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पञ्चमांश · अध्याय 29

नरकासुर-वध

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (vishnu.5.29.1)

पराशर उवाच । द्वारवत्यां ततः शौरिं शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः । आजगामाथ मैत्रेय मत्तैरावतपृष्ठगः

parāśara uvāca dvāravatyāṁ tataḥ śauriṁ śakrastribhuvaneśvaraḥ ājagāmātha maitreya mattairāvatapṛṣṭhagaḥ

पराशर ने कहा — हे मैत्रेय! तत्पश्चात् त्रिभुवन के स्वामी शक्र (इन्द्र) मदमत्त ऐरावत की पीठ पर सवार होकर द्वारवती में शौरि (कृष्ण) के पास आए।

श्लोक 2 (vishnu.5.29.2)

प्रविश्य द्वारकां सोऽथ समेत्य हरिणा ततः । कथयाम् आस दैत्यस्य नरकस्य विचेष्टितम्

praviśya dvārakāṁ so'tha sametya hariṇā tataḥ kathayām āsa daityasya narakasya viceṣṭitam

द्वारका में प्रवेश कर तथा हरि से मिलकर उसने दैत्य नरक के दुष्कर्मों का वर्णन किया।

श्लोक 3 (vishnu.5.29.3)

त्वया नाथेन देवानां मनुष्यत्वेऽपि तिष्ठता । प्रशमं सर्वदुःखानि नीतानि मधुसूदन

tvayā nāthena devānāṁ manuṣyatve'pi tiṣṭhatā praśamaṁ sarvaduḥkhāni nītāni madhusūdana

'हे मधुसूदन! मनुष्य-रूप में रहते हुए भी देवताओं के स्वामी आप ही ने हमारे समस्त दुःखों को शांत किया है।'

श्लोक 4 (vishnu.5.29.4)

तपस्विजननाशाय सोऽरिष्टो धेनुकस्तथा । प्रवृत्तो यस्तथा केशी ते सर्वे निहतास्त्वया

tapasvijananāśāya so'riṣṭo dhenukastathā pravṛtto yastathā keśī te sarve nihatāstvayā

'तपस्वियों के विनाश में लगा हुआ अरिष्ट, तथा धेनुक, और उसी प्रकार केशी — ये सभी आपके द्वारा मारे गए हैं।'

श्लोक 5 (vishnu.5.29.5)

कंसः कुवलयापीडः पूतना बालघातिनी । नाशं नीतास्त्वया सर्वे येऽन्ये जगदुपद्रवाः

kaṁsaḥ kuvalayāpīḍaḥ pūtanā bālaghātinī nāśaṁ nītāstvayā sarve ye'nye jagadupadravāḥ

'कंस, कुवलयापीड़, और बालघातिनी पूतना — ये सब तथा जगत के अन्य जो भी उपद्रव थे, आपके द्वारा नष्ट किए गए हैं।'

श्लोक 6 (vishnu.5.29.6)

युष्मद्दोर्दण्डसद्बुद्धिपरित्राते जगत्त्रये । यज्वियज्ञांशसंप्राप्त्या तृप्तिं यान्ति दिवौकसः

yuṣmaddordaṇḍasadbuddhiparitrāte jagattraye yajviyajñāṁśasaṁprāptyā tṛptiṁ yānti divaukasaḥ

'आपकी भुजाओं की सुसंगत शक्ति से त्रिलोक के रक्षित हो जाने पर, यज्ञकर्ताओं के यज्ञ-भाग की प्राप्ति से देवगण तृप्ति पाते हैं।'

श्लोक 7 (vishnu.5.29.7)

सोऽहं साम्प्रतम् आयातो यन्निमित्तं जनार्दन । तच्छ्रुत्वा तत्प्रतीकारप्रयत्नं कर्तुम् अर्हसि

so'haṁ sāmpratam āyāto yannimittaṁ janārdana tacchrutvā tatpratīkāraprayatnaṁ kartum arhasi

'हे जनार्दन! मैं अभी जिस कारण से आया हूँ, उसे सुनकर आपको उसका उपाय करने का प्रयत्न करना चाहिए।'

श्लोक 8 (vishnu.5.29.8)

भौमोऽयं नरको नाम प्राग्ज्योतिषपुरेश्वरः । करोति सर्वभूतानाम् उपघातम् अरिंदम

bhaumo'yaṁ narako nāma prāgjyotiṣapureśvaraḥ karoti sarvabhūtānām upaghātam ariṁdama

'हे शत्रुदमन! यह भौम नामक, भूमि का पुत्र, प्राग्ज्योतिषपुर का स्वामी नरक, समस्त प्राणियों को पीड़ा पहुँचा रहा है।'

श्लोक 9 (vishnu.5.29.9)

देवसिद्धासुरादीनां नृपाणां च जनार्दन । हृत्वा हि सोऽसुरः कन्या रुरोध निजमन्दिरे

devasiddhāsurādīnāṁ nṛpāṇāṁ ca janārdana hṛtvā hi so'suraḥ kanyā rurodha nijamandire

'हे जनार्दन! उस असुर ने देवों, सिद्धों, असुरों तथा राजाओं की कन्याओं को हरकर अपने ही महल में बंद कर रखा है।'

श्लोक 10 (vishnu.5.29.10)

छत्रं यत् सलिलस्रावि तज्जहार प्रचेतसः । मन्दरस्य तथा शृङ्गं हृतवान् मणिपर्वतम्

chatraṁ yat salilasrāvi tajjahāra pracetasaḥ mandarasya tathā śṛṅgaṁ hṛtavān maṇiparvatam

'उसने वरुण के जल बरसाने वाले छत्र को हर लिया है, तथा मंदराचल के मणिमय शिखर को भी छीन लिया है।'

श्लोक 11 (vishnu.5.29.11)

अमृतस्राविणी दिव्ये मन्मातुः कृष्ण कुण्डले । जहार सोऽसुरोऽदित्या वाञ्छत्य् ऐरावतं गजम्

amṛtasrāviṇī divye manmātuḥ kṛṣṇa kuṇḍale jahāra so'suro'dityā vāñchaty airāvataṁ gajam

'हे कृष्ण! उस असुर ने मेरी माता अदिति के अमृत-स्रावी दिव्य कुण्डलों को भी हर लिया है, और अब वह ऐरावत गज को भी चाहता है।'

श्लोक 12 (vishnu.5.29.12)

दुर्नीतम् एतद् गोविन्द मया तस्य तवोदितम् । यद् अत्र प्रतिकर्तव्यं तत् स्वयं परिमृश्यताम्

durnītam etad govinda mayā tasya tavoditam yad atra pratikartavyaṁ tat svayaṁ parimṛśyatām

'हे गोविन्द! मैंने उसके इस दुराचार का वर्णन आपसे कर दिया है; इसका जो भी प्रतिकार करना उचित हो, वह आप स्वयं विचार लें।'

श्लोक 13 (vishnu.5.29.13)

पराशर उवाच । इति श्रुत्वा स्मितं कृत्वा भगवान् देवकीसुतः । गृहीत्वा वासवं हस्ते समुत्तस्थौ वरासनात्

parāśara uvāca iti śrutvā smitaṁ kṛtvā bhagavān devakīsutaḥ gṛhītvā vāsavaṁ haste samuttasthau varāsanāt

पराशर ने कहा — यह सुनकर मुस्कुराते हुए भगवान देवकीनन्दन ने वासव (इन्द्र) का हाथ पकड़कर अपने उत्तम आसन से उठे।

श्लोक 14 (vishnu.5.29.14)

संचिन्तितम् उपारुह्य गरुडं गगनेचरम् । सत्यभामां समारोप्य ययौ प्राग्ज्योतिषं पुरम्

saṁcintitam upāruhya garuḍaṁ gaganecaram satyabhāmāṁ samāropya yayau prāgjyotiṣaṁ puram

मन में स्मरण मात्र से बुलाए गए आकाशगामी गरुड़ पर चढ़कर तथा सत्यभामा को साथ लेकर वे प्राग्ज्योतिषपुर को चले।

श्लोक 15 (vishnu.5.29.15)

आरुह्यैरावतं नागं शक्रोऽपि त्रिदिशालयम् । ततो जगाम मैत्रेय पश्यतां द्वारकौकसाम्

āruhyairāvataṁ nāgaṁ śakro'pi tridiśālayam tato jagāma maitreya paśyatāṁ dvārakaukasām

हे मैत्रेय! ऐरावत हाथी पर चढ़कर शक्र भी द्वारकावासियों के देखते-देखते अपने त्रिदिवधाम को चले गए।

श्लोक 16 (vishnu.5.29.16)

प्राग्ज्योतिषपुरस्यासीत् समन्ताच्छतयोजनम् । आचिता मौरवैः पाशैः क्षुरान्तैर्भूर्द्विजोत्तम

prāgjyotiṣapurasyāsīt samantācchatayojanam ācitā mauravaiḥ pāśaiḥ kṣurāntairbhūrdvijottama

हे द्विजोत्तम! प्राग्ज्योतिषपुर के चारों ओर सौ योजन तक की भूमि मुर के छुरे-जैसे तीक्ष्ण फंदों से आच्छादित थी।

श्लोक 17 (vishnu.5.29.17)

तांश्चिच्छेद हरिः पाशान् क्षिप्त्वा चक्रं सुदर्शनम् । ततो मुरुः समुत्तस्थौ तं जघान च केशवः

tāṁściccheda hariḥ pāśān kṣiptvā cakraṁ sudarśanam tato muruḥ samuttasthau taṁ jaghāna ca keśavaḥ

हरि ने अपना सुदर्शन चक्र चलाकर उन फंदों को काट डाला; तब मुर उठ खड़ा हुआ, और केशव ने उसका वध कर दिया।

श्लोक 18 (vishnu.5.29.18)

मुरोस्तु तनयान् सप्त सहस्रांस्तांस्ततो हरिः । चक्रधाराग्निनिर्दग्धांश्चकार शलभान् इव

murostu tanayān sapta sahasrāṁstāṁstato hariḥ cakradhārāgninirdagdhāṁścakāra śalabhān iva

फिर हरि ने मुर के उन सात हज़ार पुत्रों को अपने चक्र की धार की अग्नि से भस्म करके पतंगों के समान बिखेर दिया।

श्लोक 19 (vishnu.5.29.19)

हत्वा मुरुं हयग्रीवं तथा पञ्चजनं द्विज । प्राग्ज्योतिषपुरं धीमांस्त्वरावान् समुपाद्रवत्

hatvā muruṁ hayagrīvaṁ tathā pañcajanaṁ dvija prāgjyotiṣapuraṁ dhīmāṁstvarāvān samupādravat

हे द्विज! मुर, हयग्रीव तथा पंचजन का वध कर वह बुद्धिमान् (कृष्ण) शीघ्रतापूर्वक प्राग्ज्योतिषपुर की ओर बढ़ चले।

श्लोक 20 (vishnu.5.29.20)

नरकेणास्य तत्राभून् महासैन्येन संयुगः । कृष्णस्य यत्र गोविन्दो जघ्ने दैत्यान् सहस्रशः

narakeṇāsya tatrābhūn mahāsainyena saṁyugaḥ kṛṣṇasya yatra govindo jaghne daityān sahasraśaḥ

वहाँ कृष्ण का नरक की विशाल सेना से युद्ध हुआ, जिसमें गोविन्द ने हज़ारों दैत्यों का संहार किया।

श्लोक 21 (vishnu.5.29.21)

शस्त्रास्त्रवर्षं मुञ्चन्तं तं भौमं नरकं बली । क्षिप्त्वा चक्रं द्विधा चक्रे चक्री दैतेयचक्रहा

śastrāstravarṣaṁ muñcantaṁ taṁ bhaumaṁ narakaṁ balī kṣiptvā cakraṁ dvidhā cakre cakrī daiteyacakrahā

जब भौम नरक अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा कर रहा था, तब दैत्य-समूह के संहारक, बलशाली चक्रधारी ने चक्र चलाकर उसे दो भागों में विभक्त कर दिया।

श्लोक 22 (vishnu.5.29.22)

हते तु नरके भूमिर्गृहीत्वादितिकुण्डले । उपतस्थे जगन्नाथं वाक्यं चेदम् अथाब्रवीत्

hate tu narake bhūmirgṛhītvāditikuṇḍale upatasthe jagannāthaṁ vākyaṁ cedam athābravīt

नरक के मारे जाने पर पृथ्वी ने अदिति के कुण्डलों को लेकर जगन्नाथ के समीप उपस्थित होकर यह वचन कहा —

श्लोक 23 (vishnu.5.29.23)

यदाहम् उद्धृता नाथ त्वया सूकरमूर्तिना । त्वत्स्पर्शसंभवः पुत्रस्तदायं मय्य् अजायत

yadāham uddhṛtā nātha tvayā sūkaramūrtinā tvatsparśasaṁbhavaḥ putrastadāyaṁ mayy ajāyata

'हे नाथ! जब आपने वराह-रूप में मेरा उद्धार किया था, तब आपके स्पर्श से उत्पन्न यह पुत्र मुझमें जन्मा था।'

श्लोक 24 (vishnu.5.29.24)

सोऽयं त्वयैव दत्तो मे त्वयैव विनिपातितः । गृहाण कुण्डले चेमे पालयास्य च संततिम्

so'yaṁ tvayaiva datto me tvayaiva vinipātitaḥ gṛhāṇa kuṇḍale ceme pālayāsya ca saṁtatim

'यह मुझे आपने ही दिया था और आपने ही उसे मार गिराया है। ये कुण्डल ग्रहण करें, तथा इसकी संतान की रक्षा करें।'

श्लोक 25 (vishnu.5.29.25)

भारावतरणार्थाय ममैव भगवान् इमम् । अंशेन लोकम् आयातः प्रसादसुमुखः प्रभो

bhārāvataraṇārthāya mamaiva bhagavān imam aṁśena lokam āyātaḥ prasādasumukhaḥ prabho

'हे प्रभो! प्रसन्नमुख भगवान्, मेरे ही भार को उतारने के लिए आप अपने अंश से इस लोक में पधारे हैं।'

श्लोक 26 (vishnu.5.29.26)

त्वं कर्ता च विकर्ता च संहर्ता प्रभवोऽप्ययः । जगतां त्वं जगद्रूपः स्तूयतेऽच्युत किं तव

tvaṁ kartā ca vikartā ca saṁhartā prabhavo'pyayaḥ jagatāṁ tvaṁ jagadrūpaḥ stūyate'cyuta kiṁ tava

'आप ही कर्ता हैं, विकर्ता हैं, संहारक हैं, जगतों के उद्भव और लय हैं; आप ही जगत्स्वरूप हैं — हे अच्युत! आपकी क्या स्तुति की जाए?'

श्लोक 27 (vishnu.5.29.27)

व्यापी व्याप्यः क्रिया कर्ता कार्यं च भगवान् यदा । सर्वभूतात्मभूतस्य स्तूयते तव किं तदा

vyāpī vyāpyaḥ kriyā kartā kāryaṁ ca bhagavān yadā sarvabhūtātmabhūtasya stūyate tava kiṁ tadā

'जब भगवान् ही व्यापक और व्याप्य, क्रिया और कर्ता, तथा कार्य हैं — जो समस्त प्राणियों के आत्मस्वरूप हैं — तब आपकी क्या स्तुति की जाए?'

श्लोक 28 (vishnu.5.29.28)

परमात्मा त्वम् आत्मा च भूतात्मा चाव्ययो भवान् । यदा तदा स्तुतिर्नास्ति किमर्था ते प्रवर्तते

paramātmā tvam ātmā ca bhūtātmā cāvyayo bhavān yadā tadā stutirnāsti kimarthā te pravartate

'आप ही परमात्मा हैं, आप ही जीवात्मा हैं, और आप ही अविनाशी भूतात्मा हैं — ऐसी स्थिति में कोई स्तुति सम्भव नहीं; तब आपकी स्तुति किसलिए की जाए?'

श्लोक 29 (vishnu.5.29.29)

प्रसीद सर्वभूतात्मन् नरकेण कृतं हि यत् । तत् क्षम्यताम् अदोषाय त्वत्सुतः स निपातितः

prasīda sarvabhūtātman narakeṇa kṛtaṁ hi yat tat kṣamyatām adoṣāya tvatsutaḥ sa nipātitaḥ

'हे सर्वभूतात्मन्! प्रसन्न हों। नरक ने जो कुछ किया, वह क्षमा किया जाए, वह दोषी नहीं था; आपका वह पुत्र अब मारा जा चुका है।'

श्लोक 30 (vishnu.5.29.30)

पराशर उवाच । तथेति चोक्त्वा धरणीं भगवान् भूतभावनः । रत्नानि नरकावासाज्जग्राह मुनिसत्तम

parāśara uvāca tatheti coktvā dharaṇīṁ bhagavān bhūtabhāvanaḥ ratnāni narakāvāsājjagrāha munisattama

पराशर ने कहा — हे मुनिसत्तम! पृथ्वी से 'ऐसा ही हो' कहकर भूतभावन भगवान् ने नरक के निवास से रत्नों को ग्रहण किया।

श्लोक 31 (vishnu.5.29.31)

कन्यापुरे स कन्यानां षोडशातुलविक्रमः । शताधिकानि ददृशे सहस्राणि महामुने

kanyāpure sa kanyānāṁ ṣoḍaśātulavikramaḥ śatādhikāni dadṛśe sahasrāṇi mahāmune

हे महामुने! कन्याओं के महल में अतुल पराक्रमी उस भगवान् ने सोलह हज़ार एक सौ कन्याएँ देखीं।

श्लोक 32 (vishnu.5.29.32)

चतुर्दंष्ट्रान् गजांश्चोग्रान् षट्सहस्रान् स दृष्टवान् । काम्बोजानां तथाश्वानां नियुतान्य् एकविंशतिम्

caturdaṁṣṭrān gajāṁścogrān ṣaṭsahasrān sa dṛṣṭavān kāmbojānāṁ tathāśvānāṁ niyutāny ekaviṁśatim

उसने छह हज़ार भयंकर चतुर्दन्त हाथी, तथा कम्बोज देश के इक्कीस लाख अश्व देखे।

श्लोक 33 (vishnu.5.29.33)

कन्यास्ताश्च तथा नागांस्तांश्चाश्वान् द्वारकां पुरीम् । प्रेषयाम् आस गोविन्दः सद्यो नरककिंकरैः

kanyāstāśca tathā nāgāṁstāṁścāśvān dvārakāṁ purīm preṣayām āsa govindaḥ sadyo narakakiṁkaraiḥ

उन कन्याओं, उन हाथियों तथा उन अश्वों को गोविन्द ने तुरन्त नरक के ही सेवकों द्वारा द्वारका नगरी भिजवा दिया।

श्लोक 34 (vishnu.5.29.34)

ददृशे वारुणं छत्रं तथैव मणिपर्वतम् । आरोपयाम् आस हरिर्गरुडे पतगेश्वरे

dadṛśe vāruṇaṁ chatraṁ tathaiva maṇiparvatam āropayām āsa harirgaruḍe patageśvare

उसने वरुण के छत्र को तथा मणिपर्वत को भी देखा; हरि ने उन्हें पक्षिराज गरुड़ पर लदवा दिया।

श्लोक 35 (vishnu.5.29.35)

आरुह्य च स्वयं कृष्णः सत्यभामासहायवान् । अदित्याः कुण्डले दातुं जगाम त्रिदिवालयम्

āruhya ca svayaṁ kṛṣṇaḥ satyabhāmāsahāyavān adityāḥ kuṇḍale dātuṁ jagāma tridivālayam

और स्वयं कृष्ण, सत्यभामा को साथ लेकर, अदिति को उसके कुण्डल देने के लिए त्रिदिवधाम को चले गए।

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30