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चतुर्थांश · अध्याय 13

स्यमंतक मणि की कथा

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (vishnu.4.13.1)

श्रीपराशर उवाच । भजनभजमानदिव्यांधकदेवावृधमहाभोजवृष्णिसंज्ञास्सत्वतस्य पुत्रा बभूवुः । भजमानस्य निमिकृकणवृष्णयस्तथान्ये द्वैमात्राः शतजित्सहस्रजिदयुतजित्संज्ञास्त्रयः । देवावृधस्यापि बभ्रुः पुत्रोऽभवत् । तयोश्चायं श्लोको गीयते ।

śrīparāśara uvāca bhajanabhajamānadivyāṁdhakadevāvṛdhamahābhojavṛṣṇisaṁjñāssatvatasya putrā babhūvuḥ bhajamānasya nimikṛkaṇavṛṣṇayastathānye dvaimātrāḥ śatajitsahasrajidayutajitsaṁjñāstrayaḥ devāvṛdhasyāpi babhruḥ putro'bhavat tayoścāyaṁ śloko gīyate

पराशर जी ने कहा — भजिन, भजमान, दिव्य, अंधक, देवावृध, महाभोज और वृष्णि नामक सात्वत के पुत्र हुए। भजमान के दो पत्नियों से निमि, कृकण और वृष्णि, तथा अन्य तीन — शतजित्, सहस्रजित् और अयुतजित् नामक पुत्र हुए। देवावृध का भी बभ्रु नामक पुत्र हुआ। उन दोनों के विषय में यह श्लोक गाया जाता है —

श्लोक 2 (vishnu.4.13.2)

यथैव शृणुमो दूरात्संपश्यामस्तथांतिकात् । बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधस्समः । पुरुषाः षट् च षष्टिश्च सहस्राणि तथाऽष्ट ये । तेऽमृतत्वमनुप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि । महाभोजस्त्वतिधर्मात्मा तस्यान्वये भोजाः मृत्तिकावरपुरनिवासिनो मार्त्तिकावरा बभूवुः ।

yathaiva śṛṇumo dūrātsaṁpaśyāmastathāṁtikāt babhruḥ śreṣṭho manuṣyāṇāṁ devairdevāvṛdhassamaḥ puruṣāḥ ṣaṭ ca ṣaṣṭiśca sahasrāṇi tathā'ṣṭa ye te'mṛtatvamanuprāptā babhrordevāvṛdhādapi mahābhojastvatidharmātmā tasyānvaye bhojāḥ mṛttikāvarapuranivāsino mārttikāvarā babhūvuḥ

जैसे हम दूर से सुनते हैं वैसे ही निकट से भी देखते हैं — बभ्रु मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं, देवावृध देवताओं के समान हैं। छाछठ हजार आठ पुरुष बभ्रु और देवावृध के प्रभाव से अमरत्व को प्राप्त हुए। महाभोज अत्यंत धर्मात्मा थे; उनके वंश में मृत्तिकावर नगर के निवासी मार्त्तिकावर भोज हुए।

श्लोक 3 (vishnu.4.13.3)

वृष्णे सुमित्रो युधाजिच्च पुत्रावभूताम् । ततश्चानमित्रः तथानमित्रान्निघ्नः । निघ्नस्य प्रसेन सत्राजितौ । तस्य च सत्राजितो भगवानादित्यः सखाऽभवत् ।

vṛṣṇe sumitro yudhājicca putrāvabhūtām tataścānamitraḥ tathānamitrānnighnaḥ nighnasya prasena satrājitau tasya ca satrājito bhagavānādityaḥ sakhā'bhavat

वृष्णि से सुमित्र और युधाजित् नामक दो पुत्र हुए। उनसे अनमित्र, और अनमित्र से निघ्न हुआ। निघ्न के प्रसेन और सत्राजित् नामक दो पुत्र हुए। उस सत्राजित् के भगवान सूर्य मित्र थे।

श्लोक 4 (vishnu.4.13.4)

एकदा त्वंभोनिधितीरसंश्रयः सूर्यं सत्राजित्तुष्टाव तन्मनस्कतया च भास्वानभिष्टूयमानोऽग्रतस्तस्थौ । ततस्त्वस्पष्टमूर्त्तिधरं चैनमालोक्य सत्राजित्सूर्यमाह । यथैव व्योम्नि वह्निपिंडोपमं त्वामहमपश्यं तथैवाद्याग्रतो गतमप्यत्र भगवता किंचिन्न प्रसादीकृतं विशेषमुपलक्षयामीत्येवमुक्ते भगवता सूर्येण निजकंठादुन्मुच्य स्यमंतकं नाम महामणिवरमवतार्यैकान्ते न्यस्तम् ।

ekadā tvaṁbhonidhitīrasaṁśrayaḥ sūryaṁ satrājittuṣṭāva tanmanaskatayā ca bhāsvānabhiṣṭūyamāno'gratastasthau tatastvaspaṣṭamūrttidharaṁ cainamālokya satrājitsūryamāha yathaiva vyomni vahnipiṁḍopamaṁ tvāmahamapaśyaṁ tathaivādyāgrato gatamapyatra bhagavatā kiṁcinna prasādīkṛtaṁ viśeṣamupalakṣayāmītyevamukte bhagavatā sūryeṇa nijakaṁṭhādunmucya syamaṁtakaṁ nāma mahāmaṇivaramavatāryaikānte nyastam

एक बार समुद्र के तट पर बैठे सत्राजित् ने सूर्य की स्तुति की; उसके मन की उस भक्ति से प्रसन्न होकर तेजस्वी सूर्य स्तुति किए जाते हुए उसके सामने आ खड़े हुए। तब उनके अस्पष्ट (चमक से छिपे) रूप को देखकर सत्राजित् ने सूर्य से कहा — 'जैसे आकाश में मैं आपको अग्नि-पिंड के समान देखता था, वैसे ही आज सामने आने पर भी भगवान ने मुझे कोई विशेष दर्शन नहीं दिया, ऐसा मुझे प्रतीत होता है।' यह सुनकर भगवान सूर्य ने अपने कंठ से स्यमंतक नामक महान मणि को उतारकर एक ओर रख दिया।

श्लोक 5 (vishnu.4.13.5)

ततस्तमाताम्रोज्ज्वलं ह्रस्ववपुषमीषदापिंगलनयनमादित्यमद्रा क्षीत् । कृतप्रणिपातस्तवादिकं च सत्राजितमाह भगवानादित्यस्सहस्रदीधितिः वरमस्मत्तोभिमतं वृणीष्वेति । स च तदेव मणिरत्नमयाचत । स चापि तस्मै तद्दत्त्वा दीधितिपतिर्वियति स्वधिष्ण्यमारुरोह ।

tatastamātāmrojjvalaṁ hrasvavapuṣamīṣadāpiṁgalanayanamādityamadrā kṣīt kṛtapraṇipātastavādikaṁ ca satrājitamāha bhagavānādityassahasradīdhitiḥ varamasmattobhimataṁ vṛṇīṣveti sa ca tadeva maṇiratnamayācata sa cāpi tasmai taddattvā dīdhitipatirviyati svadhiṣṇyamāruroha

तब सत्राजित् ने उस ताम्र-वर्ण से उज्ज्वल, ह्रस्व शरीर वाले, कुछ पिंगल नेत्रों वाले आदित्य को देखा। प्रणाम करके उनकी स्तुति करने पर सहस्र किरणों वाले भगवान सूर्य ने सत्राजित् से कहा — 'हमसे अभीष्ट वर मांगो।' उसने वही मणिरत्न मांगा। सूर्य ने भी उसे वह देकर आकाश में अपने स्थान पर आरोहण किया।

श्लोक 6 (vishnu.4.13.6)

सत्राजितोऽप्यमलमणिरत्नसनाथकंठतया सूर्य इव तेजोभिरशेषदिगंतराण्युद्भासयन् द्वारकां विवेश । द्वारकावासी जनस्तु तमायांतमवेक्ष्य भगवंतमादिपुरुषं पुरुषोत्तममवनिभारावतरणायांशेन मानुषरूपधारिणं प्रणिपत्याह । भगवन् भवंतं द्रष्ट्रं नूनमयमादित्य आयातीत्युक्तो भगवानुवाच ।

satrājito'pyamalamaṇiratnasanāthakaṁṭhatayā sūrya iva tejobhiraśeṣadigaṁtarāṇyudbhāsayan dvārakāṁ viveśa dvārakāvāsī janastu tamāyāṁtamavekṣya bhagavaṁtamādipuruṣaṁ puruṣottamamavanibhārāvataraṇāyāṁśena mānuṣarūpadhāriṇaṁ praṇipatyāha bhagavan bhavaṁtaṁ draṣṭraṁ nūnamayamāditya āyātītyukto bhagavānuvāca

सत्राजित् भी उस निर्मल मणिरत्न से सुशोभित कंठ के कारण सूर्य के समान तेज से समस्त दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ द्वारका में प्रविष्ट हुआ। द्वारका के निवासी लोगों ने उसे आते देख, अवनि का भार उतारने के लिए अंश से मनुष्य-रूप धारण किए हुए आदिपुरुष पुरुषोत्तम भगवान को प्रणाम कर कहा — 'हे भगवन्! निश्चय ही यह आदित्य आपके दर्शन हेतु आ रहे हैं,' ऐसा सुनकर भगवान बोले —

श्लोक 7 (vishnu.4.13.7)

भगवान्नायमादित्यः सत्राजितोऽयमादित्यदत्तस्यमंतकाख्यं महामणिरत्नं बिभ्रदत्रोपयाति । तदेनं विस्त्रब्धाः पश्यतेत्युक्तास्ते तथैव ददृशुः । स च तं स्यमंतकमणिमात्मनिवेशने चक्रे । प्रतिदिनं तन्मणिरत्नमष्टौ कनकभारान्स्त्रवति ।

bhagavānnāyamādityaḥ satrājito'yamādityadattasyamaṁtakākhyaṁ mahāmaṇiratnaṁ bibhradatropayāti tadenaṁ vistrabdhāḥ paśyatetyuktāste tathaiva dadṛśuḥ sa ca taṁ syamaṁtakamaṇimātmaniveśane cakre pratidinaṁ tanmaṇiratnamaṣṭau kanakabhārānstravati

'यह आदित्य नहीं है, भगवन्! यह सत्राजित् है, जो आदित्य द्वारा दिया गया स्यमंतक नामक महामणि धारण किए यहाँ आ रहा है। निश्शंक होकर इसे देखो' — ऐसा कहे जाने पर उन्होंने वैसा ही देखा। उसने उस स्यमंतक महामणि को अपने घर में रख दिया। वह मणिरत्न प्रतिदिन आठ भार सोना बरसाता था।

श्लोक 8 (vishnu.4.13.8)

तत्प्रभावाच्च सकलस्यैव राष्ट्रस्योपसर्गानावृष्टिव्यालाग्नितो यद्दुर्भिक्षादिभयं न भवति । अच्युतोऽपि तद्दिव्यं रत्नमुग्रसेनस्य भूपतेर्योग्यमेतदिति लिप्सां चक्रे गोत्रभेदभयाच्छक्तोपि न जहार । सत्राजिदप्यच्युतो मामेतद्याचयिष्यतीत्यवगम्य रत्नलोभाद्भ्रात्रे प्रसेनाय तद्रत्नमदात् ।

tatprabhāvācca sakalasyaiva rāṣṭrasyopasargānāvṛṣṭivyālāgnito yaddurbhikṣādibhayaṁ na bhavati acyuto'pi taddivyaṁ ratnamugrasenasya bhūpateryogyametaditi lipsāṁ cakre gotrabhedabhayācchaktopi na jahāra satrājidapyacyuto māmetadyācayiṣyatītyavagamya ratnalobhādbhrātre prasenāya tadratnamadāt

उसके प्रभाव से समस्त राष्ट्र में अनावृष्टि, सर्प, अग्नि आदि उपद्रवों से जो दुर्भिक्ष आदि भय होता है, वह नहीं होता था। भगवान कृष्ण ने भी सोचा कि वह दिव्य रत्न उग्रसेन राजा के योग्य है, ऐसा विचार कर उसे पाने की इच्छा की; किंतु गोत्र में भेद होने के भय से समर्थ होते हुए भी उन्होंने उसे बलपूर्वक नहीं लिया। सत्राजित् ने भी सोचा कि अच्युत मुझसे यह मांग लेंगे, ऐसी रत्न-लोभ से भरी आशंका से उसने वह रत्न अपने भाई प्रसेन को दे दिया।

श्लोक 9 (vishnu.4.13.9)

तच्च शुचिना ध्रियमाणमशेषमेव सुवर्णस्रवादिकं गुणजातमुत्पादयति अन्यथा धारयंतमेव हंतीत्यजानन्नसावपि प्रसेनस्तेन कंठसक्तेन स्यमंतकेनाश्वमारुह्याटव्यां मृगयामगच्छत् । तत्र च सिंहाद्वधमवाप । साश्वं च तं निहत्य सिंहोप्यमलमणिरत्नमास्याग्रेणादाय गंतुमभ्युद्यतः ऋक्षाधिपतिना जांबवता दृष्टो घातितश्च ।

tacca śucinā dhriyamāṇamaśeṣameva suvarṇasravādikaṁ guṇajātamutpādayati anyathā dhārayaṁtameva haṁtītyajānannasāvapi prasenastena kaṁṭhasaktena syamaṁtakenāśvamāruhyāṭavyāṁ mṛgayāmagacchat tatra ca siṁhādvadhamavāpa sāśvaṁ ca taṁ nihatya siṁhopyamalamaṇiratnamāsyāgreṇādāya gaṁtumabhyudyataḥ ṛkṣādhipatinā jāṁbavatā dṛṣṭo ghātitaśca

वह मणि, पवित्र पुरुष द्वारा धारण किए जाने पर संपूर्ण स्वर्ण-वर्षा आदि गुण उत्पन्न करता था; परंतु अन्यथा, जो कोई उसे धारण करे, उसी को मार डालता था — यह न जानते हुए प्रसेन उस कंठ में बंधे स्यमंतक के साथ घोड़े पर चढ़कर वन में मृगया के लिए निकल गया। वहाँ उसकी सिंह द्वारा मृत्यु हो गई। घोड़े सहित उसे मारकर सिंह भी उस निर्मल मणिरत्न को मुख में लेकर जाने ही वाला था कि ऋक्षों के राजा जांबवान ने उसे देखकर मार डाला।

श्लोक 10 (vishnu.4.13.10)

जांबवानप्यमलमणिरत्नमादाय स्वबिलं प्रविवेश । सुकुमारसंज्ञाय बालकाय च क्रीडनकमकरोत् । अनागच्छति तस्मिन्प्रसेने कृष्णो मणिरत्नमभिलषितवान्स च प्राप्तनान्नूनमेतदस्य कर्मेत्यखिल एव यदुलोकः परस्परं कर्णाकर्ण्याऽकथयत् ।

jāṁbavānapyamalamaṇiratnamādāya svabilaṁ praviveśa sukumārasaṁjñāya bālakāya ca krīḍanakamakarot anāgacchati tasminprasene kṛṣṇo maṇiratnamabhilaṣitavānsa ca prāptanānnūnametadasya karmetyakhila eva yadulokaḥ parasparaṁ karṇākarṇyā'kathayat

जांबवान भी उस निर्मल मणिरत्न को लेकर अपनी गुफा में प्रविष्ट हो गया और सुकुमारक नामक बालक को खेलने के लिए दे दिया। प्रसेन के वापस न लौटने पर कृष्ण ने उस मणिरत्न की इच्छा की — 'निश्चय ही यह इसी का काम है,' ऐसा समस्त यदुलोक आपस में कानाफूसी करने लगा।

श्लोक 11 (vishnu.4.13.11)

विदितलोकापवादवृत्तांतश्च भगवान् सर्वयदुसैन्यपरिवारपरिवृतः प्रसेनाश्वपदवीमनुससार । ददर्श चाश्वसमवेतं प्रसेनं सिंहेन विनिहतम् । अखिलजनमध्ये सिंहपददर्शनकृतपरिशुद्धः सिंहपदमनुससार । ऋक्षपतिनिहतं च सिंहमप्यल्पे भूमिभागे दृष्ट्वा ततश्च तद्रत्नगौरवादृक्षस्यापि पदान्यनुययौ ।

viditalokāpavādavṛttāṁtaśca bhagavān sarvayadusainyaparivāraparivṛtaḥ prasenāśvapadavīmanusasāra dadarśa cāśvasamavetaṁ prasenaṁ siṁhena vinihatam akhilajanamadhye siṁhapadadarśanakṛtapariśuddhaḥ siṁhapadamanusasāra ṛkṣapatinihataṁ ca siṁhamapyalpe bhūmibhāge dṛṣṭvā tataśca tadratnagauravādṛkṣasyāpi padānyanuyayau

लोकापवाद का यह वृत्तांत जानकर भगवान संपूर्ण यदु-सेना के साथ प्रसेन के घोड़े के पदचिह्नों के मार्ग पर चल पड़े। उन्हें घोड़े सहित प्रसेन सिंह द्वारा मारा हुआ दिखाई दिया। सबके सामने सिंह के पदचिह्न देखकर अपनी शुद्धि करते हुए उन्होंने सिंह के पदचिह्नों का अनुसरण किया। थोड़ी दूर भूमि में ही ऋक्ष द्वारा मारे गए सिंह को देखकर, फिर उस रत्न के महत्त्व से ऋक्ष के भी पदचिह्नों का अनुसरण किया।

श्लोक 12 (vishnu.4.13.12)

गिरितटे च सकलमेव तद्यदुसैन्यमवस्थाप्य तत्पदानुसारी ऋक्षबिलं प्रविवेश । अन्तः प्रविष्टश्च धात्र्याः सुकुमारकमुल्लालयन्त्या वाणीं शुश्राव । अत्र श्लोकः। सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः । सुकुमारकमा रोदीस्तव ह्येष स्यमंतकः ।

giritaṭe ca sakalameva tadyadusainyamavasthāpya tatpadānusārī ṛkṣabilaṁ praviveśa antaḥ praviṣṭaśca dhātryāḥ sukumārakamullālayantyā vāṇīṁ śuśrāva atra ślokaḥ siṁhaḥ prasenamavadhītsiṁho jāmbavatā hataḥ sukumārakamā rodīstava hyeṣa syamaṁtakaḥ

पर्वत की तलहटी में संपूर्ण यदु-सेना को ठहराकर उन पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए वे ऋक्ष की गुफा में प्रविष्ट हुए। भीतर प्रवेश करते ही उन्होंने धाय की सुकुमारक को बहलाती हुई वाणी सुनी। यहाँ एक श्लोक है — 'सिंह ने प्रसेन को मारा, सिंह को जांबवान ने मारा; हे सुकुमारक, मत रो, यह तेरा ही स्यमंतक है।'

श्लोक 13 (vishnu.4.13.13)

इत्याकर्ण्योपलब्धस्यमंतकोदन्तःप्रविष्टः कुमारक्रीडनकीकृतं च धात्र्या हस्ते तेजोभिर्जाज्वल्यमानं स्यमंतकं ददर्श । तं च स्यमंतकाभिलषितचक्षुषमपूर्वपुरुषमागतं समवेक्ष्य धात्री त्राहित्राहीति व्याजहार । तदार्त्तरवश्रवणानंतरं चामर्षपूर्णहृदयः स जांबवानाजगाम ।

ityākarṇyopalabdhasyamaṁtakodantaḥpraviṣṭaḥ kumārakrīḍanakīkṛtaṁ ca dhātryā haste tejobhirjājvalyamānaṁ syamaṁtakaṁ dadarśa taṁ ca syamaṁtakābhilaṣitacakṣuṣamapūrvapuruṣamāgataṁ samavekṣya dhātrī trāhitrāhīti vyājahāra tadārttaravaśravaṇānaṁtaraṁ cāmarṣapūrṇahṛdayaḥ sa jāṁbavānājagāma

यह सुनकर, स्यमंतक का समाचार पाकर, वे भीतर प्रविष्ट हुए और बालक का खिलौना बनाए गए, धाय के हाथ में तेज से जाज्वल्यमान स्यमंतक को देखा। स्यमंतक पर दृष्टि टिकाए इस अपूर्व पुरुष को आया देख धाय 'बचाओ, बचाओ' चिल्ला उठी। उस चीत्कार को सुनते ही क्रोध से भरे हृदय वाला जांबवान वहाँ आ पहुंचा।

श्लोक 14 (vishnu.4.13.14)

तयोश्च परस्परमुद्धतामर्षयोर्युद्धमेकविंशतिदिनान्यभवत् । ते च यदुसैनिकास्तत्र सप्ताष्टादिनानि तन्निष्क्रांतिमुदीक्षमाणास्तस्थुः । अनिष्क्रमणे च मधुरिपुरसाववश्यमत्र बिलेऽत्यंतं नाशमवाप्तो भविष्यत्यन्यथा तस्य जीवतः कथमेतावंति दिनानि शत्रुजये व्याक्षेपो भविष्यतीति कृताध्यवसाया द्वारकामागम्य हतः कृष्ण इति कथयामासुः ।

tayośca parasparamuddhatāmarṣayoryuddhamekaviṁśatidinānyabhavat te ca yadusainikāstatra saptāṣṭādināni tanniṣkrāṁtimudīkṣamāṇāstasthuḥ aniṣkramaṇe ca madhuripurasāvavaśyamatra bile'tyaṁtaṁ nāśamavāpto bhaviṣyatyanyathā tasya jīvataḥ kathametāvaṁti dināni śatrujaye vyākṣepo bhaviṣyatīti kṛtādhyavasāyā dvārakāmāgamya hataḥ kṛṣṇa iti kathayāmāsuḥ

उन दोनों के बीच परस्पर उद्धत क्रोध से युद्ध इक्कीस दिनों तक चलता रहा। यदु-सेना के लोग वहाँ सात-आठ दिनों तक उसके बाहर निकलने की प्रतीक्षा में ठहरे रहे। मधुरिपु (कृष्ण) के बाहर न निकलने पर, यह निश्चय कर कि वे उस गुफा में अवश्य ही मारे गए होंगे — अन्यथा जीवित रहते हुए इतने दिन शत्रु-विजय में विलंब कैसे होता — यह मानकर वे द्वारका लौटकर 'कृष्ण मारे गए' ऐसा कहने लगे।

श्लोक 15 (vishnu.4.13.15)

तद्बांधवाश्च तत्कालोचितमखिलमुत्तरक्रियाकलापं चक्रुः । ततश्चास्य युद्ध्यमानस्यातिश्रद्धादत्तविशिष्टोपपात्रयुक्तान्नतोयादिना श्रीकृष्णस्य बलप्राणपुष्टिरभूत् । इतरस्यानुदिनमतिगुरुपुरुषभेद्यमानस्य अतिनिष्ठुरप्रहारपातपीडिताखिलावयवस्य निराहारतया बलहानिरभूत् ।

tadbāṁdhavāśca tatkālocitamakhilamuttarakriyākalāpaṁ cakruḥ tataścāsya yuddhyamānasyātiśraddhādattaviśiṣṭopapātrayuktānnatoyādinā śrīkṛṣṇasya balaprāṇapuṣṭirabhūt itarasyānudinamatigurupuruṣabhedyamānasya atiniṣṭhuraprahārapātapīḍitākhilāvayavasya nirāhāratayā balahānirabhūt

उनके बांधवों ने उस समय के अनुरूप संपूर्ण उत्तरक्रिया संपन्न की। इधर, अत्यंत श्रद्धा से दिए गए उत्तम पात्रों में रखे अन्न और जल आदि से, जो युद्धरत श्रीकृष्ण को धाय द्वारा दिया जाता रहा, उनके बल और प्राण की पुष्टि होती रही। दूसरी ओर, प्रतिदिन उस महान पुरुष द्वारा घायल किए जाने से, अत्यंत कठोर प्रहारों से पीड़ित समस्त अंगों वाले जांबवान का, निराहार रहने से बल क्षीण होता गया।

श्लोक 16 (vishnu.4.13.16)

निर्जितश्च भगवता जांबवान्प्रणिपत्य व्याजहार । सुरासुरगंधर्वयक्षराक्षसादिभिरप्यखिलैर्भवान्न जेतुं शक्यः किमुतावनिगोचरैरल्पवीर्यैर्नरैर्नरावयवभूतैश्च तिर्यग्योन्यनुसृतिभिः किं पुनरस्मद्विधैरवश्यं भवताऽस्मत्स्वामिना रामेणेव नारायणस्य सकलजगत्परायणस्यांशेन भगवता भवितव्यमित्युक्तस्तस्मै भगवानखिलावनिभारावतरणार्थमवतरणमाचचक्षे ।

nirjitaśca bhagavatā jāṁbavānpraṇipatya vyājahāra surāsuragaṁdharvayakṣarākṣasādibhirapyakhilairbhavānna jetuṁ śakyaḥ kimutāvanigocarairalpavīryairnarairnarāvayavabhūtaiśca tiryagyonyanusṛtibhiḥ kiṁ punarasmadvidhairavaśyaṁ bhavatā'smatsvāminā rāmeṇeva nārāyaṇasya sakalajagatparāyaṇasyāṁśena bhagavatā bhavitavyamityuktastasmai bhagavānakhilāvanibhārāvataraṇārthamavataraṇamācacakṣe

भगवान से पराजित होकर जांबवान ने प्रणाम कर कहा — 'असुर, देव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस आदि समस्त प्राणियों द्वारा भी आप जीते नहीं जा सकते; फिर पृथ्वी पर विचरने वाले अल्पवीर्य मनुष्यों और नर-शरीरधारी पशु-योनि के प्राणियों की तो बात ही क्या, हम-जैसों की तो बात ही क्या — निश्चय ही आप हमारे स्वामी, संपूर्ण जगत के आश्रय नारायण के अंश स्वरूप भगवान ही होंगे, राम के समान' — यह कहे जाने पर भगवान ने उन्हें संपूर्ण अवनि का भार उतारने का अपना अवतार-प्रयोजन बताया।

श्लोक 17 (vishnu.4.13.17)

प्रीत्यभिव्यंजितकरतलस्पर्शनेन चैनमपगतयुद्धखेदं चकार । स च प्रणिपत्य पुनरप्येनं प्रसाद्य जांबवतीं नाम कन्यां गृहागतायार्घ्यभूतां ग्राहयामास । स्यमंतकमणिरत्नमपि प्रणिपत्य तस्मै प्रददौ । अच्युतोप्यतिप्रणतात्तस्मादग्राह्यमपि तन्मणिरत्नमात्मसंशोधनाय जग्राह ।

prītyabhivyaṁjitakaratalasparśanena cainamapagatayuddhakhedaṁ cakāra sa ca praṇipatya punarapyenaṁ prasādya jāṁbavatīṁ nāma kanyāṁ gṛhāgatāyārghyabhūtāṁ grāhayāmāsa syamaṁtakamaṇiratnamapi praṇipatya tasmai pradadau acyutopyatipraṇatāttasmādagrāhyamapi tanmaṇiratnamātmasaṁśodhanāya jagrāha

प्रेम से भरकर हथेली के स्पर्श से उसे आश्वस्त कर उन्होंने उसकी युद्ध की थकान दूर की। उसने भी फिर से प्रणाम कर उन्हें प्रसन्न करते हुए अपनी पुत्री जांबवती को घर आए अतिथि के लिए अर्घ्य-स्वरूप उन्हें ग्रहण करा दी। स्यमंतक मणिरत्न भी उसने प्रणाम कर उन्हें दे दिया। अच्युत ने भी, अत्यंत विनम्र उस भक्त से, अस्वीकार्य होते हुए भी उस मणिरत्न को अपनी शुद्धि के लिए ग्रहण किया।

श्लोक 18 (vishnu.4.13.18)

सह जांबवत्या स द्वारकामाजगाम । भगवदागमनोद्भूतहर्षोत्कर्षस्य द्वारकावासिजनस्य कृष्णावलोकनात्तत्क्षणमेवातिपरिणतवयसोपि नवयौवनमिवाभवत् । दिष्ट्यादिष्ट्येति सकलयादवाः स्त्रियश्च सभाजयामासुः । भगवानपि यथानुभूतमशेष यादवसमाजे यथावदाचचक्षे ।

saha jāṁbavatyā sa dvārakāmājagāma bhagavadāgamanodbhūtaharṣotkarṣasya dvārakāvāsijanasya kṛṣṇāvalokanāttatkṣaṇamevātipariṇatavayasopi navayauvanamivābhavat diṣṭyādiṣṭyeti sakalayādavāḥ striyaśca sabhājayāmāsuḥ bhagavānapi yathānubhūtamaśeṣa yādavasamāje yathāvadācacakṣe

जांबवती के साथ वे द्वारका लौट आए। भगवान के आगमन से उत्पन्न अत्यधिक हर्ष के कारण द्वारकावासी लोग कृष्ण को देखते ही, जैसे अत्यंत वृद्धावस्था वाले भी उसी क्षण नवयौवन से युक्त हो गए हों, ऐसा अनुभव करने लगे। 'धन्य हैं, धन्य हैं' कहकर संपूर्ण यादव और स्त्रियां उनका सम्मान करने लगीं। भगवान ने भी जैसा अनुभव किया था, वैसा ही संपूर्ण यादव-समाज में यथावत बता दिया।

श्लोक 19 (vishnu.4.13.19)

स्यमंतकं च सत्राजिताय दत्त्वा मिथ्याभिशस्तिपरिशुद्धिमवाप । जांबवतीं चांतःपुरे निवेशयामास । सत्राजितोपि मयास्याभूतमलिनमारोपितमिति जातसंत्रासात्स्वसुतां सत्यभामां भगवते भार्यार्थं ददौ । तां चाक्रूरकृतवर्मशतधन्वप्रमुखा यादवाः प्राग्वरयाम्बभूवुः ।

syamaṁtakaṁ ca satrājitāya dattvā mithyābhiśastipariśuddhimavāpa jāṁbavatīṁ cāṁtaḥpure niveśayāmāsa satrājitopi mayāsyābhūtamalinamāropitamiti jātasaṁtrāsātsvasutāṁ satyabhāmāṁ bhagavate bhāryārthaṁ dadau tāṁ cākrūrakṛtavarmaśatadhanvapramukhā yādavāḥ prāgvarayāmbabhūvuḥ

स्यमंतक मणि सत्राजित् को लौटाकर उन्होंने अपने ऊपर लगे मिथ्या दोषारोपण से शुद्धि प्राप्त की। जांबवती को उन्होंने अंतःपुर में प्रविष्ट कराया। सत्राजित् भी, यह सोचकर कि मैंने ही इन पर व्यर्थ का कलंक मढ़ा है, भयभीत होकर अपनी पुत्री सत्यभामा को भगवान को पत्नी-रूप में दे दिया — जिसे पहले अक्रूर, कृतवर्मा और शतधन्वा आदि यादवों ने मांगा था।

श्लोक 20 (vishnu.4.13.20)

ततस्तत्प्रदानादवज्ञातमेवात्मानं मन्यमानाः सत्राजिते वैरानुबंधं चक्रुः । अक्रूरकृतवर्मप्रमुखाश्च शतधन्वानमूचुः । अयमतीव दुरात्मा सत्राजितो योऽस्माभिर्भवता च प्रार्थितोऽप्यात्मजामस्मान् भवंतं चाविगणय्य कृष्णाय दत्तवान् ।

tatastatpradānādavajñātamevātmānaṁ manyamānāḥ satrājite vairānubaṁdhaṁ cakruḥ akrūrakṛtavarmapramukhāśca śatadhanvānamūcuḥ ayamatīva durātmā satrājito yo'smābhirbhavatā ca prārthito'pyātmajāmasmān bhavaṁtaṁ cāvigaṇayya kṛṣṇāya dattavān

उस विवाह-दान से स्वयं को अपमानित मानते हुए उन्होंने सत्राजित् से वैर बांध लिया। अक्रूर, कृतवर्मा आदि ने शतधन्वा से कहा — 'यह सत्राजित् अत्यंत दुरात्मा है, जिसने हम सबके और आपके निवेदन करने पर भी हम सबकी उपेक्षा कर अपनी पुत्री कृष्ण को दे दी।'

श्लोक 21 (vishnu.4.13.21)

तदलमनेन जीवता घातयित्वैनं तन्महारत्नं स्यमंतकाख्यं त्वया किं न गृह्यते वयमभ्युपपत्स्यामो यद्यच्युतस्तवोपरि वैरानुबंधं करिष्यतीत्येवमुक्तस्तथेत्यसावप्याह । जतुगृहदग्धानां पांडुतनयानां विदितपरमार्थोऽपि भगवान् दुर्योधनप्रयत्नशैथिल्यकरणार्थं पार्थानुकूल्यकरणाय वारणावतं गतः ।

tadalamanena jīvatā ghātayitvainaṁ tanmahāratnaṁ syamaṁtakākhyaṁ tvayā kiṁ na gṛhyate vayamabhyupapatsyāmo yadyacyutastavopari vairānubaṁdhaṁ kariṣyatītyevamuktastathetyasāvapyāha jatugṛhadagdhānāṁ pāṁḍutanayānāṁ viditaparamārtho'pi bhagavān duryodhanaprayatnaśaithilyakaraṇārthaṁ pārthānukūlyakaraṇāya vāraṇāvataṁ gataḥ

अतः इस जीवित रहते हुए क्या प्रयोजन है — इसे मारकर वह महारत्न तुम क्यों नहीं ले लेते? यदि अच्युत तुम्हारे विरुद्ध वैर बांधेंगे तो हम भी तुम्हारा साथ देंगे' — ऐसा कहे जाने पर उसने 'ऐसा ही करूंगा' कहा। इधर, लाक्षागृह में जलाए गए पांडु-पुत्रों की वास्तविकता जानते हुए भी भगवान, दुर्योधन के प्रयत्न को शिथिल करने और पार्थों के अनुकूल कार्य करने के लिए वारणावत गए।

श्लोक 22 (vishnu.4.13.22)

गते च तस्मिन् सुप्तमेव सत्राजितं शतधन्वा जघान मणिरत्नं चाददात् । पितृवधामर्षपूर्णा च सत्यभामा शीघ्रं स्यंदनमारूढा वारणावतं गत्वा भगवतेऽहं प्रतिपादितेत्यक्षांतिमता शतधन्वनाऽस्मत्पिता व्यापादितः तच्च स्यमंतकमणिरत्नमपहृतं यस्यावभासनेनापहृततिमिरं त्रैलोक्यं भविष्यति ।

gate ca tasmin suptameva satrājitaṁ śatadhanvā jaghāna maṇiratnaṁ cādadāt pitṛvadhāmarṣapūrṇā ca satyabhāmā śīghraṁ syaṁdanamārūḍhā vāraṇāvataṁ gatvā bhagavate'haṁ pratipāditetyakṣāṁtimatā śatadhanvanā'smatpitā vyāpāditaḥ tacca syamaṁtakamaṇiratnamapahṛtaṁ yasyāvabhāsanenāpahṛtatimiraṁ trailokyaṁ bhaviṣyati

उनके चले जाने पर शतधन्वा ने सोए हुए सत्राजित् को मार डाला और मणिरत्न ले लिया। पिता-वध से क्रोध से भरी सत्यभामा तुरंत रथ पर चढ़कर वारणावत गई और भगवान से बोली — 'मैं जिनके यहाँ ब्याही गई, वे मेरे पिता असहनशील शतधन्वा द्वारा मार डाले गए, और वह स्यमंतक मणिरत्न भी छीन लिया गया है, जिसके प्रकाश से त्रैलोक्य का अंधकार दूर होता।'

श्लोक 23 (vishnu.4.13.23)

तदियं त्वदीयापहासना तदालोच्य यदत्र युक्तं तत्क्रियतामिति कृष्णमाह । तया चैवमुक्तः परितुष्टांतः करणोऽपि कृष्णः सत्यभामाममर्षताम्रनयनः प्राह । सत्ये सत्यं ममैवैषापहासना नाहमेतां तस्य दुरात्मनस्सहिष्ये । न ह्यनुल्लंघ्य परपादपं तत्कृतनीडाश्रयिणो विहंगमा वध्यंते तदलममुनास्मत्पुरतः सौकप्रोरितवाक्यपरिकरेणेत्युक्त्वा द्वारकामभ्येत्यैकांते बलदेवं वासुदेवः प्राह ।

tadiyaṁ tvadīyāpahāsanā tadālocya yadatra yuktaṁ tatkriyatāmiti kṛṣṇamāha tayā caivamuktaḥ parituṣṭāṁtaḥ karaṇo'pi kṛṣṇaḥ satyabhāmāmamarṣatāmranayanaḥ prāha satye satyaṁ mamaivaiṣāpahāsanā nāhametāṁ tasya durātmanassahiṣye na hyanullaṁghya parapādapaṁ tatkṛtanīḍāśrayiṇo vihaṁgamā vadhyaṁte tadalamamunāsmatpurataḥ saukaproritavākyaparikareṇetyuktvā dvārakāmabhyetyaikāṁte baladevaṁ vāsudevaḥ prāha

'यह तुम्हारी ही उपहासित दशा है — इस पर विचार कर जो उचित हो वह करो,' ऐसा उसने कृष्ण से कहा। इस प्रकार कहे जाने पर, यद्यपि अंतःकरण में संतुष्ट थे, फिर भी क्रोध से ताम्र-वर्ण नेत्रों वाले कृष्ण ने सत्यभामा से कहा — 'सत्ये! यह उपहास मेरा ही है, मैं उस दुरात्मा का यह अपमान सहन नहीं करूंगा। जैसे दूसरे के वृक्ष का उल्लंघन किए बिना उसमें घोंसला बनाने वाले पक्षी नहीं मारे जाते' — यह कहकर द्वारका आकर उन्होंने एकांत में बलदेव से यह बात कही —

श्लोक 24 (vishnu.4.13.24)

मृगयागतं प्रसेनमटव्यां मृगपतिर्जघान । सत्राजितोऽप्यधुना शतधन्वना निधनं प्रापितः । तदुभयविनाशात्तन्मणिरत्नमावाभ्यां सामान्यं भविष्यति । तदुत्तिष्ठारुह्यतां रथः शतधन्वनिधनायोद्यमं कुर्वित्यभिहितस्तथेति समन्विच्छितवान् ।

mṛgayāgataṁ prasenamaṭavyāṁ mṛgapatirjaghāna satrājito'pyadhunā śatadhanvanā nidhanaṁ prāpitaḥ tadubhayavināśāttanmaṇiratnamāvābhyāṁ sāmānyaṁ bhaviṣyati taduttiṣṭhāruhyatāṁ rathaḥ śatadhanvanidhanāyodyamaṁ kurvityabhihitastatheti samanvicchitavān

'मृगया के लिए गए प्रसेन को वन में सिंह ने मार डाला, सत्राजित् भी अब शतधन्वा द्वारा मार डाले गए हैं। इन दोनों के नाश से वह मणिरत्न हम दोनों का साझा अधिकार होगा। अतः उठो, रथ पर सवार हो, शतधन्वा के वध का प्रयत्न करो' — ऐसा कहे जाने पर उन्होंने 'ऐसा ही हो' कहकर सहमति दी।

श्लोक 25 (vishnu.4.13.25)

कृतोद्यमौ च तावुभावुपलभ्य शतधन्वा कृतवर्माणमुपेत्य पार्ष्णिपूरणकर्मनिमित्तमचोदयत् । आह चैनं कृतवर्मा । नाऽहं बलदेववासुदेवाभ्यां सह विरोधायालमित्युक्तश्चाक्रूरमचोदयत् । असावप्याह ।

kṛtodyamau ca tāvubhāvupalabhya śatadhanvā kṛtavarmāṇamupetya pārṣṇipūraṇakarmanimittamacodayat āha cainaṁ kṛtavarmā nā'haṁ baladevavāsudevābhyāṁ saha virodhāyālamityuktaścākrūramacodayat asāvapyāha

तैयार होकर उन दोनों को देखकर शतधन्वा ने कृतवर्मा के पास जाकर सहायता के लिए प्रेरित किया। कृतवर्मा ने उससे कहा — 'मैं बलदेव और वासुदेव के विरुद्ध जाने में समर्थ नहीं हूं,' ऐसा कहे जाने पर उसने अक्रूर को प्रेरित किया। अक्रूर ने भी कहा —

श्लोक 26 (vishnu.4.13.26)

न हि कश्चिद्भगवता पादप्रहारपरिकंपितजगत्त्रयेण सुररिषुवनितावैधव्यकारिणा प्रबलरिपुचक्राप्रतिहतचक्रेण चक्रिणा मदमुदितनयनावलोकनाखिलनिशातनेनातिगुरुवैरिवारणापकर्षणा-विकृतमहिमोरुसीरेम सीरिणा च सह सकलजगद्वंद्यानाममरवराणामपि योद्धुं समर्थः ।

na hi kaścidbhagavatā pādaprahāraparikaṁpitajagattrayeṇa surariṣuvanitāvaidhavyakāriṇā prabalaripucakrāpratihatacakreṇa cakriṇā madamuditanayanāvalokanākhilaniśātanenātiguruvairivāraṇāpakarṣaṇā-vikṛtamahimorusīrema sīriṇā ca saha sakalajagadvaṁdyānāmamaravarāṇāmapi yoddhuṁ samarthaḥ

'जिनके पैर के एक प्रहार से त्रिलोकी कांप उठती है, जो असुरों की श्रेष्ठ नगरियों की स्त्रियों को विधवा बनाने वाले हैं, जिनका चक्र प्रबल शत्रु-समूह द्वारा भी अप्रतिहत रहता है, जिनकी मद-भरी दृष्टिपात से ही शत्रु-सेनाएं विनष्ट हो जाती हैं, जिनकी शक्ति महान वैरी-गजों के आकर्षण से प्रकट होती है, ऐसे बलराम के साथ, संपूर्ण जगत द्वारा वंदनीय देवश्रेष्ठों के लिए भी युद्ध करना संभव नहीं है —

श्लोक 27 (vishnu.4.13.27)

किमुताहं तदन्यश्शरणमभिलष्यतामित्युक्तश्शतधनुराह । यद्यस्मत्परित्राणासमर्थं भवानात्मानमधिगच्छति तदयमस्मत्तस्तावन्मणिः संगृह्य रक्ष्यतामिति । एकमुक्तः सोऽप्याह । यद्यंत्ययामप्यवस्थायां न कस्मैचिद्भवान् कथयिष्यति तदहमेतं ग्रहीष्यामीति ।

kimutāhaṁ tadanyaśśaraṇamabhilaṣyatāmityuktaśśatadhanurāha yadyasmatparitrāṇāsamarthaṁ bhavānātmānamadhigacchati tadayamasmattastāvanmaṇiḥ saṁgṛhya rakṣyatāmiti ekamuktaḥ so'pyāha yadyaṁtyayāmapyavasthāyāṁ na kasmaicidbhavān kathayiṣyati tadahametaṁ grahīṣyāmīti

'तो फिर मैं क्या करूं? किसी और की शरण खोजो,' ऐसा कहे जाने पर शतधन्वा ने कहा — 'यदि तुम अपने आप को हमारी रक्षा में असमर्थ मानते हो, तो यह मणि लेकर इसकी रक्षा करो।' यह कहे जाने पर उसने भी कहा — 'यदि अंतिम अवस्था में भी तुम इसे किसी को नहीं बताओगे, तो मैं इसे ले लूंगा।'

श्लोक 28 (vishnu.4.13.28)

तथेत्युक्ते चाक्रूरस्तन्मणिरत्नं जग्राह । शतधनुरप्य तुलवेगां शतयोजनवाहिनीं वडवामारुह्यापक्रांतः । शैव्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकाश्वचतुष्टययुक्तरथस्थितौ बलदेववासुदेवौ तमनुप्रयातौ । सा च वडवा शतयोजनप्रमाणमार्गमतीता पुनरपि वाह्यमाना मिथिलावनोद्देशे प्राणानुत्ससर्ज ।

tathetyukte cākrūrastanmaṇiratnaṁ jagrāha śatadhanurapya tulavegāṁ śatayojanavāhinīṁ vaḍavāmāruhyāpakrāṁtaḥ śaivyasugrīvameghapuṣpabalāhakāśvacatuṣṭayayuktarathasthitau baladevavāsudevau tamanuprayātau sā ca vaḍavā śatayojanapramāṇamārgamatītā punarapi vāhyamānā mithilāvanoddeśe prāṇānutsasarja

'ऐसा ही होगा' कहे जाने पर अक्रूर ने वह मणिरत्न ले लिया। शतधन्वा भी अतुल वेग वाली, सौ योजन तक चलने वाली घोड़ी पर सवार होकर भाग गया। शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक — इन चार घोड़ों से युक्त रथ पर बैठे बलदेव और वासुदेव उसके पीछे चल पड़े। वह घोड़ी सौ योजन का मार्ग पार कर, फिर भी चलाई जाने पर, मिथिला वन के प्रदेश में प्राण त्याग गई।

श्लोक 29 (vishnu.4.13.29)

शतधनुरपि तां परित्यज्य पदातिरेवाद्रवत् । कृष्णोपि बलभद्रमाह । तावदत्र स्यंदने भवता स्थेयमहमेनमधमाचारं पदातिरेव पदातिमनुगम्य यावद्घातयामि अत्र हि भूभागे दृष्टदोषास्सभया अतो नैतेश्वा भवतेमं भूमिभागमुल्लंघनीयाः ।

śatadhanurapi tāṁ parityajya padātirevādravat kṛṣṇopi balabhadramāha tāvadatra syaṁdane bhavatā stheyamahamenamadhamācāraṁ padātireva padātimanugamya yāvadghātayāmi atra hi bhūbhāge dṛṣṭadoṣāssabhayā ato naiteśvā bhavatemaṁ bhūmibhāgamullaṁghanīyāḥ

शतधन्वा भी उसे छोड़कर पैदल ही भागने लगा। कृष्ण ने बलभद्र से कहा — 'तुम यहीं रथ पर रहो, मैं इस अधम आचरण वाले का पैदल ही पीछा कर, जब तक इसे मार न दूं तब तक जाता हूं। इस भूभाग में घोड़ों के लिए दोष देखा गया है, अतः ये घोड़े तुम्हारे द्वारा इस भूभाग को लांघकर आगे नहीं ले जाए जाने चाहिए।'

श्लोक 30 (vishnu.4.13.30)

तथेत्युक्त्वा बलदेवो रथ एव तस्थौ । कृष्णोपि द्विक्रोशमात्रं भूमिभागमनुसृत्य दूरस्थितस्यैव चक्रं क्षिप्त्वा शतधनुषश्शिरश्चिच्छेद । तच्छरीरांबरादिषु च बहुप्रकारमन्विच्छन्नपि स्यमंतकमणिं नावाप पदा तदोपगम्य बलभद्रमाह ।

tathetyuktvā baladevo ratha eva tasthau kṛṣṇopi dvikrośamātraṁ bhūmibhāgamanusṛtya dūrasthitasyaiva cakraṁ kṣiptvā śatadhanuṣaśśiraściccheda taccharīrāṁbarādiṣu ca bahuprakāramanvicchannapi syamaṁtakamaṇiṁ nāvāpa padā tadopagamya balabhadramāha

'ऐसा ही हो' कहकर बलदेव रथ में ही रुके रहे। कृष्ण भी दो कोस मात्र भूभाग का पीछा कर, दूर खड़े हुए ही शतधन्वा पर चक्र फेंककर उसका सिर काट डाला। उसके शरीर और वस्त्रों में बहुत ढूंढने पर भी स्यमंतक मणि न मिलने पर, वे बलभद्र के पास आकर बोले —

श्लोक 31 (vishnu.4.13.31)

वृथैवास्माभिः शतधनुर्घातितः न प्राप्तमखिलजगत्सारभूतं तन्महारत्नं स्यमंतकाख्यमित्याकर्ण्योद्भूतकोपो बलदेवो वासुदेवमाह । धिक्त्वां यस्त्वमेवमर्थलिप्सुरेतच्च ते भ्रातृत्वान्मया क्षांतं तदयं पंथास्स्वेच्छया गम्यतां न मे द्वारकया न त्वया न चाशेषबंधुभिः कार्य्यमलमलमेभिर्ममाग्रतोऽलीकशपथैरित्याक्षिप्य तत्कथां कथंचित्प्रसाद्यमानोपि न तस्थौ ।

vṛthaivāsmābhiḥ śatadhanurghātitaḥ na prāptamakhilajagatsārabhūtaṁ tanmahāratnaṁ syamaṁtakākhyamityākarṇyodbhūtakopo baladevo vāsudevamāha dhiktvāṁ yastvamevamarthalipsuretacca te bhrātṛtvānmayā kṣāṁtaṁ tadayaṁ paṁthāssvecchayā gamyatāṁ na me dvārakayā na tvayā na cāśeṣabaṁdhubhiḥ kāryyamalamalamebhirmamāgrato'līkaśapathairityākṣipya tatkathāṁ kathaṁcitprasādyamānopi na tasthau

'व्यर्थ ही हमने शतधन्वा को मार डाला, समस्त जगत के सारभूत उस महारत्न को हम प्राप्त न कर सके' — यह सुनकर क्रोध से भरे बलदेव ने वासुदेव से कहा — 'धिक्कार है तुझे, जो तू इस प्रकार अर्थ का लोभी है! फिर भी यह तेरा भाईपन जानकर मैंने सह लिया। अब यह मार्ग है, अपनी इच्छा से जाओ — न मुझे द्वारका से, न तुझसे, न ही समस्त बंधुओं से कोई प्रयोजन है; बस, अब मेरे सामने ये झूठी शपथें बंद करो' — ऐसा आक्षेप कर, बहुत मनाए जाने पर भी वे न रुके।

श्लोक 32 (vishnu.4.13.32)

स विदेहपुरीं प्रविवेश । जनकराजश्चार्घ्यपूर्वकमेनं गृहं प्रवेशयामास । स तत्रैव च तस्थौ । वासुदेवोऽपि द्वारकामाजगाम ।

sa videhapurīṁ praviveśa janakarājaścārghyapūrvakamenaṁ gṛhaṁ praveśayāmāsa sa tatraiva ca tasthau vāsudevo'pi dvārakāmājagāma

वे विदेहपुरी में प्रविष्ट हो गए। जनक राजा ने अर्घ्य देकर उन्हें अपने घर में प्रवेश कराया। वे वहीं ठहर गए। वासुदेव भी द्वारका लौट आए।

श्लोक 33 (vishnu.4.13.33)

यावच्च जनकराजगृहे बलभद्रो ऽवतस्थे तावद्धार्त्तराष्ट्रो दुर्योधनस्तत्सकाशाद्गदाशिक्षामशिक्षयत् । वर्षत्रयांते च बभ्रूग्रसेनप्रभृतिभिर्यादवैर्न तद्रत्नं कृष्णेनाऽपहृतमिति कृतावगतिभिर्विदेहनगरीं गत्वा बलदेवस्संप्रत्याय्य द्वारकामानीतः ।

yāvacca janakarājagṛhe balabhadro 'vatasthe tāvaddhārttarāṣṭro duryodhanastatsakāśādgadāśikṣāmaśikṣayat varṣatrayāṁte ca babhrūgrasenaprabhṛtibhiryādavairna tadratnaṁ kṛṣṇenā'pahṛtamiti kṛtāvagatibhirvidehanagarīṁ gatvā baladevassaṁpratyāyya dvārakāmānītaḥ

जब तक बलभद्र जनक राजा के घर में ठहरे रहे, तब तक धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ने उनसे गदा-विद्या सीखी। तीन वर्ष बीत जाने पर, बभ्रु, उग्रसेन आदि यादवों को यह विश्वास हो जाने पर कि वह रत्न कृष्ण ने नहीं चुराया, वे विदेहनगरी जाकर बलदेव को समझा-बुझाकर द्वारका ले आए।

श्लोक 34 (vishnu.4.13.34)

अक्रूरोप्युत्तममणिसमुद्भूतसुवर्णेन भगवद्ध्यानपरोऽनवरतं यज्ञानियाज । सवनगतौ हि क्षत्रियवैश्यौ निघ्नन्ब्रह्महा भवतीत्येवंप्रकारं दीक्षाकवचं प्रविष्ट एव तस्थौ । द्विषष्टिवर्षाण्येवं तन्मणिप्रभावात्तत्रोपसर्गदुर्भिक्षमारिकामरणादिकं नाभूत् ।

akrūropyuttamamaṇisamudbhūtasuvarṇena bhagavaddhyānaparo'navarataṁ yajñāniyāja savanagatau hi kṣatriyavaiśyau nighnanbrahmahā bhavatītyevaṁprakāraṁ dīkṣākavacaṁ praviṣṭa eva tasthau dviṣaṣṭivarṣāṇyevaṁ tanmaṇiprabhāvāttatropasargadurbhikṣamārikāmaraṇādikaṁ nābhūt

इधर अक्रूर उस उत्तम मणि से उत्पन्न सोने से, भगवान के ध्यान में लीन रहते हुए, निरंतर यज्ञ करने लगे। यज्ञ में स्थित क्षत्रिय और वैश्य को मारने वाला ब्रह्महत्या का पात्र होता है, यह जानकर वे दीक्षा-कवच धारण किए ही रहे। इस प्रकार बासठ वर्षों तक उस मणि के प्रभाव से वहां अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, मारी आदि उपद्रव नहीं हुए।

श्लोक 35 (vishnu.4.13.35)

अथाक्रूरपक्षीयैर्भोजैश्शत्रुघ्ने सात्वतस्य प्रपौत्रे व्यापादिते भोजैस्सहाक्रूरो द्वारकामपहायापक्रान्तः । तदपक्रांतिदिनादारभ्य तत्रोपसर्गदुर्भिक्षव्यालानावृष्टिमारिकाद्युपद्रवा बभूवुः । अथ यादवा बलभद्रो ग्रसेनसमवेता मंत्रममंत्रयन् ।

athākrūrapakṣīyairbhojaiśśatrughne sātvatasya prapautre vyāpādite bhojaissahākrūro dvārakāmapahāyāpakrāntaḥ tadapakrāṁtidinādārabhya tatropasargadurbhikṣavyālānāvṛṣṭimārikādyupadravā babhūvuḥ atha yādavā balabhadro grasenasamavetā maṁtramamaṁtrayan

फिर, अक्रूर के पक्ष के भोजों द्वारा सात्वत के प्रपौत्र शत्रुघ्न के मारे जाने पर, अक्रूर भी उन भोजों के साथ द्वारका छोड़कर चला गया। उसके चले जाने के दिन से ही वहां उपद्रव, अनावृष्टि, मारी आदि विपत्तियां आने लगीं। तब यादवों ने उग्रसेन और बलभद्र के साथ मिलकर सलाह की।

श्लोक 36 (vishnu.4.13.36)

भगवानुरगारिकेतनः किमिदमेकदैव प्रचुरोपद्रवागमनमेतदालोच्यतामित्युक्तेंधकनामा यदुवृद्धः प्राह । अस्याक्रूरस्य पितृश्वफल्को यत्र यत्राभूत्तत्रतत्र दुर्भिक्षमारिकानावृष्ट्यादिकं नाभूत् । काशीराजस्य विषये त्वनावृष्ट्या च श्वफल्को नीतः ततश्च तत्क्षणाद्देवो ववर्ष ।

bhagavānuragāriketanaḥ kimidamekadaiva pracuropadravāgamanametadālocyatāmityukteṁdhakanāmā yaduvṛddhaḥ prāha asyākrūrasya pitṛśvaphalko yatra yatrābhūttatratatra durbhikṣamārikānāvṛṣṭyādikaṁ nābhūt kāśīrājasya viṣaye tvanāvṛṣṭyā ca śvaphalko nītaḥ tataśca tatkṣaṇāddevo vavarṣa

सर्प-ध्वज भगवान ने कहा — 'ऐसा एक साथ यह अनेक उपद्रवों का आगमन क्यों हो रहा है, इस पर विचार करो' — ऐसा कहे जाने पर अंधक नामक वृद्ध यादव ने कहा — 'इस अक्रूर के पिता श्वफल्क जहां-जहां रहे, वहां-वहां दुर्भिक्ष, मारी, अनावृष्टि आदि नहीं हुए। काशीराज के राज्य में अत्यंत अनावृष्टि होने पर श्वफल्क को वहां ले जाया गया, और उसी क्षण देवता ने वर्षा कर दी।'

श्लोक 37 (vishnu.4.13.37)

काशीराजपत्न्याश्च गर्भे कन्यारत्नं पूर्वमासीत् । सा च कन्या पूर्णेपि प्रसूतिकाले नैव निश्चक्राम । एवं च तस्य गर्भस्य द्वादशवर्षाण्यनिष्क्रामतो ययुः । काशीराजश्च तामात्मजां गर्भस्थामाह ।

kāśīrājapatnyāśca garbhe kanyāratnaṁ pūrvamāsīt sā ca kanyā pūrṇepi prasūtikāle naiva niścakrāma evaṁ ca tasya garbhasya dvādaśavarṣāṇyaniṣkrāmato yayuḥ kāśīrājaśca tāmātmajāṁ garbhasthāmāha

काशीराज की पत्नी के गर्भ में पहले एक कन्यारत्न था। वह कन्या प्रसव-काल पूर्ण होने पर भी बाहर नहीं निकली। इस प्रकार बारह वर्ष उस गर्भ के बिना बाहर निकले बीत गए। काशीराज ने अपनी उस गर्भस्थ पुत्री से कहा —

श्लोक 38 (vishnu.4.13.38)

पुत्रि कस्मान्न जायसे निष्क्रम्य तामास्यं ते द्रष्टुमिच्छामि एतां च मातरं किमिति चिरं क्लेशयिष्यसीत्युक्ता गर्भस्थैव व्याजहार । तात यद्येकैकां गां दिनेदिने ब्राह्मणाय प्रयच्छसि तदहमन्यैस्त्रिभिर्वर्षैरस्माद्गर्भात्ततोऽवश्यं निष्क्रमिष्यामीत्येद्वचनमाकर्ण्य राजा दिनेदिने ब्राह्मणाय गां प्रादात् ।

putri kasmānna jāyase niṣkramya tāmāsyaṁ te draṣṭumicchāmi etāṁ ca mātaraṁ kimiti ciraṁ kleśayiṣyasītyuktā garbhasthaiva vyājahāra tāta yadyekaikāṁ gāṁ dinedine brāhmaṇāya prayacchasi tadahamanyaistribhirvarṣairasmādgarbhāttato'vaśyaṁ niṣkramiṣyāmītyedvacanamākarṇya rājā dinedine brāhmaṇāya gāṁ prādāt

'हे पुत्री! तुम क्यों नहीं जन्म लेतीं? बाहर निकलो, मैं तुम्हारा मुख देखना चाहता हूं। अपनी इस माता को भी क्यों इतने समय तक कष्ट देती हो?' ऐसा कहे जाने पर गर्भ में स्थित रहते हुए ही उसने कहा — 'हे तात! यदि आप प्रतिदिन एक-एक गाय ब्राह्मण को दान करें, तो मैं और तीन वर्षों में इस गर्भ से अवश्य बाहर निकलूंगी' — यह वचन सुनकर राजा प्रतिदिन ब्राह्मण को गाय देने लगे।

श्लोक 39 (vishnu.4.13.39)

सापि तावता कालेन जाता । ततस्तस्याः पिता गांदिनीति नाम चकार । तां च गांदिनीं कन्यां श्वफल्कायोपकारिणे गृहमागतायार्घ्यभूतां प्रादात् । तस्यामयमक्रूरः श्वफल्काज्जज्ञे ।

sāpi tāvatā kālena jātā tatastasyāḥ pitā gāṁdinīti nāma cakāra tāṁ ca gāṁdinīṁ kanyāṁ śvaphalkāyopakāriṇe gṛhamāgatāyārghyabhūtāṁ prādāt tasyāmayamakrūraḥ śvaphalkājjajñe

इतने समय में वह उत्पन्न हुई। तब उसके पिता ने उसका नाम गांदिनी रखा। उस गांदिनी नामक कन्या को, अपना उपकार करने वाले श्वफल्क को घर आए अतिथि के लिए अर्घ्य-स्वरूप, उन्होंने प्रदान किया। इसी गांदिनी से यह अक्रूर श्वफल्क द्वारा उत्पन्न हुआ।

श्लोक 40 (vishnu.4.13.40)

तस्यैवंगुणमिथुनादुत्पत्तिः । तत्कथमस्मिन्नपक्रान्ते अत्र दुर्भिक्षमारिकाद्युपद्रवा न भविष्यंति । तदयमत्रानीयतामलमतिगुणवत्यपराधान्वेषणेनेति यदुवृद्धस्यांधकस्यैतद्वचनमाकर्ण्य केशवोग्रसेनबलभद्रपुरोगमैर्यदुभिः कृतापराधतितिक्षुभिरभयं दत्त्वा श्वफल्कपुत्रः स्वपुरमानीतः ।

tasyaivaṁguṇamithunādutpattiḥ tatkathamasminnapakrānte atra durbhikṣamārikādyupadravā na bhaviṣyaṁti tadayamatrānīyatāmalamatiguṇavatyaparādhānveṣaṇeneti yaduvṛddhasyāṁdhakasyaitadvacanamākarṇya keśavograsenabalabhadrapurogamairyadubhiḥ kṛtāparādhatitikṣubhirabhayaṁ dattvā śvaphalkaputraḥ svapuramānītaḥ

इस प्रकार के गुणवान दंपति से उसकी उत्पत्ति हुई। अतः इसके यहां से चले जाने पर यहां दुर्भिक्ष, मारी आदि उपद्रव क्यों न होंगे? इसलिए इसे यहां वापस लाया जाए, अत्यंत गुणवान इस व्यक्ति के अपराधों की खोज करना व्यर्थ है' — यादु-वृद्ध अंधक के इस वचन को सुनकर, केशव, उग्रसेन और बलभद्र को आगे कर, यादवों ने अपराध सहने की अपनी सहमति देकर श्वफल्क के पुत्र को अभयदान देकर अपने नगर वापस ले आए।

श्लोक 41 (vishnu.4.13.41)

तत्र चागतमात्र एव तस्य स्यमंतकमणेः प्रभावादनावृष्टिमारिकादुर्भिक्षव्यालाद्युपद्रवोपशमा बभूवुः । कृष्णश्चिंतयामास । स्वल्पमेतत्कारणं यदयं गांदिन्यां श्वफल्केनाक्रूरो जनितः । सुमहांश्चायमनावृष्टिदुर्भिक्षमारिकाद्युपद्रवाप्रतिषेधकारी प्रभावः ।

tatra cāgatamātra eva tasya syamaṁtakamaṇeḥ prabhāvādanāvṛṣṭimārikādurbhikṣavyālādyupadravopaśamā babhūvuḥ kṛṣṇaściṁtayāmāsa svalpametatkāraṇaṁ yadayaṁ gāṁdinyāṁ śvaphalkenākrūro janitaḥ sumahāṁścāyamanāvṛṣṭidurbhikṣamārikādyupadravāpratiṣedhakārī prabhāvaḥ

वहां आते ही उस स्यमंतक मणि के प्रभाव से अनावृष्टि, मारी, दुर्भिक्ष, सर्प आदि उपद्रव शांत हो गए। कृष्ण ने विचार किया — 'यह कारण अत्यंत तुच्छ है कि यह गांदिनी में श्वफल्क द्वारा उत्पन्न अक्रूर मात्र है, फिर भी अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, मारी आदि उपद्रवों को शांत करने वाला यह प्रभाव अत्यंत महान है।'

श्लोक 42 (vishnu.4.13.42)

तन्नूनमस्य सकाशे स महामणिः स्यमंतकाख्यस्तिष्ठति । तस्य ह्येवंविधाः प्रभावाः श्रूयन्ते । अयमपि च यज्ञादनंतरमन्यत्क्रत्वंतरं तस्यानंतरमन्यद्यज्ञांतरं चाजस्रमविच्छिन्नं यजतीति । अनल्पोपादानं चास्यासंशयमत्राऽसौ मणिवरस्तिष्ठितीति कृताध्यवसायोऽन्यत्प्रयोजनमुद्दिश्य सकलयादवसमाजमात्मगृह एवाचीकरत् ।

tannūnamasya sakāśe sa mahāmaṇiḥ syamaṁtakākhyastiṣṭhati tasya hyevaṁvidhāḥ prabhāvāḥ śrūyante ayamapi ca yajñādanaṁtaramanyatkratvaṁtaraṁ tasyānaṁtaramanyadyajñāṁtaraṁ cājasramavicchinnaṁ yajatīti analpopādānaṁ cāsyāsaṁśayamatrā'sau maṇivarastiṣṭhitīti kṛtādhyavasāyo'nyatprayojanamuddiśya sakalayādavasamājamātmagṛha evācīkarat

निश्चय ही इसके पास वह स्यमंतक नामक महामणि है, ऐसा प्रतीत होता है। उसकी ऐसी शक्तियां सुनी जाती हैं — यह भी एक यज्ञ के बाद दूसरा, फिर उसके बाद और यज्ञ, इस प्रकार निरंतर बिना रुके यज्ञ करता है। इसकी संपत्ति भी अल्प है — निस्संदेह यहां वह श्रेष्ठ मणि विद्यमान है' — ऐसा निश्चय कर, किसी अन्य प्रयोजन का बहाना बनाकर उन्होंने संपूर्ण यादव-समाज को अपने ही घर में एकत्र किया।

श्लोक 43 (vishnu.4.13.43)

तत्र चोपविष्टेष्वखिलेषु यदुषु पूर्वं प्रयोजनमुपन्यस्य पर्यवसिते च तस्मिन् प्रसंगांतरपरिहासकथामक्रूरेण कृत्वा जनार्दनस्तमक्रूरमाह । दानपते जानीम एव वयं यथा शतधन्वना तदिदमखिलजगत्सारभूतं स्यमंतकं रत्नं भवतः तदशेषराष्ट्रोपकरकं भवत्सकाशे तिष्ठति तिष्ठतु सर्व एव वयं तत्प्रभावफलभुजः किं त्वेष बलभद्रो ऽस्मानाशंकितवांश्तदस्मत्प्रीतये दर्शयस्वेत्यभिधाय जोषं स्थिते भगवति वासुदेवे सरत्नस्सोचिंतयत् ।

tatra copaviṣṭeṣvakhileṣu yaduṣu pūrvaṁ prayojanamupanyasya paryavasite ca tasmin prasaṁgāṁtaraparihāsakathāmakrūreṇa kṛtvā janārdanastamakrūramāha dānapate jānīma eva vayaṁ yathā śatadhanvanā tadidamakhilajagatsārabhūtaṁ syamaṁtakaṁ ratnaṁ bhavataḥ tadaśeṣarāṣṭropakarakaṁ bhavatsakāśe tiṣṭhati tiṣṭhatu sarva eva vayaṁ tatprabhāvaphalabhujaḥ kiṁ tveṣa balabhadro 'smānāśaṁkitavāṁśtadasmatprītaye darśayasvetyabhidhāya joṣaṁ sthite bhagavati vāsudeve saratnassociṁtayat

वहां बैठे संपूर्ण यादवों के सामने पहले वह असली प्रयोजन रखकर, उसके समाप्त होने पर, अक्रूर के साथ प्रसंगवश हास्य-वार्ता कर, जनार्दन ने उस अक्रूर से कहा — 'हे दानपते! हम जानते ही हैं कि जैसे शतधन्वा द्वारा यह समस्त जगत के सारभूत स्यमंतक रत्न तुम्हें सौंपा गया, वह समस्त राष्ट्र का उपकार करने वाला वह रत्न तुम्हारे पास ही है — रहने दो; हम सब भी उसके प्रभाव के फल का उपभोग करने वाले ही हैं। किंतु यह बलभद्र हम पर संदेह करते हैं, अतः हमारी प्रसन्नता के लिए उसे दिखा दो' — ऐसा कहे जाने पर, मणि सहित वे मौन बैठे भगवान वासुदेव ने सोचा —

श्लोक 44 (vishnu.4.13.44)

किमत्रानुष्ठेयमन्यथा चेद्ब्रवीम्यहं तत्केवलांबरतिरोधानमन्विष्यंतो रत्नमेते द्रक्ष्यंति अतिविरोधो न क्षम इति संचिंत्य तमखिलजगत्कारणभूतं नारायणमाहक्रूरः । भगवन्ममैतत्स्यमंतकरत्नं शतधनुषा समर्पितमपगते च तस्मिन्नद्य श्वः परश्वो वा भगवान् याचयिष्यतीति कृतमतिरतिकृच्छ्रेणैतावंतं कालमधारयम् ।

kimatrānuṣṭheyamanyathā cedbravīmyahaṁ tatkevalāṁbaratirodhānamanviṣyaṁto ratnamete drakṣyaṁti ativirodho na kṣama iti saṁciṁtya tamakhilajagatkāraṇabhūtaṁ nārāyaṇamāhakrūraḥ bhagavanmamaitatsyamaṁtakaratnaṁ śatadhanuṣā samarpitamapagate ca tasminnadya śvaḥ paraśvo vā bhagavān yācayiṣyatīti kṛtamatiratikṛcchreṇaitāvaṁtaṁ kālamadhārayam

'यहां क्या करना उचित है? यदि मैं नहीं बताऊंगा, तो ये लोग केवल वस्त्र-आच्छादन में छिपाए इसकी खोज करते हुए भी इस रत्न को देख ही लेंगे, अतः अधिक विरोध करना उचित नहीं है' — ऐसा विचार कर, संपूर्ण जगत के कारणभूत उन नारायण से अक्रूर ने कहा — 'हे भगवन्! यह स्यमंतक रत्न मुझे शतधन्वा द्वारा सौंपा गया था। उसके चले जाने पर, आज, कल या परसों भगवान इसे मुझसे मांग लेंगे, ऐसा सोचकर मैंने अत्यंत कठिनाई से इतने समय तक इसे धारण किए रखा।

श्लोक 45 (vishnu.4.13.45)

तस्य च धारणश्क्लेशेनाहमशेषोपभोगेष्वसंगिमानसो न वेद्मि स्वसुखकलामपि । एतावन्मात्रमप्यशेषराष्ट्रोपकारी धारयितुं न शक्नोति भवान्मन्यत इत्यात्मना न चोदितवान् । तदिदं स्यमंतकरत्नं गृह्यतामिच्छया यस्याभिमतं तस्य समर्प्यताम् ।

tasya ca dhāraṇaśkleśenāhamaśeṣopabhogeṣvasaṁgimānaso na vedmi svasukhakalāmapi etāvanmātramapyaśeṣarāṣṭropakārī dhārayituṁ na śaknoti bhavānmanyata ityātmanā na coditavān tadidaṁ syamaṁtakaratnaṁ gṛhyatāmicchayā yasyābhimataṁ tasya samarpyatām

'उसे धारण करने के कष्ट से मैं समस्त भोगों में अनासक्त मन वाला होकर, अपने सुख का लेशमात्र भी नहीं जानता। इतना भी भगवान यह न समझें कि मैं इसे समस्त राष्ट्र के हित में धारण करने में असमर्थ हूं — ऐसा मैंने स्वयं इसकी चर्चा नहीं की। अतः यह स्यमंतक रत्न ले लीजिए; जिसकी इच्छा हो, उसे यह सौंप दिया जाए।'

श्लोक 46 (vishnu.4.13.46)

ततः स्वोदरवस्त्रनिगोपितमतिलघुकनकसमुद्गकगतं प्रकटीकृतवान् । ततश्च निष्क्राम्य स्यमंतकमणिं तस्मिन्यदुकुलसमाजे मुमोच । मुक्तमात्रे च तस्मिन्नतिकान्त्या तदखिलमास्थानमुद्योतितम् । अथाहाक्रुरः स एष मणिः शतधन्वनास्माकं समर्पितः यस्यायं स एनं गृह्णातु इति ।

tataḥ svodaravastranigopitamatilaghukanakasamudgakagataṁ prakaṭīkṛtavān tataśca niṣkrāmya syamaṁtakamaṇiṁ tasminyadukulasamāje mumoca muktamātre ca tasminnatikāntyā tadakhilamāsthānamudyotitam athāhākruraḥ sa eṣa maṇiḥ śatadhanvanāsmākaṁ samarpitaḥ yasyāyaṁ sa enaṁ gṛhṇātu iti

तब उसने अपने पेट के वस्त्र में छिपाए हुए अत्यंत छोटे स्वर्ण-पात्र में रखे उसे प्रकट किया। फिर बाहर निकालकर उस यदुकुल-समाज में स्यमंतक मणि को छोड़ दिया। छोड़ते ही उसकी अत्यधिक कांति से वह संपूर्ण सभा-स्थल प्रकाशित हो उठा। तब अक्रूर ने कहा — 'यह वही मणि है जो शतधन्वा द्वारा हमें सौंपा गया था; जिसका यह हो, वह इसे ग्रहण करे।'

श्लोक 47 (vishnu.4.13.47)

तमालोक्य सर्वयादवानां साधुसाध्विति विस्मितमनसां वाचोऽश्रूयंत । तमालोक्यातीव बलभद्रो ममायमच्युतेनैव सामान्यस्समन्विच्छित इति कृतस्पृहोऽभूत् । ममैवायं पितृधनमित्यतीव च सत्यभामापि स्पृहयांचकार । बलसत्यावलोकनात्कृष्णोप्यात्मानं गोचक्रांतरावस्थितमिव मेने ।

tamālokya sarvayādavānāṁ sādhusādhviti vismitamanasāṁ vāco'śrūyaṁta tamālokyātīva balabhadro mamāyamacyutenaiva sāmānyassamanvicchita iti kṛtaspṛho'bhūt mamaivāyaṁ pitṛdhanamityatīva ca satyabhāmāpi spṛhayāṁcakāra balasatyāvalokanātkṛṣṇopyātmānaṁ gocakrāṁtarāvasthitamiva mene

उसे देखकर संपूर्ण यादवों के मन विस्मित हो गए और 'साधु, साधु' की ध्वनि सुनाई देने लगी। उसे देखकर बलभद्र भी अत्यंत उत्कट रूप से सोचने लगे कि यह अच्युत के साथ मेरा भी समान अधिकार है, उसके लिए लालायित हो उठे। सत्यभामा भी 'यह तो मेरा ही पितृधन है' ऐसा सोचकर अत्यंत लालायित हो उठी। बल और सत्या के मुखों को देखकर कृष्ण भी स्वयं को मानो चक्र के बीच में स्थित अनुभव करने लगे।

श्लोक 48 (vishnu.4.13.48)

सकलयादवसमक्षं चाक्रूरमाह । एतद्धि मणिरत्नमात्मसंशोधनाय एतेषां यदूनां मया दर्शितम् एतच्च मम बलभद्रस्य च सामान्यं पितृधनं चैतत्सत्यभामाया नान्यस्यैतत् । एतच्च सर्वकालं शुचिना ब्रह्मचर्यादिगुणवता ध्रियमाणमशेषराष्ट्रस्योपकारकमशुचिना ध्रियमाणमाधारमेव हंति ।

sakalayādavasamakṣaṁ cākrūramāha etaddhi maṇiratnamātmasaṁśodhanāya eteṣāṁ yadūnāṁ mayā darśitam etacca mama balabhadrasya ca sāmānyaṁ pitṛdhanaṁ caitatsatyabhāmāyā nānyasyaitat etacca sarvakālaṁ śucinā brahmacaryādiguṇavatā dhriyamāṇamaśeṣarāṣṭrasyopakārakamaśucinā dhriyamāṇamādhārameva haṁti

समस्त यादवों के सामने उन्होंने अक्रूर से कहा — 'यह मणिरत्न मैंने केवल अपनी शुद्धि के लिए इन यादवों को दिखलाया है; यह मेरा और बलभद्र का साझा अधिकार है, और यह मेरा पितृधन है — सत्यभामा के अतिरिक्त और किसी का नहीं। यह रत्न सदैव पवित्र, ब्रह्मचर्यादि गुणों से युक्त पुरुष द्वारा धारण किए जाने पर समस्त राष्ट्र का उपकार करता है; किंतु अपवित्र पुरुष द्वारा धारण किए जाने पर धारण करने वाले को ही नष्ट कर देता है।

श्लोक 49 (vishnu.4.13.49)

अतोहमस्य षोडशस्त्रीसहस्रपरिग्रहादसमर्थो धारणे कथमेतत्सत्यभामा स्वीकरोति । आर्यबलभद्रेणापि मदिरापानाद्यशेषोपभोगपरित्यागः कार्यः । तदलं यदुलोकोयं बलभद्रः अहं च सत्या च त्वां दानपते प्रार्थयामः । तद्भवानेव धारयितुं समर्थः ।

atohamasya ṣoḍaśastrīsahasraparigrahādasamartho dhāraṇe kathametatsatyabhāmā svīkaroti āryabalabhadreṇāpi madirāpānādyaśeṣopabhogaparityāgaḥ kāryaḥ tadalaṁ yadulokoyaṁ balabhadraḥ ahaṁ ca satyā ca tvāṁ dānapate prārthayāmaḥ tadbhavāneva dhārayituṁ samarthaḥ

अतः मैं सोलह हजार स्त्रियों के परिग्रह के कारण इसे धारण करने में असमर्थ हूं; फिर सत्यभामा इसे कैसे स्वीकार कर सकती है? आर्य बलभद्र को भी मदिरापान आदि समस्त भोगों का त्याग करना होगा। अतः यह यदुलोक ही, मैं और सत्या, हे दानपते! तुमसे प्रार्थना करते हैं — तुम ही इसे धारण करने में समर्थ हो।

श्लोक 50 (vishnu.4.13.50)

त्वद्धृतं चास्य राष्ट्रस्योपकारकं तद्भवानशेषराष्ट्रनिमित्तमेतत्पूर्ववद्धारयत्वन्यन्न वक्तव्यमित्युक्तो दानपतिस्तथेत्याह जग्राह च तन्महारत्नम् । ततःप्रभृत्यक्रूरः प्रकटेनैव तेनातिजाज्ज्वल्यमानेनात्मकंठावसक्तेनादित्य इवांशुमाली चचार ।

tvaddhṛtaṁ cāsya rāṣṭrasyopakārakaṁ tadbhavānaśeṣarāṣṭranimittametatpūrvavaddhārayatvanyanna vaktavyamityukto dānapatistathetyāha jagrāha ca tanmahāratnam tataḥprabhṛtyakrūraḥ prakaṭenaiva tenātijājjvalyamānenātmakaṁṭhāvasaktenāditya ivāṁśumālī cacāra

तुम्हारे पास रहने वाला यह रत्न इस राष्ट्र का उपकार करता है; अतः तुम ही समस्त राष्ट्र के हित के लिए इसे पहले की भांति धारण करो — इसके अतिरिक्त और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं' — यह कहे जाने पर उस दानपति ने 'ऐसा ही हो' कहकर उस महारत्न को ग्रहण कर लिया। तब से अक्रूर, अपने ही कंठ में बंधे उस अत्यंत जाज्वल्यमान तेज से प्रकटतः सूर्य के समान किरणों से युक्त होकर विचरने लगा।

श्लोक 51 (vishnu.4.13.51)

इत्येतद्भगवतो मिथ्याभिशस्तिक्षालनं यः स्मरति न तस्य कदाचिदल्पापि मिथ्याभिशस्तिर्भवति अव्याहताखिलेंद्रि यश्चाखिलपापमोक्षमवाप्नोति ।

ityetadbhagavato mithyābhiśastikṣālanaṁ yaḥ smarati na tasya kadācidalpāpi mithyābhiśastirbhavati avyāhatākhileṁdri yaścākhilapāpamokṣamavāpnoti

इस प्रकार भगवान की इस मिथ्या-दोषारोपण की शुद्धि की कथा का जो स्मरण करता है, उसे कभी भी थोड़ा भी मिथ्या-दोषारोपण नहीं लगता; और उसकी सभी इंद्रियां अबाधित रहते हुए वह समस्त पापों से मुक्ति पाता है।

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