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प्रथमांश · अध्याय 4

वराह अवतार और पृथ्वी-उद्धार

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (vishnu.1.4.1)

श्रीमैत्रेय उवाच । ब्रह्मा नारायणाख्योऽसौ कल्पादौ भगवान् यथा । ससर्ज सर्वभूतानि तद् आचक्ष्व महामुने

śrīmaitreya uvāca brahmā nārāyaṇākhyo 'sau kalpādau bhagavān yathā sasarja sarvabhūtāni tad ācakṣva mahāmune

श्रीमैत्रेय ने कहा — हे महामुने! बताइए कि कल्प के आरम्भ में नारायण नामक भगवान् ब्रह्मा ने किस प्रकार समस्त प्राणियों की सृष्टि की।

श्लोक 2 (vishnu.1.4.2)

श्रीपराशर उवाच । प्रजाः ससर्ज भगवान् ब्रह्मा नारायणात्मकः । प्रजापतिपतिर् देवो यथा तन् मे निशामय

śrīparāśara uvāca prajāḥ sasarja bhagavān brahmā nārāyaṇātmakaḥ prajāpatipatir devo yathā tan me niśāmaya

श्रीपराशर ने कहा — सुनो, किस प्रकार नारायण-स्वरूप भगवान् ब्रह्मा, प्रजापतियों के स्वामी देव, ने प्रजाओं की सृष्टि की।

श्लोक 3 (vishnu.1.4.3)

अतीतकल्पावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभुः । सत्त्वोद्रिक्तस् तथा ब्रह्मा शून्यं लोकम् अवैक्षत

atītakalpāvasāne niśāsuptotthitaḥ prabhuḥ sattvodriktas tathā brahmā śūnyaṁ lokam avaikṣata

बीते हुए कल्प के अन्त में, रात्रि की निद्रा से जागे हुए प्रभु, सत्त्वगुण-प्रधान ब्रह्मा ने शून्य लोक को देखा।

श्लोक 4 (vishnu.1.4.4)

नारायणः परोऽचिन्त्यः परेषाम् अपि स प्रभुः । ब्रह्मस्वरूपी भगवान् अनादिः सर्वसंभवः

nārāyaṇaḥ paro 'cintyaḥ pareṣām api sa prabhuḥ brahmasvarūpī bhagavān anādiḥ sarvasaṁbhavaḥ

नारायण परम, अचिन्त्य हैं; वे परम-श्रेष्ठों के भी स्वामी हैं; वे ब्रह्मस्वरूप भगवान् अनादि तथा समस्त सृष्टि के मूल स्रोत हैं।

श्लोक 5 (vishnu.1.4.5)

इमं चोदाहरन्त्य् अत्र श्लोकं नारायणं प्रति । ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवाप्ययम्

imaṁ codāharanty atra ślokaṁ nārāyaṇaṁ prati brahmasvarūpiṇaṁ devaṁ jagataḥ prabhavāpyayam

इस विषय में नारायण के सम्बन्ध में — जो ब्रह्मस्वरूप देव और जगत् की उत्पत्ति तथा लय के कारण हैं — यह श्लोक उद्धृत किया जाता है —

श्लोक 6 (vishnu.1.4.6)

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः । अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः

āpo nārā iti proktā āpo vai narasūnavaḥ ayanaṁ tasya tāḥ pūrvaṁ tena nārāyaṇaḥ smṛtaḥ

'जल को नार कहा गया है, क्योंकि जल नर (पुरुष) की सन्तान हैं; पूर्वकाल में वे जल ही उनका आयन (निवास-स्थान) थे, इसीलिए वे नारायण कहलाए।'

श्लोक 7 (vishnu.1.4.7)

तोयान्तः स महीं ज्ञात्वा जगत्य् एकार्णवे प्रभुः । अनुमानात् तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः

toyāntaḥ sa mahīṁ jñātvā jagaty ekārṇave prabhuḥ anumānāt taduddhāraṁ kartukāmaḥ prajāpatiḥ

जब सम्पूर्ण जगत् एक ही महासागर बन गया था, तब प्रभु प्रजापति ने अनुमान से यह जानकर कि पृथ्वी जल के भीतर है, उसे बाहर निकालने की इच्छा की।

श्लोक 8 (vishnu.1.4.8)

अकरोत् स तनूम् अन्यां कल्पादिषु यथा पुरा । मत्स्यकूर्मादिकां तद्वद् वाराहं वपुर् आस्थितः

akarot sa tanūm anyāṁ kalpādiṣu yathā purā matsyakūrmādikāṁ tadvad vārāhaṁ vapur āsthitaḥ

उन्होंने, जैसे पूर्वकाल में कल्पों के आरम्भ में मत्स्य, कूर्म आदि रूप धारण किए थे, उसी प्रकार अब वाराह रूप धारण किया।

श्लोक 9 (vishnu.1.4.9)

वेदयज्ञमयं रूपम् अशेषजगतः स्थितौ । स्थितः स्थिरात्मा सर्वात्मा परमात्मा प्रजापतिः

vedayajñamayaṁ rūpam aśeṣajagataḥ sthitau sthitaḥ sthirātmā sarvātmā paramātmā prajāpatiḥ

वह रूप वेद और यज्ञमय है, समस्त जगत् की स्थिति के लिए है; स्थिर आत्मा, सर्वात्मा, परमात्मा प्रजापति उस रूप में स्थित हुए।

श्लोक 10 (vishnu.1.4.10)

जनलोकगतैः सिद्धैः सनकाद्यैर् अभिष्टुतः । प्रविवेश तदा तोयम् आत्माधारो धराधरः

janalokagataiḥ siddhaiḥ sanakādyair abhiṣṭutaḥ praviveśa tadā toyam ātmādhāro dharādharaḥ

जनलोक में स्थित सनकादि सिद्धों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, स्वयं ही अपना आधार, वे पृथ्वीधर तब जल में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 11 (vishnu.1.4.11)

निरीक्ष्य तं तदा देवी पातालतलम् आगतम् । तुष्टाव प्रणता भूत्वा भक्तिनम्रा वसुंधरा

nirīkṣya taṁ tadā devī pātālatalam āgatam tuṣṭāva praṇatā bhūtvā bhaktinamrā vasuṁdharā

उन्हें पाताल-तल में आया देखकर देवी वसुंधरा ने प्रणत होकर, भक्तिपूर्वक नम्र होकर उनकी स्तुति की।

श्लोक 12 (vishnu.1.4.12)

श्रीपृथिव्य् उवाच । नमस् ते सर्वभूताय तुभ्यं शङ्खगदाधर । माम् उद्धरास्माद् अद्य त्वं त्वत्तोऽहं पूर्वम् उत्थिता

śrīpṛthivy uvāca namas te sarvabhūtāya tubhyaṁ śaṅkhagadādhara mām uddharāsmād adya tvaṁ tvatto 'haṁ pūrvam utthitā

श्रीपृथ्वी ने कहा — हे शंख-गदाधर! आप ही समस्त प्राणी हैं, आपको नमस्कार है। आज आप मुझे इस जल से उद्धार करें; मैं पहले आप से ही उत्पन्न हुई थी।

श्लोक 13 (vishnu.1.4.13)

त्वयाहम् उद्धृता पूर्वं त्वन्मयाहं जनार्दन । तथान्यानि च भूतानि गगनादीन्य् अशेषतः

tvayāham uddhṛtā pūrvaṁ tvanmayāhaṁ janārdana tathānyāni ca bhūtāni gaganādīny aśeṣataḥ

हे जनार्दन! पूर्वकाल में आपने ही मुझे उद्धार किया था; मैं आप ही से बनी हूँ, तथा आकाश आदि अन्य समस्त भूत भी।

श्लोक 14 (vishnu.1.4.14)

नमस् ते परमात्मात्मन् पुरुषात्मन् नमोऽस्तु ते । प्रधानव्यक्तभूताय कालभूताय ते नमः

namas te paramātmātman puruṣātman namo 'stu te pradhānavyaktabhūtāya kālabhūtāya te namaḥ

हे परमात्मात्मन्! आपको नमस्कार है, हे पुरुषात्मन्! आपको नमस्कार हो। प्रधान और व्यक्त रूप में प्रकट होने वाले, तथा काल-रूप धारण करने वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 15 (vishnu.1.4.15)

त्वं कर्ता सर्वभूतानां त्वं पाता त्वं विनाशकृत् । सर्गादिषु प्रभो ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मरूपधृक्

tvaṁ kartā sarvabhūtānāṁ tvaṁ pātā tvaṁ vināśakṛt sargādiṣu prabho brahmaviṣṇurudrātmarūpadhṛk

आप ही समस्त प्राणियों के कर्ता हैं, आप ही पालक हैं, आप ही विनाशकर्ता हैं; हे प्रभो! सृष्टि आदि में आप ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का रूप धारण करते हैं।

श्लोक 16 (vishnu.1.4.16)

संभक्षयित्वा सकलं जगत्य् एकार्णवीकृते । शेषे त्वम् एव गोविन्द चिन्त्यमानो मनीषिभिः

saṁbhakṣayitvā sakalaṁ jagaty ekārṇavīkṛte śeṣe tvam eva govinda cintyamāno manīṣibhiḥ

जब सम्पूर्ण जगत् को निगलकर वह एक ही महासागर बन जाता है, तब हे गोविन्द! विद्वानों द्वारा ध्यान किए जाते हुए आप ही अकेले शेष रहते हैं।

श्लोक 17 (vishnu.1.4.17)

भवतो यत् परं रूपं तन् न जानाति कश्चन । अवतारेषु यद् रूपं तद् अर्चन्ति दिवौकसः

bhavato yat paraṁ rūpaṁ tan na jānāti kaścana avatāreṣu yad rūpaṁ tad arcanti divaukasaḥ

आपके परम रूप को कोई नहीं जानता; देवगण केवल आपके अवतार-रूपों की ही पूजा करते हैं।

श्लोक 18 (vishnu.1.4.18)

त्वाम् आराध्य परं ब्रह्म याता मुक्तिं मुमुक्षवः । वासुदेवम् अनाराध्य को मोक्षं समवाप्स्यति

tvām ārādhya paraṁ brahma yātā muktiṁ mumukṣavaḥ vāsudevam anārādhya ko mokṣaṁ samavāpsyati

आपकी परब्रह्म रूप में आराधना करके मुमुक्षुजन मुक्ति को प्राप्त होते हैं; वासुदेव की आराधना किए बिना कौन मोक्ष पा सकता है?

श्लोक 19 (vishnu.1.4.19)

यत् किंचिन् मनसा ग्राह्यं यद् ग्राह्यं चक्षुरादिभिः । बुद्ध्या च यत् परिच्छेद्यं तद् रूपम् अखिलं तव

yat kiṁcin manasā grāhyaṁ yad grāhyaṁ cakṣurādibhiḥ buddhyā ca yat paricchedyaṁ tad rūpam akhilaṁ tava

जो कुछ मन से ग्रहण किया जा सकता है, जो कुछ आँख आदि इन्द्रियों से ग्रहण किया जा सकता है, और जो कुछ बुद्धि से निर्धारित किया जा सकता है — वह सब आपका ही रूप है।

श्लोक 20 (vishnu.1.4.20)

त्वन्मयाहं त्वदाधारा त्वत्सृष्टा त्वाम् उपाश्रिता । माधवीम् इति लोकोऽयम् अभिधत्ते ततो हि माम्

tvanmayāhaṁ tvadādhārā tvatsṛṣṭā tvām upāśritā mādhavīm iti loko 'yam abhidhatte tato hi mām

मैं आप ही से बनी हूँ, आप ही मेरा आधार हैं, आप ही ने मुझे उत्पन्न किया है, मैं आपका ही आश्रय लेती हूँ; इसीलिए यह लोक मुझे 'माधवी' कहकर पुकारता है।

श्लोक 21 (vishnu.1.4.21)

जयाखिलज्ञानमय जय स्थूलमयाव्यय । जयानन्त जयाव्यक्त जय व्यक्तमय प्रभो । परापरात्मन् विश्वात्मञ् जय यज्ञपतेऽनघ

jayākhilajñānamaya jaya sthūlamayāvyaya jayānanta jayāvyakta jaya vyaktamaya prabho parāparātman viśvātmañ jaya yajñapate 'nagha

हे अखिल-ज्ञानमय! जय हो। हे अव्यय स्थूलमय! जय हो। हे अनन्त! जय हो। हे अव्यक्त! जय हो। हे व्यक्तमय प्रभो! जय हो। हे परापर आत्मन्! हे विश्वात्मन्! हे निष्पाप यज्ञपते! जय हो।

श्लोक 22 (vishnu.1.4.22)

त्वं यज्ञस् त्वं वषट्कारस् त्वम् ओंकारस् त्वम् अग्नयः । त्वं वेदास् त्वं तदङ्गानि त्वं यज्ञपुरुषो हरे

tvaṁ yajñas tvaṁ vaṣaṭkāras tvam oṁkāras tvam agnayaḥ tvaṁ vedās tvaṁ tadaṅgāni tvaṁ yajñapuruṣo hare

आप ही यज्ञ हैं, आप ही वषट्कार हैं, आप ही ॐकार हैं, आप ही अग्नियाँ हैं; आप ही वेद हैं, आप ही उनके अंग हैं; हे हरे! आप ही यज्ञपुरुष हैं।

श्लोक 23 (vishnu.1.4.23)

सूर्यादयो ग्रहास् तारा नक्षत्राण्य् अखिलानि च । मूर्तामूर्तम् अदृश्यं च दृश्यं च पुरुषोत्तम

sūryādayo grahās tārā nakṣatrāṇy akhilāni ca mūrtāmūrtam adṛśyaṁ ca dṛśyaṁ ca puruṣottama

हे पुरुषोत्तम! सूर्यादि ग्रह, तारे, समस्त नक्षत्र, मूर्त और अमूर्त, अदृश्य और दृश्य — सब कुछ आप ही हैं।

श्लोक 24 (vishnu.1.4.24)

यच् चोक्तं यच् च नैवोक्तं मयात्र परमेश्वर । तत् सर्वं त्वं नमस् तुभ्यं भूयो भूयो नमो नमः

yac coktaṁ yac ca naivoktaṁ mayātra parameśvara tat sarvaṁ tvaṁ namas tubhyaṁ bhūyo bhūyo namo namaḥ

हे परमेश्वर! यहाँ मैंने जो कुछ कहा और जो कुछ नहीं कहा — वह सब आप ही हैं। आपको नमस्कार है, बार-बार नमस्कार, नमस्कार।

श्लोक 25 (vishnu.1.4.25)

श्रीपराशर उवाच । एवं संस्तूयमानस् तु पृथिव्या पृथिवीधरः । सामस्वरध्वनिः श्रीमाञ् जगर्ज परिघर्घरम्

śrīparāśara uvāca evaṁ saṁstūyamānas tu pṛthivyā pṛthivīdharaḥ sāmasvaradhvaniḥ śrīmāñ jagarja parighargharam

श्रीपराशर ने कहा — इस प्रकार पृथ्वी द्वारा स्तुति किए जाते हुए वे श्रीमान् पृथ्वीधर सामगान की ध्वनि के समान गम्भीर स्वर में गरजे।

श्लोक 26 (vishnu.1.4.26)

ततः समुत्क्षिप्य धरां स्वदंष्ट्रया महावराहः स्फुटपद्मलोचनः । रसातलाद् उत्पलपत्रसंनिभः समुत्थितो नील इवाचलो महान्

tataḥ samutkṣipya dharāṁ svadaṁṣṭrayā mahāvarāhaḥ sphuṭapadmalocanaḥ rasātalād utpalapatrasaṁnibhaḥ samutthito nīla ivācalo mahān

तब वह महान् वाराह, अपने दाँत पर पृथ्वी को उठाए हुए, खिले हुए कमल के समान नेत्रों वाला, कमल-पत्र के सदृश, नीले पर्वत के समान विशाल, रसातल से ऊपर उठा।

श्लोक 27 (vishnu.1.4.27)

उत्तिष्ठता तेन मुखानिलाहतं तत्संप्लवाम्भो जनलोकसंश्रयान् । सनन्दनादीन् अपकल्मषान् मुनीन् चकार भूयोऽपि पवित्रतास्पदम्

uttiṣṭhatā tena mukhānilāhataṁ tatsaṁplavāmbho janalokasaṁśrayān sanandanādīn apakalmaṣān munīn cakāra bhūyo 'pi pavitratāspadam

उठते हुए उनके मुख की वायु से आहत तथा उस प्रलय-जल में डूबे हुए, जनलोक में शरण लिए हुए सनन्दन आदि मुनियों को उन्होंने पुनः निष्पाप और पवित्र बना दिया।

श्लोक 28 (vishnu.1.4.28)

प्रयान्ति तोयानि खुराग्रविक्षते रसातलेऽधः कृतशब्दसंततम् । श्वासानिलार्ताः परितः प्रयान्ति सिद्धा जने ये नियतं वसन्ति

prayānti toyāni khurāgravikṣate rasātale 'dhaḥ kṛtaśabdasaṁtatam śvāsānilārtāḥ paritaḥ prayānti siddhā jane ye niyataṁ vasanti

उनके खुरों के अग्रभाग से क्षत-विक्षत रसातल में जल नीचे निरन्तर शब्द करते हुए बह चला; और जनलोक में सदा निवास करने वाले सिद्ध उनकी श्वास-वायु से पीड़ित होकर चारों ओर भागने लगे।

श्लोक 29 (vishnu.1.4.29)

उत्तिष्ठतस् तस्य जलार्द्रकुक्षेर् महावराहस्य महीं विगृह्य । विधुन्वतो वेदमयं शरीरं रोमान्तरस्था मुनयः स्तुवन्ति

uttiṣṭhatas tasya jalārdrakukṣer mahāvarāhasya mahīṁ vigṛhya vidhunvato vedamayaṁ śarīraṁ romāntarasthā munayaḥ stuvanti

जल से भीगे हुए उदर वाले उस महावाराह के उठते समय, पृथ्वी को ग्रहण किए तथा अपने वेदमय शरीर को कँपाते हुए, उनके रोमों में स्थित मुनि उनकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 30 (vishnu.1.4.30)

तं तुष्टुवुस् तोषपरीतचेतसो लोके जने ये निवसन्ति योगिनः । सनन्दनाद्या नतिनम्रकन्धरा धराधरं धीरतरोद्धतेक्षणम्

taṁ tuṣṭuvus toṣaparītacetaso loke jane ye nivasanti yoginaḥ sanandanādyā natinamrakandharā dharādharaṁ dhīrataroddhatekṣaṇam

जनलोक में निवास करने वाले योगीजन, हर्ष से परिपूर्ण चित्त होकर, धीर तथा उद्धत नेत्रों वाले उन पृथ्वीधर की स्तुति करने लगे — सनन्दन आदि, नम्र-ग्रीव होकर।

श्लोक 31 (vishnu.1.4.31)

जयेश्वराणां परमेश केशव प्रभो गदाशङ्खधरासिचक्रधृक् । प्रसूतिनाशस्थितिहेतुर् ईश्वरस् त्वम् एव नान्यत् परमं च यत् पदम्

jayeśvarāṇāṁ parameśa keśava prabho gadāśaṅkhadharāsicakradhṛk prasūtināśasthitihetur īśvaras tvam eva nānyat paramaṁ ca yat padam

हे ईश्वरों के परमेश! हे केशव! हे गदा-शंख-असि-चक्रधारी प्रभो! जय हो। उत्पत्ति, विनाश और स्थिति के कारण आप ही ईश्वर हैं; इससे परे और कोई परम पद नहीं है।

श्लोक 32 (vishnu.1.4.32)

पादेषु वेदास् तव यूपदंष्ट्र दन्तेषु यज्ञाश् चितयश् च वक्त्रे । हुताशजिह्वोऽसि तनूरुहाणि दर्भाः प्रभो यज्ञपुमांस् त्वम् एव

pādeṣu vedās tava yūpadaṁṣṭra danteṣu yajñāś citayaś ca vaktre hutāśajihvo 'si tanūruhāṇi darbhāḥ prabho yajñapumāṁs tvam eva

हे यूपदंष्ट्र! आपके पैरों में वेद हैं, दाँतों में यज्ञ हैं, मुख में चितियाँ हैं; आप अग्नि-जिह्वा वाले हैं, आपके रोम दर्भ (कुश) हैं; हे प्रभो! आप ही यज्ञपुरुष हैं।

श्लोक 33 (vishnu.1.4.33)

विलोचने रात्र्यहनी महात्मन् सर्वास्पदं ब्रह्म परं शिरस् ते । सूक्तान्य् अशेषाणि सटाकलापो घ्राणं समस्तानि हवींषि देव

vilocane rātryahanī mahātman sarvāspadaṁ brahma paraṁ śiras te sūktāny aśeṣāṇi saṭākalāpo ghrāṇaṁ samastāni havīṁṣi deva

हे महात्मन्! रात्रि और दिन आपके नेत्र हैं, सर्वाधार परब्रह्म आपका शिर है; समस्त सूक्त आपकी अयाल हैं, हे देव! आपका घ्राण समस्त हवियाँ हैं।

श्लोक 34 (vishnu.1.4.34)

स्रुक्तुण्ड सामस्वरधीरनाद प्राग्वंशकायाखिलसत्रसंधे । पूर्तेष्टधर्मश्रवणोऽसि देव सनातनात्मन् भगवन् प्रसीद

sruktuṇḍa sāmasvaradhīranāda prāgvaṁśakāyākhilasatrasaṁdhe pūrteṣṭadharmaśravaṇo 'si deva sanātanātman bhagavan prasīda

हे देव! जिनका मुख स्रुक् (यज्ञपात्र) है, जिनकी ध्वनि सामस्वर के समान गम्भीर है, जिनका शरीर यज्ञशाला है, जो समस्त यज्ञों के संधि-स्थल हैं, जो पूर्त और इष्ट धर्मों के श्रवण-स्वरूप हैं — हे सनातनात्मन् भगवन्! प्रसन्न हों।

श्लोक 35 (vishnu.1.4.35)

पदक्रमाक्रान्तम् अनन्तम् आदि स्थितं त्वम् एवाक्षर विश्वमूर्ते । विश्वस्य विद्मः परमेश्वरोऽसि प्रसीद नाथोऽसि चराचरस्य

padakramākrāntam anantam ādi sthitaṁ tvam evākṣara viśvamūrte viśvasya vidmaḥ parameśvaro 'si prasīda nātho 'si carācarasya

हे अक्षर विश्वमूर्ते! अपने चरणों से समस्त लोक को व्याप्त करने वाले, अनन्त, आदि में स्थित आप ही हैं; हम जानते हैं कि आप विश्व के परमेश्वर हैं; प्रसन्न हों, आप चराचर के स्वामी हैं।

श्लोक 36 (vishnu.1.4.36)

दंष्ट्राग्रविन्यस्तम् अशेषम् एतद् भूमण्डलं नाथ विभाव्यते ते । विगाहतः पद्मवनं विलग्नं सरोजिनीपत्रम् इवोढपङ्कम्

daṁṣṭrāgravinyastam aśeṣam etad bhūmaṇḍalaṁ nātha vibhāvyate te vigāhataḥ padmavanaṁ vilagnaṁ sarojinīpatram ivoḍhapaṅkam

हे नाथ! यह सम्पूर्ण भूमण्डल आपके दाँत के अग्रभाग पर स्थित दिखाई देता है, जैसे कमलवन में गोता लगाते हुए किसी के दाँत में कीचड़ सहित कमल-पत्र लिपट जाए।

श्लोक 37 (vishnu.1.4.37)

द्यावापृथिव्योर् अतुलप्रभाव यद् अन्तरं तद् वपुषा तवैव । व्याप्तं जगद् व्याप्तिसमर्थदीप्ते हिताय विश्वस्य विभो भव त्वम्

dyāvāpṛthivyor atulaprabhāva yad antaraṁ tad vapuṣā tavaiva vyāptaṁ jagad vyāptisamarthadīpte hitāya viśvasya vibho bhava tvam

हे अतुल प्रभाव वाले! आकाश और पृथ्वी के बीच जो अन्तराल है, वह आपके ही शरीर से व्याप्त है; हे व्यापन-समर्थ तेजस्वी! विश्व के हित के लिए आप प्रकट हों।

श्लोक 38 (vishnu.1.4.38)

परमार्थस् त्वम् एवैको नान्योऽस्ति जगतः पते । तवैष महिमा येन व्याप्तम् एतच् चराचरम्

paramārthas tvam evaiko nānyo 'sti jagataḥ pate tavaiṣa mahimā yena vyāptam etac carācaram

हे जगत्पते! आप ही एकमात्र परमार्थ हैं, अन्य कोई नहीं; यह आपकी ही महिमा है, जिससे यह चराचर जगत् व्याप्त है।

श्लोक 39 (vishnu.1.4.39)

यद् एतद् दृश्यते मूर्तम् एतज् ज्ञानात्मनस् तव । भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति जगद्रूपम् अयोगिनः

yad etad dṛśyate mūrtam etaj jñānātmanas tava bhrāntijñānena paśyanti jagadrūpam ayoginaḥ

जो कुछ यह मूर्त रूप में दिखाई देता है, वह आपके ही ज्ञानस्वरूप की अभिव्यक्ति है; योगरहित लोग भ्रान्त ज्ञान से इसे जगत्-रूप में देखते हैं।

श्लोक 40 (vishnu.1.4.40)

ज्ञानस्वरूपम् अखिलं जगद् एतद् अबुद्धयः । अर्थस्वरूपं पश्यन्तो भ्राम्यन्ते मोहसंप्लवे

jñānasvarūpam akhilaṁ jagad etad abuddhayaḥ arthasvarūpaṁ paśyanto bhrāmyante mohasaṁplave

यह सम्पूर्ण जगत् वास्तव में ज्ञानस्वरूप ही है, किन्तु अज्ञानी लोग इसे पदार्थ-रूप में देखते हुए मोह के प्रवाह में भ्रमित होते रहते हैं।

श्लोक 41 (vishnu.1.4.41)

ये तु ज्ञानविदः शुद्धचेतसस् तेऽखिलं जगत् । ज्ञानात्मकं प्रपश्यन्ति त्वद्रूपं परमेश्वर

ye tu jñānavidaḥ śuddhacetasas te 'khilaṁ jagat jñānātmakaṁ prapaśyanti tvadrūpaṁ parameśvara

किन्तु हे परमेश्वर! जो ज्ञानवान् और शुद्धचित्त हैं, वे इस सम्पूर्ण जगत् को ज्ञानस्वरूप — आपका ही रूप — देखते हैं।

श्लोक 42 (vishnu.1.4.42)

प्रसीद सर्वसर्वात्मन् भवाय जगताम् इमाम् । उद्धरोर्वीम् अमेयात्मञ् शं नो देह्य् अब्जलोचन

prasīda sarvasarvātman bhavāya jagatām imām uddharorvīm ameyātmañ śaṁ no dehy abjalocana

हे सर्वात्मन्! इन लोकों के कल्याण के लिए प्रसन्न हों; हे अमेय आत्मन्! पृथ्वी का उद्धार करें; हे कमलनयन! हमें कल्याण प्रदान करें।

श्लोक 43 (vishnu.1.4.43)

सत्त्वोद्रिक्तोऽसि भगवन् गोविन्द पृथिवीम् इमाम् । समुद्धर भवायेश शं नो देह्य् अब्जलोचन

sattvodrikto 'si bhagavan govinda pṛthivīm imām samuddhara bhavāyeśa śaṁ no dehy abjalocana

हे भगवन् गोविन्द! आप सत्त्वगुण-प्रधान हैं; कल्याण के लिए इस पृथ्वी का उद्धार करें, हे ईश! हे कमलनयन! हमें कल्याण प्रदान करें।

श्लोक 44 (vishnu.1.4.44)

सर्गप्रवृत्तिर् भवतो जगताम् उपकारिणी । भवत्व् एषा नमस् तेऽस्तु शं नो देह्य् अब्जलोचन

sargapravṛttir bhavato jagatām upakāriṇī bhavatv eṣā namas te 'stu śaṁ no dehy abjalocana

आपकी यह सृष्टि-प्रवृत्ति लोकों के लिए उपकारी हो; ऐसा ही हो; आपको नमस्कार है; हे कमलनयन! हमें कल्याण प्रदान करें।

श्लोक 45 (vishnu.1.4.45)

श्रीपराशर उवाच । एवं संस्तूयमानस् तु परमात्मा महीधरः । उज्जहार क्षितिं क्षिप्रं न्यस्तवांश् च महार्णवे

śrīparāśara uvāca evaṁ saṁstūyamānas tu paramātmā mahīdharaḥ ujjahāra kṣitiṁ kṣipraṁ nyastavāṁś ca mahārṇave

श्रीपराशर ने कहा — इस प्रकार स्तुति किए जाते हुए उन परमात्मा पृथ्वीधर ने शीघ्र ही पृथ्वी को ऊपर उठाया और महासागर में स्थापित कर दिया।

श्लोक 46 (vishnu.1.4.46)

तस्योपरि जलौघस्य महती नौर् इव स्थिता । विततत्वात् तु देहस्य न मही याति संप्लवम्

tasyopari jalaughasya mahatī naur iva sthitā vitatatvāt tu dehasya na mahī yāti saṁplavam

उनके विस्तृत शरीर के कारण पृथ्वी उस जलराशि के ऊपर एक विशाल नौका के समान स्थित रही, वह डूबी नहीं।

श्लोक 47 (vishnu.1.4.47)

ततः क्षितिं समां कृत्वा पृथिव्यां सोऽचिनोद् गिरीन् । यथाविभागं भगवान् अनादिः सर्वसंभवः

tataḥ kṣitiṁ samāṁ kṛtvā pṛthivyāṁ so 'cinod girīn yathāvibhāgaṁ bhagavān anādiḥ sarvasaṁbhavaḥ

तब पृथ्वी को समतल बनाकर, उन अनादि, सर्वसंभव भगवान् ने उस पर यथाविभाग पर्वतों की स्थापना की।

श्लोक 48 (vishnu.1.4.48)

प्राक्सर्गदग्धान् अखिलान् पर्वतान् पृथिवीतले । अमोघेन प्रभावेन ससर्जामोघवाञ्छितः

prāksargadagdhān akhilān parvatān pṛthivītale amoghena prabhāvena sasarjāmoghavāñchitaḥ

पूर्व सृष्टि में जो सभी पर्वत भस्म हो गए थे, उन्हें उन अमोघ-संकल्प भगवान् ने अपने अमोघ प्रभाव से पृथ्वीतल पर पुनः उत्पन्न किया।

श्लोक 49 (vishnu.1.4.49)

भूविभागं ततः कृत्वा सप्तद्वीपं यथातथम् । भूराद्यांश् चतुरो लोकान् पूर्ववत् समकल्पयत्

bhūvibhāgaṁ tataḥ kṛtvā saptadvīpaṁ yathātatham bhūrādyāṁś caturo lokān pūrvavat samakalpayat

तब पृथ्वी का सप्तद्वीपों में यथावत् विभाजन कर, उन्होंने पूर्ववत् भूः आदि चार लोकों की रचना की।

श्लोक 50 (vishnu.1.4.50)

ब्रह्मरूपधरो देवस् ततोऽसौ रजसा वृतः । चकार सृष्टिं भगवांश् चतुर्वक्त्रधरो हरिः

brahmarūpadharo devas tato 'sau rajasā vṛtaḥ cakāra sṛṣṭiṁ bhagavāṁś caturvaktradharo hariḥ

तब वे देव ब्रह्मा का रूप धारण कर, रजोगुण से आवृत होकर, चतुर्मुख भगवान् हरि सृष्टि करने लगे।

श्लोक 51 (vishnu.1.4.51)

निमित्तमात्रम् एवासौ सृज्यानां सर्गकर्मणि । प्रधानकारणीभूता यतो वै सृज्यशक्तयः

nimittamātram evāsau sṛjyānāṁ sargakarmaṇi pradhānakāraṇībhūtā yato vai sṛjyaśaktayaḥ

वे सृज्य वस्तुओं की सृष्टि-क्रिया में केवल निमित्तमात्र कारण हैं; प्रधान ही सृष्टि-शक्तियों का मुख्य कारण है।

श्लोक 52 (vishnu.1.4.52)

निमित्तमात्रं मुक्त्वैकं नान्यत् किंचिद् अपेक्ष्यते । नीयते तपतां श्रेष्ठ स्वशक्त्या वस्तु वस्तुताम्

nimittamātraṁ muktvaikaṁ nānyat kiṁcid apekṣyate nīyate tapatāṁ śreṣṭha svaśaktyā vastu vastutām

हे तपस्वियों में श्रेष्ठ! निमित्तमात्र कारण के अतिरिक्त और किसी की अपेक्षा नहीं होती; वस्तु अपनी ही शक्ति से अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त होती है।

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