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प्रथमांश · अध्याय 11

ध्रुव का तिरस्कार और ऋषियों का उपदेश

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (vishnu.1.11.1)

श्रीपराशर उवाच । प्रियव्रतोत्तानपादौ मनोः स्वायम्भुवस्य तु । द्वौ पुत्रौ सुमहावीर्यौ धर्मज्ञौ कथितौ तव

śrīparāśara uvāca priyavratottānapādau manoḥ svāyambhuvasya tu dvau putrau sumahāvīryau dharmajñau kathitau tava

श्रीपराशर बोले — स्वायंभुव मनु के प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो अत्यंत पराक्रमी, धर्मज्ञ पुत्र तुम्हें बताए जा चुके हैं।

श्लोक 2 (vishnu.1.11.2)

तयोर् उत्तानपादस्य सुरुच्याम् उत्तमः सुतः । अभीष्टायाम् अभूद् ब्रह्मन् पितुर् अत्यन्तवल्लभः

tayor uttānapādasya surucyām uttamaḥ sutaḥ abhīṣṭāyām abhūd brahman pitur atyantavallabhaḥ

उन दोनों में से उत्तानपाद को सुरुचि से, जो उनकी अत्यंत प्रिय पत्नी थीं, उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पिता को अत्यंत प्रिय था, हे ब्रह्मन्।

श्लोक 3 (vishnu.1.11.3)

सुनीतिर् नाम या राज्ञस् तस्याभून् महिषी द्विज । स नातिप्रीतिमांस् तस्यां तस्याश् चाभूद् ध्रुवः सुतः

sunītir nāma yā rājñas tasyābhūn mahiṣī dvija sa nātiprītimāṁs tasyāṁ tasyāś cābhūd dhruvaḥ sutaḥ

सुनीति नामक जो उस राजा की पटरानी थीं, हे द्विज, राजा का उनमें अधिक अनुराग नहीं था; उन्हीं से ध्रुव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 4 (vishnu.1.11.4)

राजासनस्थितस्याङ्कं पितुर् भ्रातरम् आश्रितम् । दृष्ट्वोत्तमं ध्रुवश् चक्रे तम् आरोढुं मनोरथम्

rājāsanasthitasyāṅkaṁ pitur bhrātaram āśritam dṛṣṭvottamaṁ dhruvaś cakre tam āroḍhuṁ manoratham

एक दिन सिंहासन पर बैठे पिता की गोद में अपने प्रिय भाई को बैठा देखकर ध्रुव ने भी वहाँ चढ़ने की इच्छा की।

श्लोक 5 (vishnu.1.11.5)

प्रत्यक्षं भूपतिस् तस्याः सुरुच्या नाभ्यनन्दत । प्रणयेनागतं पुत्रम् उत्सङ्गारोहणोत्सुकम्

pratyakṣaṁ bhūpatis tasyāḥ surucyā nābhyanandata praṇayenāgataṁ putram utsaṅgārohaṇotsukam

परन्तु राजा ने सुरुचि के सामने ही, स्नेहवश गोद में चढ़ने को उत्सुक आए हुए उस पुत्र का स्वागत नहीं किया।

श्लोक 6 (vishnu.1.11.6)

सपत्नी तनयं दृष्ट्वा तम् अङ्कारोहणोत्सुकम् । स्वपुत्रं च तथारूढं सुरुचिर् वाक्यम् अब्रवीत्

sapatnī tanayaṁ dṛṣṭvā tam aṅkārohaṇotsukam svaputraṁ ca tathārūḍhaṁ surucir vākyam abravīt

सौत के पुत्र को गोद में चढ़ने को उत्सुक और अपने पुत्र को वहाँ चढ़ा हुआ देखकर सुरुचि ने यह वचन कहा।

श्लोक 7 (vishnu.1.11.7)

क्रियते किं वृथा वत्स महान् एष मनोरथः । अन्यस्त्रीगर्भजातेन असंभूय ममोदरे । उत्तमोत्तमम् अप्राप्यम् अविवेकोऽभिवाञ्छसि

kriyate kiṁ vṛthā vatsa mahān eṣa manorathaḥ anyastrīgarbhajātena asaṁbhūya mamodare uttamottamam aprāpyam aviveko 'bhivāñchasi

'हे वत्स! क्यों व्यर्थ यह इतना बड़ा मनोरथ करते हो? मेरे उदर से न जन्मे होकर तुम बिना विवेक के उस सर्वोत्तम पद की कामना करते हो, जो तुम्हें अप्राप्य है।'

श्लोक 8 (vishnu.1.11.8)

सत्यं सुतस् त्वम् अप्य् अस्य किन्तु न त्वं मया धृतः

satyaṁ sutas tvam apy asya kintu na tvaṁ mayā dhṛtaḥ

'सच है कि तुम भी इनके पुत्र हो, परन्तु मैंने तुम्हें धारण नहीं किया।'

श्लोक 9 (vishnu.1.11.9)

एतद् राजासनं सर्वभूभृत्संश्रयकेतनम् । योग्यं ममैव पुत्रस्य किम् आत्मा क्लिश्यते त्वया

etad rājāsanaṁ sarvabhūbhṛtsaṁśrayaketanam yogyaṁ mamaiva putrasya kim ātmā kliśyate tvayā

'यह राजसिंहासन, समस्त भूपतियों के आश्रय का चिह्न, केवल मेरे ही पुत्र के योग्य है — क्यों व्यर्थ अपने आपको कष्ट देते हो?'

श्लोक 10 (vishnu.1.11.10)

उच्चैर् मनोरथस् तेऽयं मत्पुत्रस्येव किं वृथा । सुनीत्याम् आत्मनो जन्म किं त्वया नावगम्यते

uccair manorathas te 'yaṁ matputrasyeva kiṁ vṛthā sunītyām ātmano janma kiṁ tvayā nāvagamyate

'मेरे पुत्र के समान यह तुम्हारा उच्च मनोरथ क्यों व्यर्थ है? क्या तुम्हें यह ज्ञात नहीं कि तुम्हारा जन्म सुनीति से हुआ है?'

श्लोक 11 (vishnu.1.11.11)

श्रीपराशर उवाच । उत्सृज्य पितरं बालस् तच् छ्रुत्वा मातृभाषितम् । जगाम कुपितो मातुर् निजाया द्विज मन्दिरम्

śrīparāśara uvāca utsṛjya pitaraṁ bālas tac chrutvā mātṛbhāṣitam jagāma kupito mātur nijāyā dvija mandiram

श्रीपराशर बोले — माता का यह वचन सुनकर वह बालक क्रोधित होकर पिता को छोड़कर, हे द्विज, अपनी माता के महल की ओर चला गया।

श्लोक 12 (vishnu.1.11.12)

तं दृष्ट्वा कुपितं पुत्रम् ईषत्प्रस्फुरिताधरम् । सुनीतिर् अङ्कम् आरोप्य मैत्रेयैतद् अभाषत

taṁ dṛṣṭvā kupitaṁ putram īṣatprasphuritādharam sunītir aṅkam āropya maitreyaitad abhāṣata

क्रोधित, कुछ काँपते होंठों वाले उस पुत्र को देखकर सुनीति ने उसे गोद में बिठाकर, हे मैत्रेय, यह कहा।

श्लोक 13 (vishnu.1.11.13)

श्रीसुनीतिर् उवाच । वत्स कः कोपहेतुस् ते कश् च त्वां नाभिनन्दति । कोऽवजानाति पितरं तव यस् तेऽपराध्यति

śrīsunītir uvāca vatsa kaḥ kopahetus te kaś ca tvāṁ nābhinandati ko 'vajānāti pitaraṁ tava yas te 'parādhyati

श्रीसुनीति बोलीं — 'वत्स! तुम्हारे क्रोध का कारण क्या है? किसने तुम्हारा स्वागत नहीं किया? कौन तुम्हारे पिता का अनादर करता है, जिसने तुम्हारा अपराध किया हो?'

श्लोक 14 (vishnu.1.11.14)

श्रीपराशर उवाच । इत्य् उक्तः सकलं मात्रे कथयाम् आस तद् यथा । सुरुचिः प्राह भूपालप्रत्यक्षम् अतिगर्विता

śrīparāśara uvāca ity uktaḥ sakalaṁ mātre kathayām āsa tad yathā suruciḥ prāha bhūpālapratyakṣam atigarvitā

श्रीपराशर बोले — इस प्रकार पूछे जाने पर उसने माता को सब कुछ ज्यों का त्यों बता दिया, जो अत्यंत अभिमानिनी सुरुचि ने राजा के समक्ष कहा था।

श्लोक 15 (vishnu.1.11.15)

निःश्वस्य सेति कथिते तस्मिन् पुत्रेण दुर्मनाः । श्वासक्षामेक्षणा दीना सुनीतिर् वाक्यम् अब्रवीत्

niḥśvasya seti kathite tasmin putreṇa durmanāḥ śvāsakṣāmekṣaṇā dīnā sunītir vākyam abravīt

पुत्र द्वारा यह बताए जाने पर दुखी मन वाली सुनीति ने आह भरी; निःश्वास से क्षीण नेत्रों वाली, दीन होकर उन्होंने यह वचन कहा।

श्लोक 16 (vishnu.1.11.16)

श्रीसुनीतिर् उवाच । सुरुचिः सत्यम् आहेदं स्वल्पभाग्योऽसि पुत्रक । न हि पुण्यवतां वत्स सपत्नैर् एवम् उच्यते

śrīsunītir uvāca suruciḥ satyam āhedaṁ svalpabhāgyo 'si putraka na hi puṇyavatāṁ vatsa sapatnair evam ucyate

श्रीसुनीति बोलीं — 'हे पुत्रक! सुरुचि ने जो कहा है वह सत्य है, तुम अल्पभाग्य हो; हे वत्स! पुण्यवानों से सौतें ऐसा नहीं कहतीं।'

श्लोक 17 (vishnu.1.11.17)

नोद्वेगस् तात कर्तव्यः कृतं यद् भवता पुरा । तत् कोऽपहर्तुं शक्नोति दातुं कश् चाकृतं त्वया

nodvegas tāta kartavyaḥ kṛtaṁ yad bhavatā purā tat ko 'pahartuṁ śaknoti dātuṁ kaś cākṛtaṁ tvayā

'हे तात! उद्वेग मत करो; तुमने पूर्वकाल में जो किया है, उसे कौन हर सकता है, और जो तुमने नहीं किया, वह तुम्हें कौन दे सकता है?'

श्लोक 18 (vishnu.1.11.18)

राजासनं तथा छत्रं वराश्वा वरवारणाः । यस्य पुण्यानि तस्यैव मत्वैतच् छाम्य पुत्रक

rājāsanaṁ tathā chatraṁ varāśvā varavāraṇāḥ yasya puṇyāni tasyaiva matvaitac chāmya putraka

'राजसिंहासन, राजछत्र, उत्तम अश्व, उत्तम गजराज — ये उसी के हैं जिसके पुण्य हैं; ऐसा मानकर, हे पुत्रक, शांत हो जाओ।'

श्लोक 19 (vishnu.1.11.19)

अन्यजन्मकृतैः पुण्यैः सुरुच्यां सुरुचिर् नृपः । भार्येति प्रोच्यते चान्या मद्विधा पुण्यवर्जिता

anyajanmakṛtaiḥ puṇyaiḥ surucyāṁ surucir nṛpaḥ bhāryeti procyate cānyā madvidhā puṇyavarjitā

'अन्य जन्म में किए गए पुण्यों से राजा सुरुचि को अपनी पत्नी मानकर उसे 'सुरुचि' कहते हैं; और मेरे समान पुण्यरहित दूसरी स्त्री को भी पत्नी कहा जाता है।'

श्लोक 20 (vishnu.1.11.20)

पुण्योपचयसंपन्नस् तस्याः पुत्रस् तथोत्तमः । मम पुत्रस् तथा जातः स्वल्पपुण्यो ध्रुवो भवान्

puṇyopacayasaṁpannas tasyāḥ putras tathottamaḥ mama putras tathā jātaḥ svalpapuṇyo dhruvo bhavān

'पुण्य के संचय से संपन्न उसका पुत्र इस प्रकार सर्वोत्तम हुआ है; और मेरा पुत्र, हे ध्रुव, तुम इस प्रकार अल्पपुण्य होकर जन्मे हो।'

श्लोक 21 (vishnu.1.11.21)

तथापि दुःखं न भवान् कर्तुम् अर्हति पुत्रक । यस्य यावत् स तेनैव स्वेन तुष्यति बुद्धिमान्

tathāpi duḥkhaṁ na bhavān kartum arhati putraka yasya yāvat sa tenaiva svena tuṣyati buddhimān

'फिर भी, हे पुत्रक, तुम्हें दुख नहीं करना चाहिए; बुद्धिमान व्यक्ति जिसका जितना अपना है, उतने से ही संतुष्ट रहता है।'

श्लोक 22 (vishnu.1.11.22)

यदि चेद् दुःखम् अत्यर्थं सुरुच्या वचनात् तव । तत् पुण्योपचये यत्नं कुरु सर्वफलप्रदे

yadi ced duḥkham atyarthaṁ surucyā vacanāt tava tat puṇyopacaye yatnaṁ kuru sarvaphalaprade

'फिर भी यदि सुरुचि के वचन से तुम्हें अत्यंत दुख है, तो सर्वफलदायी पुण्य की वृद्धि के लिए प्रयत्न करो।'

श्लोक 23 (vishnu.1.11.23)

सुशीलो भव धर्मात्मा मैत्रः प्राणिहिते रतः । निम्नं यथापः प्रवणाः पात्रम् आयान्ति संपदः

suśīlo bhava dharmātmā maitraḥ prāṇihite rataḥ nimnaṁ yathāpaḥ pravaṇāḥ pātram āyānti saṁpadaḥ

'सुशील बनो, धर्मात्मा बनो, सबसे मित्रता रखो, प्राणियों के हित में रत रहो; जैसे जल नीचे की ओर बहता है, वैसे ही संपत्तियाँ योग्य पात्र की ओर आती हैं।'

श्लोक 24 (vishnu.1.11.24)

श्रीध्रुव उवाच । अम्ब यत् त्वम् इदं प्राह प्रशमाय वचो मम । नैतद् दुर्वचसा भिन्ने हृदये मम तिष्ठति

śrīdhruva uvāca amba yat tvam idaṁ prāha praśamāya vaco mama naitad durvacasā bhinne hṛdaye mama tiṣṭhati

श्रीध्रुव बोले — 'हे माँ! मुझे शांत करने के लिए आपने जो यह कहा, वह कठोर वचनों से विदीर्ण मेरे हृदय में नहीं ठहरता।'

श्लोक 25 (vishnu.1.11.25)

सोऽहं तथा यतिष्यामि यथा सर्वोत्तमोत्तमम् । स्थानं प्राप्स्याम्य् अशेषाणां जगताम् अभिपूजितम्

so 'haṁ tathā yatiṣyāmi yathā sarvottamottamam sthānaṁ prāpsyāmy aśeṣāṇāṁ jagatām abhipūjitam

'मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि समस्त लोकों में पूजित, सबसे उत्तम पद को प्राप्त करूँ।'

श्लोक 26 (vishnu.1.11.26)

सुरुचिर् दयिता राज्ञस् तस्या जातोऽस्मि नोदरात् । प्रभावं पश्य मेऽम्ब त्वं धृतस्यापि तवोदरे

surucir dayitā rājñas tasyā jāto 'smi nodarāt prabhāvaṁ paśya me 'mba tvaṁ dhṛtasyāpi tavodare

'सुरुचि राजा की प्रिया हैं और मैं उनके उदर से उत्पन्न नहीं हूँ; हे माँ! आपके उदर में धारण किए जाने पर भी मेरा प्रभाव देखिए।'

श्लोक 27 (vishnu.1.11.27)

उत्तमः स मम भ्राता यो गर्भेण धृतस् तया । स राजासनम् आप्नोतु पित्रा दत्तं तथास्तु तत्

uttamaḥ sa mama bhrātā yo garbheṇa dhṛtas tayā sa rājāsanam āpnotu pitrā dattaṁ tathāstu tat

'उनके गर्भ से धारण किया गया वह मेरा भाई ही श्रेष्ठ बने; वही पिता द्वारा दिया गया राजसिंहासन प्राप्त करे — ऐसा ही हो।'

श्लोक 28 (vishnu.1.11.28)

नान्यदत्तम् अभीप्स्यामि स्थानम् अम्ब स्वकर्मणा । इच्छामि तद् अहं स्थानं यन् न प्राप पिता मम

nānyadattam abhīpsyāmi sthānam amba svakarmaṇā icchāmi tad ahaṁ sthānaṁ yan na prāpa pitā mama

'हे माँ! मैं दूसरे के द्वारा दिया गया पद नहीं चाहता; मैं अपने ही कर्म से वह पद चाहता हूँ जिसे मेरे पिता भी नहीं पा सके।'

श्लोक 29 (vishnu.1.11.29)

श्रीपराशर उवाच । निर्जगाम गृहान् मातुर् इत्य् उक्त्वा मातरं ध्रुवः । पुराच् च निर्गम्य ततस् तद्बाह्योपवनं ययौ

śrīparāśara uvāca nirjagāma gṛhān mātur ity uktvā mātaraṁ dhruvaḥ purāc ca nirgamya tatas tadbāhyopavanaṁ yayau

श्रीपराशर बोले — माता से ऐसा कहकर ध्रुव उसके घर से निकल पड़ा, और नगर से बाहर जाकर तब नगर के बाहरी उपवन में गया।

श्लोक 30 (vishnu.1.11.30)

स ददर्श मुनींस् तत्र सप्त पूर्वागतान् ध्रुवः । कृष्णाजिनोत्तरीयेषु विष्टरेषु समास्थितान्

sa dadarśa munīṁs tatra sapta pūrvāgatān dhruvaḥ kṛṣṇājinottarīyeṣu viṣṭareṣu samāsthitān

वहाँ ध्रुव ने पहले से आए हुए सात मुनियों को देखा, जो कृष्णाजिन को उत्तरीय बनाए हुए आसनों पर विराजमान थे।

श्लोक 31 (vishnu.1.11.31)

स राजपुत्रस् तान् सर्वान् प्रणिपत्याभ्यभाषत । प्रश्रयावनतः सम्यग् अभिवादनपूर्वकम्

sa rājaputras tān sarvān praṇipatyābhyabhāṣata praśrayāvanataḥ samyag abhivādanapūrvakam

उस राजपुत्र ने उन सबको प्रणाम करके, विनयपूर्वक झुककर, विधिवत अभिवादनपूर्वक उनसे यह कहा।

श्लोक 32 (vishnu.1.11.32)

श्रीध्रुव उवाच । उत्तानपादतनयं मां निबोधत सत्तमाः । जातं सुनीत्यां निर्वेदाद् युष्माकं प्राप्तम् अन्तिकम्

śrīdhruva uvāca uttānapādatanayaṁ māṁ nibodhata sattamāḥ jātaṁ sunītyāṁ nirvedād yuṣmākaṁ prāptam antikam

श्रीध्रुव बोले — 'हे सत्पुरुषो! मुझे उत्तानपाद का पुत्र, सुनीति से उत्पन्न, वैराग्यवश आपके समीप आया हुआ जानिए।'

श्लोक 33 (vishnu.1.11.33)

ऋषय ऊचुः । चतुःपञ्चाब्दसंभूतो बालस् त्वं नृपनन्दन । निर्वेदकारणं किंचित् तव नाद्यापि विद्यते

ṛṣaya ūcuḥ catuḥpañcābdasaṁbhūto bālas tvaṁ nṛpanandana nirvedakāraṇaṁ kiṁcit tava nādyāpi vidyate

ऋषियों ने कहा — 'हे राजनंदन! तुम तो चार-पाँच वर्ष के बालक हो; तुम्हें अभी तक वैराग्य का कोई कारण नहीं हो सकता।'

श्लोक 34 (vishnu.1.11.34)

न चिन्त्यं भवतः किंचिद् ध्रियते भूपतिः पिता । न चैवेष्टवियोगादि तव पश्याम बालक

na cintyaṁ bhavataḥ kiṁcid dhriyate bhūpatiḥ pitā na caiveṣṭaviyogādi tava paśyāma bālaka

'हमें तुम्हारे संबंध में चिंता की कोई बात नहीं दिखती; तुम्हारे पिता राजा जीवित हैं, और हे बालक, हम तुम्हारे किसी प्रिय वस्तु का वियोग भी नहीं देखते।'

श्लोक 35 (vishnu.1.11.35)

शरीरे न च ते व्याधिर् अस्माभिर् उपलक्ष्यते । निर्वेदः किंनिमित्तस् ते कथ्यतां यदि विद्यते

śarīre na ca te vyādhir asmābhir upalakṣyate nirvedaḥ kiṁnimittas te kathyatāṁ yadi vidyate

'हमें तुम्हारे शरीर में भी कोई व्याधि नहीं दिखती; यदि जानते हो तो अपने वैराग्य का कारण बताओ।'

श्लोक 36 (vishnu.1.11.36)

श्रीपराशर उवाच । ततः स कथयाम् आस सुरुच्या यद् उदाहृतम् । तन् निशम्य ततः प्रोचुर् मुनयस् ते परस्परम्

śrīparāśara uvāca tataḥ sa kathayām āsa surucyā yad udāhṛtam tan niśamya tataḥ procur munayas te parasparam

श्रीपराशर बोले — तब उसने सुरुचि द्वारा कहे गए वचन को बताया; यह सुनकर मुनियों ने आपस में कहा।

श्लोक 37 (vishnu.1.11.37)

अहो क्षात्रं परं तेजो बालस्यापि यद् अक्षमा । सपत्न्या मातुर् उक्तस्य हृदयान् नापसर्पति

aho kṣātraṁ paraṁ tejo bālasyāpi yad akṣamā sapatnyā mātur uktasya hṛdayān nāpasarpati

'अहो! बालक होते हुए भी क्षत्रिय-तेज कैसा प्रबल है, कि सौत माता के कहे वचन की असहनशीलता उसके हृदय से दूर नहीं होती!'

श्लोक 38 (vishnu.1.11.38)

भो भोः क्षत्रियदायाद निर्वेदाद् यत् त्वयाधुना । कर्तुं व्यवसितं तन् नः कथ्यतां यदि रोचते

bho bhoḥ kṣatriyadāyāda nirvedād yat tvayādhunā kartuṁ vyavasitaṁ tan naḥ kathyatāṁ yadi rocate

'हे क्षत्रियकुमार! वैराग्यवश तुमने अभी जो करने का निश्चय किया है, यदि उचित लगे तो हमें बताओ।'

श्लोक 39 (vishnu.1.11.39)

यच् च कार्यं तवास्माभिः साहाय्यम् अमितद्युते । तद् उच्यतां विवक्षुस् त्वम् अस्माभिर् उपलक्ष्यसे

yac ca kāryaṁ tavāsmābhiḥ sāhāyyam amitadyute tad ucyatāṁ vivakṣus tvam asmābhir upalakṣyase

'हे अमित तेजस्वी! जिस कार्य में हमारी सहायता तुम्हें चाहिए, वह कहो; हम देख रहे हैं कि तुम कुछ कहना चाहते हो।'

श्लोक 40 (vishnu.1.11.40)

श्रीध्रुव उवाच । नाहम् अर्थम् अभीप्सामि न राज्यं द्विजसत्तमाः । तत् स्थानम् एकम् इच्छामि भुक्तं नान्येन यत् पुरा

śrīdhruva uvāca nāham artham abhīpsāmi na rājyaṁ dvijasattamāḥ tat sthānam ekam icchāmi bhuktaṁ nānyena yat purā

श्रीध्रुव बोले — 'हे द्विजसत्तमो! मैं न धन चाहता हूँ, न राज्य; मैं केवल वह एक पद चाहता हूँ जो पहले किसी और ने नहीं भोगा।'

श्लोक 41 (vishnu.1.11.41)

एतन् मे क्रियतां सम्यक् कथ्यतां प्राप्यते यथा । स्थानम् अग्र्यं समस्तेभ्यः स्थानेभ्यो मुनिसत्तमाः

etan me kriyatāṁ samyak kathyatāṁ prāpyate yathā sthānam agryaṁ samastebhyaḥ sthānebhyo munisattamāḥ

'यह मुझे भलीभाँति बताइए — किस प्रकार समस्त पदों में सबसे उत्तम वह पद प्राप्त होता है, हे मुनिसत्तमो।'

श्लोक 42 (vishnu.1.11.42)

मरीचिर् उवाच । अनाराधितगोविन्दैर् नरैः स्थानं नृपात्मज । न हि संप्राप्यते श्रेष्ठं तस्माद् आराधयाच्युतम्

marīcir uvāca anārādhitagovindair naraiḥ sthānaṁ nṛpātmaja na hi saṁprāpyate śreṣṭhaṁ tasmād ārādhayācyutam

मरीचि बोले — 'हे राजपुत्र! जिन मनुष्यों ने गोविंद की आराधना नहीं की, उन्हें वह श्रेष्ठ पद प्राप्त नहीं होता; इसलिए अच्युत की आराधना करो।'

श्लोक 43 (vishnu.1.11.43)

अत्रिर् उवाच । परः पराणां पुरुषो यस्य तुष्टो जनार्दनः । स प्राप्नोत्य् अक्षयं स्थानम् एतत् सत्यं मयोदितम्

atrir uvāca paraḥ parāṇāṁ puruṣo yasya tuṣṭo janārdanaḥ sa prāpnoty akṣayaṁ sthānam etat satyaṁ mayoditam

अत्रि बोले — 'परों से भी पर वे पुरुष, जिनसे प्रसन्न होकर जनार्दन अक्षय पद देते हैं — यह मैंने सत्य कहा है।'

श्लोक 44 (vishnu.1.11.44)

अङ्गिरा उवाच । यस्यान्तः सर्वम् एवेदम् अच्युतस्याव्ययात्मनः । तम् आराधय गोविन्दं स्थानम् अग्र्यं यदीच्छसि

aṅgirā uvāca yasyāntaḥ sarvam evedam acyutasyāvyayātmanaḥ tam ārādhaya govindaṁ sthānam agryaṁ yadīcchasi

अंगिरा बोले — 'जिनके भीतर यह सब कुछ है, अच्युत, अव्यय आत्मा — यदि श्रेष्ठ पद चाहते हो तो उन गोविंद की आराधना करो।'

श्लोक 45 (vishnu.1.11.45)

पुलस्त्य उवाच । परं ब्रह्म परं धाम योऽसौ ब्रह्म तथा परम् । तम् आराध्य हरिं याति मुक्तिम् अप्य् अतिदुर्लभाम्

pulastya uvāca paraṁ brahma paraṁ dhāma yo 'sau brahma tathā param tam ārādhya hariṁ yāti muktim apy atidurlabhām

पुलस्त्य बोले — 'जो परब्रह्म हैं, परम धाम हैं, और स्वयं परब्रह्म भी हैं, उन हरि की आराधना करके मनुष्य अत्यंत दुर्लभ मुक्ति को भी प्राप्त करता है।'

श्लोक 46 (vishnu.1.11.46)

क्रतुर् उवाच । यो यज्ञपुरुषो यज्ञे योगे यः परमः पुमान् । तस्मिंस् तुष्टे यद् अप्राप्यं किं तद् अस्ति जनार्दने

kratur uvāca yo yajñapuruṣo yajñe yoge yaḥ paramaḥ pumān tasmiṁs tuṣṭe yad aprāpyaṁ kiṁ tad asti janārdane

क्रतु बोले — 'जो यज्ञ में यज्ञपुरुष हैं और योग में परम पुरुष हैं, उन जनार्दन के प्रसन्न होने पर क्या अप्राप्य रह जाता है?'

श्लोक 47 (vishnu.1.11.47)

पुलह उवाच । ऐन्द्रम् इन्द्रः परं स्थानं यम् आराध्य जगत्पतिम् । प्राप यज्ञपतिं विष्णुं तम् आराधय सुव्रत

pulaha uvāca aindram indraḥ paraṁ sthānaṁ yam ārādhya jagatpatim prāpa yajñapatiṁ viṣṇuṁ tam ārādhaya suvrata

पुलह बोले — 'जिस जगत्पति की आराधना करके इन्द्र ने इन्द्र-पद प्राप्त किया, उन यज्ञपति विष्णु की आराधना करो, हे सुव्रत।'

श्लोक 48 (vishnu.1.11.48)

वसिष्ठ उवाच । प्राप्नोष्य् आराधिते विष्णौ मनसा यद् यद् इच्छसि । त्रैलोक्यान्तर्गतं स्थानं किम् उ वत्सोत्तमोत्तमम्

vasiṣṭha uvāca prāpnoṣy ārādhite viṣṇau manasā yad yad icchasi trailokyāntargataṁ sthānaṁ kim u vatsottamottamam

वसिष्ठ बोले — 'विष्णु की आराधना करने पर तुम मन में जो-जो चाहो वह पाओगे; फिर, हे उत्तमोत्तम वत्स, त्रिभुवन के भीतर के किसी पद की तो बात ही क्या!'

श्लोक 49 (vishnu.1.11.49)

श्रीध्रुव उवाच । आराध्यः कथितो देवो भवद्भिः प्रणतस्य मे । मया तत्परितोषाय यज् जप्तव्यं तद् उच्यताम्

śrīdhruva uvāca ārādhyaḥ kathito devo bhavadbhiḥ praṇatasya me mayā tatparitoṣāya yaj japtavyaṁ tad ucyatām

श्रीध्रुव बोले — 'आप सबने मुझ प्रणत को वह आराध्य देव बता दिया; अब उनकी संतुष्टि के लिए मुझे क्या जपना चाहिए, वह बताइए।'

श्लोक 50 (vishnu.1.11.50)

यथा चाराधनं तस्य मया कार्यं महात्मनः । प्रसादसुमुखास् तन् मे कथयन्तु महर्षयः

yathā cārādhanaṁ tasya mayā kāryaṁ mahātmanaḥ prasādasumukhās tan me kathayantu maharṣayaḥ

'और उस महात्मा की आराधना मुझे किस प्रकार करनी चाहिए, वह भी प्रसन्नमुख होकर महर्षिगण मुझे बताएँ।'

श्लोक 51 (vishnu.1.11.51)

ऋषय ऊचुः । राजपुत्र यथा विष्णोर् आराधनपरैर् नरैः । कार्यम् आराधनं तन् नो यथावच् छ्रोतुम् अर्हसि

ṛṣaya ūcuḥ rājaputra yathā viṣṇor ārādhanaparair naraiḥ kāryam ārādhanaṁ tan no yathāvac chrotum arhasi

ऋषियों ने कहा — 'हे राजपुत्र! विष्णु की आराधना में तत्पर मनुष्यों द्वारा जो आराधना करनी होती है, वह हमसे यथावत् सुनने योग्य है।'

श्लोक 52 (vishnu.1.11.52)

बाह्यार्थाद् अखिलाच् चित्तं त्याजयेत् प्रथमं नरः । तस्मिन्न् एव जगद्धाम्नि ततः कुर्वीत निश्चलम्

bāhyārthād akhilāc cittaṁ tyājayet prathamaṁ naraḥ tasminn eva jagaddhāmni tataḥ kurvīta niścalam

'मनुष्य को सबसे पहले सम्पूर्ण बाह्य विषयों से चित्त को हटा लेना चाहिए, फिर उसे उसी जगद्धाम में स्थिर करना चाहिए।'

श्लोक 53 (vishnu.1.11.53)

एवम् एकाग्रचित्तेन तन्मयेन धृतात्मना । जप्तव्यं यन् निबोधैतत् तन् नः पार्थिवनन्दन

evam ekāgracittena tanmayena dhṛtātmanā japtavyaṁ yan nibodhaitat tan naḥ pārthivanandana

'इस प्रकार एकाग्रचित्त होकर, उन्हीं में तन्मय होकर, संयत आत्मा से जो जपना चाहिए, वह हमसे सुनो, हे राजकुमार।'

श्लोक 54 (vishnu.1.11.54)

हिरण्यगर्भपुरुषप्रधानव्यक्तरूपिणे । ओं नमो वासुदेवाय शुद्धज्ञानस्वभाविने

hiraṇyagarbhapuruṣapradhānavyaktarūpiṇe oṁ namo vāsudevāya śuddhajñānasvabhāvine

'हिरण्यगर्भ, पुरुष, प्रधान और व्यक्त रूप धारण करने वाले शुद्धज्ञानस्वरूप वासुदेव को ओ३म् नमः।'

श्लोक 55 (vishnu.1.11.55)

एतज् जजाप भगवान् जप्यं स्वायम्भुवो मनुः । पितामहस् तव पुरा तस्य तुष्टो जनार्दनः

etaj jajāpa bhagavān japyaṁ svāyambhuvo manuḥ pitāmahas tava purā tasya tuṣṭo janārdanaḥ

'इसी जप्य मंत्र का जप पूर्वकाल में भगवान् स्वायंभुव मनु ने किया था, तुम्हारे उन पितामह से जनार्दन प्रसन्न हुए,'

श्लोक 56 (vishnu.1.11.56)

ददौ यथाभिलषिताम् ऋद्धिं त्रैलोक्यदुर्लभाम् । तथा त्वम् अपि गोविन्दं तोषयैतत् सदा जपन्

dadau yathābhilaṣitām ṛddhiṁ trailokyadurlabhām tathā tvam api govindaṁ toṣayaitat sadā japan

'और उन्हें त्रिभुवन में दुर्लभ, इच्छानुसार समृद्धि प्रदान की; तुम भी सदा इसी का जप करते हुए गोविंद को प्रसन्न करो।'

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