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तृतीयांश · अध्याय 12

सदाचार के अन्य नियम

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (vishnu.3.12.1)

और्व उवाच देवगोब्राहमणान् सिद्धान् वृद्धाचार्यांस्तथार्चयेत् । द्विकालञ्च नमेत् सन्ध्यामग्नीनुपचरेत् तथा

aurva uvāca devagobrāhamaṇān siddhān vṛddhācāryāṁstathārcayet dvikālañca namet sandhyāmagnīnupacaret tathā

और्व बोले -- देव, गौ, ब्राह्मण, सिद्ध, तथा वृद्ध आचार्यों की पूजा करे; दोनों समय सन्ध्या को नमन करे, तथा अग्नियों की भी सेवा करे।

श्लोक 2 (vishnu.3.12.2)

सदानुपहते वस्त्रे प्रशस्ताश्च महौषधीः । गारुडानि च रत्नानि बिभृयात् प्रयतो नरः

sadānupahate vastre praśastāśca mahauṣadhīḥ gāruḍāni ca ratnāni bibhṛyāt prayato naraḥ

सदा निर्दोष वस्त्र पहने, प्रशस्त महौषधियाँ, गरुड़-चिह्नित वस्तुएँ और रत्न धारण करे -- ऐसा संयमी पुरुष होना चाहिए।

श्लोक 3 (vishnu.3.12.3)

प्रस्निग्धामलकेशश्च सुगन्धिश्चारुवेषधृक् । सिताः सुमनसो हृद्या बिभृयाच्च नरः सदा

prasnigdhāmalakeśaśca sugandhiścāruveṣadhṛk sitāḥ sumanaso hṛdyā bibhṛyācca naraḥ sadā

मनुष्य सदा स्निग्ध और स्वच्छ केशों वाला, सुगन्धित, सुन्दर वेश धारण करने वाला हो, तथा उजले, मनोहर पुष्प धारण करे।

श्लोक 4 (vishnu.3.12.4)

किञ्चित् परस्वं न हरेन्नाल्पमप्यप्रियं वदेत् । प्रियञ्च नानृतं ब्रूयान्नान्यदोषानुदीरयेत्

kiñcit parasvaṁ na harennālpamapyapriyaṁ vadet priyañca nānṛtaṁ brūyānnānyadoṣānudīrayet

पराया धन तनिक भी न हरे, न अल्प भी अप्रिय वचन बोले; प्रिय भी असत्य न बोले, और दूसरों के दोषों की चर्चा न करे।

श्लोक 5 (vishnu.3.12.5)

नान्यश्रियं तथा वैरं रोचयेत् पुरुषर्षभ । न दुष्टं यानमारोहेत् कूलच्छाया न संश्रयेत्

nānyaśriyaṁ tathā vairaṁ rocayet puruṣarṣabha na duṣṭaṁ yānamārohet kūlacchāyā na saṁśrayet

हे पुरुषर्षभ, दूसरे की सम्पत्ति की भी इच्छा न करे, और न ही वैर में रुचि रखे; दुष्ट वाहन पर सवार न हो, न ही नदी-तट की छाया का आश्रय ले।

श्लोक 6 (vishnu.3.12.6)

विद्विष्टपतितोन्मत्तबहुवैरादिकीटकैः । बन्धकी बन्धकीभर्तुः क्षुद्रानृतकथैस्सह

vidviṣṭapatitonmattabahuvairādikīṭakaiḥ bandhakī bandhakībhartuḥ kṣudrānṛtakathaissaha

जो घृणित हैं, पतित हैं, उन्मत्त हैं, बहुत वैर रखने वाले तुच्छ लोग हैं, वेश्या है, वेश्या का पति है, या क्षुद्र और असत्य बोलने वालों के साथ,

श्लोक 7 (vishnu.3.12.7)

तथातिव्ययशीलैश्च परिवादरतैश्शठैः । बुधो मैत्रीं न कुर्वीत नैकः पन्थानमाश्रयेत्

tathātivyayaśīlaiśca parivādarataiśśaṭhaiḥ budho maitrīṁ na kurvīta naikaḥ panthānamāśrayet

तथा अत्यधिक व्यय करने वाले और निन्दा में रत, कपटी लोगों से भी, बुद्धिमान् व्यक्ति मित्रता न करे; और न ही अकेला मार्ग पर चले।

श्लोक 8 (vishnu.3.12.8)

नावगाहेज्जलौघस्य वेगमग्रे नरेश्वर । प्रदीप्तं वेश्म न विशेन्नारोहेच्छिखरं तरोः

nāvagāhejjalaughasya vegamagre nareśvara pradīptaṁ veśma na viśennārohecchikharaṁ taroḥ

हे नरेश्वर, बाढ़ के प्रबल वेग में न उतरे; जलते हुए घर में प्रवेश न करे, न ही वृक्ष की चोटी पर चढ़े।

श्लोक 9 (vishnu.3.12.9)

न कुर्याद्दन्तसङ्घर्षं कुष्णीयाच्च न नासिकाम् । नासंवृतमुखो जृम्भेच्छ्वासकासौ विसर्जयेत्

na kuryāddantasaṅgharṣaṁ kuṣṇīyācca na nāsikām nāsaṁvṛtamukho jṛmbhecchvāsakāsau visarjayet

दाँतों को न रगड़े, नाक को न मरोड़े; बिना मुख ढके न जँभाई ले, और श्वास व खाँसी को [ढककर ही] छोड़े।

श्लोक 10 (vishnu.3.12.10)

नोच्चैर्हसेत् सशब्दं च न मुञ्चेत् पवनं बुधः । नखान्न खादयेच्छिन्द्यान्न तृणं न महीं लिखेत्

noccairhaset saśabdaṁ ca na muñcet pavanaṁ budhaḥ nakhānna khādayecchindyānna tṛṇaṁ na mahīṁ likhet

ऊँचे स्वर में न हँसे, शब्द करते हुए वायु (अपानवायु) न छोड़े; नाखून न चबाए, तिनका न तोड़े, और भूमि को न कुरेदे।

श्लोक 11 (vishnu.3.12.11)

न श्मश्रु भक्षयेल्लोष्टं न मृद्नीयाद्विचक्षणः । ज्योतींष्यमेध्यशस्तानि नाभिवीक्षेत च प्रभो

na śmaśru bhakṣayelloṣṭaṁ na mṛdnīyādvicakṣaṇaḥ jyotīṁṣyamedhyaśastāni nābhivīkṣeta ca prabho

विचक्षण पुरुष दाढ़ी-मूँछ न चबाए, मिट्टी का ढेला न मसले; अपवित्र और निषिद्ध ज्योतियों (अग्नि आदि) को भी न देखे, हे प्रभो।

श्लोक 12 (vishnu.3.12.12)

नग्नां परस्त्रियं चैव सूर्यं चास्तमयोदये । न हुङ्कुर्याच्छवं गन्धं शवगन्धो हि सोमजः

nagnāṁ parastriyaṁ caiva sūryaṁ cāstamayodaye na huṅkuryācchavaṁ gandhaṁ śavagandho hi somajaḥ

नग्न पराई स्त्री को, तथा उदय और अस्त होते सूर्य को [न देखे]; शव की दुर्गन्ध पर 'हुं' शब्द न करे, क्योंकि शव-गन्ध सोम-सम्बन्धी होती है।

श्लोक 13 (vishnu.3.12.13)

चतुष्पथं चैत्यतरुं श्मशानोपवनानि च । दुष्टस्त्रीसन्निकर्षं च वर्जयेन्निशि सर्वदा

catuṣpathaṁ caityataruṁ śmaśānopavanāni ca duṣṭastrīsannikarṣaṁ ca varjayenniśi sarvadā

चौराहे, चैत्य-वृक्ष, श्मशान और उपवन, तथा दुष्ट स्त्री के सान्निध्य को -- रात्रि में सर्वदा ही त्याग दे।

श्लोक 14 (vishnu.3.12.14)

पूज्यदेवद्विजज्योतिश्छायां नातिक्रमेद्बुधः । नैकश्शून्याटवीं गच्छेत् तथा शून्यगृहे वसेत्

pūjyadevadvijajyotiśchāyāṁ nātikramedbudhaḥ naikaśśūnyāṭavīṁ gacchet tathā śūnyagṛhe vaset

पूज्य देव, द्विज और ज्योतियों की छाया का बुद्धिमान् व्यक्ति उल्लंघन न करे; अकेला सूने जंगल में न जाए, तथा सूने घर में भी न रहे।

श्लोक 15 (vishnu.3.12.15)

केशास्थिकण्टकामेध्यबलिभस्मतुषांस्तथा । स्नानार्द्रधरणीं चैव दूरतः परिवर्जयेत्

keśāsthikaṇṭakāmedhyabalibhasmatuṣāṁstathā snānārdradharaṇīṁ caiva dūrataḥ parivarjayet

बाल, हड्डी, काँटे, अपवित्र वस्तु, बलि-शेष, राख और भूसी, तथा स्नान से गीली भूमि -- इन सबको दूर से ही त्याग दे।

श्लोक 16 (vishnu.3.12.16)

नानार्यानाश्रयेत् कांश्चिन्न जिह्मं रोचयेद्बुधः । उपसर्पेन्न वै व्यालं चिरं तिष्ठेन्न वोत्थितः

nānāryānāśrayet kāṁścinna jihmaṁ rocayedbudhaḥ upasarpenna vai vyālaṁ ciraṁ tiṣṭhenna votthitaḥ

किसी भी अनार्य (नीच) व्यक्ति का आश्रय न ले, बुद्धिमान् व्यक्ति कुटिलता में रुचि न रखे; विषैले सर्प के निकट न जाए, और न लम्बे समय तक बिना हिले-डुले खड़ा रहे।

श्लोक 17 (vishnu.3.12.17)

अतीव जागरस्वप्ने तद्वत्स्नानासने बुधः । न सेवेत तथा शय्यां व्यायामं च नरेश्वर

atīva jāgarasvapne tadvatsnānāsane budhaḥ na seveta tathā śayyāṁ vyāyāmaṁ ca nareśvara

अत्यधिक जागरण और अत्यधिक निद्रा का, इसी प्रकार अत्यधिक स्नान और आसन का, बुद्धिमान् व्यक्ति सेवन न करे; और न ही अत्यधिक शय्या-सुख या हे नरेश्वर, अत्यधिक व्यायाम का।

श्लोक 18 (vishnu.3.12.18)

दंष्ट्रिणः शृङ्गिणश्चैव प्राज्ञो दूरेण वर्जयेत् । अवश्यायं च राजेन्द्र पुरोवातातपौ तथा

daṁṣṭriṇaḥ śṛṅgiṇaścaiva prājño dūreṇa varjayet avaśyāyaṁ ca rājendra purovātātapau tathā

जिनके दाँत या सींग हों, ऐसे प्राणियों को बुद्धिमान् व्यक्ति दूर से ही त्याग दे; हे राजेन्द्र, ओस, आँधी और तेज धूप को भी।

श्लोक 19 (vishnu.3.12.19)

न स्नायान्न स्वपेन्नग्नो न चैवोपस्पृशेद्बुधः । मुक्तकेशश्च नाचामेद्देवाद्यर्चां च वर्जयेत्

na snāyānna svapennagno na caivopaspṛśedbudhaḥ muktakeśaśca nācāmeddevādyarcāṁ ca varjayet

न नग्न होकर स्नान करे, न नग्न सोए, न बुद्धिमान् व्यक्ति नग्न होकर आचमन करे; बाल खुले हुए आचमन न करे, तथा देवादि की मूर्ति-पूजा भी [नग्न होकर] न करे।

श्लोक 20 (vishnu.3.12.20)

होमदेवार्चनाद्यासु क्रियास्वाचमने तथा । नैकवस्त्रः प्रवर्तेत द्विजवाचनिके जपे

homadevārcanādyāsu kriyāsvācamane tathā naikavastraḥ pravarteta dvijavācanike jape

होम, देव-पूजा आदि क्रियाओं में, तथा आचमन में भी, एक ही वस्त्र पहने हुए प्रवृत्त न हो, और द्विज-वाचित जप में भी नहीं।

श्लोक 21 (vishnu.3.12.21)

नासमञ्जसशीलैस्तु सहासीत कथञ्चन । सद्वृत्तसन्निकर्षो हि क्षणार्द्धमपि शस्यते

nāsamañjasaśīlaistu sahāsīta kathañcana sadvṛttasannikarṣo hi kṣaṇārddhamapi śasyate

असंगत स्वभाव वाले लोगों के साथ कभी न बैठे; सद्वृत्त (सदाचारी) लोगों की संगति तो आधे क्षण के लिए भी प्रशंसनीय है।

श्लोक 22 (vishnu.3.12.22)

विरोधं नोत्तमैर्गच्छेन्नाधमैश्च सदा बुधः । विवाहश्च विवादश्च तुल्यशीलैर्नृपेष्यते

virodhaṁ nottamairgacchennādhamaiśca sadā budhaḥ vivāhaśca vivādaśca tulyaśīlairnṛpeṣyate

बुद्धिमान् व्यक्ति न तो उत्तम पुरुषों से और न सदा नीच पुरुषों से भी विरोध करे; हे राजन्, विवाह और विवाद समान स्वभाव वालों के साथ ही उचित माने जाते हैं।

श्लोक 23 (vishnu.3.12.23)

नारभेत कलिं प्राज्ञः शुष्कवैरञ्च वर्जयेत् । अप्यल्पहानिः सोढव्या वैरेणार्थागमं त्यजेत्

nārabheta kaliṁ prājñaḥ śuṣkavairañca varjayet apyalpahāniḥ soḍhavyā vaireṇārthāgamaṁ tyajet

बुद्धिमान् व्यक्ति कलह आरम्भ न करे, और निरर्थक वैर का भी त्याग करे; थोड़ी हानि भी सह ले, किन्तु वैर से धन-प्राप्ति का त्याग करे।

श्लोक 24 (vishnu.3.12.24)

स्नातो नाङ्गानि सम्मार्जेत् स्नानशाट्या न पाणिना । न च निर्धूनयेत् केशान् नाचामेच्चैव चोत्थितः

snāto nāṅgāni sammārjet snānaśāṭyā na pāṇinā na ca nirdhūnayet keśān nācāmeccaiva cotthitaḥ

स्नान करके अंगों को स्नान-वस्त्र से पोंछे, हाथ से नहीं; केशों को न झटके, और उठते ही आचमन न करे।

श्लोक 25 (vishnu.3.12.25)

पादेन नाक्रमेत् पादं न पूज्याभिमुखं नयेत् । नोच्चासनं गुरोरग्रे भजेताविनयान्वितः

pādena nākramet pādaṁ na pūjyābhimukhaṁ nayet noccāsanaṁ guroragre bhajetāvinayānvitaḥ

पैर से पैर पर न चढ़े, पूज्य व्यक्ति की ओर पैर न फैलाए; गुरु के सामने ऊँचे आसन का सेवन विनयरहित होकर न करे।

श्लोक 26 (vishnu.3.12.26)

अपसव्यं न गच्छेच्च देवागारचतुष्पथान् । माङ्गल्यपूज्यांश्च तथा विपरीतान्न दक्षिणम्

apasavyaṁ na gacchecca devāgāracatuṣpathān māṅgalyapūjyāṁśca tathā viparītānna dakṣiṇam

देवालय और चौराहों को अपसव्य (उलटी दिशा से, बाईं ओर से) होकर न पार करे; इसी प्रकार मंगल-पूज्य वस्तुओं को भी विपरीत दिशा से नहीं, दायीं ओर से ही [प्रदक्षिणा करे]।

श्लोक 27 (vishnu.3.12.27)

सोमार्काग्न्यम्बुवायूनां पूज्यानाञ्च न सम्मुखम् । कुर्यान्निष्ठीवविण्मूत्रसमुत्सर्गञ्च पण्डितः

somārkāgnyambuvāyūnāṁ pūjyānāñca na sammukham kuryānniṣṭhīvaviṇmūtrasamutsargañca paṇḍitaḥ

विद्वान् पुरुष चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, जल और वायु के, तथा अन्य पूज्य वस्तुओं के सम्मुख थूकना, मल-मूत्र त्याग न करे।

श्लोक 28 (vishnu.3.12.28)

तिष्ठन्न मूत्रयेत् तद्वत् पथिष्वपि न मूत्रयेत् । श्लैष्मविण्मूत्ररक्तानि सर्वदैव न लङ्घयेत्

tiṣṭhanna mūtrayet tadvat pathiṣvapi na mūtrayet ślaiṣmaviṇmūtraraktāni sarvadaiva na laṅghayet

खड़े होकर मूत्र-त्याग न करे, इसी प्रकार मार्गों पर भी मूत्र-त्याग न करे; कफ, मल, मूत्र और रक्त को कभी भी लाँघकर न जाए।

श्लोक 29 (vishnu.3.12.29)

श्लेष्मशिङ्घाणिकोत्सर्गो नान्नकाले प्रशस्यते । बलिमङ्गलजप्यादौ न होमे न महाजने

śleṣmaśiṅghāṇikotsargo nānnakāle praśasyate balimaṅgalajapyādau na home na mahājane

भोजन के समय कफ और नाक का स्राव त्यागना प्रशस्त नहीं है; तथा बलि, मंगल-कार्य, जप, होम और सभा में भी नहीं।

श्लोक 30 (vishnu.3.12.30)

योषितो नावमन्येत न चासां विश्वसेद् बुधः । न चैवेर्ष्युर्भवेत्तासु न धिक्कुर्यात् कदाचन

yoṣito nāvamanyeta na cāsāṁ viśvased budhaḥ na caiverṣyurbhavettāsu na dhikkuryāt kadācana

स्त्रियों का अनादर न करे, न ही बुद्धिमान् व्यक्ति उन पर पूर्ण विश्वास करे; उनसे ईर्ष्या भी न रखे, और कभी उनकी निन्दा भी न करे।

श्लोक 31 (vishnu.3.12.31)

माङ्गल्यपुष्परत्नाज्यपूज्याननभिवाद्य च । न निष्क्रमेद्गृहात् प्राज्ञः सदाचारपरो नरः

māṅgalyapuṣparatnājyapūjyānanabhivādya ca na niṣkramedgṛhāt prājñaḥ sadācāraparo naraḥ

मंगल-वस्तु, पुष्प, रत्न, घृत और पूज्य वस्तुओं को प्रणाम किए बिना, सदाचार-परायण बुद्धिमान् मनुष्य घर से बाहर न निकले।

श्लोक 32 (vishnu.3.12.32)

चतुष्पथान् नमस्कुर्यात् काले होमपरो भवेत् । दीनानभ्युद्धरेत् साधूनुपासीत बहुश्रुतान्

catuṣpathān namaskuryāt kāle homaparo bhavet dīnānabhyuddharet sādhūnupāsīta bahuśrutān

चौराहों को नमस्कार करे, समय पर होम-कार्य में तत्पर रहे; दीनों का उद्धार करे, तथा साधुओं और बहुश्रुत (विद्वान्) पुरुषों की उपासना करे।

श्लोक 33 (vishnu.3.12.33)

देवर्षिपूजकः सम्यक् पितृपिण्डोदकप्रदः । सत्कर्ता चातिथीनां यः स लोकानुत्तमान् व्रजेत्

devarṣipūjakaḥ samyak pitṛpiṇḍodakapradaḥ satkartā cātithīnāṁ yaḥ sa lokānuttamān vrajet

जो देवताओं और ऋषियों का भलीभाँति पूजक है, पितरों को पिण्ड और जल देने वाला है, तथा अतिथियों का सत्कार करने वाला है, वह उत्तम लोकों को प्राप्त होता है।

श्लोक 34 (vishnu.3.12.34)

हितं मितं प्रियं काले वश्यात्मा योऽभिभाषते । स याति लोकानाह्लादहेतुभूतान् नृपाक्षयान्

hitaṁ mitaṁ priyaṁ kāle vaśyātmā yo'bhibhāṣate sa yāti lokānāhlādahetubhūtān nṛpākṣayān

जो संयमी होकर उचित समय पर हितकर, परिमित और प्रिय वचन बोलता है, वह राजाओं को प्रिय, अक्षय, आनन्दप्रद लोकों को प्राप्त होता है।

श्लोक 35 (vishnu.3.12.35)

धीमान् ह्रीमान् क्षमायुक्तो ह्यास्तिको विनयान्वितः । विद्याभिजनवृद्धानां याति लोकाननुत्तमान्

dhīmān hrīmān kṣamāyukto hyāstiko vinayānvitaḥ vidyābhijanavṛddhānāṁ yāti lokānanuttamān

बुद्धिमान्, लज्जाशील, क्षमावान्, आस्तिक और विनययुक्त पुरुष विद्या, कुल और वृद्धजनों के [योग्य] उत्तम लोकों को प्राप्त होता है।

श्लोक 36 (vishnu.3.12.36)

अकालगर्जितादौ च पर्वस्वाशौचकादिषु । अनध्यायं बुधः कुर्यादुपरागादिके तथा

akālagarjitādau ca parvasvāśaucakādiṣu anadhyāyaṁ budhaḥ kuryāduparāgādike tathā

असामयिक गर्जन आदि होने पर, पर्व-दिनों में, अशौच आदि के समय में, तथा ग्रहण आदि में भी, बुद्धिमान् व्यक्ति अध्ययन-निषेध का पालन करे।

श्लोक 37 (vishnu.3.12.37)

शमं नयति यः क्रुद्धान् सर्वबन्धुरमत्सरी । भीताश्वासनकृत् साधुः स्वर्गस्तस्याल्पकं फलम्

śamaṁ nayati yaḥ kruddhān sarvabandhuramatsarī bhītāśvāsanakṛt sādhuḥ svargastasyālpakaṁ phalam

जो क्रुद्ध जनों को शान्त करता है, सबका बन्धु है, ईर्ष्या-रहित है, तथा भयभीतों को आश्वासन देता है -- ऐसे साधु के लिए स्वर्ग भी अल्प फल है।

श्लोक 38 (vishnu.3.12.38)

वर्षातपादिषु च्छत्री दण्डी रात्र्यटवीषु च । शरीरत्राणकामो वै सोपानत्कः सदा व्रजेत्

varṣātapādiṣu cchatrī daṇḍī rātryaṭavīṣu ca śarīratrāṇakāmo vai sopānatkaḥ sadā vrajet

वर्षा और धूप आदि में छाता लिए, रात्रि में या जंगल में दण्ड लिए, शरीर की रक्षा चाहने वाला व्यक्ति सदा जूते पहनकर ही यात्रा करे।

श्लोक 39 (vishnu.3.12.39)

नोर्ध्वं न तिर्यग्दूरं वा न पश्यन् पर्यटेद्बुधः । युगमात्रं महीपृष्ठं नरो गच्छेद्विलोकयन्

nordhvaṁ na tiryagdūraṁ vā na paśyan paryaṭedbudhaḥ yugamātraṁ mahīpṛṣṭhaṁ naro gacchedvilokayan

बुद्धिमान् व्यक्ति न ऊपर देखता हुआ, न तिरछा, न दूर तक देखता हुआ भ्रमण करे; मनुष्य पृथ्वी की सतह को देखते हुए ही एक युग (जुए) भर की दूरी तक चले।

श्लोक 40 (vishnu.3.12.40)

दोषहेतूनशेषांश्च वश्यात्मा यो निरस्यति । तस्य धर्मार्थकामानां हानिर्नाल्पापि जायते

doṣahetūnaśeṣāṁśca vaśyātmā yo nirasyati tasya dharmārthakāmānāṁ hānirnālpāpi jāyate

संयमी पुरुष जो समस्त दोषों के कारणों को सर्वथा दूर कर देता है, उसके धर्म, अर्थ और काम की हानि तनिक भी नहीं होती।

श्लोक 41 (vishnu.3.12.41)

सदाचाररतः प्राज्ञो विद्याविनयशिक्षितः । पापेऽप्यपापः परुषे ह्यभिधत्ते प्रियाणि यः । मैत्रीद्रवान्तःकरणस्तस्य मुक्तिः करे स्थिता

sadācārarataḥ prājño vidyāvinayaśikṣitaḥ pāpe'pyapāpaḥ paruṣe hyabhidhatte priyāṇi yaḥ maitrīdravāntaḥkaraṇastasya muktiḥ kare sthitā

जो सदाचार में रत, विद्या और विनय से शिक्षित, पाप के बीच भी निष्पाप, और कठोर [व्यक्ति] के प्रति भी प्रिय वचन ही बोलता है -- मैत्री से द्रवित अन्तःकरण वाले उस पुरुष के हाथ में ही मुक्ति स्थित है।

श्लोक 42 (vishnu.3.12.42)

ये कामक्रोधलोभानां वीतरागा न गोचरे । सदाचारस्थितास्तेषामनुभावैर्धृता मही

ye kāmakrodhalobhānāṁ vītarāgā na gocare sadācārasthitāsteṣāmanubhāvairdhṛtā mahī

जो लोग काम, क्रोध और लोभ के विषय से पूर्णतः विरक्त हैं और सदाचार में स्थित हैं, उन्हीं के प्रभाव से यह पृथ्वी धारण की जाती है।

श्लोक 43 (vishnu.3.12.43)

तस्मात् सत्यं वदेत् प्राज्ञो यत् परप्रीतिकारणम् । सत्यं यत् परदुःखाय तत्र मौनपरो भवेत्

tasmāt satyaṁ vadet prājño yat paraprītikāraṇam satyaṁ yat paraduḥkhāya tatra maunaparo bhavet

इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति वही सत्य बोले जो दूसरों को प्रसन्नता का कारण हो; जो सत्य दूसरे को दुःख देने वाला हो, उसके विषय में मौन ही धारण करे।

श्लोक 44 (vishnu.3.12.44)

प्रियमुक्तं हितं नैतदिति मत्वा न तद्वदेत् । श्रेयस्तत्र हितं वाक्यं यद्यप्यत्यन्तमप्रियम्

priyamuktaṁ hitaṁ naitaditi matvā na tadvadet śreyastatra hitaṁ vākyaṁ yadyapyatyantamapriyam

'यह प्रिय तो लगेगा, पर हितकर नहीं है' -- ऐसा समझकर वह न बोले; इसके विपरीत जो वचन हितकर हो, वह श्रेयस्कर है, भले ही वह अत्यन्त अप्रिय हो।

श्लोक 45 (vishnu.3.12.45)

प्राणिनामुपकाराय यथैवेह परत्र च । कर्मणा मनसा वाचा तदेव मतिमान् भजेत्

prāṇināmupakārāya yathaiveha paratra ca karmaṇā manasā vācā tadeva matimān bhajet

जो भी प्राणियों के उपकार के लिए हो, चाहे इस लोक में हो या परलोक में, बुद्धिमान् व्यक्ति उसी का सेवन कर्म से, मन से, और वाणी से करे।

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