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नागर खण्ड · अध्याय 72

धृतराष्ट्रादिकृतहाटकेश्वरक्षेत्रदर्शनवर्णनम्

अध्याय 71अध्याय-सूचीअध्याय 73

श्लोक 1 (skanda.6.72.1)

सूत उवाच॥ तत्रैव स्थापितं लिंगं धृतराष्ट्रेण भूभुजा॥ दुर्योधनेन चालोक्य सर्वपापैः प्रमुच्यते

sūta uvāca tatraiva sthāpitaṁ liṁgaṁ dhṛtarāṣṭreṇa bhūbhujā duryodhanena cālokya sarvapāpaiḥ pramucyate

सूत जी बोले -- वहीं राजा धृतराष्ट्र द्वारा एक लिंग की स्थापना की गई थी, दुर्योधन द्वारा भी; जो कोई उसे देखता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.6.72.2)

ऋषय ऊचुः॥ कस्मिन्काले नरेन्द्रेण धृतराष्ट्रेण भूभुजा॥ तत्र संस्थापितं लिंगं वद त्वं रौमहर्षणे

ṛṣaya ūcuḥ kasminkāle narendreṇa dhṛtarāṣṭreṇa bhūbhujā tatra saṁsthāpitaṁ liṁgaṁ vada tvaṁ raumaharṣaṇe

ऋषियों ने कहा -- हे रोमहर्षण-पुत्र! किस समय राजा धृतराष्ट्र ने वहाँ लिंग की स्थापना की थी? हमें बताइये।

श्लोक 3 (skanda.6.72.3)

सूत उवाच॥ आसीद्भानुमतीनाम बलभद्रसुता पुरा॥ सर्वलक्षणसंपन्ना रूपौदार्यगुणान्विता

sūta uvāca āsīdbhānumatīnāma balabhadrasutā purā sarvalakṣaṇasaṁpannā rūpaudāryaguṇānvitā

सूत जी बोले -- प्राचीन काल में बलभद्र की भानुमती नामक कन्या थी, जो सभी शुभ लक्षणों से युक्त तथा रूप, औदार्य आदि गुणों से सम्पन्न थी।

श्लोक 4 (skanda.6.72.4)

तां ददावथ पत्न्यर्थे धार्तराष्ट्राय धीमते॥ दुर्योधनाय संमन्त्र्य विष्णुना सह यादवः

tāṁ dadāvatha patnyarthe dhārtarāṣṭrāya dhīmate duryodhanāya saṁmantrya viṣṇunā saha yādavaḥ

विष्णु से परामर्श करके यादव (बलराम) ने उसे बुद्धिमान धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन को पत्नी रूप में प्रदान किया।

श्लोक 5 (skanda.6.72.5)

अथ नागपुरात्सर्वे भीष्मद्रोणादयश्च ये॥ कौरवाः प्रस्थितास्तूर्णं पुरीं द्वारवतीं प्रति

atha nāgapurātsarve bhīṣmadroṇādayaśca ye kauravāḥ prasthitāstūrṇaṁ purīṁ dvāravatīṁ prati

तब नागपुर से भीष्म-द्रोण आदि समस्त कौरव द्वारवती नगरी की ओर शीघ्र प्रस्थान कर गये।

श्लोक 6 (skanda.6.72.6)

तथा पांडुसुताः पंच परिवारसमन्विताः॥ सौभ्रात्रं मन्यमानास्ते दुर्योधनसमन्विताः॥ जग्मुर्द्वारवतीं हृष्टाः सैन्येन महतान्विताः

tathā pāṁḍusutāḥ paṁca parivārasamanvitāḥ saubhrātraṁ manyamānāste duryodhanasamanvitāḥ jagmurdvāravatīṁ hṛṣṭāḥ sainyena mahatānvitāḥ

और परिवार सहित पाण्डु के पाँचों पुत्र भी, इसे भाईचारे का अवसर मानते हुए, दुर्योधन के साथ बड़ी सेना सहित हर्षपूर्वक द्वारवती गये।

श्लोक 7 (skanda.6.72.7)

अथ क्रमेण गच्छंतस्ते सर्वे कुरुपाण्डवाः॥ आनर्तविषयं प्राप्ता धनधान्यसमाकुलम्

atha krameṇa gacchaṁtaste sarve kurupāṇḍavāḥ ānartaviṣayaṁ prāptā dhanadhānyasamākulam

तत्पश्चात् क्रमशः चलते हुए वे समस्त कुरु-पाण्डव धन-धान्य से परिपूर्ण आनर्त देश में पहुँचे।

श्लोक 8 (skanda.6.72.8)

सर्वपापहरं पुण्यं यत्र तत्क्षेत्रमुत्तमम्॥ हाटकेश्वरदेवस्य विख्यातं भुवनत्रये

sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ yatra tatkṣetramuttamam hāṭakeśvaradevasya vikhyātaṁ bhuvanatraye

वहाँ हाटकेश्वर देव का वह उत्तम, समस्त पापों को हरने वाला, पुण्यमय क्षेत्र है, जो तीनों लोकों में विख्यात है।

श्लोक 9 (skanda.6.72.9)

अथ प्राह विशुद्धात्मा वृद्धः कुरुपितामहः॥ धृतराष्ट्रं महीपालं सपुत्रं प्रहसन्निव

atha prāha viśuddhātmā vṛddhaḥ kurupitāmahaḥ dhṛtarāṣṭraṁ mahīpālaṁ saputraṁ prahasanniva

तब विशुद्धात्मा, वृद्ध कुरु-पितामह (भीष्म) ने मुस्कुराते हुए से, पुत्रों सहित राजा धृतराष्ट्र से कहा --

श्लोक 10 (skanda.6.72.10)

भीष्म उवाच॥ एतद्वत्स पुरा दृष्टं मया क्षेत्रमनुत्तमम्॥ हाटकेश्वरदेवस्य सर्वपातकनाशनम्

bhīṣma uvāca etadvatsa purā dṛṣṭaṁ mayā kṣetramanuttamam hāṭakeśvaradevasya sarvapātakanāśanam

भीष्म बोले -- हे वत्स! मैंने पूर्वकाल में हाटकेश्वर देव के इस अनुपम, समस्त पातकों का नाश करने वाले क्षेत्र को देखा था।

श्लोक 11 (skanda.6.72.11)

अत्राहं चैव निर्मुक्तः स्त्रीहत्योद्भवपातकात्॥ तस्मादत्रैव राजेंद्र तिष्ठामः पंचवासरान्

atrāhaṁ caiva nirmuktaḥ strīhatyodbhavapātakāt tasmādatraiva rājeṁdra tiṣṭhāmaḥ paṁcavāsarān

"यहीं मैं स्त्री-हत्या से उत्पन्न पाप से मुक्त हुआ था; अतः हे राजेन्द्र! हम यहीं पाँच दिन ठहरें,"

श्लोक 12 (skanda.6.72.12)

येन सर्वाणि पश्यामस्तीर्थान्यायतनानि च॥ यान्यत्र संति पुण्यानि मुनीनां भावितात्मनाम्

yena sarvāṇi paśyāmastīrthānyāyatanāni ca yānyatra saṁti puṇyāni munīnāṁ bhāvitātmanām

"जिससे हम यहाँ के भावितात्मा मुनियों के समस्त पुण्य तीर्थों और आयतनों (मन्दिरों) को देख सकें।"

श्लोक 13 (skanda.6.72.13)

अथ तद्वचनाद्राजा धृतराष्ट्रोंऽबिकासुतः॥ शतसंख्यैः सुतैः सार्धं कौतूहलसमन्वितः

atha tadvacanādrājā dhṛtarāṣṭroṁ'bikāsutaḥ śatasaṁkhyaiḥ sutaiḥ sārdhaṁ kautūhalasamanvitaḥ

तब उनके वचन से अम्बिका-पुत्र राजा धृतराष्ट्र, कौतूहल से भरकर, अपने सौ पुत्रों सहित,

श्लोक 14 (skanda.6.72.14)

जगाम सत्वरं तत्र यत्र तत्क्षेत्रमुत्तमम्॥ तपस्विगणसंकीर्णं युक्तं चैवाश्रमैः शुभैः

jagāma satvaraṁ tatra yatra tatkṣetramuttamam tapasvigaṇasaṁkīrṇaṁ yuktaṁ caivāśramaiḥ śubhaiḥ

उस उत्तम क्षेत्र में शीघ्र गये, जो तपस्वियों के समूहों से भरा हुआ था तथा शुभ आश्रमों से युक्त था,

श्लोक 15 (skanda.6.72.15)

ब्रह्मघोषेण महता नादितं सर्वतोदिशम्॥ वह्निपूजोत्थधूम्रेण कलुषीकृतपादपम्॥ क्रीडामृगैश्च संकीर्णं धावद्भिर्बहुभिस्तथा

brahmaghoṣeṇa mahatā nāditaṁ sarvatodiśam vahnipūjotthadhūmreṇa kaluṣīkṛtapādapam krīḍāmṛgaiśca saṁkīrṇaṁ dhāvadbhirbahubhistathā

जो चारों ओर वेदघोष की महती ध्वनि से गूँज रहा था, अग्नि-पूजा से उठे धुएँ से जिसके वृक्ष धूमिल हो गये थे, तथा जो क्रीड़ा करते हुए अनेक पालतू मृगों से भरा हुआ था।

श्लोक 16 (skanda.6.72.16)

ततो निवार्य सैन्यं स्वमुपद्रवभयान्नृपः॥ पञ्चभिः पांडवैः सार्धं शतसंख्यैस्तथा सुतैः

tato nivārya sainyaṁ svamupadravabhayānnṛpaḥ pañcabhiḥ pāṁḍavaiḥ sārdhaṁ śatasaṁkhyaistathā sutaiḥ

तब राजा ने उपद्रव के भय से अपनी सेना को रोककर, पाँचों पाण्डवों तथा अपने सौ पुत्रों सहित,

श्लोक 17 (skanda.6.72.17)

भीष्मेण सोमदत्तेन बाह्लीकेन समन्वितः॥ द्रोणाचार्येण वीरेण तत्पुत्रेण कृपेण च

bhīṣmeṇa somadattena bāhlīkena samanvitaḥ droṇācāryeṇa vīreṇa tatputreṇa kṛpeṇa ca

भीष्म, सोमदत्त, बाह्लीक, वीर आचार्य द्रोण, उनके पुत्र (अश्वत्थामा) तथा कृप के साथ,

श्लोक 18 (skanda.6.72.18)

सौबलेन च कर्णेन तथान्यैरपि पार्थिवैः॥ परिवारपरित्यक्तैस्तस्मिन्क्षेत्रे चचार सः

saubalena ca karṇena tathānyairapi pārthivaiḥ parivāraparityaktaistasminkṣetre cacāra saḥ

तथा शकुनि (सौबल), कर्ण और अन्य राजाओं के साथ -- सबने परिवार को छोड़कर -- उस क्षेत्र में विचरण किया।

श्लोक 19 (skanda.6.72.19)

तेऽपि सर्वे महात्मानः क्षत्रियास्तत्र संस्थिताः॥ चक्रुर्धर्मक्रियाः सर्वाः श्रद्धापूतेन चेतसा

te'pi sarve mahātmānaḥ kṣatriyāstatra saṁsthitāḥ cakrurdharmakriyāḥ sarvāḥ śraddhāpūtena cetasā

वे सभी महात्मा क्षत्रिय वहाँ रहकर श्रद्धा से पवित्र हृदय से समस्त धर्म-कार्य करने लगे।

श्लोक 20 (skanda.6.72.20)

स्नानं चक्रुर्विधानेन तीर्थेषु द्विजसत्तमाः॥ भ्रांत्वाभ्रांत्वा सुपुण्येषु श्रुत्वाश्रुत्वा द्विजन्मनाम्

snānaṁ cakrurvidhānena tīrtheṣu dvijasattamāḥ bhrāṁtvābhrāṁtvā supuṇyeṣu śrutvāśrutvā dvijanmanām

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उन्होंने विधिपूर्वक तीर्थों में स्नान किया, बार-बार पुण्य तीर्थों में भ्रमण करते हुए और ब्राह्मणों से बार-बार उनकी महिमा सुनते हुए।

श्लोक 21 (skanda.6.72.21)

दानानि च विशिष्टानि ददुरिष्टानि चापरे॥ दीनेभ्यः कृपणेभ्यश्च तपस्विभ्यो विशेषतः

dānāni ca viśiṣṭāni daduriṣṭāni cāpare dīnebhyaḥ kṛpaṇebhyaśca tapasvibhyo viśeṣataḥ

कुछ ने विशिष्ट और इच्छित दान दिये, विशेषतः दीनों, कृपणों और तपस्वियों को।

श्लोक 22 (skanda.6.72.22)

चक्रुः श्राद्धक्रियाश्चान्ये पितॄनुद्दिश्य भक्तितः॥ पितॄणां तर्पणं चान्ये तिलमिश्रजलेन च

cakruḥ śrāddhakriyāścānye pitṝnuddiśya bhaktitaḥ pitṝṇāṁ tarpaṇaṁ cānye tilamiśrajalena ca

अन्यों ने भक्तिपूर्वक पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध-कर्म किये, और अन्यों ने तिल मिश्रित जल से पितरों का तर्पण किया।

श्लोक 23 (skanda.6.72.23)

अन्ये होमक्रिया भूपा जपमन्ये निरर्गलम्॥ स्वाध्यायमपरे शान्ताः सम्यक्छ्रद्धासमन्विताः

anye homakriyā bhūpā japamanye nirargalam svādhyāyamapare śāntāḥ samyakchraddhāsamanvitāḥ

कुछ राजाओं ने होम-कर्म किये, कुछ ने निर्बाध जप किया, और अन्य शांत जन भलीभाँति श्रद्धा से युक्त होकर स्वाध्याय करने लगे।

श्लोक 24 (skanda.6.72.24)

देवतायतनान्यन्ये माहात्म्यसहितानि च॥ श्रुत्वा पूर्वनृपाणां च पूजयंति विशेषतः

devatāyatanānyanye māhātmyasahitāni ca śrutvā pūrvanṛpāṇāṁ ca pūjayaṁti viśeṣataḥ

अन्यों ने देवताओं के आयतनों की तथा पूर्व राजाओं की महिमा सुनकर उनकी विशेष पूजा की।

श्लोक 25 (skanda.6.72.25)

बलिदानैः सुवस्त्रैश्च गन्धपुष्पोपलेपनैः॥ मार्जनैध्वजदानैश्च तथा प्रेक्षणकैः शुभैः

balidānaiḥ suvastraiśca gandhapuṣpopalepanaiḥ mārjanaidhvajadānaiśca tathā prekṣaṇakaiḥ śubhaiḥ

बलि, सुन्दर वस्त्र, गन्ध-पुष्प के लेप, मार्जन (सफाई), ध्वजदान तथा शुभ प्रेक्षणकों (कौतुक-प्रदर्शनों) से,

श्लोक 26 (skanda.6.72.26)

मंडनैः पुष्पमालाभिः समंताद्द्विजसत्तमाः॥ हस्त्यश्वरथदानैश्च गोर्भिर्वस्त्रैश्च कांचनैः॥ कृतार्था ब्राह्मणाः सर्वे कृतास्तैस्तत्र भक्तितः

maṁḍanaiḥ puṣpamālābhiḥ samaṁtāddvijasattamāḥ hastyaśvarathadānaiśca gorbhirvastraiśca kāṁcanaiḥ kṛtārthā brāhmaṇāḥ sarve kṛtāstaistatra bhaktitaḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! सजावट और पुष्पमालाओं से चारों ओर, तथा हाथी, घोड़े, रथ, गौ, वस्त्र और सुवर्ण के दान से, वहाँ के समस्त ब्राह्मण उनके द्वारा भक्तिपूर्वक कृतार्थ किये गये।

श्लोक 27 (skanda.6.72.27)

एवं स्नात्वा तथाऽभ्यर्च्य देवान्विप्रान्नृपोत्तमाः॥ धृतराष्ट्रसमायुक्ता जग्मुः स्वशिबिरं ततः

evaṁ snātvā tathā'bhyarcya devānviprānnṛpottamāḥ dhṛtarāṣṭrasamāyuktā jagmuḥ svaśibiraṁ tataḥ

इस प्रकार स्नान कर तथा देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा कर, धृतराष्ट्र सहित वे श्रेष्ठ राजा तब अपने शिविर को लौट गये,

श्लोक 28 (skanda.6.72.28)

शंसन्तो विस्मयाविष्टास्तीर्थान्यायतनानि च॥ तस्मिन्क्षेत्रे द्विजांश्चैव तापसान्संशितव्रतान्

śaṁsanto vismayāviṣṭāstīrthānyāyatanāni ca tasminkṣetre dvijāṁścaiva tāpasānsaṁśitavratān

विस्मय से भरकर उस क्षेत्र के तीर्थों, आयतनों तथा वहाँ के ब्राह्मणों एवं दृढ़व्रती तपस्वियों की प्रशंसा करते हुए।

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