नागर खण्ड · अध्याय 71
स्कन्दस्थापितशक्तिमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.6.71.1)
सूत उवाच॥ तास्तथेति प्रतिज्ञाय चक्रुस्तच्छक्रशासनम्॥ सूतिकागृहधर्मे यत्तच्चक्रुस्तस्य सर्वशः
sūta uvāca tāstatheti pratijñāya cakrustacchakraśāsanam sūtikāgṛhadharme yattaccakrustasya sarvaśaḥ
सूत जी बोले -- "ऐसा ही होगा" कहकर उन्होंने (कृत्तिकाओं ने) इन्द्र की आज्ञा का पालन किया और सूतिकागृह (प्रसूति-गृह) से संबंधित समस्त धर्मकृत्य उस बालक के लिये सम्पन्न किये।
श्लोक 2 (skanda.6.71.2)
अथान्यदिवसे बालो द्वादशार्कसमद्युतिः॥ संजज्ञे तेन वीर्येण द्विभुजैकमुखः शुभः
athānyadivase bālo dvādaśārkasamadyutiḥ saṁjajñe tena vīryeṇa dvibhujaikamukhaḥ śubhaḥ
फिर दूसरे दिन उसी वीर्य से बारह सूर्यों के समान तेजस्वी, दो भुजाओं और एक मुखवाला एक शुभ बालक उत्पन्न हुआ।
श्लोक 3 (skanda.6.71.3)
यथासौ जातमात्रस्तु प्ररुरोद सुदुःखितः॥ तच्छ्रुत्वा रुदितं सर्वाः कृत्तिकास्तमुपागताः
yathāsau jātamātrastu praruroda suduḥkhitaḥ tacchrutvā ruditaṁ sarvāḥ kṛttikāstamupāgatāḥ
जन्म लेते ही वह अत्यंत दुःखी होकर रोने लगा; उसका रुदन सुनकर समस्त कृत्तिकाएँ उसके पास आ गईं।
श्लोक 4 (skanda.6.71.4)
महासेनोऽपि संवीक्ष्य मातॄस्ताः समुपागताः॥ सोत्कण्ठः षण्मुखो जातो द्वादशाक्षभुजस्तथा
mahāseno'pi saṁvīkṣya mātṝstāḥ samupāgatāḥ sotkaṇṭhaḥ ṣaṇmukho jāto dvādaśākṣabhujastathā
महासेन (स्कन्द) भी उन समागत माताओं को देखकर उत्कण्ठावश छह मुखों, बारह नेत्रों और बारह भुजाओं से युक्त हो गये।
श्लोक 5 (skanda.6.71.5)
एकैकस्याः पृथक्तेन प्रपपौ प्रयतः स्तनम्॥ द्वाभ्यामालिंगयामास भुजाभ्यां स्नेहपूर्वकम्
ekaikasyāḥ pṛthaktena prapapau prayataḥ stanam dvābhyāmāliṁgayāmāsa bhujābhyāṁ snehapūrvakam
उन्होंने पृथक्-पृथक् प्रत्येक माता का स्तनपान भक्तिपूर्वक किया और दो भुजाओं से स्नेहपूर्वक उनका आलिंगन किया।
श्लोक 6 (skanda.6.71.6)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्ता ब्रह्मविष्णुशिवादयः॥ सर्वे देवाः सहेन्द्रेण गन्धर्वाप्सरसस्तथा
etasminnaṁtare prāptā brahmaviṣṇuśivādayaḥ sarve devāḥ sahendreṇa gandharvāpsarasastathā
इसी बीच ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि तथा इन्द्र सहित समस्त देवगण और गन्धर्व-अप्सराएँ भी वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 7 (skanda.6.71.7)
महोत्सवोऽथ संजज्ञे तस्मिन्स्थाने निरर्गलः॥ गीतवाद्यप्रणादेन येन विश्वं प्रपूरितम्
mahotsavo'tha saṁjajñe tasminsthāne nirargalaḥ gītavādyapraṇādena yena viśvaṁ prapūritam
तब उस स्थान पर एक निर्बाध महोत्सव हुआ, जिसके गीत-वाद्यों की ध्वनि से सारा विश्व भर गया।
श्लोक 8 (skanda.6.71.8)
रंभाद्या ननृतुस्तस्य विलासिन्यो दिवौकसाम्॥ जगुश्च मुख्यगन्धर्वाश्चित्रांगदमुखाश्च ये
raṁbhādyā nanṛtustasya vilāsinyo divaukasām jaguśca mukhyagandharvāścitrāṁgadamukhāśca ye
रम्भा आदि देवताओं की विलासिनी अप्सराओं ने उसके लिये नृत्य किया, और चित्रांगद आदि प्रमुख गन्धर्वों ने गान किया।
श्लोक 9 (skanda.6.71.9)
ततस्तु देवताः सर्वास्तस्य नाम प्रचक्रिरे॥ स्कन्दनाद्रेतसो भूमौ स्कन्द इत्येव सादरम्
tatastu devatāḥ sarvāstasya nāma pracakrire skandanādretaso bhūmau skanda ityeva sādaram
तत्पश्चात् समस्त देवताओं ने आदरपूर्वक उसका नाम रखा -- चूँकि वह वीर्य से पृथ्वी पर स्खलित (स्कन्न) हुआ था, अतः उसे "स्कन्द" कहा गया।
श्लोक 10 (skanda.6.71.10)
अथ तस्य कुमारस्य तदा तत्राभिषेचनम्॥ सेनापत्यं कृतं साक्षाद्देवानां शंभुना स्वयम्
atha tasya kumārasya tadā tatrābhiṣecanam senāpatyaṁ kṛtaṁ sākṣāddevānāṁ śaṁbhunā svayam
फिर उसी स्थान पर उस कुमार का अभिषेक किया गया, और स्वयं शम्भु ने साक्षात् उसे देवताओं का सेनापतित्व प्रदान किया।
श्लोक 11 (skanda.6.71.11)
तस्य शक्तिः स्वयं दत्ता विधिनाऽद्भुतदर्शना॥ अमोघा विजयार्थाय दैत्यपक्षक्षयाय च
tasya śaktiḥ svayaṁ dattā vidhinā'dbhutadarśanā amoghā vijayārthāya daityapakṣakṣayāya ca
विधाता (ब्रह्मा) ने स्वयं उसे विजय हेतु तथा दैत्यपक्ष के विनाश हेतु अद्भुत दर्शनवाली, अमोघ शक्ति प्रदान की।
श्लोक 12 (skanda.6.71.12)
मयूरो वाहनार्थाय त्र्यंबकेण सुशीघ्रतः॥ दिव्यास्त्राणि महेन्द्रेण विष्णुनाथ महात्मना
mayūro vāhanārthāya tryaṁbakeṇa suśīghrataḥ divyāstrāṇi mahendreṇa viṣṇunātha mahātmanā
त्र्यम्बक (शिव) ने शीघ्रतापूर्वक वाहन के रूप में मयूर दिया, तथा महात्मा महेन्द्र और विष्णु भगवान ने उसे दिव्य अस्त्र प्रदान किये।
श्लोक 13 (skanda.6.71.13)
ततोऽभीष्टानि शस्त्राणि देवैः सर्वैः पृथक्पृथक्॥ तस्य दत्तानि संतुष्टैस्तथा मातृगणैरपि
tato'bhīṣṭāni śastrāṇi devaiḥ sarvaiḥ pṛthakpṛthak tasya dattāni saṁtuṣṭaistathā mātṛgaṇairapi
तत्पश्चात् समस्त देवताओं ने प्रसन्न होकर पृथक्-पृथक् अपने-अपने अभीष्ट शस्त्र उसे प्रदान किये, और मातृगणों ने भी वैसा ही किया।
श्लोक 14 (skanda.6.71.14)
ततस्तमग्रतः कृत्वा सेनानाथं सुरेश्वराः॥ जग्मुः ससैनिकास्तत्र तारको यत्र संस्थितः
tatastamagrataḥ kṛtvā senānāthaṁ sureśvarāḥ jagmuḥ sasainikāstatra tārako yatra saṁsthitaḥ
तब सुरेश्वरों ने उसे सेनानायक के रूप में आगे रखकर सैनिकों सहित वहाँ प्रस्थान किया, जहाँ तारक स्थित था।
श्लोक 15 (skanda.6.71.15)
तारकोऽपि समालोक्य देवान्स्वयमुपागतान्॥ युद्धार्थं हर्षसंयुक्तः सम्मुखः सत्वरं ययौ
tārako'pi samālokya devānsvayamupāgatān yuddhārthaṁ harṣasaṁyuktaḥ sammukhaḥ satvaraṁ yayau
तारक भी स्वयं युद्ध हेतु आये हुए देवताओं को देखकर हर्षपूर्वक शीघ्र ही उनके सम्मुख गया।
श्लोक 16 (skanda.6.71.16)
ततोऽभूत्सुमहद्युद्धं देवानां दानवैः सह॥ कोपसंरक्तनेत्राणां मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्
tato'bhūtsumahadyuddhaṁ devānāṁ dānavaiḥ saha kopasaṁraktanetrāṇāṁ mṛtyuṁ kṛtvā nivartanam
तत्पश्चात् क्रोध से रक्त-नेत्र हुए देवताओं और दानवों के बीच मृत्यु को पीछे छोड़ता हुआ अत्यंत भीषण युद्ध हुआ।
श्लोक 17 (skanda.6.71.17)
अथ स्कन्देन संवीक्ष्य दूरस्थं तारकं रणे॥ समाहूय ततो मुक्ता सा शक्तिस्तस्य मृत्यवे
atha skandena saṁvīkṣya dūrasthaṁ tārakaṁ raṇe samāhūya tato muktā sā śaktistasya mṛtyave
तब स्कन्द ने रणभूमि में दूर खड़े तारक को देखकर उस शक्ति को बुलाकर उसके वध हेतु छोड़ दिया।
श्लोक 18 (skanda.6.71.18)
अथासौ हृदयं भित्त्वा तस्य दैत्यस्य दारुणा॥ चमत्कारपुरोपांते पतिता रुधिरोक्षिता
athāsau hṛdayaṁ bhittvā tasya daityasya dāruṇā camatkārapuropāṁte patitā rudhirokṣitā
वह भयंकर शक्ति उस दैत्य के हृदय को विदीर्ण कर रक्त से लथपथ चमत्कारपुर के समीप जा गिरी।
श्लोक 19 (skanda.6.71.19)
तारकस्तु गतो नाशं मुक्तः प्राणैश्च तत्क्षणात्॥ ततो देवगणाः सर्वे संहृष्टास्तं महाबलम्
tārakastu gato nāśaṁ muktaḥ prāṇaiśca tatkṣaṇāt tato devagaṇāḥ sarve saṁhṛṣṭāstaṁ mahābalam
तारक तत्क्षण ही प्राणों से मुक्त होकर नष्ट हो गया; तब समस्त देवगण अत्यंत हर्षित होकर,
श्लोक 20 (skanda.6.71.20)
स्तोत्रैर्बहुविधैः स्तुत्वा प्रोचुस्तस्मिन्हते सति॥ गताश्च त्रिदिवं तूर्णं सह शक्रेण निर्भयाः
stotrairbahuvidhaiḥ stutvā procustasminhate sati gatāśca tridivaṁ tūrṇaṁ saha śakreṇa nirbhayāḥ
उस महाबली स्कन्द की विविध स्तोत्रों से स्तुति कर, तारक के मारे जाने पर, उससे यह कहकर निर्भय होकर इन्द्र सहित शीघ्र स्वर्गलोक चले गये।
श्लोक 21 (skanda.6.71.21)
स्कन्दोऽपि तां समादाय शक्तिं तत्र पुरोत्तमे॥ स्थापयामास येनैव रक्तशृंगोऽभवद्दृढः
skando'pi tāṁ samādāya śaktiṁ tatra purottame sthāpayāmāsa yenaiva raktaśṛṁgo'bhavaddṛḍhaḥ
स्कन्द ने भी उस शक्ति को लेकर उसी उत्तम नगर में स्थापित किया, जिससे रक्तशृंग पर्वत दृढ़ हो गया।
श्लोक 22 (skanda.6.71.22)
ऋषय ऊचुः॥ रक्तशृंगः कथं तेन निश्चलोऽपि दृढीकृतः॥ कस्य वाक्येन नो ब्रूहि विस्तरेण महामते
ṛṣaya ūcuḥ raktaśṛṁgaḥ kathaṁ tena niścalo'pi dṛḍhīkṛtaḥ kasya vākyena no brūhi vistareṇa mahāmate
ऋषियों ने कहा -- रक्तशृंग, चंचल होते हुए भी, उनके द्वारा कैसे दृढ़ किया गया? किसके वचन से? हे महामते! यह हमें विस्तार से बताइये।
श्लोक 23 (skanda.6.71.23)
सूत उवाच॥ यदा वै भूमिकम्पस्तु संप्रजातः सुदारुणः॥ रक्तशृङ्गः प्रचलितः स्वस्थानादतिवेगतः
sūta uvāca yadā vai bhūmikampastu saṁprajātaḥ sudāruṇaḥ raktaśṛṅgaḥ pracalitaḥ svasthānādativegataḥ
सूत जी बोले -- जब एक अत्यंत भीषण भूकम्प उत्पन्न हुआ, तब रक्तशृंग अपने स्थान से अत्यंत वेग से चलायमान हो गया।
श्लोक 24 (skanda.6.71.24)
तस्य दैत्यस्य पातेन यथान्ये पर्वतोत्तमाः॥ अथ हर्म्याणि सर्वाणि चमत्कारपुरे तदा
tasya daityasya pātena yathānye parvatottamāḥ atha harmyāṇi sarvāṇi camatkārapure tadā
उस दैत्य के गिरने से, जैसे अन्य श्रेष्ठ पर्वत हिल उठते हैं वैसे ही यह भी हिल उठा, और तब चमत्कारपुर के समस्त भवन,
श्लोक 25 (skanda.6.71.25)
शीर्णानि चलिते तस्मिन्पर्वते व्यथिता द्विजाः॥ प्रायशो निधनं प्राप्तास्तथाऽन्ये मूर्छयार्दिताः
śīrṇāni calite tasminparvate vyathitā dvijāḥ prāyaśo nidhanaṁ prāptāstathā'nye mūrchayārditāḥ
उस पर्वत के हिलने से जीर्ण-शीर्ण हो गये; ब्राह्मण व्यथित हो गये, अधिकांश की मृत्यु हो गई और अन्य मूर्छा से पीड़ित हुए।
श्लोक 26 (skanda.6.71.26)
हतशेषास्ततो विप्रा गत्वा स्कन्दं क्रुधान्विताः॥ प्रोचुश्च किमिदं पाप त्वया कृतमबुद्धिना
hataśeṣāstato viprā gatvā skandaṁ krudhānvitāḥ procuśca kimidaṁ pāpa tvayā kṛtamabuddhinā
तब बचे हुए विप्रगण क्रोधित होकर स्कन्द के पास गये और बोले -- "तुमने बुद्धिहीन होकर यह कैसा पाप किया है?"
श्लोक 27 (skanda.6.71.27)
नाशं नीता वयं सर्वे सपुत्रपशुबाधवाः॥ तस्माच्छापं प्रदास्यामो वयं दुःखेन दुःखिताः
nāśaṁ nītā vayaṁ sarve saputrapaśubādhavāḥ tasmācchāpaṁ pradāsyāmo vayaṁ duḥkhena duḥkhitāḥ
"हम सब अपने पुत्रों, पशुओं और बन्धुओं सहित विनाश को प्राप्त हो गये हैं; अतः दुःख से दुःखी होकर हम तुम्हें शाप देंगे।"
श्लोक 28 (skanda.6.71.28)
स्कन्द उवाच॥ हिताय सर्वलोकानां मयैतत्समनुष्ठितम्॥ यद्धतो दानवो रौद्रो नान्यथा द्विजसत्तमाः
skanda uvāca hitāya sarvalokānāṁ mayaitatsamanuṣṭhitam yaddhato dānavo raudro nānyathā dvijasattamāḥ
स्कन्द बोले -- यह मैंने समस्त लोकों के हित के लिये किया है, जिससे वह भयंकर दानव मारा गया, अन्यथा नहीं, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो!
श्लोक 29 (skanda.6.71.29)
प्रसादः क्रियतां तस्मान्मान्या मे ब्राह्मणाः सदा॥ मृतानपि द्विजान्सर्वानहं तानमृताश्रयात्
prasādaḥ kriyatāṁ tasmānmānyā me brāhmaṇāḥ sadā mṛtānapi dvijānsarvānahaṁ tānamṛtāśrayāt
"अतः प्रसन्न होइये; ब्राह्मण सदा मेरे लिये मान्य हैं। मृत हुए उन सभी ब्राह्मणों को मैं अमृत के आश्रय से..."
श्लोक 30 (skanda.6.71.30)
पुनर्जीवितसंयुक्तान्करिष्यामि न संशयः॥ तथा सुनिश्चलं शैलं करिष्यामि स्वशक्तितः
punarjīvitasaṁyuktānkariṣyāmi na saṁśayaḥ tathā suniścalaṁ śailaṁ kariṣyāmi svaśaktitaḥ
"...मैं पुनः निःसंदेह जीवित कर दूँगा, तथा अपनी शक्ति से इस पर्वत को भी सुनिश्चल बना दूँगा।"
श्लोक 31 (skanda.6.71.31)
एवमुक्त्वा समादाय तां शक्तिं रुधिरोक्षिताम्॥ चक्रे स्थापनमस्यास्तु रक्तशृङ्गस्य मूर्धनि
evamuktvā samādāya tāṁ śaktiṁ rudhirokṣitām cakre sthāpanamasyāstu raktaśṛṅgasya mūrdhani
ऐसा कहकर उन्होंने रक्त से सनी उस शक्ति को लेकर रक्तशृंग के शिखर पर उसकी स्थापना की।
श्लोक 32 (skanda.6.71.32)
ततः प्रोवाच संहृष्टो देवतानां चतुष्टयम्॥ आंबवृद्धां तथैवाम्रां माहित्थां च चमत्करीम्
tataḥ provāca saṁhṛṣṭo devatānāṁ catuṣṭayam āṁbavṛddhāṁ tathaivāmrāṁ māhitthāṁ ca camatkarīm
तब अत्यंत प्रसन्न होकर उन्होंने चार देवियों -- अम्बवृद्धा, आम्रा, माहित्था और चमत्करी -- को सम्बोधित किया।
श्लोक 33 (skanda.6.71.33)
युष्माभिर्निश्चलः कार्यो भूयोऽयं नगसत्तमः॥ प्रलयेऽपि यथा स्थानाद्रक्तशृङ्गश्चलेन्नहि
yuṣmābhirniścalaḥ kāryo bhūyo'yaṁ nagasattamaḥ pralaye'pi yathā sthānādraktaśṛṅgaścalennahi
"तुम्हें इस श्रेष्ठ पर्वत को पुनः इस प्रकार अचल बनाना है कि प्रलयकाल में भी रक्तशृंग अपने स्थान से न हिले।"
श्लोक 34 (skanda.6.71.34)
सदैव ख्यातिमायातु मन्नाम्ना पुरमुत्तमम्॥ युष्माकं ब्राह्मणाः सर्वे पूजां दास्यंति सर्वदा
sadaiva khyātimāyātu mannāmnā puramuttamam yuṣmākaṁ brāhmaṇāḥ sarve pūjāṁ dāsyaṁti sarvadā
"मेरे नाम से यह उत्तम नगर सदैव प्रसिद्धि को प्राप्त हो, और यहाँ के समस्त ब्राह्मण तुम्हें सदा पूजा अर्पित करें।"
श्लोक 35 (skanda.6.71.35)
बाढमित्येव ताः प्रोच्य चतुर्दिक्षु ततश्च तम्॥ शूलाग्रैः सुदृढं चक्रुः स्कन्दवाक्येन हर्षिताः
bāḍhamityeva tāḥ procya caturdikṣu tataśca tam śūlāgraiḥ sudṛḍhaṁ cakruḥ skandavākyena harṣitāḥ
"ऐसा ही हो" कहकर स्कन्द के वचन से हर्षित हुई उन देवियों ने चारों दिशाओं में शूल की नोकों से उसे अत्यंत दृढ़ कर दिया।
श्लोक 36 (skanda.6.71.36)
ततश्चामृतमादाय मृतानपि द्विजोत्तमान्॥ स्कन्दो जीवापयामास द्विजभक्तिपरायणः
tataścāmṛtamādāya mṛtānapi dvijottamān skando jīvāpayāmāsa dvijabhaktiparāyaṇaḥ
तत्पश्चात् अमृत लेकर, ब्राह्मणों के परम भक्त स्कन्द ने मृत हुए उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भी पुनर्जीवित कर दिया।
श्लोक 37 (skanda.6.71.37)
ततस्ते ब्राह्मणास्तत्र संहृष्टा वरमुत्तमम्॥ ददुस्तस्य स च प्राह मन्नामैतत्पुरोत्तमम्॥ सदैव ख्यातिमायातु एतन्मे हृदि वांछितम्
tataste brāhmaṇāstatra saṁhṛṣṭā varamuttamam dadustasya sa ca prāha mannāmaitatpurottamam sadaiva khyātimāyātu etanme hṛdi vāṁchitam
तब वहाँ के ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर उन्हें एक उत्तम वर दिया, और उन्होंने कहा -- "मेरे नाम से यह श्रेष्ठ नगर सदा प्रसिद्धि को प्राप्त हो -- यही मेरे हृदय की इच्छा है।"
श्लोक 38 (skanda.6.71.38)
ऋषय ऊचुः॥ एतत्स्कन्दपुरंनाम तव नाम्ना भविष्यति॥ चमत्कारपुरं तद्वत्सांप्रतं सुरसत्तम
ṛṣaya ūcuḥ etatskandapuraṁnāma tava nāmnā bhaviṣyati camatkārapuraṁ tadvatsāṁprataṁ surasattama
ऋषियों ने कहा -- यह नगर अब तुम्हारे नाम से "स्कन्दपुर" कहलायेगा, हे देवश्रेष्ठ, इस प्रकार यह अब चमत्कारपुर के स्थान पर होगा।
श्लोक 39 (skanda.6.71.39)
पूजां तव करिष्यामः कृत्वा प्रासादमुत्तमम्॥ तथैव देवताः सर्वाश्चतस्रोऽपि त्वया धृताः
pūjāṁ tava kariṣyāmaḥ kṛtvā prāsādamuttamam tathaiva devatāḥ sarvāścatasro'pi tvayā dhṛtāḥ
"हम एक उत्तम प्रासाद बनाकर तुम्हारी पूजा करेंगे; तथा तुम्हारे द्वारा स्थापित की गई वे चारों देवियाँ भी..."
श्लोक 40 (skanda.6.71.40)
सर्वाः संपूजयिष्यामः सर्वकृत्येषु सादरम्॥ एतां चं तावकीं शक्तिं सदा सुरवरोत्तम॥ विशेषात्पूजयिष्यामः षष्ठ्यां श्रद्धासमन्विताः
sarvāḥ saṁpūjayiṣyāmaḥ sarvakṛtyeṣu sādaram etāṁ caṁ tāvakīṁ śaktiṁ sadā suravarottama viśeṣātpūjayiṣyāmaḥ ṣaṣṭhyāṁ śraddhāsamanvitāḥ
"...हम उन सबकी सभी कार्यों में आदरपूर्वक पूजा करेंगे; और हे देवश्रेष्ठ! तुम्हारी इस शक्ति की भी हम षष्ठी तिथि को श्रद्धापूर्वक विशेष रूप से पूजा करेंगे।"
श्लोक 41 (skanda.6.71.41)
सूत उवाच॥ एवं स ब्राह्मणैः प्रोक्तो महासेनो महाबलः॥ स्थितस्तत्रैव तद्वाक्याज्ज्ञात्वा तत्क्षेत्रमुत्तमम्
sūta uvāca evaṁ sa brāhmaṇaiḥ prokto mahāseno mahābalaḥ sthitastatraiva tadvākyājjñātvā tatkṣetramuttamam
सूत जी बोले -- इस प्रकार ब्राह्मणों द्वारा कहे जाने पर, महाबली महासेन उनके वचन से उस स्थान को उत्तम तीर्थक्षेत्र जानकर वहीं स्थित हो गये।
श्लोक 42 (skanda.6.71.42)
यस्तं पूजयते भक्त्या चैत्रषष्ठ्यां सुभावतः॥ शुक्लायां तस्य संतुष्टिं कुरुते बर्हिवाहनः
yastaṁ pūjayate bhaktyā caitraṣaṣṭhyāṁ subhāvataḥ śuklāyāṁ tasya saṁtuṣṭiṁ kurute barhivāhanaḥ
जो कोई शुद्ध भाव से चैत्र मास की शुक्ल षष्ठी को भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, मयूरवाहन (स्कन्द) उससे संतुष्ट होते हैं।
श्लोक 43 (skanda.6.71.43)
तस्यां शक्तौ नरो यश्च कुर्यात्पृष्ठिनिघर्षणम्॥ पूजयित्वा तु पुष्पाद्यैः सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः॥ स न स्याद्रोगसंयुक्तो यावत्संवत्सरं द्विजाः
tasyāṁ śaktau naro yaśca kuryātpṛṣṭhinigharṣaṇam pūjayitvā tu puṣpādyaiḥ samyakchraddhāsamanvitaḥ sa na syādrogasaṁyukto yāvatsaṁvatsaraṁ dvijāḥ
और जो मनुष्य उस शक्ति की पुष्पादि से भलीभाँति श्रद्धापूर्वक पूजा करके अपनी पीठ उससे रगड़ता है, हे ब्राह्मणो! वह एक वर्ष तक रोगमुक्त रहता है।
श्लोक 44 (skanda.6.71.44)
एवं तत्र धृता शक्तिस्तेन स्कन्देन धीमता॥ रक्तशृंगस्य रक्षार्थं तत्पुरस्य विशेषतः
evaṁ tatra dhṛtā śaktistena skandena dhīmatā raktaśṛṁgasya rakṣārthaṁ tatpurasya viśeṣataḥ
इस प्रकार बुद्धिमान स्कन्द ने रक्तशृंग की तथा विशेषतः उस नगर की रक्षा के लिये वहाँ उस शक्ति को स्थापित किया।