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पञ्चमांश · अध्याय 34

पौण्ड्रक-वध और वाराणसी-दहन

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

श्लोक 1 (vishnu.5.34.1)

मैत्रेय उवाच । चक्रे कर्म महच्छौरिर्बिभ्राणो मानुषीं तनुम् । जिगाय शक्रं शर्वं च सर्वान् देवांश्च लीलया

maitreya uvāca cakre karma mahacchaurirbibhrāṇo mānuṣīṁ tanum jigāya śakraṁ śarvaṁ ca sarvān devāṁśca līlayā

मैत्रेय ने कहा — मानव देह धारण किए हुए शौरि ने महान् कर्म किए; उन्होंने लीलामात्र में शक्र, शर्व (शिव) तथा समस्त देवताओं को जीत लिया।

श्लोक 2 (vishnu.5.34.2)

यच्चान्यद् अकरोत् कर्म दिव्यचेष्टाविधानकृत् । तत् कथ्यतां महाभाग परं कौतूहलं हि मे

yaccānyad akarot karma divyaceṣṭāvidhānakṛt tat kathyatāṁ mahābhāga paraṁ kautūhalaṁ hi me

'दिव्य लीलाओं का विधान करने वाले उन्होंने और जो कर्म किए, वह भी कहिए, हे महाभाग! मुझे इसमें अत्यंत उत्सुकता है।'

श्लोक 3 (vishnu.5.34.3)

पराशर उवाच । गदतो मम विप्रर्षे श्रूयताम् इदम् आदरात् । नरावतारे कृष्णेन दग्धा वाराणसी यथा

parāśara uvāca gadato mama viprarṣe śrūyatām idam ādarāt narāvatāre kṛṣṇena dagdhā vārāṇasī yathā

पराशर ने कहा — हे विप्रर्षे! आदरपूर्वक सुनो, मैं बताता हूँ कि मनुष्यावतार में कृष्ण ने वाराणसी को किस प्रकार दग्ध किया।

श्लोक 4 (vishnu.5.34.4)

पौण्ड्रको वासुदेवस्तु वासुदेवोऽभवद् भुवि । अवतीर्णस्त्वम् इत्य् उक्तो जनैरज्ञानमोहितैः

pauṇḍrako vāsudevastu vāsudevo'bhavad bhuvi avatīrṇastvam ity ukto janairajñānamohitaiḥ

पृथ्वी पर पौण्ड्रक वासुदेव नामक एक राजा था; अज्ञान से मोहित लोगों द्वारा उससे कहा गया कि 'आप ही अवतार हैं।'

श्लोक 5 (vishnu.5.34.5)

स मेने वासुदेवोऽहम् अवतीर्णो महीतले । नष्टस्मृतिस्ततः सर्वं विष्णुचिह्नम् अचीकरत्

sa mene vāsudevo'ham avatīrṇo mahītale naṣṭasmṛtistataḥ sarvaṁ viṣṇucihnam acīkarat

उसने यह मान लिया कि 'मैं ही वासुदेव, पृथ्वी पर अवतरित हुआ हूँ'; स्मृति खोकर उसने विष्णु के समस्त चिह्न धारण कर लिए।

श्लोक 6 (vishnu.5.34.6)

दूतं च प्रेषयाम् आस कृष्णाय सुमहात्मने । त्यक्त्वा चक्रादिकं चिह्नं मदीयं नाम चात्मनः

dūtaṁ ca preṣayām āsa kṛṣṇāya sumahātmane tyaktvā cakrādikaṁ cihnaṁ madīyaṁ nāma cātmanaḥ

और उसने महात्मा कृष्ण के पास दूत भेजा कि वे चक्र आदि चिह्नों को तथा अपने ही नाम (वासुदेव) को त्याग दें।

श्लोक 7 (vishnu.5.34.7)

वासुदेवात्मकं मूढ मुक्त्वा गर्वं विशेषतः । आत्मनो जीवितार्थाय ततो मे प्रणतिं व्रज

vāsudevātmakaṁ mūḍha muktvā garvaṁ viśeṣataḥ ātmano jīvitārthāya tato me praṇatiṁ vraja

'हे मूर्ख! वासुदेव होने का यह अभिमान त्यागकर, अपने जीवन की रक्षा के लिए मेरे समक्ष नतमस्तक हो जाओ।'

श्लोक 8 (vishnu.5.34.8)

इत्य् उक्तः संप्रहस्यैनं दूतं प्राह जनार्दनः । निजचिह्नम् अहं चक्रं समुत्स्रक्ष्ये त्वयीति वै

ity uktaḥ saṁprahasyainaṁ dūtaṁ prāha janārdanaḥ nijacihnam ahaṁ cakraṁ samutsrakṣye tvayīti vai

यह सुनकर जनार्दन ने खूब हँसते हुए उस दूत से कहा — 'मैं अपने चिह्न, इस चक्र को, उस पर अवश्य छोड़ूँगा।'

श्लोक 9 (vishnu.5.34.9)

वाच्यश्च पौण्ड्रको गत्वा त्वया दूत वचो मम । ज्ञातस्त्वद्वाक्यसद्भावो यत् कार्यं तद् विधीयताम्

vācyaśca pauṇḍrako gatvā tvayā dūta vaco mama jñātastvadvākyasadbhāvo yat kāryaṁ tad vidhīyatām

'और हे दूत! जाकर पौण्ड्रक से मेरा यह वचन कहो — तुम्हारे वचन का सद्भाव मुझे ज्ञात हो गया है; अब जो करणीय हो, वह किया जाए।'

श्लोक 10 (vishnu.5.34.10)

गृहीतचिह्न एवाहम् आगमिष्यामि ते पुरम् । समुत्स्रक्ष्यामि ते चक्रं निजचिह्नम् असंशयम्

gṛhītacihna evāham āgamiṣyāmi te puram samutsrakṣyāmi te cakraṁ nijacihnam asaṁśayam

'मैं स्वयं अपने चिह्नों को धारण किए हुए तुम्हारे नगर में आऊँगा, और अपने ही चिह्न, इस चक्र को, तुम पर निश्चय ही छोड़ूँगा।'

श्लोक 11 (vishnu.5.34.11)

आज्ञापूर्वं च यद् इदम् आगच्छेति त्वयोदितम् । संपादयिष्ये श्वस्तुभ्यं तद् अप्य् एषोऽविलम्बितम्

ājñāpūrvaṁ ca yad idam āgaccheti tvayoditam saṁpādayiṣye śvastubhyaṁ tad apy eṣo'vilambitam

'और यह जो तुमने आज्ञापूर्वक कहा है कि आ जाओ — इसे भी मैं कल तुम्हारे लिए बिना विलम्ब के पूरा करूँगा।'

श्लोक 12 (vishnu.5.34.12)

शरणं ते समभ्येत्य कर्तास्मि नृपते तथा । यथा त्वत्तो भयं भूयो न मे किंचिद् भविष्यति

śaraṇaṁ te samabhyetya kartāsmi nṛpate tathā yathā tvatto bhayaṁ bhūyo na me kiṁcid bhaviṣyati

'हे नृप! मैं तुम्हारी शरण में आकर ऐसा करूँगा कि तुमसे मुझे फिर कभी कोई भय न रहे।'

श्लोक 13 (vishnu.5.34.13)

पराशर उवाच । इत्य् उक्तेऽपगते दूते संस्मृत्याभ्यागतं हरिः । गरुत्मन्तम् अथारुह्य त्वरितं तत्पुरं ययौ

parāśara uvāca ity ukte'pagate dūte saṁsmṛtyābhyāgataṁ hariḥ garutmantam athāruhya tvaritaṁ tatpuraṁ yayau

पराशर ने कहा — यह कहे जाने पर दूत के चले जाने पर, हरि ने स्मरण मात्र से आए हुए गरुड़ पर चढ़कर शीघ्रतापूर्वक उस नगर की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 14 (vishnu.5.34.14)

तस्यापि केशवोद्योगं श्रुत्वा काशिपतिस्तदा । सर्वसैन्यपरीवारः पार्ष्णिग्राह उपाययौ

tasyāpi keśavodyogaṁ śrutvā kāśipatistadā sarvasainyaparīvāraḥ pārṣṇigrāha upāyayau

केशव के अभियान का समाचार सुनकर काशीपति भी अपनी समस्त सेना सहित पीछे से सहायतार्थ आ पहुँचा।

श्लोक 15 (vishnu.5.34.15)

ततो बलेन महता काशिराजबलेन च । पौण्ड्रको वासुदेवोऽसौ केशवाभिमुखं ययौ

tato balena mahatā kāśirājabalena ca pauṇḍrako vāsudevo'sau keśavābhimukhaṁ yayau

तब विशाल सेना के साथ, तथा काशिराज की सेना के साथ, वह पौण्ड्रक वासुदेव केशव के सम्मुख आया।

श्लोक 16 (vishnu.5.34.16)

तं ददर्श हरिर्दूराद् उदारस्यन्दने स्थितम् । चक्रहस्तं गदाखड्गबाहुं पाणिगताम्बुजम्

taṁ dadarśa harirdūrād udārasyandane sthitam cakrahastaṁ gadākhaḍgabāhuṁ pāṇigatāmbujam

हरि ने उसे दूर से ही एक भव्य रथ पर स्थित, हाथ में चक्र लिए, भुजाओं में गदा-खड्ग धारण किए, तथा हाथ में कमल लिए हुए देखा,

श्लोक 17 (vishnu.5.34.17)

स्रग्धरं धृतशार्ङ्गं च सुपर्णरचितध्वजम् । वक्षःस्थले कृतं चास्य श्रीवत्सं ददृशे हरिः

sragdharaṁ dhṛtaśārṅgaṁ ca suparṇaracitadhvajam vakṣaḥsthale kṛtaṁ cāsya śrīvatsaṁ dadṛśe hariḥ

माला पहने, शार्ङ्ग-सदृश धनुष धारण किए, गरुड़-चिह्नित ध्वजा वाले, तथा उसकी छाती पर बनाए गए श्रीवत्स-चिह्न को भी हरि ने देखा।

श्लोक 18 (vishnu.5.34.18)

किरीटकुण्डलधरं पीतवासःसमन्वितम् । दृष्ट्वा तं भावगम्भीरं जहास गरुडध्वजः

kirīṭakuṇḍaladharaṁ pītavāsaḥsamanvitam dṛṣṭvā taṁ bhāvagambhīraṁ jahāsa garuḍadhvajaḥ

— मुकुट-कुण्डल धारण किए, पीत वस्त्र पहने हुए उस [पौण्ड्रक] को इतने गम्भीर भाव से देखकर गरुड़ध्वज (कृष्ण) हँस पड़े।

श्लोक 19 (vishnu.5.34.19)

युयुधे च बलेनास्य हस्त्यश्वबलिना द्विज । निस्त्रिंशर्ष्टिगदाशूलशक्तिकार्मुकशालिना

yuyudhe ca balenāsya hastyaśvabalinā dvija nistriṁśarṣṭigadāśūlaśaktikārmukaśālinā

हे द्विज! और उन्होंने हस्ति-अश्व से समृद्ध, तलवार, ऋष्टि, गदा, शूल, शक्ति तथा धनुष से सुसज्जित उस सेना से युद्ध किया।

श्लोक 20 (vishnu.5.34.20)

क्षणेन शार्ङ्गनिर्मुक्तैः शरैररिविदारणैः । गदाचक्रनिपातैश्च सूदयाम् आस तद्बलम्

kṣaṇena śārṅganirmuktaiḥ śarairarividāraṇaiḥ gadācakranipātaiśca sūdayām āsa tadbalam

एक ही क्षण में शार्ङ्ग से छूटे शत्रु-विदारक बाणों से, तथा गदा और चक्र के प्रहारों से उन्होंने उस सेना का संहार कर दिया।

श्लोक 21 (vishnu.5.34.21)

काशिराजबलं चैव क्षयं नीत्वा जनार्दनः । उवाच पौण्ड्रकं मूढम् आत्मचिह्नोपलक्षणम्

kāśirājabalaṁ caiva kṣayaṁ nītvā janārdanaḥ uvāca pauṇḍrakaṁ mūḍham ātmacihnopalakṣaṇam

और काशिराज की सेना का भी विनाश कर जनार्दन ने अपने ही चिह्नों को धारण किए हुए उस मूर्ख पौण्ड्रक से कहा —

श्लोक 22 (vishnu.5.34.22)

भगवान् उवाच । पौण्ड्रकोक्तं त्वया यत् तु दूतवक्त्रेण मां प्रति । समुत्सृजेति चिह्नानि तत् ते संपादयाम्य् अहम्

bhagavān uvāca pauṇḍrakoktaṁ tvayā yat tu dūtavaktreṇa māṁ prati samutsṛjeti cihnāni tat te saṁpādayāmy aham

भगवान् ने कहा — 'हे पौण्ड्रक! दूत के मुख से तुमने मुझसे जो कहलवाया था — कि चिह्नों को त्याग दो — वह मैं अब तुम्हें पूरा करके दिखाता हूँ।'

श्लोक 23 (vishnu.5.34.23)

चक्रम् एतत् समुत्सृष्टं गदेयं ते विसर्जिता । गरुत्मान् एष निर्दिष्टः समारोहतु ते ध्वजम्

cakram etat samutsṛṣṭaṁ gadeyaṁ te visarjitā garutmān eṣa nirdiṣṭaḥ samārohatu te dhvajam

'यह चक्र तुम पर छोड़ा गया, यह गदा भी तुम्हें अर्पित की गई; और यह गरुड़ भेजा गया — तुम्हारी ध्वजा पर विराजमान हो।'

श्लोक 24 (vishnu.5.34.24)

पराशर उवाच । इत्य् उच्चार्य विमुक्तेन चक्रेणासौ विदारितः । पोथितो गदया भग्नो गरुत्मांश्च गरुत्मता

parāśara uvāca ity uccārya vimuktena cakreṇāsau vidāritaḥ pothito gadayā bhagno garutmāṁśca garutmatā

पराशर ने कहा — यह कहकर छोड़े गए चक्र से वह विदीर्ण हो गया, गदा से कुचल दिया गया, और उसके गरुड़-चिह्न को वास्तविक गरुत्मान् ने ही तोड़ डाला।

श्लोक 25 (vishnu.5.34.25)

ततो हाहाकृते लोके काशीनाम् अधिपो बली । युयुधे वासुदेवेन मित्रस्यापचितौ स्थितः

tato hāhākṛte loke kāśīnām adhipo balī yuyudhe vāsudevena mitrasyāpacitau sthitaḥ

तब लोक में हाहाकार मच जाने पर काशी का बलवान् स्वामी अपने मित्र का प्रतिशोध लेने हेतु दृढ़ होकर वासुदेव से युद्ध करने लगा।

श्लोक 26 (vishnu.5.34.26)

ततः शार्ङ्गधनुर्मुक्तैश्छित्त्वा तस्य शरैः शिरः । काशिपुर्यां स चिक्षेप कुर्वंल् लोकस्य विस्मयम्

tataḥ śārṅgadhanurmuktaiśchittvā tasya śaraiḥ śiraḥ kāśipuryāṁ sa cikṣepa kurvaṁl lokasya vismayam

तब शार्ङ्ग-धनुष से छोड़े गए बाणों से उसका सिर काटकर उसने उसे काशीपुरी में फेंक दिया, जिससे लोगों में भारी आश्चर्य फैल गया।

श्लोक 27 (vishnu.5.34.27)

हत्वा च पौण्ड्रकं शौरिः काशिराजं च सानुगम् । पुनर्द्वारवतीं प्राप्तो रेमे स्वर्गगतो यथा

hatvā ca pauṇḍrakaṁ śauriḥ kāśirājaṁ ca sānugam punardvāravatīṁ prāpto reme svargagato yathā

और पौण्ड्रक तथा उसके अनुयायियों सहित काशिराज का वध कर शौरि पुनः द्वारवती लौट आए और वहाँ स्वर्ग-गमन के समान आनन्दित हुए।

श्लोक 28 (vishnu.5.34.28)

तच्छिरः पतितं दृष्ट्वा तत्र काशिपतेः पुरे । जनः किम् एतद् इत्य् आह केनेत्य् अत्यन्तविस्मितः

tacchiraḥ patitaṁ dṛṣṭvā tatra kāśipateḥ pure janaḥ kim etad ity āha kenety atyantavismitaḥ

काशिपति के नगर में गिरे हुए उस सिर को देखकर लोग अत्यंत आश्चर्यचकित होकर कहने लगे — 'यह क्या है? किसने किया?'

श्लोक 29 (vishnu.5.34.29)

ज्ञात्वा तं वासुदेवेन हतं तस्य सुतस्ततः । पुरोहितेन सहितस्तोषयाम् आस शंकरम्

jñātvā taṁ vāsudevena hataṁ tasya sutastataḥ purohitena sahitastoṣayām āsa śaṁkaram

उसे वासुदेव द्वारा मारा गया जानकर उसके पुत्र ने पुरोहित के साथ मिलकर शंकर को प्रसन्न किया।

श्लोक 30 (vishnu.5.34.30)

अविमुक्ते महाक्षेत्रे तोषितस्तेन शंकरः । वरं वृणीष्वेति तदा तं प्रोवाच नृपात्मजम्

avimukte mahākṣetre toṣitastena śaṁkaraḥ varaṁ vṛṇīṣveti tadā taṁ provāca nṛpātmajam

अविमुक्त महाक्षेत्र में उसके द्वारा प्रसन्न किए गए शंकर ने तब उस राजकुमार से कहा — 'वर माँगो।'

श्लोक 31 (vishnu.5.34.31)

स वव्रे भगवन् कृत्या पितृहन्तुर्वधाय मे । समुत्तिष्ठतु कृष्णस्य त्वत्प्रसादान् महेश्वर

sa vavre bhagavan kṛtyā pitṛhanturvadhāya me samuttiṣṭhatu kṛṣṇasya tvatprasādān maheśvara

उसने वर माँगा — 'हे भगवन्, हे महेश्वर! आपकी कृपा से मेरे पिता के हन्ता कृष्ण के वध के लिए एक कृत्या उत्पन्न हो।'

श्लोक 32 (vishnu.5.34.32)

पराशर उवाच । एवं भविष्यतीत्य् उक्ते दक्षिणाग्नेरनन्तरम् । महाकृत्या समुत्तस्थौ तस्यैवाग्निनिवेशनात्

parāśara uvāca evaṁ bhaviṣyatīty ukte dakṣiṇāgneranantaram mahākṛtyā samuttasthau tasyaivāgniniveśanāt

पराशर ने कहा — 'ऐसा ही होगा' यह कहे जाने पर दक्षिणाग्नि से तुरन्त, उसी अग्नि-निवास से एक महाकृत्या प्रकट हुई।

श्लोक 33 (vishnu.5.34.33)

ततो ज्वालाकरालास्या ज्वलत्केशकलापिका । कृष्ण कृष्णेति कुपिता कृत्या द्वारवतीं ययौ

tato jvālākarālāsyā jvalatkeśakalāpikā kṛṣṇa kṛṣṇeti kupitā kṛtyā dvāravatīṁ yayau

तब ज्वाला से भयंकर मुख वाली, प्रज्वलित केश-राशि वाली वह कृत्या क्रुद्ध होकर 'कृष्ण! कृष्ण!' पुकारती हुई द्वारवती की ओर चली।

श्लोक 34 (vishnu.5.34.34)

ताम् अवेक्ष्य जनस्त्रासविचलल्लोचनो मुने । ययौ शरण्यं जगतां शरणं मधुसूदनम्

tām avekṣya janastrāsavicalallocano mune yayau śaraṇyaṁ jagatāṁ śaraṇaṁ madhusūdanam

हे मुने! उसे देखकर भय से चंचल नेत्रों वाले लोग जगत के शरण्य मधुसूदन की शरण में गए।

श्लोक 35 (vishnu.5.34.35)

काशिराजसुतेनेयम् आराध्य वृषभध्वजम् । उत्पादिता महाकृत्येत्य् अवगम्याथ चक्रिणा

kāśirājasuteneyam ārādhya vṛṣabhadhvajam utpāditā mahākṛtyety avagamyātha cakriṇā

यह जानकर कि काशिराज-पुत्र ने वृषभध्वज (शिव) की आराधना कर इस महाकृत्या को उत्पन्न किया है, चक्रधारी ने कहा —

श्लोक 36 (vishnu.5.34.36)

जहि कृत्याम् इमाम् उग्रां वह्निज्वालाजटाकुलाम् । चक्रम् उत्सृष्टम् अक्षेषु क्रीडासक्तेन लीलया

jahi kṛtyām imām ugrāṁ vahnijvālājaṭākulām cakram utsṛṣṭam akṣeṣu krīḍāsaktena līlayā

'अग्नि-ज्वाला से आच्छादित इस भयंकर कृत्या का वध करो!' — यह कहकर उसने चक्र को इस प्रकार छोड़ा, मानो कोई द्यूत-क्रीड़ा में लीलापूर्वक पासा फेंक रहा हो।

श्लोक 37 (vishnu.5.34.37)

तदग्निमालाजटिलज्वालोद्गारातिभीषणाम् । कृत्याम् अनुजगामाशु विष्णुचक्रं सुदर्शनम्

tadagnimālājaṭilajvālodgārātibhīṣaṇām kṛtyām anujagāmāśu viṣṇucakraṁ sudarśanam

विष्णु का सुदर्शन चक्र अग्नि-मालाओं से गुंथी हुई भीषण ज्वालाओं वाली उस कृत्या का शीघ्रता से पीछा करने लगा।

श्लोक 38 (vishnu.5.34.38)

चक्रप्रतापविध्वस्ता कृत्या माहेश्वरी तदा । ननाश वेगिनी वेगात् तद् अप्य् अनुजगाम ताम्

cakrapratāpavidhvastā kṛtyā māheśvarī tadā nanāśa veginī vegāt tad apy anujagāma tām

तब चक्र के प्रताप से नष्ट होती हुई वह माहेश्वरी कृत्या, वेगवती होते हुए भी वेगपूर्वक भाग खड़ी हुई — किन्तु वह चक्र भी उसका पीछा करता रहा।

श्लोक 39 (vishnu.5.34.39)

कृत्या वाराणसीम् एव प्रविवेश त्वरान्विता । विष्णुचक्रप्रतिहतप्रभावा मुनिसत्तम

kṛtyā vārāṇasīm eva praviveśa tvarānvitā viṣṇucakrapratihataprabhāvā munisattama

हे मुनिसत्तम! विष्णु के चक्र से जिसका प्रभाव नष्ट हो चुका था, वह कृत्या शीघ्रतापूर्वक वाराणसी नगरी में ही प्रविष्ट हो गई।

श्लोक 40 (vishnu.5.34.40)

ततः काशिबलं भूरि प्रमथानां तथा बलम् । समस्तशस्त्रास्त्रयुतं चक्रस्याभिमुखं ययौ

tataḥ kāśibalaṁ bhūri pramathānāṁ tathā balam samastaśastrāstrayutaṁ cakrasyābhimukhaṁ yayau

तब काशी की विशाल सेना, तथा प्रमथगणों की सेना भी, समस्त शस्त्र-अस्त्रों से युक्त होकर चक्र के सम्मुख आ डटी।

श्लोक 41 (vishnu.5.34.41)

शस्त्रास्त्रमोक्षचतुरं दग्ध्वा तद् बलम् ओजसा । कृत्यागर्भाम् अशेषां तां तदा वाराणसीं पुरीम्

śastrāstramokṣacaturaṁ dagdhvā tad balam ojasā kṛtyāgarbhām aśeṣāṁ tāṁ tadā vārāṇasīṁ purīm

शस्त्र-अस्त्र चलाने में निपुण उस सेना को अपने ही तेज से भस्म कर, तब कृत्या को अपने भीतर समेटे हुए उस सम्पूर्ण वाराणसी नगरी को —

श्लोक 42 (vishnu.5.34.42)

सभूभृद्भृत्यपौरां तु साश्वमातङ्गमानवाम् । अशेषकोशकोष्ठां तां दुर्निरीक्ष्यां सुरैरपि

sabhūbhṛdbhṛtyapaurāṁ tu sāśvamātaṅgamānavām aśeṣakośakoṣṭhāṁ tāṁ durnirīkṣyāṁ surairapi

— अपने राजा, सेवकों तथा नागरिकों सहित, अश्वों, गजों और मनुष्यों सहित, समस्त कोश-भण्डारों सहित, जिसे देवगण भी कठिनाई से देख पाते थे —

श्लोक 43 (vishnu.5.34.43)

ज्वालापरिष्कृताशेषगृहप्राकारचत्वराम् । ददाह तद् धरेश्चक्रं सकलाम् एव तां पुरीम्

jvālāpariṣkṛtāśeṣagṛhaprākāracatvarām dadāha tad dhareścakraṁ sakalām eva tāṁ purīm

— जिसके समस्त गृह, प्राकार तथा चौक ज्वालाओं से घिर गए — हरि के उस चक्र ने उस सम्पूर्ण नगरी को जलाकर भस्म कर दिया।

श्लोक 44 (vishnu.5.34.44)

अक्षीणामर्षम् अत्यल्पसाध्यसाधनसस्पृहम् । तच्चक्रं प्रस्फुरद्दीप्ति विष्णोरभ्याययौ करम्

akṣīṇāmarṣam atyalpasādhyasādhanasaspṛham taccakraṁ prasphuraddīpti viṣṇorabhyāyayau karam

उस चक्र का क्रोध क्षीण नहीं हुआ था, यद्यपि उसे अत्यल्प कार्य ही सम्पन्न करना था; देदीप्यमान होते हुए वह पुनः विष्णु के हाथ में लौट आया।

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35