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पञ्चमांश · अध्याय 7

कालीय-दमन

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (vishnu.5.7.1)

श्रीपराशर उवाच । एकदा तु विना रामं कृष्णो वृंदावनं ययौ विचचार वृतो गोपैर्वन्यपुष्पस्रगुज्ज्वलः

śrīparāśara uvāca ekadā tu vinā rāmaṁ kṛṣṇo vṛṁdāvanaṁ yayau vicacāra vṛto gopairvanyapuṣpasragujjvalaḥ

पराशर जी ने कहा — एक बार बलराम के बिना ही कृष्ण वृन्दावन गए और वन्य पुष्पों की माला से सुशोभित होकर गोपों से घिरे हुए विचरण करने लगे।

श्लोक 2 (vishnu.5.7.2)

स जगामाथ कालिंदीं लोलकल्लोलशालिनीम् तीरसंलग्नफेनौघैर्हसंतीमिव सर्वतः

sa jagāmātha kāliṁdīṁ lolakallolaśālinīm tīrasaṁlagnaphenaughairhasaṁtīmiva sarvataḥ

तब वे यमुना के पास गए, जो चंचल तरंगों से युक्त थी और तटों पर लगे फेन-समूहों से मानो सर्वत्र हँस रही हो।

श्लोक 3 (vishnu.5.7.3)

तस्याश्चातिमहाभीमं विषाग्निश्रितवारिणम् ह्रदं कालीयनागस्य ददर्शातिविभीषणम्

tasyāścātimahābhīmaṁ viṣāgniśritavāriṇam hradaṁ kālīyanāgasya dadarśātivibhīṣaṇam

और वहाँ उन्होंने कालीय नाग के उस अत्यंत भयंकर, विष की अग्नि से व्याप्त जलवाले भीषण ह्रद को देखा।

श्लोक 4 (vishnu.5.7.4)

विषाग्निना प्रसरता दग्धतीरमहीरुहम् वाताहतांबुविक्षेपस्पर्शदग्धविहंगमम्

viṣāgninā prasaratā dagdhatīramahīruham vātāhatāṁbuvikṣepasparśadagdhavihaṁgamam

जिसकी फैलती हुई विष-अग्नि से तट के वृक्ष जल चुके थे, और वायु से उछलकर छिटकी हुई जल-बूँदों के स्पर्शमात्र से पक्षी भी जल जाते थे।

श्लोक 5 (vishnu.5.7.5)

तमतीव महारौद्रं मृत्युवक्त्रमिवापरम् विलोक्य चिंतयामास भगवान्मधुसूदनः

tamatīva mahāraudraṁ mṛtyuvaktramivāparam vilokya ciṁtayāmāsa bhagavānmadhusūdanaḥ

उस अत्यंत भयंकर, मानो मृत्यु के दूसरे मुख जैसे ह्रद को देखकर भगवान् मधुसूदन विचार करने लगे।

श्लोक 6 (vishnu.5.7.6)

अस्मिन्वसति दुष्टात्मा कालीयोऽसौ विषायुधः यो मया निर्जितस्त्यक्त्वा दुष्टो गच्छेत्पयोनिधिम्

asminvasati duṣṭātmā kālīyo'sau viṣāyudhaḥ yo mayā nirjitastyaktvā duṣṭo gacchetpayonidhim

'यहाँ वह दुरात्मा, विष ही जिसका शस्त्र है, कालीय नाग रहता है; मेरे द्वारा पराजित होकर वह दुष्ट इस स्थान को त्यागकर समुद्र में चला जाए।'

श्लोक 7 (vishnu.5.7.7)

तेनेयं दूषिता सर्वा यमुना सागरंगमा न नरैर्गोधनैश्चापि तृषार्त्तैरुपभुज्यते

teneyaṁ dūṣitā sarvā yamunā sāgaraṁgamā na narairgodhanaiścāpi tṛṣārttairupabhujyate

'उसके कारण सागर तक जाने वाली यह सम्पूर्ण यमुना दूषित हो गई है; प्यास से व्याकुल मनुष्य या गोधन भी इसका उपयोग नहीं कर सकते।'

श्लोक 8 (vishnu.5.7.8)

तदस्य नागराजस्य कर्त्तव्यो निग्रहो मया निस्त्रासास्तु सुखं येन चरेयुर्व्रजवासिनः

tadasya nāgarājasya karttavyo nigraho mayā nistrāsāstu sukhaṁ yena careyurvrajavāsinaḥ

'अतः मुझे इस नागराज का दमन करना चाहिए, जिससे व्रजवासी निर्भय होकर सुखपूर्वक विचरण कर सकें।'

श्लोक 9 (vishnu.5.7.9)

एतदर्थं तु लोकेस्मिन्नवतारः कृतो मया यदेषामुत्पथस्थानां कार्या शांतिर्दुरात्मनाम्

etadarthaṁ tu lokesminnavatāraḥ kṛto mayā yadeṣāmutpathasthānāṁ kāryā śāṁtirdurātmanām

'इसी उद्देश्य से मैंने इस लोक में अवतार लिया है, कि कुमार्गगामी इन दुरात्माओं की शान्ति की जा सके।'

श्लोक 10 (vishnu.5.7.10)

तदेतं नातिदूरस्थं कदंबमुरुशाखिनम् अधिरुह्य पतिष्यामि ह्रदेऽस्मिन्ननिलाशिनः

tadetaṁ nātidūrasthaṁ kadaṁbamuruśākhinam adhiruhya patiṣyāmi hrade'sminnanilāśinaḥ

'अतः इस निकटस्थ, विशाल शाखाओं वाले कदम्ब वृक्ष पर चढ़कर मैं इस वायुभक्षी सर्प के ह्रद में कूद पड़ूँगा।'

श्लोक 11 (vishnu.5.7.11)

श्रीपराशर उवाच । इत्थं विचिंत्य बद्धा च गाढं परिकरं ततः निपपात ह्रदे तत्र नागराजस्य वेगतः

śrīparāśara uvāca itthaṁ viciṁtya baddhā ca gāḍhaṁ parikaraṁ tataḥ nipapāta hrade tatra nāgarājasya vegataḥ

पराशर जी ने कहा — ऐसा विचार करके तथा अपनी कमर कसकर बाँधकर, वे उस नागराज के ह्रद में वेगपूर्वक कूद पड़े।

श्लोक 12 (vishnu.5.7.12)

तेनातिपतता तत्र क्षोभितस्स महाह्रदः अत्यर्थं दूरजातांस्तु समसिंचन्महीरुहान्

tenātipatatā tatra kṣobhitassa mahāhradaḥ atyarthaṁ dūrajātāṁstu samasiṁcanmahīruhān

उनके इस प्रकार अत्यंत वेग से कूदने पर वह विशाल ह्रद इस प्रकार क्षुब्ध हुआ कि दूर खड़े वृक्षों को भी उसने सींच दिया।

श्लोक 13 (vishnu.5.7.13)

ते हि दुष्टविषज्वालातप्तांबुपवनोक्षिताः जज्वलुः पादपास्सद्यो ज्वालाव्याप्तदिगंतराः

te hi duṣṭaviṣajvālātaptāṁbupavanokṣitāḥ jajvaluḥ pādapāssadyo jvālāvyāptadigaṁtarāḥ

दुष्ट विष-ज्वाला से तप्त जल और वायु से सिंचित वे वृक्ष तत्क्षण जल उठे, और उनकी ज्वालाओं से दिशाएँ व्याप्त हो गईं।

श्लोक 14 (vishnu.5.7.14)

आस्फोटयामास तदा कृष्णो नागह्रदे भुजम् तच्छब्दश्रवणाच्चाशु नागराजोऽभ्युपागमत्

āsphoṭayāmāsa tadā kṛṣṇo nāgahrade bhujam tacchabdaśravaṇāccāśu nāgarājo'bhyupāgamat

तब कृष्ण ने नाग के ह्रद में अपनी भुजा थपथपाई; उस ध्वनि को सुनकर नागराज तुरंत वहाँ आ पहुँचा।

श्लोक 15 (vishnu.5.7.15)

आताम्रनयनः कोपाद्विषज्वालाकुलैर्मुखैः वृतो महाविषैश्चान्यैरुरगैरनिलाशनैः

ātāmranayanaḥ kopādviṣajvālākulairmukhaiḥ vṛto mahāviṣaiścānyairuragairanilāśanaiḥ

क्रोध से लाल नेत्रों वाला, विष की ज्वालाओं से व्याकुल मुखों वाला वह नाग, अन्य महाविषधारी वायुभक्षी सर्पों से घिरा हुआ था।

श्लोक 16 (vishnu.5.7.16)

नागपत्न्यश्च शतशो हारिहारोपशोभिताः प्रकंपिततनुक्षेपचलत्कुंतलकांतयः

nāgapatnyaśca śataśo hārihāropaśobhitāḥ prakaṁpitatanukṣepacalatkuṁtalakāṁtayaḥ

और सैकड़ों नाग-पत्नियाँ, मनोहर हारों से अलंकृत, अपने काँपते हुए शरीर के हिलने से लहराते केशों वाली —

श्लोक 17 (vishnu.5.7.17)

ततः प्रवेष्टितस्सर्पैस्स कृष्णे भोगबंधनैः ददंशुस्तेऽपि तं कृष्णं विषज्वालाकुलैर्मुखैः

tataḥ praveṣṭitassarpaissa kṛṣṇe bhogabaṁdhanaiḥ dadaṁśuste'pi taṁ kṛṣṇaṁ viṣajvālākulairmukhaiḥ

तब उस नाग ने अपनी कुण्डली से कृष्ण को जकड़ लिया, और अन्य सर्पों ने भी विष-ज्वालाओं से युक्त मुखों से कृष्ण को डस लिया।

श्लोक 18 (vishnu.5.7.18)

तं तत्र पतितं दृष्ट्वा सर्पभोगैर्निपीडितम् गोपा व्रजमुपागम्य चुक्रुशुः शोकलालसाः

taṁ tatra patitaṁ dṛṣṭvā sarpabhogairnipīḍitam gopā vrajamupāgamya cukruśuḥ śokalālasāḥ

उसे वहाँ गिरा हुआ, सर्प की कुण्डलियों से पीड़ित देखकर, गोप व्रज लौटकर शोकाकुल होकर चिल्लाने लगे।

श्लोक 19 (vishnu.5.7.19)

गोपा ऊचुः । एष मोहं गतः कृष्णो मग्नौ वै कालियह्रदे भक्ष्यते नागराजेन तमागच्छत पश्यत

gopā ūcuḥ eṣa mohaṁ gataḥ kṛṣṇo magnau vai kāliyahrade bhakṣyate nāgarājena tamāgacchata paśyata

गोपों ने कहा — 'यह कृष्ण मूर्च्छित होकर कालीय के ह्रद में डूब गया है! नागराज उसे निगल रहा है — आओ, चलकर देखो!'

श्लोक 20 (vishnu.5.7.20)

तच्छ्रुत्वा तत्र ते गोपा वज्रपा तोपमं वचः गोप्यश्च त्वरिता जग्मुर्यशोदाप्रमुखा ह्रदम्

tacchrutvā tatra te gopā vajrapā topamaṁ vacaḥ gopyaśca tvaritā jagmuryaśodāpramukhā hradam

वज्रपात के समान इस वचन को सुनकर वे गोप-गोपियाँ, यशोदा को आगे किए, शीघ्रता से ह्रद की ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 21 (vishnu.5.7.21)

हाहा क्वासाविति जनो गोपीनामतिविह्वलः यशोदया समं भ्रान्तो द्रु तप्रस्खलितं ययौ

hāhā kvāsāviti jano gopīnāmativihvalaḥ yaśodayā samaṁ bhrānto dru tapraskhalitaṁ yayau

'हाय! कहाँ है वह?' — इस प्रकार गोपियों के लोग अत्यंत व्याकुल होकर यशोदा के साथ भागते हुए, लड़खड़ाते हुए दौड़े।

श्लोक 22 (vishnu.5.7.22)

नंदगोपश्च गोपाश्च रामश्चाद्भुतविक्रमः त्वरितं यमुनां जग्मुः कृष्णदर्शनलालसाः

naṁdagopaśca gopāśca rāmaścādbhutavikramaḥ tvaritaṁ yamunāṁ jagmuḥ kṛṣṇadarśanalālasāḥ

नन्दगोप, गोपगण, तथा अद्भुत पराक्रमी बलराम, कृष्ण को देखने की उत्कण्ठा से शीघ्र यमुना की ओर दौड़े।

श्लोक 23 (vishnu.5.7.23)

ददृशुश्चापि ते तत्र सर्पराजवशंगतम् निष्प्रयत्नीकृतं कृष्णं सर्पभोगविवेष्टितम्

dadṛśuścāpi te tatra sarparājavaśaṁgatam niṣprayatnīkṛtaṁ kṛṣṇaṁ sarpabhogaviveṣṭitam

और वहाँ उन्होंने कृष्ण को नागराज के वश में पड़ा, निश्चेष्ट किया हुआ, सर्प की कुण्डलियों से जकड़ा हुआ देखा।

श्लोक 24 (vishnu.5.7.24)

नंदगोपोपि निश्चेष्टो न्यस्य पुत्रमुखे दृशम् यशोदा च महाभागा बभूव मुनिसत्तम

naṁdagopopi niśceṣṭo nyasya putramukhe dṛśam yaśodā ca mahābhāgā babhūva munisattama

हे मुनिसत्तम! नन्दगोप भी अपने पुत्र के मुख पर दृष्टि गड़ाए हुए निश्चेष्ट हो गए, और महाभागा यशोदा भी वैसी ही हो गईं।

श्लोक 25 (vishnu.5.7.25)

गोप्यस्त्वन्या रुदंत्यश्च ददृशुः शोककातराः प्रोचुश्च केशवं प्रीत्या भयकातर्यगद्गदम्

gopyastvanyā rudaṁtyaśca dadṛśuḥ śokakātarāḥ procuśca keśavaṁ prītyā bhayakātaryagadgadam

अन्य गोपियाँ रोती हुई, शोक से व्याकुल होकर देख रही थीं, और स्नेह तथा भय-व्याकुलता से गद्गद होकर केशव से कहने लगीं।

श्लोक 26 (vishnu.5.7.26)

गोप्य ऊचुः । सर्वा यशोदया सार्द्धं विशामोत्र महाह्रदम् सर्पराजस्य नो गंतुमस्माभिर्युज्यते व्रजम्

gopya ūcuḥ sarvā yaśodayā sārddhaṁ viśāmotra mahāhradam sarparājasya no gaṁtumasmābhiryujyate vrajam

गोपियों ने कहा — 'हम सब यशोदा के साथ इस नागराज के महाह्रद में प्रवेश करें; हमारे लिए व्रज लौट जाना उचित नहीं है।'

श्लोक 27 (vishnu.5.7.27)

दिवसः को विना सूर्यं विना चंद्रे ण का निशा विना वृषेण का गावो विना कृष्णेन को व्रजः

divasaḥ ko vinā sūryaṁ vinā caṁdre ṇa kā niśā vinā vṛṣeṇa kā gāvo vinā kṛṣṇena ko vrajaḥ

'सूर्य के बिना दिन कैसा? चन्द्रमा के बिना रात्रि कैसी? वृषभ के बिना गौएँ कैसी? कृष्ण के बिना व्रज ही क्या?'

श्लोक 28 (vishnu.5.7.28)

विनाकृता न यास्यामः कृष्णेनानेन गोकुलम् अरम्यं नातिसेव्यं च वारिहीनं यथा सरः

vinākṛtā na yāsyāmaḥ kṛṣṇenānena gokulam aramyaṁ nātisevyaṁ ca vārihīnaṁ yathā saraḥ

'इस कृष्ण के बिना हम गोकुल नहीं जाएँगी, जो जल-रहित सरोवर के समान अरम्य और असेवनीय हो जाएगा।'

श्लोक 29 (vishnu.5.7.29)

यत्र नेंदीवरश्यामकायकांतिरयं हरिः तेनापि पातुर्वासेन रतिरस्तीति विस्मयः

yatra neṁdīvaraśyāmakāyakāṁtirayaṁ hariḥ tenāpi pāturvāsena ratirastīti vismayaḥ

'जिस स्थान में नीलकमल के समान श्याम शरीर-कान्ति वाले ये हरि न हों, वहाँ रहने में भी किसी को रति हो सकती है — यह तो आश्चर्य ही है!'

श्लोक 30 (vishnu.5.7.30)

उत्फुल्लपंकजदलस्पष्टकांतिविलोचनम् अपश्यंतो हरिं दीनाः कथं गोष्ठे भविष्यथ

utphullapaṁkajadalaspaṣṭakāṁtivilocanam apaśyaṁto hariṁ dīnāḥ kathaṁ goṣṭhe bhaviṣyatha

'खिले हुए कमल-दल के समान स्पष्ट कान्ति वाले नेत्रों वाले हरि को न देखते हुए, हम दीन होकर गोष्ठ में कैसे रह सकेंगी?'

श्लोक 31 (vishnu.5.7.31)

अत्यंतमधुरालापहृताश्षोमनोरथम् न विना पुंडरीकाक्षं यास्यामो नंदगोकुलम्

atyaṁtamadhurālāpahṛtāśṣomanoratham na vinā puṁḍarīkākṣaṁ yāsyāmo naṁdagokulam

'जिनके समस्त मनोरथ उनकी अत्यंत मधुर वाणी से हर लिए गए हैं, हम उस कमलनयन के बिना नन्द के गोकुल को नहीं जाएँगी।'

श्लोक 32 (vishnu.5.7.32)

भोगेनावेष्टितस्यापि सर्पराजस्य पश्यत स्मितशोभिमुखं गोप्यः कृष्णस्यास्मद्विलोकने

bhogenāveṣṭitasyāpi sarparājasya paśyata smitaśobhimukhaṁ gopyaḥ kṛṣṇasyāsmadvilokane

'देखो सखियो, नागराज की कुण्डली से जकड़े होने पर भी हमें देखकर कृष्ण का मुख मुस्कान से शोभित हो रहा है।'

श्लोक 33 (vishnu.5.7.33)

श्रीपराशर उवाच । इति गोपीवचः श्रुत्वा रौहिणेयो महाबलः गोपांश्च त्रासविधुरान्विलोक्य स्तिमितेक्षणान्

śrīparāśara uvāca iti gopīvacaḥ śrutvā rauhiṇeyo mahābalaḥ gopāṁśca trāsavidhurānvilokya stimitekṣaṇān

पराशर जी ने कहा — गोपियों के इन वचनों को सुनकर तथा भय से काँपते हुए, स्तब्ध नेत्रों वाले गोपों को देखकर महाबली रोहिणीपुत्र बलराम ने —

श्लोक 34 (vishnu.5.7.34)

नंदं च दीनमत्यर्थं न्यस्तदृष्टिं सुतानने मूर्च्छाकुलां यशोदां च कृष्णमाहात्मसंज्ञया

naṁdaṁ ca dīnamatyarthaṁ nyastadṛṣṭiṁ sutānane mūrcchākulāṁ yaśodāṁ ca kṛṣṇamāhātmasaṁjñayā

— तथा अत्यंत दीन नन्द को, जो पुत्र के मुख पर दृष्टि गड़ाए थे, और मूर्च्छा से व्याकुल यशोदा को देखकर, बलराम ने कृष्ण को उनकी अपनी महिमा का स्मरण कराते हुए यह कहा।

श्लोक 35 (vishnu.5.7.35)

किमिदं देवदेवेश भावोऽयं मानुषस्त्वया व्यज्यतेत्यंतमात्मानं किमनंतं न वोत्सि यत्

kimidaṁ devadeveśa bhāvo'yaṁ mānuṣastvayā vyajyatetyaṁtamātmānaṁ kimanaṁtaṁ na votsi yat

'हे देवदेवेश! यह क्या है? आप यह मानवोचित भाव क्यों प्रकट कर रहे हैं? क्या आप अपने अनन्त स्वरूप को नहीं जानते?'

श्लोक 36 (vishnu.5.7.36)

त्वमेव जगतो नाभिरराणामिव संश्रयः कर्त्तापहर्त्ता पाता च त्रैलोक्यं त्वं त्रयीमयः

tvameva jagato nābhirarāṇāmiva saṁśrayaḥ karttāpaharttā pātā ca trailokyaṁ tvaṁ trayīmayaḥ

'आप ही जगत् की नाभि हैं, जैसे आरों का आश्रय नाभि होती है; आप ही कर्ता, संहर्ता और पालनकर्ता हैं; आप ही त्रैलोक्य और त्रयीमय हैं।'

श्लोक 37 (vishnu.5.7.37)

सेंद्रै रुद्रा ग्निवसुभिरादित्यैर्मरुदश्विभिः चिंत्यसे त्वमचिंत्यात्मन् समस्तैश्चैव योगिभिः

seṁdrai rudrā gnivasubhirādityairmarudaśvibhiḥ ciṁtyase tvamaciṁtyātman samastaiścaiva yogibhiḥ

'हे अचिन्त्यस्वरूप! इन्द्र सहित रुद्र, अग्नि, वसु, आदित्य, मरुत, अश्विनीकुमार तथा समस्त योगीजन भी आपका ही चिन्तन करते हैं।'

श्लोक 38 (vishnu.5.7.38)

जगत्यर्थं जगन्नाथ भारावतरणेच्छया अवतीर्णोऽसि मर्त्येषु तवांशश्चाहमग्रजः

jagatyarthaṁ jagannātha bhārāvataraṇecchayā avatīrṇo'si martyeṣu tavāṁśaścāhamagrajaḥ

'हे जगन्नाथ! जगत् के हित हेतु, भार उतारने की इच्छा से आप मनुष्यों में अवतीर्ण हुए हैं, और मैं आपका ही अग्रज अंश हूँ।'

श्लोक 39 (vishnu.5.7.39)

मनुष्यलीलां भगवन् भजता भवता सुराः विडम्बयन्तस्त्वल्लीलां सर्व एव सहासते

manuṣyalīlāṁ bhagavan bhajatā bhavatā surāḥ viḍambayantastvallīlāṁ sarva eva sahāsate

'हे भगवन्! आपके मनुष्य-लीला करने पर समस्त देवता भी आपकी उस लीला का अनुकरण करते हुए साथ-साथ बैठे रहते हैं।'

श्लोक 40 (vishnu.5.7.40)

अवतार्य भवान्पूर्वं गोकुले तु सुरांगनाः क्रीडार्थमात्मनः पश्चादवर्तीर्णोऽसि शाश्वत

avatārya bhavānpūrvaṁ gokule tu surāṁganāḥ krīḍārthamātmanaḥ paścādavartīrṇo'si śāśvata

'हे शाश्वत! पहले आपने देवांगनाओं को गोकुल में भेजा और फिर स्वयं अपनी क्रीड़ा के लिए अवतरित हुए।'

श्लोक 41 (vishnu.5.7.41)

अत्रावतीर्णयोः कृष्ण गोपा एव हि बांधवाः गोप्यश्च सीदतः कस्मादेतान्बंधूनुपेक्षसे

atrāvatīrṇayoḥ kṛṣṇa gopā eva hi bāṁdhavāḥ gopyaśca sīdataḥ kasmādetānbaṁdhūnupekṣase

'हे कृष्ण! यहाँ अवतीर्ण हुए हम दोनों के लिए गोप और गोपियाँ ही बन्धु हैं; इन दुःखी बन्धुओं की उपेक्षा आप क्यों कर रहे हैं?'

श्लोक 42 (vishnu.5.7.42)

दर्शितो मानुषो भावो दर्शितं बालचापलम् तदयं दम्यतां कृष्ण दुष्टात्मा दशनायुधः

darśito mānuṣo bhāvo darśitaṁ bālacāpalam tadayaṁ damyatāṁ kṛṣṇa duṣṭātmā daśanāyudhaḥ

'आपने मनुष्योचित भाव दिखा दिया, बालसुलभ चंचलता भी दिखा दी; अब हे कृष्ण! दाँत ही जिसका शस्त्र है, उस दुरात्मा को वश में कीजिए।'

श्लोक 43 (vishnu.5.7.43)

श्रीपराशर उवाच । इति संस्मारितः कृष्णः स्मितभिन्नोष्ठसंपुटः आस्फोट्य मोचयामास स्वदेहं भोगिबंधनात्

śrīparāśara uvāca iti saṁsmāritaḥ kṛṣṇaḥ smitabhinnoṣṭhasaṁpuṭaḥ āsphoṭya mocayāmāsa svadehaṁ bhogibaṁdhanāt

पराशर जी ने कहा — इस प्रकार स्मरण कराए जाने पर, मुस्कान से होंठ खोलते हुए कृष्ण ने झटक कर अपने शरीर को सर्प के बन्धन से मुक्त कर लिया।

श्लोक 44 (vishnu.5.7.44)

आनम्य चापि हस्ताभ्यामुभाभ्यां मध्यमं शिरः आरुह्याभुग्नशिरसः प्रणनर्त्तोरुविक्रमः

ānamya cāpi hastābhyāmubhābhyāṁ madhyamaṁ śiraḥ āruhyābhugnaśirasaḥ praṇanarttoruvikramaḥ

और दोनों हाथों से उसके मध्य फण को झुकाकर तथा उस पर चढ़कर, महापराक्रमी कृष्ण ने उसके नत मस्तक पर नृत्य करना आरम्भ किया।

श्लोक 45 (vishnu.5.7.45)

प्राणाः फणेऽभवंश्चास्य कृष्णस्यांघ्रिनिकुट्टनैः यत्रोन्नतिं च कुरुते ननामास्य ततश्शिरः

prāṇāḥ phaṇe'bhavaṁścāsya kṛṣṇasyāṁghrinikuṭṭanaiḥ yatronnatiṁ ca kurute nanāmāsya tataśśiraḥ

कृष्ण के चरणों की ठोकरों से उसके प्राण उसी फण में केन्द्रित हो गए; और जहाँ भी वह सिर ऊँचा करने का प्रयत्न करता, कृष्ण उसे वहीं झुका देते।

श्लोक 46 (vishnu.5.7.46)

मूर्च्छामुपाययौ भ्रांत्या नागः कृष्णस्य रेचकैः दंडपातनिपातेन ववाम रुधिरं बहु

mūrcchāmupāyayau bhrāṁtyā nāgaḥ kṛṣṇasya recakaiḥ daṁḍapātanipātena vavāma rudhiraṁ bahu

कृष्ण के घूर्णन-पादाघातों से चक्कर खाकर नाग मूर्च्छित हो गया, और दण्ड के समान आघातों की चोट से उसने बहुत रक्त वमन किया।

श्लोक 47 (vishnu.5.7.47)

तं विभुग्नशिरोग्रीवमास्येभ्यस्स्रुतशोणितम् विलोक्य करुणं जग्मुस्तत्पत्न्यो मधुसूदनम्

taṁ vibhugnaśirogrīvamāsyebhyassrutaśoṇitam vilokya karuṇaṁ jagmustatpatnyo madhusūdanam

उसे इस प्रकार झुकी हुई ग्रीवाओं और मुखों से रक्त बहाते हुए देखकर करुणा से द्रवित होकर उसकी पत्नियाँ मधुसूदन के पास गईं।

श्लोक 48 (vishnu.5.7.48)

नागपत्न्य ऊचुः । ज्ञातोऽसि देवदेवेश सर्वज्ञस्त्वमनुत्तमः परं ज्योतिरचिंत्यं यत्तदंशः परमेश्वरः

nāgapatnya ūcuḥ jñāto'si devadeveśa sarvajñastvamanuttamaḥ paraṁ jyotiraciṁtyaṁ yattadaṁśaḥ parameśvaraḥ

नाग-पत्नियों ने कहा — 'हे देवदेवेश! हम आपको पहचान गई हैं; आप सर्वज्ञ, अनुत्तम हैं; आप उस परम अचिन्त्य ज्योति परमेश्वर के ही अंश हैं।'

श्लोक 49 (vishnu.5.7.49)

न समर्थाः सुरास्स्तोतुं यमनन्यभवं विभुम् स्वरूपवर्णनं तस्य कथं योषित्करिष्यति

na samarthāḥ surāsstotuṁ yamananyabhavaṁ vibhum svarūpavarṇanaṁ tasya kathaṁ yoṣitkariṣyati

'जिस अद्वितीय, स्वयंभू प्रभु की स्तुति करने में देवता भी समर्थ नहीं, उसके स्वरूप का वर्णन एक स्त्री भला कैसे कर सकती है?'

श्लोक 50 (vishnu.5.7.50)

यस्याऽखिलमहीर्व्योमजलाग्निपवनात्मकम् ब्रह्मांडमल्पकाल्पांशः स्तोष्यामस्तं कथं वयम्

yasyā'khilamahīrvyomajalāgnipavanātmakam brahmāṁḍamalpakālpāṁśaḥ stoṣyāmastaṁ kathaṁ vayam

'जिनका अल्प अंशमात्र ही यह पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायुमय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है, उनकी स्तुति हम कैसे कर सकती हैं?'

श्लोक 51 (vishnu.5.7.51)

यमतो न विदुर्नित्यं यत्स्वरूपं हि योगिनः परमार्थमणोरल्पं स्थूलात्स्थूलं नताः स्म तम्

yamato na vidurnityaṁ yatsvarūpaṁ hi yoginaḥ paramārthamaṇoralpaṁ sthūlātsthūlaṁ natāḥ sma tam

'जिनके परमार्थ स्वरूप को योगीजन भी सदा नहीं जान पाते — जो अणु से भी सूक्ष्म और स्थूल से भी स्थूल हैं — उन्हें हम नमस्कार करती हैं।'

श्लोक 52 (vishnu.5.7.52)

न यस्य जन्मने धाता यस्य चांताय नांतकः स्थितिकर्त्ता न चान्योस्ति यस्य तस्मै नमस्सदा

na yasya janmane dhātā yasya cāṁtāya nāṁtakaḥ sthitikarttā na cānyosti yasya tasmai namassadā

'जिनके जन्म के लिए कोई विधाता नहीं और जिनके अन्त के लिए कोई मृत्यु नहीं, तथा जिनके अतिरिक्त कोई अन्य स्थितिकर्ता नहीं — उन्हें सदा नमस्कार है।'

श्लोक 53 (vishnu.5.7.53)

कोपः स्वल्पोऽपि ते नास्ति स्थितिपालनमेव ते कारणं कालियस्यास्य दमने श्रूयतां वचः

kopaḥ svalpo'pi te nāsti sthitipālanameva te kāraṇaṁ kāliyasyāsya damane śrūyatāṁ vacaḥ

'आपमें तनिक भी क्रोध नहीं है; स्थिति-पालन ही आपका उद्देश्य है। इस कालीय के दमन के विषय में हमारी बात सुनिए।'

श्लोक 54 (vishnu.5.7.54)

स्त्रियोनुकंप्यास्साधूनां मूढा दीनाश्च जंतवः यतस्ततोस्य दीनस्य क्षम्यतां क्षमतांवर

striyonukaṁpyāssādhūnāṁ mūḍhā dīnāśca jaṁtavaḥ yatastatosya dīnasya kṣamyatāṁ kṣamatāṁvara

'स्त्रियाँ, मूढ़ और दीन प्राणी सज्जनों की करुणा के पात्र होते हैं; अतः हे क्षमाशीलों में श्रेष्ठ! इस दीन को क्षमा कीजिए।'

श्लोक 55 (vishnu.5.7.55)

समस्त जगदाधारो भवानल्पबलः फणी त्वत्पादपीडितो जह्यान्मुहूर्त्तार्द्धेन जीवितम्

samasta jagadādhāro bhavānalpabalaḥ phaṇī tvatpādapīḍito jahyānmuhūrttārddhena jīvitam

'आप सम्पूर्ण जगत् के आधार हैं, और यह सर्प अल्पबल है; आपके चरणों से पीड़ित होकर यह आधे मुहूर्त में ही अपने प्राण त्याग देगा।'

श्लोक 56 (vishnu.5.7.56)

पन्नगोल्पवीर्योऽयं क्व भवान्भुवनाश्रयः प्रीतिद्वेषौ समोत्कृष्टगोचरौ भवतोऽव्यय

pannagolpavīryo'yaṁ kva bhavānbhuvanāśrayaḥ prītidveṣau samotkṛṣṭagocarau bhavato'vyaya

'कहाँ यह अल्पपराक्रमी सर्प, और कहाँ भुवनाश्रय आप! हे अव्यय! आपका प्रेम और द्वेष समान और श्रेष्ठ — दोनों के प्रति समान भाव से होता है।'

श्लोक 57 (vishnu.5.7.57)

ततः कुरु जगत्स्वामिन्प्रसादमवसीदतः प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षा प्रदीयताम्

tataḥ kuru jagatsvāminprasādamavasīdataḥ prāṇāṁstyajati nāgo'yaṁ bhartṛbhikṣā pradīyatām

'अतः हे जगत्स्वामिन्! इस पीड़ित के प्रति कृपा कीजिए; यह नाग अपने प्राण त्याग रहा है — हमें अपने पति के जीवन की भिक्षा दीजिए।'

श्लोक 58 (vishnu.5.7.58)

भुवनेश जगन्नाथ महापुरुषपूर्वज प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षां प्रयच्छ नः

bhuvaneśa jagannātha mahāpuruṣapūrvaja prāṇāṁstyajati nāgo'yaṁ bhartṛbhikṣāṁ prayaccha naḥ

'हे भुवनेश! हे जगन्नाथ! हे महापुरुष के अग्रज! यह नाग प्राण त्याग रहा है; हमें पति की भिक्षा दीजिए।'

श्लोक 59 (vishnu.5.7.59)

वेदांतवेद्य देवेश दुष्टदैत्यनिबर्हण प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षा प्रदीयताम्

vedāṁtavedya deveśa duṣṭadaityanibarhaṇa prāṇāṁstyajati nāgo'yaṁ bhartṛbhikṣā pradīyatām

'हे वेदान्त द्वारा जानने योग्य! हे देवेश! हे दुष्ट दैत्यों के संहारक! यह नाग प्राण त्याग रहा है — हमें पति की भिक्षा दीजिए।'

श्लोक 60 (vishnu.5.7.60)

श्रीपराशर उवाच । इत्युक्ते ताभिराश्वस्य क्लांतदेहोपि पन्नगः प्रसीद देवदेवेति प्राह वाक्यं शनैः शनैः

śrīparāśara uvāca ityukte tābhirāśvasya klāṁtadehopi pannagaḥ prasīda devadeveti prāha vākyaṁ śanaiḥ śanaiḥ

पराशर जी ने कहा — इस प्रकार उनके कहने पर, शरीर से क्लान्त होते हुए भी सर्प ने धैर्य धारण कर धीरे-धीरे यह वचन कहा — 'हे देवदेव! प्रसन्न होइए।'

श्लोक 61 (vishnu.5.7.61)

कालिय उवाच । तवाष्टगुणमैश्वर्यं नाथ स्वाभाविकं परम् निरस्तातिशयं यस्य तस्य स्तोष्यामि किन्न्वहम्

kāliya uvāca tavāṣṭaguṇamaiśvaryaṁ nātha svābhāvikaṁ param nirastātiśayaṁ yasya tasya stoṣyāmi kinnvaham

कालीय ने कहा — 'हे नाथ! आपका आठ प्रकार का ऐश्वर्य स्वाभाविक और परम है, जिसकी कोई तुलना नहीं — मैं भला आपकी स्तुति कैसे करूँ?'

श्लोक 62 (vishnu.5.7.62)

त्वं परस्त्वं पस्याद्यः परं त्वत्तः परात्मक परस्मात्परमो यस्त्वं तस्य स्तोष्यामि किन्न्वहम्

tvaṁ parastvaṁ pasyādyaḥ paraṁ tvattaḥ parātmaka parasmātparamo yastvaṁ tasya stoṣyāmi kinnvaham

'आप ही परम हैं, आप ही उससे भी परे हैं, हे परात्मस्वरूप! आप परम से भी परम हैं — मैं भला आपकी स्तुति कैसे करूँ?'

श्लोक 63 (vishnu.5.7.63)

यस्माद्ब्रह्मा च रुद्रश्च चंद्रेद्रं! मरुदश्विनः वसवश्च सहादित्यैस्तस्य स्तोष्यामि किन्न्वहम्

yasmādbrahmā ca rudraśca caṁdredraṁ! marudaśvinaḥ vasavaśca sahādityaistasya stoṣyāmi kinnvaham

'जिनसे ब्रह्मा, रुद्र, चन्द्र, इन्द्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा आदित्यों सहित वसुगण उत्पन्न हुए — मैं भला उनकी स्तुति कैसे करूँ?'

श्लोक 64 (vishnu.5.7.64)

एकावयवसूक्ष्मांशो यस्यैतदखिलं जगत् कल्पनावयवस्यांशस्तस्य स्तोष्यामि किन्न्वहम्

ekāvayavasūkṣmāṁśo yasyaitadakhilaṁ jagat kalpanāvayavasyāṁśastasya stoṣyāmi kinnvaham

'जिनके एक अवयव के सूक्ष्म अंशमात्र से यह सम्पूर्ण जगत् है, वह भी कल्पित अंश के अंशमात्र से — मैं भला उनकी स्तुति कैसे करूँ?'

श्लोक 65 (vishnu.5.7.65)

सदसद्रू पिणो यस्य ब्रह्माद्यास्त्रिश्श्वोराः परमार्थं न जानंति तस्य स्तोष्यामि किन्न्वहम्

sadasadrū piṇo yasya brahmādyāstriśśvorāḥ paramārthaṁ na jānaṁti tasya stoṣyāmi kinnvaham

'जो सत् और असत् दोनों रूप वाले हैं, जिनके परमार्थ स्वरूप को ब्रह्मा आदि देवेश्वर भी नहीं जानते — मैं भला उनकी स्तुति कैसे करूँ?'

श्लोक 66 (vishnu.5.7.66)

ब्रह्माद्यैरर्चिते यस्तु गंधपुष्पानुलेपनैः नंदनादिसमुद्भूतैस्सोर्च्यते वा कथं मया

brahmādyairarcite yastu gaṁdhapuṣpānulepanaiḥ naṁdanādisamudbhūtaissorcyate vā kathaṁ mayā

'जो ब्रह्मा आदि द्वारा नन्दनवन आदि में उत्पन्न सुगन्ध, पुष्प और अनुलेपनों से पूजित होते हैं — उनकी पूजा भला मैं कैसे कर सकता हूँ?'

श्लोक 67 (vishnu.5.7.67)

यस्यावताररूपाणि देवराजस्सदार्च्चति न वेत्ति परमं रूपं सोऽर्च्यते वा कथं मया

yasyāvatārarūpāṇi devarājassadārccati na vetti paramaṁ rūpaṁ so'rcyate vā kathaṁ mayā

'जिनके अवतार-रूपों की देवराज इन्द्र सदा पूजा करते हैं, फिर भी उनके परम स्वरूप को नहीं जानते — उनकी पूजा भला मैं कैसे कर सकता हूँ?'

श्लोक 68 (vishnu.5.7.68)

विषयेभ्यस्समावृत्त्य सर्वाक्षाणि च योगिनः यमर्चयंति ध्यानेन सोऽर्च्यते वा कथं मया

viṣayebhyassamāvṛttya sarvākṣāṇi ca yoginaḥ yamarcayaṁti dhyānena so'rcyate vā kathaṁ mayā

'जिन्हें योगीजन अपनी समस्त इन्द्रियों को विषयों से हटाकर ध्यान द्वारा पूजते हैं — उनकी पूजा भला मैं कैसे कर सकता हूँ?'

श्लोक 69 (vishnu.5.7.69)

[१]हृदि संकल्प्य यद्रूपं ध्यानेनार्चंति योगिनः भावपुष्पादिना नाथः सोर्च्यते वा कथं मया

[1]hṛdi saṁkalpya yadrūpaṁ dhyānenārcaṁti yoginaḥ bhāvapuṣpādinā nāthaḥ sorcyate vā kathaṁ mayā

'जिस रूप की हृदय में कल्पना करके योगीजन ध्यान द्वारा भाव-पुष्पादि से पूजते हैं, हे नाथ! उनकी पूजा भला मैं कैसे कर सकता हूँ?'

श्लोक 70 (vishnu.5.7.70)

सोऽहं ते देवदेवेश नार्चनादौ स्तुतौ न च सामर्थ्यवान् कृपामात्रमनोवृत्तिः प्रसीद मे

so'haṁ te devadeveśa nārcanādau stutau na ca sāmarthyavān kṛpāmātramanovṛttiḥ prasīda me

'हे देवदेवेश! मैं आपकी पूजा या स्तुति में समर्थ नहीं हूँ; केवल आपकी कृपा-वृत्ति से मुझ पर प्रसन्न हों।'

श्लोक 71 (vishnu.5.7.71)

सर्पजातिरियं क्रुरा यस्यां जातोस्मि केशव तत्स्वभावोऽयमत्रास्ति नापराधो ममाच्युत

sarpajātiriyaṁ krurā yasyāṁ jātosmi keśava tatsvabhāvo'yamatrāsti nāparādho mamācyuta

'हे केशव! यह सर्प-जाति क्रूर है, जिसमें मैंने जन्म लिया है; हे अच्युत! यह तो इसका स्वभाव है, इसमें मेरा कोई अपराध नहीं।'

श्लोक 72 (vishnu.5.7.72)

सृज्यते भवता सर्वं तथा संह्रीयते जगत् जातिरूपस्वभावाश्च सृज्यंते सृजता त्वया

sṛjyate bhavatā sarvaṁ tathā saṁhrīyate jagat jātirūpasvabhāvāśca sṛjyaṁte sṛjatā tvayā

'सब कुछ आपके द्वारा ही सृजित होता है और आपके द्वारा ही जगत् संहृत होता है; जाति, रूप और स्वभाव भी सृष्टि करने वाले आप ही के द्वारा सृजित होते हैं।'

श्लोक 73 (vishnu.5.7.73)

यथाहं भवता सृष्टो जात्या रूपेण चेश्वर स्वभावेन च साधुत्वं तथेदं चेष्टितं मया

yathāhaṁ bhavatā sṛṣṭo jātyā rūpeṇa ceśvara svabhāvena ca sādhutvaṁ tathedaṁ ceṣṭitaṁ mayā

'हे ईश्वर! जिस प्रकार आपने मुझे जाति, रूप और स्वभाव से सृजित किया है, उसी के अनुरूप ही मैंने यह आचरण किया है।'

श्लोक 74 (vishnu.5.7.74)

यद्यन्यथा प्रवर्त्तेयं देवदेव ततो मयि न्याय्यो दण्डनिपातो वै तवैव वचनं यथा

yadyanyathā pravartteyaṁ devadeva tato mayi nyāyyo daṇḍanipāto vai tavaiva vacanaṁ yathā

'हे देवदेव! यदि मैं अन्यथा आचरण करूँ, तो निश्चय ही आपके द्वारा दण्ड का पड़ना न्यायसंगत है, जैसा कि आपका ही वचन है।'

श्लोक 75 (vishnu.5.7.75)

तथाप्यज्ञे जगत्स्वामिन्दंडं पातितवान्मयि स श्लाघ्योयं दंडस्त्वत्तो मे नान्यतो वरः

tathāpyajñe jagatsvāmindaṁḍaṁ pātitavānmayi sa ślāghyoyaṁ daṁḍastvatto me nānyato varaḥ

'फिर भी, हे जगत्स्वामिन्! अज्ञानी मुझ पर आपने जो दण्ड दिया है, वह दण्ड भी श्लाघनीय है; आपसे प्राप्त इस दण्ड से बढ़कर मेरे लिए कुछ और श्रेष्ठ नहीं है।'

श्लोक 76 (vishnu.5.7.76)

हतवीर्यो हतविषो दमितोऽहं त्वयाऽच्युत जीवितं दीयतामेकमाज्ञापय करोमि किम्

hatavīryo hataviṣo damito'haṁ tvayā'cyuta jīvitaṁ dīyatāmekamājñāpaya karomi kim

'हे अच्युत! मेरा बल नष्ट हो गया, मेरा विष नष्ट हो गया, आपने मुझे वश में कर लिया; केवल मुझे जीवनदान दीजिए — आज्ञा दीजिए, मैं क्या करूँ?'

श्लोक 77 (vishnu.5.7.77)

श्रीभगवानुवाच । नात्र स्थेयं त्वया सर्प कदाचिद्यमुनाजले सपुत्रपरिवारस्त्वं समुद्र सलिलं व्रज

śrībhagavānuvāca nātra stheyaṁ tvayā sarpa kadācidyamunājale saputraparivārastvaṁ samudra salilaṁ vraja

भगवान् ने कहा — हे सर्प! तुझे कभी इस यमुना-जल में नहीं रहना है; अपने पुत्र-परिवार सहित समुद्र के जल में चला जा।

श्लोक 78 (vishnu.5.7.78)

मत्पदानि च ते सर्प दृष्ट्वा मूर्द्धनि सागरे गरुडः पन्नगरिपुस्त्वयि न प्रहरिष्यति

matpadāni ca te sarpa dṛṣṭvā mūrddhani sāgare garuḍaḥ pannagaripustvayi na prahariṣyati

'हे सर्प! समुद्र में अपने मस्तक पर मेरे चरण-चिह्नों को देखकर सर्पों का शत्रु गरुड़ तुझ पर प्रहार नहीं करेगा।'

श्लोक 79 (vishnu.5.7.79)

श्रीपराशर उवाच । इत्युक्त्वा सर्पराजं तं मुमोच भगवान्हरिः प्रणम्य सोपि कुष्णाय जगाम पयसां निधिम्

śrīparāśara uvāca ityuktvā sarparājaṁ taṁ mumoca bhagavānhariḥ praṇamya sopi kuṣṇāya jagāma payasāṁ nidhim

पराशर जी ने कहा — ऐसा कहकर भगवान् हरि ने उस नागराज को मुक्त कर दिया; और वह भी कृष्ण को प्रणाम करके समुद्र की ओर चला गया।

श्लोक 80 (vishnu.5.7.80)

पश्यतां सर्वभूतानां सभृत्यसुतबांधवः समस्तभार्यासहितः परित्यज्य स्वकं ह्रदम्

paśyatāṁ sarvabhūtānāṁ sabhṛtyasutabāṁdhavaḥ samastabhāryāsahitaḥ parityajya svakaṁ hradam

समस्त प्राणियों के देखते-देखते, अपने सेवकों, पुत्रों, बन्धुओं तथा सभी पत्नियों सहित अपने ह्रद को त्यागकर वह चला गया।

श्लोक 81 (vishnu.5.7.81)

गते सर्पे परिष्वज्य मृतं पुनरिवागतम् गोपा मूर्द्धनि हार्देन सिषिचुर्नेत्रजैर्जलैः

gate sarpe pariṣvajya mṛtaṁ punarivāgatam gopā mūrddhani hārdena siṣicurnetrajairjalaiḥ

सर्प के चले जाने पर, मानो मृत्यु से लौटे हुए कृष्ण को गले लगाकर, गोपों ने स्नेहपूर्वक अपने नेत्रों के जल से उनका मस्तक भिगो दिया।

श्लोक 82 (vishnu.5.7.82)

कृष्णमक्लिष्टकर्माणमन्ये विस्मितचेतसः तुष्टुवुर्मुदिता गोपा दृष्ट्वा शिवजलां नदीम्

kṛṣṇamakliṣṭakarmāṇamanye vismitacetasaḥ tuṣṭuvurmuditā gopā dṛṣṭvā śivajalāṁ nadīm

अन्य गोप, विस्मित हृदय से, नदी के जल को अब पवित्र हुआ देखकर आनन्दित होकर अथक-कर्मा कृष्ण की स्तुति करने लगे।

श्लोक 83 (vishnu.5.7.83)

गीयमानः स गोपीभिश्चारितैस्साधुचेष्टितैः संस्तूयमानो गोपैश्च कृष्णो व्रजमुपागमत्

gīyamānaḥ sa gopībhiścāritaissādhuceṣṭitaiḥ saṁstūyamāno gopaiśca kṛṣṇo vrajamupāgamat

गोपियों द्वारा अपने सत्कर्मों और साधु-चेष्टाओं के गुणगान किए जाते हुए तथा गोपों द्वारा स्तुति किए जाते हुए कृष्ण व्रज लौट आए।

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