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तृतीयांश · अध्याय 11

गृहस्थ का दैनिक सदाचार

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (vishnu.3.11.1)

सगर उवाच गृहस्थस्य सदाचारं श्रोतुमिच्छाम्यहं मुने । लोकादस्मात् परस्माच्च यमातिष्ठन्न हीयते

sagara uvāca gṛhasthasya sadācāraṁ śrotumicchāmyahaṁ mune lokādasmāt parasmācca yamātiṣṭhanna hīyate

सगर बोले -- हे मुने, मैं गृहस्थ के सदाचार को सुनना चाहता हूँ, जिसका पालन करने वाला मनुष्य इस लोक और परलोक दोनों से कभी च्युत नहीं होता।

श्लोक 2 (vishnu.3.11.2)

और्व उवाच श्रूयतां पृथिवीपाल सदाचारस्य लक्षणम् । सदाचारवता पुंसा जितौ लोकावुभावपि

aurva uvāca śrūyatāṁ pṛthivīpāla sadācārasya lakṣaṇam sadācāravatā puṁsā jitau lokāvubhāvapi

और्व बोले -- हे पृथ्वीपाल, सदाचार का लक्षण सुनो; सदाचारी पुरुष के द्वारा दोनों ही लोक जीत लिए जाते हैं।

श्लोक 3 (vishnu.3.11.3)

साधवः क्षीणदोषास्तु सच्छब्दः साधुवाचकः । तेषामाचरणं यस्तु सदाचारस्स उच्यते

sādhavaḥ kṣīṇadoṣāstu sacchabdaḥ sādhuvācakaḥ teṣāmācaraṇaṁ yastu sadācārassa ucyate

साधु वे हैं जिनके दोष क्षीण हो चुके हैं, और 'सत्' शब्द साधु का ही वाचक है; उनका जो आचरण है, वही सदाचार कहलाता है।

श्लोक 4 (vishnu.3.11.4)

सप्तर्षयोऽथ मनवः प्रजानां पतयस्तथा । सदाचारस्य वक्तारः कर्तारश्च महीपते

saptarṣayo'tha manavaḥ prajānāṁ patayastathā sadācārasya vaktāraḥ kartāraśca mahīpate

हे महीपते, सप्तर्षि, मनुगण, तथा प्रजापतिगण -- ये ही सदाचार के वक्ता और कर्ता दोनों हैं।

श्लोक 5 (vishnu.3.11.5)

ब्राह्मे मुहूर्त्ते चोत्थाय मनसा मतिमान्नृप । प्रबुद्धश्चिन्तयेद्धर्ममर्थं चाप्यविरोधिनम्

brāhme muhūrtte cotthāya manasā matimānnṛpa prabuddhaścintayeddharmamarthaṁ cāpyavirodhinam

हे राजन्, बुद्धिमान् मनुष्य ब्राह्म मुहूर्त में उठकर, जागते ही मन से धर्म का, तथा उससे अविरोधी अर्थ का भी चिन्तन करे।

श्लोक 6 (vishnu.3.11.6)

अपीडया तयोः काममुभयोरपि चिन्तयेत् । दृष्टादृष्टविनाशाय त्रिवर्गे समदर्शिता

apīḍayā tayoḥ kāmamubhayorapi cintayet dṛṣṭādṛṣṭavināśāya trivarge samadarśitā

इन दोनों को पीड़ा पहुँचाए बिना काम का भी चिन्तन करे; दृष्ट और अदृष्ट [दोनों प्रकार के] विनाश से बचने के लिए त्रिवर्ग में समदृष्टि रखे।

श्लोक 7 (vishnu.3.11.7)

परित्यजेदर्थकामौ धर्मपीडाकरौ नृप । धर्ममप्यसुखोदर्कं लोकविद्वेष्टमेव च

parityajedarthakāmau dharmapīḍākarau nṛpa dharmamapyasukhodarkaṁ lokavidveṣṭameva ca

हे राजन्, धर्म को पीड़ा पहुँचाने वाले अर्थ और काम को त्याग दे; तथा जो धर्म भी दुःखद परिणाम वाला हो और लोक-निन्दित हो, उसे भी त्याग दे।

श्लोक 8 (vishnu.3.11.8)

ततः कल्यं समुत्थाय कुर्यान्मैत्रं नरेश्वर

tataḥ kalyaṁ samutthāya kuryānmaitraṁ nareśvara

फिर प्रातःकाल सवेरे उठकर, हे नरेश्वर, मित्रों से मिले [अथवा मंगल-चिन्तन करे]।

श्लोक 9 (vishnu.3.11.9)

नैरृत्यामिषुविक्षेपमतीत्याभ्यधिकं भुवः । दूरादावसथान्मूत्रं पुरीषं च विसर्जयेत्

nairṛtyāmiṣuvikṣepamatītyābhyadhikaṁ bhuvaḥ dūrādāvasathānmūtraṁ purīṣaṁ ca visarjayet

अपने घर से इतनी दूर नैऋत्य दिशा में, जितनी दूर बाण फेंका जा सके, उससे भी अधिक दूर जाकर मल-मूत्र का त्याग करे।

श्लोक 10 (vishnu.3.11.10)

पादावनेजनोच्छिष्टे प्रक्षिपेन्न गृहाङ्गणे

pādāvanejanocchiṣṭe prakṣipenna gṛhāṅgaṇe

अपने पैर धोने के जल या जूठन को घर के आँगन में न फेंके।

श्लोक 11 (vishnu.3.11.11)

आत्मच्छायां तरुच्छायां गोसूर्याग्न्यनिलांस्तथा । गुरुद्विजादींस्तु बुधो नाधिमेहेत् कदाचन

ātmacchāyāṁ tarucchāyāṁ gosūryāgnyanilāṁstathā gurudvijādīṁstu budho nādhimehet kadācana

अपनी ही छाया, वृक्ष की छाया, गौ, सूर्य, अग्नि और वायु पर, तथा गुरु और द्विजों की ओर भी, बुद्धिमान् व्यक्ति कभी मूत्र-त्याग न करे।

श्लोक 12 (vishnu.3.11.12)

न कृष्टे सस्यमध्ये वा गोव्रजे जनसंसदि । न वर्त्मनि न नद्यादितीर्थेषु पुरुषर्षभ

na kṛṣṭe sasyamadhye vā govraje janasaṁsadi na vartmani na nadyāditīrtheṣu puruṣarṣabha

हे पुरुषर्षभ, जोते हुए खेत में, फसल के बीच, गोशाला में, जन-समूह में, मार्ग में, या नदी आदि तीर्थों में भी [मल-मूत्र-त्याग] न करे।

श्लोक 13 (vishnu.3.11.13)

नाप्सु नैवाम्भसस्तीरे श्मशाने न समाचरेत् । उत्सर्गं वै पुरीषस्य मूत्रस्य च विसर्जनम्

nāpsu naivāmbhasastīre śmaśāne na samācaret utsargaṁ vai purīṣasya mūtrasya ca visarjanam

जल में, जल के किनारे, या श्मशान में भी मल-त्याग और मूत्र-विसर्जन कभी न करे।

श्लोक 14 (vishnu.3.11.14)

उदङ्मुखो दिवा मूत्रं विपरीतमुखो निशि । कुर्वीतानापदि प्राज्ञो मूत्रोत्सर्गं च पार्थिव

udaṅmukho divā mūtraṁ viparītamukho niśi kurvītānāpadi prājño mūtrotsargaṁ ca pārthiva

हे पार्थिव, दिन में उत्तर की ओर मुख करके और रात्रि में उससे विपरीत मुख करके, बुद्धिमान् पुरुष आपत्काल के अतिरिक्त मूत्र-त्याग करे।

श्लोक 15 (vishnu.3.11.15)

तृणैरास्तीर्य वसुधां वस्त्रप्रावृतमस्तकः । तिष्ठेन्नातिचिरं तत्र नैव किंचिदुदीरयेत्

tṛṇairāstīrya vasudhāṁ vastraprāvṛtamastakaḥ tiṣṭhennāticiraṁ tatra naiva kiṁcidudīrayet

भूमि पर तिनके बिछाकर, वस्त्र से सिर ढककर, वहाँ अधिक देर तक न रुके, और कुछ भी न बोले।

श्लोक 16 (vishnu.3.11.16)

वल्मीकमूषिकोद्भूतां मृदं नान्तर्जलां तथा । शौचावशिष्टां गेहाच्च नादद्याल्लेपसम्भवाम्

valmīkamūṣikodbhūtāṁ mṛdaṁ nāntarjalāṁ tathā śaucāvaśiṣṭāṁ gehācca nādadyāllepasambhavām

दीमक के बिल से या चूहे के बिल से निकली मिट्टी, जल के भीतर की मिट्टी, तथा शौच-कर्म से बची हुई या घर के लेप-कार्य से प्राप्त मिट्टी -- [इन्हें शुद्धि-कार्य में] न ग्रहण करे।

श्लोक 17 (vishnu.3.11.17)

अणुप्राण्युपपन्नां च हलोत्खातां च पार्थिव । परित्यजेन्मृदो ह्येतास्सकलाश्शौचकर्मणि

aṇuprāṇyupapannāṁ ca halotkhātāṁ ca pārthiva parityajenmṛdo hyetāssakalāśśaucakarmaṇi

हे पार्थिव, सूक्ष्म जीवों से युक्त मिट्टी और हल से जोती गई मिट्टी को भी शौच-कर्म में सर्वथा त्याग दे।

श्लोक 18 (vishnu.3.11.18)

एका लिंगे गुदे तिस्रो दश वामकरे नृप । हस्तद्वये च सप्त स्युर्मृदश्शौचोपपादिकाः

ekā liṁge gude tisro daśa vāmakare nṛpa hastadvaye ca sapta syurmṛdaśśaucopapādikāḥ

हे राजन्, लिंग के लिए एक [मिट्टी की मात्रा], गुदा के लिए तीन, बाएँ हाथ के लिए दस, और दोनों हाथों के लिए सात -- ये मिट्टी शौच-कर्म में सहायक होती हैं।

श्लोक 19 (vishnu.3.11.19)

अच्छेनागन्धलेपेन जलेनाबुद्बुदेन च । आचामेच्च मृदं भूयस्तथा दद्यात् समाहितः

acchenāgandhalepena jalenābudbudena ca ācāmecca mṛdaṁ bhūyastathā dadyāt samāhitaḥ

स्वच्छ, गन्ध-रहित तथा झाग-रहित जल से, फिर से मिट्टी लेकर आचमन करे, और इसी प्रकार एकाग्रचित्त होकर [शेष क्रिया भी] सम्पन्न करे।

श्लोक 20 (vishnu.3.11.20)

निष्पादिताङ्घ्रिशौचस्तु पादावभ्युक्ष्य वै पुनः । त्रिः पिबेत्सलिलं तेन तथा द्विः परिमार्जयेत्

niṣpāditāṅghriśaucastu pādāvabhyukṣya vai punaḥ triḥ pibetsalilaṁ tena tathā dviḥ parimārjayet

पैरों की शुद्धि सम्पन्न कर लेने पर, फिर से पैरों को धोकर, उसी जल से तीन बार जल पिए, और उसी प्रकार दो बार मुख का प्रमार्जन करे।

श्लोक 21 (vishnu.3.11.21)

शीर्षण्यानि ततः खानि मूर्द्धानं च समालभेत् । बाहू नाभिं च तोयेन हृदयं चापि संस्पृशेत्

śīrṣaṇyāni tataḥ khāni mūrddhānaṁ ca samālabhet bāhū nābhiṁ ca toyena hṛdayaṁ cāpi saṁspṛśet

फिर सिर के इन्द्रियों के छिद्रों को तथा सिर को स्पर्श करे; जल से बाहुओं और नाभि को, तथा हृदय को भी स्पर्श करे।

श्लोक 22 (vishnu.3.11.22)

आचांतस्तु ततः कुर्यात् पुमान् केशप्रसाधनम् । आदर्शाञ्जनमाङ्गल्यं दूर्वाद्यालम्भनानि च

ācāṁtastu tataḥ kuryāt pumān keśaprasādhanam ādarśāñjanamāṅgalyaṁ dūrvādyālambhanāni ca

भलीभाँति आचमन करने के बाद पुरुष केश-संवारना करे, तथा दर्पण देखना, अंजन लगाना, मंगल-कार्य, और दूर्वा आदि का स्पर्श करे।

श्लोक 23 (vishnu.3.11.23)

ततस्स्ववर्णधर्मेण वृत्त्यर्थं च धनार्जनम् । कुर्वीत श्रद्धासंपन्नो यजेच्च पृथिवीपते

tatassvavarṇadharmeṇa vṛttyarthaṁ ca dhanārjanam kurvīta śraddhāsaṁpanno yajecca pṛthivīpate

फिर हे पृथ्वीपते, अपने वर्ण के अनुसार धर्मपूर्वक, आजीविका के लिए धन अर्जित करे, श्रद्धासम्पन्न होकर यज्ञ भी करे।

श्लोक 24 (vishnu.3.11.24)

सोमसंस्था हविस्संस्थाः पाकसंस्थास्तु संस्थिताः । धने यतो मनुष्याणां यतेतातो धनार्जने

somasaṁsthā havissaṁsthāḥ pākasaṁsthāstu saṁsthitāḥ dhane yato manuṣyāṇāṁ yatetāto dhanārjane

सोम-संस्थाएँ, हविः-संस्थाएँ, और पाक-संस्थाएँ -- ये सब धन पर ही निर्भर हैं; इसलिए मनुष्य को धनार्जन में प्रयत्नशील रहना चाहिए।

श्लोक 25 (vishnu.3.11.25)

नदीनदतटाकेषु देवखातजलेषु च । नित्यक्रियार्थं स्नायीत गिरिप्रस्रवणेषु च

nadīnadataṭākeṣu devakhātajaleṣu ca nityakriyārthaṁ snāyīta giriprasravaṇeṣu ca

नित्य-कर्म के लिए नदी, नद, तालाब, देव-निर्मित जलाशयों, तथा पर्वत के झरनों में स्नान करे।

श्लोक 26 (vishnu.3.11.26)

कूपेषूद्धृततोयेन स्नानं कुर्वीत वा भुवि । गृहेषूद्धृततोयेन ह्यथवा भुव्यसम्भवे

kūpeṣūddhṛtatoyena snānaṁ kurvīta vā bhuvi gṛheṣūddhṛtatoyena hyathavā bhuvyasambhave

कुओं से निकाले हुए जल से भूमि पर भी स्नान कर सकता है; अथवा जहाँ [प्राकृतिक जल] उपलब्ध न हो, वहाँ घरों में निकाले हुए जल से भी स्नान करे।

श्लोक 27 (vishnu.3.11.27)

शुचिवस्त्रधरः स्नातो देवर्षिपितृतर्पणम् । तेषामेव हि तीर्थेन कुर्वीत सुसमाहितः

śucivastradharaḥ snāto devarṣipitṛtarpaṇam teṣāmeva hi tīrthena kurvīta susamāhitaḥ

स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण किए हुए वह देव, ऋषि और पितरों का तर्पण, उन्हीं के तीर्थ (हाथ के विभाग) से, पूर्ण एकाग्रता के साथ करे।

श्लोक 28 (vishnu.3.11.28)

त्रिरपः प्रीणनार्थाय देवानामपवर्जयेत् । ऋषीणां च यथान्यायं सकृच्चापि प्रजापतेः

trirapaḥ prīṇanārthāya devānāmapavarjayet ṛṣīṇāṁ ca yathānyāyaṁ sakṛccāpi prajāpateḥ

देवताओं की तृप्ति के लिए तीन बार जल अर्पित करे, तथा ऋषियों के लिए भी विधिपूर्वक, और प्रजापति के लिए एक बार।

श्लोक 29 (vishnu.3.11.29)

पितॄणां प्रीणनार्थाय त्रिरपः पृथिवीपते । पितामहेभ्यश्च तथा प्रीणयेत्प्रपितामहान्

pitṝṇāṁ prīṇanārthāya trirapaḥ pṛthivīpate pitāmahebhyaśca tathā prīṇayetprapitāmahān

हे पृथ्वीपते, पितरों की तृप्ति के लिए तीन बार जल [अर्पित करे], तथा इसी प्रकार पितामहों और प्रपितामहों को भी तृप्त करे।

श्लोक 30 (vishnu.3.11.30)

मातामहाय तत्पित्रे तत्पित्रे च समाहितः । दद्यात्पैत्रेण तीर्थेन काम्यं चान्यच्छृणुष्व मे

mātāmahāya tatpitre tatpitre ca samāhitaḥ dadyātpaitreṇa tīrthena kāmyaṁ cānyacchṛṇuṣva me

मातामह को, उनके पिता को, और उनके भी पिता को, एकाग्रचित्त होकर पितृ-तीर्थ से जल अर्पित करे; अब अन्य काम्य (ऐच्छिक) तर्पण भी मुझसे सुनो।

श्लोक 31 (vishnu.3.11.31)

मात्रे प्रमात्रे तन्मात्रे गुरुपत्न्यै तथा नृप । गुरूणां मातुलानां च स्निग्धमित्राय भूभुजे

mātre pramātre tanmātre gurupatnyai tathā nṛpa gurūṇāṁ mātulānāṁ ca snigdhamitrāya bhūbhuje

हे राजन्, माता, दादी, परदादी को, गुरु-पत्नी को, गुरुओं को, मामाओं को, और स्नेही मित्र को भी [जल अर्पित करे]।

श्लोक 32 (vishnu.3.11.32)

इदं चापि जपेदम्बु दद्यादात्मेच्छया नृप । उपकाराय भूतानां कृतदेवादितर्पणम्

idaṁ cāpi japedambu dadyādātmecchayā nṛpa upakārāya bhūtānāṁ kṛtadevāditarpaṇam

हे राजन्, यह भी जप करते हुए स्वेच्छा से जल अर्पित करे, जब देवादि का तर्पण कर चुका हो, प्राणियों के उपकार के लिए।

श्लोक 33 (vishnu.3.11.33)

देवासुरास्तथा यक्षा नागगन्धर्वराक्षसाः । पिशाचा गुह्यकास्सिद्धाः कूष्माण्डाः पशवः खगाः

devāsurāstathā yakṣā nāgagandharvarākṣasāḥ piśācā guhyakāssiddhāḥ kūṣmāṇḍāḥ paśavaḥ khagāḥ

देव, असुर, यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध, कूष्माण्ड, पशु, पक्षी,

श्लोक 34 (vishnu.3.11.34)

जलेचरा भूनिलया वाय्वाहाराश्च जन्तवः । तृप्तिमेतेन यान्त्याशु मद्दत्तेनाम्बुनाऽखिलाः

jalecarā bhūnilayā vāyvāhārāśca jantavaḥ tṛptimetena yāntyāśu maddattenāmbunā'khilāḥ

जल में विचरने वाले, पृथ्वी पर रहने वाले, तथा वायु का आहार करने वाले जीव -- ये सब मेरे द्वारा दिए गए इस जल से शीघ्र ही तृप्ति को प्राप्त हों।

श्लोक 35 (vishnu.3.11.35)

नरकेषु समस्तेषु यातनासु च संस्थिताः । तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मया

narakeṣu samasteṣu yātanāsu ca saṁsthitāḥ teṣāmāpyāyanāyaitaddīyate salilaṁ mayā

जो समस्त नरकों में और यातनाओं में स्थित हैं, उनकी तृप्ति के लिए यह जल मेरे द्वारा दिया जाता है।

श्लोक 36 (vishnu.3.11.36)

ये बान्धवा बान्धवा ये येऽन्यजन्मनि बान्धवाः । ते तृप्तिमखिला यान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिणः

ye bāndhavā bāndhavā ye ye'nyajanmani bāndhavāḥ te tṛptimakhilā yāntu ye cāsmattoyakāṅkṣiṇaḥ

जो भी बन्धु हैं, जो अबन्धु हैं, तथा जो अन्य जन्मों में बन्धु रहे हैं, वे सब पूर्ण तृप्ति को प्राप्त हों -- और जो भी मुझसे जल की कामना रखते हैं।

श्लोक 37 (vishnu.3.11.37)

यत्र क्वचनसंस्थानां क्षुत्तृष्णोपहतात्मनाम् । इदमाप्यायनायास्तु मया दत्तं तिलोदकम्

yatra kvacanasaṁsthānāṁ kṣuttṛṣṇopahatātmanām idamāpyāyanāyāstu mayā dattaṁ tilodakam

जो कहीं भी स्थित हैं, भूख-प्यास से पीड़ित आत्मा वाले -- उनकी तृप्ति के लिए यह तिल-मिश्रित जल मेरे द्वारा दिया गया है।

श्लोक 38 (vishnu.3.11.38)

काम्योदकप्रदानं ते मयैतत्कथितं नृप । यद्दत्त्वा प्रीणयत्येतन्मनुष्यस्सकलं जगत् । जगदाप्यायनोद्भूतं पुण्यमाप्नोति चानघ

kāmyodakapradānaṁ te mayaitatkathitaṁ nṛpa yaddattvā prīṇayatyetanmanuṣyassakalaṁ jagat jagadāpyāyanodbhūtaṁ puṇyamāpnoti cānagha

हे राजन्, यह मैंने तुम्हें इच्छानुसार जल-दान बताया, जिसे देकर मनुष्य इस सम्पूर्ण जगत् को प्रसन्न करता है; और हे निष्पाप, जगत् की तृप्ति से उत्पन्न पुण्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 39 (vishnu.3.11.39)

दत्त्वा काम्योदकं सम्यगेतेभ्यः श्राद्धयान्वितः । आचम्य च ततो दद्यात्सूर्याय सलिलांजलिम्

dattvā kāmyodakaṁ samyagetebhyaḥ śrāddhayānvitaḥ ācamya ca tato dadyātsūryāya salilāṁjalim

इन [सबको] भलीभाँति काम्य-जल श्रद्धापूर्वक देकर, फिर आचमन करके सूर्य को जल की अंजलि अर्पित करे।

श्लोक 40 (vishnu.3.11.40)

नमो विवस्वते ब्रह्मभास्वते विष्णुतेजसे । जगत्सवित्रे शुचये सवित्रे कर्मसाक्षिणे

namo vivasvate brahmabhāsvate viṣṇutejase jagatsavitre śucaye savitre karmasākṣiṇe

'विवस्वान् को, ब्रह्म-तेज से देदीप्यमान को, विष्णु-तेज को, जगत् के प्रसविता को, पवित्र सविता को, कर्मों के साक्षी को नमस्कार है।'

श्लोक 41 (vishnu.3.11.41)

ततो गृहाऽर्चनं कुर्यादभीष्टसुरपूजनम् । जलाभिषेकैः पुष्पैश्च धूपाद्यैश्च निवेदनम्

tato gṛhā'rcanaṁ kuryādabhīṣṭasurapūjanam jalābhiṣekaiḥ puṣpaiśca dhūpādyaiśca nivedanam

फिर घर में अपने इष्ट देवता की पूजा करे, जल के अभिषेक, पुष्प तथा धूप आदि से निवेदन करे।

श्लोक 42 (vishnu.3.11.42)

अपूर्वमग्निहोत्रं च कुर्यात्प्राग्ब्रह्मणे नृप

apūrvamagnihotraṁ ca kuryātprāgbrahmaṇe nṛpa

फिर उसके बाद ब्रह्मा को उद्देश्य कर पहले अपूर्व अग्निहोत्र करे।

श्लोक 43 (vishnu.3.11.43)

प्रजापतिं समुद्दिश्य दद्यादाहुतिमादरात् । गृहेभ्यः काश्यपायाथ ततोनुमतये क्रमात्

prajāpatiṁ samuddiśya dadyādāhutimādarāt gṛhebhyaḥ kāśyapāyātha tatonumataye kramāt

प्रजापति को उद्देश्य कर आदरपूर्वक आहुति दे, फिर गृह-देवताओं को, फिर काश्यप को, फिर क्रमशः अनुमति (अनुज्ञा) के देवता को।

श्लोक 44 (vishnu.3.11.44)

तच्छेषं मणिके पृथ्वीपर्जन्येभ्यः क्षिपेत्ततः । द्वारे धातुर्विधातुश्च मध्ये च ब्रह्मणे क्षिपेत्

taccheṣaṁ maṇike pṛthvīparjanyebhyaḥ kṣipettataḥ dvāre dhāturvidhātuśca madhye ca brahmaṇe kṣipet

उसका शेष भाग एक पात्र में लेकर पृथ्वी और पर्जन्य को अर्पित करे; द्वार पर धाता और विधाता को, तथा मध्य में ब्रह्मा को अर्पित करे।

श्लोक 45 (vishnu.3.11.45)

गृहस्य पुरषव्याघ्र दिग्देवानपि मे शृणु

gṛhasya puraṣavyāghra digdevānapi me śṛṇu

हे पुरुषव्याघ्र, अब घर के दिक्पाल देवताओं को भी मुझसे सुनो।

श्लोक 46 (vishnu.3.11.46)

इंद्राय धर्मराजाय वरुणाय तथेंदवे । प्राच्यादिषु बुधो दद्याद्धुतशेषात्मकं बलिम्

iṁdrāya dharmarājāya varuṇāya tatheṁdave prācyādiṣu budho dadyāddhutaśeṣātmakaṁ balim

इन्द्र को, धर्मराज को, वरुण को, तथा चन्द्रमा को -- पूर्व आदि दिशाओं में बुद्धिमान् व्यक्ति हवन के शेष भाग से युक्त बलि अर्पित करे।

श्लोक 47 (vishnu.3.11.47)

प्रागुत्तरे च दिग्भागे धन्वंतारिबलिं बुधः । निर्वपैद्वैश्वदेवं च कर्म कुर्य्यादतः परम्

prāguttare ca digbhāge dhanvaṁtāribaliṁ budhaḥ nirvapaidvaiśvadevaṁ ca karma kuryyādataḥ param

पूर्वोत्तर (ईशान) दिशा-भाग में बुद्धिमान् व्यक्ति धन्वन्तरि को बलि अर्पित करे, फिर वैश्वदेव-कर्म सम्पन्न करे।

श्लोक 48 (vishnu.3.11.48)

वायव्यां वायवे दिक्षु समस्तासु यथादिशम् । ब्रह्मणे चांतरिक्षाय भानवे च क्षिपेद्बलिम्

vāyavyāṁ vāyave dikṣu samastāsu yathādiśam brahmaṇe cāṁtarikṣāya bhānave ca kṣipedbalim

वायव्य दिशा में वायु को, तथा शेष समस्त दिशाओं में यथोचित रूप से; अन्तरिक्ष के ब्रह्मा को और सूर्य को भी बलि अर्पित करे।

श्लोक 49 (vishnu.3.11.49)

विश्वेदेवान्विश्वभूतानष्टौ विश्वपतीन्पितॄन् । यक्षाणां च समुद्दिश्य बलिं दद्यान्नरेश्वर

viśvedevānviśvabhūtānaṣṭau viśvapatīnpitṝn yakṣāṇāṁ ca samuddiśya baliṁ dadyānnareśvara

हे नरेश्वर, विश्वेदेवों को, विश्वभूतों को, आठ विश्वपतियों को, पितरों को, तथा यक्षों को उद्देश्य कर बलि अर्पित करे।

श्लोक 50 (vishnu.3.11.50)

ततोन्यदन्नमादाय भूमि भागे शुचौ बुधः । दद्यादशेषभूतेभ्यस्स्वेच्छया सुसमाहितः

tatonyadannamādāya bhūmi bhāge śucau budhaḥ dadyādaśeṣabhūtebhyassvecchayā susamāhitaḥ

फिर उसके बाद बुद्धिमान् व्यक्ति अन्य अन्न लेकर, भूमि के शुद्ध स्थान पर, समस्त प्राणियों को अपनी इच्छा से, पूर्ण एकाग्रता के साथ अर्पित करे।

श्लोक 51 (vishnu.3.11.51)

देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धास्सयक्षोरगदैत्यसङ्घाः । प्रेताः पिशाचास्तरवस्समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मयात्र दत्तम्

devā manuṣyāḥ paśavo vayāṁsi siddhāssayakṣoragadaityasaṅghāḥ pretāḥ piśācāstaravassamastā ye cānnamicchanti mayātra dattam

'देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, सिद्ध, यक्ष-नाग-दैत्य-गणों सहित, प्रेत, पिशाच, और वृक्ष -- जितने भी मेरे द्वारा दिए गए इस अन्न की कामना रखते हैं,

श्लोक 52 (vishnu.3.11.52)

पिपीलिकाः कीटपतंङ्गकाद्या बुभुक्षिताः कर्मनिबंधबद्धाः । प्रयांति ते तृप्तिमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवंतु

pipīlikāḥ kīṭapataṁṅgakādyā bubhukṣitāḥ karmanibaṁdhabaddhāḥ prayāṁti te tṛptimidaṁ mayānnaṁ tebhyo visṛṣṭaṁ sukhino bhavaṁtu

चींटियाँ, कीड़े-पतंगे आदि, भूखे और कर्म-बन्धन में बँधे हुए -- वे इस मेरे द्वारा दिए गए अन्न से तृप्ति को प्राप्त हों; उन्हें अर्पित यह अन्न उन्हें सुखी करे।'

श्लोक 53 (vishnu.3.11.53)

येषां न माता न पिता न बन्धुर्नैवान्नसिद्धिर्न तथान्नमस्ति । तत्तृप्तयेऽन्नं भुवि दत्तमेव ते यान्तु तृप्तिं मुदिता भवन्तु

yeṣāṁ na mātā na pitā na bandhurnaivānnasiddhirna tathānnamasti tattṛptaye'nnaṁ bhuvi dattameva te yāntu tṛptiṁ muditā bhavantu

'जिनकी न माता है, न पिता, न बन्धु, और न ही जिन्हें अन्न-सिद्धि प्राप्त है और न अन्न ही है -- उनकी तृप्ति के लिए यह अन्न पृथ्वी पर दिया गया है; वे तृप्ति को प्राप्त हों और आनन्दित हों।'

श्लोक 54 (vishnu.3.11.54)

भूतानि सर्वाणि तथान्नमेतदहं च विष्णुर्न यतोऽन्यदस्ति । तस्मादहं भूतनिकायभूतमन्नं प्रयच्छामि भवाय तेषाम्

bhūtāni sarvāṇi tathānnametadahaṁ ca viṣṇurna yato'nyadasti tasmādahaṁ bhūtanikāyabhūtamannaṁ prayacchāmi bhavāya teṣām

'समस्त प्राणी, तथा यह अन्न, और मैं भी -- सब विष्णु ही हैं, क्योंकि उनसे भिन्न कुछ भी नहीं है; इसलिए मैं समस्त प्राणि-समूहस्वरूप इस अन्न को उनके कल्याण के लिए अर्पित करता हूँ।'

श्लोक 55 (vishnu.3.11.55)

चतुर्दशो भूतगणो य एषः तत्र स्थिता येऽखिलभूतसङ्घाः । तृप्त्यर्थमन्नं हि मया निसृष्टं तेषामिदं ते मुदिता भवन्तु

caturdaśo bhūtagaṇo ya eṣaḥ tatra sthitā ye'khilabhūtasaṅghāḥ tṛptyarthamannaṁ hi mayā nisṛṣṭaṁ teṣāmidaṁ te muditā bhavantu

'जो यह चौदहवाँ भूत-गण है, तथा जो भी समस्त भूत-समुदाय वहाँ स्थित हैं -- उनकी तृप्ति के लिए ही यह अन्न मेरे द्वारा अर्पित किया गया है; वे इससे आनन्दित हों।'

श्लोक 56 (vishnu.3.11.56)

इत्युच्चार्य नरो दद्यादन्नं श्रद्धासमन्वितः । भुवि सर्वोपकाराय गृही सर्वाश्रयो यतः

ityuccārya naro dadyādannaṁ śraddhāsamanvitaḥ bhuvi sarvopakārāya gṛhī sarvāśrayo yataḥ

ऐसा उच्चारण करके मनुष्य श्रद्धापूर्वक अन्न अर्पित करे, पृथ्वी पर सबके उपकार के लिए, क्योंकि गृहस्थ ही सबका आश्रय है।

श्लोक 57 (vishnu.3.11.57)

श्वचण्डालविहङ्गानां भुवि दद्यान्नरेश्वर । ये चान्ये पतिताः केचिदपुत्राः सन्ति मानवाः

śvacaṇḍālavihaṅgānāṁ bhuvi dadyānnareśvara ye cānye patitāḥ kecidaputrāḥ santi mānavāḥ

हे नरेश्वर, कुत्तों, चाण्डालों और पक्षियों के लिए भी भूमि पर [अन्न] अर्पित करे, तथा जो अन्य पतित एवं सन्तान-रहित मनुष्य हों, उनके लिए भी।

श्लोक 58 (vishnu.3.11.58)

ततो गोदोहमात्रं वै कालं तिष्ठेद्गृहाङ्गणे । अतिथिग्रहणार्थाय तदूर्ध्वं तु यथेच्छया

tato godohamātraṁ vai kālaṁ tiṣṭhedgṛhāṅgaṇe atithigrahaṇārthāya tadūrdhvaṁ tu yathecchayā

फिर गाय दुहने जितने समय तक ही घर के आँगन में अतिथि की प्रतीक्षा में ठहरे; उससे अधिक समय तो इच्छानुसार ठहर सकता है।

श्लोक 59 (vishnu.3.11.59)

अतिथिं तत्र सम्प्राप्तं पूजयेत् स्वागतादिना । तथासनप्रदानेन पादप्रक्षालनेन च

atithiṁ tatra samprāptaṁ pūjayet svāgatādinā tathāsanapradānena pādaprakṣālanena ca

वहाँ आए हुए अतिथि का स्वागत आदि से सत्कार करे, तथा आसन देने और पैर धुलाने से भी।

श्लोक 60 (vishnu.3.11.60)

श्रद्धया चान्नदानेन प्रियप्रश्नोत्तरेण च । गच्छतश्चानुयानेन प्रीतिमुत्पादयेद्गृही

śraddhayā cānnadānena priyapraśnottareṇa ca gacchataścānuyānena prītimutpādayedgṛhī

श्रद्धापूर्वक अन्न-दान से, प्रिय प्रश्नों के उत्तर से, तथा जाते समय उसके पीछे-पीछे चलकर भी, गृहस्थ [अतिथि में] प्रीति उत्पन्न करे।

श्लोक 61 (vishnu.3.11.61)

अज्ञातकुलनामानमन्यदेशादुपागतम् । पूजयेदतिथिं सम्यङ्नैकग्रामनिवासिनम्

ajñātakulanāmānamanyadeśādupāgatam pūjayedatithiṁ samyaṅnaikagrāmanivāsinam

जिसका कुल और नाम अज्ञात हो, जो अन्य देश से आया हो -- ऐसे अतिथि का भलीभाँति सत्कार करे, न कि केवल एक ही ग्राम में रहने वाले का।

श्लोक 62 (vishnu.3.11.62)

अकिञ्चनमसम्बन्धमज्ञातकुलशालिनम् । असम्पूज्यातिथिं भुक्त्वा भोक्तुकामं व्रजत्यधः

akiñcanamasambandhamajñātakulaśālinam asampūjyātithiṁ bhuktvā bhoktukāmaṁ vrajatyadhaḥ

जो निर्धन है, जिसका कोई सम्बन्ध नहीं है, जो अज्ञात कुल का है, अन्य देश से आया है -- ऐसे भोजनेच्छुक अतिथि का सत्कार किए बिना जो भोजन करता है, वह अधोगति को प्राप्त होता है।

श्लोक 63 (vishnu.3.11.63)

स्वाध्यायगोत्राचरणमपृष्ट्वा च तथा कुलम् । हिरण्यगर्भबुद्ध्या तं मन्येताभ्यागतं गृही

svādhyāyagotrācaraṇamapṛṣṭvā ca tathā kulam hiraṇyagarbhabuddhyā taṁ manyetābhyāgataṁ gṛhī

स्वाध्याय, गोत्र, आचार तथा कुल के बारे में बिना पूछे ही, गृहस्थ अभ्यागत को हिरण्यगर्भ (ब्रह्म) की बुद्धि से देखे।

श्लोक 64 (vishnu.3.11.64)

पित्रर्थं चापरं विप्रमेकमप्याशयेन्नृप । तद्देश्यं विदिताचारसम्भूतिं पाञ्चयज्ञिकम्

pitrarthaṁ cāparaṁ vipramekamapyāśayennṛpa taddeśyaṁ viditācārasambhūtiṁ pāñcayajñikam

हे राजन्, पितरों के निमित्त भी एक अन्य विप्र को, जो उसी देश का हो, सदाचार से युक्त हो, और पंचयज्ञ जानने वाला हो, आमंत्रित करे।

श्लोक 65 (vishnu.3.11.65)

अन्नाग्रं च समुद्धृत्य हन्तकारोपकल्पितम् । निर्वापभूतं भूपाल श्रोत्रियायोपपादयेत्

annāgraṁ ca samuddhṛtya hantakāropakalpitam nirvāpabhūtaṁ bhūpāla śrotriyāyopapādayet

हे भूपाल, अन्न का श्रेष्ठ भाग निकालकर, हवि के लिए तैयार किया हुआ, तथा निर्वाप-योग्य भाग वेदपाठी ब्राह्मण को दे।

श्लोक 66 (vishnu.3.11.66)

दद्याच्च भिक्षात्रितयं परिव्राड्ब्रह्मचारिणाम् । इच्छया च बुधो दद्याद्विभवे सत्यवारितम्

dadyācca bhikṣātritayaṁ parivrāḍbrahmacāriṇām icchayā ca budho dadyādvibhave satyavāritam

परिव्राजकों और ब्रह्मचारियों को भी तीन प्रकार की भिक्षा दे, तथा बुद्धिमान् व्यक्ति अपनी सम्पन्नता के अनुसार, इच्छानुसार, बिना रोक-टोक के भी दान दे।

श्लोक 67 (vishnu.3.11.67)

इत्येतेऽतिथयः प्रोक्ता प्रागुक्ता भिक्षवश्च ये । चतुरः पूजयित्वैतान्नृप पापात् प्रमुच्यते

ityete'tithayaḥ proktā prāguktā bhikṣavaśca ye caturaḥ pūjayitvaitānnṛpa pāpāt pramucyate

ये पूर्वोक्त अतिथि तथा भिक्षुक -- इन चारों की पूजा करके, हे राजन्, मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 68 (vishnu.3.11.68)

अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्त्तते । स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति

atithiryasya bhagnāśo gṛhāt pratinivarttate sa tasmai duṣkṛtaṁ dattvā puṇyamādāya gacchati

जिसके घर से आशा भंग होकर अतिथि दूसरी ओर मुख करके लौट जाता है, वह उसे अपना पाप देकर, उसका पुण्य लेकर चला जाता है।

श्लोक 69 (vishnu.3.11.69)

धाता प्रजापतिः शक्रो वह्निर्वसुगणोऽर्यमा । प्रविश्यातिथिमेते वै भुञ्जन्तेऽन्नं नरेश्वर

dhātā prajāpatiḥ śakro vahnirvasugaṇo'ryamā praviśyātithimete vai bhuñjante'nnaṁ nareśvara

हे नरेश्वर, धाता, प्रजापति, शक्र, अग्नि, वसुगण, और अर्यमा -- ये सब अतिथि में प्रवेश करके ही अन्न ग्रहण करते हैं।

श्लोक 70 (vishnu.3.11.70)

तस्मादतिथिपूजायां यतेत सततं नरः । स केवलमघं भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते ह्यतिथिं विना

tasmādatithipūjāyāṁ yateta satataṁ naraḥ sa kevalamaghaṁ bhuṅkte yo bhuṅkte hyatithiṁ vinā

इसलिए मनुष्य को सदा अतिथि-पूजा में प्रयत्नशील रहना चाहिए; जो अतिथि के बिना ही भोजन करता है, वह केवल पाप का ही भक्षण करता है।

श्लोक 71 (vishnu.3.11.71)

ततः सुवासिनीदुःखिगर्भिणीवृद्धबालकान् । भोजयेत् संस्कृतान्नेन प्रथमं चरमं गृही

tataḥ suvāsinīduḥkhigarbhiṇīvṛddhabālakān bhojayet saṁskṛtānnena prathamaṁ caramaṁ gṛhī

फिर गृहस्थ सुहागिनों, दुःखी स्त्रियों, गर्भवतियों, वृद्धों और बालकों को संस्कारयुक्त अन्न से पहले भोजन कराए, और स्वयं सबसे अन्त में भोजन करे।

श्लोक 72 (vishnu.3.11.72)

अभुक्तवत्सु चैतेषु भुञ्जन् भुङ्क्ते स दुष्कृतम् । मृतश्च गत्वा नरकं श्लेष्मभुग्जायते नरः

abhuktavatsu caiteṣu bhuñjan bhuṅkte sa duṣkṛtam mṛtaśca gatvā narakaṁ śleṣmabhugjāyate naraḥ

इनके भोजन किए बिना यदि कोई स्वयं भोजन करता है, तो वह घोर पाप का भक्षण करता है; मरने के बाद नरक में जाकर वह श्लेष्म-भक्षक मनुष्य बनता है।

श्लोक 73 (vishnu.3.11.73)

अस्नाताशी मलं भुङ्क्ते ह्यजपी पूयशोणितम् । असंस्कृतान्नभुङ्मूत्रं बालादिप्रथमं शकृत्

asnātāśī malaṁ bhuṅkte hyajapī pūyaśoṇitam asaṁskṛtānnabhuṅmūtraṁ bālādiprathamaṁ śakṛt

स्नान किए बिना भोजन करने वाला मल का भक्षण करता है, जप किए बिना [भोजन करने वाला] पीब और रक्त का; असंस्कृत अन्न खाने वाला मूत्र का, तथा सबसे पहले बालक आदि को दिए बिना खाने वाला विष्ठा का भक्षण करता है।

श्लोक 74 (vishnu.3.11.74)

अहोमी च कृमीन् भुङ्क्ते अदत्त्वा विषमश्नुते

ahomī ca kṛmīn bhuṅkte adattvā viṣamaśnute

होम किए बिना खाने वाला कृमियों का भक्षण करता है, और बिना [पहले] दिए खाने वाला विष का भक्षण करता है।

श्लोक 75 (vishnu.3.11.75)

तस्माच्छृणुष्व राजेन्द्र यथा भुञ्जीत वै गृही । भुञ्जतश्च यथा पुंसः पापबन्धो न जायते

tasmācchṛṇuṣva rājendra yathā bhuñjīta vai gṛhī bhuñjataśca yathā puṁsaḥ pāpabandho na jāyate

इसलिए हे राजेन्द्र, यह सुनो कि गृहस्थ किस प्रकार भोजन करे, जिससे भोजन करते हुए भी मनुष्य को पाप-बन्धन न हो।

श्लोक 76 (vishnu.3.11.76)

इह चारोग्यविपुलं बलबुद्धिस्तथा नृप । भवत्यरिष्टशान्तिश्च वैरिपक्षाभिचारिणः

iha cārogyavipulaṁ balabuddhistathā nṛpa bhavatyariṣṭaśāntiśca vairipakṣābhicāriṇaḥ

इससे इस लोक में अतुल आरोग्य, बल और बुद्धि की वृद्धि होती है; हे राजन्, अनिष्टों की शान्ति तथा शत्रु-पक्ष के अभिचार से भी रक्षा होती है।

श्लोक 77 (vishnu.3.11.77)

स्नातो यथावत् कृत्वा च देवर्षिपितृतर्पणम् । प्रशस्तरत्नपाणिस्तु भुञ्जीत प्रयतो गृही

snāto yathāvat kṛtvā ca devarṣipitṛtarpaṇam praśastaratnapāṇistu bhuñjīta prayato gṛhī

स्नान करके, विधिपूर्वक देव-ऋषि-पितृ-तर्पण सम्पन्न कर, प्रशस्त रत्न धारण किए हुए हाथ से, संयत गृहस्थ भोजन करे।

श्लोक 78 (vishnu.3.11.78)

कृते जपे हुते वह्नौ शुद्धवस्त्रधरो नृप । दत्त्वाऽतिथिभ्यो विप्रेभ्यो गुरुभ्यस्संश्रिताय च । पुण्यगन्धधरः शस्तमाल्यधारी नरेश्वर

kṛte jape hute vahnau śuddhavastradharo nṛpa dattvā'tithibhyo viprebhyo gurubhyassaṁśritāya ca puṇyagandhadharaḥ śastamālyadhārī nareśvara

जप और अग्नि में हवन कर चुकने पर, शुद्ध वस्त्र धारण किए हुए, अतिथियों, विप्रों, गुरुजनों तथा आश्रितों को [अन्न] देकर, हे नरेश्वर, पवित्र गन्ध धारण किए, प्रशस्त माला पहने हुए [भोजन करे]।

श्लोक 79 (vishnu.3.11.79)

नैकवस्त्रधरो नार्द्रपाणिपादो महीपते । विशुद्धवदनः प्रीतो भुञ्जीत न विदिङ्मुखः

naikavastradharo nārdrapāṇipādo mahīpate viśuddhavadanaḥ prīto bhuñjīta na vidiṅmukhaḥ

एक ही वस्त्र धारण किए हुए नहीं, न गीले हाथ-पैर वाला, हे महीपते; शुद्ध मुख वाला, प्रसन्न, दिशाओं की ओर मुख किए बिना भोजन करे।

श्लोक 80 (vishnu.3.11.80)

प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि न चैवान्यमना नरः । अन्नं प्रशस्तं पथ्यं च प्रोक्षितं प्रोक्षणोदकैः

prāṅmukhodaṅmukho vāpi na caivānyamanā naraḥ annaṁ praśastaṁ pathyaṁ ca prokṣitaṁ prokṣaṇodakaiḥ

पूर्व या उत्तर की ओर मुख किए हुए, मन को अन्यत्र न ले जाकर, मनुष्य प्रशस्त और हितकर अन्न को, जो शुद्धिकारक जल से सिंचित हो, [खाए]।

श्लोक 81 (vishnu.3.11.81)

न कुत्सिताहृतं नैव जुगुप्सापदसंस्कृतम् । दत्त्वा तु भक्तं शिष्येभ्यः क्षुधितेभ्यस्तथा गृही

na kutsitāhṛtaṁ naiva jugupsāpadasaṁskṛtam dattvā tu bhaktaṁ śiṣyebhyaḥ kṣudhitebhyastathā gṛhī

जो निन्दित ढंग से लाया गया हो या घृणित रूप से बिना संस्कार के हो, ऐसा अन्न न खाए; गृहस्थ भूखे शिष्यों को भी भाग देकर [स्वयं खाए]।

श्लोक 82 (vishnu.3.11.82)

प्रशस्तशुद्धपात्रे तु भुञ्जीताकुपितो द्विजः

praśastaśuddhapātre tu bhuñjītākupito dvijaḥ

प्रशस्त और शुद्ध पात्र में ही द्विज बिना क्रोध किए भोजन करे।

श्लोक 83 (vishnu.3.11.83)

नासन्दिसंस्थिते पात्रे नादेशे च नरेश्वर । नाकाले नातिसङ्कीर्णे दत्त्वाग्रं च नरोऽग्नये

nāsandisaṁsthite pātre nādeśe ca nareśvara nākāle nātisaṅkīrṇe dattvāgraṁ ca naro'gnaye

हे नरेश्वर, चौकी पर रखे पात्र में नहीं, न अनुपयुक्त स्थान पर, न अनुचित समय पर, न अत्यधिक भीड़भाड़ में; और अग्नि को [अन्न का] अग्रभाग अर्पित करके ही [खाए]।

श्लोक 84 (vishnu.3.11.84)

मन्त्राभिमन्त्रितं शस्तं न च पर्युषितं नृप । अन्यत्र फलमूलेभ्यः शुष्कशाखादिकात् तथा

mantrābhimantritaṁ śastaṁ na ca paryuṣitaṁ nṛpa anyatra phalamūlebhyaḥ śuṣkaśākhādikāt tathā

हे राजन्, मन्त्राभिमन्त्रित अन्न ही प्रशस्त है, बासी अन्न नहीं -- सिवाय फल-मूल के, तथा सूखी शाखा आदि से प्राप्त [पदार्थों] के,

श्लोक 85 (vishnu.3.11.85)

तद्वद्धारीतकेभ्यश्च गुडभक्ष्येभ्य एव च । भुञ्जीतोद्धृतसाराणि न कदापि नरेश्वर

tadvaddhārītakebhyaśca guḍabhakṣyebhya eva ca bhuñjītoddhṛtasārāṇi na kadāpi nareśvara

इसी प्रकार सूखे फलों (हरीतकी आदि) से, तथा गुड़ से बने खाद्य पदार्थों से भी; परन्तु हे नरेश्वर, इन [बासी पदार्थों में से] भी सार-भाग निकाल लिया गया हो, तो कभी न खाए।

श्लोक 86 (vishnu.3.11.86)

न शेषं पुरुषोऽश्नीयादन्यत्र जगतीपते । मध्वम्बुदधिसर्पिभ्यः सक्तुभ्यश्च विवेकवान्

na śeṣaṁ puruṣo'śnīyādanyatra jagatīpate madhvambudadhisarpibhyaḥ saktubhyaśca vivekavān

हे जगतीपते, मनुष्य को शेष (जूठा) अन्न नहीं खाना चाहिए, सिवाय मधु, जल, दही, घी और सत्तू के -- विवेकी पुरुष इनका सेवन कर सकता है।

श्लोक 87 (vishnu.3.11.87)

अश्नीयात् तन्मयो भूत्वा पूर्वं तु मधुरं रसम् । लवणाम्लौ तथा मध्ये कटुतिक्तादिकांस्ततः

aśnīyāt tanmayo bhūtvā pūrvaṁ tu madhuraṁ rasam lavaṇāmlau tathā madhye kaṭutiktādikāṁstataḥ

उस [रस] में तन्मय होकर पहले मधुर रस खाए, फिर मध्य में नमकीन और खट्टे रस, तत्पश्चात् कटु-तिक्त आदि रस खाए।

श्लोक 88 (vishnu.3.11.88)

प्राग्द्रवं पुरुषोऽश्नीयान्मध्ये कठिनभोजनः । अन्ते पुनर्द्रवाशी तु बलारोग्ये न मुञ्चति

prāgdravaṁ puruṣo'śnīyānmadhye kaṭhinabhojanaḥ ante punardravāśī tu balārogye na muñcati

मनुष्य पहले द्रव पदार्थ खाए, मध्य में कठोर भोजन, और अन्त में फिर द्रव पदार्थ का सेवन करे -- ऐसा करने वाला बल और आरोग्य से वंचित नहीं होता।

श्लोक 89 (vishnu.3.11.89)

अनिन्द्यं भक्षयेदित्थं वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् । पञ्चग्रासं महामौनं प्राणाद्याप्यायनं हि तत्

anindyaṁ bhakṣayeditthaṁ vāgyato'nnamakutsayan pañcagrāsaṁ mahāmaunaṁ prāṇādyāpyāyanaṁ hi tat

इस प्रकार वाणी को संयत रखते हुए, अन्न की निन्दा किए बिना, अनिन्द्य भोजन करे; पाँच ग्रास खाकर महामौन धारण करना ही प्राणों की तृप्ति का साधन है।

श्लोक 90 (vishnu.3.11.90)

भुक्त्वा सम्यगथाचम्य प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपि वा । यथावत् पुनराचामेत् पाणी प्रक्षाल्य मूलतः

bhuktvā samyagathācamya prāṅmukhodaṅmukho'pi vā yathāvat punarācāmet pāṇī prakṣālya mūlataḥ

भलीभाँति भोजन करके, पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके आचमन करे, फिर हाथों को मूल तक धोकर, विधिपूर्वक पुनः आचमन करे।

श्लोक 91 (vishnu.3.11.91)

स्वस्थः प्रशान्तचित्तस्तु कृतासनपरिग्रहः । अभीष्टदेवतानां तु कुर्वीत स्मरणं नरः

svasthaḥ praśāntacittastu kṛtāsanaparigrahaḥ abhīṣṭadevatānāṁ tu kurvīta smaraṇaṁ naraḥ

स्वस्थ और शान्तचित्त होकर, आसन ग्रहण किए हुए, मनुष्य अपने इष्ट देवताओं का स्मरण करे।

श्लोक 92 (vishnu.3.11.92)

अग्निराप्याययेद्धातुं पार्थिवं पवनेरितः । दत्तावकाशं नभसा जरयत्यस्तु मे सुखम्

agnirāpyāyayeddhātuṁ pārthivaṁ pavaneritaḥ dattāvakāśaṁ nabhasā jarayatyastu me sukham

'अग्नि पार्थिव तत्व को तृप्त करे, वायु द्वारा प्रेरित होकर; आकाश द्वारा अवकाश दिया गया वह [अन्न] पचे -- मुझे सुख प्राप्त हो।'

श्लोक 93 (vishnu.3.11.93)

अन्नं बलाय मे भूमेरपामग्न्यनिलस्य च । भवत्येतत्परीणतं ममास्त्यव्याहतं सुखम्

annaṁ balāya me bhūmerapāmagnyanilasya ca bhavatyetatparīṇataṁ mamāstyavyāhataṁ sukham

'यह अन्न मेरे लिए पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु के बल के लिए हो; यह भलीभाँति पचकर मेरे लिए अबाधित सुख उत्पन्न करे।'

श्लोक 94 (vishnu.3.11.94)

प्राणापानसमानानामुदानव्यानयोस्तथा । अन्नं पुष्टिकरं चास्तु ममाप्यव्याहतं सुखम्

prāṇāpānasamānānāmudānavyānayostathā annaṁ puṣṭikaraṁ cāstu mamāpyavyāhataṁ sukham

'प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान [इन पाँचों वायुओं] का यह अन्न पुष्टिकारक हो; मुझे भी अबाधित सुख प्राप्त हो।'

श्लोक 95 (vishnu.3.11.95)

अगस्तिरग्निर्वडवानलश्च भुक्तं मयान्नं जरयत्वशेषम् । सुखं च मे तत्परिणामसम्भवं यच्छन्त्वरोगं मम चास्तु देहे

agastiragnirvaḍavānalaśca bhuktaṁ mayānnaṁ jarayatvaśeṣam sukhaṁ ca me tatpariṇāmasambhavaṁ yacchantvarogaṁ mama cāstu dehe

'अगस्ति, अग्नि और वडवानल -- ये मेरे द्वारा खाए गए इस समस्त अन्न को पचा दें; इसके परिणाम से उत्पन्न सुख मुझे प्राप्त हो, और मेरे शरीर में आरोग्य हो।'

श्लोक 96 (vishnu.3.11.96)

विष्णुः समस्तेन्द्रियदेहदेही वृथा न भूतो भगवान् यथैकः । सत्येन तेनात्तमशेषमन्नमारोग्यतां मे परिणाममेतु

viṣṇuḥ samastendriyadehadehī vṛthā na bhūto bhagavān yathaikaḥ satyena tenāttamaśeṣamannamārogyatāṁ me pariṇāmametu

'विष्णु ही समस्त इन्द्रियों, देह और देही में व्याप्त हैं; भगवान् व्यर्थ ही अद्वितीय नहीं हुए -- उसी सत्य के बल से, मेरे द्वारा खाया गया यह समस्त अन्न परिणाम में मेरे लिए आरोग्यकारी हो।'

श्लोक 97 (vishnu.3.11.97)

विष्णुरत्ता तथैवान्नं परिणामश्च वै तथा । सत्येन तेन मद्भुक्तं जीर्यत्यन्नमिदं तथा

viṣṇurattā tathaivānnaṁ pariṇāmaśca vai tathā satyena tena madbhuktaṁ jīryatyannamidaṁ tathā

'विष्णु ही खाने वाले हैं, विष्णु ही अन्न हैं, और विष्णु ही उसका परिणाम भी हैं -- उसी सत्य के बल से, मेरे द्वारा खाया गया यह अन्न भलीभाँति पचे।'

श्लोक 98 (vishnu.3.11.98)

इत्युच्चार्य स्वहस्तेन परिमृज्य तथोदरम् । अनायासप्रदायीनि कुर्यात् कर्माण्यतन्द्रितः

ityuccārya svahastena parimṛjya tathodaram anāyāsapradāyīni kuryāt karmāṇyatandritaḥ

ऐसा उच्चारण करके, अपने हाथ से उदर का स्पर्श करते हुए, आलस्य-रहित होकर वह ऐसे कार्य करे जो [शरीर के लिए] सरल और सुखद हों।

श्लोक 99 (vishnu.3.11.99)

सच्छास्त्रादिविनोदेन सन्मार्गादविरोधिना । दिनं नयेत् ततस्सन्ध्यामुपतिष्ठेत् समाहितः

sacchāstrādivinodena sanmārgādavirodhinā dinaṁ nayet tatassandhyāmupatiṣṭhet samāhitaḥ

सत्शास्त्र आदि के मनोरंजन से, जो सन्मार्ग के विरुद्ध न हो, दिन बिताए, फिर एकाग्रचित्त होकर सन्ध्या-वन्दन में उपस्थित हो।

श्लोक 100 (vishnu.3.11.100)

दिनान्तसन्ध्यां सूर्येण पूर्वामृक्षैर्युतां बुधः । उपतिष्ठेद्यथान्याय्यं सम्यगाचम्य पार्थिव

dināntasandhyāṁ sūryeṇa pūrvāmṛkṣairyutāṁ budhaḥ upatiṣṭhedyathānyāyyaṁ samyagācamya pārthiva

हे पार्थिव, बुद्धिमान् व्यक्ति सूर्य के साथ, पूर्व-नक्षत्रों से युक्त दिन के अन्त की सन्ध्या की, भलीभाँति आचमन कर, यथोचित रीति से उपासना करे।

श्लोक 101 (vishnu.3.11.101)

सर्वकालमुपस्थानं सन्ध्ययोः पार्थिवेष्यते । अन्यत्र सूतकाशौचविभ्रमातुरभीतितः

sarvakālamupasthānaṁ sandhyayoḥ pārthiveṣyate anyatra sūtakāśaucavibhramāturabhītitaḥ

राजा के लिए सर्वदा दोनों सन्ध्याओं की उपासना अपेक्षित है, सिवाय जन्म-मृत्यु की अशुद्धि, भ्रम, रोग या भय के अवसरों के।

श्लोक 102 (vishnu.3.11.102)

सूर्येणाभ्युदितो यश्च त्यक्तः सूर्येण वा स्वपन् । अन्यत्रातुरभावात्तु प्रायश्चित्ती भवेन्नरः

sūryeṇābhyudito yaśca tyaktaḥ sūryeṇa vā svapan anyatrāturabhāvāttu prāyaścittī bhavennaraḥ

जो सूर्योदय के बाद तक सोता रह जाए, या जो सूर्यास्त के समय भी सोता रहे, वह -- रोगावस्था के अतिरिक्त -- प्रायश्चित्त का पात्र होता है।

श्लोक 103 (vishnu.3.11.103)

तस्मादनुदिते सूर्ये समुत्थाय महीपते । उपतिष्ठेन्नरस्सन्ध्यामस्वपंश्च दिनान्तजाम्

tasmādanudite sūrye samutthāya mahīpate upatiṣṭhennarassandhyāmasvapaṁśca dināntajām

इसलिए, हे महीपते, सूर्योदय से पहले ही उठकर, तथा सोए बिना ही, मनुष्य दिन के अन्त में होने वाली सन्ध्या की उपासना करे।

श्लोक 104 (vishnu.3.11.104)

उपतिष्ठन्ति वै सन्ध्यां ये न पूर्वां न पश्चिमाम् । व्रजन्ति ते दुरात्मानस्तमिस्रं नरकं नृप

upatiṣṭhanti vai sandhyāṁ ye na pūrvāṁ na paścimām vrajanti te durātmānastamisraṁ narakaṁ nṛpa

हे राजन्, जो न प्रातःकाल की और न सायंकाल की सन्ध्या की उपासना करते हैं, वे दुरात्मा तमिस्र नामक नरक में जाते हैं।

श्लोक 105 (vishnu.3.11.105)

पुनः पाकमुपादाय सायमप्यवनीपते । वैश्वदेवनिमित्तं वै पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत्

punaḥ pākamupādāya sāyamapyavanīpate vaiśvadevanimittaṁ vai patnyamantraṁ baliṁ haret

हे अवनीपते, पुनः पाक-कर्म से भोजन तैयार कर, सायंकाल भी वैश्वदेव के निमित्त पत्नी मन्त्ररहित बलि अर्पित करे।

श्लोक 106 (vishnu.3.11.106)

तत्रापि श्वपचादिभ्यस्तथैवान्नविसर्जनम्

tatrāpi śvapacādibhyastathaivānnavisarjanam

वहाँ भी श्वपच आदि के लिए इसी प्रकार अन्न का विसर्जन करे।

श्लोक 107 (vishnu.3.11.107)

अतिथिं चागतं तत्र स्वशक्तया पूजयेद्बुधः । पादशौचासनप्रह्वस्वागतोक्त्या च पूजनम् । ततश्चान्नप्रदानेन शयनेन च पार्थिव

atithiṁ cāgataṁ tatra svaśaktayā pūjayedbudhaḥ pādaśaucāsanaprahvasvāgatoktyā ca pūjanam tataścānnapradānena śayanena ca pārthiva

वहाँ आए हुए अतिथि का भी बुद्धिमान् व्यक्ति अपनी शक्ति के अनुसार सत्कार करे -- पैर धुलाकर, आसन देकर, झुककर स्वागत-वचन कहकर सत्कार करे, तथा हे पार्थिव, फिर अन्न-दान और शय्या देकर भी।

श्लोक 108 (vishnu.3.11.108)

दिवातिथौ तु विमुखे गते यत्पातकं नृप । तदेवाष्टगुणं पुंसस्सूर्योढे विमुखे गते

divātithau tu vimukhe gate yatpātakaṁ nṛpa tadevāṣṭaguṇaṁ puṁsassūryoḍhe vimukhe gate

हे राजन्, दिन के अतिथि को निराश लौटा देने पर जो पाप लगता है, सूर्यास्त के बाद आए अतिथि को निराश लौटाने पर वही पाप आठ गुना हो जाता है।

श्लोक 109 (vishnu.3.11.109)

तस्मात् स्वशक्त्या राजेन्द्र सूर्योढमतिथिं नरः । पूजयेत् पूजिते तस्मिन् पूजितास्सर्वदेवताः

tasmāt svaśaktyā rājendra sūryoḍhamatithiṁ naraḥ pūjayet pūjite tasmin pūjitāssarvadevatāḥ

इसलिए हे राजेन्द्र, मनुष्य को अपनी शक्ति के अनुसार सूर्यास्त के बाद आए अतिथि का भी सत्कार करना चाहिए; उसके सत्कार से समस्त देवता ही सत्कारित हो जाते हैं।

श्लोक 110 (vishnu.3.11.110)

अन्नशाकाम्बुदानेन स्वशक्त्या पूजयेत् पुमान् । शयनप्रस्तरमहीप्रदानैरथवापि तम्

annaśākāmbudānena svaśaktyā pūjayet pumān śayanaprastaramahīpradānairathavāpi tam

मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार अन्न, शाक और जल देकर उसका सत्कार करे, अथवा शय्या, आसन और भूमि प्रदान करके भी।

श्लोक 111 (vishnu.3.11.111)

कृतपादादिशौचस्तु भुक्त्वा सायं ततो गृही । गच्छेच्छय्यामस्फुटितामपि दारुमयीं नृप

kṛtapādādiśaucastu bhuktvā sāyaṁ tato gṛhī gacchecchayyāmasphuṭitāmapi dārumayīṁ nṛpa

हे राजन्, पैर आदि की शुद्धि कर, सायंकाल भोजन कर लेने पर, गृहस्थ फिर शय्या पर जाए, चाहे वह लकड़ी की बनी हुई ही क्यों न हो, यहाँ तक कि दरार वाली भी हो।

श्लोक 112 (vishnu.3.11.112)

नाविशालां न वै भुग्नां नासमां मलिनां न च । न च जन्तुमयीं शय्यामधितिष्ठेदनास्तृताम्

nāviśālāṁ na vai bhugnāṁ nāsamāṁ malināṁ na ca na ca jantumayīṁ śayyāmadhitiṣṭhedanāstṛtām

न अत्यधिक चौड़ी, न झुकी हुई, न असमतल, न मैली शय्या पर सोए; और न जीव-जन्तुओं से युक्त शय्या पर, बिना बिछौने के भी न सोए।

श्लोक 113 (vishnu.3.11.113)

प्राच्यां दिशि शिरश्शस्तं याम्यायामथ वा नृप । सदैव स्वपतः पुंसो विपरीतं तु रोगदम्

prācyāṁ diśi śiraśśastaṁ yāmyāyāmatha vā nṛpa sadaiva svapataḥ puṁso viparītaṁ tu rogadam

हे राजन्, सोते हुए पुरुष का सिर सदा पूर्व दिशा में, या फिर दक्षिण दिशा में होना प्रशस्त है; इसके विपरीत सोना रोगकारी है।

श्लोक 114 (vishnu.3.11.114)

ऋतावुपगमश्शस्तस्स्वपत्न्यामवनीपते । पुन्नामर्क्षे शुभे काले ज्येष्ठायुग्मासु रात्रिषु

ṛtāvupagamaśśastassvapatnyāmavanīpate punnāmarkṣe śubhe kāle jyeṣṭhāyugmāsu rātriṣu

हे अवनीपते, अपनी ही पत्नी के पास ऋतुकाल में जाना प्रशस्त है -- पुत्र-जनक नक्षत्र में, शुभ काल में, तथा ज्येष्ठा को छोड़कर सम काल की रात्रियों में।

श्लोक 115 (vishnu.3.11.115)

नाद्यूनां तु स्त्रियं गच्छेन्नातुरां न रजस्वलाम् । नानिष्टां न प्रकुपितां न त्रस्तां न च गर्भिणीम्

nādyūnāṁ tu striyaṁ gacchennāturāṁ na rajasvalām nāniṣṭāṁ na prakupitāṁ na trastāṁ na ca garbhiṇīm

जो स्त्री अल्पवयस्क हो, रोगी हो, या रजस्वला हो, उसके पास न जाए; न ही जो अनिच्छुक हो, क्रोधित हो, भयभीत हो, या गर्भवती हो।

श्लोक 116 (vishnu.3.11.116)

नादक्षिणां नान्यकामां नाकामां नान्ययोषितम् । क्षुत्क्षामां नातिभुक्तां वा स्वयं चैभिर्गुणैर्युतः

nādakṣiṇāṁ nānyakāmāṁ nākāmāṁ nānyayoṣitam kṣutkṣāmāṁ nātibhuktāṁ vā svayaṁ caibhirguṇairyutaḥ

जो अनुकूल न हो, जिसकी कामना अन्यत्र हो, जो निष्काम हो, या जो पराई स्त्री हो; जो भूख से क्षीण हो या अत्यधिक भोजन कर चुकी हो, उसके पास भी न जाए; और स्वयं भी इन्हीं गुणों से युक्त होकर [जाए]।

श्लोक 117 (vishnu.3.11.117)

स्नातस्स्रग्गन्धधृक् प्रीतो नाध्मातः क्षुधितोऽपि वा । सकामस्सानुरागश्च व्यवायं पुरुषो व्रजेत्

snātassraggandhadhṛk prīto nādhmātaḥ kṣudhito'pi vā sakāmassānurāgaśca vyavāyaṁ puruṣo vrajet

स्नान किया हुआ, माला और गन्ध धारण किए, प्रसन्न, न अफरा हुआ और न अत्यधिक भूखा -- ऐसा पुरुष कामना और अनुराग से युक्त होकर ही समागम को प्राप्त हो।

श्लोक 118 (vishnu.3.11.118)

चतुर्दश्यष्टमी चैव तथामा चाथ पूर्णिमा । पर्वाण्येतानि राजेन्द्र रविसङ्क्रान्तिरेव च

caturdaśyaṣṭamī caiva tathāmā cātha pūrṇimā parvāṇyetāni rājendra ravisaṅkrāntireva ca

चतुर्दशी, अष्टमी, तथा अमावस्या और पूर्णिमा -- हे राजेन्द्र, ये पर्व-तिथियाँ हैं, और सूर्य की संक्रान्ति भी।

श्लोक 119 (vishnu.3.11.119)

तैलस्त्रीमांससम्भोगी सर्वेष्वेतेषु वै पुमान् । विण्मूत्रभोजनं नाम प्रयाति नरकं मृतः

tailastrīmāṁsasambhogī sarveṣveteṣu vai pumān viṇmūtrabhojanaṁ nāma prayāti narakaṁ mṛtaḥ

इन सभी [पर्व-दिनों] में जो पुरुष तेल, स्त्री-सम्भोग और मांस का सेवन करता है, वह मरने के बाद 'विण्मूत्रभोजन' नामक नरक में जाता है।

श्लोक 120 (vishnu.3.11.120)

अशेषपर्वस्वेतेषु तस्मात् संयमिभिर्बुधैः । भाव्यं सच्छास्त्रदेवेज्याध्यानजप्यपरैर्नरैः

aśeṣaparvasveteṣu tasmāt saṁyamibhirbudhaiḥ bhāvyaṁ sacchāstradevejyādhyānajapyaparairnaraiḥ

इसलिए इन समस्त पर्व-दिनों में संयमी और बुद्धिमान् मनुष्यों को सत्शास्त्र, देव-पूजा, ध्यान और जप में तत्पर रहना चाहिए।

श्लोक 121 (vishnu.3.11.121)

नान्ययोनावयोनौ वा नोपयुक्तौषधस्तथा । द्विजदेवगुरूणां च व्यवायी नाश्रमे भवेत्

nānyayonāvayonau vā nopayuktauṣadhastathā dvijadevagurūṇāṁ ca vyavāyī nāśrame bhavet

जो अयोनि (योनि-रहित मार्ग) में, या अन्य के गर्भ में समागम करने वाला हो, या जिसने औषध का सेवन किया हो, वैसा ही व्यक्ति द्विजों, देवताओं और गुरुओं के आश्रम में समागम न करे।

श्लोक 122 (vishnu.3.11.122)

चैत्यचत्वरतीरेषु नैव गोष्ठे चतुष्पथे । नैव श्मशानोपवने सलिलेषु महीपते

caityacatvaratīreṣu naiva goṣṭhe catuṣpathe naiva śmaśānopavane salileṣu mahīpate

चैत्य (पवित्र वृक्ष), चौराहों, नदी-तटों में, गोशाला में, चौराहे पर; तथा हे महीपते, श्मशान, उपवन और जल में भी [समागम न करे]।

श्लोक 123 (vishnu.3.11.123)

प्रोक्तपर्वस्वशेषेषु नैव भूपाल सन्ध्ययोः । गच्छेद्व्यवायं मनसा न मूत्रोच्चारपीडितः

proktaparvasvaśeṣeṣu naiva bhūpāla sandhyayoḥ gacchedvyavāyaṁ manasā na mūtroccārapīḍitaḥ

उपर्युक्त सभी पर्व-दिनों में, तथा हे भूपाल, दोनों सन्ध्याओं के समय भी समागम न करे; मूत्र-मल के वेग से पीड़ित हो तो मन से भी समागम की इच्छा न करे।

श्लोक 124 (vishnu.3.11.124)

पर्वस्वभिगमोऽधन्यो दिवा पापप्रदो नृप । भुवि रोगावहो नॄणामप्रशस्तो जलाशये

parvasvabhigamo'dhanyo divā pāpaprado nṛpa bhuvi rogāvaho nṝṇāmapraśasto jalāśaye

पर्व-दिनों में समागम अशुभ है, दिन में समागम पाप देने वाला है; भूमि पर समागम मनुष्यों के लिए रोगकारी है, और जलाशय में समागम अप्रशस्त है।

श्लोक 125 (vishnu.3.11.125)

परदारान्न गच्छेत मनसापि कथञ्चन । किमु वाचास्थिबन्धोऽपि नास्ति तेषु व्यवायिनाम्

paradārānna gaccheta manasāpi kathañcana kimu vācāsthibandho'pi nāsti teṣu vyavāyinām

पराई स्त्री के पास मन से भी कभी न जाए, वाणी से जाने की तो बात ही क्या -- समागम करने वालों को उससे कोई अस्थि-बन्ध (मुक्ति) भी नहीं मिलता।

श्लोक 126 (vishnu.3.11.126)

मृतो नरकमभ्येति हीयतेऽत्रापि चायुषः । परदाररतिः पुंसामिह चामुत्र भीतिदा

mṛto narakamabhyeti hīyate'trāpi cāyuṣaḥ paradāraratiḥ puṁsāmiha cāmutra bhītidā

मरकर वह नरक को प्राप्त होता है, और यहाँ भी उसकी आयु क्षीण होती है; पराई स्त्री में आसक्ति मनुष्यों के लिए इस लोक और परलोक दोनों में भय देने वाली है।

श्लोक 127 (vishnu.3.11.127)

इति मत्वा स्वदारेषु ऋतुमत्सु बुधो व्रजेत् । यथोक्तदोषहीनेषु सकामेष्वनृतावपि

iti matvā svadāreṣu ṛtumatsu budho vrajet yathoktadoṣahīneṣu sakāmeṣvanṛtāvapi

ऐसा जानकर बुद्धिमान् पुरुष अपनी ही पत्नी के पास, जब वह ऋतुमती हो, जाए -- यथोक्त दोषों से रहित, कामनायुक्त होने पर भी, ऋतुकाल के अतिरिक्त भी [कभी-कभी] जा सकता है।

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