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पञ्चमांश · अध्याय 37

मुनि-शाप और यादव-संहार

अध्याय 36अध्याय-सूचीअध्याय 38

श्लोक 1 (vishnu.5.37.1)

पराशर उवाच । एवं दैत्यवधं कृष्णो बलदेवसहायवान् । चक्रे दुष्टक्षितीशानां तथैव जगतः कृते

parāśara uvāca evaṁ daityavadhaṁ kṛṣṇo baladevasahāyavān cakre duṣṭakṣitīśānāṁ tathaiva jagataḥ kṛte

पराशर ने कहा — इस प्रकार बलदेव को सहायक बनाकर कृष्ण ने दैत्यों तथा दुष्ट राजाओं का, जगत के हित के लिए, संहार किया।

श्लोक 2 (vishnu.5.37.2)

क्षितेश्च भारं भगवान् फाल्गुनेन समं विभुः । अवतारयाम् आस हरिः समस्ताक्षौहिणीवधात्

kṣiteśca bhāraṁ bhagavān phālgunena samaṁ vibhuḥ avatārayām āsa hariḥ samastākṣauhiṇīvadhāt

और सर्वव्यापी भगवान् हरि ने फाल्गुन (अर्जुन) के साथ मिलकर समस्त अक्षौहिणी सेनाओं के संहार द्वारा पृथ्वी का भार उतारा।

श्लोक 3 (vishnu.5.37.3)

कृत्वा भारावतरणं भुवो हत्वाखिलान् नृपान् । शापव्याजेन विप्राणाम् उपसंहृतवान् कुलम्

kṛtvā bhārāvataraṇaṁ bhuvo hatvākhilān nṛpān śāpavyājena viprāṇām upasaṁhṛtavān kulam

पृथ्वी के भार को उतारकर, समस्त राजाओं का वध कर, उसने विप्रों के शाप के बहाने अपने ही कुल का संहार करवाया।

श्लोक 4 (vishnu.5.37.4)

उत्सृज्य द्वारकां कृष्णस्त्यक्त्वा मानुष्यम् आत्मभूः । सांशो विष्णुमयं स्थानं प्रविवेश पुनर्निजम्

utsṛjya dvārakāṁ kṛṣṇastyaktvā mānuṣyam ātmabhūḥ sāṁśo viṣṇumayaṁ sthānaṁ praviveśa punarnijam

द्वारका को त्यागकर, मानव देह का परित्याग कर, वह स्वयंभू कृष्ण अपने अंश सहित पुनः अपने विष्णुमय धाम में प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 5 (vishnu.5.37.5)

मैत्रेय उवाच । स विप्रशापव्याजेन संजह्रे स्वकुलं कथम् । कथं च मानुषं देहम् उत्ससर्ज जनार्दनः

maitreya uvāca sa vipraśāpavyājena saṁjahre svakulaṁ katham kathaṁ ca mānuṣaṁ deham utsasarja janārdanaḥ

मैत्रेय ने कहा — उसने विप्र-शाप के बहाने अपने ही कुल का संहार कैसे किया? और जनार्दन ने मानव देह का त्याग कैसे किया?

श्लोक 6 (vishnu.5.37.6)

पराशर उवाच । विश्वामित्रस्तथा कण्वो नारदश्च महामुनिः । पिण्डारके महातीर्थे दृष्टा यदुकुमारकैः

parāśara uvāca viśvāmitrastathā kaṇvo nāradaśca mahāmuniḥ piṇḍārake mahātīrthe dṛṣṭā yadukumārakaiḥ

पराशर ने कहा — पिण्डारक महातीर्थ में विश्वामित्र, कण्व तथा महामुनि नारद को यदुवंश के राजकुमारों ने देखा।

श्लोक 7 (vishnu.5.37.7)

ततस्ते यौवनोन्मत्ता भाविकार्यप्रचोदिताः । साम्बं जाम्बवतीपुत्रं भूषयित्वा स्त्रियं यथा

tataste yauvanonmattā bhāvikāryapracoditāḥ sāmbaṁ jāmbavatīputraṁ bhūṣayitvā striyaṁ yathā

तब यौवन के मद से उन्मत्त, तथा होनहार से प्रेरित उन राजकुमारों ने जाम्बवती-पुत्र साम्ब को स्त्री का वेश धारण कराकर,

श्लोक 8 (vishnu.5.37.8)

प्रसृतास्तान् मुनीन् ऊचुः प्रणिपातपुरःसरम् । इयं स्त्री पुत्रकामस्य बभ्रोः किं जनयिष्यति

prasṛtāstān munīn ūcuḥ praṇipātapuraḥsaram iyaṁ strī putrakāmasya babhroḥ kiṁ janayiṣyati

— उन मुनियों के पास जाकर, प्रणाम करते हुए, उनसे कहा — 'बभ्रु की यह पुत्रकामी स्त्री क्या जन्म देगी?'

श्लोक 9 (vishnu.5.37.9)

पराशर उवाच । दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते विप्रलब्धाः कुमारकैः । मुनयः कुपिताः प्रोचुर्मुसलं जनयिष्यति । येनाखिलकुलोत्सादो यादवानां भविष्यति

parāśara uvāca divyajñānopapannāste vipralabdhāḥ kumārakaiḥ munayaḥ kupitāḥ procurmusalaṁ janayiṣyati yenākhilakulotsādo yādavānāṁ bhaviṣyati

पराशर ने कहा — दिव्यज्ञान से सम्पन्न वे मुनि, कुमारों द्वारा छले जाने पर क्रुद्ध होकर बोले — 'यह एक मूसल को जन्म देगी, जिससे यादवों के समस्त कुल का विनाश होगा।'

श्लोक 10 (vishnu.5.37.10)

इत्य् उक्तास्तैः कुमारास्ते आचचक्षुर्यथातथम् । उग्रसेनाय मुसलं जज्ञे साम्बस्य चोदरात्

ity uktāstaiḥ kumārāste ācacakṣuryathātatham ugrasenāya musalaṁ jajñe sāmbasya codarāt

यह सुनकर उन कुमारों ने उग्रसेन को यथावत सब बता दिया; और साम्ब के उदर से मूसल उत्पन्न हुआ।

श्लोक 11 (vishnu.5.37.11)

तद् उग्रसेनो मुसलम् अयश्चूर्णम् अकारयत् । जज्ञे स चैरकाश्चूर्णः प्रक्षिप्तस्तैर्महोदधौ

tad ugraseno musalam ayaścūrṇam akārayat jajñe sa cairakāścūrṇaḥ prakṣiptastairmahodadhau

उग्रसेन ने उस लौह-मूसल को चूर्ण करवा दिया; वह चूर्ण एरका (सरकंडे) के रूप में उत्पन्न हुआ, और उन्होंने उसे महासागर में फेंक दिया।

श्लोक 12 (vishnu.5.37.12)

मुसलस्याथ लोहस्य चूर्णितस्यान्धकैर्द्विज । खण्डं चूर्णयितुं शेकुर्नैकं ते तोमराकृति

musalasyātha lohasya cūrṇitasyāndhakairdvija khaṇḍaṁ cūrṇayituṁ śekurnaikaṁ te tomarākṛti

हे द्विज! उस लौह-मूसल को अन्धकवंशियों ने चूर्ण किया, परन्तु भाले के आकार का एक टुकड़ा वे चूर्ण नहीं कर सके।

श्लोक 13 (vishnu.5.37.13)

तद् अप्य् अम्बुनिधौ क्षिप्तं मत्स्यो जग्राह जालिभिः । घातितस्योदरात् तस्य लुब्धो जग्राह तं जराः

tad apy ambunidhau kṣiptaṁ matsyo jagrāha jālibhiḥ ghātitasyodarāt tasya lubdho jagrāha taṁ jarāḥ

उसे भी समुद्र में फेंक दिया गया; एक मत्स्य ने उसे निगल लिया, जिसे जालियों ने पकड़ा; उस मारे गए मत्स्य के उदर से जरा नामक व्याध ने उसे ले लिया।

श्लोक 14 (vishnu.5.37.14)

विज्ञातपरमार्थोऽपि भगवान् मधुसूदनः । नैच्छत् तद् अन्यथाकर्तुं विधिना यत् समाहितम्

vijñātaparamārtho'pi bhagavān madhusūdanaḥ naicchat tad anyathākartuṁ vidhinā yat samāhitam

परमार्थ को जानते हुए भी भगवान् मधुसूदन ने विधि द्वारा जो निर्धारित था, उसे बदलना नहीं चाहा।

श्लोक 15 (vishnu.5.37.15)

देवैश्च प्रहितो दूतः प्रणिपत्याह केशवम् । रहस्य् एवम् अहं दूतः प्रहितो भगवन् सुरैः

devaiśca prahito dūtaḥ praṇipatyāha keśavam rahasy evam ahaṁ dūtaḥ prahito bhagavan suraiḥ

और देवताओं द्वारा भेजा गया एक दूत केशव को प्रणाम कर बोला — 'हे भगवन्! मैं देवताओं द्वारा गुप्त रूप से इस प्रकार भेजा गया दूत हूँ।'

श्लोक 16 (vishnu.5.37.16)

वस्वश्विमरुदादित्यरुद्रसाध्यादिभिः सह । विज्ञापयति वः शक्रस्तद् इदं श्रूयतां प्रभो

vasvaśvimarudādityarudrasādhyādibhiḥ saha vijñāpayati vaḥ śakrastad idaṁ śrūyatāṁ prabho

'वसु, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, आदित्य, रुद्र, साध्य आदि के साथ शक्र आपको यह सूचित करते हैं — हे प्रभो! इसे सुनें।'

श्लोक 17 (vishnu.5.37.17)

भारावतारणार्थाय वर्षाणाम् अधिकं शतम् । भगवान् अवतीर्णोऽत्र त्रिदशैः संप्रसादितः

bhārāvatāraṇārthāya varṣāṇām adhikaṁ śatam bhagavān avatīrṇo'tra tridaśaiḥ saṁprasāditaḥ

'एक सौ वर्षों से अधिक समय से भगवान् त्रिदशगणों की प्रार्थना पर, भार उतारने के लिए यहाँ अवतरित हैं।'

श्लोक 18 (vishnu.5.37.18)

दुर्वृत्ता निहता दैत्या भुवो भारोऽवतारितः । त्वया सनाथास्त्रिदशा भवन्तु त्रिदिवे सदा

durvṛttā nihatā daityā bhuvo bhāro'vatāritaḥ tvayā sanāthāstridaśā bhavantu tridive sadā

'दुराचारी दैत्य मारे जा चुके हैं, पृथ्वी का भार उतर चुका है; आपसे सनाथ हुए त्रिदशगण त्रिदिव में सदा सुरक्षित रहें।'

श्लोक 19 (vishnu.5.37.19)

तद् अतीतं जगन्नाथ वर्षाणाम् अधिकं शतम् । इदानीं गम्यतां स्वर्गो भवता यदि रोचते

tad atītaṁ jagannātha varṣāṇām adhikaṁ śatam idānīṁ gamyatāṁ svargo bhavatā yadi rocate

'हे जगन्नाथ! अब एक सौ वर्षों से अधिक समय बीत चुका है; यदि आपको रुचे तो अब स्वर्गारोहण करें।'

श्लोक 20 (vishnu.5.37.20)

देवैर्विज्ञाप्यते चेदं अथात्रैव रतिस्तव । तत् स्थीयतां यथाकालम् आख्येयम् अनुजीविभिः

devairvijñāpyate cedaṁ athātraiva ratistava tat sthīyatāṁ yathākālam ākhyeyam anujīvibhiḥ

'देवताओं द्वारा यह भी सूचित किया जाता है — किन्तु यदि आपकी प्रीति यहीं रहने में हो, तो जितने काल तक चाहें रहें; यह भी अपने आश्रितों को बता दिया जाए।'

श्लोक 21 (vishnu.5.37.21)

भगवान् उवाच । यत् त्वम् आत्थाखिलं दूत वेद्म्य् एतद् अहम् अप्य् उत । प्रारब्ध एव हि मया यादवानाम् अपि क्षयः

bhagavān uvāca yat tvam ātthākhilaṁ dūta vedmy etad aham apy uta prārabdha eva hi mayā yādavānām api kṣayaḥ

भगवान् ने कहा — 'हे दूत! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब मैं भी जानता हूँ; मैंने स्वयं ही यादवों के विनाश का भी आरम्भ कर दिया है।'

श्लोक 22 (vishnu.5.37.22)

भुवो नाद्यापि भारोऽयं यादवैरनिबर्हितैः । अवतार्य करोम्य् एतत् सप्तरात्रेण सत्वरः

bhuvo nādyāpi bhāro'yaṁ yādavairanibarhitaiḥ avatārya karomy etat saptarātreṇa satvaraḥ

'यादवों के अभी तक नष्ट न होने से पृथ्वी का यह भार अभी उतरा नहीं है; मैं शीघ्रतापूर्वक सात रात्रियों में इसे सम्पन्न करूँगा।'

श्लोक 23 (vishnu.5.37.23)

यथा गृहीतम् अम्भोधेर्दत्त्वाहं द्वारकाभुवम् । यादवान् उपसंहृत्य यास्यामि त्रिदशालयम्

yathā gṛhītam ambhodherdattvāhaṁ dvārakābhuvam yādavān upasaṁhṛtya yāsyāmi tridaśālayam

'समुद्र से ली गई द्वारका-भूमि को उसे लौटाकर, तथा यादवों का संहार कर, मैं त्रिदशालय (स्वर्ग) को जाऊँगा।'

श्लोक 24 (vishnu.5.37.24)

मनुष्यदेहम् उत्सृज्य संकर्षणसहायवान् । प्राप्त एवास्मि मन्तव्यो देवेन्द्रेण तथा सुरैः

manuṣyadeham utsṛjya saṁkarṣaṇasahāyavān prāpta evāsmi mantavyo devendreṇa tathā suraiḥ

'संकर्षण (बलराम) को साथ लेकर मानव देह का त्याग कर, यह मान लिया जाए कि मैं देवराज तथा देवताओं के पास पहुँच ही गया हूँ।'

श्लोक 25 (vishnu.5.37.25)

जरासंधादयो येऽन्ये निहता भारहेतवः । क्षितेस्तेभ्यः कुमारोऽपि यदूनां नापचीयते

jarāsaṁdhādayo ye'nye nihatā bhārahetavaḥ kṣitestebhyaḥ kumāro'pi yadūnāṁ nāpacīyate

'जरासंध आदि जो अन्य भार के कारण थे, वे मारे जा चुके हैं; परन्तु यदुवंश के एक भी राजकुमार से भार कम नहीं होता।'

श्लोक 26 (vishnu.5.37.26)

तद् एनं सुमहाभारम् अवतार्य क्षितेरहम् । यास्याम्य् अमरलोकस्य पालनाय ब्रवीहि तान्

tad enaṁ sumahābhāram avatārya kṣiteraham yāsyāmy amaralokasya pālanāya bravīhi tān

'अतः पृथ्वी के इस अत्यंत भारी भार को उतारकर मैं अमरलोक की रक्षा हेतु वहाँ जाऊँगा; उन्हें यह कह दो।'

श्लोक 27 (vishnu.5.37.27)

पराशर उवाच । इत्य् उक्तो वासुदेवेन देवदूतः प्रणम्य तम् । मैत्रेय दिव्यया गत्या देवराजान्तिकं ययौ

parāśara uvāca ity ukto vāsudevena devadūtaḥ praṇamya tam maitreya divyayā gatyā devarājāntikaṁ yayau

पराशर ने कहा — हे मैत्रेय! वासुदेव द्वारा ऐसा कहे जाने पर देवदूत ने उन्हें प्रणाम कर दिव्य गति से देवराज के समीप प्रस्थान किया।

श्लोक 28 (vishnu.5.37.28)

भगवान् अप्य् अथोत्पातान् दिव्यभौमान्तरिक्षगान् । ददर्श द्वारकापुर्यां विनाशाय दिवानिशम्

bhagavān apy athotpātān divyabhaumāntarikṣagān dadarśa dvārakāpuryāṁ vināśāya divāniśam

तब भगवान् ने भी द्वारकापुरी में विनाश के सूचक आकाशीय, भौम तथा अन्तरिक्षीय उत्पातों को दिन-रात देखा।

श्लोक 29 (vishnu.5.37.29)

तान् दृष्ट्वा यादवान् आह पश्यध्वम् अतिदारुणान् । महोत्पाताञ् छमायैषां प्रभासं याम मा चिरम्

tān dṛṣṭvā yādavān āha paśyadhvam atidāruṇān mahotpātāñ chamāyaiṣāṁ prabhāsaṁ yāma mā ciram

उन्हें देखकर उन्होंने यादवों से कहा — 'इन अत्यंत भयंकर महान् उत्पातों को देखो; इनकी शान्ति के लिए बिना विलम्ब किए प्रभास चलें।'

श्लोक 30 (vishnu.5.37.30)

पराशर उवाच । महाभागवतः प्राह प्रणिपत्योद्धवो हरिम् । भगवन् यन् मया कार्यं तद् आज्ञापय साम्प्रतम् । मन्ये कुलम् इदं सर्वं भगवान् संहरिष्यति

parāśara uvāca mahābhāgavataḥ prāha praṇipatyoddhavo harim bhagavan yan mayā kāryaṁ tad ājñāpaya sāmpratam manye kulam idaṁ sarvaṁ bhagavān saṁhariṣyati

पराशर ने कहा — महाभागवत उद्धव ने प्रणाम कर हरि से कहा — 'हे भगवन्! मुझे जो करना है, वह अभी आज्ञा दें; मुझे लगता है कि भगवान् इस समस्त कुल का संहार करने वाले हैं।'

श्लोक 31 (vishnu.5.37.31)

नाशायास्य निमित्तानि कुलस्याच्युत लक्षये

nāśāyāsya nimittāni kulasyācyuta lakṣaye

'हे अच्युत! मुझे इस कुल के विनाश के लक्षण दिखाई दे रहे हैं।'

श्लोक 32 (vishnu.5.37.32)

भगवान् उवाच । गच्छ त्वं दिव्यया गत्या मत्प्रसादसमुत्थया । बदरीकाश्रमं पुण्यं गन्धमादनपर्वते । नरनारायणस्थाने तत्पावितमहीतले

bhagavān uvāca gaccha tvaṁ divyayā gatyā matprasādasamutthayā badarīkāśramaṁ puṇyaṁ gandhamādanaparvate naranārāyaṇasthāne tatpāvitamahītale

भगवान् ने कहा — 'तुम मेरी कृपा से उत्पन्न दिव्य गति से गन्धमादन पर्वत पर पुण्य बदरिकाश्रम में, नर-नारायण के उस पवित्र स्थान को जाओ।'

श्लोक 33 (vishnu.5.37.33)

मन्मना मत्प्रसादेन तत्र सिद्धिम् अवाप्स्यसि । अहं स्वर्गं गमिष्यामि उपसंहृत्य वै कुलम्

manmanā matprasādena tatra siddhim avāpsyasi ahaṁ svargaṁ gamiṣyāmi upasaṁhṛtya vai kulam

'वहाँ मुझमें मन लगाए हुए, मेरी कृपा से तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी; मैं कुल का संहार कर स्वर्ग को जाऊँगा।'

श्लोक 34 (vishnu.5.37.34)

द्वारकां च मया त्यक्तां समुद्रः प्लावयिष्यति

dvārakāṁ ca mayā tyaktāṁ samudraḥ plāvayiṣyati

'और मेरे द्वारा त्यागी गई द्वारका को समुद्र जलमग्न कर देगा।'

श्लोक 35 (vishnu.5.37.35)

पराशर उवाच । इत्य् उक्तः प्रणिपत्यैनं जगाम स तदोद्धवः । नरनारायणस्थानं केशवेनानुमोदितः

parāśara uvāca ity uktaḥ praṇipatyainaṁ jagāma sa tadoddhavaḥ naranārāyaṇasthānaṁ keśavenānumoditaḥ

पराशर ने कहा — यह सुनकर उद्धव ने उन्हें प्रणाम कर, केशव से अनुमति पाकर, नर-नारायण के उस स्थान की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 36 (vishnu.5.37.36)

ततस्ते यादवाः सर्वे रथान् आरुह्य शीघ्रगान् । प्रभासं प्रययुः सार्धं कृष्णरामादिभिर्द्विज

tataste yādavāḥ sarve rathān āruhya śīghragān prabhāsaṁ prayayuḥ sārdhaṁ kṛṣṇarāmādibhirdvija

हे द्विज! तब समस्त यादव शीघ्रगामी रथों पर चढ़कर कृष्ण, राम आदि के साथ प्रभास की ओर चल पड़े।

श्लोक 37 (vishnu.5.37.37)

प्राप्य प्रभासं प्रयताः स्नातास्ते कुकुरान्धकाः । चक्रुस्तत्र मुदा पानं वासुदेवानुमोदिताः

prāpya prabhāsaṁ prayatāḥ snātāste kukurāndhakāḥ cakrustatra mudā pānaṁ vāsudevānumoditāḥ

प्रभास पहुँचकर स्नान कर पवित्र हुए वे कुकुर तथा अन्धकवंशी वासुदेव की अनुमति से हर्षपूर्वक मदिरापान करने लगे।

श्लोक 38 (vishnu.5.37.38)

पिबतां तत्र वै तेषां संघर्षेण परस्परम् । अतिवादेन्धनो जज्ञे कलहाग्निः क्षयावहः

pibatāṁ tatra vai teṣāṁ saṁgharṣeṇa parasparam ativādendhano jajñe kalahāgniḥ kṣayāvahaḥ

वहाँ मदिरापान करते हुए उनके परस्पर के घर्षण से, कटु वचनों के ईंधन से, विनाशकारी कलह की अग्नि प्रज्वलित हो उठी।

श्लोक 39 (vishnu.5.37.39)

जघ्नुः परस्परं ते तु शस्त्रैर्दैवबलात्कृताः । क्षीणशस्त्राश्च जगृहुः प्रत्यासन्नाम् अथैरकाम्

jaghnuḥ parasparaṁ te tu śastrairdaivabalātkṛtāḥ kṣīṇaśastrāśca jagṛhuḥ pratyāsannām athairakām

देव-बल से विवश होकर वे परस्पर शस्त्रों से प्रहार करने लगे; और शस्त्र समाप्त हो जाने पर उन्होंने निकट की एरका घास पकड़ ली।

श्लोक 40 (vishnu.5.37.40)

एरका तु गृहीता तैर्वज्रभूतेव लक्ष्यते । तया परस्परं जघ्नुः संप्रहारे सुदारुणे

erakā tu gṛhītā tairvajrabhūteva lakṣyate tayā parasparaṁ jaghnuḥ saṁprahāre sudāruṇe

उनके हाथ में लिया गया वह एरका घास मानो वज्र के समान बन गया; उससे उन्होंने अत्यंत भीषण संहार में एक-दूसरे पर प्रहार किया।

श्लोक 41 (vishnu.5.37.41)

प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाः कृतवर्माथ सात्यकिः । अनिरुद्धादयश्चान्ये पृथुर्विपृथुरेव च

pradyumnasāmbapramukhāḥ kṛtavarmātha sātyakiḥ aniruddhādayaścānye pṛthurvipṛthureva ca

प्रद्युम्न, साम्ब आदि, कृतवर्मा, सात्यकि, अनिरुद्ध आदि अन्य, पृथु तथा विपृथु,

श्लोक 42 (vishnu.5.37.42)

चारुवर्मा चारुकश्च तथाक्रूरादयो द्विज । एरकारूपिभिर्वज्रैस्ते निजघ्नुः परस्परम्

cāruvarmā cārukaśca tathākrūrādayo dvija erakārūpibhirvajraiste nijaghnuḥ parasparam

चारुवर्मा और चारुक, तथा हे द्विज! अक्रूर आदि — इन सबने एरका-रूपी वज्रों से एक-दूसरे का वध कर डाला।

श्लोक 43 (vishnu.5.37.43)

निवारयाम् आस हरिर्यादवांस्ते च केशवम् । सहायं मेनिरे प्राप्तं ते निजघ्नुः परस्परम्

nivārayām āsa hariryādavāṁste ca keśavam sahāyaṁ menire prāptaṁ te nijaghnuḥ parasparam

हरि ने यादवों को रोकने का प्रयत्न किया, परन्तु वे केशव को भी सहायक के रूप में प्राप्त मानकर परस्पर प्रहार करते रहे।

श्लोक 44 (vishnu.5.37.44)

कृष्णोऽपि कुपितस्तेषाम् एरकामुष्टिम् आददे । वधाय सोऽपि मुसलं मुष्टिर्लोहम् अभूत् तदा

kṛṣṇo'pi kupitasteṣām erakāmuṣṭim ādade vadhāya so'pi musalaṁ muṣṭirloham abhūt tadā

क्रुद्ध होकर कृष्ण ने भी उनके वध के लिए एरका की एक मुट्ठी उठाई; और वह मुट्ठी भी लोहे की, एक मूसल की, बन गई।

श्लोक 45 (vishnu.5.37.45)

जघान तेन निःशेषान् यादवान् आततायिनः । जघ्नुश्च सहसाभ्येत्य तथान्ये वै परस्परम्

jaghāna tena niḥśeṣān yādavān ātatāyinaḥ jaghnuśca sahasābhyetya tathānye vai parasparam

उससे उसने आततायी हो चुके समस्त यादवों का वध कर डाला; और शेष अन्य भी सहसा एक-दूसरे पर टूट पड़े।

श्लोक 46 (vishnu.5.37.46)

ततश्चार्णवमध्येन जैत्रोऽसौ चक्रिणो रथः । पश्यतो दारुकस्याशु हृतोऽश्वैर्द्विजसत्तम

tataścārṇavamadhyena jaitro'sau cakriṇo rathaḥ paśyato dārukasyāśu hṛto'śvairdvijasattama

हे द्विजसत्तम! तब चक्रधारी का वह सर्वदा विजयी रथ दारुक के देखते-देखते उसके अश्वों द्वारा शीघ्र ही समुद्र के मध्य ले जाया गया।

श्लोक 47 (vishnu.5.37.47)

चक्रं तथा गदा शार्ङ्गतूणी शङ्खोऽसिरेव च । प्रदक्षिणं हरिं कृत्वा जग्मुरादित्यवर्त्मना

cakraṁ tathā gadā śārṅgatūṇī śaṅkho'sireva ca pradakṣiṇaṁ hariṁ kṛtvā jagmurādityavartmanā

चक्र, तथा गदा, शार्ङ्ग-धनुष तूणीरों सहित, शंख तथा खड्ग — इन सबने हरि की प्रदक्षिणा कर सूर्य के मार्ग से प्रस्थान किया।

श्लोक 48 (vishnu.5.37.48)

क्षणेन नाभवत् कश्चिद् यादवानाम् अघातितः । ऋते कृष्णं महाबाहुं दारुकं च महामुने

kṣaṇena nābhavat kaścid yādavānām aghātitaḥ ṛte kṛṣṇaṁ mahābāhuṁ dārukaṁ ca mahāmune

हे महामुने! एक ही क्षण में यादवों में से कोई भी अवध्य न रहा, केवल महाबाहु कृष्ण तथा दारुक को छोड़कर।

श्लोक 49 (vishnu.5.37.49)

चङ्क्रम्यमाणौ तौ रामं वृक्षमूले कृतासनम् । ददृशाते मुखाच्चास्य निष्क्रामन्तं महोरगम्

caṅkramyamāṇau tau rāmaṁ vṛkṣamūle kṛtāsanam dadṛśāte mukhāccāsya niṣkrāmantaṁ mahoragam

वे दोनों घूमते हुए राम को एक वृक्ष के नीचे आसन लगाए बैठे देख पाए, तथा उनके मुख से एक महान् नाग को निकलते हुए भी देखा।

श्लोक 50 (vishnu.5.37.50)

निष्क्रम्य स मुखात् तस्य महाभोगो भुजंगमः । प्रययाव् अर्णवं सिद्धैः पूज्यमानस्तथोरगैः

niṣkramya sa mukhāt tasya mahābhogo bhujaṁgamaḥ prayayāv arṇavaṁ siddhaiḥ pūjyamānastathoragaiḥ

उसके मुख से निकला वह विशाल-फणधारी सर्प, सिद्धों तथा अन्य नागों द्वारा पूजित होता हुआ, समुद्र की ओर चला गया।

श्लोक 51 (vishnu.5.37.51)

ततोऽर्घम् आदाय तदा जलधिः संमुखं ययौ । प्रविवेश च तत्तोयं पूजितः पन्नगोत्तमैः

tato'rgham ādāya tadā jaladhiḥ saṁmukhaṁ yayau praviveśa ca tattoyaṁ pūjitaḥ pannagottamaiḥ

तब समुद्र अर्घ्य लेकर उसके सम्मुख आया; और सर्पश्रेष्ठों द्वारा पूजित होकर वह उस जल में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 52 (vishnu.5.37.52)

दृष्ट्वा बलस्य निर्याणं दारुकं प्राह केशवः । इदं सर्वं त्वम् आचक्ष्व वसुदेवोग्रसेनयोः

dṛṣṭvā balasya niryāṇaṁ dārukaṁ prāha keśavaḥ idaṁ sarvaṁ tvam ācakṣva vasudevograsenayoḥ

बल के इस प्रकार प्रस्थान को देखकर केशव ने दारुक से कहा — 'यह सब वसुदेव तथा उग्रसेन को कह सुनाओ —'

श्लोक 53 (vishnu.5.37.53)

निर्याणं बलभद्रस्य यादवानां तथा क्षयम् । योगे स्थित्वाहम् अप्य् एतत् परित्यक्ष्ये कलेवरम्

niryāṇaṁ balabhadrasya yādavānāṁ tathā kṣayam yoge sthitvāham apy etat parityakṣye kalevaram

'— बलभद्र का प्रस्थान, तथा यादवों का विनाश; मैं भी योग में स्थित होकर इस शरीर का त्याग करूँगा।'

श्लोक 54 (vishnu.5.37.54)

वाच्यश्च द्वारकावासी जनः सर्वस्तथाहुकः । यथेमां नगरीं सर्वां समुद्रः प्लावयिष्यति

vācyaśca dvārakāvāsī janaḥ sarvastathāhukaḥ yathemāṁ nagarīṁ sarvāṁ samudraḥ plāvayiṣyati

'और द्वारकावासी समस्त जनों को, तथा आहुक को भी, यह बता दिया जाए कि समुद्र इस सम्पूर्ण नगरी को जलमग्न कर देगा।'

श्लोक 55 (vishnu.5.37.55)

तस्माद् भवद्भिः सज्जैस्तु प्रतीक्ष्यो ह्य् अर्जुनागमः । न स्थेयं द्वारकामध्ये निष्क्रान्ते तत्र पाण्डवे

tasmād bhavadbhiḥ sajjaistu pratīkṣyo hy arjunāgamaḥ na stheyaṁ dvārakāmadhye niṣkrānte tatra pāṇḍave

'अतः तुम सब सन्नद्ध होकर अर्जुन के आगमन की प्रतीक्षा करो; उस पाण्डव के वहाँ से निकल जाने पर द्वारका के भीतर कोई न रहे।'

श्लोक 56 (vishnu.5.37.56)

तेनैव सह गन्तव्यं यत्र याति स कौरवः

tenaiva saha gantavyaṁ yatra yāti sa kauravaḥ

'वह कौरव (अर्जुन) जहाँ भी जाए, उसी के साथ जाना चाहिए।'

श्लोक 57 (vishnu.5.37.57)

गत्वा च ब्रूहि कौन्तेयम् अर्जुनं वचनान् मम । पालनीयस्त्वया शक्त्या जनोऽयं मत्परिग्रहः

gatvā ca brūhi kaunteyam arjunaṁ vacanān mama pālanīyastvayā śaktyā jano'yaṁ matparigrahaḥ

'और जाकर कुन्तीपुत्र अर्जुन से मेरा यह वचन कहो — मेरी यह प्रजा, जो मेरे आश्रित हैं, तुम्हें अपनी शक्ति भर उनकी रक्षा करनी चाहिए।'

श्लोक 58 (vishnu.5.37.58)

इत्य् अर्जुनेन सहितो द्वारवत्या भवाञ् जनम् । गृहीत्वा यातु वज्रश्च यदुराजो भविष्यति

ity arjunena sahito dvāravatyā bhavāñ janam gṛhītvā yātu vajraśca yadurājo bhaviṣyati

'इस प्रकार अर्जुन के साथ द्वारवती से प्रजा को लेकर वह जाए; और वज्र यदुराज होगा।'

श्लोक 59 (vishnu.5.37.59)

पराशर उवाच । इत्य् उक्तो दारुकः कृष्णं प्रणिपत्य पुनः पुनः । प्रदक्षिणं च बहुशः कृत्वा प्रायाद् यथोदितम्

parāśara uvāca ity ukto dārukaḥ kṛṣṇaṁ praṇipatya punaḥ punaḥ pradakṣiṇaṁ ca bahuśaḥ kṛtvā prāyād yathoditam

पराशर ने कहा — यह सुनकर दारुक ने कृष्ण को बार-बार प्रणाम कर तथा अनेक बार प्रदक्षिणा कर, यथा-आदेश प्रस्थान किया।

श्लोक 60 (vishnu.5.37.60)

स गत्वा च तथा चक्रे द्वारकायां तथार्जुनम् । आनिनाय महाबुद्धिर्वज्रं चक्रे तथा नृपम्

sa gatvā ca tathā cakre dvārakāyāṁ tathārjunam ānināya mahābuddhirvajraṁ cakre tathā nṛpam

वहाँ जाकर उसने द्वारका में वैसा ही किया, तथा उस महाबुद्धिमान् ने अर्जुन को वहाँ लाया, और वज्र को राजा बनाया।

श्लोक 61 (vishnu.5.37.61)

भगवान् अपि गोविन्दो वासुदेवात्मकं परम् । ब्रह्मात्मनि समारोप्य सर्वभूतेष्व् अधारयत्

bhagavān api govindo vāsudevātmakaṁ param brahmātmani samāropya sarvabhūteṣv adhārayat

भगवान् गोविन्द ने भी अपने वासुदेवात्मक परब्रह्म-स्वरूप को अपने भीतर स्थापित कर समस्त प्राणियों में धारण किया।

श्लोक 62 (vishnu.5.37.62)

संमानयन् द्विजवचो दुर्वासा यद् उवाच ह । योगयुक्तोऽभवत् पादं कृत्वा जानुनि सत्तम

saṁmānayan dvijavaco durvāsā yad uvāca ha yogayukto'bhavat pādaṁ kṛtvā jānuni sattama

हे सत्तम! ब्राह्मण दुर्वासा ने जो वचन कहा था, उसका सम्मान करते हुए उन्होंने अपना पैर घुटने पर रखकर योग में स्थिति प्राप्त की।

श्लोक 63 (vishnu.5.37.63)

आययौ च जरा नाम स तदा तत्र लुब्धकः । मुसलावशेषलोहैकसायकन्यस्ततोमरः

āyayau ca jarā nāma sa tadā tatra lubdhakaḥ musalāvaśeṣalohaikasāyakanyastatomaraḥ

और तब वहाँ जरा नामक व्याध आ पहुँचा, जिसने मूसल के शेष लौह-खण्ड से बने एकमात्र बाण को अपने तीर में लगा रखा था।

श्लोक 64 (vishnu.5.37.64)

स तत्पादं मृगाकारम् अवेक्ष्याराद् अवस्थितः । तले विव्याध तेनैव तोमरेण द्विजोत्तम

sa tatpādaṁ mṛgākāram avekṣyārād avasthitaḥ tale vivyādha tenaiva tomareṇa dvijottama

हे द्विजोत्तम! दूर से उनके पैर को मृग के आकार का समझकर, खड़े रहकर, उसने उसी तीर से उनके तलवे को बींध दिया।

श्लोक 65 (vishnu.5.37.65)

गतश्च ददृशे तत्र चतुर्बाहुधरं नरम् । प्रणिपत्याह चैवैनं प्रसीदेति पुनः पुनः

gataśca dadṛśe tatra caturbāhudharaṁ naram praṇipatyāha caivainaṁ prasīdeti punaḥ punaḥ

पास जाकर उसने वहाँ एक चतुर्भुज पुरुष को देखा; उनके चरणों में गिरकर उसने बार-बार कहा — 'प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए।'

श्लोक 66 (vishnu.5.37.66)

अजानता कृतम् इदं मया हरिणशङ्कया । क्षम्यतां नात्मपापेन दग्धं मां दग्धुम् अर्हसि

ajānatā kṛtam idaṁ mayā hariṇaśaṅkayā kṣamyatāṁ nātmapāpena dagdhaṁ māṁ dagdhum arhasi

'मैंने अनजाने में, मृग की शंका से यह किया है; इसे क्षमा किया जाए। मैं अपने ही पाप से दग्ध हूँ, आप मुझे और मत जलाइए।'

श्लोक 67 (vishnu.5.37.67)

पराशर उवाच । ततस्तं भगवान् आह न तेऽस्ति भयम् अण्व् अपि । गच्छ त्वं मत्प्रसादेन लुब्ध स्वर्गं सुरास्पदम्

parāśara uvāca tatastaṁ bhagavān āha na te'sti bhayam aṇv api gaccha tvaṁ matprasādena lubdha svargaṁ surāspadam

पराशर ने कहा — तब भगवान् ने उससे कहा — 'तुम्हें रत्ती भर भी भय नहीं है; हे व्याध! मेरी कृपा से देवताओं के धाम स्वर्ग को जाओ।'

श्लोक 68 (vishnu.5.37.68)

पराशर उवाच । विमानम् आगतं सद्यस्तद्वाक्यसमनन्तरम् । आरुह्य प्रययौ स्वर्गं लुब्धकस्तत्प्रसादतः

parāśara uvāca vimānam āgataṁ sadyastadvākyasamanantaram āruhya prayayau svargaṁ lubdhakastatprasādataḥ

पराशर ने कहा — उन वचनों के तुरन्त पश्चात् एक विमान आ पहुँचा; उस पर चढ़कर व्याध उनकी कृपा से स्वर्ग को चला गया।

श्लोक 69 (vishnu.5.37.69)

गते तस्मिन् स भगवान् संयोज्यात्मानम् आत्मनि । ब्रह्मभूतेऽव्ययेऽचिन्त्ये वासुदेवमयेऽमले

gate tasmin sa bhagavān saṁyojyātmānam ātmani brahmabhūte'vyaye'cintye vāsudevamaye'male

उसके चले जाने पर भगवान् ने अपने आत्मा को अपने ही में, उस ब्रह्मभूत, अविनाशी, अचिन्त्य, वासुदेवमय, निर्मल स्वरूप में लीन कर,

श्लोक 70 (vishnu.5.37.70)

अजन्मन्य् अजरेऽनाशिन्य् अप्रमेयेऽखिलात्मनि । तत्याज मानुषं देहम् अतीत्य त्रिविधां गतिम्

ajanmany ajare'nāśiny aprameye'khilātmani tatyāja mānuṣaṁ deham atītya trividhāṁ gatim

— जो अजन्मा, अजर, अविनाशी, अप्रमेय तथा सर्वात्मा है — उस मानव देह का त्याग किया, और त्रिविध गति (जन्म-मरण के मार्ग) को लाँघ गए।

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