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पञ्चमांश · अध्याय 30

पारिजात-हरण

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

श्लोक 1 (vishnu.5.30.1)

पराशर उवाच । गरुडो वारुणं छत्रं तथैव मणिपर्वतम् । सभार्यं च हृषीकेशं लीलयैव वहन् ययौ

parāśara uvāca garuḍo vāruṇaṁ chatraṁ tathaiva maṇiparvatam sabhāryaṁ ca hṛṣīkeśaṁ līlayaiva vahan yayau

पराशर ने कहा — गरुड़ वरुण के छत्र, मणिपर्वत, तथा पत्नी सहित हृषीकेश को लीलापूर्वक वहन करते हुए चले।

श्लोक 2 (vishnu.5.30.2)

ततः शङ्खम् उपाध्मासीत् स्वर्गद्वारगतो हरिः । उपतस्थुस्ततो देवाः सार्घ्यपात्रा जनार्दनम्

tataḥ śaṅkham upādhmāsīt svargadvāragato hariḥ upatasthustato devāḥ sārghyapātrā janārdanam

तब स्वर्गद्वार पर पहुँचकर हरि ने अपना शंख बजाया; तब देवगण अर्घ्य-पात्र लिए हुए जनार्दन के समक्ष उपस्थित हुए।

श्लोक 3 (vishnu.5.30.3)

स देवैरर्चितः कृष्णो देवमातुर्निवेशनम् । सिताभ्रशिखराकारं प्रविश्य ददृशेऽदितिम्

sa devairarcitaḥ kṛṣṇo devamāturniveśanam sitābhraśikharākāraṁ praviśya dadṛśe'ditim

देवताओं द्वारा पूजित कृष्ण ने श्वेत मेघ-शिखर के समान आकार वाले देवमाता के निवास में प्रवेश कर अदिति के दर्शन किए।

श्लोक 4 (vishnu.5.30.4)

स तां प्रणम्य शक्रेण सह ते कुण्डलोत्तमे । ददौ नरकनाशं च शशंसास्यै जनार्दनः

sa tāṁ praṇamya śakreṇa saha te kuṇḍalottame dadau narakanāśaṁ ca śaśaṁsāsyai janārdanaḥ

उसे प्रणाम कर शक्र के साथ उसने वे उत्तम कुण्डल उसे भेंट किए, और जनार्दन ने उससे नरक के वध का वृत्तान्त कह सुनाया।

श्लोक 5 (vishnu.5.30.5)

ततः प्रीता जगन्माता धातारं जगतां हरिम् । तुष्टावादितिरव्यग्रा कृत्वा तत्प्रवणं मनः

tataḥ prītā jaganmātā dhātāraṁ jagatāṁ harim tuṣṭāvāditiravyagrā kṛtvā tatpravaṇaṁ manaḥ

तब प्रसन्न होकर जगन्माता अदिति ने अविचल होकर, अपने मन को उसी में लगाकर, जगत के धाता हरि की स्तुति की।

श्लोक 6 (vishnu.5.30.6)

अदितिरुवाच । नमस्ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानाम् अभयंकर । सनातनात्मन् सर्वात्मन् भूतात्मन् भूतभावन

aditiruvāca namaste puṇḍarīkākṣa bhaktānām abhayaṁkara sanātanātman sarvātman bhūtātman bhūtabhāvana

अदिति ने कहा — हे कमलनयन! भक्तों को अभय देने वाले, आपको नमस्कार है; हे सनातन आत्मन्, सर्वात्मन्, भूतात्मन्, भूतभावन!

श्लोक 7 (vishnu.5.30.7)

प्रणेता मनसो बुद्धेरिन्द्रियाणां गुणात्मक । त्रिगुणातीत निर्द्वन्द्व शुद्ध सर्वहृदिस्थित

praṇetā manaso buddherindriyāṇāṁ guṇātmaka triguṇātīta nirdvandva śuddha sarvahṛdisthita

हे मन, बुद्धि और इन्द्रियों के प्रेरक, गुणस्वरूप! त्रिगुणातीत, द्वन्द्वरहित, शुद्ध, सबके हृदय में स्थित!

श्लोक 8 (vishnu.5.30.8)

सितदीर्घादिनिःशेषकल्पनापरिवर्जित । जन्मादिभिरसंस्पृष्ट स्वप्नादिपरिवर्जित

sitadīrghādiniḥśeṣakalpanāparivarjita janmādibhirasaṁspṛṣṭa svapnādiparivarjita

श्वेत, दीर्घ आदि सभी कल्पनाओं से रहित; जन्म आदि से अस्पृष्ट; निद्रा आदि अवस्थाओं से रहित!

श्लोक 9 (vishnu.5.30.9)

संध्या रात्रिरहो भूमिर्गगनं वायुरम्बु च । हुताशनो मनो बुद्धिर्भूतादिस्त्वं तथाच्युत

saṁdhyā rātriraho bhūmirgaganaṁ vāyurambu ca hutāśano mano buddhirbhūtādistvaṁ tathācyuta

हे अच्युत! आप ही संध्या, रात्रि, दिन, पृथ्वी, आकाश, वायु और जल हैं; आप ही अग्नि, मन, बुद्धि तथा भूतादि (अहंकार) हैं।

श्लोक 10 (vishnu.5.30.10)

सृष्टिस्थितिविनाशानां कर्ता कर्तृपतिर्भवान् । ब्रह्मविष्णुशिवाख्याभिरात्ममूर्तिभिरीश्वर

sṛṣṭisthitivināśānāṁ kartā kartṛpatirbhavān brahmaviṣṇuśivākhyābhirātmamūrtibhirīśvara

हे ईश्वर! सृष्टि, स्थिति तथा विनाश के कर्ता, कर्ताओं के भी स्वामी आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामक अपने ही स्वरूपों से हैं।

श्लोक 11 (vishnu.5.30.11)

देवा यक्षास्तथा दैत्या राक्षसाः सिद्धपन्नगाः । कूष्माण्डाश्च पिशाचाश्च गन्धर्वा मनुजास्तथा

devā yakṣāstathā daityā rākṣasāḥ siddhapannagāḥ kūṣmāṇḍāśca piśācāśca gandharvā manujāstathā

देव, यक्ष, दैत्य, राक्षस, सिद्ध, सर्प, कूष्माण्ड, पिशाच, गन्धर्व तथा मनुष्य —

श्लोक 12 (vishnu.5.30.12)

पशवो मृगाः पतंगाश्च तथैव च सरीसृपाः । वृक्षगुल्मलतावल्लीसमस्ततृणजातयः

paśavo mṛgāḥ pataṁgāśca tathaiva ca sarīsṛpāḥ vṛkṣagulmalatāvallīsamastatṛṇajātayaḥ

पशु, मृग, पक्षी, तथा सरीसृप; वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली तथा समस्त तृण-जातियाँ —

श्लोक 13 (vishnu.5.30.13)

स्थूला मध्यास्तथा सूक्ष्माः सूक्ष्मात् सूक्ष्मतराश्च ये । देहभेदा भवान् सर्वे ये केचित् पुद्गलाश्रयाः

sthūlā madhyāstathā sūkṣmāḥ sūkṣmāt sūkṣmatarāśca ye dehabhedā bhavān sarve ye kecit pudgalāśrayāḥ

स्थूल, मध्यम, सूक्ष्म, तथा सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर जो भी हैं — इन समस्त देह-भेदों में, जो भी पुद्गल के आश्रित हैं, आप ही हैं।

श्लोक 14 (vishnu.5.30.14)

माया तवेयम् अज्ञातपरमार्थातिमोहिनी । अनात्मन्य् आत्मविज्ञानं यया मूढो निरुध्यते

māyā taveyam ajñātaparamārthātimohinī anātmany ātmavijñānaṁ yayā mūḍho nirudhyate

यह आपकी माया है, जो परम तत्त्व को अज्ञात रखते हुए अत्यंत मोहित करने वाली है, जिसके द्वारा मूढ़ जन अनात्मा में आत्मबोध करते हुए बँधे रहते हैं।

श्लोक 15 (vishnu.5.30.15)

अहं ममेति भावोऽत्र यत् पुंसाम् अभिजायते । संसारमातुर्मायायास्तवैतन् नाथ चेष्टितम्

ahaṁ mameti bhāvo'tra yat puṁsām abhijāyate saṁsāramāturmāyāyāstavaitan nātha ceṣṭitam

पुरुषों में जो 'मैं' और 'मेरा' का भाव उत्पन्न होता है, हे नाथ! यह आपकी उसी संसार-जननी माया की क्रीड़ा है।

श्लोक 16 (vishnu.5.30.16)

यैः स्वधर्मपरैर्नाथ नरैराराधितो भवान् । ते तरन्त्य् अखिलाम् एतां मायाम् आत्मविमुक्तये

yaiḥ svadharmaparairnātha narairārādhito bhavān te taranty akhilām etāṁ māyām ātmavimuktaye

हे नाथ! जो मनुष्य अपने-अपने धर्म में तत्पर रहकर आपकी आराधना करते हैं, वे आत्मा की मुक्ति के लिए इस समस्त माया को पार कर जाते हैं।

श्लोक 17 (vishnu.5.30.17)

ब्रह्माद्याः सकला देवा मनुष्याः पशवस्तथा । विष्णुमायामहावर्तमोहान्धतमसा वृताः

brahmādyāḥ sakalā devā manuṣyāḥ paśavastathā viṣṇumāyāmahāvartamohāndhatamasā vṛtāḥ

ब्रह्मा आदि समस्त देवगण, मनुष्य तथा पशु — सभी विष्णु की माया के महान भँवर के मोहमय अन्धकार से आवृत हैं।

श्लोक 18 (vishnu.5.30.18)

आराध्य त्वाम् अभीप्सन्ते कामान् आत्मभवक्षयम् । यद् एते पुरुषा माया सैवेयं भगवंस्तव

ārādhya tvām abhīpsante kāmān ātmabhavakṣayam yad ete puruṣā māyā saiveyaṁ bhagavaṁstava

आपकी आराधना कर वे लोग [अपने ही जन्म-मरण के नाश की अपेक्षा] भोगों की कामना करते हैं — हे भगवन्! यह मनुष्यों की यही दशा भी आपकी माया ही है।

श्लोक 19 (vishnu.5.30.19)

मया त्वं पुत्रकामिन्या वैरिपक्षक्षयाय च । आराधितो न मोक्षाय मायाविलसितं हि तत्

mayā tvaṁ putrakāminyā vairipakṣakṣayāya ca ārādhito na mokṣāya māyāvilasitaṁ hi tat

पुत्र-कामना से तथा शत्रु-पक्ष के नाश के लिए मैंने आपकी आराधना की, मोक्ष के लिए नहीं — यह भी माया की ही लीला है।

श्लोक 20 (vishnu.5.30.20)

कौपीनाच्छादनप्राया वाञ्छा कल्पद्रुमाद् अपि । जायते यद् अपुण्यानां सोऽपराधः स्वदोषजः

kaupīnācchādanaprāyā vāñchā kalpadrumād api jāyate yad apuṇyānāṁ so'parādhaḥ svadoṣajaḥ

कल्पवृक्ष से भी मात्र लंगोटी माँगने जैसी इच्छा जो अपुण्यवानों में उत्पन्न होती है, वह उनके अपने ही दोष से उपजा अपराध है।

श्लोक 21 (vishnu.5.30.21)

तत् प्रसीदाखिलजगन्मायामोहकराव्यय । अज्ञानं ज्ञानसद्भावभूतं भूतेश नाशय

tat prasīdākhilajaganmāyāmohakarāvyaya ajñānaṁ jñānasadbhāvabhūtaṁ bhūteśa nāśaya

इसलिए, हे अविनाशी, समस्त जगत को माया से मोहित करने वाले! प्रसन्न हों। हे भूतेश! ज्ञान के सद्भाव द्वारा मेरे अज्ञान का नाश करें।

श्लोक 22 (vishnu.5.30.22)

नमस्ते चक्रहस्ताय शार्ङ्गहस्ताय ते नमः । गदाहस्ताय ते विष्णो शङ्खहस्ताय ते नमः

namaste cakrahastāya śārṅgahastāya te namaḥ gadāhastāya te viṣṇo śaṅkhahastāya te namaḥ

चक्र-हस्त आपको नमस्कार है; शार्ङ्ग-हस्त आपको नमस्कार है; हे विष्णु! गदा-हस्त आपको नमस्कार है; शंख-हस्त आपको नमस्कार है।

श्लोक 23 (vishnu.5.30.23)

एतत् पश्यामि ते रूपं स्थूलचिह्नोपलक्षितम् । न जानामि परं यत् ते प्रसीद परमेश्वर

etat paśyāmi te rūpaṁ sthūlacihnopalakṣitam na jānāmi paraṁ yat te prasīda parameśvara

आपके इस स्थूल चिह्नों से चिह्नित रूप को ही मैं देख पाती हूँ; आपके जो परम स्वरूप हैं, उन्हें मैं नहीं जानती — हे परमेश्वर! प्रसन्न हों।

श्लोक 24 (vishnu.5.30.24)

पराशर उवाच । अदित्यैवं स्तुतो विष्णुः प्रहस्याह सुरारणिम् । माता देवि त्वम् अस्माकं प्रसीद वरदा भव

parāśara uvāca adityaivaṁ stuto viṣṇuḥ prahasyāha surāraṇim mātā devi tvam asmākaṁ prasīda varadā bhava

पराशर ने कहा — अदिति द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर विष्णु ने मुस्कुराते हुए देवमाता से कहा — 'हे देवी! आप हम सबकी माता हैं; प्रसन्न होइए, वर देने वाली बनिए।'

श्लोक 25 (vishnu.5.30.25)

अदितिरुवाच । एवम् अस्तु यथेच्छा ते त्वम् अशेषैः सुरासुरैः । अजेयः पुरुषव्याघ्र मर्त्यलोके भविष्यसि

aditiruvāca evam astu yathecchā te tvam aśeṣaiḥ surāsuraiḥ ajeyaḥ puruṣavyāghra martyaloke bhaviṣyasi

अदिति ने कहा — 'तुम्हारी इच्छा के अनुसार ऐसा ही हो। हे पुरुषव्याघ्र! तुम मृत्युलोक में समस्त देवों और असुरों से अजेय रहोगे।'

श्लोक 26 (vishnu.5.30.26)

पराशर उवाच । ततोऽनन्तरम् एवास्य शक्राणीसहितादितिम् । सत्यभामा प्रणम्याह प्रसीदेति पुनः पुनः

parāśara uvāca tato'nantaram evāsya śakrāṇīsahitāditim satyabhāmā praṇamyāha prasīdeti punaḥ punaḥ

पराशर ने कहा — तत्पश्चात् तुरन्त ही सत्यभामा ने शची सहित अदिति को प्रणाम कर बार-बार कहा — 'प्रसन्न होइए।'

श्लोक 27 (vishnu.5.30.27)

अदितिरुवाच । मत्प्रसादान् न ते सुभ्रु जरा वैरूप्यम् एव च । भविष्यत्य् अनवद्याङ्गी सर्वकालं भविष्यसि

aditiruvāca matprasādān na te subhru jarā vairūpyam eva ca bhaviṣyaty anavadyāṅgī sarvakālaṁ bhaviṣyasi

अदिति ने कहा — 'हे सुभ्रु! मेरी कृपा से तुम्हें कभी न वृद्धावस्था होगी और न रूप-हानि; तुम सदैव निर्दोष अंगों वाली बनी रहोगी।'

श्लोक 28 (vishnu.5.30.28)

पराशर उवाच । अदित्या तु कृतानुज्ञो देवराजो जनार्दनम् । यथावत् पूजयाम् आस बहुमानपुरःसरम्

parāśara uvāca adityā tu kṛtānujño devarājo janārdanam yathāvat pūjayām āsa bahumānapuraḥsaram

पराशर ने कहा — अदिति से अनुमति प्राप्त कर देवराज (इन्द्र) ने विधिपूर्वक अत्यंत सम्मानपूर्वक जनार्दन का पूजन किया।

श्लोक 29 (vishnu.5.30.29)

ततो ददर्श कृष्णोऽपि सत्यभामासहायवान् । देवोद्यानानि हृद्यानि नन्दनादीनि सत्तम

tato dadarśa kṛṣṇo'pi satyabhāmāsahāyavān devodyānāni hṛdyāni nandanādīni sattama

हे सत्तम! तब कृष्ण ने सत्यभामा को साथ लेकर देवताओं के मनोहर उद्यानों — नन्दनवन आदि — का अवलोकन किया।

श्लोक 30 (vishnu.5.30.30)

ददर्श च सुगन्धाढ्यं मञ्जरीपुष्पधारिणम् । शैत्याह्लादकरं ताम्रबालपल्लवशोभितम्

dadarśa ca sugandhāḍhyaṁ mañjarīpuṣpadhāriṇam śaityāhlādakaraṁ tāmrabālapallavaśobhitam

और उसने एक अत्यंत सुगन्धित, मंजरी-पुष्पों से लदे, शीतल-सुखद, ताम्रवर्णी कोमल पल्लवों से सुशोभित वृक्ष को देखा —

श्लोक 31 (vishnu.5.30.31)

मथ्यमानेऽमृते जातं जातरूपोपमत्वचम् । पारिजातं जगन्नाथः केशवः केशिसूदनः

mathyamāne'mṛte jātaṁ jātarūpopamatvacam pārijātaṁ jagannāthaḥ keśavaḥ keśisūdanaḥ

— अमृत-मंथन के समय उत्पन्न, सुवर्ण के समान छाल वाले उस पारिजात वृक्ष को जगन्नाथ केशिसूदन केशव ने देखा।

श्लोक 32 (vishnu.5.30.32)

तं दृष्ट्वा प्राह गोविन्दं सत्यभामा द्विजोत्तम । कस्मान् न द्वारकाम् एष नीयते कृष्ण पादपः

taṁ dṛṣṭvā prāha govindaṁ satyabhāmā dvijottama kasmān na dvārakām eṣa nīyate kṛṣṇa pādapaḥ

हे द्विजोत्तम! उसे देखकर सत्यभामा ने गोविन्द से कहा — 'हे कृष्ण! यह वृक्ष द्वारका क्यों नहीं ले जाया जाता?'

श्लोक 33 (vishnu.5.30.33)

यदि ते तद् वचः सत्यं सत्यात्यर्थं प्रियेति मे । मद्गेहनिष्कुटार्थाय तद् अयं नीयतां तरुः

yadi te tad vacaḥ satyaṁ satyātyarthaṁ priyeti me madgehaniṣkuṭārthāya tad ayaṁ nīyatāṁ taruḥ

'यदि तुम्हारा वह वचन सत्य है कि मैं, सत्या, तुम्हें अत्यंत प्रिय हूँ, तो यह वृक्ष मेरे घर के उपवन के लिए ले जाया जाए।'

श्लोक 34 (vishnu.5.30.34)

न मे जाम्बवती तादृग् अभीष्टा न च रुक्मिणी । सत्ये यथा त्वम् इत्य् उक्तं त्वया कृष्णासकृत् प्रियम्

na me jāmbavatī tādṛg abhīṣṭā na ca rukmiṇī satye yathā tvam ity uktaṁ tvayā kṛṣṇāsakṛt priyam

'जाम्बवती मुझे उतनी प्रिय नहीं, न ही रुक्मिणी, जितनी तुम, सत्या' — यह तुमने, हे कृष्ण, मुझसे बार-बार प्रेमपूर्वक कहा है।

श्लोक 35 (vishnu.5.30.35)

सत्यं तद् यदि गोविन्द नोपचारकृतं तव । तद् अस्तु पारिजातोऽयं मम गेहविभूषणम्

satyaṁ tad yadi govinda nopacārakṛtaṁ tava tad astu pārijāto'yaṁ mama gehavibhūṣaṇam

'हे गोविन्द! यदि वह सत्य है और मात्र उपचार-वचन नहीं है, तो यह पारिजात मेरे घर का आभूषण बने।'

श्लोक 36 (vishnu.5.30.36)

बिभ्रती पारिजातस्य केशपक्षेण मञ्जरीम् । सपत्नीनाम् अहं मध्ये शोभेयम् इति कामये

bibhratī pārijātasya keśapakṣeṇa mañjarīm sapatnīnām ahaṁ madhye śobheyam iti kāmaye

'पारिजात की मंजरी को अपने केश-पाश में धारण कर मैं अपनी सौतों के मध्य शोभा पाना चाहती हूँ।'

श्लोक 37 (vishnu.5.30.37)

पराशर उवाच । इत्य् उक्तः स प्रहस्यैनां पारिजातं गरुत्मति । आरोपयाम् आस हरिस्तम् ऊचुर्वनरक्षिणः

parāśara uvāca ity uktaḥ sa prahasyaināṁ pārijātaṁ garutmati āropayām āsa haristam ūcurvanarakṣiṇaḥ

पराशर ने कहा — यह सुनकर मुस्कुराते हुए हरि ने पारिजात को गरुड़ पर लदवा दिया; तब वनरक्षकों ने उससे कहा —

श्लोक 38 (vishnu.5.30.38)

भो शची देवराजस्य महिषी तत्परिग्रहम् । पारिजातं न गोविन्द हर्तुम् अर्हसि पादपम्

bho śacī devarājasya mahiṣī tatparigraham pārijātaṁ na govinda hartum arhasi pādapam

'हे गोविन्द! यह पारिजात वृक्ष देवराज की महारानी शची का अधिकार है; इसे हरना आपको शोभा नहीं देता।'

श्लोक 39 (vishnu.5.30.39)

शचीविभूषणार्थाय देवैरमृतमन्थने । उत्पादितोऽयं न क्षेमी गृहीत्वैनं गमिष्यसि

śacīvibhūṣaṇārthāya devairamṛtamanthane utpādito'yaṁ na kṣemī gṛhītvainaṁ gamiṣyasi

'यह देवताओं द्वारा अमृत-मंथन में शची के आभूषण के लिए उत्पन्न किया गया था; इसे लेकर आप सकुशल नहीं जा सकेंगे।'

श्लोक 40 (vishnu.5.30.40)

देवराजो मुखप्रेक्षो यस्यास्तस्याः परिग्रहम् । मौढ्यात् प्रार्थयसे क्षेमी गृहीत्वैनं हि को व्रजेत्

devarājo mukhaprekṣo yasyāstasyāḥ parigraham mauḍhyāt prārthayase kṣemī gṛhītvainaṁ hi ko vrajet

'जिसका मुख देवराज स्वयं निहारते रहते हैं, उसी की वस्तु को आप मूर्खतावश माँग रहे हैं; भला इसे लेकर कौन सकुशल जा सकता है?'

श्लोक 41 (vishnu.5.30.41)

अवश्यम् अस्य देवेन्द्रो निष्कृतिं कृष्ण यास्यति । वज्रोद्यतकरं शक्रम् अनुयास्यन्ति चामराः

avaśyam asya devendro niṣkṛtiṁ kṛṣṇa yāsyati vajrodyatakaraṁ śakram anuyāsyanti cāmarāḥ

'हे कृष्ण! देवेन्द्र इसका अवश्य ही प्रतिकार करेंगे; वज्र उठाए हुए शक्र का अनुसरण अमरगण करेंगे।'

श्लोक 42 (vishnu.5.30.42)

तद् अलं सकलैर्देवैर्विग्रहेण तवाच्युत । विपाककटु यत् कर्म तन् न शंसन्ति पण्डिताः

tad alaṁ sakalairdevairvigraheṇa tavācyuta vipākakaṭu yat karma tan na śaṁsanti paṇḍitāḥ

'अतः हे अच्युत! समस्त देवताओं से विग्रह करना व्यर्थ है; जिस कर्म का परिणाम कटु हो, उसकी विद्वान लोग प्रशंसा नहीं करते।'

श्लोक 43 (vishnu.5.30.43)

पराशर उवाच । इत्य् उक्ते तैरुवाचैतान् सत्यभामातिकोपिनी । का शची पारिजातस्य को वा शक्रः सुराधिपः

parāśara uvāca ity ukte tairuvācaitān satyabhāmātikopinī kā śacī pārijātasya ko vā śakraḥ surādhipaḥ

पराशर ने कहा — यह कहे जाने पर अत्यंत क्रुद्ध सत्यभामा ने उनसे कहा — 'पारिजात पर शची का क्या अधिकार? और देवाधिप शक्र ही कौन है?'

श्लोक 44 (vishnu.5.30.44)

सामान्यः सर्वलोकानां यद्य् एषोऽमृतमन्थने । समुत्पन्नः सुराः कस्माद् एको गृह्णाति वासवः

sāmānyaḥ sarvalokānāṁ yady eṣo'mṛtamanthane samutpannaḥ surāḥ kasmād eko gṛhṇāti vāsavaḥ

'हे देवगण! यदि अमृत-मंथन में उत्पन्न यह वृक्ष समस्त लोकों का समान रूप से है, तो अकेला वासव ही इसे क्यों ग्रहण करे?'

श्लोक 45 (vishnu.5.30.45)

यथा सुधा यथैवेन्दुर्यथा श्रीर्वनरक्षिणः । सामान्यः सर्वलोकस्य पारिजातस्तथा द्रुमः

yathā sudhā yathaivenduryathā śrīrvanarakṣiṇaḥ sāmānyaḥ sarvalokasya pārijātastathā drumaḥ

'हे वनरक्षको! जैसे अमृत, जैसे चन्द्रमा, तथा जैसे लक्ष्मी — वैसे ही यह पारिजात वृक्ष भी समस्त लोक का समान भाग है।'

श्लोक 46 (vishnu.5.30.46)

भर्तृबाहुमहागर्वाद् रुणद्ध्य् एनम् अथो शची । तत् कथ्यताम् अलं क्षान्त्या सत्या हारयति द्रुमम्

bhartṛbāhumahāgarvād ruṇaddhy enam atho śacī tat kathyatām alaṁ kṣāntyā satyā hārayati drumam

'अपने पति की भुजा के महान अभिमान से शची इसे रोक रही है; अतः उससे कह दो — अब बहुत सहन हो चुका, सत्या स्वयं यह वृक्ष ले जा रही है।'

श्लोक 47 (vishnu.5.30.47)

कथ्यतां च द्रुतं गत्वा पौलोम्या वचनं मम । सत्यभामा वदत्य् एतद् इति गर्वोद्धताक्षरम्

kathyatāṁ ca drutaṁ gatvā paulomyā vacanaṁ mama satyabhāmā vadaty etad iti garvoddhatākṣaram

'और शीघ्र जाकर पौलोमी (शची) से मेरा यह वचन कह दो, इन गर्वोद्धत शब्दों में — कि सत्यभामा यह कहती है।'

श्लोक 48 (vishnu.5.30.48)

यदि त्वं दयिता भर्तुर्यदि वश्यः पतिस्तव । मद्भर्तुर्हरतो वृक्षं तत् कारय निवारणम्

yadi tvaṁ dayitā bharturyadi vaśyaḥ patistava madbharturharato vṛkṣaṁ tat kāraya nivāraṇam

'यदि तुम सचमुच अपने पति की प्रिया हो, यदि तुम्हारा पति सचमुच तुम्हारे वश में है, तो इस वृक्ष को हरते हुए मेरे पति को रुकवा दो।'

श्लोक 49 (vishnu.5.30.49)

जानामि ते पतिं शक्रं जानामि त्रिदशेश्वरम् । पारिजातं तथाप्य् एनं मानुषी हारयामि ते

jānāmi te patiṁ śakraṁ jānāmi tridaśeśvaram pārijātaṁ tathāpy enaṁ mānuṣī hārayāmi te

'मैं जानती हूँ कि तुम्हारे पति शक्र हैं, मैं जानती हूँ कि वे त्रिदशेश्वर हैं; फिर भी, मैं, एक मानवी, तुम्हारे इस पारिजात को हर ले जा रही हूँ।'

श्लोक 50 (vishnu.5.30.50)

पराशर उवाच । इत्य् उक्ता रक्षिणो गत्वा शच्या ऊचुर्यथोदितम् । शची चोत्साहयाम् आस त्रिदशाधिपतिं पतिम्

parāśara uvāca ity uktā rakṣiṇo gatvā śacyā ūcuryathoditam śacī cotsāhayām āsa tridaśādhipatiṁ patim

पराशर ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर रक्षकों ने जाकर शची को यथावत सुना दिया; और शची ने अपने पति, त्रिदशाधिपति (इन्द्र), को उकसाया।

श्लोक 51 (vishnu.5.30.51)

ततः समस्तदेवानां सैन्यैः परिवृतो हरिम् । प्रययौ पारिजातार्थम् इन्द्रो योधयितुं द्विज

tataḥ samastadevānāṁ sainyaiḥ parivṛto harim prayayau pārijātārtham indro yodhayituṁ dvija

हे द्विज! तब समस्त देवताओं की सेनाओं से घिरकर इन्द्र पारिजात के लिए हरि से युद्ध करने चल पड़े।

श्लोक 52 (vishnu.5.30.52)

ततः परिघनिस्त्रिंशगदाशूलवरायुधाः । बभूवुस्त्रिदशाः सज्जाः शक्रे वज्रकरे स्थिते

tataḥ parighanistriṁśagadāśūlavarāyudhāḥ babhūvustridaśāḥ sajjāḥ śakre vajrakare sthite

तब परिघ, तलवार, गदा, शूल आदि उत्तम अस्त्रों से सुसज्जित त्रिदशगण तैयार हो गए, जब शक्र वज्र हाथ में लिए खड़े हुए।

श्लोक 53 (vishnu.5.30.53)

ततो निरीक्ष्य गोविन्दो नागराजोपरि स्थितम् । शक्रं देवपरीवारं युद्धाय समुपस्थितम्

tato nirīkṣya govindo nāgarājopari sthitam śakraṁ devaparīvāraṁ yuddhāya samupasthitam

तब गोविन्द ने गजराज (ऐरावत) पर स्थित, देवताओं से घिरे तथा युद्ध हेतु उपस्थित शक्र को देखकर —

श्लोक 54 (vishnu.5.30.54)

चकार शङ्खनिर्घोषं दिशः शब्देन पूरयन् । मुमोच च शरव्रातं सहस्रायुतसंमितम्

cakāra śaṅkhanirghoṣaṁ diśaḥ śabdena pūrayan mumoca ca śaravrātaṁ sahasrāyutasaṁmitam

— अपना शंख बजाया, जिसकी ध्वनि से दिशाएँ भर उठीं, और हज़ारों-लाखों बाणों की वर्षा की।

श्लोक 55 (vishnu.5.30.55)

ततो दिशो नभश्चैव दृष्ट्वा शरशताचितम् । मुमुचुस्त्रिदशाः सर्वे अस्त्रशस्त्राण्य् अनेकशः

tato diśo nabhaścaiva dṛṣṭvā śaraśatācitam mumucustridaśāḥ sarve astraśastrāṇy anekaśaḥ

तब दिशाओं और आकाश को सैकड़ों बाणों से आच्छादित देखकर समस्त त्रिदशगण ने अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र छोड़े।

श्लोक 56 (vishnu.5.30.56)

एकैकं शस्त्रम् अस्त्रं च देवैर्मुक्तं सहस्रधा । चिच्छेद लीलयैवेशो जगतां मधुसूदनः

ekaikaṁ śastram astraṁ ca devairmuktaṁ sahasradhā ciccheda līlayaiveśo jagatāṁ madhusūdanaḥ

देवताओं द्वारा छोड़े गए प्रत्येक अस्त्र-शस्त्र को जगत के स्वामी मधुसूदन ने लीलामात्र में सहस्रों टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 57 (vishnu.5.30.57)

पाशं सलिलराजस्य समाकृष्योरगाशनः । चकार खण्डशश्चञ्च्वा बालपन्नगदेहवत्

pāśaṁ salilarājasya samākṛṣyoragāśanaḥ cakāra khaṇḍaśaścañcvā bālapannagadehavat

उरगभक्षी गरुड़ ने जलपति वरुण के पाश को खींचकर अपनी चोंच से इस प्रकार खण्ड-खण्ड कर डाला, मानो किसी नवजात सर्प के शरीर को।

श्लोक 58 (vishnu.5.30.58)

यमेन प्रहितं दण्डं गदाविक्षेपखण्डितम् । पृथिव्यां पातयाम् आस भगवान् देवकीसुतः

yamena prahitaṁ daṇḍaṁ gadāvikṣepakhaṇḍitam pṛthivyāṁ pātayām āsa bhagavān devakīsutaḥ

भगवान् देवकीनन्दन ने यम द्वारा फेंके गए दण्ड को अपनी गदा के प्रहार से खण्डित कर पृथ्वी पर गिरा दिया।

श्लोक 59 (vishnu.5.30.59)

शिबिकां च धनेशस्य चक्रेण तिलशो विभुः । चकार शौरिरर्कं च दृष्टिदृष्टं हतौजसम्

śibikāṁ ca dhaneśasya cakreṇa tilaśo vibhuḥ cakāra śaurirarkaṁ ca dṛṣṭidṛṣṭaṁ hataujasam

सर्वशक्तिमान शौरि ने धनाधिप कुबेर की पालकी को भी अपने चक्र से टुकड़े-टुकड़े कर दिया, और सूर्य को अपनी दृष्टि से देखकर ही उसका तेज हर लिया।

श्लोक 60 (vishnu.5.30.60)

नीतोऽग्निः शतशो बाणैर्द्राविता वसवो दिशः । चक्रविच्छिन्नशूलाग्रा रुद्रा भुवि निपातिताः

nīto'gniḥ śataśo bāṇairdrāvitā vasavo diśaḥ cakravicchinnaśūlāgrā rudrā bhuvi nipātitāḥ

अग्नि सैकड़ों बाणों से खदेड़ दिया गया; वसुगण दिशाओं में तितर-बितर हो गए; चक्र से जिनके शूलाग्र कट गए थे, वे रुद्रगण पृथ्वी पर गिरा दिए गए।

श्लोक 61 (vishnu.5.30.61)

साध्या विश्वे च मरुतो गन्धर्वाश्चैव सायकैः । शार्ङ्गेण प्रेरितैरस्ता व्योम्नि शाल्मलितूलवत्

sādhyā viśve ca maruto gandharvāścaiva sāyakaiḥ śārṅgeṇa preritairastā vyomni śālmalitūlavat

साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण तथा गन्धर्व भी शार्ङ्ग-धनुष से छोड़े गए बाणों से आहत होकर आकाश में शाल्मलि-रुई के समान बिखर गए।

श्लोक 62 (vishnu.5.30.62)

गरुत्मान् अपि वक्त्रेण पक्षाभ्यां नखराङ्कुरैः । भक्षयंस्ताडयन् देवान् दारयंश्च चचार वै

garutmān api vaktreṇa pakṣābhyāṁ nakharāṅkuraiḥ bhakṣayaṁstāḍayan devān dārayaṁśca cacāra vai

गरुत्मान् भी अपनी चोंच से नोचते हुए, पंखों से प्रहार करते हुए, तथा नखों के अग्रभाग से चीरते हुए देवताओं के मध्य विचरण करने लगे।

श्लोक 63 (vishnu.5.30.63)

ततः शरसहस्रेण देवेन्द्रमधुसूदनौ । परस्परं ववर्षाते धाराभिरिव तोयदौ

tataḥ śarasahasreṇa devendramadhusūdanau parasparaṁ vavarṣāte dhārābhiriva toyadau

तब देवेन्द्र और मधुसूदन दोनों एक-दूसरे पर सहस्रों बाणों की वर्षा करने लगे, मानो दो मेघ धाराओं की वर्षा कर रहे हों।

श्लोक 64 (vishnu.5.30.64)

ऐरावतेन गरुडो युयुधे तत्र संकुले । देवैः समस्तैर्युयुधे शक्रेण च जनार्दनः

airāvatena garuḍo yuyudhe tatra saṁkule devaiḥ samastairyuyudhe śakreṇa ca janārdanaḥ

उस घमासान युद्ध में गरुड़ ऐरावत से जूझ रहे थे, और जनार्दन समस्त देवताओं तथा शक्र से युद्धरत थे।

श्लोक 65 (vishnu.5.30.65)

छिन्नेष्व् अशेषबाणेषु शस्त्रेष्व् अस्त्रेषु च त्वरन् । जग्राह वासवो वज्रं कृष्णश्चक्रं सुदर्शनम्

chinneṣv aśeṣabāṇeṣu śastreṣv astreṣu ca tvaran jagrāha vāsavo vajraṁ kṛṣṇaścakraṁ sudarśanam

जब समस्त बाण, शस्त्र तथा अस्त्र कट चुके, तब वासव ने शीघ्रतापूर्वक अपना वज्र और कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र उठा लिया।

श्लोक 66 (vishnu.5.30.66)

ततो हाहाकृतं सर्वं त्रैलोक्यं द्विजसत्तम । वज्रचक्रधरौ दृष्ट्वा देवराजजनार्दनौ

tato hāhākṛtaṁ sarvaṁ trailokyaṁ dvijasattama vajracakradharau dṛṣṭvā devarājajanārdanau

हे द्विजसत्तम! तब वज्र और चक्र धारण किए हुए देवराज तथा जनार्दन को देखकर समस्त त्रिलोक हाहाकार कर उठा।

श्लोक 67 (vishnu.5.30.67)

क्षिप्तं वज्रम् अथेन्द्रेण जग्राह भगवान् हरिः । न मुमोच तथा चक्रं शक्रं तिष्ठेति चाब्रवीत्

kṣiptaṁ vajram athendreṇa jagrāha bhagavān hariḥ na mumoca tathā cakraṁ śakraṁ tiṣṭheti cābravīt

तब इन्द्र द्वारा फेंके गए वज्र को भगवान् हरि ने पकड़ लिया, परन्तु अपना चक्र नहीं छोड़ा, और शक्र से कहा — 'ठहरो!'

श्लोक 68 (vishnu.5.30.68)

प्रणष्टवज्रं देवेन्द्रं गरुडक्षतवाहनम् । सत्यभामाब्रवीद् वीरं पलायनपरायणम्

praṇaṣṭavajraṁ devendraṁ garuḍakṣatavāhanam satyabhāmābravīd vīraṁ palāyanaparāyaṇam

वज्र से रहित, गरुड़ द्वारा घायल किए गए वाहन वाले, तथा भागने को उद्यत उस वीर देवेन्द्र से सत्यभामा ने कहा —

श्लोक 69 (vishnu.5.30.69)

त्रैलोक्येश्वर नो युक्तं शचीभर्तुः पलायनम् । पारिजातस्रगाभोगा त्वाम् उपस्थास्यते शची

trailokyeśvara no yuktaṁ śacībhartuḥ palāyanam pārijātasragābhogā tvām upasthāsyate śacī

'हे त्रिलोकेश्वर! शची के पति के लिए भाग जाना उचित नहीं है। पारिजात की पूर्ण माला धारण किए हुए शची तो फिर भी तुम्हारी सेवा में उपस्थित हो ही जाएगी।'

श्लोक 70 (vishnu.5.30.70)

कीदृशं देवराज्यं ते पारिजातस्रगुज्ज्वलाम् । अपश्यतो यथा पूर्वं प्रणयाभ्यागतां शचीम्

kīdṛśaṁ devarājyaṁ te pārijātasragujjvalām apaśyato yathā pūrvaṁ praṇayābhyāgatāṁ śacīm

'तुम्हारा वह देवराज्य कैसा, यदि तुम पारिजात-माला से देदीप्यमान, प्रेमपूर्वक पूर्ववत् समीप आती हुई शची को नहीं देख सकोगे?'

श्लोक 71 (vishnu.5.30.71)

अलं शक्र प्रयातेन न व्रीडां गन्तुम् अर्हसि । नीयतां पारिजातोऽयं देवाः सन्तु गतव्यथाः

alaṁ śakra prayātena na vrīḍāṁ gantum arhasi nīyatāṁ pārijāto'yaṁ devāḥ santu gatavyathāḥ

'हे शक्र! जाना व्यर्थ है, तुम्हें लज्जित होने की आवश्यकता नहीं। यह पारिजात ले जाया जाए, देवगण व्यथामुक्त हो जाएँ।'

श्लोक 72 (vishnu.5.30.72)

पतिगर्वावलेपेन बहुमानपुरःसरम् । न ददर्श गृहायाताम् उपचारेण मां शची

patigarvāvalepena bahumānapuraḥsaram na dadarśa gṛhāyātām upacāreṇa māṁ śacī

'अपने पति के गर्व और अभिमान के कारण जब मैं उसके घर गई थी, तब शची ने मुझे उचित सम्मान और शिष्टाचार के साथ नहीं देखा था।'

श्लोक 73 (vishnu.5.30.73)

स्त्रीत्वाद् अगुरुचित्ताहं स्वभर्तृश्लाघनापरा । ततः कृतवती शक्र भवता सह विग्रहम्

strītvād agurucittāhaṁ svabhartṛślāghanāparā tataḥ kṛtavatī śakra bhavatā saha vigraham

'नारी-स्वभाव के कारण गम्भीर बुद्धि न रखते हुए, और अपने पति की प्रशंसा में तत्पर होकर, हे शक्र! मैंने ही यह विग्रह तुमसे उत्पन्न कर दिया।'

श्लोक 74 (vishnu.5.30.74)

तद् अलं पारिजातेन परस्वेन हृतेन नः । रूपेण गर्विता सा तु भर्त्रा स्त्री का न गर्विता

tad alaṁ pārijātena parasvena hṛtena naḥ rūpeṇa garvitā sā tu bhartrā strī kā na garvitā

'अतः पराई वस्तु, इस हरे गए पारिजात से, अब बस हो। वह तो अपने रूप और पति से गर्वित है — पर भला अपने पति के कारण कौन स्त्री गर्वित नहीं होती?'

श्लोक 75 (vishnu.5.30.75)

पराशर उवाच । इत्य् उक्तो वै निववृते देवराजस्तया द्विज । प्राह चैनाम् अलं चण्डि सखि खेदातिविस्तरैः

parāśara uvāca ity ukto vai nivavṛte devarājastayā dvija prāha cainām alaṁ caṇḍi sakhi khedātivistaraiḥ

पराशर ने कहा — हे द्विज! इस प्रकार कहे जाने पर देवराज उसकी बात से शान्त होकर लौट गए, और उससे कहा — 'हे चण्डि, सखि! अब इतने खेद की आवश्यकता नहीं।'

श्लोक 76 (vishnu.5.30.76)

न चापि सर्गसंहारस्थितिकर्ताखिलस्य यः । जितस्य तेन मे व्रीडा जायते विश्वरूपिणा

na cāpi sargasaṁhārasthitikartākhilasya yaḥ jitasya tena me vrīḍā jāyate viśvarūpiṇā

'समस्त सृष्टि, संहार तथा स्थिति के कर्ता, विश्वरूपी उस [कृष्ण] के हाथों पराजित होने में मुझे कोई लज्जा नहीं होती।'

श्लोक 77 (vishnu.5.30.77)

यस्मिञ् जगत् सकलम् एतद् अनादिमध्ये यस्माद् यतश्च न भविष्यति सर्वभूतात् । तेनोद्भवप्रलयपालनकारणेन व्रीडा कथं भवति देवि निराकृतस्य

yasmiñ jagat sakalam etad anādimadhye yasmād yataśca na bhaviṣyati sarvabhūtāt tenodbhavapralayapālanakāraṇena vrīḍā kathaṁ bhavati devi nirākṛtasya

'हे देवी! जिसमें यह समस्त अनादि-अनन्त जगत स्थित है, जिससे यह उत्पन्न होता है और जिसमें यह लीन हो जाएगा — समस्त प्राणियों की उत्पत्ति, प्रलय तथा पालन के उस कारण-स्वरूप से पराजित होने में भला लज्जा कैसी?'

श्लोक 78 (vishnu.5.30.78)

सकलभुवनसूतिर्मूर्तिरस्याणुसूक्ष्मा विदितसकलवेद्यैर्ज्ञायते यस्य नान्यैः । तम् अजम् अकृतम् ईशं शाश्वतं स्वेच्छयैनं जगदुपकृतिमर्त्यं को विजेतुं समर्थः

sakalabhuvanasūtirmūrtirasyāṇusūkṣmā viditasakalavedyairjñāyate yasya nānyaiḥ tam ajam akṛtam īśaṁ śāśvataṁ svecchayainaṁ jagadupakṛtimartyaṁ ko vijetuṁ samarthaḥ

'समस्त लोकों की उत्पत्ति का कारण, अणु से भी सूक्ष्म उसका स्वरूप, केवल वे ही जानते हैं जिन्होंने समस्त ज्ञातव्य को जान लिया है, अन्य कोई नहीं। उस अजन्मा, अकृत, नित्य ईश्वर को, जो अपनी ही इच्छा से जगत के कल्याण हेतु मर्त्य रूप धारण किए हुए हैं — भला उन्हें जीतने में कौन समर्थ है?'

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