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पञ्चमांश · अध्याय 10

गोवर्धन-यज्ञ का प्रवर्तन

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (vishnu.5.10.1)

तयोविंहरतोस्तत्र राम-केशवयोर्व्रजे । प्रावृट् व्यतीता विकसत्-सरोजा चाभवच्छरत्

tayoviṁharatostatra rāma-keśavayorvraje prāvṛṭ vyatītā vikasat-sarojā cābhavaccharat

राम और केशव के वहाँ व्रज में विहार करते हुए वर्षाऋतु बीत गई और खिले हुए कमलों वाली शरद ऋतु आ गई।

श्लोक 2 (vishnu.5.10.2)

अवापुस्तापमत्यर्थं शफर्य्यः पल्वलोदके । पुत्रक्षेत्रादिसक्तेन ममत्वेन यथा गृही

avāpustāpamatyarthaṁ śapharyyaḥ palvalodake putrakṣetrādisaktena mamatvena yathā gṛhī

छोटी-छोटी मछलियाँ तालाब के जल में अत्यंत संताप को प्राप्त हुईं, जैसे पुत्र-क्षेत्र आदि में ममता से आसक्त गृहस्थ को कष्ट होता है।

श्लोक 3 (vishnu.5.10.3)

मयूरा मौनिस्तस्थुः परित्यक्तमदा वने । असारतां परिज्ञाय संसारस्येव योगिनः

mayūrā maunistasthuḥ parityaktamadā vane asāratāṁ parijñāya saṁsārasyeva yoginaḥ

मयूर अपना उन्माद त्यागकर वन में मौन खड़े रहे, मानो संसार की असारता को जानकर योगी मौन धारण कर लेते हैं।

श्लोक 4 (vishnu.5.10.4)

उत्सृज्य जलसर्वस्वं निर्म्मलाः सितमूर्त्तयः । तत्यजुश्वाम्बरं मेघा गृहं विज्ञानिनो यथा

utsṛjya jalasarvasvaṁ nirmmalāḥ sitamūrttayaḥ tatyajuśvāmbaraṁ meghā gṛhaṁ vijñānino yathā

अपनी संपूर्ण जल-सम्पत्ति त्यागकर, निर्मल और श्वेत आकृति वाले मेघों ने आकाश को त्याग दिया, जैसे ज्ञानी पुरुष गृहस्थी को त्याग देते हैं।

श्लोक 5 (vishnu.5.10.5)

शरत्सूर्य्यांशुतप्तानि ययुः शोष संरासि च । बह्वालम्बि-ममत्वेन हृदयानीव देहिनाम्

śaratsūryyāṁśutaptāni yayuḥ śoṣa saṁrāsi ca bahvālambi-mamatvena hṛdayānīva dehinām

शरद् के सूर्य की किरणों से तप्त होकर सरोवर सूख गए, जैसे अनेक वस्तुओं में ममत्व रखने से प्राणियों के हृदय शुष्क हो जाते हैं।

श्लोक 6 (vishnu.5.10.6)

कुमुदैः शरदम्भांसि योग्यतालक्षणं ययुः। अवबोधैर्मनांसीव सम्बन्धममलात्मनाम्

kumudaiḥ śaradambhāṁsi yogyatālakṣaṇaṁ yayuḥ avabodhairmanāṁsīva sambandhamamalātmanām

कुमुदों से युक्त शरद् का जल शोभा-योग्यता को प्राप्त हुआ, जैसे बोध द्वारा मन निर्मलात्माओं से सम्बन्ध को प्राप्त होता है।

श्लोक 7 (vishnu.5.10.7)

तारका विमले व्योम्नि रराजाखण्डमण्डलः । चन्द्रश्चरमदेहात्मा योगी साधुकुले यथा

tārakā vimale vyomni rarājākhaṇḍamaṇḍalaḥ candraścaramadehātmā yogī sādhukule yathā

निर्मल आकाश में तारागण तथा अखण्ड मण्डल वाला चन्द्रमा शोभित हुआ, जैसे अन्तिम देहधारी योगी किसी साधुकुल में शोभा पाता है।

श्लोक 8 (vishnu.5.10.8)

शनकैः शनकैस्तीरं तत्यजुश्व जलाशयाः । ममत्वं क्षेत्रपुत्रादिरूढ़मुच्चैर्यथा बुधाः

śanakaiḥ śanakaistīraṁ tatyajuśva jalāśayāḥ mamatvaṁ kṣetraputrādirūr̤hamuccairyathā budhāḥ

धीरे-धीरे जलाशयों ने अपने तटों को त्याग दिया, जैसे बुद्धिजन दृढ़तापूर्वक जड़ जमाए हुए क्षेत्र-पुत्रादि के ममत्व को धीरे-धीरे त्याग देते हैं।

श्लोक 9 (vishnu.5.10.9)

पूर्व्वं त्यक्तैः सरोऽम्भोभिर्हंसा योगं पुनर्ययुः । क्लेशैः कुयोगिनोऽशेषैरन्तरायहता इव

pūrvvaṁ tyaktaiḥ saro'mbhobhirhaṁsā yogaṁ punaryayuḥ kleśaiḥ kuyogino'śeṣairantarāyahatā iva

पहले त्यागे हुए सरोवर के जल से हंस पुनः मिल गए, जैसे कुयोगी अनेक क्लेशों के विघ्नों से बाधित होकर पुनः संसार में पड़ जाते हैं।

श्लोक 10 (vishnu.5.10.10)

निभृतोऽभवदत्यर्थं समुद्रः स्तिमितोदकः । क्रमावाप्तमहायोगो निश्वलात्मा यथा यतिः

nibhṛto'bhavadatyarthaṁ samudraḥ stimitodakaḥ kramāvāptamahāyogo niśvalātmā yathā yatiḥ

समुद्र, अपने जल के थम जाने से अत्यंत शान्त हो गया, जैसे क्रमशः महायोग को प्राप्त तथा निश्चल आत्मा वाला कोई यति होता है।

श्लोक 11 (vishnu.5.10.11)

सर्व्वत्रातिप्रसन्नानि सलिलानि तदाभवन् । ज्ञाते सर्व्वगते विष्णौ मनांसीव सुमेधसाम्

sarvvatrātiprasannāni salilāni tadābhavan jñāte sarvvagate viṣṇau manāṁsīva sumedhasām

उस समय सर्वत्र जल अत्यंत निर्मल हो गया, जैसे सर्वव्यापी विष्णु को जान लेने पर बुद्धिमानों के मन निर्मल हो जाते हैं।

श्लोक 12 (vishnu.5.10.12)

बभूव निर्म्मलं व्योम शरदा ध्वस्ततोयदम् । योगाग्निदग्धक्लेशौघं योगिनामिव मानसम्

babhūva nirmmalaṁ vyoma śaradā dhvastatoyadam yogāgnidagdhakleśaughaṁ yogināmiva mānasam

मेघों के नष्ट होने से शरद् के कारण आकाश निर्मल हो गया, जैसे योगाग्नि से क्लेश-समूह के जल जाने पर योगियों का मन निर्मल हो जाता है।

श्लोक 13 (vishnu.5.10.13)

सूर्य्यांशुजनितं तापं निन्यं तारापतिः शमम् । अहङ्कारोद्भवं दुःखं विवेकः सुमहानिव

sūryyāṁśujanitaṁ tāpaṁ ninyaṁ tārāpatiḥ śamam ahaṅkārodbhavaṁ duḥkhaṁ vivekaḥ sumahāniva

चन्द्रमा ने सूर्य की किरणों से उत्पन्न ताप को शान्त कर दिया, जैसे महान् विवेक अहंकार से उत्पन्न दुःख को शान्त कर देता है।

श्लोक 14 (vishnu.5.10.14)

नभसोऽभ्रान् भुवः पङ्कान् कालुष्यं चाम्भसः शरत् । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः प्रत्याहार इवाहरत्

nabhaso'bhrān bhuvaḥ paṅkān kāluṣyaṁ cāmbhasaḥ śarat indriyāṇīndriyārthebhyaḥ pratyāhāra ivāharat

शरद् ने आकाश से मेघों को, पृथ्वी से कीचड़ को, और जल से मलिनता को इस प्रकार हर लिया, जैसे प्रत्याहार इन्द्रियों को उनके विषयों से हर लेता है।

श्लोक 15 (vishnu.5.10.15)

प्राणायाम इवाम्भोभिः सरसां कृतपूरकैः । अभ्यस्यतेऽनुदिवसं रेचकाकुम्भकादिभिः

prāṇāyāma ivāmbhobhiḥ sarasāṁ kṛtapūrakaiḥ abhyasyate'nudivasaṁ recakākumbhakādibhiḥ

सरोवरों के जल के प्रतिदिन भरने और खाली होने से, मानो रेचक-कुम्भक आदि सहित प्राणायाम का प्रतिदिन अभ्यास किया जा रहा हो।

श्लोक 16 (vishnu.5.10.16)

विमलाम्बरनक्षत्रे काले चाभ्यागते व्रजे। ददर्शेन्द्रमहारम्भायौद्यतांस्तान् व्रजौकसः

vimalāmbaranakṣatre kāle cābhyāgate vraje dadarśendramahārambhāyaudyatāṁstān vrajaukasaḥ

जब निर्मल आकाश और नक्षत्रों वाला वह समय व्रज में आ पहुँचा, तब कृष्ण ने व्रजवासियों को इन्द्र-महोत्सव की तैयारी में जुटा हुआ देखा।

श्लोक 17 (vishnu.5.10.17)

कृष्णस्तानुत्सुकान् दृष्ट्वा गोपानुत्सवलालसान् । कौतूहलादिदं वाक्यं प्राह वृद्धान् महामतिः

kṛṣṇastānutsukān dṛṣṭvā gopānutsavalālasān kautūhalādidaṁ vākyaṁ prāha vṛddhān mahāmatiḥ

उन उत्सुक, उत्सव के लिए लालायित गोपों को देखकर महामति कृष्ण ने कौतूहलवश वृद्धजनों से यह वचन कहा।

श्लोक 18 (vishnu.5.10.18)

कोऽयं शक्रमहो नाम येन वो हर्ष आगतः । प्राह तं नन्दगोपश्व पृच्छन्तमतिसादरम्

ko'yaṁ śakramaho nāma yena vo harṣa āgataḥ prāha taṁ nandagopaśva pṛcchantamatisādaram

'यह इन्द्र-महोत्सव नामक क्या है, जिससे तुम्हें इतना हर्ष हुआ है?' — इस प्रकार पूछने पर नन्दगोप ने अत्यंत आदरपूर्वक उन्हें उत्तर दिया।

श्लोक 19 (vishnu.5.10.19)

मेघानां पयसां चेशो देवराजः शतक्रतुः । तेन सञ्चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बुमयं रसम्

meghānāṁ payasāṁ ceśo devarājaḥ śatakratuḥ tena sañcoditā meghā varṣantyambumayaṁ rasam

'शतक्रतु देवराज इन्द्र मेघों और जल के स्वामी हैं; उन्हीं की प्रेरणा से मेघ जलमय रस बरसाते हैं।'

श्लोक 20 (vishnu.5.10.20)

तद्वृष्टिजनितं शस्यं वयमन्ये च देहिनः । वर्त्तयामोपयुञ्जानास्तर्पयामश्व देवताः

tadvṛṣṭijanitaṁ śasyaṁ vayamanye ca dehinaḥ varttayāmopayuñjānāstarpayāmaśva devatāḥ

'उस वर्षा से उत्पन्न अन्न से हम तथा अन्य प्राणी अपना जीवन-निर्वाह करते हैं, और उसी से देवताओं को तृप्त करते हैं।'

श्लोक 21 (vishnu.5.10.21)

क्षीरवत्य इमा गावो वत्सवत्यश्व निर्वृताः । तेन संवर्द्धितैः शस्यैः पुष्टास्तुष्टा भवन्ति वै

kṣīravatya imā gāvo vatsavatyaśva nirvṛtāḥ tena saṁvarddhitaiḥ śasyaiḥ puṣṭāstuṣṭā bhavanti vai

'ये दूध देने वाली गौएँ, अपने बछड़ों सहित, सुखी रहती हैं; उसी वर्षा से पोषित फसलों से वे पुष्ट और संतुष्ट होती हैं।'

श्लोक 22 (vishnu.5.10.22)

नासस्या नातृणा भूमिर्न बुभुक्षार्द्दितो जनः । दृश्यते यत्र दृश्यन्ते वृष्टिमन्तो बलाहकाः

nāsasyā nātṛṇā bhūmirna bubhukṣārddito janaḥ dṛśyate yatra dṛśyante vṛṣṭimanto balāhakāḥ

'जहाँ वर्षा करने वाले मेघ दिखाई देते हैं, वहाँ भूमि न तो फसल-रहित होती है, न घास-रहित, और न ही लोग भूख से पीड़ित दिखाई देते हैं।'

श्लोक 23 (vishnu.5.10.23)

भौममेतत् पयो दुग्धं गोभिः सूर्य्यस्य वारिदः । पर्ज्जन्यः सर्व्वलोकस्य भवाय भुवि वर्षति

bhaumametat payo dugdhaṁ gobhiḥ sūryyasya vāridaḥ parjjanyaḥ sarvvalokasya bhavāya bhuvi varṣati

'सूर्य द्वारा गौओं के समान दुहे हुए इस पार्थिव जल को पर्जन्य (मेघ) समस्त लोक के कल्याण के लिए पृथ्वी पर बरसाते हैं।'

श्लोक 24 (vishnu.5.10.24)

तस्मात् प्रावृषि राजानः सर्व्वे शक्र मुदा युताः । मखैः सुरेशमर्च्चन्ति वयमन्ये च मानवाः

tasmāt prāvṛṣi rājānaḥ sarvve śakra mudā yutāḥ makhaiḥ sureśamarccanti vayamanye ca mānavāḥ

'इसीलिए वर्षाऋतु में सभी राजा प्रसन्नतापूर्वक यज्ञों द्वारा देवेश्वर शक्र की पूजा करते हैं, और हम तथा अन्य मनुष्य भी वैसे ही करते हैं।'

श्लोक 25 (vishnu.5.10.25)

नन्दगोपस्य वचनं श्रुत्वेत्थं शक्रपूजने । कोपाय त्रिदशेन्द्रस्य प्राह दामोदरस्तदा

nandagopasya vacanaṁ śrutvetthaṁ śakrapūjane kopāya tridaśendrasya prāha dāmodarastadā

नन्दगोप के इन शक्र-पूजा संबंधी वचनों को सुनकर, त्रिदशेन्द्र के कोप को आमंत्रित करते हुए दामोदर ने तब यह कहा।

श्लोक 26 (vishnu.5.10.26)

न वयं कृषिकर्त्तारो वाणिज्यजीवनो न च । गावोऽस्मद्दैवतं तात! वयं वनचरा यतः

na vayaṁ kṛṣikarttāro vāṇijyajīvano na ca gāvo'smaddaivataṁ tāta! vayaṁ vanacarā yataḥ

'हे तात! हम न तो कृषि करने वाले हैं, न ही व्यापार से जीविका चलाने वाले; हम वनचर हैं, इसलिए गौएँ ही हमारी देवता हैं।'

श्लोक 27 (vishnu.5.10.27)

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्डनीतिस्तथापरा । विद्याचतुष्टयं त्वेतत् वार्त्तामत्र शृणुष्व मे

ānvīkṣikī trayī vārttā daṇḍanītistathāparā vidyācatuṣṭayaṁ tvetat vārttāmatra śṛṇuṣva me

'आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता तथा दण्डनीति — ये चार विद्याएँ हैं; इनमें से वार्ता के विषय में मेरी बात सुनो।'

श्लोक 28 (vishnu.5.10.28)

कृषिर्वणिज्या तद्वच्च तृतीयं पशुपालनम् । विद्या ह्येका महाभाग! वार्त्ता वृत्तित्रयाश्रया

kṛṣirvaṇijyā tadvacca tṛtīyaṁ paśupālanam vidyā hyekā mahābhāga! vārttā vṛttitrayāśrayā

'हे महाभाग! कृषि, वाणिज्य तथा तीसरा पशुपालन — यह वार्ता नामक एक ही विद्या इन तीन वृत्तियों पर आश्रित है।'

श्लोक 29 (vishnu.5.10.29)

कर्षकाणां कृषिर्वृत्तिः पणयं विपणिजीविनाम् । अस्माकं गाः परा वृत्तिर्वार्त्ताभेदैरियं त्रिभिः

karṣakāṇāṁ kṛṣirvṛttiḥ paṇayaṁ vipaṇijīvinām asmākaṁ gāḥ parā vṛttirvārttābhedairiyaṁ tribhiḥ

'किसानों के लिए कृषि आजीविका है, व्यापारियों के लिए व्यापार; हमारे लिए गौएँ ही परम आजीविका हैं — इस प्रकार यह वार्ता तीन भेदों में विभक्त है।'

श्लोक 30 (vishnu.5.10.30)

विद्यया यो यया युक्तस्तस्य स दैवतं महत् । सैव पूज्यार्च्चनीया च सैव तस्योपकारिका

vidyayā yo yayā yuktastasya sa daivataṁ mahat saiva pūjyārccanīyā ca saiva tasyopakārikā

'जो व्यक्ति जिस विद्या से युक्त है, वही विद्या उसका महान् देवता है; वही पूजनीय और अर्चनीय है, क्योंकि वही उसकी उपकारिणी है।'

श्लोक 31 (vishnu.5.10.31)

यो यस्य फलमश्नन् वै पूजयत्यपरं नरः । इह च प्रेत्य चैवासौ न तदाप्नोति शोभनम्

yo yasya phalamaśnan vai pūjayatyaparaṁ naraḥ iha ca pretya caivāsau na tadāpnoti śobhanam

'जो मनुष्य जिसके फल का उपभोग करता है, यदि वह किसी अन्य की पूजा करता है, तो उसे न तो इस लोक में और न परलोक में शुभ फल प्राप्त होता है।'

श्लोक 32 (vishnu.5.10.32)

कृष्यान्ता प्रथिता सीमा सीमान्तञ्च पुनर्वनम् । वनान्ता गिरयः सर्व्वे ते चास्माकं परा गतिः

kṛṣyāntā prathitā sīmā sīmāntañca punarvanam vanāntā girayaḥ sarvve te cāsmākaṁ parā gatiḥ

'खेती की सीमा जहाँ समाप्त होती है, वहीं से वन आरम्भ होता है; और वन जहाँ समाप्त होता है, वहाँ पर्वत हैं — यही सब हमारी परम गति हैं।'

श्लोक 33 (vishnu.5.10.33)

न द्वारबन्धावरणा न गृहक्षेत्रिणस्तथा । सुखिनस्त्वखिले लोके यथा वै चक्रचारिणः

na dvārabandhāvaraṇā na gṛhakṣetriṇastathā sukhinastvakhile loke yathā vai cakracāriṇaḥ

'हमारे लिए न कोई द्वार-बंधन है, न कोई आवरण, न ही हम घर-खेत से बंधे हैं; हम सम्पूर्ण लोक में उतने ही सुखी हैं, जितने चक्र के समान स्वच्छन्द विचरण करने वाले।'

श्लोक 34 (vishnu.5.10.34)

श्रूयन्ते गिरयश्चैव वनोऽस्मिन् कामरूपिणः । तत्तद्रूपं समास्थाय रमन्ते स्वेषु सानुषु

śrūyante girayaścaiva vano'smin kāmarūpiṇaḥ tattadrūpaṁ samāsthāya ramante sveṣu sānuṣu

'सुना जाता है कि इस वन में पर्वत भी कामरूपी हैं; वे भिन्न-भिन्न रूप धारण करके अपनी ही चोटियों पर रमण करते हैं।'

श्लोक 35 (vishnu.5.10.35)

यदा चैते प्रबाध्यन्ते तेषां ये काननौकसः । तदा सिंहादिरूपैस्तान् घातयन्ति महीधराः

yadā caite prabādhyante teṣāṁ ye kānanaukasaḥ tadā siṁhādirūpaistān ghātayanti mahīdharāḥ

'और जब उनके वन-निवासियों को कोई पीड़ित करता है, तब वे पर्वत सिंह आदि का रूप धारण करके उन दुष्टों का वध कर देते हैं।'

श्लोक 36 (vishnu.5.10.36)

गिरियज्ञस्त्वयं तस्माद् गोयज्ञश्च प्रवर्त्त्यताम् । किमस्माकं महेन्द्रेण गावः शैलाश्व देवताः

giriyajñastvayaṁ tasmād goyajñaśca pravarttyatām kimasmākaṁ mahendreṇa gāvaḥ śailāśva devatāḥ

'अतः यह गिरि-यज्ञ तथा गो-यज्ञ ही प्रवृत्त किया जाए; हमें महेन्द्र से क्या प्रयोजन? गौएँ और पर्वत ही हमारे देवता हैं।'

श्लोक 37 (vishnu.5.10.37)

मन्त्रयज्ञपरा विप्राः सीतायज्ञाश्व कर्षकाः । गिरि-गोयज्ञशीलाश्व वयमद्रिवनाश्रयाः

mantrayajñaparā viprāḥ sītāyajñāśva karṣakāḥ giri-goyajñaśīlāśva vayamadrivanāśrayāḥ

'ब्राह्मण मंत्र-यज्ञ में तत्पर हैं, कृषक सीता-यज्ञ (कृषि-यज्ञ) में; और पर्वत-वन के आश्रित हम गिरि-यज्ञ तथा गो-यज्ञ के स्वभाव वाले हैं।'

श्लोक 38 (vishnu.5.10.38)

तस्माद् गोवर्द्धनः शैलो भवद्भिर्विविधार्हणैः । अर्च्च्यतां पूज्यतां मेध्यान् पशून् हत्वा विधानतः

tasmād govarddhanaḥ śailo bhavadbhirvividhārhaṇaiḥ arccyatāṁ pūjyatāṁ medhyān paśūn hatvā vidhānataḥ

'अतः विधिपूर्वक पवित्र पशुओं का बलिदान करके, तुम सब विविध उपचारों से गोवर्धन पर्वत की अर्चना और पूजा करो।'

श्लोक 39 (vishnu.5.10.39)

सर्व्वघोषस्य सन्दोहो गृह्यतां मा विचार्य्यताम् । भोज्यन्तां तेन वै विप्रास्तथा ये चाभिवाञ्छकाः

sarvvaghoṣasya sandoho gṛhyatāṁ mā vicāryyatām bhojyantāṁ tena vai viprāstathā ye cābhivāñchakāḥ

'सम्पूर्ण व्रज-समुदाय का दूध बिना विचार किए इकट्ठा किया जाए; और उससे ब्राह्मणों को तथा जो भी इच्छुक हों, उन्हें भोजन कराया जाए।'

श्लोक 40 (vishnu.5.10.40)

तत्रार्चिते कृते होमे भोजितेषु द्विजातिषु । शरत्पुष्पकृतापीड़ाः परिगच्छन्तु गोगणाः

tatrārcite kṛte home bhojiteṣu dvijātiṣu śaratpuṣpakṛtāpīr̤āḥ parigacchantu gogaṇāḥ

'वहाँ पूजा और होम सम्पन्न होने पर तथा ब्राह्मणों को भोजन कराए जाने पर, शरद्-पुष्पों से सज्जित गौओं के समूह उस पर्वत की परिक्रमा करें।'

श्लोक 41 (vishnu.5.10.41)

एतन्मम मतं गोपाः सम्प्रीत्या क्रियते यदि । ततः कृता भवेत् प्रीतिर्गवामद्रेस्तथा मम

etanmama mataṁ gopāḥ samprītyā kriyate yadi tataḥ kṛtā bhavet prītirgavāmadrestathā mama

'हे गोपो! यह मेरा मत है; यदि यह प्रेमपूर्वक किया जाए, तो गौओं की, पर्वत की तथा मेरी भी प्रसन्नता होगी।'

श्लोक 42 (vishnu.5.10.42)

इति तस्य वचः श्रुत्वा नन्दाद्यास्ते व्रजौकसः । प्रीत्युत्फुल्लमुखा विप्र! साधु साध्वित्यथाब्रुवन्

iti tasya vacaḥ śrutvā nandādyāste vrajaukasaḥ prītyutphullamukhā vipra! sādhu sādhvityathābruvan

हे विप्र! उनके इन वचनों को सुनकर नन्द आदि व्रजवासी प्रसन्नता से खिले हुए मुख से 'साधु-साधु' कहने लगे।

श्लोक 43 (vishnu.5.10.43)

शोभनं ते मतं वत्स! यदेतद्भवतोदितम् । तत् करिष्यामहे सर्व्वं गिरियज्ञः प्रवर्त्त्यताम्

śobhanaṁ te mataṁ vatsa! yadetadbhavatoditam tat kariṣyāmahe sarvvaṁ giriyajñaḥ pravarttyatām

'हे वत्स! तुमने जो यह मत कहा है, वह उत्तम है; हम यह सब करेंगे — गिरि-यज्ञ प्रवृत्त किया जाए।'

श्लोक 44 (vishnu.5.10.44)

तथा च कृतवन्तस्ते गिरियज्ञं व्रजौकसः । दधि-पायस-मांसाद्यैर्ददुः शैलबलिं ततः

tathā ca kṛtavantaste giriyajñaṁ vrajaukasaḥ dadhi-pāyasa-māṁsādyairdaduḥ śailabaliṁ tataḥ

और इस प्रकार व्रजवासियों ने गिरि-यज्ञ किया और दही, खीर, मांस आदि से पर्वत को बलि अर्पित की।

श्लोक 45 (vishnu.5.10.45)

द्विजांश्च भोजयामासुः शतशोऽथ सहस्रशः । अन्यानप्यागतानित्थं कृष्णेनोक्तं यथा पुरा

dvijāṁśca bhojayāmāsuḥ śataśo'tha sahasraśaḥ anyānapyāgatānitthaṁ kṛṣṇenoktaṁ yathā purā

उन्होंने सैकड़ों-हजारों ब्राह्मणों को तथा अन्य आगन्तुकों को भी भोजन कराया, ठीक वैसा ही जैसा कृष्ण ने पहले कहा था।

श्लोक 46 (vishnu.5.10.46)

गावः शैलं ततश्चक्रुरर्चितास्ताः प्रदक्षिणम् । ऋषभाश्चापि नर्द्दन्तः सतोया जलदा इव

gāvaḥ śailaṁ tataścakrurarcitāstāḥ pradakṣiṇam ṛṣabhāścāpi narddantaḥ satoyā jaladā iva

पूजित की गई गौओं ने तब पर्वत की प्रदक्षिणा की, और वृषभ भी जल से भरे मेघों के समान गरजने लगे।

श्लोक 47 (vishnu.5.10.47)

गिरिमूर्द्धनि कृष्णोऽपि शैलोऽहमिति मूर्त्तिमान् । बुभुजेऽन्नं बहु तदा गोपवर्य्याहृतं द्विज

girimūrddhani kṛṣṇo'pi śailo'hamiti mūrttimān bubhuje'nnaṁ bahu tadā gopavaryyāhṛtaṁ dvija

हे द्विज! कृष्ण भी 'मैं ही पर्वत हूँ' — इस रूप में साकार होकर पर्वत के शिखर पर श्रेष्ठ गोपों द्वारा लाया गया प्रचुर अन्न उस समय भक्षण करने लगे।

श्लोक 48 (vishnu.5.10.48)

अन्येन कृष्णो रूपेण गोपैः सह गिरेः शिरः । अधिरुह्यार्च्चयामास द्रितीयामात्मनस्तनुम्

anyena kṛṣṇo rūpeṇa gopaiḥ saha gireḥ śiraḥ adhiruhyārccayāmāsa dritīyāmātmanastanum

दूसरे रूप में कृष्ण ने गोपों के साथ पर्वत के शिखर पर चढ़कर अपने ही उस दूसरे शरीर की पूजा की।

श्लोक 49 (vishnu.5.10.49)

अन्तर्द्धानं गते तस्मिन् गोपा लब्ध्वा ततो वरान् । कृत्वा गिरिमखं गोष्ठं निजमभ्याययुः पुनः

antarddhānaṁ gate tasmin gopā labdhvā tato varān kṛtvā girimakhaṁ goṣṭhaṁ nijamabhyāyayuḥ punaḥ

उस पर्वत-रूप के अंतर्धान हो जाने पर, गोपगण वरदान प्राप्त करके तथा गिरि-यज्ञ सम्पन्न करके पुनः अपने गोष्ठ को लौट आए।

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