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चतुर्थांश · अध्याय 11

यदुवंश और कार्तवीर्य अर्जुन का वर्णन

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (vishnu.4.11.1)

श्रीपराशर उवाच अतः परं ययातेः प्रथमपुत्रस्य यदोर्वंशमहं कथयामि

śrīparāśara uvāca ataḥ paraṁ yayāteḥ prathamaputrasya yadorvaṁśamahaṁ kathayāmi

श्री पराशर ने कहा — अब इसके आगे मैं ययाति के प्रथम पुत्र यदु के वंश का वर्णन करूँगा।

श्लोक 2 (vishnu.4.11.2)

यत्राशेषलोकनिवासो मनुष्यसिद्धगन्धर्वयक्षराक्षसगुह्यककिंपुरुषाप्सरोरगविहगदैत्यदानवादित्यरुद्रवस्वश्विमरुद्देवर्षिभिर्मुमुक्षुभिर्धर्मार्थकाममोक्षार्थिभिश्च तत्तत्फललाभाय सदाभिष्टुतोऽपरिच्छेद्यमाहात्म्यांशेन भगवाननादिनिधनो विष्णुरवततार

yatrāśeṣalokanivāso manuṣyasiddhagandharvayakṣarākṣasaguhyakakiṁpuruṣāpsaroragavihagadaityadānavādityarudravasvaśvimaruddevarṣibhirmumukṣubhirdharmārthakāmamokṣārthibhiśca tattatphalalābhāya sadābhiṣṭuto'paricchedyamāhātmyāṁśena bhagavānanādinidhano viṣṇuravatatāra

जिस वंश में मनुष्य, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, गुह्यक, किम्पुरुष, अप्सरा, नाग, पक्षी, दैत्य, दानव, आदित्य, रुद्र, वसु, अश्विनीकुमार, मरुद्गण और देवर्षिगण — ये सभी, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के अभिलाषी होकर, अपने-अपने फल की प्राप्ति के लिए सदा जिसकी स्तुति करते रहे — उस अपरिच्छेद्य महिमा वाले, आदि-अंतरहित भगवान विष्णु ने अपने अंश से अवतार लिया।

श्लोक 3 (vishnu.4.11.3)

अत्र श्लोकः

atra ślokaḥ

इस विषय में एक श्लोक है —

श्लोक 4 (vishnu.4.11.4)

यदोर्वंशं नरः श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते । यत्रावतीर्णं कृष्णाख्यंपरं ब्रह्मनराकृति

yadorvaṁśaṁ naraḥ śrutvā sarvapāpaiḥ pramucyate | yatrāvatīrṇaṁ kṛṣṇākhyaṁparaṁ brahmanarākṛti

यदु के वंश को सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, क्योंकि उसी वंश में मनुष्य-रूप धारण किए हुए वह परब्रह्म कृष्ण नाम से अवतरित हुआ।

श्लोक 5 (vishnu.4.11.5)

सहस्रजित्क्रोष्टुनलनहुषसंज्ञाश्चात्वारो यदुपुत्रा बभूवुः

sahasrajitkroṣṭunalanahuṣasaṁjñāścātvāro yaduputrā babhūvuḥ

सहस्रजित्, क्रोष्टु, नल और नहुष नामक यदु के चार पुत्र हुए।

श्लोक 6 (vishnu.4.11.6)

सहस्रजित्पुः शतजित्

sahasrajitpuḥ śatajit

सहस्रजित् का पुत्र शतजित् हुआ।

श्लोक 7 (vishnu.4.11.7)

तस्य हैहयहेहयवेणुहयास्त्रयः पुत्रा बभूवुः

tasya haihayahehayaveṇuhayāstrayaḥ putrā babhūvuḥ

उसके हैहय, हेहय और वेणुहय नामक तीन पुत्र हुए।

श्लोक 8 (vishnu.4.11.8)

हैहयपुत्रो धर्मः तस्यापि धर्मनेत्रः ततः कुन्तिः कुन्तेः सहजित्

haihayaputro dharmaḥ tasyāpi dharmanetraḥ tataḥ kuntiḥ kunteḥ sahajit

हैहय का पुत्र धर्म था, उसका पुत्र धर्मनेत्र, उससे कुन्ति और कुन्ति से सहजित् हुआ।

श्लोक 9 (vishnu.4.11.9)

तत्तनयो महिष्मान् योऽसौ माहिष्मतीं पुरीं निर्वापयामास

tattanayo mahiṣmān yo'sau māhiṣmatīṁ purīṁ nirvāpayāmāsa

उसका पुत्र महिष्मान् हुआ, जिसने माहिष्मती नामक नगरी बसाई।

श्लोक 10 (vishnu.4.11.10)

तस्माद्भद्रश्रेण्यस्ततो दुर्दमस्तस्माद्धनकः धनकस्य कृतवीर्यकृताग्निकृतधर्मकृतौजसश्चत्वारः पुत्रा बभूवुः

tasmādbhadraśreṇyastato durdamastasmāddhanakaḥ dhanakasya kṛtavīryakṛtāgnikṛtadharmakṛtaujasaścatvāraḥ putrā babhūvuḥ

उससे भद्रश्रेण्य, उससे दुर्दम, उससे धनक हुआ। धनक के कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतधर्म और कृतौजस् नामक चार पुत्र हुए।

श्लोक 11 (vishnu.4.11.11)

कृतवीर्यादर्जुःसप्तद्वीपाधिपतिर्बाहुसहस्रो जज्ञे

kṛtavīryādarjuḥsaptadvīpādhipatirbāhusahasro jajñe

कृतवीर्य से अर्जुन का जन्म हुआ, जो सातों द्वीपों का अधिपति और सहस्र भुजाओं वाला था।

श्लोक 12 (vishnu.4.11.12)

योऽसौ भगवदंशमत्रिकुलप्रसूतं दत्तात्रेयाख्यमाराध्य बाहुसहस्रमधर्मसेवानिवारणं स्वधर्मसेवित्वं रणे पृथिवीजयं धर्मतश्चानुपालनमारातिभ्योऽपराजयमखिलजगत्प्रख्यातपुरुषाच्च मृत्युमित्येतान्वरानभिलषितवांल्लेभे च

yo'sau bhagavadaṁśamatrikulaprasūtaṁ dattātreyākhyamārādhya bāhusahasramadharmasevānivāraṇaṁ svadharmasevitvaṁ raṇe pṛthivījayaṁ dharmataścānupālanamārātibhyo'parājayamakhilajagatprakhyātapuruṣācca mṛtyumityetānvarānabhilaṣitavāṁllebhe ca

उसने अत्रि-कुल में उत्पन्न भगवान के अंशस्वरूप दत्तात्रेय की आराधना करके ये वर पाए, जिनकी उसने अभिलाषा की थी — सहस्र भुजाएँ, अधर्म के आचरण से निवृत्ति, स्वधर्म का पालन, युद्ध में पृथ्वी-विजय, धर्मपूर्वक उसका पालन, शत्रुओं से कभी पराजित न होना, और समस्त जगत में विख्यात किसी पुरुष के हाथों मृत्यु।

श्लोक 13 (vishnu.4.11.13)

तेनेयमशेषद्वीपवती पृथिवी सम्यक्परीपालिता

teneyamaśeṣadvīpavatī pṛthivī samyakparīpālitā

उसने इस समस्त द्वीपों सहित पृथ्वी का भलीभाँति पालन किया।

श्लोक 14 (vishnu.4.11.14)

दशयज्ञसहस्राण्यसावयजत्

daśayajñasahasrāṇyasāvayajat

उसने दस हजार यज्ञ किए।

श्लोक 15 (vishnu.4.11.15)

तस्य च श्लोकोऽद्यापि गीयते

tasya ca śloko'dyāpi gīyate

उसके विषय में आज भी यह श्लोक गाया जाता है —

श्लोक 16 (vishnu.4.11.16)

न नूनं कार्तवीर्यस्य गातिं यास्यन्ति पार्थिवाः । यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा प्रश्रयेण श्रुतेन च

na nūnaṁ kārtavīryasya gātiṁ yāsyanti pārthivāḥ | yajñairdānaistapobhirvā praśrayeṇa śrutena ca

यज्ञों से, दानों से, तपस्या से, विनय से अथवा शास्त्रज्ञान से भी अन्य राजा निश्चय ही कार्तवीर्य की गति (महिमा) को नहीं पा सकेंगे।

श्लोक 17 (vishnu.4.11.17)

अनष्टद्रव्यता च तस्य राज्येऽभवत्

anaṣṭadravyatā ca tasya rājye'bhavat

उसके राज्य में कोई भी वस्तु नष्ट नहीं होती थी।

श्लोक 18 (vishnu.4.11.18)

एवं च पञ्चाशीतिवर्षसहस्रण्यव्याहतेरोग्यश्रीबलपराक्रमो राज्यमकरोत्

evaṁ ca pañcāśītivarṣasahasraṇyavyāhaterogyaśrībalaparākramo rājyamakarot

इस प्रकार उसने पचासी हजार वर्षों तक अबाधित आरोग्य, समृद्धि, बल और पराक्रम के साथ राज्य किया।

श्लोक 19 (vishnu.4.11.19)

माहिष्मत्यां दिग्विजयाभ्यागतो नर्मदाजलावगाहनक्रीडातिपानमदाकुलेनायत्नेनैव तेनाशेषदेवदैत्यगन्धर्वेशजयोद्भूतमदावलेपोऽपि रावणः पशुर् इव बद्ध्वा स्वनगरैकान्ते स्थापितः

māhiṣmatyāṁ digvijayābhyāgato narmadājalāvagāhanakrīḍātipānamadākulenāyatnenaiva tenāśeṣadevadaityagandharveśajayodbhūtamadāvalepo'pi rāvaṇaḥ paśur iva baddhvā svanagaraikānte sthāpitaḥ

दिग्विजय करते हुए माहिष्मती नगरी में आया हुआ रावण, जो नर्मदा के जल में क्रीड़ा करते हुए मद्यपान के मद में चूर था, और जो समस्त देवों, दैत्यों तथा गन्धर्वों के अधिपतियों को जीतने के गर्व से उन्मत्त था, उसे कार्तवीर्य ने बिना किसी प्रयास के ही एक पशु के समान बाँधकर अपने नगर के एक ओर बंदी बना दिया।

श्लोक 20 (vishnu.4.11.20)

यश्च पञ्चाशीतिवर्षसहस्रोपलक्षणकालावसाने भगवन्नारायणांशेन परशुरामेणोपसंहृतः

yaśca pañcāśītivarṣasahasropalakṣaṇakālāvasāne bhagavannārāyaṇāṁśena paraśurāmeṇopasaṁhṛtaḥ

पचासी हजार वर्षों की उस अवधि के अंत में उस कार्तवीर्य का संहार भगवान नारायण के अंशावतार परशुराम द्वारा किया गया।

श्लोक 21 (vishnu.4.11.21)

तस्य च पुत्रशतप्रधानाः पञ्चपुत्रा बभूवुः शूरशूरसेनवृषसेनमधुजयध्वजसंज्ञाः

tasya ca putraśatapradhānāḥ pañcaputrā babhūvuḥ śūraśūrasenavṛṣasenamadhujayadhvajasaṁjñāḥ

उसके सौ पुत्रों में प्रधान पाँच पुत्र थे — शूर, शूरसेन, वृषसेन, मधु और जयध्वज।

श्लोक 22 (vishnu.4.11.22)

जयध्वजात्तालजङ्घः पुत्रोभवत्

jayadhvajāttālajaṅghaḥ putrobhavat

जयध्वज का पुत्र तालजङ्घ हुआ।

श्लोक 23 (vishnu.4.11.23)

तालजङ्घस्य तालजङ्घाख्यं पुत्रशतमासीत्

tālajaṅghasya tālajaṅghākhyaṁ putraśatamāsīt

तालजङ्घ के तालजङ्घ नाम से प्रसिद्ध सौ पुत्र हुए।

श्लोक 24 (vishnu.4.11.24)

एषां ज्येष्ठे वीतिहोत्रस्तथान्यो भरतः

eṣāṁ jyeṣṭhe vītihotrastathānyo bharataḥ

इनमें ज्येष्ठ वीतिहोत्र था, और दूसरा भरत।

श्लोक 25 (vishnu.4.11.25)

भरताद्वृषः

bharatādvṛṣaḥ

भरत से वृष उत्पन्न हुआ।

श्लोक 26 (vishnu.4.11.26)

वृषस्य पुत्रो मधुरभवत्

vṛṣasya putro madhurabhavat

वृष का पुत्र मधु हुआ।

श्लोक 27 (vishnu.4.11.27)

तस्यापि वृष्णिप्रमुखंपुत्रशतमासीत्

tasyāpi vṛṣṇipramukhaṁputraśatamāsīt

उसके भी वृष्णि आदि सौ पुत्र हुए।

श्लोक 28 (vishnu.4.11.28)

यतो वृष्णिसंज्ञामेतद्गोत्रमवाप

yato vṛṣṇisaṁjñāmetadgotramavāpa

उसी वृष्णि से इस गोत्र को वृष्णि नाम प्राप्त हुआ।

श्लोक 29 (vishnu.4.11.29)

मधुसंज्ञाहेतुश्च मधुरभवत्

madhusaṁjñāhetuśca madhurabhavat

मधु ही इस वंश के माधव नाम का भी कारण हुआ।

श्लोक 30 (vishnu.4.11.30)

यादवाश्च यदुनामोपलक्षणादिति

yādavāśca yadunāmopalakṣaṇāditi

और यदु के नाम से ही ये सब यादव कहलाए।

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