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पञ्चमांश · अध्याय 31

पारिजात-वापसी और उद्धृत कन्याओं का विवाह

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (vishnu.5.31.1)

पराशर उवाच । संस्तुतो भगवान् इत्थं देवराजेन केशवः । प्रहस्य भावगम्भीरम् उवाचेन्द्रं द्विजोत्तम

parāśara uvāca saṁstuto bhagavān itthaṁ devarājena keśavaḥ prahasya bhāvagambhīram uvācendraṁ dvijottama

पराशर ने कहा — हे द्विजोत्तम! देवराज द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर भगवान् केशव ने मुस्कुराते हुए गम्भीर भाव से इन्द्र से कहा —

श्लोक 2 (vishnu.5.31.2)

भगवान् उवाच । देवराजो भवान् इन्द्रो वयं मर्त्या जगत्पते । क्षन्तव्यं भवतैवैतद् अपराधकृतं मम

bhagavān uvāca devarājo bhavān indro vayaṁ martyā jagatpate kṣantavyaṁ bhavataivaitad aparādhakṛtaṁ mama

भगवान् ने कहा — 'हे इन्द्र! तुम देवराज हो, हे जगत्पते! हम तो मनुष्य मात्र हैं। मेरे इस अपराध को आप ही क्षमा करें।'

श्लोक 3 (vishnu.5.31.3)

पारिजाततरुश्चायं नीयताम् उचितास्पदम् । गृहीतोऽयं मया शक्र सत्यावचनकारणात्

pārijātataruścāyaṁ nīyatām ucitāspadam gṛhīto'yaṁ mayā śakra satyāvacanakāraṇāt

'और यह पारिजात वृक्ष अपने उचित स्थान पर ले जाया जाए; हे शक्र! इसे मैंने सत्या के वचन की रक्षा हेतु ही लिया था।'

श्लोक 4 (vishnu.5.31.4)

वज्रं चेदं गृहाण त्वं यद् ग्रस्तं प्रहितं त्वया । तवैवैतत् प्रहरणं शक्र वैरिविदारणम्

vajraṁ cedaṁ gṛhāṇa tvaṁ yad grastaṁ prahitaṁ tvayā tavaivaitat praharaṇaṁ śakra vairividāraṇam

'और यह वज्र भी ग्रहण करो, जो तुम्हारे द्वारा फेंका गया था और मैंने पकड़ लिया था; हे शक्र! शत्रुओं को विदीर्ण करने वाला यह अस्त्र तुम्हारा ही है।'

श्लोक 5 (vishnu.5.31.5)

शक्र उवाच । विमोहयसि माम् ईश मर्त्योऽहम् इति किं वदन् । जानीमस्त्वां भगवतो न तु सूक्ष्मविदो वयम्

śakra uvāca vimohayasi mām īśa martyo'ham iti kiṁ vadan jānīmastvāṁ bhagavato na tu sūkṣmavido vayam

शक्र ने कहा — 'हे ईश! मैं मर्त्य हूँ, ऐसा कहकर आप मुझे क्यों मोहित करते हैं? हम आपको भगवान् जानते हैं, परन्तु हम सूक्ष्म तत्त्व के ज्ञाता नहीं हैं।'

श्लोक 6 (vishnu.5.31.6)

योऽसि सोऽसि जगत्त्राणप्रवृत्तौ नाथ संस्थितः । जगतः शल्यनिष्कर्षं करोष्य् असुरसूदन

yo'si so'si jagattrāṇapravṛttau nātha saṁsthitaḥ jagataḥ śalyaniṣkarṣaṁ karoṣy asurasūdana

'आप जो भी हैं, वही हैं; हे नाथ! जगत की रक्षा में तत्पर, हे असुरसूदन! आप जगत के कण्टक को उखाड़ते हैं।'

श्लोक 7 (vishnu.5.31.7)

नीयतां पारिजातोऽयं कृष्ण द्वारवतीं पुरीम् । मर्त्यलोके त्वया मुक्ते नायं संस्थास्यते भुवि

nīyatāṁ pārijāto'yaṁ kṛṣṇa dvāravatīṁ purīm martyaloke tvayā mukte nāyaṁ saṁsthāsyate bhuvi

'हे कृष्ण! यह पारिजात द्वारवती नगरी को ले जाया जाए; जब आप मर्त्यलोक को त्यागेंगे, तब यह पृथ्वी पर नहीं रहेगा।'

श्लोक 8 (vishnu.5.31.8)

पराशर उवाच । तथेत्य् उक्त्वा च देवेन्द्रम् आजगाम भुवं हरिः । प्रसक्तैः सिद्धगन्धर्वैः स्तूयमानः सुरर्षिभिः

parāśara uvāca tathety uktvā ca devendram ājagāma bhuvaṁ hariḥ prasaktaiḥ siddhagandharvaiḥ stūyamānaḥ surarṣibhiḥ

पराशर ने कहा — देवेन्द्र से 'ऐसा ही हो' कहकर हरि पृथ्वी पर लौट आए, जिनकी सिद्ध, गन्धर्व तथा देवर्षिगण चारों ओर से घिरकर स्तुति कर रहे थे।

श्लोक 9 (vishnu.5.31.9)

ततः शङ्खम् उपाध्माय द्वारकोपरि संस्थितः । हर्षम् उत्पादयाम् आस द्वारकावासिनां द्विज

tataḥ śaṅkham upādhmāya dvārakopari saṁsthitaḥ harṣam utpādayām āsa dvārakāvāsināṁ dvija

हे द्विज! तब द्वारका के ऊपर स्थित होकर उन्होंने शंख बजाया, जिससे द्वारकावासियों में हर्ष उत्पन्न हो गया।

श्लोक 10 (vishnu.5.31.10)

अवतीर्याथ गरुडात् सत्यभामासहायवान् । निष्कुटे स्थापयाम् आस पारिजातं महातरुम्

avatīryātha garuḍāt satyabhāmāsahāyavān niṣkuṭe sthāpayām āsa pārijātaṁ mahātarum

फिर गरुड़ से उतरकर, सत्यभामा को साथ लेकर, उसने उस महान् पारिजात वृक्ष को उपवन में स्थापित करवाया।

श्लोक 11 (vishnu.5.31.11)

यम् अभ्येत्य जनः सर्वो जातिं स्मरति पौर्विकीम् । वास्यते यस्य पुष्पोत्थगन्धेनोर्वी त्रियोजनम्

yam abhyetya janaḥ sarvo jātiṁ smarati paurvikīm vāsyate yasya puṣpotthagandhenorvī triyojanam

जिसके पास आकर हर व्यक्ति अपना पूर्वजन्म स्मरण कर लेता है, और जिसके पुष्पों की सुगन्ध से तीन योजन तक की भूमि सुवासित रहती है।

श्लोक 12 (vishnu.5.31.12)

ततस्ते यादवाः सर्वे देहबन्धान् अमानुषान् । ददृशुः पादपे तस्मिन् कुर्वतो मुखदर्शनम्

tataste yādavāḥ sarve dehabandhān amānuṣān dadṛśuḥ pādape tasmin kurvato mukhadarśanam

तब उन समस्त यादवों ने उस वृक्ष में अलौकिक देहधारी आकृतियों को अपना मुख दिखाते हुए देखा।

श्लोक 13 (vishnu.5.31.13)

किंकरैः समुपानीतं हस्त्यश्वादि ततो धनम् । स्त्रियश्च कृष्णो जग्राह नरकस्य परिग्रहान्

kiṁkaraiḥ samupānītaṁ hastyaśvādi tato dhanam striyaśca kṛṣṇo jagrāha narakasya parigrahān

तब कृष्ण ने सेवकों द्वारा लाए गए हाथी, अश्व आदि धन को, तथा नरक के अधिकार में रही उन स्त्रियों को भी ग्रहण किया।

श्लोक 14 (vishnu.5.31.14)

ततः काले शुभे प्राप्ते उपयेमे जनार्दनः । ताः कन्या नरकेणासन् सर्वतो याः समाहृताः

tataḥ kāle śubhe prāpte upayeme janārdanaḥ tāḥ kanyā narakeṇāsan sarvato yāḥ samāhṛtāḥ

तब शुभ समय आने पर जनार्दन ने उन कन्याओं का पाणिग्रहण किया, जिन्हें नरक ने सब ओर से एकत्र किया था।

श्लोक 15 (vishnu.5.31.15)

एकस्मिन्न् एव गोविन्दः काले तासां महामुने । जग्राह विधिवत् पाणीन् पृथग्गेहेषु धर्मतः

ekasminn eva govindaḥ kāle tāsāṁ mahāmune jagrāha vidhivat pāṇīn pṛthaggeheṣu dharmataḥ

हे महामुने! एक ही समय में गोविन्द ने विधिपूर्वक, धर्मानुसार, उन सबका पाणिग्रहण अलग-अलग घरों में किया।

श्लोक 16 (vishnu.5.31.16)

षोडशस्त्रीसहस्राणि शतम् एकं तथाधिकम् । तावन्ति चक्रे रूपाणि भगवान् मधुसूदनः

ṣoḍaśastrīsahasrāṇi śatam ekaṁ tathādhikam tāvanti cakre rūpāṇi bhagavān madhusūdanaḥ

सोलह हज़ार तथा एक सौ अधिक स्त्रियाँ — भगवान् मधुसूदन ने उतने ही रूप धारण किए।

श्लोक 17 (vishnu.5.31.17)

एकैकश्येन ताः कन्या मेनिरे मधुसूदनः । ममैव पाणिग्रहणं भगवान् कृतवान् इति

ekaikaśyena tāḥ kanyā menire madhusūdanaḥ mamaiva pāṇigrahaṇaṁ bhagavān kṛtavān iti

उन सभी कन्याओं में से प्रत्येक ने अलग-अलग यही समझा कि 'भगवान् मधुसूदन ने मेरा ही पाणिग्रहण किया है।'

श्लोक 18 (vishnu.5.31.18)

निशासु च जगत्स्रष्टा तासां गेहेषु केशवः । उवास विप्र सर्वासां विश्वरूपधरो हरिः

niśāsu ca jagatsraṣṭā tāsāṁ geheṣu keśavaḥ uvāsa vipra sarvāsāṁ viśvarūpadharo hariḥ

हे विप्र! और रात्रियों में जगत्स्रष्टा केशव, विश्वरूपधारी हरि, उन सभी के घरों में निवास करते थे।

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