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पञ्चमांश · अध्याय 28

द्यूत-क्रीड़ा में रुक्मी का वध

अध्याय 27अध्याय-सूचीअध्याय 29

श्लोक 1 (vishnu.5.28.1)

पराशर उवाच । चारुदेष्णं सुदेष्णं च चारुदेहं च वीर्यवान् । सुषेणं चारुगुप्तं च भद्रचारुं तथा परम्

parāśara uvāca cārudeṣṇaṁ sudeṣṇaṁ ca cārudehaṁ ca vīryavān suṣeṇaṁ cāruguptaṁ ca bhadracāruṁ tathā param

पराशर ने कहा — पराक्रमी कृष्ण ने चारुदेष्ण, सुदेष्ण, चारुदेह, सुषेण, चारुगुप्त तथा श्रेष्ठ भद्रचारु —

श्लोक 2 (vishnu.5.28.2)

चारुविन्दं सुचारुं च चारुं च बलिनां वरम् । रुक्मिण्य् अजनयत् पुत्रान् कन्यां चारुमतीं तथा

cāruvindaṁ sucāruṁ ca cāruṁ ca balināṁ varam rukmiṇy ajanayat putrān kanyāṁ cārumatīṁ tathā

— चारुविन्द, सुचारु और बलवानों में श्रेष्ठ चारु, इन पुत्रों को तथा चारुमती नामक कन्या को रुक्मिणी से उत्पन्न किया।

श्लोक 3 (vishnu.5.28.3)

अन्याश्च भार्याः कृष्णस्य बभूवुः सप्त शोभनाः । कालिन्दी मित्रविन्दा च सत्या नाग्नजिती तथा

anyāśca bhāryāḥ kṛṣṇasya babhūvuḥ sapta śobhanāḥ kālindī mitravindā ca satyā nāgnajitī tathā

कृष्ण की अन्य सात सुंदर पत्नियाँ भी थीं — कालिन्दी, मित्रविन्दा, सत्या, नाग्नजिती,

श्लोक 4 (vishnu.5.28.4)

देवी जाम्बवती चापि रोहिणी कामरूपिणी । मद्रराजसुता चान्या सुशीला शीलमण्डना

devī jāmbavatī cāpi rohiṇī kāmarūpiṇī madrarājasutā cānyā suśīlā śīlamaṇḍanā

देवी जाम्बवती, तथा इच्छानुसार रूप धारण करने वाली रोहिणी, और मद्रराज की एक अन्य सुशील, शीलभूषित कन्या —

श्लोक 5 (vishnu.5.28.5)

सात्राजिती सत्यभामा लक्ष्मणा चारुहासिनी । षोडशासन् सहस्राणि स्त्रीणाम् अन्यानि चक्रिणः

sātrājitī satyabhāmā lakṣmaṇā cāruhāsinī ṣoḍaśāsan sahasrāṇi strīṇām anyāni cakriṇaḥ

सत्राजित की पुत्री सत्यभामा, तथा मधुर मुस्कान वाली लक्ष्मणा — और चक्रधारी कृष्ण की अन्य सोलह हज़ार स्त्रियाँ भी थीं।

श्लोक 6 (vishnu.5.28.6)

प्रद्युम्नोऽपि महावीर्यो रुक्मिणस्तनयां शुभाम् । स्वयंवरस्थां जग्राह सा च तं तनयं हरेः

pradyumno'pi mahāvīryo rukmiṇastanayāṁ śubhām svayaṁvarasthāṁ jagrāha sā ca taṁ tanayaṁ hareḥ

महापराक्रमी प्रद्युम्न ने भी रुक्मी की सुंदर कन्या को उसके स्वयंवर में प्राप्त किया, और उसने भी हरिपुत्र प्रद्युम्न को ही वरा।

श्लोक 7 (vishnu.5.28.7)

तस्याम् अस्याभवत् पुत्रो महाबलपराक्रमः । अनिरुद्धो रणे रुद्धो वीर्योदधिररिंदमः

tasyām asyābhavat putro mahābalaparākramaḥ aniruddho raṇe ruddho vīryodadhirariṁdamaḥ

उससे उसका महाबलशाली पुत्र हुआ — अनिरुद्ध, जो युद्ध में कभी रोका नहीं जा सका, पराक्रम का सागर, शत्रुदमन।

श्लोक 8 (vishnu.5.28.8)

तस्यापि रुक्मिणः पौत्रीं वरयाम् आस केशवः । दौहित्राय ददौ रुक्मी तां स्पर्धन्न् अपि शौरिणा

tasyāpi rukmiṇaḥ pautrīṁ varayām āsa keśavaḥ dauhitrāya dadau rukmī tāṁ spardhann api śauriṇā

केशव ने अनिरुद्ध के लिए उसी रुक्मी की पौत्री को वरने की चेष्टा की, और रुक्मी ने शौरि (कृष्ण) से स्पर्धा रखते हुए भी उसे अपने दौहित्र (अनिरुद्ध) को दे दिया।

श्लोक 9 (vishnu.5.28.9)

तस्या विवाहे रामाद्या यादवा हरिणा सह । रुक्मिणो नगरं जग्मुर्नाम्ना भोजकटं द्विज

tasyā vivāhe rāmādyā yādavā hariṇā saha rukmiṇo nagaraṁ jagmurnāmnā bhojakaṭaṁ dvija

हे द्विज! उसके विवाह के लिए बलराम आदि यादव हरि के साथ रुक्मी के नगर, जिसका नाम भोजकट था, वहाँ गए।

श्लोक 10 (vishnu.5.28.10)

विवाहे तत्र निर्वृत्ते प्राद्युम्नेः सुमहात्मनः । कलिङ्गराजप्रमुखा रुक्मिणं वाक्यम् अब्रुवन्

vivāhe tatra nirvṛtte prādyumneḥ sumahātmanaḥ kaliṅgarājapramukhā rukmiṇaṁ vākyam abruvan

वहाँ प्रद्युम्न के महात्मा पुत्र (अनिरुद्ध) का विवाह सम्पन्न होने पर कलिंगराज-प्रमुख राजाओं ने रुक्मी से यह कहा —

श्लोक 11 (vishnu.5.28.11)

अनक्षज्ञो हली द्यूते तथास्य व्यसनं महत् । न जयामो बलं कस्माद् द्यूते नैनं महाद्युते

anakṣajño halī dyūte tathāsya vyasanaṁ mahat na jayāmo balaṁ kasmād dyūte nainaṁ mahādyute

'हलधर (बलराम) द्यूत-विद्या नहीं जानते, और यही उनका बड़ा व्यसन है। हे महातेजस्वी! हम द्यूत में बल को क्यों न जीत लें?'

श्लोक 12 (vishnu.5.28.12)

पराशर उवाच । तथेति तान् आह नृपान् रुक्मी बलसमन्वितः । सभायां सह रामेण चक्रे द्यूतं च वै तदा

parāśara uvāca tatheti tān āha nṛpān rukmī balasamanvitaḥ sabhāyāṁ saha rāmeṇa cakre dyūtaṁ ca vai tadā

पराशर ने कहा — 'ऐसा ही हो' कहकर रुक्मी ने उन राजाओं से यह कहा, और बल के साथ सभा में उसने उस समय द्यूत खेला।

श्लोक 13 (vishnu.5.28.13)

सहस्रम् एकं निष्काणां रुक्मिणा विजितो बलः । द्वितीयेऽपि पणे चान्यत् सहस्रं रुक्मिणा जितः

sahasram ekaṁ niṣkāṇāṁ rukmiṇā vijito balaḥ dvitīye'pi paṇe cānyat sahasraṁ rukmiṇā jitaḥ

एक हज़ार निष्कों की शर्त पर रुक्मी ने बल को हरा दिया; दूसरी बाजी में भी एक और हज़ार की शर्त पर रुक्मी ने बल को हराया।

श्लोक 14 (vishnu.5.28.14)

ततो दशसहस्राणि निष्काणां पणम् आददे । बलभद्रोऽजयत् तानि रुक्मी द्यूतविदां वरः

tato daśasahasrāṇi niṣkāṇāṁ paṇam ādade balabhadro'jayat tāni rukmī dyūtavidāṁ varaḥ

तब बलभद्र ने दस हज़ार निष्कों की शर्त लगाई — द्यूत-विशारदों में श्रेष्ठ रुक्मी ने उसे भी जीत लिया।

श्लोक 15 (vishnu.5.28.15)

ततो जहास स्वनवत् कलिङ्गाधिपतिर्द्विज । दन्तान् विदर्शयन् मूढो रुक्मी चाह मदोद्धतः

tato jahāsa svanavat kaliṅgādhipatirdvija dantān vidarśayan mūḍho rukmī cāha madoddhataḥ

हे द्विज! तब कलिंगाधिपति ज़ोर से हँसा, मूर्खतावश दाँत दिखाते हुए, और मद से उन्मत्त रुक्मी ने कहा —

श्लोक 16 (vishnu.5.28.16)

अविद्योऽयं मया द्यूते बलदेवः पराजितः । मुधैवाक्षावलेपान्धो योऽवमेनेऽक्षकोविदान्

avidyo'yaṁ mayā dyūte baladevaḥ parājitaḥ mudhaivākṣāvalepāndho yo'vamene'kṣakovidān

'यह अनजान बलदेव मुझसे द्यूत में हार गया — व्यर्थ ही पासों के अभिमान से अंधा होकर उसने द्यूत-विशारदों का तिरस्कार किया था।'

श्लोक 17 (vishnu.5.28.17)

दृष्ट्वा कलिङ्गराजानं प्रकाशदशनाननम् । रुक्मिणं चापि दुर्वाक्यं कोपं चक्रे हलायुधः

dṛṣṭvā kaliṅgarājānaṁ prakāśadaśanānanam rukmiṇaṁ cāpi durvākyaṁ kopaṁ cakre halāyudhaḥ

दाँत दिखाते हुए कलिंगराज को और रुक्मी की कटु वाणी को देख-सुनकर हलायुध (बलराम) क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 18 (vishnu.5.28.18)

ततः कोपपरीतात्मा निष्ककोटिं हलायुधः । ग्लहं जग्राह रुक्मी च तदर्थेऽक्षान् अपातयत्

tataḥ kopaparītātmā niṣkakoṭiṁ halāyudhaḥ glahaṁ jagrāha rukmī ca tadarthe'kṣān apātayat

तब क्रोध से आविष्ट हलायुध ने एक करोड़ निष्कों की शर्त लगाई, और उस शर्त के लिए रुक्मी ने पासे फेंके।

श्लोक 19 (vishnu.5.28.19)

अजयद् बलदेवस्तं प्राहोच्चैस्तं जितं मया । मयेति रुक्मी प्राहोच्चैरलीकोक्तैरलं बल

ajayad baladevastaṁ prāhoccaistaṁ jitaṁ mayā mayeti rukmī prāhoccairalīkoktairalaṁ bala

बलदेव जीत गए और ऊँचे स्वर में बोले — 'मैंने जीत लिया!' परन्तु रुक्मी झूठा दावा करते हुए ऊँचे स्वर में बोला — 'नहीं, मैंने जीता! बस करो, बल!'

श्लोक 20 (vishnu.5.28.20)

त्वयोक्तोऽयं ग्लहः सत्यं न मयैषोऽनुमोदितः । एवं त्वया चेद् विजितं मया न विजितं कथम्

tvayokto'yaṁ glahaḥ satyaṁ na mayaiṣo'numoditaḥ evaṁ tvayā ced vijitaṁ mayā na vijitaṁ katham

'यह शर्त तुमने अवश्य रखी थी, परन्तु इसे मैंने स्वीकार नहीं किया था। यदि इस प्रकार तुमने जीत लिया, तो मैंने क्यों नहीं जीता?'

श्लोक 21 (vishnu.5.28.21)

पराशर उवाच । अथान्तरिक्षे वाग् उच्चैः प्राह गम्भीरनादिनी । बलदेवस्य तं कोपं वर्धयन्ती महात्मनः

parāśara uvāca athāntarikṣe vāg uccaiḥ prāha gambhīranādinī baladevasya taṁ kopaṁ vardhayantī mahātmanaḥ

पराशर ने कहा — तब आकाश में एक गंभीर स्वर वाली वाणी ऊँचे शब्दों में बोली, जिसने महात्मा बलदेव के उस क्रोध को और बढ़ा दिया —

श्लोक 22 (vishnu.5.28.22)

जितं बलेन धर्मेण रुक्मिणा भाषितं मृषा । अनुक्त्वापि वचः किंचित् कृतं भवति कर्मणा

jitaṁ balena dharmeṇa rukmiṇā bhāṣitaṁ mṛṣā anuktvāpi vacaḥ kiṁcit kṛtaṁ bhavati karmaṇā

'बल ने न्यायपूर्वक जीता है; रुक्मी ने झूठ बोला है। बिना कुछ कहे भी कर्म से बात सिद्ध हो जाती है।'

श्लोक 23 (vishnu.5.28.23)

ततो बलः समुत्थाय कोपसंरक्तलोचनः । जघानाष्टापदेनैव रुक्मिणं स महाबलः

tato balaḥ samutthāya kopasaṁraktalocanaḥ jaghānāṣṭāpadenaiva rukmiṇaṁ sa mahābalaḥ

तब क्रोध से रक्तनेत्र हुए महाबली बल ने उठकर उसी अष्टापद (द्यूत-पट) से रुक्मी पर प्रहार कर उसे मार डाला।

श्लोक 24 (vishnu.5.28.24)

कलिङ्गराजं चादाय विस्फुरन्तं बलाद् बलः । बभञ्ज दन्तान् कुपितो यैः प्रकाशं जहास सः

kaliṅgarājaṁ cādāya visphurantaṁ balād balaḥ babhañja dantān kupito yaiḥ prakāśaṁ jahāsa saḥ

और बलपूर्वक काँपते हुए कलिंगराज को पकड़कर क्रुद्ध बल ने उसके वे दाँत तोड़ डाले जिन्हें दिखाकर वह खुलकर हँसा था।

श्लोक 25 (vishnu.5.28.25)

आकृष्य च महास्तम्भं जातरूपमयं बलः । जघान येऽन्ये तत्पक्षाः भूभृतः कुपितो बलः

ākṛṣya ca mahāstambhaṁ jātarūpamayaṁ balaḥ jaghāna ye'nye tatpakṣāḥ bhūbhṛtaḥ kupito balaḥ

और स्वर्णमय एक विशाल स्तम्भ उखाड़कर क्रुद्ध बल ने उसके पक्ष के अन्य जो राजा थे, उन सबको मार डाला।

श्लोक 26 (vishnu.5.28.26)

ततो हाहाकृतं सर्वं पलायनपरं द्विज । तद् राजमण्डलं सर्वं बभूव कुपिते बले

tato hāhākṛtaṁ sarvaṁ palāyanaparaṁ dvija tad rājamaṇḍalaṁ sarvaṁ babhūva kupite bale

हे द्विज! तब बल के क्रुद्ध हो जाने पर वह समस्त राजमंडल हाहाकार करता हुआ भागने लगा।

श्लोक 27 (vishnu.5.28.27)

बलेन निहतं श्रुत्वा रुक्मिणं मधुसूदनः । नोवाच किंचिन् मैत्रेय रुक्मिणीबलयोर्भयात्

balena nihataṁ śrutvā rukmiṇaṁ madhusūdanaḥ novāca kiṁcin maitreya rukmiṇībalayorbhayāt

हे मैत्रेय! रुक्मी के बल द्वारा मारे जाने का समाचार सुनकर मधुसूदन (कृष्ण) रुक्मिणी और बल दोनों के प्रति स्नेहवश कुछ भी नहीं बोले।

श्लोक 28 (vishnu.5.28.28)

ततोऽनिरुद्धम् आदाय कृतोद्वाहं द्विजोत्तम । द्वारकाम् आजगामाथ यदुचक्रं स केशवः

tato'niruddham ādāya kṛtodvāhaṁ dvijottama dvārakām ājagāmātha yaducakraṁ sa keśavaḥ

हे द्विजोत्तम! तब विवाहित अनिरुद्ध को साथ लेकर केशव समस्त यादव-समुदाय सहित द्वारका लौट आए।

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