁti kāt
और वहाँ स्वच्छ जल से भरा एक विशाल कुण्ड है, जिसे स्वयं उन्होंने ही बनाया था; जो कोई वहाँ स्नान करके उस शक्ति की पूजा करता है, वह जन्म से लेकर मृत्यु-पर्यंत के समस्त पापों से तत्काल मुक्त हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.6.70.3)
ऋषय ऊचुः॥ कस्मिन्काले विनिर्मुक्ता सा शक्तिस्तेन नो वद॥ किमर्थं स्वामिना तत्र किंप्रभावा वद स्वयम्
ṛṣaya ūcuḥ kasminkāle vinirmuktā sā śaktistena no vada kimarthaṁ svāminā tatra kiṁprabhāvā vada svayam
ऋषियों ने कहा — वह शक्ति उनके द्वारा किस काल में त्यागी गई? हमें बताइए। उसके स्वामी ने उसे वहाँ किस प्रयोजन से रखा, तथा उसका क्या प्रभाव है, स्वयं बताइए।
श्लोक 4 (skanda.6.70.4)
सूत उवाच॥ पुरासीत्तारकोनाम दानवोऽतिबलान्वितः॥ हिरण्याक्षस्य दायादस्त्रैलोक्यस्य भयावहः
sūta uvāca purāsīttārakonāma dānavo'tibalānvitaḥ hiraṇyākṣasya dāyādastrailokyasya bhayāvahaḥ
सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में तारक नामक एक अत्यंत बलशाली दानव था, जो हिरण्याक्ष का वंशज तथा तीनों लोकों के लिए भयंकर था।
श्लोक 5 (skanda.6.70.5)
स ज्ञात्वा जनकं ध्वस्तं विष्णुना प्रभविष्णुना॥ तपस्तेपे ततस्तीव्रं गोकर्णं प्राप्य पर्वतम्
sa jñātvā janakaṁ dhvastaṁ viṣṇunā prabhaviṣṇunā tapastepe tatastīvraṁ gokarṇaṁ prāpya parvatam
अपने पिता को शक्तिशाली विष्णु द्वारा नष्ट हुआ जानकर, उसने गोकर्ण पर्वत पर जाकर तीव्र तपस्या की।
श्लोक 6 (skanda.6.70.6)
यावद्वर्षसहस्रांतं शीर्णपर्णा शनः स्थितः॥ ध्यायमानो महादेवं कायेन मनसा गिरा
yāvadvarṣasahasrāṁtaṁ śīrṇaparṇā śanaḥ sthitaḥ dhyāyamāno mahādevaṁ kāyena manasā girā
पूरे एक सहस्र वर्षों तक वह वहाँ सूखे पत्तों के आहार पर रहा, तन-मन-वाणी से महादेव का ध्यान करते हुए।
श्लोक 7 (skanda.6.70.7)
वरुपूजोपहारैश्च नैवेद्यैर्विविधैस्ततः॥ ततो वर्षसहस्रांते स दैत्यो दुःखसंयुतः
varupūjopahāraiśca naivedyairvividhaistataḥ tato varṣasahasrāṁte sa daityo duḥkhasaṁyutaḥ
उत्तम पूजा-सामग्री, उपहारों तथा विविध नैवेद्यों से; फिर सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर, वह दैत्य दुःखी होकर —
श्लोक 8 (skanda.6.70.8)
ज्ञात्वा रुद्रमसंतुष्टं ततो रौद्रं तपोऽकरोत्॥ विनिष्कृत्त्यात्ममांसानि जुहोतिस्म हुताशने
jñātvā rudramasaṁtuṣṭaṁ tato raudraṁ tapo'karot viniṣkṛttyātmamāṁsāni juhotisma hutāśane
— रुद्र को असंतुष्ट जानकर, उसने और भी भीषण तपस्या की, अपने ही मांस को काटकर अग्नि में हवन करने लगा।
श्लोक 9 (skanda.6.70.9)
ततस्तुष्टो महादेवो वृषारूढ उमापतिः॥ सर्वैरेव गणैः सार्धं तस्य संदर्शनं ययौ
tatastuṣṭo mahādevo vṛṣārūḍha umāpatiḥ sarvaireva gaṇaiḥ sārdhaṁ tasya saṁdarśanaṁ yayau
तब प्रसन्न होकर उमापति महादेव, वृषभ पर आरूढ़ होकर, अपने समस्त गणों सहित उसे दर्शन देने आए।
श्लोक 10 (skanda.6.70.10)
तत्र प्रोवाच संहृष्टस्तारनादेन नादयन्॥ दिशः सर्वा महादेवो हर्ष गद्गदया गिरा
tatra provāca saṁhṛṣṭastāranādena nādayan diśaḥ sarvā mahādevo harṣa gadgadayā girā
वहाँ अत्यंत प्रसन्न होकर महादेव ने, समस्त दिशाओं को अपनी उच्च गर्जना से गुँजाते हुए, हर्ष से गद्गद वाणी में कहा।
श्लोक 11 (skanda.6.70.11)
भोभोस्तारक तुष्टोऽस्मि साहसं मेदृशं कुरु॥ प्रार्थयस्व मनोऽभीष्टं येन ते प्रददाम्यहम्
bhobhostāraka tuṣṭo'smi sāhasaṁ medṛśaṁ kuru prārthayasva mano'bhīṣṭaṁ yena te pradadāmyaham
'अरे तारक! मैं प्रसन्न हूँ; अब ऐसा साहस मत करो। जो तुम्हारे मन को अभीष्ट हो, वह माँगो, जिससे मैं तुम्हें वह प्रदान करूँ।'
श्लोक 12 (skanda.6.70.12)
तारक उवाच॥ अजेयः सर्वदेवानां त्वत्प्रसादादहं विभो॥ यथा भवामि संग्रामे त्वां विहाय तथा कुरु
tāraka uvāca ajeyaḥ sarvadevānāṁ tvatprasādādahaṁ vibho yathā bhavāmi saṁgrāme tvāṁ vihāya tathā kuru
तारक ने कहा — 'हे विभो! आपकी कृपा से मैं युद्ध में आपको छोड़कर समस्त देवताओं के लिए अजेय हो जाऊँ, ऐसा कीजिए।'
श्लोक 13 (skanda.6.70.13)
भगवानुवाच॥ मत्प्रसादादसंदिग्धं सर्वमेतद्भविष्यति॥ त्वया यत्प्रार्थितं दैत्य त्वमेको बलवानिह
bhagavānuvāca matprasādādasaṁdigdhaṁ sarvametadbhaviṣyati tvayā yatprārthitaṁ daitya tvameko balavāniha
भगवान् ने कहा — 'मेरी कृपा से, हे दैत्य! तुमने जो कुछ भी माँगा है, वह सब निःसंदेह पूर्ण होगा; तुम ही यहाँ अकेले बलवान होगे।'
श्लोक 14 (skanda.6.70.14)
एवमुक्त्वा महादेवः स्वमेव भवनं गतः॥ तारकश्चापि संहृष्टस्तथैवनिज मन्दिरम्
evamuktvā mahādevaḥ svameva bhavanaṁ gataḥ tārakaścāpi saṁhṛṣṭastathaivanija mandiram
ऐसा कहकर महादेव अपने भवन को लौट गए; और तारक भी अत्यंत प्रसन्न होकर उसी प्रकार अपने घर को लौट गया।
श्लोक 15 (skanda.6.70.15)
ततो दानवसैन्येन महता परिवारितः॥ गतः शक्रपुरीं योद्धुं विख्याताममरावतीम्
tato dānavasainyena mahatā parivāritaḥ gataḥ śakrapurīṁ yoddhuṁ vikhyātāmamarāvatīm
तब दानवों की विशाल सेना से घिरा हुआ, वह इन्द्र की विख्यात नगरी अमरावती पर युद्ध करने के लिए गया।
श्लोक 16 (skanda.6.70.16)
अथाभवन्महायुद्धं देवानां दानवैः सह॥ यावद्वर्षसहस्रांते मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्
athābhavanmahāyuddhaṁ devānāṁ dānavaiḥ saha yāvadvarṣasahasrāṁte mṛtyuṁ kṛtvā nivartanam
तब देवताओं और दानवों के बीच एक महायुद्ध हुआ, जो पूरे एक सहस्र वर्ष तक चलता रहा, जिसमें मृत्यु ही वापसी का एकमात्र कारण थी।
श्लोक 17 (skanda.6.70.17)
तत्राभवत्क्षयो नित्यं देवानां रणमूर्धनि॥ विजयो दानवानां च प्रसादाच्छूलपा णिनः
tatrābhavatkṣayo nityaṁ devānāṁ raṇamūrdhani vijayo dānavānāṁ ca prasādācchūlapā ṇinaḥ
वहाँ युद्ध के मोर्चे पर देवताओं की सतत क्षति होती रही, और त्रिशूलधारी की कृपा से दानवों की विजय होती रही।
श्लोक 18 (skanda.6.70.18)
ततश्चक्रुरुपायांस्ते विजयाय दिवौकसः॥ वर्माणि सुविचित्राणि यन्त्राणि परिखास्तथा
tataścakrurupāyāṁste vijayāya divaukasaḥ varmāṇi suvicitrāṇi yantrāṇi parikhāstathā
तब स्वर्गवासियों ने विजय के लिए उपाय किए — विचित्र कवच, यंत्र तथा खाइयाँ बनाईं।
श्लोक 19 (skanda.6.70.19)
अन्यान्यपि शरीरस्य रक्षणार्थं प्रयत्नतः॥ तथैव योधमुख्यानां विशेषाद्द्विजसत्तमाः
anyānyapi śarīrasya rakṣaṇārthaṁ prayatnataḥ tathaiva yodhamukhyānāṁ viśeṣāddvijasattamāḥ
और शरीर की रक्षा के लिए अन्य उपाय भी बड़े प्रयत्न से किए, तथा हे द्विजसत्तमो! विशेष रूप से अपने प्रमुख योद्धाओं के लिए भी।
श्लोक 20 (skanda.6.70.20)
ससृजुस्ते सुराधीशा दानवेभ्यो दिवानिशम्
sasṛjuste surādhīśā dānavebhyo divāniśam
उन देवाधीशों ने दानवों के विरुद्ध दिन-रात अस्त्रों का निर्माण किया।
श्लोक 21 (skanda.6.70.21)
मुद्गरा भिंडिपालाश्च शतघ्न्योऽथ वरेषवः॥ प्रासाः कुन्ताश्च भल्लाश्च तस्मिन्काले विनिर्मिताः॥ विशेषाहवसंबन्धव्यूहानां प्रक्रियाश्च याः
mudgarā bhiṁḍipālāśca śataghnyo'tha vareṣavaḥ prāsāḥ kuntāśca bhallāśca tasminkāle vinirmitāḥ viśeṣāhavasaṁbandhavyūhānāṁ prakriyāśca yāḥ
उस समय मुद्गर, भिंडिपाल, शतघ्नी, उत्तम बाण, भाले, कुन्त और भल्ल जैसे शस्त्र बनाए गए, तथा युद्ध के विशेष व्यूह-संबंधी विधियाँ भी विकसित की गईं।
श्लोक 22 (skanda.6.70.22)
तथान्यानि विचित्राणि कूटयुद्धान्यनेकशः॥ भीषिकाः कुहकाश्चैव शक्रजालानि कृत्स्नशः
tathānyāni vicitrāṇi kūṭayuddhānyanekaśaḥ bhīṣikāḥ kuhakāścaiva śakrajālāni kṛtsnaśaḥ
तथा अन्य अनेक विचित्र कूट-युद्ध की विधियाँ, भय उत्पन्न करने वाले उपाय, छल-कपट तथा समस्त प्रकार के इन्द्रजाल भी बनाए गए।
श्लोक 23 (skanda.6.70.23)
न च ते विजयं प्रापुस्तथापि द्विजसत्तमाः॥ दानवेभ्यो महायुद्धे प्रहारैर्जर्जरीकृताः
na ca te vijayaṁ prāpustathāpi dvijasattamāḥ dānavebhyo mahāyuddhe prahārairjarjarīkṛtāḥ
फिर भी हे द्विजसत्तमो! उन्हें विजय प्राप्त नहीं हुई; वे उस महायुद्ध में दानवों के प्रहारों से जर्जरित हो गए।
श्लोक 24 (skanda.6.70.24)
अथ प्राह सहस्राक्षो भयत्रस्तो बृहस्पतिम्॥ दिनेदिने वयं दैत्यैर्विजयामो द्विजोत्तम
atha prāha sahasrākṣo bhayatrasto bṛhaspatim dinedine vayaṁ daityairvijayāmo dvijottama
तब भयभीत हुए सहस्राक्ष इन्द्र ने बृहस्पति से कहा — 'हे द्विजोत्तम! हम दिन-प्रतिदिन दैत्यों से पराजित हो रहे हैं।'
श्लोक 25 (skanda.6.70.25)
यथायथा रणार्थाय सदुपायान्करोम्यहम्॥ तथातथा पराभूतिर्जायते मे महाहवे
yathāyathā raṇārthāya sadupāyānkaromyaham tathātathā parābhūtirjāyate me mahāhave
'मैं जितने ही अच्छे उपाय युद्ध के लिए करता हूँ, उतनी ही अधिक मेरी पराजय इस महायुद्ध में होती जाती है।'
श्लोक 26 (skanda.6.70.26)
तदुपायं सुराचार्य स्वबुद्ध्या त्वं प्रचिन्तय॥ येन मे स्याज्जयो युद्धे तव कीर्तिरनिन्दिता
tadupāyaṁ surācārya svabuddhyā tvaṁ pracintaya yena me syājjayo yuddhe tava kīrtiraninditā
'अतः हे सुराचार्य! अपनी बुद्धि से कोई उपाय सोचिए, जिससे मुझे युद्ध में विजय प्राप्त हो और आपकी कीर्ति निष्कलंक बनी रहे।'
श्लोक 27 (skanda.6.70.27)
सूत उवाच॥ ततो बृहस्पतिः प्राह चिरं ध्यात्वा शचीपतिम्॥ प्रहृष्टवदनो ज्ञात्वा जयोपायं महाहवे
sūta uvāca tato bṛhaspatiḥ prāha ciraṁ dhyātvā śacīpatim prahṛṣṭavadano jñātvā jayopāyaṁ mahāhave
सूत जी ने कहा — तब बहुत देर तक विचार करके बृहस्पति ने, महायुद्ध में विजय का उपाय जानकर, प्रसन्न मुख से शचीपति इन्द्र से कहा।
श्लोक 28 (skanda.6.70.28)
मया शक्र परिज्ञातः स उपायो महाहवे॥ जीयन्ते शत्रवो येन लीलयैवापि भूरिशः
mayā śakra parijñātaḥ sa upāyo mahāhave jīyante śatravo yena līlayaivāpi bhūriśaḥ
'हे शक्र! मैंने महायुद्ध के लिए वह उपाय जान लिया है, जिससे बड़ी संख्या में भी शत्रुओं को सहज ही जीता जा सकता है।'
श्लोक 29 (skanda.6.70.29)
यदाभीष्टं वरं तेन प्रार्थितस्त्रिपुरांतकः॥ तदैवं वचनं प्राह प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः
yadābhīṣṭaṁ varaṁ tena prārthitastripurāṁtakaḥ tadaivaṁ vacanaṁ prāha praṇipatya muhurmuhuḥ
'जब उस त्रिपुरांतक शिव से उसने वह अभीष्ट वर माँगा, बार-बार प्रणाम करते हुए, तब उसने यह वचन कहा —'
श्लोक 30 (skanda.6.70.30)
अजेयः सर्वदेवानां त्वत्प्रसादादहं विभो॥ यथा भवामि संग्रामे त्वां विहाय तथा कुरु
ajeyaḥ sarvadevānāṁ tvatprasādādahaṁ vibho yathā bhavāmi saṁgrāme tvāṁ vihāya tathā kuru
'हे विभो! आपकी कृपा से मैं युद्ध में आपको छोड़कर समस्त देवताओं के लिए अजेय हो जाऊँ, ऐसा कीजिए।'
श्लोक 31 (skanda.6.70.31)
न तं स्वयं महादेवः स्वशिष्यं सूदयिष्यति॥ विषवृक्षमपि स्थाप्य कश्छिनत्ति पुनः स्वयम्
na taṁ svayaṁ mahādevaḥ svaśiṣyaṁ sūdayiṣyati viṣavṛkṣamapi sthāpya kaśchinatti punaḥ svayam
'महादेव स्वयं अपने भक्त का वध नहीं करेंगे; भला विषवृक्ष को भी लगाकर कौन उसे पुनः स्वयं ही काट डालता है?'
श्लोक 32 (skanda.6.70.32)
यो वै पिता स पुत्रः स्याच्छ्रुतिवाक्यमिदं स्मृतम्॥ तस्माज्जनयतु क्षिप्रं हरस्तन्नाशकृत्सुतम्
yo vai pitā sa putraḥ syācchrutivākyamidaṁ smṛtam tasmājjanayatu kṣipraṁ harastannāśakṛtsutam
'जो पिता है, वही पुत्र भी हो सकता है — यह श्रुति-वाक्य स्मृत है। अतः हर उस दैत्य का नाश करने वाले पुत्र को शीघ्र उत्पन्न करें।'
श्लोक 33 (skanda.6.70.33)
येन सेनाधिपत्ये तं विनियोज्य महाहवम्॥ कुर्मो दैत्यैः समं शस्त्रैः प्राप्नुयाम ततो जयम्
yena senādhipatye taṁ viniyojya mahāhavam kurmo daityaiḥ samaṁ śastraiḥ prāpnuyāma tato jayam
'उसे सेनापति नियुक्त करके हम दैत्यों के साथ शस्त्रों द्वारा वह महायुद्ध करेंगे और तब विजय प्राप्त करेंगे।'
श्लोक 34 (skanda.6.70.34)
एष एव उपायोऽत्र मया ते परिकीर्तितः॥ विजयाय सहस्राक्ष नान्योऽस्ति भुवनत्रये
eṣa eva upāyo'tra mayā te parikīrtitaḥ vijayāya sahasrākṣa nānyo'sti bhuvanatraye
'हे सहस्राक्ष! विजय के लिए मैंने यहाँ तुम्हें यही उपाय बताया है; तीनों लोकों में इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।'
श्लोक 35 (skanda.6.70.35)
ततो देवगणैः सर्वैः समेतः पाकशासनः॥ तमर्थं प्रोक्तवाञ्छंभुं विनयावनतः स्थितः
tato devagaṇaiḥ sarvaiḥ sametaḥ pākaśāsanaḥ tamarthaṁ proktavāñchaṁbhuṁ vinayāvanataḥ sthitaḥ
तब इन्द्र समस्त देवगणों सहित, विनयपूर्वक झुके हुए, शंभु से यह वृत्तांत कहने लगा।
श्लोक 36 (skanda.6.70.36)
सुतस्य जननार्थाय कुरु यत्नं वृषध्वज॥ येन सेनाधिपत्ये तं योजयामि दिवौकसाम्
sutasya jananārthāya kuru yatnaṁ vṛṣadhvaja yena senādhipatye taṁ yojayāmi divaukasām
'हे वृषध्वज! पुत्र की उत्पत्ति के लिए प्रयत्न कीजिए, जिससे मैं उसे देवताओं की सेना का सेनापति बना सकूँ।'
श्लोक 37 (skanda.6.70.37)
प्राप्नोम्यहं च संग्रामे विजयं त्वत्प्रसादतः॥ निहत्य दानवान्सर्वांस्तारकेण समन्वितान्
prāpnomyahaṁ ca saṁgrāme vijayaṁ tvatprasādataḥ nihatya dānavānsarvāṁstārakeṇa samanvitān
'और आपकी कृपा से मुझे युद्ध में विजय प्राप्त होगी, तारक सहित समस्त दानवों का वध करके।'
श्लोक 38 (skanda.6.70.38)
नान्यथा विजयो मे स्यात्संग्रामे दानवैः सह॥ इति मां प्राह देवेज्यो ज्ञात्वा सम्यङ्महामतिः
nānyathā vijayo me syātsaṁgrāme dānavaiḥ saha iti māṁ prāha devejyo jñātvā samyaṅmahāmatiḥ
'दानवों के साथ युद्ध में मेरी विजय अन्यथा संभव नहीं है।' ऐसा मुझसे देवगुरु बृहस्पति ने कहा, यह भली-भाँति जानकर।
श्लोक 39 (skanda.6.70.39)
अथोवाच विहस्योच्चैः शंकरस्त्रिदशेश्वरम्॥ करिष्यामि वचः क्षिप्रं तव शक्र न संशयः
athovāca vihasyoccaiḥ śaṁkarastridaśeśvaram kariṣyāmi vacaḥ kṣipraṁ tava śakra na saṁśayaḥ
तब शंकर ने ज़ोर से हँसते हुए त्रिदशेश्वर इन्द्र से कहा — 'हे शक्र! मैं शीघ्र ही तुम्हारी बात मानूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं।'
श्लोक 40 (skanda.6.70.40)
पुत्रमुत्पादयिष्यामि सर्वदैत्यविनाशकम्॥ यं त्वं सेनापतिं कृत्वा जयं प्राप्स्यसि सर्वदा
putramutpādayiṣyāmi sarvadaityavināśakam yaṁ tvaṁ senāpatiṁ kṛtvā jayaṁ prāpsyasi sarvadā
'मैं ऐसा पुत्र उत्पन्न करूँगा, जो समस्त दैत्यों का नाशक होगा, जिसे सेनापति बनाकर तुम सदा विजय प्राप्त करोगे।'
श्लोक 41 (skanda.6.70.41)
एवमुक्त्वा महादेवो गत्वा कैलास पर्वतम्॥ गौर्या समं ततश्चक्रे कामधर्मं यथोचितम्
evamuktvā mahādevo gatvā kailāsa parvatam gauryā samaṁ tataścakre kāmadharmaṁ yathocitam
ऐसा कहकर महादेव कैलास पर्वत पर गए, और वहाँ गौरी के साथ विधिवत् कामधर्म में प्रवृत्त हुए।
श्लोक 42 (skanda.6.70.42)
हावैर्भावैः समोपेतं हास्यैरन्यैस्तदात्मिकैः॥ यावद्वर्षसहस्रांतं दिव्यं चैव निमेषवत्
hāvairbhāvaiḥ samopetaṁ hāsyairanyaistadātmikaiḥ yāvadvarṣasahasrāṁtaṁ divyaṁ caiva nimeṣavat
भावभंगिमाओं तथा हास्य से युक्त होकर, वह दिव्य सहस्र वर्षों तक चला, फिर भी वह एक क्षण के समान ही व्यतीत हुआ।
श्लोक 43 (skanda.6.70.43)
अथ देवगणाः सर्वे भयसंत्रस्तमानसाः॥ चक्रुर्मंत्रं तदर्थं हि तारकेण प्रपीडिताः
atha devagaṇāḥ sarve bhayasaṁtrastamānasāḥ cakrurmaṁtraṁ tadarthaṁ hi tārakeṇa prapīḍitāḥ
तब भय से व्याकुल मन वाले समस्त देवगण, तारक से पीड़ित होकर, इस विषय में परस्पर मंत्रणा करने लगे।
श्लोक 44 (skanda.6.70.44)
सहस्रं वत्सराणां तु रतासक्तस्य शूलिनः॥ अतिक्रांतं न देवानां तेन कृत्यं विनिर्मितम्
sahasraṁ vatsarāṇāṁ tu ratāsaktasya śūlinaḥ atikrāṁtaṁ na devānāṁ tena kṛtyaṁ vinirmitam
शूलधारी शिव के काम-भोग में लीन रहते हुए एक सहस्र वर्ष बीत गए, फिर भी देवताओं का वह कार्य सिद्ध नहीं हुआ।
श्लोक 45 (skanda.6.70.45)
तस्माद्गच्छामहे तत्र यत्र देवो महेश्वरः॥ संतिष्ठते समं गौर्या कैलासे विजने स्थितः
tasmādgacchāmahe tatra yatra devo maheśvaraḥ saṁtiṣṭhate samaṁ gauryā kailāse vijane sthitaḥ
'अतः चलें वहाँ, जहाँ महादेव, गौरी के साथ, कैलास पर एकांत में विराजमान हैं।'
श्लोक 46 (skanda.6.70.46)
ततस्तत्रैव संजग्मुः सर्वे देवाः सवासवाः॥ उद्वहन्तः परामार्तिं तारकारिसमुद्भवाम्
tatastatraiva saṁjagmuḥ sarve devāḥ savāsavāḥ udvahantaḥ parāmārtiṁ tārakārisamudbhavām
तब इन्द्र सहित समस्त देवता, तारकासुर से उत्पन्न परम पीड़ा को लिए हुए, वहीं एकत्र हो गए।
श्लोक 47 (skanda.6.70.47)
अथ कैलासमासाद्य यावद्यांति भवांतिकम्॥ निषिद्धा नंदिना तावन्न गंतव्यमतः परम्
atha kailāsamāsādya yāvadyāṁti bhavāṁtikam niṣiddhā naṁdinā tāvanna gaṁtavyamataḥ param
तब कैलास पर पहुँचकर, जैसे ही वे शिव के समीप जाने लगे, नंदी ने उन्हें रोक दिया — 'आगे नहीं जाया जा सकता।'
श्लोक 48 (skanda.6.70.48)
रहस्ये भगवान्सार्धं पार्वत्या समवस्थितः॥ अस्माकमपि नो गम्यं तस्मात्तावन्न गम्यताम्
rahasye bhagavānsārdhaṁ pārvatyā samavasthitaḥ asmākamapi no gamyaṁ tasmāttāvanna gamyatām
'भगवान् पार्वती के साथ एकांत में हैं; हम स्वयं भी नहीं जा सकते; अतः तुम भी वहाँ मत जाओ।'
श्लोक 49 (skanda.6.70.49)
ततस्तैर्विबुधैः सर्वैः प्रेषितस्तत्र चानिलः॥ किं करोति महादेवः शीघ्रं विज्ञायतामिति
tatastairvibudhaiḥ sarvaiḥ preṣitastatra cānilaḥ kiṁ karoti mahādevaḥ śīghraṁ vijñāyatāmiti
तब उन समस्त देवताओं ने वायु को वहाँ भेजा — 'जाकर शीघ्र पता लगाओ कि महादेव क्या कर रहे हैं।'
श्लोक 50 (skanda.6.70.50)
अथ वायुर्गतस्तत्र यत्रास्ते भगवाञ्छिवः॥ गौर्या सह रतासक्त आनन्दं परमं गतः
atha vāyurgatastatra yatrāste bhagavāñchivaḥ gauryā saha ratāsakta ānandaṁ paramaṁ gataḥ
तब वायु वहाँ गया, जहाँ भगवान् शिव गौरी के साथ काम-भोग में लीन, परम आनंद को प्राप्त थे।
श्लोक 51 (skanda.6.70.51)
अथ प्रचलिते शुक्रे स्थानादप्राप्तयोनिके॥ देवेन वीक्षितो वायुर्नातिदूरे व्यवस्थितः
atha pracalite śukre sthānādaprāptayonike devena vīkṣito vāyurnātidūre vyavasthitaḥ
तभी जब वीर्य अपने स्थान से गर्भाशय में पहुँचे बिना ही चलित हो गया, तब भगवान् ने वायु को न अधिक दूर खड़ा देखा।
श्लोक 52 (skanda.6.70.52)
ततो व्रीडा समोपेतस्तत्क्षणादेव चोत्थितः॥ भावासक्तां प्रियां त्यक्त्वा मा मोत्तिष्ठेतिवादिनीम्
tato vrīḍā samopetastatkṣaṇādeva cotthitaḥ bhāvāsaktāṁ priyāṁ tyaktvā mā mottiṣṭhetivādinīm
तब लज्जा से भरकर वे उसी क्षण उठ खड़े हुए, अपनी भावासक्त प्रिया को छोड़कर, जो कह रही थीं — 'मत उठो, मत उठो।'
श्लोक 53 (skanda.6.70.53)
अब्रवीदथ तं वायुं विनयावनतं स्थितम्॥ किमर्थं त्वमिहायातः कच्चित्क्षेमं दिवौकसाम्
abravīdatha taṁ vāyuṁ vinayāvanataṁ sthitam kimarthaṁ tvamihāyātaḥ kaccitkṣemaṁ divaukasām
तब उन्होंने विनयपूर्वक झुके हुए उस वायु से कहा — 'तुम यहाँ किस लिए आए हो? क्या देवताओं का कुशल है?'
श्लोक 54 (skanda.6.70.54)
वायुरुवाच॥ एते शक्रादयो देवा नंदिना विनिवारिताः॥ तारकेण हतोत्साहास्तिष्ठंति गिरिरोधसि
vāyuruvāca ete śakrādayo devā naṁdinā vinivāritāḥ tārakeṇa hatotsāhāstiṣṭhaṁti girirodhasi
वायु ने कहा — 'ये इन्द्र आदि देवता, नंदी द्वारा रोके गए, तारक से हतोत्साह होकर, इस पर्वत की तलहटी में खड़े हैं।'
श्लोक 55 (skanda.6.70.55)
तस्मादेतान्समाभाष्य समाश्वास्य च सादरम्॥ प्रेषयस्व द्रुतं तत्र यत्र ते दानवाः स्थिताः
tasmādetānsamābhāṣya samāśvāsya ca sādaram preṣayasva drutaṁ tatra yatra te dānavāḥ sthitāḥ
'अतः इनसे बात करके, आदरपूर्वक उन्हें आश्वस्त करके, शीघ्र उन्हें वहाँ भेज दीजिए जहाँ वे दानव स्थित हैं।'
श्लोक 56 (skanda.6.70.56)
अथ तानाह्वयामाम तत्क्षणात्त्रिपुरांतकः॥ संप्राह चविषण्णास्यः कृतांजलिपुटान्स्थितान्
atha tānāhvayāmāma tatkṣaṇāttripurāṁtakaḥ saṁprāha caviṣaṇṇāsyaḥ kṛtāṁjalipuṭānsthitān
तब त्रिपुरांतक शिव ने उसी क्षण उन्हें बुलाया, और उदास मुख से हाथ जोड़कर खड़े उन देवताओं से कहा।
श्लोक 57 (skanda.6.70.57)
श्रीभगवानुवाच॥ युष्मत्कृते समारंभः पुत्रार्थं यो मया कृतः॥ स्वस्थानाच्चलिते शुक्रे कृतो मोघोद्य वायुना
śrībhagavānuvāca yuṣmatkṛte samāraṁbhaḥ putrārthaṁ yo mayā kṛtaḥ svasthānāccalite śukre kṛto moghodya vāyunā
भगवान् ने कहा — 'तुम्हारे लिए पुत्रोत्पत्ति हेतु मैंने जो प्रयास आरंभ किया था, वह आज वायु के कारण वीर्य के स्थानच्युत हो जाने से व्यर्थ हो गया।'
श्लोक 58 (skanda.6.70.58)
एतद्वीर्यं मया धैर्यात्स्तंभितं लिंगमध्यगम्॥ अमोघं तिष्ठते सर्वं क्व दधामि निवेद्यताम्
etadvīryaṁ mayā dhairyātstaṁbhitaṁ liṁgamadhyagam amoghaṁ tiṣṭhate sarvaṁ kva dadhāmi nivedyatām
'यह वीर्य मैंने धैर्यपूर्वक रोककर लिंग के मध्य में ही स्तंभित कर रखा है, यह पूर्ण रूप से अमोघ ही रहेगा; बताओ, इसे कहाँ रखूँ।'
श्लोक 59 (skanda.6.70.59)
येन संजायते पुत्रो दानवांतकरः परः॥ सेनानाथश्च युष्माकं दुर्द्धरः समरे परैः
yena saṁjāyate putro dānavāṁtakaraḥ paraḥ senānāthaśca yuṣmākaṁ durddharaḥ samare paraiḥ
'जिससे एक परम पुत्र उत्पन्न हो, जो दानवों का नाशक हो, तथा तुम्हारी सेना का सेनापति हो, जिसे शत्रु युद्ध में परास्त न कर सकें।'
श्लोक 60 (skanda.6.70.60)
एतत्कल्पाग्निसंकाशं धर्तुं शक्नोति नापरः॥ विना वैश्वानरं तस्माद्दधात्वेष सनातनम्
etatkalpāgnisaṁkāśaṁ dhartuṁ śaknoti nāparaḥ vinā vaiśvānaraṁ tasmāddadhātveṣa sanātanam
'प्रलयाग्नि के समान इस तेज को वैश्वानर के अतिरिक्त कोई और धारण नहीं कर सकता; अतः यह सनातन अग्नि इसे धारण करे।'
श्लोक 61 (skanda.6.70.61)
येन तत्र प्रमुञ्चामि सुताय विजयाय च॥ एतद्वीर्यं महातीव्रं द्वादशार्कसमप्रभम्
yena tatra pramuñcāmi sutāya vijayāya ca etadvīryaṁ mahātīvraṁ dvādaśārkasamaprabham
'जिससे मैं फिर पुत्रोत्पत्ति और विजय के लिए, बारह सूर्यों के समान तेजस्वी इस अत्यंत प्रचंड वीर्य को वहाँ छोड़ सकूँ।'
श्लोक 62 (skanda.6.70.62)
अथ प्राहुः सुराः सर्वे वह्निं संश्लाघ्य सादराः॥ त्वं धारयाग्ने वक्त्रांते वीर्यमेतद्भवोद्भवम्
atha prāhuḥ surāḥ sarve vahniṁ saṁślāghya sādarāḥ tvaṁ dhārayāgne vaktrāṁte vīryametadbhavodbhavam
तब समस्त देवताओं ने अग्नि की प्रशंसा करते हुए आदरपूर्वक कहा — 'हे अग्नि! शिव से उत्पन्न इस वीर्य को अपने मुख में धारण करो।'
श्लोक 63 (skanda.6.70.63)
ततः प्रसारयामास स्ववक्त्रं पावको द्रुतम्॥ कुर्वञ्छक्रसमादेशमविकल्पेन चेतसा
tataḥ prasārayāmāsa svavaktraṁ pāvako drutam kurvañchakrasamādeśamavikalpena cetasā
तब अग्नि ने शीघ्र ही अपना मुख फैला दिया, इन्द्र की आज्ञा का पालन करते हुए, बिना किसी संकोच के।
श्लोक 64 (skanda.6.70.64)
शंकरोऽप्यक्षिपत्तत्र कामबाणप्रपीडितः॥ गौरीं भगवतीं ध्यायन्नानन्दं परमं गतः
śaṁkaro'pyakṣipattatra kāmabāṇaprapīḍitaḥ gaurīṁ bhagavatīṁ dhyāyannānandaṁ paramaṁ gataḥ
और कामबाण से पीड़ित शंकर ने भी, भगवती गौरी का ध्यान करते हुए तथा परम आनंद में लीन होकर, वहाँ उस वीर्य को डाल दिया।
श्लोक 65 (skanda.6.70.65)
पावकोऽपि भृशं तेन कल्पाग्निसदृशेन च॥ दह्यमानोऽक्षिपद्भूमौ शरस्तंबे सुविस्तरे
pāvako'pi bhṛśaṁ tena kalpāgnisadṛśena ca dahyamāno'kṣipadbhūmau śarastaṁbe suvistare
प्रलयाग्नि के समान उस वीर्य से अत्यंत जलते हुए अग्नि ने भी उसे भूमि पर, एक विस्तृत सरकंडों के झुरमुट में डाल दिया।
श्लोक 66 (skanda.6.70.66)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्ता भ्रममाणा इतस्ततः॥ भार्यास्तत्र मुनीनां ताः षण्णां षट्कृत्तिकाः शुभाः
etasminnaṁtare prāptā bhramamāṇā itastataḥ bhāryāstatra munīnāṁ tāḥ ṣaṇṇāṁ ṣaṭkṛttikāḥ śubhāḥ
इसी बीच वहाँ मुनियों की पत्नियाँ, वे छह शुभ कृत्तिकाएँ, इधर-उधर भ्रमण करती हुई आ पहुँचीं।
श्लोक 67 (skanda.6.70.67)
तासां निदेशयामास स्वयमेव शतक्रतुः॥ एतद्बीजं त्रिनेत्रस्य परिपाल्यं प्रयत्नतः
tāsāṁ nideśayāmāsa svayameva śatakratuḥ etadbījaṁ trinetrasya paripālyaṁ prayatnataḥ
उन्हें स्वयं शतक्रतु इन्द्र ने ही आदेश दिया — 'त्रिनेत्र शिव के इस बीज का बड़े यत्न से पालन करना है।'
श्लोक 68 (skanda.6.70.68)
अत्र संपत्स्यते पुत्रो द्वादशार्कसमप्रभः॥ भवतीनामपि प्रायः पुत्रत्वं संप्रयास्यति
atra saṁpatsyate putro dvādaśārkasamaprabhaḥ bhavatīnāmapi prāyaḥ putratvaṁ saṁprayāsyati
'यहीं एक पुत्र उत्पन्न होगा, जो बारह सूर्यों के समान तेजस्वी होगा; और वह प्रायः तुम्हारा भी पुत्रत्व प्राप्त करेगा।'