Skip to main content

अरण्यकाण्ड · सर्ग 13

पंचवटी का मार्ग

सर्ग 12सर्ग-सूचीसर्ग 14

श्लोक 1 (aranya.13.1)

राम प्रीतोऽस्मि भद्रं ते परितुष्टोऽस्मि लक्ष्मण । अभिवादयितुं यन्मां प्राप्तौ स्थः सह सीतया ॥ 13.1 ॥

rāma prīto'smi bhadraṃ te parituṣṭo'smi lakṣmaṇa | abhivādayituṃ yanmāṃ prāptau sthaḥ saha sītayā || 13.1 ||

"हे राम, मैं प्रसन्न हूँ; तुम्हारा कल्याण हो। हे लक्ष्मण, मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ कि तुम दोनों सीता सहित मुझे प्रणाम करने आए हो।

श्लोक 2 (aranya.13.2)

अध्वश्रमेण वां खेदो बाधते प्रचुरश्रमः । व्यक्तमुत्कण्ठते वापि मैथिली जनकात्मजा ॥ 13.2 ॥

adhvaśrameṇa vāṃ khedo bādhate pracuraśramaḥ | vyaktamutkaṇṭhate vāpi maithilī janakātmajā || 13.2 ||

मार्ग की थकान से उत्पन्न प्रचुर श्रम तुम दोनों को कष्ट पहुँचा रहा होगा, और स्पष्ट है कि जनकनंदिनी मैथिली भी इससे व्याकुल होंगी।

श्लोक 3 (aranya.13.3)

एषा च सुकुमारी च खेदैश्च न विमानिता । प्राज्यदोषं वनं प्राप्ता भर्तृस्नेहप्रचोदिता ॥ 13.3 ॥

eṣā ca sukumārī ca khedaiśca na vimānitā | prājyadoṣaṃ vanaṃ prāptā bhartṛsnehapracoditā || 13.3 ||

यह अत्यंत सुकुमारी होते हुए भी, जो पहले कभी क्लेशों से पीड़ित नहीं हुई, पति के स्नेह से प्रेरित होकर इस दोषपूर्ण वन में आ पहुँची है।

श्लोक 4 (aranya.13.4)

यथैषा रमते राम इह सीता तथा कुरु । दुष्करं कृतवत्येषा वने त्वामभिगच्छती ॥ 13.4 ॥

yathaiṣā ramate rāma iha sītā tathā kuru | duṣkaraṃ kṛtavatyeṣā vane tvāmabhigacchatī || 13.4 ||

हे राम, ऐसा करो कि सीता यहाँ प्रसन्न रह सकें; क्योंकि वन में तुम्हारे साथ आकर उन्होंने एक अत्यंत कठिन कार्य किया है।

श्लोक 5 (aranya.13.5)

एषा हि प्रकृतिः स्त्रीणामासृष्टे रघुनन्दन । समस्थमनुरज्यन्ते विषमस्थं त्यजन्ति च ॥ 13.5 ॥

eṣā hi prakṛtiḥ strīṇāmāsṛṣṭe raghunandana | samasthamanurajyante viṣamasthaṃ tyajanti ca || 13.5 ||

हे रघुनंदन, सृष्टि के आरंभ से ही स्त्रियों का यह स्वभाव रहा है — वे सुख की अवस्था में अनुरक्त रहती हैं और विपत्ति में साथ छोड़ देती हैं।

श्लोक 6 (aranya.13.6)

शतह्रदानां लोलत्वं शस्त्राणां तीक्ष्णतां तथा । गरुडानिलयोः शैघ्र्यमनुगच्छन्ति योषितः ॥ 13.6 ॥

śatahradānāṃ lolatvaṃ śastrāṇāṃ tīkṣṇatāṃ tathā | garuḍānilayoḥ śaighryamanugacchanti yoṣitaḥ || 13.6 ||

स्त्रियाँ बिजली की चंचलता, शस्त्रों की तीक्ष्णता, तथा गरुड़ और वायु की गति का अनुसरण करती हैं — ऐसा उनका सामान्य स्वभाव है।

श्लोक 7 (aranya.13.7)

इयं तु भवतो भार्या दोषैरेतैर्विवर्जिता । श्लाघ्या च व्यपदेश्या च यथा देवीष्वरुन्धती ॥ 13.7 ॥

iyaṃ tu bhavato bhāryā doṣairetairvivarjitā | ślāghyā ca vyapadeśyā ca yathā devīṣvarundhatī || 13.7 ||

किंतु तुम्हारी यह पत्नी इन सब दोषों से रहित है — यह प्रशंसनीय और आदर्श रूप में उल्लेख योग्य है, जैसे देवियों में अरुंधती।

श्लोक 8 (aranya.13.8)

अलंकृतोऽयं देशश्च यत्र सौमित्रिणा सह । वैदेह्या चानया राम वत्स्यसि त्वमरिंदम ॥ 13.8 ॥

alaṃkṛto'yaṃ deśaśca yatra saumitriṇā saha | vaidehyā cānayā rāma vatsyasi tvamariṃdama || 13.8 ||

हे शत्रुदमन राम, जिस भी प्रदेश में तुम सौमित्र और इस वैदेही के साथ निवास करोगे, वह प्रदेश अलंकृत हो जाएगा।"

श्लोक 9 (aranya.13.9)

एवमुक्तस्तु मुनिना राघवः संयताञ्जलिः । उवाच प्रश्रितं वाक्यमृषिं दीप्तमिवानलम् ॥ 13.9 ॥

evamuktastu muninā rāghavaḥ saṃyatāñjaliḥ | uvāca praśritaṃ vākyamṛṣiṃ dīptamivānalam || 13.9 ||

मुनि द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर राघव ने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर अग्नि के समान तेजस्वी उस ऋषि से यह विनीत वचन कहा —

श्लोक 10 (aranya.13.10)

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगवः । गुणैः सभ्रातृभार्यस्य गुरुर्नः परितुष्यति ॥ 13.10 ॥

dhanyo'smyanugṛhīto'smi yasya me munipuṃgavaḥ | guṇaiḥ sabhrātṛbhāryasya gururnaḥ parituṣyati || 13.10 ||

"मैं धन्य हूँ, कृतार्थ हूँ, कि यह मुनिश्रेष्ठ हमारे गुरु, भाई और पत्नी सहित मेरे गुणों से प्रसन्न हैं।

श्लोक 11 (aranya.13.11)

किं तु व्यादिश मे देशं सोदकं बहुकाननम् । यत्राश्रमपदं कृत्वा वसेयं निरतः सुखम् ॥ 13.11 ॥

kiṃ tu vyādiśa me deśaṃ sodakaṃ bahukānanam | yatrāśramapadaṃ kṛtvā vaseyaṃ nirataḥ sukham || 13.11 ||

किंतु कृपया मुझे जल और वनों से परिपूर्ण कोई स्थान बताइए, जहाँ आश्रम बनाकर मैं सुखपूर्वक और स्थिरतापूर्वक निवास कर सकूँ।"

श्लोक 12 (aranya.13.12)

ततोऽब्रवीन्मुनिश्रेष्ठः श्रुत्वा रामस्य भाषितम् । ध्यात्वा मुहूर्तं धर्मात्मा ततोवाच वचः शुभम् ॥ 13.12 ॥

tato'bravīnmuniśreṣṭhaḥ śrutvā rāmasya bhāṣitam | dhyātvā muhūrtaṃ dharmātmā tatovāca vacaḥ śubham || 13.12 ||

तब राम की यह बात सुनकर उस मुनिश्रेष्ठ ने एक क्षण विचार किया, और फिर उस धर्मात्मा ने यह शुभ वचन कहा —

श्लोक 13 (aranya.13.13)

इतो द्वियोजने तात बहुमूलफलोदकः । देशो बहुमृगः श्रीमान् पञ्चवट्यभिविश्रुतः ॥ 13.13 ॥

ito dviyojane tāta bahumūlaphalodakaḥ | deśo bahumṛgaḥ śrīmān pañcavaṭyabhiviśrutaḥ || 13.13 ||

"हे तात, यहाँ से दो योजन दूर कंद-मूल, फल और जल से भरपूर, अनेक मृगों से युक्त, श्रीसंपन्न प्रदेश है, जो पंचवटी के नाम से विख्यात है।

श्लोक 14 (aranya.13.14)

तत्र गत्वाऽऽश्रमपदं कृत्वा सौमित्रिणा सह । रमस्व त्वं पितुर्वाक्यं यथोक्तमनुपालयन् ॥ 13.14 ॥

tatra gatvā''śramapadaṃ kṛtvā saumitriṇā saha | ramasva tvaṃ piturvākyaṃ yathoktamanupālayan || 13.14 ||

वहाँ जाकर सौमित्र के साथ आश्रम बनाकर, पिता की आज्ञा का यथावत् पालन करते हुए, वहाँ आनंदपूर्वक निवास करो।

श्लोक 15 (aranya.13.15)

विदितो ह्येष वृत्तान्तो मम सर्वस्तवानघ । तपसश्च प्रभावेण स्नेहाद् दशरथस्य च ॥ 13.15 ॥

vidito hyeṣa vṛttānto mama sarvastavānagha | tapasaśca prabhāveṇa snehād daśarathasya ca || 13.15 ||

हे निष्पाप, तुम्हारा यह सारा वृत्तांत मुझे ज्ञात है — अपने तप के प्रभाव से, और दशरथ के प्रति मेरे स्नेह के कारण भी।

श्लोक 16 (aranya.13.16)

हृदयस्थं च ते च्छन्दो विज्ञातं तपसा मया । इह वासं प्रतिज्ञाय मया सह तपोवने ॥ 13.16 ॥

hṛdayasthaṃ ca te cchando vijñātaṃ tapasā mayā | iha vāsaṃ pratijñāya mayā saha tapovane || 13.16 ||

तुम्हारे हृदय में जो इच्छा है, वह भी मैंने अपने तप से जान ली है — यद्यपि मैं तुम्हें यहीं इस तपोवन में मेरे साथ रहने का निमंत्रण दे सकता था,

श्लोक 17 (aranya.13.17)

अतश्च त्वामहं ब्रूमि गच्छ पञ्चवटीमिति । स हि रम्यो वनोद्देशो मैथिली तत्र रंस्यते ॥ 13.17 ॥

ataśca tvāmahaṃ brūmi gaccha pañcavaṭīmiti | sa hi ramyo vanoddeśo maithilī tatra raṃsyate || 13.17 ||

— फिर भी मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम पंचवटी जाओ। वह वनप्रदेश अत्यंत रमणीय है, और वहाँ मैथिली आनंदित रहेंगी।

श्लोक 18 (aranya.13.18)

स देशः श्लाघनीयश्च नातिदूरे च राघव । गोदावर्याः समीपे च मैथिली तत्र रंस्यते ॥ 13.18 ॥

sa deśaḥ ślāghanīyaśca nātidūre ca rāghava | godāvaryāḥ samīpe ca maithilī tatra raṃsyate || 13.18 ||

हे राघव, वह प्रदेश प्रशंसनीय है और यहाँ से अधिक दूर नहीं है; गोदावरी के समीप होने से वहाँ भी मैथिली आनंदित रहेंगी।

श्लोक 19 (aranya.13.19)

प्राज्यमूलफलैश्चैव नानाद्विजगणैर्युतः । विविक्तश्च महाबाहो पुण्यो रम्यस्तथैव च ॥ 13.19 ॥

prājyamūlaphalaiścaiva nānādvijagaṇairyutaḥ | viviktaśca mahābāho puṇyo ramyastathaiva ca || 13.19 ||

वह प्रचुर कंद-मूल और फलों से युक्त है, नाना पक्षी-समूहों से भरा है; हे महाबाहु, वह एकांत, पवित्र और उतना ही रमणीय भी है।

श्लोक 20 (aranya.13.20)

भवानपि सदाचारः शक्तश्च परिरक्षणे । अपि चात्र वसन् राम तापसान् पालयिष्यसि ॥ 13.20 ॥

bhavānapi sadācāraḥ śaktaśca parirakṣaṇe | api cātra vasan rāma tāpasān pālayiṣyasi || 13.20 ||

हे राम, तुम भी सदाचारी और रक्षा करने में समर्थ हो; वहाँ रहते हुए तुम तपस्वियों की भी रक्षा करोगे।

श्लोक 21 (aranya.13.21)

एतदालक्ष्यते वीर मधूकानां महावनम् । उत्तरेणास्य गन्तव्यं न्यग्रोधमपि गच्छता ॥ 13.21 ॥

etadālakṣyate vīra madhūkānāṃ mahāvanam | uttareṇāsya gantavyaṃ nyagrodhamapi gacchatā || 13.21 ||

हे वीर, यह देखो महुए के वृक्षों का विशाल वन; इससे उत्तर की ओर जाते हुए तुम्हें एक वटवृक्ष तक पहुँचना है।

श्लोक 22 (aranya.13.22)

ततः स्थलमुपारुह्य पर्वतस्याविदूरतः । ख्यातः पञ्चवटीत्येव नित्यपुष्पितकाननः ॥ 13.22 ॥

tataḥ sthalamupāruhya parvatasyāvidūrataḥ | khyātaḥ pañcavaṭītyeva nityapuṣpitakānanaḥ || 13.22 ||

फिर उस स्थल पर चढ़कर, जो एक पर्वत से अधिक दूर नहीं है, वहीं पंचवटी नाम से विख्यात, सदा पुष्पित वन-प्रदेश मिलेगा।"

श्लोक 23 (aranya.13.23)

अगस्त्येनैवमुक्तस्तु रामः सौमित्रिणा सह । सत्कृत्यामन्त्रयामास तमृषिं सत्यवादिनम् ॥ 13.23 ॥

agastyenaivamuktastu rāmaḥ saumitriṇā saha | satkṛtyāmantrayāmāsa tamṛṣiṃ satyavādinam || 13.23 ||

अगस्त्य द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर राम ने सौमित्र सहित उस सत्यवादी ऋषि का सत्कार करके उनसे विदा ली।

श्लोक 24 (aranya.13.24)

तौ तु तेनाभ्यनुज्ञातौ कृतपादाभिवन्दनौ । तमाश्रमं पञ्चवटीं जग्मतुः सह सीतया ॥ 13.24 ॥

tau tu tenābhyanujñātau kṛtapādābhivandanau | tamāśramaṃ pañcavaṭīṃ jagmatuḥ saha sītayā || 13.24 ||

उनकी आज्ञा पाकर और उनके चरणों में प्रणाम करके, वे दोनों भाई सीता सहित उस पंचवटी आश्रम-स्थान की ओर चल पड़े।

श्लोक 25 (aranya.13.25)

गृहीतचापौ तु नराधिपात्मजौ । विषक्ततूणी समरेष्वकातरौ । यथोपदिष्टेन पथा महर्षिणा । प्रजग्मतुः पञ्चवटीं समाहितौ ॥ 13.25 ॥

gṛhītacāpau tu narādhipātmajau | viṣaktatūṇī samareṣvakātarau | yathopadiṣṭena pathā maharṣiṇā | prajagmatuḥ pañcavaṭīṃ samāhitau || 13.25 ||

धनुष हाथों में लिए, तरकश बाँधे, युद्ध में निर्भय वे दोनों राजकुमार, महर्षि के बताए हुए मार्ग से, एकाग्रचित्त होकर पंचवटी की ओर चल पड़े।

सर्ग 12सर्ग-सूचीसर्ग 14