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चतुर्थांश · अध्याय 14

वृष्णि-अंधक वंश तथा वसुदेव-पुत्रों का जन्म

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (vishnu.4.14.1)

श्रीपराशर उवाच अनमित्रस्य पुत्रः शिनिर्नामाभवत्

śrīparāśara uvāca anamitrasya putraḥ śinirnāmābhavat

अनमित्र का पुत्र शिनि नामक हुआ।

श्लोक 2 (vishnu.4.14.2)

तस्यापि सत्यकः सत्यकात्सात्यकिर्युयुधानापरनामा

tasyāpi satyakaḥ satyakātsātyakiryuyudhānāparanāmā

उसके भी सत्यक हुआ, सत्यक से सात्यकि, जिसका दूसरा नाम युयुधान था।

श्लोक 3 (vishnu.4.14.3)

तस्मादपि संजयः तत्पुत्रश्च कुणिः कुणेर्युगन्धरः

tasmādapi saṁjayaḥ tatputraśca kuṇiḥ kuṇeryugandharaḥ

उससे भी संजय, उसका पुत्र कुणि, कुणि से युगंधर हुआ।

श्लोक 4 (vishnu.4.14.4)

इत्येते शैनेयाः

ityete śaineyāḥ

ये शैनेय (शिनि के वंशज) कहलाए।

श्लोक 5 (vishnu.4.14.5)

अनमित्रस्यान्वये वृष्णिः तस्मात्श्चफल्कः तत्प्रभावः काथेन एव

anamitrasyānvaye vṛṣṇiḥ tasmātścaphalkaḥ tatprabhāvaḥ kāthena eva

अनमित्र के वंश में वृष्णि हुआ; उससे श्वफल्क हुआ, जिसका प्रभाव पहले ही बताया जा चुका है।

श्लोक 6 (vishnu.4.14.6)

श्वफल्कस्यान्यः कनीयांश्चित्रकोनाम भ्राता

śvaphalkasyānyaḥ kanīyāṁścitrakonāma bhrātā

श्वफल्क का छोटा भाई चित्रक नामक था।

श्लोक 7 (vishnu.4.14.7)

श्वफल्कादक्रूरो गान्दिन्यामभवत्

śvaphalkādakrūro gāndinyāmabhavat

श्वफल्क से गांदिनी में अक्रूर उत्पन्न हुआ।

श्लोक 8 (vishnu.4.14.8)

तथोपमद्गः

tathopamadgaḥ

तथा उपमद्गु भी।

श्लोक 9 (vishnu.4.14.9)

उपमद्गोर्मृदामृदविश्वारिमेजयगिरिक्षत्रोपक्षत्रशतघ्नारिमर्दनधर्मदृग्दृष्टधर्मगन्धमोजवाहप्रतिवाहाख्याः पुत्राःसुताराख्या कन्या च

upamadgormṛdāmṛdaviśvārimejayagirikṣatropakṣatraśataghnārimardanadharmadṛgdṛṣṭadharmagandhamojavāhaprativāhākhyāḥ putrāḥsutārākhyā kanyā ca

उपमद्गु के मृदु, अविश्वारि, मृगयजय, गिरिक्षत्र, उपक्षत्र, शत्रुघ्न, अरिमर्दन, धर्मदृक्, दृष्टवर्मा, गंध, मोजवाह और प्रतिवाह नामक पुत्र, और सुतारा नामक एक पुत्री हुई।

श्लोक 10 (vishnu.4.14.10)

देववानुपदेवश्चाक्रूरपुत्रौ

devavānupadevaścākrūraputrau

देववान और उपदेव अक्रूर के पुत्र थे।

श्लोक 11 (vishnu.4.14.11)

पृथुविपृथुप्रमुखाश्चित्रकस्य पुत्रा बहवो बभूवुः

pṛthuvipṛthupramukhāścitrakasya putrā bahavo babhūvuḥ

पृथु, विपृथु आदि प्रमुख चित्रक के अनेक पुत्र हुए।

श्लोक 12 (vishnu.4.14.12)

कुकुरभजमानशुचिकंबलबर्हिषाख्यास्तथान्धकस्य चत्वारः पुत्राः

kukurabhajamānaśucikaṁbalabarhiṣākhyāstathāndhakasya catvāraḥ putrāḥ

कुकुर, भजमान, शुचि और कंबल-बर्हिष नामक अंधक के चार पुत्र हुए।

श्लोक 13 (vishnu.4.14.13)

कुकुराद्धृष्टः तस्माच्च कपोतरोमा ततश्च विलोमा तस्मादपि तुंबुरसखोऽभवदनुसंज्ञश्च

kukurāddhṛṣṭaḥ tasmācca kapotaromā tataśca vilomā tasmādapi tuṁburasakho'bhavadanusaṁjñaśca

कुकुर से हृष्ट, उससे कपोतरोमा, उससे विलोम, उससे भी तुंबुरु का मित्र (नामक पुत्र) और अनु नामक पुत्र हुआ।

श्लोक 14 (vishnu.4.14.14)

अनोरानकदुन्दभिः ततश्चा भिजितभिजितः पुनर्वसुः

anorānakadundabhiḥ tataścā bhijitabhijitaḥ punarvasuḥ

अनु से आनकदुंदुभि, उससे अभिजित्, उससे पुनर्वसु हुआ।

श्लोक 15 (vishnu.4.14.15)

तस्याप्याहुकः आहुकी च कन्या

tasyāpyāhukaḥ āhukī ca kanyā

उसके भी आहुक नामक पुत्र और आहुकी नामक पुत्री हुई।

श्लोक 16 (vishnu.4.14.16)

आहुकस्य देवकोग्रसेनौ द्वौ पुत्रौ

āhukasya devakograsenau dvau putrau

आहुक के देवक और उग्रसेन नामक दो पुत्र हुए।

श्लोक 17 (vishnu.4.14.17)

देववानुपदेवः सहदेवो देवरक्षिता च देवकस्य चत्वारः पुत्राः

devavānupadevaḥ sahadevo devarakṣitā ca devakasya catvāraḥ putrāḥ

देववान, उपदेव, सहदेव और देवरक्षित — ये देवक के चार पुत्र हुए।

श्लोक 18 (vishnu.4.14.18)

तेषां वृकदेवोपदेवा देवरक्षिता श्रीदेवा शान्तिदेवा सहदेवा देवकी च सप्तभगिन्यः

teṣāṁ vṛkadevopadevā devarakṣitā śrīdevā śāntidevā sahadevā devakī ca saptabhaginyaḥ

उनकी वृकदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शांतिदेवा, सहदेवा और देवकी — ये सात बहनें थीं।

श्लोक 19 (vishnu.4.14.19)

ताश्च सर्वा वसुदेव उपयेमे

tāśca sarvā vasudeva upayeme

उन सबका ही वसुदेव ने पाणिग्रहण किया।

श्लोक 20 (vishnu.4.14.20)

उग्रसेनस्यापि कंसन्यग्रोधसुनामानकाह्वशङ्कुसुभूमिराष्ट्रपालयुद्धतुष्टिसुतुष्टिंमत्संज्ञाः पुत्रा बभूवुः

ugrasenasyāpi kaṁsanyagrodhasunāmānakāhvaśaṅkusubhūmirāṣṭrapālayuddhatuṣṭisutuṣṭiṁmatsaṁjñāḥ putrā babhūvuḥ

उग्रसेन के भी कंस, न्यग्रोध, सुनामा, कंक, शंकु, सुभूमि, राष्ट्रपाल, युद्धमुष्टि और तुष्टिमान नामक पुत्र हुए।

श्लोक 21 (vishnu.4.14.21)

कंसाकंसवतीसुतनूराष्ट्रपलिकाह्वाश्चोग्रसेनस्य तनूजाः कन्याः

kaṁsākaṁsavatīsutanūrāṣṭrapalikāhvāścograsenasya tanūjāḥ kanyāḥ

कंसा, कंसवती, सुतनू, राष्ट्रपाली और कंकी — ये उग्रसेन की पुत्रियां थीं।

श्लोक 22 (vishnu.4.14.22)

भजमानाच्च विदूरथः पुत्रोऽभवत्

bhajamānācca vidūrathaḥ putro'bhavat

भजमान से विदूरथ नामक पुत्र हुआ।

श्लोक 23 (vishnu.4.14.23)

विदूरथाच्छूरः शुराच्छमी शमिनः प्रतिक्षत्रः तस्मात्स्वयंभोजः ततश्च हृदिकः

vidūrathācchūraḥ śurācchamī śaminaḥ pratikṣatraḥ tasmātsvayaṁbhojaḥ tataśca hṛdikaḥ

विदूरथ से शूर, शूर से शमी, शमी से प्रतिक्षत्र, उससे स्वयंभोज, उससे हृदीक हुआ।

श्लोक 24 (vishnu.4.14.24)

तस्यापि कृतवर्मशतधनुर्देवमीढुषाख्याः पुत्रा बभूवुः

tasyāpi kṛtavarmaśatadhanurdevamīḍhuṣākhyāḥ putrā babhūvuḥ

उसके भी कृतवर्मा, शतधनु और देवमीढुष नामक पुत्र हुए।

श्लोक 25 (vishnu.4.14.25)

देवमीढुषस्यापि शूरः

devamīḍhuṣasyāpi śūraḥ

देवमीढुष का भी शूर हुआ।

श्लोक 26 (vishnu.4.14.26)

शुरस्यापि मारीषा नाम पत्न्यभवत्

śurasyāpi mārīṣā nāma patnyabhavat

शूर की मारीषा नामक पत्नी हुई।

श्लोक 27 (vishnu.4.14.27)

तस्यां चासौ दशपुत्रानजनयद्वसुदेवरूर्वान्

tasyāṁ cāsau daśaputrānajanayadvasudevarūrvān

उससे उसने वसुदेव को प्रधान मानकर दस पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 28 (vishnu.4.14.28)

वसुदेवस्य जातमात्रस्यैव तद्गृहे भगवदंशावतारमव्याहतदृष्ट्या पश्यद्भिर्देवैर्दिव्यानकदुन्दुभयो वादिताः

vasudevasya jātamātrasyaiva tadgṛhe bhagavadaṁśāvatāramavyāhatadṛṣṭyā paśyadbhirdevairdivyānakadundubhayo vāditāḥ

वसुदेव के जन्म लेते ही, उनके घर भगवान के अंशावतार को अबाधित दृष्टि से देखने वाले देवताओं ने दिव्य आनक और दुंदुभि (नगाड़े) बजाए।

श्लोक 29 (vishnu.4.14.29)

ततश्चसावानकदुन्दुभिसंज्ञामवाप

tataścasāvānakadundubhisaṁjñāmavāpa

तभी से उसने आनकदुंदुभि नाम प्राप्त किया।

श्लोक 30 (vishnu.4.14.30)

तस्य च देवभागदेवश्रवाष्टकककुच्चक्रवत्सधारकसृंजयश्यामशमिकगञ्जूषसंज्ञा नव भ्रतरोऽभवन्

tasya ca devabhāgadevaśravāṣṭakakakuccakravatsadhārakasṛṁjayaśyāmaśamikagañjūṣasaṁjñā nava bhrataro'bhavan

उसके भी देवभाग, देवश्रवा, अष्टक, ककु, चक्रवत्स, धारक, सृंजय, श्यामशमिक और गंडूष नामक नौ भाई हुए।

श्लोक 31 (vishnu.4.14.31)

पृथा श्रुतदेवा श्रुत कीर्तिः श्रुतश्रवा राजाधिदेवी च वसुदेदादीनां पञ्च भगिन्योऽभवन्

pṛthā śrutadevā śruta kīrtiḥ śrutaśravā rājādhidevī ca vasudedādīnāṁ pañca bhaginyo'bhavan

पृथा, श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी — ये वसुदेव आदि की पांच बहनें थीं।

श्लोक 32 (vishnu.4.14.32)

शुरस्य कुन्तिर्नाम सखाभवत्

śurasya kuntirnāma sakhābhavat

शूर का कुंति नामक मित्र था।

श्लोक 33 (vishnu.4.14.33)

तस्मै चापुत्राय पृथामात्मजां विधिना शुरो दत्तवान्

tasmai cāputrāya pṛthāmātmajāṁ vidhinā śuro dattavān

उस निःसंतान मित्र को शूर ने विधिपूर्वक अपनी पुत्री पृथा दे दी।

श्लोक 34 (vishnu.4.14.34)

तां च पाण्डुरुवाह

tāṁ ca pāṇḍuruvāha

उसका पाणिग्रहण पांडु ने किया।

श्लोक 35 (vishnu.4.14.35)

तस्यां च धर्मानिलेन्द्रैर्युधिष्ठरभीमसेनार्जुनाख्यास्त्रयः पुत्राःसमुत्पादिताः

tasyāṁ ca dharmānilendrairyudhiṣṭharabhīmasenārjunākhyāstrayaḥ putrāḥsamutpāditāḥ

उससे धर्म, वायु और इंद्र द्वारा युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन नामक तीन पुत्र उत्पन्न किए गए।

श्लोक 36 (vishnu.4.14.36)

पूर्वमेवानूढायाश्च भगवता भास्वता कानीनः कर्णो नाम पुत्रोऽजन्यत

pūrvamevānūḍhāyāśca bhagavatā bhāsvatā kānīnaḥ karṇo nāma putro'janyata

इससे पूर्व, अविवाहित रहते हुए ही, भगवान सूर्य द्वारा उसे कानीन (कुंवारी-अवस्था में उत्पन्न) कर्ण नामक पुत्र हुआ।

श्लोक 37 (vishnu.4.14.37)

तस्याश्च सपत्नी माद्री नामाभूत्

tasyāśca sapatnī mādrī nāmābhūt

उसकी सौत का नाम माद्री था।

श्लोक 38 (vishnu.4.14.38)

तस्यां च नासत्यदस्त्राभ्यां नकुलसहदेवौ पाण्डोः पुत्रौ जनितौ

tasyāṁ ca nāsatyadastrābhyāṁ nakulasahadevau pāṇḍoḥ putrau janitau

उससे अश्विनीकुमारों नासत्य और दस्र द्वारा नकुल और सहदेव नामक पांडु के दो पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 39 (vishnu.4.14.39)

श्रुतदेवां तु वृद्धधर्मा नाम कारूश उवयेमे

śrutadevāṁ tu vṛddhadharmā nāma kārūśa uvayeme

श्रुतदेवा का वृद्धशर्मा नामक कारूष देश के राजा ने पाणिग्रहण किया।

श्लोक 40 (vishnu.4.14.40)

तस्याञ्च च दन्तवक्रो नाम महासुरो जज्ञे

tasyāñca ca dantavakro nāma mahāsuro jajñe

उससे दंतवक्र नामक महान असुर उत्पन्न हुआ।

श्लोक 41 (vishnu.4.14.41)

श्रुतकीर्तिमपि केकयराजा उपयेमे

śrutakīrtimapi kekayarājā upayeme

श्रुतकीर्ति का भी केकय देश के राजा ने पाणिग्रहण किया।

श्लोक 42 (vishnu.4.14.42)

तस्यां च संतर्दनादयः कैकेयाः पञ्च पुत्रा बभूवुः

tasyāṁ ca saṁtardanādayaḥ kaikeyāḥ pañca putrā babhūvuḥ

उससे संतर्दन आदि पांच कैकेय पुत्र हुए।

श्लोक 43 (vishnu.4.14.43)

राजाधिदेव्यमावन्त्यौ विन्दानुविन्दौ जज्ञाते

rājādhidevyamāvantyau vindānuvindau jajñāte

राजाधिदेवी से आवंती (अवंती के राजा) द्वारा विंद और अनुविंद उत्पन्न हुए।

श्लोक 44 (vishnu.4.14.44)

श्रुतश्रवसमपि चेदिराजो दमघोषनामोपयेमे

śrutaśravasamapi cedirājo damaghoṣanāmopayeme

श्रुतश्रवा का भी चेदि देश के राजा दमघोष नामक ने पाणिग्रहण किया।

श्लोक 45 (vishnu.4.14.45)

तस्यां च शिशुपालमुत्पादयामास

tasyāṁ ca śiśupālamutpādayāmāsa

उससे उसने शिशुपाल को उत्पन्न किया।

श्लोक 46 (vishnu.4.14.46)

स वा पूर्वमप्युदारविक्रमो दैत्यानामादिपुरुषो हिरण्यकशिपुरभवत्

sa vā pūrvamapyudāravikramo daityānāmādipuruṣo hiraṇyakaśipurabhavat

वही (शिशुपाल) पहले असीम पराक्रम वाला दैत्यों का आदिपुरुष हिरण्यकशिपु हुआ था,

श्लोक 47 (vishnu.4.14.47)

यश्च भगवता सकललोकगुरुणा नारसिंहेन घातितः

yaśca bhagavatā sakalalokaguruṇā nārasiṁhena ghātitaḥ

जो सकल लोकों के गुरु भगवान नृसिंह द्वारा मारा गया था।

श्लोक 48 (vishnu.4.14.48)

पुनरपि अक्षयवीर्यशौर्यसंपत्पराक्रमगुणःसमाक्रान्तसकलत्रैलोकेश्वरप्रभावो दशाननो नामाभूत्

punarapi akṣayavīryaśauryasaṁpatparākramaguṇaḥsamākrāntasakalatrailokeśvaraprabhāvo daśānano nāmābhūt

फिर वही अक्षय बल, शौर्य, संपत्ति और पराक्रम के गुणों से युक्त होकर, संपूर्ण त्रैलोक्य के ईश्वरों को दबाने वाला दशानन (रावण) नामक हुआ,

श्लोक 49 (vishnu.4.14.49)

बहुकालोपभुक्तभगवत्सकाशावाप्तशरीरपातोद्भवपुण्यफलो भगवता राघवरूपिणा सोऽपि निधनमुपपादितः

bahukālopabhuktabhagavatsakāśāvāptaśarīrapātodbhavapuṇyaphalo bhagavatā rāghavarūpiṇā so'pi nidhanamupapāditaḥ

जो दीर्घकाल तक भगवान के सान्निध्य में रहकर प्राप्त शरीर-पात के पुण्य-फल से युक्त होकर, राघव-रूपधारी भगवान द्वारा भी नाश को प्राप्त हुआ।

श्लोक 50 (vishnu.4.14.50)

पुनश्चेदिराजस्य दमघोषस्यात्मजः शिशु पालनामाभवत्

punaścedirājasya damaghoṣasyātmajaḥ śiśu pālanāmābhavat

फिर वही चेदिराज दमघोष का पुत्र शिशुपाल नामक हुआ।

श्लोक 51 (vishnu.4.14.51)

शिशुपालत्वेपि भगवतो भूभारावतारणायावतीर्णांशस्य पुण्डरीकनयनाख्यस्योपरि द्वेषानुबन्धमतितराञ्चकार

śiśupālatvepi bhagavato bhūbhārāvatāraṇāyāvatīrṇāṁśasya puṇḍarīkanayanākhyasyopari dveṣānubandhamatitarāñcakāra

शिशुपाल के रूप में भी उसने अवनि का भार उतारने के लिए अवतीर्ण, कमल-नयन भगवान के प्रति अत्यंत द्वेष-भाव बना रखा।

श्लोक 52 (vishnu.4.14.52)

भगवता च स निधनमुपानीतस्तत्रैव परमात्मभूते मनस एकाग्रतया सायुज्यमवाप

bhagavatā ca sa nidhanamupānītastatraiva paramātmabhūte manasa ekāgratayā sāyujyamavāpa

भगवान द्वारा ही वह नाश को प्राप्त हुआ, और उसी क्षण, मन की उस परमात्म-स्वरूप में एकाग्रता के कारण, उसने सायुज्य (भगवान में लीन होने का पद) प्राप्त किया।

श्लोक 53 (vishnu.4.14.53)

भगवान् यदि प्रसन्नो यथाभिलषितं ददाति तथा अग्रसन्नोपि निघ्नन् दिव्यमनुपमं स्थानं प्रयच्छति

bhagavān yadi prasanno yathābhilaṣitaṁ dadāti tathā agrasannopi nighnan divyamanupamaṁ sthānaṁ prayacchati

भगवान प्रसन्न होकर जैसे अभीष्ट वर देते हैं, वैसे ही अप्रसन्न होकर भी, मारते हुए भी, वे दिव्य और अनुपम स्थान प्रदान करते हैं।

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