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पञ्चमांश · अध्याय 11

इन्द्र-कोप और गोवर्धन-धारण

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (vishnu.5.11.1)

श्रीपराशर उवाच । मखे प्रतिहते शक्रो मैत्रेयातिरुषान्वितः । संवर्त्तकं नाम गणं तोयदानामथाऽब्रवीत्

śrīparāśara uvāca makhe pratihate śakro maitreyātiruṣānvitaḥ saṁvarttakaṁ nāma gaṇaṁ toyadānāmathā'bravīt

पराशर जी ने कहा — हे मैत्रेय! अपना यज्ञ भंग होने पर अत्यंत क्रोधित इन्द्र ने तब संवर्तक नामक मेघ-समूह से यह कहा।

श्लोक 2 (vishnu.5.11.2)

भोभो मेघा निशम्यैतद्वचनं गदतो मम । आज्ञानंतरमेवाशु क्रियतामविचारितम्

bhobho meghā niśamyaitadvacanaṁ gadato mama ājñānaṁtaramevāśu kriyatāmavicāritam

'हे मेघो! मेरे कहे हुए इन वचनों को सुनो; मेरी आज्ञा मिलते ही तत्काल, बिना विचार किए यह कार्य करो।'

श्लोक 3 (vishnu.5.11.3)

नंदगोपस्सुदुर्बुद्धिर्गोपैरन्यैस्सहायवान् । कृष्णाश्रयं बलाध्मातो मखभंगमचीकरत्

naṁdagopassudurbuddhirgopairanyaissahāyavān kṛṣṇāśrayaṁ balādhmāto makhabhaṁgamacīkarat

'अत्यंत दुर्बुद्धि नन्दगोप ने, अन्य गोपों के साथ मिलकर, कृष्ण का आश्रय लेकर तथा बल से उन्मत्त होकर मेरे यज्ञ का विनाश किया है।'

श्लोक 4 (vishnu.5.11.4)

आजीवो याः परस्तेषां गावस्तस्य च कारणम् । तागावो वृष्टिपातेन पीड्यन्तां वचनान्मम

ājīvo yāḥ parasteṣāṁ gāvastasya ca kāraṇam tāgāvo vṛṣṭipātena pīḍyantāṁ vacanānmama

'उनकी जो प्रमुख आजीविका हैं तथा जो इस अपराध का कारण भी हैं, वे गौएँ मेरे वचन से वर्षा के प्रकोप से पीड़ित की जाएँ।'

श्लोक 5 (vishnu.5.11.5)

अहमप्यद्रि शृंगाभं तुंगमारुह्य वारणम् । साहाय्यं वः करिष्यामि वाय्वम्बूत्सर्गयोजितम्

ahamapyadri śṛṁgābhaṁ tuṁgamāruhya vāraṇam sāhāyyaṁ vaḥ kariṣyāmi vāyvambūtsargayojitam

'मैं भी पर्वत-शिखर के समान ऊँचे अपने गजराज पर आरूढ़ होकर वायु और जल के वेगपूर्वक विसर्जन द्वारा तुम्हारी सहायता करूँगा।'

श्लोक 6 (vishnu.5.11.6)

श्रीपराशर उवाच । इत्याज्ञप्तास्ततस्तेन मुमुचुस्ते बलाहकाः । वातवर्षं महाभीममभावाय गवां द्विज

śrīparāśara uvāca ityājñaptāstatastena mumucuste balāhakāḥ vātavarṣaṁ mahābhīmamabhāvāya gavāṁ dvija

पराशर जी ने कहा — हे द्विज! उनके द्वारा इस प्रकार आज्ञप्त होकर उन मेघों ने गौओं के विनाश हेतु अत्यंत भीषण वायु और वर्षा छोड़ी।

श्लोक 7 (vishnu.5.11.7)

ततः क्षणेन पृथिवी ककुभॐबरमेव च । एकं धारामहासारपूरेणनाभवन्मुने

tataḥ kṣaṇena pṛthivī kakubhaoṁbarameva ca ekaṁ dhārāmahāsārapūreṇanābhavanmune

हे मुने! तब क्षणभर में ही पृथ्वी, दिशाएँ और आकाश — ये सब वर्षा-धाराओं के महाप्रवाह से एक-सा हो गए।

श्लोक 8 (vishnu.5.11.8)

विद्युल्लताकषाघातत्रस्तैरिव घनैर्घनम् । नादापूरितदिक्चक्रैर्धारासारमपात्यत

vidyullatākaṣāghātatrastairiva ghanairghanam nādāpūritadikcakrairdhārāsāramapātyata

मानो बिजली की लताओं की चाबुक-सी मार से भयभीत मेघों ने अपनी गर्जना से दिशाचक्र को भरते हुए सघन जलधाराएँ बरसाईं।

श्लोक 9 (vishnu.5.11.9)

अंधकारीकृते लोके वर्षद्भिरनिशं घनैः । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् च जगदाप्यमिवाभवत्

aṁdhakārīkṛte loke varṣadbhiraniśaṁ ghanaiḥ adhaścordhvaṁ ca tiryak ca jagadāpyamivābhavat

निरन्तर बरसते हुए मेघों से जगत् अंधकारमय हो गया, और नीचे, ऊपर तथा चारों ओर सारा संसार मानो जलमय हो गया।

श्लोक 10 (vishnu.5.11.10)

गावस्तु तेन पतता वर्षवातेन वेगिना । धूताः प्राणाञ्जहुस्सन्नत्रिकसक्थिशिरोधराः

gāvastu tena patatā varṣavātena veginā dhūtāḥ prāṇāñjahussannatrikasakthiśirodharāḥ

उस वेगवती वर्षा-वायु से हिलती हुई गौएँ, शिथिल होकर, नितंब, जंघा और गर्दन झुकाए हुए अपने प्राण त्यागने लगीं।

श्लोक 11 (vishnu.5.11.11)

क्रोडेन वत्सानाक्रम्य तस्थुरन्या महामुने । गावो विवत्साश्च कृता वारिपूरेण चापराः

kroḍena vatsānākramya tasthuranyā mahāmune gāvo vivatsāśca kṛtā vāripūreṇa cāparāḥ

हे महामुने! कुछ गौएँ अपने बछड़ों को छाती से लगाकर खड़ी रहीं, और कुछ जल के प्रवाह से अपने बछड़ों से बिछुड़ गईं।

श्लोक 12 (vishnu.5.11.12)

वत्साश्च दीनवदना वातकंपितकंधराः । त्राहित्राहीत्यल्पशब्दाः कृष्णमूचुरिवातुराः

vatsāśca dīnavadanā vātakaṁpitakaṁdharāḥ trāhitrāhītyalpaśabdāḥ kṛṣṇamūcurivāturāḥ

और बछड़े, दीन मुख वाले, वायु से काँपती हुई गर्दन वाले, क्षीण स्वर से 'बचाओ, बचाओ' कहते हुए मानो व्याकुल होकर कृष्ण को ही पुकार रहे थे।

श्लोक 13 (vishnu.5.11.13)

ततस्तद्गोकुलं सर्वं गोगोपीगोपसंकुलम् । अतीवार्त्तं हरिर्दृष्ट्वा मैत्रेयाचिंतयत्तदा

tatastadgokulaṁ sarvaṁ gogopīgopasaṁkulam atīvārttaṁ harirdṛṣṭvā maitreyāciṁtayattadā

हे मैत्रेय! तब गौओं, गोपियों और गोपों से भरे उस सम्पूर्ण गोकुल को अत्यंत पीड़ित देखकर हरि ने यह विचार किया।

श्लोक 14 (vishnu.5.11.14)

एतत्कृतं महेंद्रे ण मखभंगविरोधिना । तदेतदखिलं गोष्ठं त्रातव्यमधुना मया

etatkṛtaṁ maheṁdre ṇa makhabhaṁgavirodhinā tadetadakhilaṁ goṣṭhaṁ trātavyamadhunā mayā

'यह सब महेन्द्र ने, जो अपने यज्ञ-भंग से रुष्ट है, किया है; अतः अब मुझे ही इस सम्पूर्ण गोष्ठ की रक्षा करनी होगी।'

श्लोक 15 (vishnu.5.11.15)

इममद्रि महं धैर्यादुत्पाट्योरुशिखाघनम् । धारयिष्यामि गोष्ठस्य पृथुच्छत्रमिवोपरि

imamadri mahaṁ dhairyādutpāṭyoruśikhāghanam dhārayiṣyāmi goṣṭhasya pṛthucchatramivopari

'मैं धैर्यपूर्वक इस विशाल-शिखर वाले, मेघों को छूने वाले पर्वत को उखाड़कर गोष्ठ के ऊपर एक विशाल छत्र के समान धारण करूँगा।'

श्लोक 16 (vishnu.5.11.16)

श्रीपराशर उवाच । इति कृत्वामतिं कृष्णो गोवर्द्धनमहीधरम् । उत्पाट्यैककरेणैव धारयामास लीलया

śrīparāśara uvāca iti kṛtvāmatiṁ kṛṣṇo govarddhanamahīdharam utpāṭyaikakareṇaiva dhārayāmāsa līlayā

पराशर जी ने कहा — ऐसा निश्चय करके कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को एक ही हाथ से उखाड़कर लीलापूर्वक धारण कर लिया।

श्लोक 17 (vishnu.5.11.17)

गोपांश्चाह हसञ्छौरिस्समुत्पाटितभूधरः । विशध्वमत्रत्वरिताः कृतं वर्षनिवारणम्

gopāṁścāha hasañchaurissamutpāṭitabhūdharaḥ viśadhvamatratvaritāḥ kṛtaṁ varṣanivāraṇam

पर्वत को उखाड़ चुके शौरि ने हँसते हुए गोपों से कहा — 'शीघ्र यहाँ प्रवेश करो; वर्षा का निवारण कर दिया गया है।'

श्लोक 18 (vishnu.5.11.18)

सुनिवातेषु देश्षोउ! यथा जोषमिहास्यताम् । प्रविश्यतां न भेतव्यं गिरिपाताच्च निर्भयैः

sunivāteṣu deśṣou! yathā joṣamihāsyatām praviśyatāṁ na bhetavyaṁ giripātācca nirbhayaiḥ

'यहाँ सुरक्षित स्थानों पर सुखपूर्वक बैठ जाओ; निर्भय होकर प्रवेश करो, पर्वत के गिरने का कोई भय मत करो।'

श्लोक 19 (vishnu.5.11.19)

इत्युक्तास्तेन ते गोपा विविशुर्गोधनैस्सह । शकटारोपितैर्भांडैर्गोप्यश्चासारपीडिताः

ityuktāstena te gopā viviśurgodhanaissaha śakaṭāropitairbhāṁḍairgopyaścāsārapīḍitāḥ

उनके इस प्रकार कहने पर वर्षा से पीड़ित गोप अपने गोधन तथा गाड़ियों पर लदे सामान सहित, और गोपियाँ भी, वहाँ प्रविष्ट हो गईं।

श्लोक 20 (vishnu.5.11.20)

कृष्णोपि तं दधारैव शैलमत्यंतनिश्चलम् । व्रजौकवासिभिर्हर्षविस्मिताक्षैर्निरीक्षितः

kṛṣṇopi taṁ dadhāraiva śailamatyaṁtaniścalam vrajaukavāsibhirharṣavismitākṣairnirīkṣitaḥ

और कृष्ण ने उस पर्वत को अत्यंत निश्चल धारण किए रखा, जिसे व्रजवासी हर्ष और विस्मय से भरी आँखों से देख रहे थे।

श्लोक 21 (vishnu.5.11.21)

गोपगोपीजनैर्हृष्टैः प्रीतिविस्तारितेक्षणैः । संस्तूयमानचरितः कृष्णश्शैलमधारयत्

gopagopījanairhṛṣṭaiḥ prītivistāritekṣaṇaiḥ saṁstūyamānacaritaḥ kṛṣṇaśśailamadhārayat

हर्षित गोप-गोपियों द्वारा, जिनके नेत्र प्रेम से विस्तृत हो गए थे, अपने चरित्र की स्तुति किए जाते हुए कृष्ण ने उस पर्वत को धारण किए रखा।

श्लोक 22 (vishnu.5.11.22)

सप्तरात्रं महामेघा ववर्षुर्नंदगोकुले । इंद्रे ण चोदिता विप्र गोपानां नाशकारिणा

saptarātraṁ mahāmeghā vavarṣurnaṁdagokule iṁdre ṇa coditā vipra gopānāṁ nāśakāriṇā

हे विप्र! गोपों के विनाश की इच्छा रखने वाले इन्द्र से प्रेरित होकर महामेघों ने नन्द के गोकुल में सात रात्रि तक वर्षा की।

श्लोक 23 (vishnu.5.11.23)

ततो धृते महाशैले परित्राते च गोकुले । मिथ्याप्रतिज्ञो बलभिद्वारयामास तान्घनान्

tato dhṛte mahāśaile paritrāte ca gokule mithyāpratijño balabhidvārayāmāsa tānghanān

तब महापर्वत के धारण किए जाने पर और गोकुल के रक्षित हो जाने पर, अपनी प्रतिज्ञा मिथ्या सिद्ध हुई देखकर इन्द्र ने उन मेघों को रोक दिया।

श्लोक 24 (vishnu.5.11.24)

व्यभ्रे नभसि देवेंद्रे वितथात्मवचस्यथ । निष्क्रम्य गोकुलं हृष्टं स्वस्थानं पुनरागमत्

vyabhre nabhasi deveṁdre vitathātmavacasyatha niṣkramya gokulaṁ hṛṣṭaṁ svasthānaṁ punarāgamat

आकाश के मेघरहित हो जाने पर तथा देवेन्द्र का अपना वचन मिथ्या सिद्ध होने पर, हर्षित गोकुल पर्वत से बाहर निकलकर पुनः अपने-अपने स्थान को लौट आया।

श्लोक 25 (vishnu.5.11.25)

मुमोच कृष्णोपि तदा गोवर्द्धनमहाचलम् । स्वस्थाने विस्मितमुखैर्दृष्टस्तैस्तु व्रजौकसैः

mumoca kṛṣṇopi tadā govarddhanamahācalam svasthāne vismitamukhairdṛṣṭastaistu vrajaukasaiḥ

कृष्ण ने भी तब विस्मितमुख व्रजवासियों के देखते-देखते गोवर्धन महापर्वत को उसके अपने स्थान पर पुनः स्थापित कर दिया।

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