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अरण्यकाण्ड · सर्ग 19

खर के समक्ष शूर्पणखा का विलाप

सर्ग 18सर्ग-सूचीसर्ग 20

श्लोक 1 (aranya.19.1)

ताम् तथा पतिताम् दृष्ट्वा विरूपाम् शोणित उक्षिताम् | भगिनीम् क्रोध संतप्तः खरः पप्रच्छ्ह राक्षसः ॥ 19.1 ॥

tām tathā patitām dṛṣṭvā virūpām śoṇita ukṣitām | bhaginīm krodha saṃtaptaḥ kharaḥ papracchha rākṣasaḥ || 19.1 ||

विरूपित और रक्त से लथपथ अपनी बहन को इस प्रकार गिरी हुई देखकर क्रोध से जलते हुए राक्षस खर ने उससे पूछा।

श्लोक 2 (aranya.19.2)

उत्तिष्ठ तावत् आख्याहि प्रमोहम् जहि संभ्रमम् | व्यक्तम् आख्याहि केन त्वम् एवम् रूपा विरूपिता ॥ 19.2 ॥

uttiṣṭha tāvat ākhyāhi pramoham jahi saṃbhramam | vyaktam ākhyāhi kena tvam evam rūpā virūpitā || 19.2 ||

"उठो, पहले बताओ — भय और घबराहट को त्यागकर स्पष्ट रूप से बताओ, किसने तुम्हें इस प्रकार विरूप कर दिया है।

श्लोक 3 (aranya.19.3)

कः कृष्ण सर्पम् असीनम् आशी विषम नागसम् | तुदति अभिसमापन्नम् अ.ंगुलि अग्रेण लीलया ॥ 19.3 ॥

kaḥ kṛṣṇa sarpam asīnam āśī viṣama nāgasam | tudati abhisamāpannam a.ṃguli agreṇa līlayā || 19.3 ||

वह कौन है जो अपराध न करनेवाले, समीप आए हुए विषधर काले सर्प को क्रीड़ावश अपनी उँगली की नोक से छेड़ता है?

श्लोक 4 (aranya.19.4)

काल पाशम् समासज्य कण्ठे मोहात् न जानते | यः त्वाम् अद्य समासाद्य पीतवान् विषम् उत्तमम् ॥ 19.4 ॥

kāla pāśam samāsajya kaṇṭhe mohāt na jānate | yaḥ tvām adya samāsādya pītavān viṣam uttamam || 19.4 ||

जो आज तुम्हें छूकर अनजाने में ही उत्तम विष पी बैठा है, या मूर्खतावश काल के फंदे को अपने ही गले में डाल बैठा है?

श्लोक 5 (aranya.19.5)

बल विक्रम संपन्ना कामगा काम रूपिणी | इमाम् अवस्थाम् नीता त्वम् केन अंतक समा गता ॥ 19.5 ॥

bala vikrama saṃpannā kāmagā kāma rūpiṇī | imām avasthām nītā tvam kena aṃtaka samā gatā || 19.5 ||

बल और पराक्रम से सम्पन्न, इच्छानुसार विचरण करनेवाली, इच्छानुसार रूप बदलनेवाली, स्वयं यमराज के समान तुम — किसके पास गई थीं और किसने तुम्हें इस दशा में पहुँचा दिया?

श्लोक 6 (aranya.19.6)

देव गन्धर्व भूतानाम् ऋषीणाम् च महात्मनाम् | को अयम् एवम् महावीर्यः त्वाम् विरूपाम् चकार ह ॥ 19.6 ॥

deva gandharva bhūtānām ṛṣīṇām ca mahātmanām | ko ayam evam mahāvīryaḥ tvām virūpām cakāra ha || 19.6 ||

देवताओं, गन्धर्वों, अन्य प्राणियों अथवा महात्मा ऋषियों में से ऐसा कौन महापराक्रमी है जिसने तुम्हें विरूप कर दिया है?

श्लोक 7 (aranya.19.7)

न हि पश्यामि अहम् लोके यः कुर्यात् मम विप्रियम् | अमरेषु सहस्राक्षम् महएन्द्रम् पाकशासनम् ॥ 19.7 ॥

na hi paśyāmi aham loke yaḥ kuryāt mama vipriyam | amareṣu sahasrākṣam mahaendram pākaśāsanam || 19.7 ||

क्योंकि मुझे तो इस लोक में सहस्रनेत्रधारी पाकशासन इन्द्र सहित किसी भी देवता में ऐसा कोई नहीं दिखता जो मुझे अप्रसन्न करने का साहस करे।

श्लोक 8 (aranya.19.8)

अद्य अहम् मार्गणैः प्राणान् आदास्ये जीवितांतगैः | सलिले क्षीरम् आसक्तम् निष्पिबन् इव सारसः ॥ 19.8 ॥

adya aham mārgaṇaiḥ prāṇān ādāsye jīvitāṃtagaiḥ | salile kṣīram āsaktam niṣpiban iva sārasaḥ || 19.8 ||

आज मैं जीवन का अन्त करनेवाले बाणों से उस दुष्ट के प्राण हर लूँगा, जैसे हंस जल में मिले हुए दूध को भी निचोड़कर पी जाता है।

श्लोक 9 (aranya.19.9)

निहतस्य मया संख्ये शर संकृत्त मर्मणः | सफेनम् रुधिरम् कस्य मेदिनी पातुम् इच्छ्हसि ॥ 19.9 ॥

nihatasya mayā saṃkhye śara saṃkṛtta marmaṇaḥ | saphenam rudhiram kasya medinī pātum icchhasi || 19.9 ||

युद्ध में मेरे बाणों से जिसके मर्मस्थल छिन्न-भिन्न हो जाएँगे और जो मारा जाएगा, उसका फेनयुक्त रक्त पीने की इच्छा पृथ्वी किसकी करती है?

श्लोक 10 (aranya.19.10)

कस्य पत्ररथाः कायात् मांसम् उत्कृत्य संगताः | प्रहृष्टा भक्षयिष्यन्ति निहतस्य मया रणे ॥ 19.10 ॥

kasya patrarathāḥ kāyāt māṃsam utkṛtya saṃgatāḥ | prahṛṣṭā bhakṣayiṣyanti nihatasya mayā raṇe || 19.10 ||

युद्ध में मेरे हाथों मारे गए किसके शरीर से माँस नोचकर पक्षी हर्षपूर्वक खाएँगे?

श्लोक 11 (aranya.19.11)

तम् न देवा न गंधर्वा न पिशाचा न राक्षसाः | मया अपकृष्टम् कृपणम् शक्ताः त्रातुम् इह आहवे ॥ 19.11 ॥

tam na devā na gaṃdharvā na piśācā na rākṣasāḥ | mayā apakṛṣṭam kṛpaṇam śaktāḥ trātum iha āhave || 19.11 ||

यहाँ युद्ध में मेरे द्वारा गिराए गए उस दुष्ट को न देवता, न गन्धर्व, न पिशाच और न ही राक्षस बचा सकेंगे।

श्लोक 12 (aranya.19.12)

उपलभ्य शनैः संज्ञाम् तम् मे शंसितुम् अर्हसि | येन त्वम् दुर्विनीतेन वने विक्रम्य निर्जिता ॥ 19.12 ॥

upalabhya śanaiḥ saṃjñām tam me śaṃsitum arhasi | yena tvam durvinītena vane vikramya nirjitā || 19.12 ||

धीरे-धीरे अपनी चेतना पाकर मुझे यह बताना तुम्हारे लिए उचित है कि किस दुष्ट ने वन में पराक्रम दिखाकर तुम्हें पराजित किया है।"

श्लोक 13 (aranya.19.13)

इति भ्रातुर् वचः श्रुत्वा क्रुद्धस्य च विशेषतः | ततः शूर्पणखा वाक्यम् सबाष्पम् इदम् अब्रवीत् ॥ 19.13 ॥

iti bhrātur vacaḥ śrutvā kruddhasya ca viśeṣataḥ | tataḥ śūrpaṇakhā vākyam sabāṣpam idam abravīt || 19.13 ||

भाई के विशेष रूप से क्रोधपूर्ण इन वचनों को सुनकर शूर्पणखा ने आँसू बहाते हुए यह कहा —

श्लोक 14 (aranya.19.14)

तरुणौ रूप संपन्नौ सुकूमारौ महाबलौ | पुण्डरीक विशालाक्षौ चीर कृष्ण अजिन अंबरौ ॥ 19.14 ॥

taruṇau rūpa saṃpannau sukūmārau mahābalau | puṇḍarīka viśālākṣau cīra kṛṣṇa ajina aṃbarau || 19.14 ||

"रूपवान्, कोमल किन्तु महाबली, कमल के समान विशाल नेत्रोंवाले, वल्कल और काले मृगचर्म पहने दो तरुण —

श्लोक 15 (aranya.19.15)

फल मूल अशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ | पुत्रौ दशरथस्य आस्ताम् भ्रातरौ राम लक्ष्मनौ ॥ 19.15 ॥

phala mūla aśinau dāntau tāpasau brahmacāriṇau | putrau daśarathasya āstām bhrātarau rāma lakṣmanau || 19.15 ||

फल-मूल खानेवाले, संयमी, ब्रह्मचारी तपस्वी — वे दशरथ के पुत्र, राम और लक्ष्मण नामक दो भाई हैं।

श्लोक 16 (aranya.19.16)

गन्धर्व राज प्रतिमौ पार्थिव व्यन्जन अन्वितौ | देवौ वा दानवौ - मानुषौ - वा तौ न तर्कयितुम् उत्सहे ॥ 19.16 ॥

gandharva rāja pratimau pārthiva vyanjana anvitau | devau vā dānavau - mānuṣau - vā tau na tarkayitum utsahe || 19.16 ||

गन्धर्वराज के समान, राजोचित सभी लक्षणों से युक्त वे दोनों देवता हैं या दानव, मैं यह निश्चित नहीं कर पाई।

श्लोक 17 (aranya.19.17)

तरुणी रूपसंपन्ना सर्वाअभरण भूषिता | दृष्टा तत्र मया नारी तयोर् मध्ये सुमध्यमा ॥ 19.17 ॥

taruṇī rūpasaṃpannā sarvāabharaṇa bhūṣitā | dṛṣṭā tatra mayā nārī tayor madhye sumadhyamā || 19.17 ||

वहाँ उन दोनों के मध्य मैंने एक तरुणी को देखा, जो अत्यन्त सुन्दर, सभी आभूषणों से सुसज्जित और सुडौल कटिवाली थी।

श्लोक 18 (aranya.19.18)

ताभ्याम् उभाभ्याम् संभूय प्रमदाम् अधिकृत्य ताम् | इमाम् अवस्थाम् नीता अहम् यथा अनाथा सती तथा ॥ 19.18 ॥

tābhyām ubhābhyām saṃbhūya pramadām adhikṛtya tām | imām avasthām nītā aham yathā anāthā satī tathā || 19.18 ||

उसी स्त्री के कारण उन दोनों ने मिलकर मुझे इस दशा में पहुँचा दिया, मानो मैं बिना किसी रक्षक के असहाय स्त्री हूँ।

श्लोक 19 (aranya.19.19)

तस्याः च अनृजु वृत्तायाः तयोः च हतयोर् अहम् | सफेनम् पातुम् इच्छ्हामि रुधिरम् रण मूर्धनि ॥ 19.19 ॥

tasyāḥ ca anṛju vṛttāyāḥ tayoḥ ca hatayor aham | saphenam pātum icchhāmi rudhiram raṇa mūrdhani || 19.19 ||

मैं युद्ध के अग्रभाग में उस कुटिल स्त्री का तथा उन दोनों के मारे जाने पर उनका फेनयुक्त रक्त पीना चाहती हूँ।

श्लोक 20 (aranya.19.20)

एष मे प्रथमः कामः कृतः तत्र त्वया भवेत् | तस्याः तयोः च रुधिरम् पिबेयम् अहम् आहवे ॥ 19.20 ॥

eṣa me prathamaḥ kāmaḥ kṛtaḥ tatra tvayā bhavet | tasyāḥ tayoḥ ca rudhiram pibeyam aham āhave || 19.20 ||

यही मेरी प्रथम इच्छा है — इसे तुम पूर्ण करो, कि युद्ध में मैं स्वयं उसका और उन दोनों का रक्त पी सकूँ।"

श्लोक 21 (aranya.19.21)

इति तस्याम् ब्रुवाणायाम् चतुर् दश महाबलान् | व्यादिदेश खरः क्रुद्धो राक्षसान् अंतकोपमान् ॥ 19.21 ॥

iti tasyām bruvāṇāyām catur daśa mahābalān | vyādideśa kharaḥ kruddho rākṣasān aṃtakopamān || 19.21 ||

उसके इस प्रकार कहने पर क्रुद्ध खर ने यमराज के समान महाबली चौदह राक्षसों को आदेश दिया —

श्लोक 22 (aranya.19.22)

मानुषौ शस्त्र संपन्नौ चीर कृष्ण अजिन अंबरौ | प्रविष्टौ दण्डकारण्यम् घोरम् प्रमदया सह ॥ 19.22 ॥

mānuṣau śastra saṃpannau cīra kṛṣṇa ajina aṃbarau | praviṣṭau daṇḍakāraṇyam ghoram pramadayā saha || 19.22 ||

"शस्त्रधारी, वल्कल और काले मृगचर्म पहने दो मनुष्य एक युवती के साथ इस भयंकर दण्डकारण्य में प्रविष्ट हुए हैं।

श्लोक 23 (aranya.19.23)

तौ हत्वा ताम् च दुर्वृत्ताम् उपावर्तितुम् अर्हथ | इयम् च रुधिरम् तेषाम् भगिनी मम पास्यति ॥ 19.23 ॥

tau hatvā tām ca durvṛttām upāvartitum arhatha | iyam ca rudhiram teṣām bhaginī mama pāsyati || 19.23 ||

उन दोनों को और उस दुष्ट स्त्री को भी मारकर तुम्हें लौटना है; और उनका रक्त मेरी यह बहन पिएगी।

श्लोक 24 (aranya.19.24)

मनोरथो अयम् इष्टो अस्या भगिन्या मम राक्षसाः | शीघ्रम् संपद्यताम् गत्वा तौ प्रमथ्य स्व तेजसा ॥ 19.24 ॥

manoratho ayam iṣṭo asyā bhaginyā mama rākṣasāḥ | śīghram saṃpadyatām gatvā tau pramathya sva tejasā || 19.24 ||

हे राक्षसो! मेरी इस बहन की यही प्रिय इच्छा है — शीघ्र जाकर अपने पराक्रम से उन दोनों को कुचलकर इसे पूर्ण करो।"

श्लोक 25 (aranya.19.25)

युष्माबिः निर्हतो दृष्ट्वा तौ उभौ भ्रातौ रणे | इयम् प्रहृष्टा मुदिता रुधिरम् युधि पास्यति ॥ 19.25 ॥

yuṣmābiḥ nirhato dṛṣṭvā tau ubhau bhrātau raṇe | iyam prahṛṣṭā muditā rudhiram yudhi pāsyati || 19.25 ||

"तुम्हारे द्वारा उन दोनों भाइयों को युद्ध में मारा गया देखकर यह प्रसन्न और हर्षित होकर युद्धभूमि में उनका रक्त पिएगी।"

श्लोक 26 (aranya.19.26)

इति प्रतिसमादिष्टा राक्षसाः ते चतुर् दश | तत्र जग्मुः तया सार्धम् घना वातेरिताः यथा ॥ 19.26 ॥

iti pratisamādiṣṭā rākṣasāḥ te catur daśa | tatra jagmuḥ tayā sārdham ghanā vāteritāḥ yathā || 19.26 ||

इस प्रकार आदेश पाकर वे चौदह राक्षस उसके साथ वहाँ उसी प्रकार चल पड़े जैसे वायु से प्रेरित काले मेघ चलते हैं।

श्लोक 27 (aranya.19.27)

ततस्तु ते तम् समुदर्ग तेजसम् तथापि तीक्ष्ण प्रदरा निशाचरा | न शेकुर् एनम् सहसा प्रमर्दितुम् वनद्विपा दीप्त्वम् इव अग्निम् उथितम् ॥ 19.27 ॥

tatastu te tam samudarga tejasam tathāpi tīkṣṇa pradarā niśācarā | na śekur enam sahasā pramarditum vanadvipā dīptvam iva agnim uthitam || 19.27 ||

किन्तु वे तीक्ष्ण बाणधारी निशाचर भी उस तेजस्वी राम को शीघ्र परास्त न कर सके, जैसे वनहस्ती धधकती हुई प्रज्वलित अग्नि को परास्त नहीं कर पाते।

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