Skip to main content

अरण्यकाण्ड · सर्ग 11

पंचाप्सर सरोवर

सर्ग 10सर्ग-सूचीसर्ग 12

श्लोक 1 (aranya.11.1)

अग्रतः प्रययौ रामः सीता मध्ये सुशोभना । पृष्ठतस्तु धनुष्पाणिर्लक्ष्मणोऽनुजगाम ह ॥ 11.1 ॥

agrataḥ prayayau rāmaḥ sītā madhye suśobhanā | pṛṣṭhatastu dhanuṣpāṇirlakṣmaṇo'nujagāma ha || 11.1 ||

राम आगे-आगे चलते थे, सुंदर सीता बीच में रहती थीं, और धनुष हाथ में लिए लक्ष्मण पीछे-पीछे उनका अनुसरण करते थे।

श्लोक 2 (aranya.11.2)

तौ पश्यमानौ विविधान् शैलप्रस्थान् वनानि च । नदीश्च विविधा रम्या जग्मतुः सह सीतया ॥ 11.2 ॥

tau paśyamānau vividhān śailaprasthān vanāni ca | nadīśca vividhā ramyā jagmatuḥ saha sītayā || 11.2 ||

विविध पर्वत-प्रस्थों और वनों को तथा नाना सुंदर नदियों को देखते हुए वे दोनों भाई सीता के साथ आगे बढ़ते गए।

श्लोक 3 (aranya.11.3)

सारसांश्चक्रवाकांश्च नदीपुलिनचारिणः । सरांसि च सपद्मानि युतानि जलजैः खगैः ॥ 11.3 ॥

sārasāṃścakravākāṃśca nadīpulinacāriṇaḥ | sarāṃsi ca sapadmāni yutāni jalajaiḥ khagaiḥ || 11.3 ||

वे नदी-तटों पर विचरते हुए सारस और चक्रवाक पक्षियों को, तथा कमलों से युक्त और जलचर पक्षियों से भरे सरोवरों को देखते गए।

श्लोक 4 (aranya.11.4)

यूथबद्धांश्च पृषतान् मदोन्मत्तान् विषाणिनः । महिषांश्च वराहांश्च गजांश्च द्रुमवैरिणः ॥ 11.4 ॥

yūthabaddhāṃśca pṛṣatān madonmattān viṣāṇinaḥ | mahiṣāṃśca varāhāṃśca gajāṃśca drumavairiṇaḥ || 11.4 ||

वे झुंड में विचरते चित्रित मृगों को, मद से उन्मत्त सींगधारी पशुओं को, भैंसों को, सूअरों को, और वृक्षों के मानो शत्रु हाथियों को देखते हुए चलते रहे।

श्लोक 5 (aranya.11.5)

ते गत्वा दूरमध्वानं लम्बमाने दिवाकरे । ददृशुः सहिता रम्यं तटाकं योजनायुतम् ॥ 11.5 ॥

te gatvā dūramadhvānaṃ lambamāne divākare | dadṛśuḥ sahitā ramyaṃ taṭākaṃ yojanāyutam || 11.5 ||

दूर तक चलकर, जब सूर्य ढलने को था, तब उन्होंने साथ मिलकर एक योजन विस्तार वाला सुंदर सरोवर देखा —

श्लोक 6 (aranya.11.6)

पद्मपुष्करसम्बाधं गजयूथैरलंकृतम् । सारसैर्हंसकादम्बैः संकुलं जलजातिभिः ॥ 11.6 ॥

padmapuṣkarasambādhaṃ gajayūthairalaṃkṛtam | sārasairhaṃsakādambaiḥ saṃkulaṃ jalajātibhiḥ || 11.6 ||

— जो कमलों और कमलिनियों से भरा था, गजयूथों से सुशोभित था, और सारसों, हंसों, कादंबों तथा अन्य जलचरों से व्याप्त था।

श्लोक 7 (aranya.11.7)

प्रसन्नसलिले रम्ये तस्मिन् सरसि शुश्रुवे । गीतवादित्रनिर्घोषो न तु कश्चन दृश्यते ॥ 11.7 ॥

prasannasalile ramye tasmin sarasi śuśruve | gītavāditranirghoṣo na tu kaścana dṛśyate || 11.7 ||

उस निर्मल जल वाले सुंदर सरोवर में से गीत और वाद्य की ध्वनि सुनाई पड़ती थी, किंतु वहाँ कोई भी दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 8 (aranya.11.8)

ततः कौतूहलाद् रामो लक्ष्मणश्च महारथः । मुनिं धर्मभृतं नाम प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ 11.8 ॥

tataḥ kautūhalād rāmo lakṣmaṇaśca mahārathaḥ | muniṃ dharmabhṛtaṃ nāma praṣṭuṃ samupacakrame || 11.8 ||

तब कौतूहलवश राम और महारथी लक्ष्मण ने धर्मभृत नामक मुनि से इस विषय में पूछना आरंभ किया।

श्लोक 9 (aranya.11.9)

इदमत्यद्भुतं श्रुत्वा सर्वेषां नो महामुने । कौतूहलं महज्जातं किमिदं साधु कथ्यताम् ॥ 11.9 ॥

idamatyadbhutaṃ śrutvā sarveṣāṃ no mahāmune | kautūhalaṃ mahajjātaṃ kimidaṃ sādhu kathyatām || 11.9 ||

"हे महामुने, यह अत्यंत अद्भुत ध्वनि सुनकर हम सबके मन में महान कौतूहल उत्पन्न हुआ है। कृपया बताइए कि यह क्या है।"

श्लोक 10 (aranya.11.10)

तेनैवमुक्तो धर्मात्मा राघवेण मुनिस्तदा । प्रभावं सरसः क्षिप्रमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ 11.10 ॥

tenaivamukto dharmātmā rāghaveṇa munistadā | prabhāvaṃ sarasaḥ kṣipramākhyātumupacakrame || 11.10 ||

राघव द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर उस धर्मात्मा मुनि ने तुरंत उस सरोवर की महिमा बताना आरंभ किया।

श्लोक 11 (aranya.11.11)

इदं पञ्चाप्सरो नाम तटाकं सार्वकालिकम् । निर्मितं तपसा राम मुनिना माण्डकर्णिना ॥ 11.11 ॥

idaṃ pañcāpsaro nāma taṭākaṃ sārvakālikam | nirmitaṃ tapasā rāma muninā māṇḍakarṇinā || 11.11 ||

"हे राम, यह सदा से विद्यमान सरोवर पंचाप्सर के नाम से जाना जाता है, जिसे मुनि माण्डकर्णि ने अपने तप के प्रभाव से बनाया था।

श्लोक 12 (aranya.11.12)

स हि तेपे तपस्तीव्रं माण्डकर्णिर्महामुनिः । दशवर्षसहस्राणि वायुभक्षो जलाशये ॥ 11.12 ॥

sa hi tepe tapastīvraṃ māṇḍakarṇirmahāmuniḥ | daśavarṣasahasrāṇi vāyubhakṣo jalāśaye || 11.12 ||

उस महामुनि माण्डकर्णि ने इसी जलाशय में रहकर, केवल वायु का आहार करते हुए, दस हजार वर्षों तक कठोर तप किया।

श्लोक 13 (aranya.11.13)

ततः प्रव्यथिताः सर्वे देवाः साग्निपुरोगमाः । अब्रुवन् वचनं सर्वे परस्परसमागताः ॥ 11.13 ॥

tataḥ pravyathitāḥ sarve devāḥ sāgnipurogamāḥ | abruvan vacanaṃ sarve parasparasamāgatāḥ || 11.13 ||

तब अग्नि को आगे किए हुए सभी देवगण अत्यंत व्याकुल हो उठे, और एक साथ मिलकर आपस में यह कहने लगे —

श्लोक 14 (aranya.11.14)

अस्माकं कस्यचित् स्थानमेष प्रार्थयते मुनिः । इति संविग्नमनसः सर्वे तत्र दिवौकसः ॥ 11.14 ॥

asmākaṃ kasyacit sthānameṣa prārthayate muniḥ | iti saṃvignamanasaḥ sarve tatra divaukasaḥ || 11.14 ||

"यह मुनि निश्चय ही हम में से किसी का पद पाने की कामना कर रहा है" — ऐसा सोचकर वहाँ के सभी देवगण चिंतित हो उठे।

श्लोक 15 (aranya.11.15)

ततः कर्तुं तपोविघ्नं सर्वदेवैर्नियोजिताः । प्रधानाप्सरसः पञ्च विद्युच्चलितवर्चसः ॥ 11.15 ॥

tataḥ kartuṃ tapovighnaṃ sarvadevairniyojitāḥ | pradhānāpsarasaḥ pañca vidyuccalitavarcasaḥ || 11.15 ||

तब उसके तप में विघ्न डालने के लिए समस्त देवताओं ने बिजली के समान चंचल तेज वाली पाँच प्रमुख अप्सराओं को नियुक्त किया।

श्लोक 16 (aranya.11.16)

अप्सरोभिस्ततस्ताभिर्मुनिर्दृष्टपरावरः । नीतो मदनवश्यत्वं देवानां कार्यसिद्धये ॥ 11.16 ॥

apsarobhistatastābhirmunirdṛṣṭaparāvaraḥ | nīto madanavaśyatvaṃ devānāṃ kāryasiddhaye || 11.16 ||

तब उन अप्सराओं द्वारा पर और अपर तत्त्व के ज्ञाता उस मुनि को देवताओं के प्रयोजन की सिद्धि के लिए काम के वशीभूत कर दिया गया।

श्लोक 17 (aranya.11.17)

ताश्चैवाप्सरसः पञ्च मुनेः पत्नीत्वमागताः । तटाके निर्मितं तासां तस्मिन्नन्तर्हितं गृहम् ॥ 11.17 ॥

tāścaivāpsarasaḥ pañca muneḥ patnītvamāgatāḥ | taṭāke nirmitaṃ tāsāṃ tasminnantarhitaṃ gṛham || 11.17 ||

वे ही पाँचों अप्सराएँ उस मुनि की पत्नियाँ बन गईं, और उसने इसी सरोवर के भीतर उनके लिए एक गुप्त भवन बनाया।

श्लोक 18 (aranya.11.18)

तत्रैवाप्सरसः पञ्च निवसन्त्यो यथासुखम् । रमयन्ति तपोयोगान्मुनिं यौवनमास्थितम् ॥ 11.18 ॥

tatraivāpsarasaḥ pañca nivasantyo yathāsukham | ramayanti tapoyogānmuniṃ yauvanamāsthitam || 11.18 ||

वहीं सुखपूर्वक रहते हुए वे पाँचों अप्सराएँ उस मुनि को रमाती हैं, जो तपोबल से पुनः यौवन को प्राप्त हो चुका है।

श्लोक 19 (aranya.11.19)

तासां संक्रीडमानानामेष वादित्रनिःस्वनः । श्रूयते भूषणोन्मिश्रो गीतशब्दो मनोहरः ॥ 11.19 ॥

tāsāṃ saṃkrīḍamānānāmeṣa vāditraniḥsvanaḥ | śrūyate bhūṣaṇonmiśro gītaśabdo manoharaḥ || 11.19 ||

उन्हीं के क्रीड़ा करते समय यह वाद्यों की ध्वनि सुनाई पड़ती है, जो आभूषणों की झंकार से मिश्रित और मनोहर गीत-स्वर से युक्त होती है।"

श्लोक 20 (aranya.11.20)

आश्चर्यमिति तस्यैतद् वचनं भावितात्मनः । राघवः प्रतिजग्राह सह भ्रात्रा महायशाः ॥ 11.20 ॥

āścaryamiti tasyaitad vacanaṃ bhāvitātmanaḥ | rāghavaḥ pratijagrāha saha bhrātrā mahāyaśāḥ || 11.20 ||

"यह तो अत्यंत आश्चर्यजनक है!" — यह कहकर महायशस्वी राघव ने अपने भाई सहित उस पवित्रात्मा मुनि की यह बात सुनी और स्वीकार की।

श्लोक 21 (aranya.11.21)

एवं कथयमानः स ददर्शाश्रममण्डलम् । कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्म्या लक्ष्म्या समावृतम् ॥ 11.21 ॥

evaṃ kathayamānaḥ sa dadarśāśramamaṇḍalam | kuśacīraparikṣiptaṃ brāhmyā lakṣmyā samāvṛtam || 11.21 ||

इस प्रकार बातचीत करते हुए उन्होंने कुश और वल्कल-वस्त्रों से घिरे तथा ब्राह्मी शोभा से आवृत एक आश्रम-मंडल को देखा।

श्लोक 22 (aranya.11.22)

प्रविश्य सह वैदेह्या लक्ष्मणेन च राघवः । तदा तस्मिन् स काकुत्स्थः श्रीमत्याश्रममण्डले ॥ 11.22 ॥

praviśya saha vaidehyā lakṣmaṇena ca rāghavaḥ | tadā tasmin sa kākutsthaḥ śrīmatyāśramamaṇḍale || 11.22 ||

वैदेही और लक्ष्मण सहित उस श्रीसंपन्न आश्रम-मंडल में प्रवेश करके काकुत्स्थकुलभूषण राम वहाँ रहने लगे।

श्लोक 23 (aranya.11.23)

उषित्वा स सुखं तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः । जगाम चाश्रमांस्तेषां पर्यायेण तपस्विनाम् ॥ 11.23 ॥

uṣitvā sa sukhaṃ tatra pūjyamāno maharṣibhiḥ | jagāma cāśramāṃsteṣāṃ paryāyeṇa tapasvinām || 11.23 ||

वहाँ महर्षियों द्वारा सम्मानित होते हुए सुखपूर्वक निवास करने के बाद, वे उन तपस्वियों के आश्रमों में क्रमशः जाने लगे।

श्लोक 24 (aranya.11.24)

येषामुषितवान् पूर्वं सकाशे स महास्त्रवित् । क्वचित् परिदशान् मासानेकसंवत्सरं क्वचित् ॥ 11.24 ॥

yeṣāmuṣitavān pūrvaṃ sakāśe sa mahāstravit | kvacit paridaśān māsānekasaṃvatsaraṃ kvacit || 11.24 ||

वह महान अस्त्रविद्या के ज्ञाता राम पहले भी जिनके यहाँ रह चुके थे, वहाँ वे कहीं लगभग दस महीने, कहीं एक वर्ष ठहरे —

श्लोक 25 (aranya.11.25)

क्वचिच्च चतुरो मासान् पञ्च षट् च परान् क्वचित् । अपरत्राधिकान् मासानध्यर्धमधिकं क्वचित् ॥ 11.25 ॥

kvacicca caturo māsān pañca ṣaṭ ca parān kvacit | aparatrādhikān māsānadhyardhamadhikaṃ kvacit || 11.25 ||

— कहीं चार महीने, कहीं पाँच या छह महीने, कहीं इससे अधिक महीने, तो कहीं डेढ़ महीने से भी अधिक ठहरे।

श्लोक 26 (aranya.11.26)

त्रीन् मासानष्टमासांश्च राघवो न्यवसत् सुखम् । तत्र संवसतस्तस्य मुनीनामाश्रमेषु वै ॥ 11.26 ॥

trīn māsānaṣṭamāsāṃśca rāghavo nyavasat sukham | tatra saṃvasatastasya munīnāmāśrameṣu vai || 11.26 ||

तीन महीने और आठ महीने भी राघव सुखपूर्वक रहे। वहाँ उन मुनियों के आश्रमों में निवास करते हुए —

श्लोक 27 (aranya.11.27)

रमतश्चानुकूल्येन ययुः संवत्सरा दश । परिसृत्य च धर्मज्ञो राघवः सह सीतया ॥ 11.27 ॥

ramataścānukūlyena yayuḥ saṃvatsarā daśa | parisṛtya ca dharmajño rāghavaḥ saha sītayā || 11.27 ||

— अनुकूलतापूर्वक रमण करते हुए उनके दस वर्ष बीत गए। इस प्रकार परिभ्रमण करके धर्मज्ञ राघव सीता सहित —

श्लोक 28 (aranya.11.28)

सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं पुनरेवाजगाम ह । स तमाश्रममागम्य मुनिभिः परिपूजितः ॥ 11.28 ॥

sutīkṣṇasyāśramapadaṃ punarevājagāma ha | sa tamāśramamāgamya munibhiḥ paripūjitaḥ || 11.28 ||

— पुनः सुतीक्ष्ण के आश्रम में आ पहुँचे। उस आश्रम में पहुँचकर वे मुनियों द्वारा भलीभाँति पूजित हुए।

श्लोक 29 (aranya.11.29)

तत्रापि न्यवसद् रामः किंचित् कालमरिंदमः । अथाश्रमस्थो विनयात् कदाचित् तं महामुनिम् ॥ 11.29 ॥

tatrāpi nyavasad rāmaḥ kiṃcit kālamariṃdamaḥ | athāśramastho vinayāt kadācit taṃ mahāmunim || 11.29 ||

वहाँ भी शत्रुदमन राम कुछ समय तक रहे। फिर आश्रम में रहते हुए एक दिन विनयपूर्वक उस महामुनि के समीप बैठे हुए —

श्लोक 30 (aranya.11.30)

उपासीनः स काकुत्स्थः सुतीक्ष्णमिदमब्रवीत् । अस्मिन्नरण्ये भगवन्नगस्त्यो मुनिसत्तमः ॥ 11.30 ॥

upāsīnaḥ sa kākutsthaḥ sutīkṣṇamidamabravīt | asminnaraṇye bhagavannagastyo munisattamaḥ || 11.30 ||

— काकुत्स्थ ने सुतीक्ष्ण से यह कहा — "भगवन्, मैंने सदा दूसरों द्वारा कही गई कथाओं में सुना है कि इस वन में मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य निवास करते हैं —

श्लोक 31 (aranya.11.31)

वसतीति मया नित्यं कथाः कथयतां श्रुतम् । न तु जानामि तं देशं वनस्यास्य महत्तया ॥ 11.31 ॥

vasatīti mayā nityaṃ kathāḥ kathayatāṃ śrutam | na tu jānāmi taṃ deśaṃ vanasyāsya mahattayā || 11.31 ||

— किंतु इस वन की विशालता के कारण मैं उस स्थान को नहीं जानता। उस बुद्धिमान महर्षि का सुंदर आश्रम कहाँ है?

श्लोक 32 (aranya.11.32)

कुत्राश्रमपदं रम्यं महर्षेस्तस्य धीमतः । प्रसादार्थं भगवतः सानुजः सह सीतया ॥ 11.32 ॥

kutrāśramapadaṃ ramyaṃ maharṣestasya dhīmataḥ | prasādārthaṃ bhagavataḥ sānujaḥ saha sītayā || 11.32 ||

मैं अपने भाई और सीता सहित उन भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए —

श्लोक 33 (aranya.11.33)

अगस्त्यमधिगच्छेयमभिवादयितुं मुनिम् । मनोरथो महानेष हृदि सम्परिवर्तते ॥ 11.33 ॥

agastyamadhigaccheyamabhivādayituṃ munim | manoratho mahāneṣa hṛdi samparivartate || 11.33 ||

— मुनि अगस्त्य के पास जाकर उन्हें प्रणाम करना चाहता हूँ; मेरे हृदय में यही महान मनोरथ सदा घूमता रहता है —

श्लोक 34 (aranya.11.34)

यदहं तं मुनिवरं शुश्रूषेयमपि स्वयम् । इति रामस्य स मुनिः श्रुत्वा धर्मात्मनो वचः ॥ 11.34 ॥

yadahaṃ taṃ munivaraṃ śuśrūṣeyamapi svayam | iti rāmasya sa muniḥ śrutvā dharmātmano vacaḥ || 11.34 ||

— कि मैं स्वयं उस श्रेष्ठ मुनि की सेवा करूँ।" धर्मात्मा राम की यह बात सुनकर वह मुनि —

श्लोक 35 (aranya.11.35)

सुतीक्ष्णः प्रत्युवाचेदं प्रीतो दशरथात्मजम् । अहमप्येतदेव त्वां वक्तुकामः सलक्ष्मणम् ॥ 11.35 ॥

sutīkṣṇaḥ pratyuvācedaṃ prīto daśarathātmajam | ahamapyetadeva tvāṃ vaktukāmaḥ salakṣmaṇam || 11.35 ||

— सुतीक्ष्ण ने प्रसन्न होकर दशरथनंदन से यह कहा — "मैं भी लक्ष्मण सहित तुमसे यही कहना चाहता था —

श्लोक 36 (aranya.11.36)

अगस्त्यमभिगच्छेति सीतया सह राघव । दिष्ट्या त्विदानीमर्थेऽस्मिन् स्वयमेव ब्रवीषि माम् ॥ 11.36 ॥

agastyamabhigaccheti sītayā saha rāghava | diṣṭyā tvidānīmarthe'smin svayameva bravīṣi mām || 11.36 ||

— कि हे राघव, सीता सहित तुम अगस्त्य के पास जाओ। सौभाग्य से अब तुम स्वयं ही इस विषय में मुझसे कह रहे हो।

श्लोक 37 (aranya.11.37)

अयमाख्यामि ते राम यत्रागस्त्यो महामुनिः । योजनान्याश्रमात् तात याहि चत्वारि वै ततः । दक्षिणेन महान् श्रीमानगस्त्यभ्रातुराश्रमः ॥ 11.37 ॥

ayamākhyāmi te rāma yatrāgastyo mahāmuniḥ | yojanānyāśramāt tāta yāhi catvāri vai tataḥ | dakṣiṇena mahān śrīmānagastyabhrāturāśramaḥ || 11.37 ||

हे राम, अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि महामुनि अगस्त्य कहाँ रहते हैं। हे तात, इस आश्रम से चार योजन जाओ, वहाँ दक्षिण दिशा में अगस्त्य के भाई का महान और शोभायमान आश्रम है।

श्लोक 38 (aranya.11.38)

स्थलीप्रायवनोद्देशे पिप्पलीवनशोभिते । बहुपुष्पफले रम्ये नानाविहगनादिते ॥ 11.38 ॥

sthalīprāyavanoddeśe pippalīvanaśobhite | bahupuṣpaphale ramye nānāvihaganādite || 11.38 ||

वह एक ऊँचे स्थल वाले वन-प्रदेश में स्थित है, जो पिप्पली के वनों से सुशोभित है, अनेक फूलों और फलों से रमणीय है, और नाना पक्षियों की ध्वनियों से गूँजता रहता है।

श्लोक 39 (aranya.11.39)

पद्मिन्यो विविधास्तत्र प्रसन्नसलिलाशयाः । हंसकारण्डवाकीर्णाश्चक्रवाकोपशोभिताः ॥ 11.39 ॥

padminyo vividhāstatra prasannasalilāśayāḥ | haṃsakāraṇḍavākīrṇāścakravākopaśobhitāḥ || 11.39 ||

वहाँ अनेक कमल-सरोवर हैं, जिनका जल निर्मल है, जो हंसों और कारंडवों से भरे हैं और चक्रवाक पक्षियों से सुशोभित हैं।

श्लोक 40 (aranya.11.40)

तत्रैकां रजनीं व्युष्य प्रभाते राम गम्यताम् । दक्षिणां दिशमास्थाय वनखण्डस्य पार्श्वतः ॥ 11.40 ॥

tatraikāṃ rajanīṃ vyuṣya prabhāte rāma gamyatām | dakṣiṇāṃ diśamāsthāya vanakhaṇḍasya pārśvataḥ || 11.40 ||

हे राम, वहाँ एक रात्रि बिताकर प्रातःकाल दक्षिण दिशा की ओर, उस वनखण्ड के पार्श्व से होकर, आगे बढ़ना।

श्लोक 41 (aranya.11.41)

तत्रागस्त्याश्रमपदं गत्वा योजनमन्तरम् । रमणीये वनोद्देशे बहुपादपशोभिते ॥ 11.41 ॥

tatrāgastyāśramapadaṃ gatvā yojanamantaram | ramaṇīye vanoddeśe bahupādapaśobhite || 11.41 ||

वहाँ से एक योजन और जाने पर अगस्त्य का आश्रम मिलेगा, जो अनेक वृक्षों से सुशोभित एक रमणीय वन-प्रदेश में है —

श्लोक 42 (aranya.11.42)

रंस्यते तत्र वैदेही लक्ष्मणश्च त्वया सह । स हि रम्यो वनोद्देशो बहुपादपसंयुतः ॥ 11.42 ॥

raṃsyate tatra vaidehī lakṣmaṇaśca tvayā saha | sa hi ramyo vanoddeśo bahupādapasaṃyutaḥ || 11.42 ||

— वहाँ वैदेही और लक्ष्मण तुम्हारे साथ आनंदित होंगे, क्योंकि अनेक वृक्षों से युक्त वह वन-प्रदेश अत्यंत रमणीय है।

श्लोक 43 (aranya.11.43)

यदि बुद्धिः कृता द्रष्टुमगस्त्यं तं महामुनिम् । अद्यैव गमने बुद्धिं रोचयस्व महामते ॥ 11.43 ॥

yadi buddhiḥ kṛtā draṣṭumagastyaṃ taṃ mahāmunim | adyaiva gamane buddhiṃ rocayasva mahāmate || 11.43 ||

यदि तुमने उस महामुनि अगस्त्य को देखने का निश्चय कर लिया है, तो हे महामते, आज ही जाने का निश्चय करो।"

श्लोक 44 (aranya.11.44)

इति रामो मुनेः श्रुत्वा सह भ्रात्राभिवाद्य च । प्रतस्थेऽगस्त्यमुद्दिश्य सानुगः सह सीतया ॥ 11.44 ॥

iti rāmo muneḥ śrutvā saha bhrātrābhivādya ca | pratasthe'gastyamuddiśya sānugaḥ saha sītayā || 11.44 ||

मुनि की यह बात सुनकर राम ने अपने भाई सहित उन्हें प्रणाम किया, और अनुचर तथा सीता के साथ अगस्त्य की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 45 (aranya.11.45)

पश्यन् वनानि चित्राणि पर्वतांश्चाभ्रसंनिभान् । सरांसि सरितश्चैव पथि मार्गवशानुगान् ॥ 11.45 ॥

paśyan vanāni citrāṇi parvatāṃścābhrasaṃnibhān | sarāṃsi saritaścaiva pathi mārgavaśānugān || 11.45 ||

विचित्र वनों को, बादलों के समान पर्वतों को, तथा मार्ग के अनुसार बहती नदियों और सरोवरों को देखते हुए —

श्लोक 46 (aranya.11.46)

सुतीक्ष्णेनोपदिष्टेन गत्वा तेन पथा सुखम् । इदं परमसंहृष्टो वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ 11.46 ॥

sutīkṣṇenopadiṣṭena gatvā tena pathā sukham | idaṃ paramasaṃhṛṣṭo vākyaṃ lakṣmaṇamabravīt || 11.46 ||

— सुतीक्ष्ण के बताए हुए उस मार्ग से सुखपूर्वक चलते हुए, वे अत्यंत प्रसन्न होकर लक्ष्मण से यह बोले —

श्लोक 47 (aranya.11.47)

एतदेवाश्रमपदं नूनं तस्य महात्मनः । अगस्त्यस्य मुनेर्भ्रातुर्दृश्यते पुण्यकर्मणः ॥ 11.47 ॥

etadevāśramapadaṃ nūnaṃ tasya mahātmanaḥ | agastyasya munerbhrāturdṛśyate puṇyakarmaṇaḥ || 11.47 ||

"यह निश्चय ही उस महात्मा के आश्रम-स्थान जैसा प्रतीत होता है, जो पुण्यकर्मा मुनि अगस्त्य के भाई हैं।

श्लोक 48 (aranya.11.48)

यथा हीमे वनस्यास्य ज्ञाताः पथि सहस्रशः । संनताः फलभारेण पुष्पभारेण च द्रुमाः ॥ 11.48 ॥

yathā hīme vanasyāsya jñātāḥ pathi sahasraśaḥ | saṃnatāḥ phalabhāreṇa puṣpabhāreṇa ca drumāḥ || 11.48 ||

क्योंकि इस वन के मार्ग में पहचाने जाने वाले हजारों वृक्ष फलों और फूलों के भार से झुके हुए दिखाई देते हैं।

श्लोक 49 (aranya.11.49)

पिप्पलीनां च पक्वानां वनादस्मादुपागतः । गन्धोऽयं पवनोत्क्षिप्तः सहसा कटुकोदयः ॥ 11.49 ॥

pippalīnāṃ ca pakvānāṃ vanādasmādupāgataḥ | gandho'yaṃ pavanotkṣiptaḥ sahasā kaṭukodayaḥ || 11.49 ||

और यह तीखी सुगंध जो वायु द्वारा उठाकर सहसा आ रही है, इसी वन से पकी हुई पिप्पलियों की है।

श्लोक 50 (aranya.11.50)

तत्र तत्र च दृश्यन्ते संक्षिप्ताः काष्ठसंचयाः । लूनाश्च परिदृश्यन्ते दर्भा वैदूर्यवर्चसः ॥ 11.50 ॥

tatra tatra ca dṛśyante saṃkṣiptāḥ kāṣṭhasaṃcayāḥ | lūnāśca paridṛśyante darbhā vaidūryavarcasaḥ || 11.50 ||

यहाँ-वहाँ एकत्रित की गई लकड़ियों के ढेर दिखाई देते हैं, और वैदूर्यमणि के समान चमकते हुए काटे गए दर्भ भी दिखाई पड़ते हैं।

श्लोक 51 (aranya.11.51)

एतच्च वनमध्यस्थं कृष्णाभ्रशिखरोपमम् । पावकस्याश्रमस्थस्य धूमाग्रं सम्प्रदृश्यते ॥ 11.51 ॥

etacca vanamadhyasthaṃ kṛṣṇābhraśikharopamam | pāvakasyāśramasthasya dhūmāgraṃ sampradṛśyate || 11.51 ||

और इस वन के मध्य में स्थित आश्रम की अग्नि का धुआँ काले बादल की चोटी के समान ऊँचा उठता हुआ दिखाई दे रहा है।

श्लोक 52 (aranya.11.52)

विविक्तेषु च तीर्थेषु कृतस्नाना द्विजातयः । पुष्पोपहारं कुर्वन्ति कुसुमैः स्वयमर्जितैः ॥ 11.52 ॥

vivikteṣu ca tīrtheṣu kṛtasnānā dvijātayaḥ | puṣpopahāraṃ kurvanti kusumaiḥ svayamarjitaiḥ || 11.52 ||

और एकांत तीर्थों में स्नान करके ब्राह्मणगण अपने ही हाथों से चुने हुए फूलों द्वारा पुष्पांजलि अर्पित कर रहे हैं।"

श्लोक 53 (aranya.11.53)

ततः सुतीक्ष्णवचनं यथा सौम्य मया श्रुतम् । अगस्त्यस्याश्रमो भ्रातुर्नूनमेष भविष्यति ॥ 11.53 ॥

tataḥ sutīkṣṇavacanaṃ yathā saumya mayā śrutam | agastyasyāśramo bhrāturnūnameṣa bhaviṣyati || 11.53 ||

"तो हे सौम्य लक्ष्मण, जैसा मैंने सुतीक्ष्ण के वचनों से सुना है, यह निश्चय ही अगस्त्य के भाई का आश्रम होगा —

श्लोक 54 (aranya.11.54)

निगृह्य तरसा मृत्युं लोकानां हितकाम्यया । यस्य भ्रात्रा कृतेयं दिक्शरण्या पुण्यकर्मणा ॥ 11.54 ॥

nigṛhya tarasā mṛtyuṃ lokānāṃ hitakāmyayā | yasya bhrātrā kṛteyaṃ dikśaraṇyā puṇyakarmaṇā || 11.54 ||

जिनके भाई ने लोक-कल्याण की इच्छा से बलपूर्वक मृत्यु को रोककर इस दिशा को शरण देने योग्य बनाया।

श्लोक 55 (aranya.11.55)

इहैकदा किल क्रूरो वातापिरपि चेल्वलः । भ्रातरौ सहितावास्तां ब्राह्मणघ्नौ महासुरौ ॥ 11.55 ॥

ihaikadā kila krūro vātāpirapi celvalaḥ | bhrātarau sahitāvāstāṃ brāhmaṇaghnau mahāsurau || 11.55 ||

यहाँ कभी क्रूर वातापि और इल्वल नाम के दो महान असुर भाई साथ-साथ रहते थे, जो ब्राह्मणों का वध किया करते थे।

श्लोक 56 (aranya.11.56)

धारयन् ब्राह्मणं रूपमिल्वलः संस्कृतं वदन् । आमन्त्रयति विप्रान् स श्राद्धमुद्दिश्य निर्घृणः ॥ 11.56 ॥

dhārayan brāhmaṇaṃ rūpamilvalaḥ saṃskṛtaṃ vadan | āmantrayati viprān sa śrāddhamuddiśya nirghṛṇaḥ || 11.56 ||

ब्राह्मण का रूप धारण करके और शुद्ध संस्कृत बोलते हुए वह निर्दय इल्वल श्राद्ध का बहाना बनाकर ब्राह्मणों को आमंत्रित करता था।

श्लोक 57 (aranya.11.57)

भ्रातरं संस्कृतं कृत्वा ततस्तं मेषरूपिणम् । तान् द्विजान् भोजयामास श्राद्धदृष्टेन कर्मणा ॥ 11.57 ॥

bhrātaraṃ saṃskṛtaṃ kṛtvā tatastaṃ meṣarūpiṇam | tān dvijān bhojayāmāsa śrāddhadṛṣṭena karmaṇā || 11.57 ||

फिर मेष-रूपधारी अपने भाई को पकाकर, श्राद्ध-विधि के अनुसार वह उन ब्राह्मणों को भोजन कराता था।

श्लोक 58 (aranya.11.58)

ततो भुक्तवतां तेषां विप्राणामिल्वलोऽब्रवीत् । वातापे निष्क्रमस्वेति स्वरेण महता वदन् ॥ 11.58 ॥

tato bhuktavatāṃ teṣāṃ viprāṇāmilvalo'bravīt | vātāpe niṣkramasveti svareṇa mahatā vadan || 11.58 ||

फिर जब वे ब्राह्मण भोजन कर चुकते, तब इल्वल ऊँचे स्वर में पुकारता था — "हे वातापि, बाहर निकल आओ!"

श्लोक 59 (aranya.11.59)

ततो भ्रातुर्वचः श्रुत्वा वातापिर्मेषवन्नदन् । भित्त्वा भित्त्वा शरीराणि ब्राह्मणानां विनिष्पतत् ॥ 11.59 ॥

tato bhrāturvacaḥ śrutvā vātāpirmeṣavannadan | bhittvā bhittvā śarīrāṇi brāhmaṇānāṃ viniṣpatat || 11.59 ||

तब भाई का स्वर सुनकर वातापि मेढ़े के समान रँभाता हुआ ब्राह्मणों के शरीर को फाड़ते हुए बाहर निकल आता था।

श्लोक 60 (aranya.11.60)

ब्राह्मणानां सहस्राणि तैरेवं कामरूपिभिः । विनाशितानि संहत्य नित्यशः पिशिताशनैः ॥ 11.60 ॥

brāhmaṇānāṃ sahasrāṇi tairevaṃ kāmarūpibhiḥ | vināśitāni saṃhatya nityaśaḥ piśitāśanaiḥ || 11.60 ||

इस प्रकार वे रूप बदलने वाले मांसभक्षी दोनों भाई मिलकर सदा हजारों ब्राह्मणों का विनाश करते रहते थे।

श्लोक 61 (aranya.11.61)

अगस्त्येन तदा देवैः प्रार्थितेन महर्षिणा । अनुभूय किल श्राद्धे भक्षितः स महासुरः ॥ 11.61 ॥

agastyena tadā devaiḥ prārthitena maharṣiṇā | anubhūya kila śrāddhe bhakṣitaḥ sa mahāsuraḥ || 11.61 ||

तब देवताओं द्वारा प्रार्थना किए गए महर्षि अगस्त्य ने श्राद्ध में उस भोजन को ग्रहण करके उस महान असुर को अपने भीतर पचा लिया।

श्लोक 62 (aranya.11.62)

ततः सम्पन्नमित्युक्त्वा दत्त्वा हस्तेऽवनेजनम् । भ्रातरं निष्क्रमस्वेति चेल्वलः समभाषत ॥ 11.62 ॥

tataḥ sampannamityuktvā dattvā haste'vanejanam | bhrātaraṃ niṣkramasveti celvalaḥ samabhāṣata || 11.62 ||

तब "कार्य संपन्न हो गया" ऐसा कहकर, हाथ धोने के लिए जल देकर, इल्वल ने अपने भाई को पुकारते हुए कहा — "बाहर निकल आओ!"

श्लोक 63 (aranya.11.63)

स तदा भाषमाणं तु भ्रातरं विप्रघातिनम् । अब्रवीत् प्रहसन् धीमानगस्त्यो मुनिसत्तमः ॥ 11.63 ॥

sa tadā bhāṣamāṇaṃ tu bhrātaraṃ vipraghātinam | abravīt prahasan dhīmānagastyo munisattamaḥ || 11.63 ||

तब अपने ब्राह्मण-घातक भाई को इस प्रकार पुकारते हुए इल्वल से बुद्धिमान मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ने हँसते हुए कहा —

श्लोक 64 (aranya.11.64)

कुतो निष्क्रमितुं शक्तिर्मया जीर्णस्य रक्षसः । भ्रातुस्तु मेषरूपस्य गतस्य यमसादनम् ॥ 11.64 ॥

kuto niṣkramituṃ śaktirmayā jīrṇasya rakṣasaḥ | bhrātustu meṣarūpasya gatasya yamasādanam || 11.64 ||

"मेढ़े के रूप में रहे तुम्हारे उस भाई राक्षस के लिए बाहर निकलने की शक्ति कहाँ से होगी, जिसे मैं पचा चुका हूँ और जो यमलोक जा चुका है?"

श्लोक 65 (aranya.11.65)

अथ तस्य वचः श्रुत्वा भ्रातुर्निधनसंश्रितम् । प्रधर्षयितुमारेभे मुनिं क्रोधान्निशाचरः ॥ 11.65 ॥

atha tasya vacaḥ śrutvā bhrāturnidhanasaṃśritam | pradharṣayitumārebhe muniṃ krodhānniśācaraḥ || 11.65 ||

तब अपने भाई की मृत्यु की सूचना देने वाले उन वचनों को सुनकर वह निशाचर क्रोध से उस मुनि पर आक्रमण करने लगा।

श्लोक 66 (aranya.11.66)

सोऽभ्यद्रवद् द्विजेन्द्रं तं मुनिना दीप्ततेजसा । चक्षुषानलकल्पेन निर्दग्धो निधनं गतः ॥ 11.66 ॥

so'bhyadravad dvijendraṃ taṃ muninā dīptatejasā | cakṣuṣānalakalpena nirdagdho nidhanaṃ gataḥ || 11.66 ||

वह उस ब्राह्मणश्रेष्ठ पर झपटा, किंतु प्रज्वलित तेज वाले उस मुनि ने अग्नि के समान अपनी दृष्टि से ही उसे भस्म कर मृत्यु के मुख में पहुँचा दिया।

श्लोक 67 (aranya.11.67)

तस्यायमाश्रमो भ्रातुस्तटाकवनशोभितः । विप्रानुकम्पया येन कर्मेदं दुष्करं कृतम् ॥ 11.67 ॥

tasyāyamāśramo bhrātustaṭākavanaśobhitaḥ | viprānukampayā yena karmedaṃ duṣkaraṃ kṛtam || 11.67 ||

वह यही तालाब और वन से सुशोभित आश्रम है, उनके भाई का, जिन्होंने ब्राह्मणों के प्रति करुणावश यह दुष्कर कार्य किया था।"

श्लोक 68 (aranya.11.68)

एवं कथयमानस्य तस्य सौमित्रिणा सह । रामस्यास्तं गतः सूर्यः संध्याकालोऽभ्यवर्तत ॥ 11.68 ॥

evaṃ kathayamānasya tasya saumitriṇā saha | rāmasyāstaṃ gataḥ sūryaḥ saṃdhyākālo'bhyavartata || 11.68 ||

इस प्रकार सौमित्र के साथ बातचीत करते हुए राम के लिए सूर्य अस्त हो गया और संध्या का समय आ पहुँचा।

श्लोक 69 (aranya.11.69)

उपास्य पश्चिमां संध्यां सह भ्रात्रा यथाविधि । प्रविवेशाश्रमपदं तमृषिं चाभ्यवादयत् ॥ 11.69 ॥

upāsya paścimāṃ saṃdhyāṃ saha bhrātrā yathāvidhi | praviveśāśramapadaṃ tamṛṣiṃ cābhyavādayat || 11.69 ||

भाई सहित विधिपूर्वक सायं-संध्या करके उन्होंने आश्रम में प्रवेश किया और उस ऋषि को प्रणाम किया।

श्लोक 70 (aranya.11.70)

सम्यक्प्रतिगृहीतस्तु मुनिना तेन राघवः । न्यवसत् तां निशामेकां प्राश्य मूलफलानि च ॥ 11.70 ॥

samyakpratigṛhītastu muninā tena rāghavaḥ | nyavasat tāṃ niśāmekāṃ prāśya mūlaphalāni ca || 11.70 ||

उस मुनि द्वारा भलीभाँति सत्कारित होकर राघव ने कंद-मूल और फल खाकर वहाँ वह एक रात्रि व्यतीत की।

श्लोक 71 (aranya.11.71)

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामुदिते रविमण्डले । भ्रातरं तमगस्त्यस्य आमन्त्रयत राघवः ॥ 11.71 ॥

tasyāṃ rātryāṃ vyatītāyāmudite ravimaṇḍale | bhrātaraṃ tamagastyasya āmantrayata rāghavaḥ || 11.71 ||

वह रात्रि बीत जाने पर और सूर्यमंडल के उदित होने पर राघव ने अगस्त्य के उस भाई से विदा माँगते हुए कहा —

श्लोक 72 (aranya.11.72)

अभिवादये त्वां भगवन् सुखमस्म्युषितो निशाम् । आमन्त्रये त्वां गच्छामि गुरुं ते द्रष्टुमग्रजम् ॥ 11.72 ॥

abhivādaye tvāṃ bhagavan sukhamasmyuṣito niśām | āmantraye tvāṃ gacchāmi guruṃ te draṣṭumagrajam || 11.72 ||

"हे भगवन्, मैं आपको प्रणाम करता हूँ; मैंने यह रात्रि सुखपूर्वक बिताई। अब मैं आपसे विदा लेता हूँ और आपके गुरुतुल्य बड़े भाई के दर्शन के लिए जाता हूँ।"

श्लोक 73 (aranya.11.73)

गम्यतामिति तेनोक्तो जगाम रघुनन्दनः । यथोद्दिष्टेन मार्गेण वनं तच्चावलोकयन् ॥ 11.73 ॥

gamyatāmiti tenokto jagāma raghunandanaḥ | yathoddiṣṭena mārgeṇa vanaṃ taccāvalokayan || 11.73 ||

उसके द्वारा "जाओ" कहे जाने पर रघुनंदन उस बताए गए मार्ग से, उस वन को देखते हुए आगे चल पड़े।

श्लोक 74 (aranya.11.74)

नीवारान् पनसान् सालान् वञ्जुलांस्तिनिशांस्तथा । चिरिबिल्वान् मधूकांश्च बिल्वानथ च तिन्दुकान् ॥ 11.74 ॥

nīvārān panasān sālān vañjulāṃstiniśāṃstathā | ciribilvān madhūkāṃśca bilvānatha ca tindukān || 11.74 ||

वे नीवार, कटहल, साल, वंजुल और तिनिश वृक्षों को, तथा चिरिबिल्व, महुआ, बेल और तेंदू के वृक्षों को देखते हुए आगे बढ़े।

श्लोक 75 (aranya.11.75)

पुष्पितान् पुष्पिताग्राभिर्लताभिरुपशोभितान् । ददर्श रामः शतशस्तत्र कान्तारपादपान् ॥ 11.75 ॥

puṣpitān puṣpitāgrābhirlatābhirupaśobhitān | dadarśa rāmaḥ śataśastatra kāntārapādapān || 11.75 ||

राम ने वहाँ सैकड़ों वन-वृक्षों को देखा, जो फूलों से लदे थे, जिनके सिरे तक फूली हुई लताओं से सुशोभित थे —

श्लोक 76 (aranya.11.76)

हस्तिहस्तैर्विमृदितान् वानरैरुपशोभितान् । मत्तैः शकुनिसङ्घैश्च शतशः प्रतिनादितान् ॥ 11.76 ॥

hastihastairvimṛditān vānarairupaśobhitān | mattaiḥ śakunisaṅghaiśca śataśaḥ pratināditān || 11.76 ||

— जो हाथियों की सूँड़ों से मसले गए थे, वानरों से सुशोभित थे, और मतवाले पक्षी-समूहों की ध्वनि से सैकड़ों बार गूँज रहे थे।

श्लोक 77 (aranya.11.77)

ततोऽब्रवीत् समीपस्थं रामो राजीवलोचनः । पृष्ठतोऽनुगतं वीरं लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम् ॥ 11.77 ॥

tato'bravīt samīpasthaṃ rāmo rājīvalocanaḥ | pṛṣṭhato'nugataṃ vīraṃ lakṣmaṇaṃ lakṣmivardhanam || 11.77 ||

तब कमल-नयन राम ने अपने पीछे-पीछे चलते हुए, यश बढ़ाने वाले वीर लक्ष्मण से, जो समीप ही थे, यह कहा —

श्लोक 78 (aranya.11.78)

स्निग्धपत्रा यथा वृक्षा यथा क्षान्ता मृगद्विजाः । आश्रमो नातिदूरस्थो महर्षेर्भावितात्मनः ॥ 11.78 ॥

snigdhapatrā yathā vṛkṣā yathā kṣāntā mṛgadvijāḥ | āśramo nātidūrastho maharṣerbhāvitātmanaḥ || 11.78 ||

"जैसे यहाँ वृक्षों के पत्ते चिकने और सुंदर हैं, और मृग-पक्षी इतने निर्भय हैं, इससे लगता है कि उस भावितात्मा महर्षि का आश्रम अधिक दूर नहीं है।

श्लोक 79 (aranya.11.79)

अगस्त्य इति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा । आश्रमो दृश्यते तस्य परिश्रान्तश्रमापहः ॥ 11.79 ॥

agastya iti vikhyāto loke svenaiva karmaṇā | āśramo dṛśyate tasya pariśrāntaśramāpahaḥ || 11.79 ||

अपने ही कर्मों से संसार में अगस्त्य नाम से विख्यात उनका ही यह आश्रम प्रतीत होता है, जो थके हुओं की थकान दूर कर देता है।

श्लोक 80 (aranya.11.80)

प्राज्यधूमाकुलवनश्चीरमालापरिष्कृतः । प्रशान्तमृगयूथश्च नानाशकुनिनादितः ॥ 11.80 ॥

prājyadhūmākulavanaścīramālāpariṣkṛtaḥ | praśāntamṛgayūthaśca nānāśakunināditaḥ || 11.80 ||

इसका वन प्रचुर धुएँ से व्याप्त है, वल्कल की मालाओं से सुसज्जित है, इसमें मृगों के झुंड पूर्णतः शांत हैं, और यह नाना पक्षियों की ध्वनि से गूँजता है।

श्लोक 81 (aranya.11.81)

निगृह्य तरसा मृत्युं लोकानां हितकाम्यया । दक्षिणा दिक् कृता येन शरण्या पुण्यकर्मणा ॥ 11.81 ॥

nigṛhya tarasā mṛtyuṃ lokānāṃ hitakāmyayā | dakṣiṇā dik kṛtā yena śaraṇyā puṇyakarmaṇā || 11.81 ||

यह उन्हीं का आश्रम है, जिन्होंने अपने बल से मृत्यु को रोककर, लोक-कल्याण की इच्छा से, अपने पुण्य-कर्मों द्वारा दक्षिण दिशा को शरण देने योग्य बनाया।

श्लोक 82 (aranya.11.82)

तस्येदमाश्रमपदं प्रभावाद् यस्य राक्षसैः । दिगियं दक्षिणा त्रासाद् दृश्यते नोपभुज्यते ॥ 11.82 ॥

tasyedamāśramapadaṃ prabhāvād yasya rākṣasaiḥ | digiyaṃ dakṣiṇā trāsād dṛśyate nopabhujyate || 11.82 ||

यह उन्हीं का आश्रम है, जिनके प्रभाव से राक्षस इस दक्षिण दिशा को भय के कारण केवल देखते ही हैं, उसका उपभोग नहीं कर पाते।

श्लोक 83 (aranya.11.83)

यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा । तदाप्रभृति निर्वैराः प्रशान्ता रजनीचराः ॥ 11.83 ॥

yadāprabhṛti cākrāntā digiyaṃ puṇyakarmaṇā | tadāprabhṛti nirvairāḥ praśāntā rajanīcarāḥ || 11.83 ||

जब से इस दिशा को उस पुण्यकर्मा ने अपने अधीन किया, तब से निशाचर वैरभाव त्याग कर शांत हो गए हैं।

श्लोक 84 (aranya.11.84)

नाम्ना चेयं भगवतो दक्षिणा दिक्प्रदक्षिणा । प्रथिता त्रिषु लोकेषु दुर्धर्षा क्रूरकर्मभिः ॥ 11.84 ॥

nāmnā ceyaṃ bhagavato dakṣiṇā dikpradakṣiṇā | prathitā triṣu lokeṣu durdharṣā krūrakarmabhiḥ || 11.84 ||

उन भगवान के नाम से यह दक्षिण दिशा प्रदक्षिणा योग्य बन गई है, और तीनों लोकों में क्रूरकर्मा राक्षसों के लिए भी दुर्धर्ष होने के कारण विख्यात है।

श्लोक 85 (aranya.11.85)

मार्गं निरोद्धुं सततं भास्करस्याचलोत्तमः । संदेशं पालयंस्तस्य विन्ध्यशैलो न वर्धते ॥ 11.85 ॥

mārgaṃ niroddhuṃ satataṃ bhāskarasyācalottamaḥ | saṃdeśaṃ pālayaṃstasya vindhyaśailo na vardhate || 11.85 ||

सूर्य का मार्ग सदा रोकने का प्रयास करने वाला विंध्य पर्वत, उन्हीं की आज्ञा का पालन करते हुए अब और नहीं बढ़ता।

श्लोक 86 (aranya.11.86)

अयं दीर्घायुषस्तस्य लोके विश्रुतकर्मणः । अगस्त्यस्याश्रमः श्रीमान् विनीतमृगसेवितः ॥ 11.86 ॥

ayaṃ dīrghāyuṣastasya loke viśrutakarmaṇaḥ | agastyasyāśramaḥ śrīmān vinītamṛgasevitaḥ || 11.86 ||

यही उन दीर्घायु और लोकविख्यात कर्मों वाले अगस्त्य का श्रीसंपन्न आश्रम है, जहाँ विनम्र मृग निवास करते हैं।

श्लोक 87 (aranya.11.87)

एष लोकार्चितः साधुर्हिते नित्यं रतः सताम् । अस्मानधिगतानेष श्रेयसा योजयिष्यति ॥ 11.87 ॥

eṣa lokārcitaḥ sādhurhite nityaṃ rataḥ satām | asmānadhigatāneṣa śreyasā yojayiṣyati || 11.87 ||

लोकपूजित यह साधु सदा सज्जनों के हित में लगे रहते हैं; जब हम उनके पास पहुँचेंगे, तो वे हमें अवश्य कल्याण से युक्त करेंगे।

श्लोक 88 (aranya.11.88)

आराधयिष्याम्यत्राहमगस्त्यं तं महामुनिम् । शेषं च वनवासस्य सौम्य वत्स्याम्यहं प्रभो ॥ 11.88 ॥

ārādhayiṣyāmyatrāhamagastyaṃ taṃ mahāmunim | śeṣaṃ ca vanavāsasya saumya vatsyāmyahaṃ prabho || 11.88 ||

यहीं मैं उन महामुनि अगस्त्य की आराधना करूँगा, और हे सौम्य, यहीं मैं अपने शेष वनवास को व्यतीत करूँगा।

श्लोक 89 (aranya.11.89)

अत्र देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । अगस्त्यं नियताहाराः सततं पर्युपासते ॥ 11.89 ॥

atra devāḥ sagandharvāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ | agastyaṃ niyatāhārāḥ satataṃ paryupāsate || 11.89 ||

यहाँ गंधर्वों सहित देवगण, सिद्ध, और परम ऋषिगण संयमित आहार लेते हुए सदा अगस्त्य की सेवा में रहते हैं।

श्लोक 90 (aranya.11.90)

नात्र जीवेन्मृषावादी क्रूरो वा यदि वा शठः । नृशंसः पापवृत्तो वा मुनिरेष तथाविधः ॥ 11.90 ॥

nātra jīvenmṛṣāvādī krūro vā yadi vā śaṭhaḥ | nṛśaṃsaḥ pāpavṛtto vā munireṣa tathāvidhaḥ || 11.90 ||

यहाँ न कोई झूठा, न क्रूर, न कपटी, न निर्दयी और न पापाचारी जीवित रह सकता है — ऐसे ही स्वभाव वाले हैं ये मुनि।

श्लोक 91 (aranya.11.91)

अत्र देवाश्च यक्षाश्च नागाश्च पतगैः सह । वसन्ति नियताहारा धर्ममाराधयिष्णवः ॥ 11.91 ॥

atra devāśca yakṣāśca nāgāśca patagaiḥ saha | vasanti niyatāhārā dharmamārādhayiṣṇavaḥ || 11.91 ||

यहाँ देवता, यक्ष और नाग, पक्षियों के साथ मिलकर, संयमित आहार लेते हुए, धर्म की आराधना में लगे रहते हैं।

श्लोक 92 (aranya.11.92)

अत्र सिद्धा महात्मानो विमानैः सूर्यसंनिभैः । त्यक्त्वा देहान् नवैर्देहैः स्वर्याताः परमर्षयः ॥ 11.92 ॥

atra siddhā mahātmāno vimānaiḥ sūryasaṃnibhaiḥ | tyaktvā dehān navairdehaiḥ svaryātāḥ paramarṣayaḥ || 11.92 ||

यहाँ महात्मा सिद्धगण और परम ऋषिगण अपने पुराने शरीर त्यागकर नए दिव्य शरीरों सहित सूर्य के समान तेजस्वी विमानों में स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 93 (aranya.11.93)

यक्षत्वममरत्वं च राज्यानि विविधानि च । अत्र देवाः प्रयच्छन्ति भूतैराराधिताः शुभैः ॥ 11.93 ॥

yakṣatvamamaratvaṃ ca rājyāni vividhāni ca | atra devāḥ prayacchanti bhūtairārādhitāḥ śubhaiḥ || 11.93 ||

यहाँ पवित्र प्राणियों द्वारा आराधित होकर देवता यक्षत्व, अमरत्व और नाना प्रकार के राज्य प्रदान करते हैं।

श्लोक 94 (aranya.11.94)

आगताः स्माश्रमपदं सौमित्रे प्रविशाग्रतः । निवेदयेह मां प्राप्तमृषये सह सीतया ॥ 11.94 ॥

āgatāḥ smāśramapadaṃ saumitre praviśāgrataḥ | nivedayeha māṃ prāptamṛṣaye saha sītayā || 11.94 ||

हे सौमित्र, हम आश्रम-स्थान तक आ पहुँचे हैं; तुम आगे जाकर यह निवेदन करो कि मैं सीता सहित यहाँ आ पहुँचा हूँ।"

सर्ग 10सर्ग-सूचीसर्ग 12