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प्रथमांश · अध्याय 20

प्रह्लाद को विष्णु का वरदान और कथाफल

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

श्लोक 1 (vishnu.1.20.1)

श्रीपराशर उवाच । एवं संचिन्तयन् विष्णुम् अभेदेनात्मनो द्विज । तन्मयत्वम् अवापाग्र्यं मेने चात्मानम् अच्युतम्

śrīparāśara uvāca evaṁ saṁcintayan viṣṇum abhedenātmano dvija tanmayatvam avāpāgryaṁ mene cātmānam acyutam

श्रीपराशर बोले — हे द्विज! इस प्रकार विष्णु का अभेद रूप से चिंतन करते हुए उसने उनसे तन्मयता की परम अवस्था प्राप्त की और अपने आपको ही अच्युत मानने लगा।

श्लोक 2 (vishnu.1.20.2)

विसस्मार तथात्मानं नान्यत् किंचिद् अजानत । अहम् एवाव्ययोऽनन्तः परमात्मेत्य् अचिन्तयत्

visasmāra tathātmānaṁ nānyat kiṁcid ajānata aham evāvyayo 'nantaḥ paramātmety acintayat

वह अपने आपको भी भूल गया, अन्य कुछ भी नहीं जानता था; वह सोचने लगा — 'मैं ही अव्यय, अनंत परमात्मा हूँ।'

श्लोक 3 (vishnu.1.20.3)

तस्य तद्भावनायोगात् क्षीणपापस्य वै क्रमात् । शुद्धेऽन्तःकरणे विष्णुस् तस्थौ ज्ञानमयोऽच्युतः

tasya tadbhāvanāyogāt kṣīṇapāpasya vai kramāt śuddhe 'ntaḥkaraṇe viṣṇus tasthau jñānamayo 'cyutaḥ

उस भावना के योग से उसके पाप धीरे-धीरे क्षीण होते गए, और उसके शुद्ध अंतःकरण में ज्ञानमय अच्युत विष्णु स्थित हो गए।

श्लोक 4 (vishnu.1.20.4)

योगप्रभावात् प्रह्लादे जाते विष्णुमयेऽसुरे । चलत्य् उरगबन्धैस् तैर् मैत्रेय त्रुटितं क्षणात्

yogaprabhāvāt prahlāde jāte viṣṇumaye 'sure calaty uragabandhais tair maitreya truṭitaṁ kṣaṇāt

हे मैत्रेय! उस योग के प्रभाव से जब असुर प्रह्लाद विष्णुमय हो गया, तब वे नागपाश क्षणभर में टूट गए।

श्लोक 5 (vishnu.1.20.5)

भ्रान्तग्राहगणः सोर्मिर् ययौ क्षोभं महार्णवः । चचाल च मही सर्वा सशैलवनकानना

bhrāntagrāhagaṇaḥ sormir yayau kṣobhaṁ mahārṇavaḥ cacāla ca mahī sarvā saśailavanakānanā

भ्रमित हुए जलचरों के समूह वाला वह लहरों से युक्त महासागर क्षोभ को प्राप्त हुआ, और सम्पूर्ण पृथ्वी अपने पर्वत-वन-कानन सहित काँप उठी।

श्लोक 6 (vishnu.1.20.6)

स च तं शैलसंघातं दैत्यैर् न्यस्तम् अथोपरि । प्रक्षिप्य तस्मात् सलिलान् निश्चक्राम महामतिः

sa ca taṁ śailasaṁghātaṁ daityair nyastam athopari prakṣipya tasmāt salilān niścakrāma mahāmatiḥ

और उस महामति ने दैत्यों द्वारा उसके ऊपर रखे गए उस पर्वत-समूह को हटाकर उन जलों से बाहर निकलकर प्रस्थान किया।

श्लोक 7 (vishnu.1.20.7)

दृष्ट्वा च स जगद् भूयो गगनाद्युपलक्षणम् । प्रह्लादोऽस्मीति सस्मार पुनर् आत्मानम् आत्मना

dṛṣṭvā ca sa jagad bhūyo gaganādyupalakṣaṇam prahlādo 'smīti sasmāra punar ātmānam ātmanā

आकाश आदि से पहचाने जाने योग्य उस जगत् को पुनः देखकर उसने अपने ही द्वारा अपने आपको फिर से याद किया — 'मैं प्रह्लाद हूँ।'

श्लोक 8 (vishnu.1.20.8)

तुष्टाव च पुनर् धीमान् अनादिं पुरुषोत्तमम् । एकाग्रमतिर् अव्यग्रो यतवाक्कायमानसः

tuṣṭāva ca punar dhīmān anādiṁ puruṣottamam ekāgramatir avyagro yatavākkāyamānasaḥ

और उस बुद्धिमान् ने एकाग्रचित्त, अव्यग्र होकर, वाणी-शरीर-मन को संयत करके पुनः अनादि पुरुषोत्तम की स्तुति की।

श्लोक 9 (vishnu.1.20.9)

श्रीप्रह्लाद उवाच । ओं नमः परमार्थार्थ स्थूलसूक्ष्म क्षराक्षर । व्यक्ताव्यक्त कलातीत सकलेश निरञ्जन

śrīprahlāda uvāca oṁ namaḥ paramārthārtha sthūlasūkṣma kṣarākṣara vyaktāvyakta kalātīta sakaleśa nirañjana

श्रीप्रह्लाद बोले — 'ओ३म् परमार्थ के भी अर्थ को, स्थूल-सूक्ष्म को, क्षर-अक्षर को, व्यक्त-अव्यक्त को, कला से परे, सकल के स्वामी, निर्मल को नमस्कार है।'

श्लोक 10 (vishnu.1.20.10)

गुणाञ्जन गुणाधार निर्गुणात्मन् गुणस्थित । मूर्तामूर्त महामूर्ते सूक्ष्ममूर्ते स्फुटास्फुट

guṇāñjana guṇādhāra nirguṇātman guṇasthita mūrtāmūrta mahāmūrte sūkṣmamūrte sphuṭāsphuṭa

'गुणों से चिह्नित, गुणों के आधार, निर्गुणस्वरूप होते हुए भी गुणों में स्थित; मूर्त-अमूर्त, महामूर्ति, सूक्ष्ममूर्ति, स्पष्ट-अस्पष्ट को नमस्कार है।'

श्लोक 11 (vishnu.1.20.11)

करालसौम्यरूपात्मन् विद्याविद्यामयाच्युत । सदसद्रूपसद्भाव सदसद्भावभावन

karālasaumyarūpātman vidyāvidyāmayācyuta sadasadrūpasadbhāva sadasadbhāvabhāvana

'भयंकर और सौम्य रूपों वाले, विद्या-अविद्यामय अच्युत को; सत्-असत् रूप, सत्-भाव, सत्-असत् भाव की भावना को नमस्कार है।'

श्लोक 12 (vishnu.1.20.12)

नित्यानित्य प्रपञ्चात्मन् निष्प्रपञ्चामलाश्रय । एकानेक नमस् तुभ्यं वासुदेवादिकारण

nityānitya prapañcātman niṣprapañcāmalāśraya ekāneka namas tubhyaṁ vāsudevādikāraṇa

'नित्य-अनित्य, प्रपंच के आत्मा, प्रपंचरहित निर्मल आश्रय; एक-अनेक — हे वासुदेव आदि के कारण! आपको नमस्कार है।'

श्लोक 13 (vishnu.1.20.13)

यः स्थूलसूक्ष्मः प्रकटप्रकाशो यः सर्वभूतो न च सर्वभूतः । विश्वं यतश् चैतद् अविश्वहेतोर् नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय

yaḥ sthūlasūkṣmaḥ prakaṭaprakāśo yaḥ sarvabhūto na ca sarvabhūtaḥ viśvaṁ yataś caitad aviśvahetor namo 'stu tasmai puruṣottamāya

'जो स्थूल-सूक्ष्म हैं, प्रकट-प्रकाश हैं, जो सर्वभूत हैं और सर्वभूत नहीं भी हैं, जिनसे यह विश्व है और जो अविश्व के भी हेतु हैं — उन पुरुषोत्तम को नमस्कार है।'

श्लोक 14 (vishnu.1.20.14)

श्रीपराशर उवाच । तस्य तच्चेतसो देवः स्तुतिम् इत्थं प्रकुर्वतः । आविर्बभूव भगवान् पीताम्बरधरो हरिः

śrīparāśara uvāca tasya taccetaso devaḥ stutim itthaṁ prakurvataḥ āvirbabhūva bhagavān pītāmbaradharo hariḥ

श्रीपराशर बोले — उसके चित्त द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर पीत वस्त्र धारण किए हुए भगवान् हरि प्रकट हुए।

श्लोक 15 (vishnu.1.20.15)

ससंभ्रमस् तम् आलोक्य समुत्थायाकुलाक्षरम् । नमोऽस्तु विष्णवैत्य् एतद् व्याजहारासकृद् द्विज

sasaṁbhramas tam ālokya samutthāyākulākṣaram namo 'stu viṣṇavaity etad vyājahārāsakṛd dvija

उन्हें देखकर संभ्रमित होकर उठ खड़े होते हुए, हे द्विज, उसने व्याकुल वाणी से बारंबार 'विष्णु को नमस्कार हो' यही कहा।

श्लोक 16 (vishnu.1.20.16)

श्रीप्रह्लाद उवाच । देव प्रपन्नार्तिहर प्रसादं कुरु केशव । अवलोकनदानेन भूयो मां पावयाव्यय

śrīprahlāda uvāca deva prapannārtihara prasādaṁ kuru keśava avalokanadānena bhūyo māṁ pāvayāvyaya

श्रीप्रह्लाद बोले — 'हे देव! शरणागतों की पीड़ा हरने वाले, हे केशव! प्रसन्न होइए, अपनी दृष्टि के दान से मुझे पुनः पवित्र कीजिए, हे अव्यय!'

श्लोक 17 (vishnu.1.20.17)

श्रीभगवान् उवाच । कुर्वतस् ते प्रसन्नोऽहं भक्तिम् अव्यभिचारिणीम् । यथाभिलषितो मत्तः प्रह्लाद व्रियतां वरः

śrībhagavān uvāca kurvatas te prasanno 'haṁ bhaktim avyabhicāriṇīm yathābhilaṣito mattaḥ prahlāda vriyatāṁ varaḥ

श्रीभगवान् बोले — 'तुम्हारी अव्यभिचारिणी भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ; हे प्रह्लाद! जैसा चाहो, मुझसे वह वर माँगो।'

श्लोक 18 (vishnu.1.20.18)

श्रीप्रह्लाद उवाच । नाथ योनिसहस्रेषु येषु येषु व्रजाम्य् अहम् । तेषु तेष्व् अच्युता भक्तिर् अच्युतास्तु सदा त्वयि

śrīprahlāda uvāca nātha yonisahasreṣu yeṣu yeṣu vrajāmy aham teṣu teṣv acyutā bhaktir acyutāstu sadā tvayi

श्रीप्रह्लाद बोले — 'हे नाथ! जिन-जिन हजारों योनियों में मैं जाऊँ, उन-उन सबमें आपके प्रति अच्युत भक्ति सदा अच्युत ही बनी रहे।'

श्लोक 19 (vishnu.1.20.19)

या प्रीतिर् अविवेकानां विषयेष्व् अनपायिनी । त्वाम् अनुस्मरतः सा मे हृदयान् मापसर्पतु

yā prītir avivekānāṁ viṣayeṣv anapāyinī tvām anusmarataḥ sā me hṛdayān māpasarpatu

'जो अविवेकियों की विषयों में न छूटने वाली प्रीति होती है, वह आपका स्मरण करते हुए मेरे हृदय से दूर हो जाए।'

श्लोक 20 (vishnu.1.20.20)

श्रीभगवान् उवाच । मयि भक्तिस् तवास्त्य् एव भूयोऽप्य् एवं भविष्यति । वरश् च मत्तः प्रह्लाद व्रियतां यस् तवेप्सितः

śrībhagavān uvāca mayi bhaktis tavāsty eva bhūyo 'py evaṁ bhaviṣyati varaś ca mattaḥ prahlāda vriyatāṁ yas tavepsitaḥ

श्रीभगवान् बोले — 'मुझमें तुम्हारी भक्ति है ही, और बारंबार वैसी ही होगी; और हे प्रह्लाद, मुझसे जो चाहो, वह दूसरा वर भी माँगो।'

श्लोक 21 (vishnu.1.20.21)

श्रीप्रह्लाद उवाच । मयि द्वेषानुबन्धोऽभूत् संस्तुताव् उद्यते तव । मत्पितुस् तत्कृतं पापं देव तस्य प्रणश्यतु

śrīprahlāda uvāca mayi dveṣānubandho 'bhūt saṁstutāv udyate tava matpitus tatkṛtaṁ pāpaṁ deva tasya praṇaśyatu

श्रीप्रह्लाद बोले — 'आपकी स्तुति में तत्पर मेरे पिता में मेरे प्रति द्वेष उत्पन्न हुआ — हे देव! उनका वह पाप नष्ट हो जाए।'

श्लोक 22 (vishnu.1.20.22)

शस्त्राणि पातितान्य् अङ्गे क्षिप्तो यच् चाग्निसंहतौ । दंशितश् चोरगैर् दत्तं यद् विषं मम भोजने

śastrāṇi pātitāny aṅge kṣipto yac cāgnisaṁhatau daṁśitaś coragair dattaṁ yad viṣaṁ mama bhojane

'मेरे शरीर पर गिराए गए शस्त्र, अग्नि-राशि में मुझे फेंका जाना, सर्पों द्वारा डसाया जाना, मेरे भोजन में विष दिया जाना,'

श्लोक 23 (vishnu.1.20.23)

बद्ध्वा समुद्रे यत् क्षिप्तो यच् चितोऽस्मि शिलोच्चयैः । अन्यानि चाप्य् असाधूनि यानि पित्रा कृतानि मे

baddhvā samudre yat kṣipto yac cito 'smi śiloccayaiḥ anyāni cāpy asādhūni yāni pitrā kṛtāni me

'मुझे बाँधकर समुद्र में फेंका जाना, पत्थरों के ढेर से मुझे दबाया जाना, और पिता द्वारा किए गए अन्य दुष्कर्म भी —'

श्लोक 24 (vishnu.1.20.24)

त्वयि भक्तिमतो द्वेषाद् अघं तत्संभवं च यत् । त्वत्प्रसादात् प्रभो सद्यस् तेन मुच्येत मे पिता

tvayi bhaktimato dveṣād aghaṁ tatsaṁbhavaṁ ca yat tvatprasādāt prabho sadyas tena mucyeta me pitā

'मेरे प्रति भक्ति के कारण उत्पन्न द्वेष से हुआ वह पाप — हे प्रभो! आपकी कृपा से मेरे पिता तत्काल उससे मुक्त हो जाएँ।'

श्लोक 25 (vishnu.1.20.25)

श्रीभगवान् उवाच । प्रह्लाद सर्वम् एतत् ते मत्प्रसादाद् भविष्यति । अन्यं च ते वरं दद्मि व्रियताम् असुरात्मज

śrībhagavān uvāca prahlāda sarvam etat te matprasādād bhaviṣyati anyaṁ ca te varaṁ dadmi vriyatām asurātmaja

श्रीभगवान् बोले — 'हे प्रह्लाद! यह सब मेरी कृपा से तुम्हारे लिए घटित होगा; और भी एक वर मैं तुम्हें देता हूँ — हे असुरात्मज! माँगो।'

श्लोक 26 (vishnu.1.20.26)

श्रीप्रह्लाद उवाच । कृतकृत्योऽस्मि भगवन् वरेणानेन यत् त्वयि । भवित्री त्वत्प्रसादेन भक्तिर् अव्यभिचारिणी

śrīprahlāda uvāca kṛtakṛtyo 'smi bhagavan vareṇānena yat tvayi bhavitrī tvatprasādena bhaktir avyabhicāriṇī

श्रीप्रह्लाद बोले — 'हे भगवन्! इसी वर से मैं कृतकृत्य हूँ, कि आपकी कृपा से आपके प्रति अव्यभिचारिणी भक्ति मुझे प्राप्त होगी।'

श्लोक 27 (vishnu.1.20.27)

धर्मार्थकामैः किं तस्य मुक्तिस् तस्य करे स्थिता । समस्तजगतां मूले यस्य भक्तिः स्थिरा त्वयि

dharmārthakāmaiḥ kiṁ tasya muktis tasya kare sthitā samastajagatāṁ mūle yasya bhaktiḥ sthirā tvayi

'जिसकी भक्ति समस्त लोकों के मूल में आपमें स्थिर है, उसे धर्म-अर्थ-काम से क्या प्रयोजन — मुक्ति तो उसकी हथेली में ही स्थित है।'

श्लोक 28 (vishnu.1.20.28)

श्रीभगवान् उवाच । यथा ते निश्चलं चेतो मयि भक्तिसमन्वितम् । तथा त्वं मत्प्रसादेन निर्वाणं परम् आप्स्यसि

śrībhagavān uvāca yathā te niścalaṁ ceto mayi bhaktisamanvitam tathā tvaṁ matprasādena nirvāṇaṁ param āpsyasi

श्रीभगवान् बोले — 'जैसे तुम्हारा चित्त मुझमें भक्तिपूर्वक अचल है, वैसे ही मेरी कृपा से तुम परम निर्वाण को प्राप्त करोगे।'

श्लोक 29 (vishnu.1.20.29)

श्रीपराशर उवाच । इत्य् उक्त्वान्तर्दधे विष्णुस् तस्य मैत्रेय पश्यतः । स चापि पुनर् आगम्य ववन्दे चरणौ पितुः

śrīparāśara uvāca ity uktvāntardadhe viṣṇus tasya maitreya paśyataḥ sa cāpi punar āgamya vavande caraṇau pituḥ

श्रीपराशर बोले — हे मैत्रेय! ऐसा कहकर उसके देखते-देखते विष्णु अंतर्धान हो गए; और वह भी पुनः आकर पिता के चरणों में प्रणाम करने लगा।

श्लोक 30 (vishnu.1.20.30)

तं पिता मूर्ध्न्य् उपाघ्राय परिष्वज्य च पीडितम् । जीवसीत्य् आह वत्सेति बाष्पार्द्रनयनो द्विज

taṁ pitā mūrdhny upāghrāya pariṣvajya ca pīḍitam jīvasīty āha vatseti bāṣpārdranayano dvija

हे द्विज! पिता ने उसके सिर को सूँघकर और कसकर आलिंगन करके, आँसुओं से भीगे नेत्रों से 'तुम जीवित हो, वत्स' यह कहा।

श्लोक 31 (vishnu.1.20.31)

प्रीतिमांश् चाभवत् तस्मिन्न् अनुतापी महासुरः । गुरुपित्रोश् चकारैवं शुश्रूषां सोऽपि धर्मवित्

prītimāṁś cābhavat tasminn anutāpī mahāsuraḥ gurupitroś cakāraivaṁ śuśrūṣāṁ so 'pi dharmavit

और वह महान् असुर पश्चातापयुक्त होकर उसमें प्रेम रखने लगा; और वह धर्मज्ञ भी गुरु और पिता दोनों की सेवा करने लगा।

श्लोक 32 (vishnu.1.20.32)

पितर्य् उपरतिं नीते नरसिंहस्वरूपिणा । विष्णुना सोऽपि दैत्यानां मैत्रेयाभूत् पतिस् ततः

pitary uparatiṁ nīte narasiṁhasvarūpiṇā viṣṇunā so 'pi daityānāṁ maitreyābhūt patis tataḥ

नरसिंहरूपधारी विष्णु द्वारा उसके पिता का अंत हो जाने पर, हे मैत्रेय, वह तब दैत्यों का स्वामी बन गया।

श्लोक 33 (vishnu.1.20.33)

तद्राज्यभूतिं संप्राप्य कर्मशुद्धिकरीं द्विज । पुत्रपौत्रांश् च सुबहून् अवाप्यैश्वर्यम् एव च

tadrājyabhūtiṁ saṁprāpya karmaśuddhikarīṁ dvija putrapautrāṁś ca subahūn avāpyaiśvaryam eva ca

हे द्विज! उस कर्मशुद्धिकारी राज्य-वैभव को प्राप्त करके तथा अनेक पुत्र-पौत्रों और ऐश्वर्य को भी प्राप्त करके,

श्लोक 34 (vishnu.1.20.34)

क्षीणाधिकारः स यदा पुण्यपापविवर्जितः । तदासौ भगवद्ध्यानात् परं निर्वाणम् आप्तवान्

kṣīṇādhikāraḥ sa yadā puṇyapāpavivarjitaḥ tadāsau bhagavaddhyānāt paraṁ nirvāṇam āptavān

जब उसका राज्याधिकार क्षीण हो गया, तब पुण्य-पाप दोनों से रहित होकर उसने भगवद्ध्यान से परम निर्वाण प्राप्त किया।

श्लोक 35 (vishnu.1.20.35)

एवंप्रभावो दैत्योऽसौ मैत्रेयासीन् महामतिः । प्रह्लादो भगवद्भक्तो यं त्वं माम् अनुपृच्छसि

evaṁprabhāvo daityo 'sau maitreyāsīn mahāmatiḥ prahlādo bhagavadbhakto yaṁ tvaṁ mām anupṛcchasi

हे मैत्रेय! ऐसे ही प्रभाव वाला वह महामति, भगवद्भक्त दैत्य प्रह्लाद था, जिसके विषय में तुमने मुझसे पूछा है।

श्लोक 36 (vishnu.1.20.36)

यस् त्व् एतच् चरितं तस्य प्रह्लादस्य महात्मनः । शृणोति तस्य पापानि सद्यो गच्छन्ति संक्षयम्

yas tv etac caritaṁ tasya prahlādasya mahātmanaḥ śṛṇoti tasya pāpāni sadyo gacchanti saṁkṣayam

जो भी उस महात्मा प्रह्लाद के इस चरित्र को सुनता है, उसके पाप तत्काल क्षय को प्राप्त हो जाते हैं।

श्लोक 37 (vishnu.1.20.37)

अहोरात्रकृतं पापं प्रह्लादचरितं नरः । शृण्वन् पठंश् च मैत्रेय व्यपोहति न संशयः

ahorātrakṛtaṁ pāpaṁ prahlādacaritaṁ naraḥ śṛṇvan paṭhaṁś ca maitreya vyapohati na saṁśayaḥ

हे मैत्रेय! दिन-रात में किए गए पाप को मनुष्य प्रह्लाद के इस चरित्र को सुनते और पढ़ते हुए दूर कर देता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 38 (vishnu.1.20.38)

पौर्णमास्याम् अमावास्याम् अष्टम्याम् अथ वा पठन् । द्वादश्यां वा तद् आप्नोति गोप्रदानफलं द्विज

paurṇamāsyām amāvāsyām aṣṭamyām atha vā paṭhan dvādaśyāṁ vā tad āpnoti gopradānaphalaṁ dvija

हे द्विज! पूर्णिमा, अमावस्या, अष्टमी, अथवा द्वादशी को इसे पढ़ते हुए मनुष्य गोदान का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 39 (vishnu.1.20.39)

प्रह्लादं सकलापत्सु यथा रक्षितवान् हरिः । तथा रक्षति यस् तस्य शृणोति चरितं सदा

prahlādaṁ sakalāpatsu yathā rakṣitavān hariḥ tathā rakṣati yas tasya śṛṇoti caritaṁ sadā

जैसे हरि ने प्रह्लाद की समस्त विपत्तियों में रक्षा की, वैसे ही वे उसकी रक्षा करते हैं जो सदा उसका चरित्र सुनता है।

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