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अरण्यकाण्ड · सर्ग 18

शूर्पणखा का विरूपण

सर्ग 17सर्ग-सूचीसर्ग 19

श्लोक 1 (aranya.18.1)

ताम् तु शूर्पणखाम् रामः काम पाश अवपाशिताम् | स्वच्छ्हया श्लक्ष्णया वाचा स्मित पूर्वम् अथ अब्रवीत् ॥ 18.1 ॥

tām tu śūrpaṇakhām rāmaḥ kāma pāśa avapāśitām | svacchhayā ślakṣṇayā vācā smita pūrvam atha abravīt || 18.1 ||

तब राम ने कामपाश में बँधी उस शूर्पणखा से मुस्कुराते हुए स्पष्ट और मृदु वाणी में यह कहा।

श्लोक 2 (aranya.18.2)

कृत दारो अस्मि भवति भार्या इयम् दयिता मम | त्वत् विधानाम् तु नारीणाम् सुदुःखा ससपत्नता ॥ 18.2 ॥

kṛta dāro asmi bhavati bhāryā iyam dayitā mama | tvat vidhānām tu nārīṇām suduḥkhā sasapatnatā || 18.2 ||

"हे भद्रे! मैं विवाहित हूँ और यह मेरी प्रिय पत्नी है। तुम्हारे जैसी स्त्रियों के लिए सौत के साथ रहना अत्यन्त दुःखदायी होगा।

श्लोक 3 (aranya.18.3)

अनुजः तु एष मे भ्राता शीलवान् प्रिय दर्शनः | श्रीमान् अकृत दारः च लक्ष्मणो नाम वीर्यवान् ॥ 18.3 ॥

anujaḥ tu eṣa me bhrātā śīlavān priya darśanaḥ | śrīmān akṛta dāraḥ ca lakṣmaṇo nāma vīryavān || 18.3 ||

यह मेरा छोटा भाई है, लक्ष्मण नामवाला, सुशील, सुन्दर, यशस्वी और पराक्रमी — और यह अभी तक अविवाहित है।

श्लोक 4 (aranya.18.4)

अपूर्वी भार्यया च अर्थी तरुणः प्रिय दर्शनः | अनुरूपः च ते भर्ता रूपस्य अस्य भविष्यति ॥ 18.4 ॥

apūrvī bhāryayā ca arthī taruṇaḥ priya darśanaḥ | anurūpaḥ ca te bhartā rūpasya asya bhaviṣyati || 18.4 ||

यह बिना पत्नी के है और पत्नी की आवश्यकता है, युवा और सुन्दर है; तुम्हारे रूप के अनुरूप यह तुम्हारा पति बन सकता है।

श्लोक 5 (aranya.18.5)

एनम् भज विशालाक्षि भर्तारम् भ्रातरम् मम | असपत्ना वरारोहे मेरुम् अर्क प्रभा यथा ॥ 18.5 ॥

enam bhaja viśālākṣi bhartāram bhrātaram mama | asapatnā varārohe merum arka prabhā yathā || 18.5 ||

हे विशालाक्षी! तुम मेरे इस भाई को अपना पति बनाओ, जैसे सूर्य की प्रभा मेरु पर्वत को चाहती है — फिर तुम बिना किसी सौत के रह सकोगी।"

श्लोक 6 (aranya.18.6)

इति रामेण सा प्रोक्ता राक्षसी काम मोहिता | विसृज्य रामम् सहसा ततो लक्ष्मणम् अब्रवीत् ॥ 18.6 ॥

iti rāmeṇa sā proktā rākṣasī kāma mohitā | visṛjya rāmam sahasā tato lakṣmaṇam abravīt || 18.6 ||

राम द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, काम से मोहित वह राक्षसी तत्काल राम को छोड़कर लक्ष्मण के पास गई और बोली —

श्लोक 7 (aranya.18.7)

अस्य रूपस्य ते युक्ता भार्या अहम् वरवर्णिनी | मया सह सुखम् सर्वान् दण्डकान् विचरिष्यसि ॥ 18.7 ॥

asya rūpasya te yuktā bhāryā aham varavarṇinī | mayā saha sukham sarvān daṇḍakān vicariṣyasi || 18.7 ||

"मैं सुन्दर वर्णवाली तुम्हारे इस रूप के योग्य पत्नी हूँ; मेरे साथ तुम सारे दण्डकारण्य में सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे।"

श्लोक 8 (aranya.18.8)

एवम् उक्तः तु सौमित्री राक्षस्या वाक्य कोविदः | ततः शूर्पणखीम् स्मित्वा लक्ष्मणो युक्तम् अब्रवीत् ॥ 18.8 ॥

evam uktaḥ tu saumitrī rākṣasyā vākya kovidaḥ | tataḥ śūrpaṇakhīm smitvā lakṣmaṇo yuktam abravīt || 18.8 ||

राक्षसी द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वाक्य में निपुण सौमित्र लक्ष्मण मुस्कुराए और शूर्पणखा को उचित उत्तर दिया —

श्लोक 9 (aranya.18.9)

कथम् दासस्य मे दासी भार्या भवितुम् इच्छ्हसि | सो अहम् आर्येण परवान् भ्रात्रा कमल वर्णिनी ॥ 18.9 ॥

katham dāsasya me dāsī bhāryā bhavitum icchhasi | so aham āryeṇa paravān bhrātrā kamala varṇinī || 18.9 ||

"हे कमलवर्णे! मुझ जैसे दास की तुम दासी बनना क्यों चाहती हो? मैं तो अपने आर्य बड़े भाई के अधीन हूँ।

श्लोक 10 (aranya.18.10)

समृद्ध अर्थस्य सिद्धार्था मुदित अमल वर्णिनी | आर्यस्य त्वम् विशालाक्षि भार्या भव यवीयसी ॥ 18.10 ॥

samṛddha arthasya siddhārthā mudita amala varṇinī | āryasya tvam viśālākṣi bhāryā bhava yavīyasī || 18.10 ||

हे विशालाक्षी! तुम निर्मल वर्णवाली हो, समृद्ध और श्रेष्ठ आर्य की छोटी पत्नी बन जाओ; तब तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा और तुम सुखी होओगी।

श्लोक 11 (aranya.18.11)

एनाम् विरूपाम् असतीम् करालाम् निर्णत उदरीम् | भार्याम् वृद्धाम् परित्यज्य त्वाम् एव एष भजिष्यति ॥ 18.11 ॥

enām virūpām asatīm karālām nirṇata udarīm | bhāryām vṛddhām parityajya tvām eva eṣa bhajiṣyati || 18.11 ||

इस विकृत, कुटिल, खोखले पेटवाली वृद्धा पत्नी को त्यागकर वे निश्चय ही तुम्हें ही अपनाएँगे।"

श्लोक 12 (aranya.18.12)

को हि रूपम् इदम् श्रेष्ठम् संत्यज्य वरवर्णिनि | मानुषेषु वरारोहे कुर्यात् भावम् विचक्षणः ॥ 18.12 ॥

ko hi rūpam idam śreṣṭham saṃtyajya varavarṇini | mānuṣeṣu varārohe kuryāt bhāvam vicakṣaṇaḥ || 18.12 ||

"हे सुन्दरी! भला कौन बुद्धिमान् पुरुष तुम्हारे जैसे श्रेष्ठ रूप को त्यागकर साधारण मानुषियों में मन लगाएगा?" ऐसा लक्ष्मण ने कहा।

श्लोक 13 (aranya.18.13)

इति सा लक्ष्मणेन उक्ता कराला निर्णतोदरी | मन्यते तत् वचः सत्यम् परिहास अविचक्षणा ॥ 18.13 ॥

iti sā lakṣmaṇena uktā karālā nirṇatodarī | manyate tat vacaḥ satyam parihāsa avicakṣaṇā || 18.13 ||

लक्ष्मण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह विकृत और स्थूलोदरी राक्षसी, परिहास को न समझते हुए, उन वचनों को सत्य मान बैठी।

श्लोक 14 (aranya.18.14)

सा रामम् पर्णशालायाम् उपविष्टम् परंतपम् | सीतया सह दुर्धर्षम् अब्रवीत् काम मोहिता ॥ 18.14 ॥

sā rāmam parṇaśālāyām upaviṣṭam paraṃtapam | sītayā saha durdharṣam abravīt kāma mohitā || 18.14 ||

काम से मोहित वह राक्षसी फिर सीता के साथ पर्णशाला में बैठे उन अजेय शत्रुतापन राम के पास गई और बोली —

श्लोक 15 (aranya.18.15)

इमाम् विरूपाम् असतीम् करालाम् निर्णतोदरीम् | वृद्धाम् भार्याम् अवष्टभ्य न माम् त्वम् बहु मन्यसे ॥ 18.15 ॥

imām virūpām asatīm karālām nirṇatodarīm | vṛddhām bhāryām avaṣṭabhya na mām tvam bahu manyase || 18.15 ||

"इस विकृत, कुटिल, खोखले पेटवाली वृद्धा पत्नी से आसक्त होकर तुम मुझे अधिक महत्त्व नहीं दे रहे हो।

श्लोक 16 (aranya.18.16)

अद्य इमाम् भक्षयिष्यामि पश्यतः तव मानुषीम् | त्वया सह चरिष्यामि निःसपत्ना यथा सुखम् ॥ 18.16 ॥

adya imām bhakṣayiṣyāmi paśyataḥ tava mānuṣīm | tvayā saha cariṣyāmi niḥsapatnā yathā sukham || 18.16 ||

आज ही मैं तुम्हारे देखते-देखते इस मानुषी को खा जाऊँगी, और फिर बिना किसी सौत के तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचरण करूँगी।"

श्लोक 17 (aranya.18.17)

इति उक्त्वा मृगशावाक्षीम् अलात सदृश ईक्षणा | अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धा महा उल्का रोहिणीम् इव ॥ 18.17 ॥

iti uktvā mṛgaśāvākṣīm alāta sadṛśa īkṣaṇā | abhyadhāvat susaṃkruddhā mahā ulkā rohiṇīm iva || 18.17 ||

ऐसा कहकर वह अंगारे-सी आँखोंवाली, अत्यन्त क्रुद्ध राक्षसी उस मृगनयनी सीता की ओर उसी प्रकार झपटी जैसे विशाल उल्कापिंड रोहिणी नक्षत्र की ओर झपटता है।

श्लोक 18 (aranya.18.18)

ताम् मृत्यु पाश प्रतिमाम् आपतंतीम् महाबलः | विगृह्य रामः कुपितः ततो लक्ष्मणम् अब्रवीत् ॥ 18.18 ॥

tām mṛtyu pāśa pratimām āpataṃtīm mahābalaḥ | vigṛhya rāmaḥ kupitaḥ tato lakṣmaṇam abravīt || 18.18 ||

मृत्यु के फंदे-सी झपटती हुई उसे देखकर महाबली राम कुपित हो गए और उसे रोककर लक्ष्मण से बोले —

श्लोक 19 (aranya.18.19)

क्रूरैः अनार्यैः सौमित्रे परिहासः कथंचन | न कार्यः पश्य वैदेहीम् कथंचित् सौम्य जीवतीम् ॥ 18.19 ॥

krūraiḥ anāryaiḥ saumitre parihāsaḥ kathaṃcana | na kāryaḥ paśya vaidehīm kathaṃcit saumya jīvatīm || 18.19 ||

"हे सौमित्र! क्रूर और नीच प्राणियों के साथ किसी भी प्रकार का परिहास उचित नहीं है। देखो, वैदेही बड़ी कठिनाई से बची है!

श्लोक 20 (aranya.18.20)

इमाम् विरूपाम् असतीम् अतिमत्ताम् महोदरीम् | राक्षसीम् पुरुषव्याघ्र विरूपयितुम् अर्हसि ॥ 18.20 ॥

imām virūpām asatīm atimattām mahodarīm | rākṣasīm puruṣavyāghra virūpayitum arhasi || 18.20 ||

हे पुरुषश्रेष्ठ! इस विकृत, कुटिल, उन्मत्त, स्थूलोदरी राक्षसी को विरूप कर देना ही तुम्हारे लिए उचित है।" राम ने लक्ष्मण से यह कहा।

श्लोक 21 (aranya.18.21)

इति उक्तो लक्ष्मणः तस्याः क्रुद्धो रामस्य पश्यतः | उद्धृत्य खड्गम् चिच्छ्हेद कर्ण नासम् महाबलः ॥ 18.21 ॥

iti ukto lakṣmaṇaḥ tasyāḥ kruddho rāmasya paśyataḥ | uddhṛtya khaḍgam cicchheda karṇa nāsam mahābalaḥ || 18.21 ||

यह सुनकर महाबली लक्ष्मण अत्यन्त क्रुद्ध हो गए और राम के देखते-देखते तलवार निकालकर उसके कान और नाक काट डाले।

श्लोक 22 (aranya.18.22)

निकृत्त कर्ण नासा तु विस्वरम् सा विनद्य च | यथा आगतम् प्रदुद्राव घोरा शूर्पणखा वनम् ॥ 18.22 ॥

nikṛtta karṇa nāsā tu visvaram sā vinadya ca | yathā āgatam pradudrāva ghorā śūrpaṇakhā vanam || 18.22 ||

कान-नाक कटी वह भयंकर शूर्पणखा तीव्र और बेसुरी चीत्कार करती हुई जिस मार्ग से आई थी उसी मार्ग से वन में भाग गई।

श्लोक 23 (aranya.18.23)

सा विरूपा महाघोरा राक्षसी शोणित उक्षिता | ननाद विविधान् नादान् यथा प्रावृषि तोयदः ॥ 18.23 ॥

sā virūpā mahāghorā rākṣasī śoṇita ukṣitā | nanāda vividhān nādān yathā prāvṛṣi toyadaḥ || 18.23 ||

वह विकृत और अत्यन्त भयानक राक्षसी रक्त से लथपथ नाना प्रकार की गर्जना करने लगी, मानो वर्षाकाल में गरजता हुआ मेघ हो।

श्लोक 24 (aranya.18.24)

सा विक्षरंती रुधिरम् बहुधा घोर दर्शना | प्रगृह्य बाहू गर्जन्ती प्रविवेश महावनम् ॥ 18.24 ॥

sā vikṣaraṃtī rudhiram bahudhā ghora darśanā | pragṛhya bāhū garjantī praviveśa mahāvanam || 18.24 ||

चारों ओर रक्त बहाती, अत्यन्त भयावह दिखनेवाली वह अपनी दोनों भुजाएँ समेटे हुए गरजती हुई विशाल वन में घुस गई।

श्लोक 25 (aranya.18.25)

ततः तु सा राक्षस संघ सम्वृतम् खरम् जन स्थान गतम् विरूपिता | उपेत्य तम् भ्रातरम् उग्र तेजसम् पपात भूमौ गगनाद् यथा अशनिः ॥ 18.25 ॥

tataḥ tu sā rākṣasa saṃgha samvṛtam kharam jana sthāna gatam virūpitā | upetya tam bhrātaram ugra tejasam papāta bhūmau gaganād yathā aśaniḥ || 18.25 ||

तब वह विरूपित राक्षसी अपने उग्रतेजस्वी भाई खर के पास, जो जनस्थान में राक्षससमूह से घिरा हुआ था, जा पहुँची और आकाश से गिरती बिजली के समान भूमि पर गिर पड़ी।

श्लोक 26 (aranya.18.26)

ततः सभार्यम् भय मोह मूर्चिता सलक्ष्मणम् राघवम् आगतम् वनम् | विरूपणम् च आत्मनि शोणित उक्षिता शशंस सर्वम् भगिनी खरस्य सा ॥ 18.26 ॥

tataḥ sabhāryam bhaya moha mūrcitā salakṣmaṇam rāghavam āgatam vanam | virūpaṇam ca ātmani śoṇita ukṣitā śaśaṃsa sarvam bhaginī kharasya sā || 18.26 ||

तब भय और मोह से विह्वल, रक्त से लथपथ खर की वह बहन उसे राघव के वन में सपत्नीक, लक्ष्मण सहित आगमन का तथा अपने विरूपित होने का सारा वृत्तान्त सुना गई।

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