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अरण्यकाण्ड · सर्ग 14

जटायु से भेंट

सर्ग 13सर्ग-सूचीसर्ग 15

श्लोक 1 (aranya.14.1)

अथ पञ्चवटीं गच्छन्नन्तरा रघुनन्दनः । आससाद महाकायं गृध्रं भीमपराक्रमम् ॥ 14.1 ॥

atha pañcavaṭīṃ gacchannantarā raghunandanaḥ | āsasāda mahākāyaṃ gṛdhraṃ bhīmaparākramam || 14.1 ||

फिर पंचवटी की ओर जाते हुए मार्ग में रघुनंदन राम को एक विशालकाय और भयंकर पराक्रमी गिद्ध दिखाई दिया।

श्लोक 2 (aranya.14.2)

तं दृष्ट्वा तौ महाभागौ वनस्थं रामलक्ष्मणौ । मेनाते राक्षसं पक्षिं ब्रुवाणौ को भवानिति ॥ 14.2 ॥

taṃ dṛṣṭvā tau mahābhāgau vanasthaṃ rāmalakṣmaṇau | menāte rākṣasaṃ pakṣiṃ bruvāṇau ko bhavāniti || 14.2 ||

वन में स्थित उस पक्षी को देखकर महाभाग्यशाली राम और लक्ष्मण ने उसे राक्षस समझा और पूछा — "तुम कौन हो?"

श्लोक 3 (aranya.14.3)

स तौ मधुरया वाचा सौम्यया प्रीणयन्निव । उवाच वत्स मां विद्धि वयस्यं पितुरात्मनः ॥ 14.3 ॥

sa tau madhurayā vācā saumyayā prīṇayanniva | uvāca vatsa māṃ viddhi vayasyaṃ piturātmanaḥ || 14.3 ||

उसने मानो उन्हें प्रसन्न करते हुए मधुर और सौम्य वाणी में कहा — "हे वत्स, मुझे अपने पिता का सखा जानो।"

श्लोक 4 (aranya.14.4)

स तं पितृसखं मत्वा पूजयामास राघवः । स तस्य कुलमव्यग्रमथ पप्रच्छ नाम च ॥ 14.4 ॥

sa taṃ pitṛsakhaṃ matvā pūjayāmāsa rāghavaḥ | sa tasya kulamavyagramatha papraccha nāma ca || 14.4 ||

उसे पिता का मित्र मानकर राघव ने उसका सम्मान किया, और फिर शांतिपूर्वक उसका कुल और नाम पूछा।

श्लोक 5 (aranya.14.5)

रामस्य वचनं श्रुत्वा कुलमात्मानमेव च । आचचक्षे द्विजस्तस्मै सर्वभूतसमुद्भवम् ॥ 14.5 ॥

rāmasya vacanaṃ śrutvā kulamātmānameva ca | ācacakṣe dvijastasmai sarvabhūtasamudbhavam || 14.5 ||

राम का यह प्रश्न सुनकर उस पक्षी ने अपना कुल और अपना परिचय बताया, और साथ ही समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन किया।

श्लोक 6 (aranya.14.6)

पूर्वकाले महाबाहो ये प्रजापतयोऽभवन् । तान् मे निगदतः सर्वानादितः शृणु राघव ॥ 14.6 ॥

pūrvakāle mahābāho ye prajāpatayo'bhavan | tān me nigadataḥ sarvānāditaḥ śṛṇu rāghava || 14.6 ||

"हे महाबाहु राघव, प्राचीन काल में जो प्रजापति हुए, उन सबका वर्णन मुझसे आदि से सुनो।

श्लोक 7 (aranya.14.7)

कर्दमः प्रथमस्तेषां विकृतस्तदनन्तरम् । शेषश्च संश्रयश्चैव बहुपुत्रश्च वीर्यवान् ॥ 14.7 ॥

kardamaḥ prathamasteṣāṃ vikṛtastadanantaram | śeṣaśca saṃśrayaścaiva bahuputraśca vīryavān || 14.7 ||

उनमें सबसे पहले कर्दम थे, फिर विकृत; फिर शेष और संश्रय भी, जो पराक्रमी थे और जिनके अनेक पुत्र थे।

श्लोक 8 (aranya.14.8)

स्थाणुर्मरीचिरत्रिश्च क्रतुश्चैव महाबलः । पुलस्त्यश्चाङ्गिराश्चैव प्रचेताः पुलहस्तथा ॥ 14.8 ॥

sthāṇurmarīciratriśca kratuścaiva mahābalaḥ | pulastyaścāṅgirāścaiva pracetāḥ pulahastathā || 14.8 ||

स्थाणु, मरीचि और अत्रि, तथा महाबली क्रतु; पुलस्त्य और अंगिरा, प्रचेता, और उसी प्रकार पुलह।

श्लोक 9 (aranya.14.9)

दक्षो विवस्वानपरोऽरिष्टनेमिश्च राघव । कश्यपश्च महातेजास्तेषामासीच्च पश्चिमः ॥ 14.9 ॥

dakṣo vivasvānaparo'riṣṭanemiśca rāghava | kaśyapaśca mahātejāsteṣāmāsīcca paścimaḥ || 14.9 ||

दक्ष, और विवस्वान, तथा अरिष्टनेमि भी, हे राघव; और उन सबमें अंत में महातेजस्वी कश्यप हुए।

श्लोक 10 (aranya.14.10)

प्रजापतेस्तु दक्षस्य बभूवुरिति नः श्रुतम् । षष्टिर्दुहितरो राम यशस्विन्यो महायशः ॥ 14.10 ॥

prajāpatestu dakṣasya babhūvuriti naḥ śrutam | ṣaṣṭirduhitaro rāma yaśasvinyo mahāyaśaḥ || 14.10 ||

हे यशस्वी राम, ऐसा सुना जाता है कि प्रजापति दक्ष की साठ अत्यंत यशस्विनी पुत्रियाँ थीं।

श्लोक 11 (aranya.14.11)

कश्यपः प्रतिजग्राह तासामष्टौ सुमध्यमाः । अदितिं च दितिं चैव दनुमपि च कालकाम् ॥ 14.11 ॥

kaśyapaḥ pratijagrāha tāsāmaṣṭau sumadhyamāḥ | aditiṃ ca ditiṃ caiva danumapi ca kālakām || 14.11 ||

उनमें से कश्यप ने आठ सुंदर मध्यभाग वाली कन्याओं को पत्नी रूप में ग्रहण किया — अदिति, दिति, दनु और कालका,

श्लोक 12 (aranya.14.12)

ताम्रां क्रोधवशां चैव मनुं चाप्यनलामपि । तास्तु कन्यास्ततः प्रीतः कश्यपः पुनरब्रवीत् ॥ 14.12 ॥

tāmrāṃ krodhavaśāṃ caiva manuṃ cāpyanalāmapi | tāstu kanyāstataḥ prītaḥ kaśyapaḥ punarabravīt || 14.12 ||

और ताम्रा, क्रोधवशा, मनु, तथा अनला को भी। फिर उन कन्याओं से प्रसन्न होकर कश्यप ने पुनः कहा —

श्लोक 13 (aranya.14.13)

पुत्रांस्त्रैलोक्यभर्तॄन् वै जनयिष्यथ मत्समान् । अदितिस्तन्मना राम दितिश्च दनुरेव च ॥ 14.13 ॥

putrāṃstrailokyabhartṝn vai janayiṣyatha matsamān | aditistanmanā rāma ditiśca danureva ca || 14.13 ||

"तुम मेरे समान पुत्रों को जन्म दोगी, जो तीनों लोकों का भरण करने वाले होंगे।" हे राम, इस पर अदिति ने पूर्ण मन से सहमति दी, और दिति तथा दनु ने भी,

श्लोक 14 (aranya.14.14)

कालका च महाबाहो शेषास्त्वमनसोऽभवन् । अदित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिंशदरिंदम ॥ 14.14 ॥

kālakā ca mahābāho śeṣāstvamanaso'bhavan | adityāṃ jajñire devāstrayastriṃśadariṃdama || 14.14 ||

और कालका ने भी, हे महाबाहु; किंतु शेष कन्याएँ इसके लिए अनिच्छुक रहीं। हे शत्रुदमन, अदिति से तैंतीस देवता उत्पन्न हुए —

श्लोक 15 (aranya.14.15)

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च परंतप । दितिस्त्वजनयत् पुत्रान् दैत्यांस्तात यशस्विनः ॥ 14.15 ॥

ādityā vasavo rudrā aśvinau ca paraṃtapa | ditistvajanayat putrān daityāṃstāta yaśasvinaḥ || 14.15 ||

— आदित्य, वसु, रुद्र और दोनों अश्विनीकुमार, हे परंतप। और दिति ने पुत्रों को जन्म दिया, हे तात, यशस्वी दैत्यों को।

श्लोक 16 (aranya.14.16)

तेषामियं वसुमती पुरासीत् सवनार्णवा । दनुस्त्वजनयत् पुत्रमश्वग्रीवमरिंदम ॥ 14.16 ॥

teṣāmiyaṃ vasumatī purāsīt savanārṇavā | danustvajanayat putramaśvagrīvamariṃdama || 14.16 ||

पहले यह सागर और वनों सहित पृथ्वी उन्हीं की थी। और दनु ने एक पुत्र को जन्म दिया, हे शत्रुदमन, अश्वग्रीव को,

श्लोक 17 (aranya.14.17)

नरकं कालकं चैव कालकापि व्यजायत । क्रौञ्चीं भासीं तथा श्येनीं धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम् ॥ 14.17 ॥

narakaṃ kālakaṃ caiva kālakāpi vyajāyata | krauñcīṃ bhāsīṃ tathā śyenīṃ dhṛtarāṣṭrīṃ tathā śukīm || 14.17 ||

और कालका ने भी नरक और कालक को जन्म दिया। और ताम्रा ने क्रौंची, भासी, श्येनी, धृतराष्ट्री और शुकी को जन्म दिया —

श्लोक 18 (aranya.14.18)

ताम्रापि सुषुवे कन्याः पञ्चैता लोकविश्रुताः । उलूकाञ् जनयत् क्रौञ्ची भासी भासान् व्यजायत ॥ 14.18 ॥

tāmrāpi suṣuve kanyāḥ pañcaitā lokaviśrutāḥ | ulūkāñ janayat krauñcī bhāsī bhāsān vyajāyata || 14.18 ||

— ये पाँच पुत्रियाँ संसार में विख्यात हुईं। क्रौंची ने उल्लुओं को जन्म दिया, भासी ने गिद्धों को जन्म दिया,

श्लोक 19 (aranya.14.19)

श्येनी श्येनांश्च गृध्रांश्च व्यजायत सुतेजसः । धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसांश्च सर्वशः ॥ 14.19 ॥

śyenī śyenāṃśca gṛdhrāṃśca vyajāyata sutejasaḥ | dhṛtarāṣṭrī tu haṃsāṃśca kalahaṃsāṃśca sarvaśaḥ || 14.19 ||

श्येनी ने बाजों और तेजस्वी गिद्धों को जन्म दिया, और धृतराष्ट्री ने हंसों और समस्त प्रकार के कलहंसों को जन्म दिया,

श्लोक 20 (aranya.14.20)

चक्रवाकांश्च भद्रं ते विजज्ञे सापि भामिनी । शुकी नतां विजज्ञे तु नताया विनता सुता ॥ 14.20 ॥

cakravākāṃśca bhadraṃ te vijajñe sāpi bhāminī | śukī natāṃ vijajñe tu natāyā vinatā sutā || 14.20 ||

— और उस सुंदरी ने चक्रवाकों को भी जन्म दिया, तुम्हारा कल्याण हो। और शुकी ने नता को जन्म दिया, तथा नता की पुत्री विनता हुई।

श्लोक 21 (aranya.14.21)

दश क्रोधवशा राम विजज्ञेऽप्यात्मसम्भवाः । मृगीं च मृगमन्दां च हरीं भद्रमदामपि ॥ 14.21 ॥

daśa krodhavaśā rāma vijajñe'pyātmasambhavāḥ | mṛgīṃ ca mṛgamandāṃ ca harīṃ bhadramadāmapi || 14.21 ||

हे राम, क्रोधवशा ने अपने ही समान दस पुत्रियों को जन्म दिया — मृगी, मृगमंदा, हरी, भद्रमदा,

श्लोक 22 (aranya.14.22)

मातंगीमथ शार्दूलीं श्वेतां च सुरभीं तथा । सर्वलक्षणसम्पन्नां सुरसां कद्रुकामपि ॥ 14.22 ॥

mātaṃgīmatha śārdūlīṃ śvetāṃ ca surabhīṃ tathā | sarvalakṣaṇasampannāṃ surasāṃ kadrukāmapi || 14.22 ||

और मातंगी, शार्दूली, श्वेता, तथा सुरभी को भी, और समस्त शुभ लक्षणों से संपन्न सुरसा और कद्रू को भी।

श्लोक 23 (aranya.14.23)

अपत्यं तु मृगाः सर्वे मृग्या नरवरोत्तम । ऋक्षाश्च मृगमन्दायाः सृमराश्चमरास्तथा ॥ 14.23 ॥

apatyaṃ tu mṛgāḥ sarve mṛgyā naravarottama | ṛkṣāśca mṛgamandāyāḥ sṛmarāścamarāstathā || 14.23 ||

हे नरवरोत्तम, सभी मृग मृगी की ही संतान हैं; और मृगमंदा से भालू, सृमर और चमरी गाय उत्पन्न हुए।

श्लोक 24 (aranya.14.24)

ततस्त्विरावतीं नाम जज्ञे भद्रमदा सुताम् । तस्यास्त्वैरावतः पुत्रो लोकनाथो महागजः ॥ 14.24 ॥

tatastvirāvatīṃ nāma jajñe bhadramadā sutām | tasyāstvairāvataḥ putro lokanātho mahāgajaḥ || 14.24 ||

फिर भद्रमदा ने इरावती नामक पुत्री को जन्म दिया, जिसका पुत्र लोकनाथ महागज ऐरावत हुआ।

श्लोक 25 (aranya.14.25)

हर्याश्च हरयोऽपत्यं वानराश्च तपस्विनः । गोलाङ्गूलांश्च शार्दूली व्याघ्रांश्चाजनयत् सुतान् ॥ 14.25 ॥

haryāśca harayo'patyaṃ vānarāśca tapasvinaḥ | golāṅgūlāṃśca śārdūlī vyāghrāṃścājanayat sutān || 14.25 ||

हरी से सिंह उत्पन्न हुए, और तपस्वी वानर तथा गोलांगूल (लंगूर) भी; और शार्दूली ने व्याघ्रों को पुत्रों के रूप में जन्म दिया।

श्लोक 26 (aranya.14.26)

मातंग्यास्त्वथ मातंगा अपत्यं मनुजर्षभ । दिशागजं तु श्वेताक्षं श्वेता व्यजनयत् सुतम् ॥ 14.26 ॥

mātaṃgyāstvatha mātaṃgā apatyaṃ manujarṣabha | diśāgajaṃ tu śvetākṣaṃ śvetā vyajanayat sutam || 14.26 ||

हे मनुजश्रेष्ठ, मातंगी से मातंग नामक हाथियों की संतति हुई; और हे काकुत्स्थ, श्वेता ने दिशाओं के रक्षक श्वेत हाथियों को जन्म दिया।

श्लोक 27 (aranya.14.27)

ततो दुहितरौ राम सुरभिर्देव्यजायत । रोहिणीं नाम भद्रं ते गन्धर्वीं च यशस्विनीम् ॥ 14.27 ॥

tato duhitarau rāma surabhirdevyajāyata | rohiṇīṃ nāma bhadraṃ te gandharvīṃ ca yaśasvinīm || 14.27 ||

फिर, हे राम, सुरभी ने दो पुत्रियों को जन्म दिया — रोहिणी नाम की, तुम्हारा कल्याण हो, और यशस्विनी गंधर्वी को।

श्लोक 28 (aranya.14.28)

रोहिण्यजनयद् गा वै गन्धर्वी वाजिनः सुतान् । सुरसाजनयन् नागान् राम कद्रूश्च पन्नगान् ॥ 14.28 ॥

rohiṇyajanayad gā vai gandharvī vājinaḥ sutān | surasājanayan nāgān rāma kadrūśca pannagān || 14.28 ||

रोहिणी ने गौओं को जन्म दिया, और गंधर्वी ने घोड़ों को अपनी संतान रूप में। सुरसा ने नागों को जन्म दिया, और हे राम, कद्रू ने सर्पों को।

श्लोक 29 (aranya.14.29)

मनुर्मनुष्याञ् जनयत् कश्यपस्य महात्मनः । ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्याञ् शूद्रांश्च मनुजर्षभ ॥ 14.29 ॥

manurmanuṣyāñ janayat kaśyapasya mahātmanaḥ | brāhmaṇān kṣatriyān vaiśyāñ śūdrāṃśca manujarṣabha || 14.29 ||

महात्मा कश्यप की पत्नी मनु ने मनुष्यों को जन्म दिया — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, हे मनुजश्रेष्ठ।

श्लोक 30 (aranya.14.30)

मुखतो ब्राह्मणा जाता उरसः क्षत्रियास्तथा । ऊरुभ्यां जज्ञिरे वैश्याः पद्भ्यां शूद्रा इति श्रुतिः ॥ 14.30 ॥

mukhato brāhmaṇā jātā urasaḥ kṣatriyāstathā | ūrubhyāṃ jajñire vaiśyāḥ padbhyāṃ śūdrā iti śrutiḥ || 14.30 ||

मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए, और उसी प्रकार वक्षस्थल से क्षत्रिय; जांघों से वैश्य उत्पन्न हुए, और चरणों से शूद्र — ऐसा श्रुति में वर्णित है।

श्लोक 31 (aranya.14.31)

सर्वान् पुण्यफलान् वृक्षाननलापि व्यजायत । विनता च शुकी पौत्री कद्रूश्च सुरसा स्वसा ॥ 14.31 ॥

sarvān puṇyaphalān vṛkṣānanalāpi vyajāyata | vinatā ca śukī pautrī kadrūśca surasā svasā || 14.31 ||

अनला ने समस्त पुण्यफल देने वाले वृक्षों को जन्म दिया। विनता शुकी की पौत्री थी, और कद्रू सुरसा की बहन थी।

श्लोक 32 (aranya.14.32)

कद्रूर्नागं सहस्रं तु विजज्ञे धरणीधरम् । द्वौ पुत्रौ विनतायास्तु गरुडोऽरुण एव च ॥ 14.32 ॥

kadrūrnāgaṃ sahasraṃ tu vijajñe dharaṇīdharam | dvau putrau vinatāyāstu garuḍo'ruṇa eva ca || 14.32 ||

कद्रू ने सहस्र नागों को तथा पृथ्वी को धारण करने वाले नागराज को जन्म दिया; और विनता को दो पुत्र हुए, गरुड़ और अरुण।

श्लोक 33 (aranya.14.33)

तस्माज्जातोऽहमरुणात् सम्पातिश्च ममाग्रजः । जटायुरिति मां विद्धि श्येनीपुत्रमरिंदम ॥ 14.33 ॥

tasmājjāto'hamaruṇāt sampātiśca mamāgrajaḥ | jaṭāyuriti māṃ viddhi śyenīputramariṃdama || 14.33 ||

उन्हीं अरुण से मेरा जन्म हुआ, और संपाति मेरा बड़ा भाई है। हे शत्रुदमन, मुझे जटायु के नाम से जानो, उसी श्येनी-वंश का पुत्र।

श्लोक 34 (aranya.14.34)

सोऽहं वाससहायस्ते भविष्यामि यदीच्छसि । इदं दुर्गं हि कान्तारं मृगराक्षससेवितम् । सीतां च तात रक्षिष्ये त्वयि याते सलक्ष्मणे ॥ 14.34 ॥

so'haṃ vāsasahāyaste bhaviṣyāmi yadīcchasi | idaṃ durgaṃ hi kāntāraṃ mṛgarākṣasasevitam | sītāṃ ca tāta rakṣiṣye tvayi yāte salakṣmaṇe || 14.34 ||

यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हारे निवास में तुम्हारा सहायक बनूँगा; क्योंकि यह दुर्गम वन हिंसक पशुओं और राक्षसों से भरा है। और हे तात, जब तुम लक्ष्मण सहित बाहर जाओगे, तब मैं सीता की रक्षा करूँगा।"

श्लोक 35 (aranya.14.35)

जटायुषं तु प्रतिपूज्य राघवो मुदा परिष्वज्य च संनतोऽभवत् । पितुर्हि शुश्राव सखित्वमात्मवाञ् जटायुषा संकथितं पुनः पुनः ॥ 14.35 ॥

jaṭāyuṣaṃ tu pratipūjya rāghavo mudā pariṣvajya ca saṃnato'bhavat | piturhi śuśrāva sakhitvamātmavāñ jaṭāyuṣā saṃkathitaṃ punaḥ punaḥ || 14.35 ||

राघव ने प्रसन्नतापूर्वक जटायु का सम्मान करके उन्हें आलिंगन किया और उनके समक्ष झुक गए; क्योंकि उस आत्मसंयमी राम ने जटायु से बार-बार अपने पिता की मित्रता की कथा सुनी थी।

श्लोक 36 (aranya.14.36)

स तत्र सीतां परिदाय मैथिलीं सहैव तेनातिबलेन पक्षिणा । जगाम तां पञ्चवटीं सलक्ष्मणो रिपून् दिधक्षञ् शलभानिवानलः ॥ 14.36 ॥

sa tatra sītāṃ paridāya maithilīṃ sahaiva tenātibalena pakṣiṇā | jagāma tāṃ pañcavaṭīṃ salakṣmaṇo ripūn didhakṣañ śalabhānivānalaḥ || 14.36 ||

तब मैथिली सीता को उस अत्यंत बलशाली पक्षी की देखरेख में सौंपकर, वे लक्ष्मण सहित पंचवटी की ओर चल पड़े — मानो अग्नि अपने शत्रुओं को टिड्डियों के समान भस्म करने को उद्यत हो।

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