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अरण्यकाण्ड · सर्ग 20

चौदह राक्षसों का वध

सर्ग 19सर्ग-सूचीसर्ग 21

श्लोक 1 (aranya.20.1)

ततः शूर्पणखा घोरा राघव आश्रमम् आगता | रक्षसान् आचचक्षे तौ भ्रातरौ सह सीतया ॥ 20.1 ॥

tataḥ śūrpaṇakhā ghorā rāghava āśramam āgatā | rakṣasān ācacakṣe tau bhrātarau saha sītayā || 20.1 ||

तत्पश्चात् वह भयंकर शूर्पणखा राघव के आश्रम में पहुँचकर उन राक्षसों को सीता सहित दोनों भाई दिखाने लगी।

श्लोक 2 (aranya.20.2)

ते रामम् पर्ण शालायाम् उपविष्टम् महाबलम् | ददृशुः सीतया सार्धम् लक्ष्मणेन अपि सेवितम् ॥ 20.2 ॥

te rāmam parṇa śālāyām upaviṣṭam mahābalam | dadṛśuḥ sītayā sārdham lakṣmaṇena api sevitam || 20.2 ||

उन्होंने पर्णशाला में बैठे महाबली राम को सीता और लक्ष्मण द्वारा सेवित देखा।

श्लोक 3 (aranya.20.3)

ताम् दृष्ट्वा राघवः श्रीमान् आगताम् ताम् च राक्षसीम् | अब्रवीत् भ्रातरम् रामो लक्ष्मणम् दीप्त तेजसम् ॥ 20.3 ॥

tām dṛṣṭvā rāghavaḥ śrīmān āgatām tām ca rākṣasīm | abravīt bhrātaram rāmo lakṣmaṇam dīpta tejasam || 20.3 ||

उस राक्षसी को उन राक्षसों सहित वहाँ आया देखकर श्रीमान् राघव राम ने तेजस्वी अपने भाई लक्ष्मण से कहा —

श्लोक 4 (aranya.20.4)

मुहूर्तम् भव सौमित्रे सीतायाः प्रत्यनंतरः | इमान् अस्या वधिष्यामि पदवीम् आगतान् इह ॥ 20.4 ॥

muhūrtam bhava saumitre sītāyāḥ pratyanaṃtaraḥ | imān asyā vadhiṣyāmi padavīm āgatān iha || 20.4 ||

"हे सौमित्र! क्षणभर सीता के निकट रहो; मैं इन राक्षसों को, जो उस राक्षसी के पीछे-पीछे यहाँ आए हैं, अभी नष्ट कर देता हूँ।"

श्लोक 5 (aranya.20.5)

वाक्यम् एतत् ततः श्रुत्वा रामस्य विदित आत्मनः | तथा इति लक्ष्मणो वाक्यम् रामस्य प्रत्यपूजयत् ॥ 20.5 ॥

vākyam etat tataḥ śrutvā rāmasya vidita ātmanaḥ | tathā iti lakṣmaṇo vākyam rāmasya pratyapūjayat || 20.5 ||

राम के इस वचन को सुनकर स्पष्ट-बुद्धि लक्ष्मण ने "तथास्तु" कहकर राम के वचन का सम्मान किया।

श्लोक 6 (aranya.20.6)

राघवो अपि महत् चापम् चामीकर विभूषितम् | चकार सज्यम् धर्मात्मा तानि रक्षांसि च अब्रवीत् ॥ 20.6 ॥

rāghavo api mahat cāpam cāmīkara vibhūṣitam | cakāra sajyam dharmātmā tāni rakṣāṃsi ca abravīt || 20.6 ||

तब धर्मात्मा राघव ने सोने से जड़े अपने विशाल धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और उन राक्षसों से चेतावनी के रूप में यह कहा —

श्लोक 7 (aranya.20.7)

पुत्रौ दशरथस्य आवाम् भ्रातरौ राम लक्ष्मणौ | प्रविष्टौ सीतया सार्धम् दुश्चरम् दण्डका वनम् ॥ 20.7 ॥

putrau daśarathasya āvām bhrātarau rāma lakṣmaṇau | praviṣṭau sītayā sārdham duścaram daṇḍakā vanam || 20.7 ||

"हम दोनों राजा दशरथ के पुत्र हैं, राम और लक्ष्मण नामक भाई, जो सीता के साथ इस दुर्गम दण्डकवन में प्रविष्ट हुए हैं।

श्लोक 8 (aranya.20.8)

फल मूल अशनौ दांतौ तापसौ धर्म चारिणौ | वसन्तौ दण्डकारण्ये किम् अर्थम् उपहिंसथ ॥ 20.8 ॥

phala mūla aśanau dāṃtau tāpasau dharma cāriṇau | vasantau daṇḍakāraṇye kim artham upahiṃsatha || 20.8 ||

हम फल-मूल खानेवाले, संयमी, धर्माचरण करनेवाले तपस्वी हैं, जो दण्डकारण्य में निवास करते हैं — तुम किस कारण हमें कष्ट पहुँचाना चाहते हो?

श्लोक 9 (aranya.20.9)

युष्मान् पाप आत्मकान् हंतुम् विप्रकारान् महाहवे | ऋषीणाम् तु नियोगेन प्राप्तो अहम् सशर आसनः ॥ 20.9 ॥

yuṣmān pāpa ātmakān haṃtum viprakārān mahāhave | ṛṣīṇām tu niyogena prāpto aham saśara āsanaḥ || 20.9 ||

मैं ऋषियों के आदेश से धनुष-बाण लेकर, हे पापात्मा दुराचारियो, तुम्हें इस भयंकर संग्राम में नष्ट करने के लिए यहाँ आया हूँ।

श्लोक 10 (aranya.20.10)

तिष्ठत एव अत्र संतुष्टा न उपवरितितुम् अर्हथ | यदि प्राणैः इह अर्थो वो निवर्तध्वम् निशा चराः ॥ 20.10 ॥

tiṣṭhata eva atra saṃtuṣṭā na upavarititum arhatha | yadi prāṇaiḥ iha artho vo nivartadhvam niśā carāḥ || 20.10 ||

यदि तुम शान्तिपूर्वक यहीं रुके रहो तो ठीक, अन्यथा लौट नहीं पाओगे; परन्तु यदि तुम्हें अपने प्राणों का मोह है, हे निशाचरो, तो अभी लौट जाओ।"

श्लोक 11 (aranya.20.11)

तस्य तद् वचनम् श्रुत्वा राक्षसाः ते चतुर्दश | ऊचुर् वाचम् सुसंक्रुद्धा ब्रह्मघ्नः शूल पाणयः ॥ 20.11 ॥

tasya tad vacanam śrutvā rākṣasāḥ te caturdaśa | ūcur vācam susaṃkruddhā brahmaghnaḥ śūla pāṇayaḥ || 20.11 ||

उसका यह वचन सुनकर वे चौदहों ब्राह्मणघाती, शूलधारी राक्षस अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे,

श्लोक 12 (aranya.20.12)

संरक्त नयना घोरा रामम् रक्तांत लोचनम् | परुषा मधुर आभाषम् हृष्टाः अदृष्ट पराक्रमम् ॥ 20.12 ॥

saṃrakta nayanā ghorā rāmam raktāṃta locanam | paruṣā madhura ābhāṣam hṛṣṭāḥ adṛṣṭa parākramam || 20.12 ||

और अपने रक्ताभ, भयंकर नेत्रोंवाले वे राक्षस मधुरभाषी राम से, जिनका पराक्रम उन्होंने अभी तक नहीं देखा था, कठोर वचन बोले —

श्लोक 13 (aranya.20.13)

क्रोधम् उत्पाद्य नो भर्तुः खरस्य सुमहात्मनः | त्वम् एव हास्यसे प्राणान् अद्य अस्माभिर् हतो युधि ॥ 20.13 ॥

krodham utpādya no bhartuḥ kharasya sumahātmanaḥ | tvam eva hāsyase prāṇān adya asmābhir hato yudhi || 20.13 ||

"आज युद्ध में हमारे हाथों मारे जाकर तुम अकेले ही अपने प्राण त्यागोगे, हमारे महात्मा स्वामी खर के क्रोध को भड़काकर।

श्लोक 14 (aranya.20.14)

का हि ते शक्तिर् एकस्य बहूनाम् रण मूर्धनि | अस्माकम् अग्रतः स्थातुम् किम् पुनर् योद्धुम् आहवे ॥ 20.14 ॥

kā hi te śaktir ekasya bahūnām raṇa mūrdhani | asmākam agrataḥ sthātum kim punar yoddhum āhave || 20.14 ||

युद्ध के अग्रभाग में इतने सारे हमारे सामने अकेले खड़े होने की तुम्हारी क्या शक्ति है, फिर युद्ध करने की तो बात ही क्या?

श्लोक 15 (aranya.20.15)

एभिः बाहु प्रयुक्तैः नः परिघैः शूल पट्टिशैः | प्राणाम् त्यक्ष्यसि वीर्यम् च धनुः च कर पीडितम् ॥ 20.15 ॥

ebhiḥ bāhu prayuktaiḥ naḥ parighaiḥ śūla paṭṭiśaiḥ | prāṇām tyakṣyasi vīryam ca dhanuḥ ca kara pīḍitam || 20.15 ||

हमारी भुजाओं से चलाए गए इन परिघों, शूलों और पट्टिशों से तुम अपने प्राण, अपना पराक्रम और अपने हाथ में थमा यह धनुष भी खो बैठोगे।"

श्लोक 16 (aranya.20.16)

इति एवम् उक्त्वा संरब्धा राक्षसाः ते चतुर्दश | उद्यत आयुध निस्त्रिंशा रामम् एव अभिदुद्रुवुः ॥ 20.16 ॥

iti evam uktvā saṃrabdhā rākṣasāḥ te caturdaśa | udyata āyudha nistriṃśā rāmam eva abhidudruvuḥ || 20.16 ||

ऐसा कहकर वे क्रुद्ध चौदहों राक्षस अपने-अपने अस्त्र उठाकर अकेले राम की ओर ही दौड़ पड़े,

श्लोक 17 (aranya.20.17)

चिक्षिपुः तानि शूलानि राघवम् प्रति दुर्जयम् | तानि शूलानि काकुत्स्थः समस्तानि चतुर्दश ॥ 20.17 ॥

cikṣipuḥ tāni śūlāni rāghavam prati durjayam | tāni śūlāni kākutsthaḥ samastāni caturdaśa || 20.17 ||

और अजेय राघव पर वे शूल फेंके। उन सभी चौदह शूलों को काकुत्स्थ राम ने,

श्लोक 18 (aranya.20.18)

तावद्भिः एव चिच्छ्हेद शरैः कांचन भूषितैः | ततः पश्चात् महातेजा नाराचान् सूर्य संनिभान् ॥ 20.18 ॥

tāvadbhiḥ eva cicchheda śaraiḥ kāṃcana bhūṣitaiḥ | tataḥ paścāt mahātejā nārācān sūrya saṃnibhān || 20.18 ||

उतने ही सुवर्णभूषित बाणों से काट डाला। इसके पश्चात् उस महातेजस्वी राम ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर पत्थर पर तेज किए हुए, सूर्य के समान चमकते चौदह नाराच उठाए।

श्लोक 19 (aranya.20.19)

जग्राह परम क्रुद्धः चतुर्दश शिल अशितान् | गृहीत्वा धनुः आयम्य लक्ष्यान् उद्दिश्य राक्षसान् ॥ 20.19 ॥

jagrāha parama kruddhaḥ caturdaśa śila aśitān | gṛhītvā dhanuḥ āyamya lakṣyān uddiśya rākṣasān || 20.19 ||

फिर धनुष लेकर उसे खींचते हुए उन राक्षसों को लक्ष्य बनाकर,

श्लोक 20 (aranya.20.20)

मुमोच राघवो बाणान् वज्रान् इव शतक्रतुः | ते भित्त्वा रक्षसाम् वेगात् वक्षांसि रुधिर आप्लुताः ॥ 20.20 ॥

mumoca rāghavo bāṇān vajrān iva śatakratuḥ | te bhittvā rakṣasām vegāt vakṣāṃsi rudhira āplutāḥ || 20.20 ||

राघव ने उसी प्रकार बाण छोड़े जैसे इन्द्र वज्र छोड़ते हैं। वे बाण वेगपूर्वक राक्षसों की छाती को भेदकर, रक्त से लथपथ होकर,

श्लोक 21 (aranya.20.21)

विनिष्पेतुः तदा भूमौ वल्मीकात् इव पन्नगाः | तैः भग्न हृदया बूमौ छ्हिन्न मूला इव द्रुमाः ॥ 20.21 ॥

viniṣpetuḥ tadā bhūmau valmīkāt iva pannagāḥ | taiḥ bhagna hṛdayā būmau chhinna mūlā iva drumāḥ || 20.21 ||

दूसरी ओर से निकलकर पृथ्वी में उसी प्रकार समा गए जैसे सर्प बाँबी में समा जाते हैं। उन बाणों से हृदय विदीर्ण होकर वे राक्षस,

श्लोक 22 (aranya.20.22)

निपेतुः शोणित स्नाता विकृता विगत असवः | तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा राक्षसी क्रोध मूर्च्छ्हिता ॥ 20.22 ॥

nipetuḥ śoṇita snātā vikṛtā vigata asavaḥ | tān bhūmau patitān dṛṣṭvā rākṣasī krodha mūrcchhitā || 20.22 ||

रक्त से नहाए, विकृत और प्राणहीन होकर, जड़ से उखड़े वृक्षों के समान भूमि पर गिर पड़े। उन्हें भूमि पर गिरा देखकर वह राक्षसी क्रोध से मूर्च्छित हो उठी,

श्लोक 23 (aranya.20.23)

उपगम्य खरम् सा तु किंचित् संशुष्क शोणिता | पपात पुनः एव आर्ता सनिर्यासा इव वल्लरी ॥ 20.23 ॥

upagamya kharam sā tu kiṃcit saṃśuṣka śoṇitā | papāta punaḥ eva ārtā saniryāsā iva vallarī || 20.23 ||

और अपना रक्त कुछ सूख जाने पर, म्लान मुख लिए, वह पुनः खर के पास जाकर, कटी हुई लता से रस टपकने के समान, व्यथित होकर पुनः उसी प्रकार गिर पड़ी।

श्लोक 24 (aranya.20.24)

भ्रातुः समीपे शोक आर्ता ससर्ज निनदम् महत् | सस्वरम् मुमोच बाष्पम् विवर्ण वदना तदा ॥ 20.24 ॥

bhrātuḥ samīpe śoka ārtā sasarja ninadam mahat | sasvaram mumoca bāṣpam vivarṇa vadanā tadā || 20.24 ||

तब अपने भाई के समीप शोकातुर होकर उसने बड़े स्वर में विलाप किया और म्लान मुख से रुदन करती हुई अश्रु बहाने लगी।

श्लोक 25 (aranya.20.25)

निपातितान् प्रेक्ष्य रणे तु राक्षसान् प्रधाविता शूर्पणखा पुनः ततः | वधम् च तेषाम् निखिलेन रक्षसाम् शशंस सर्वम् भगिनी खरस्य सा ॥ 20.25 ॥

nipātitān prekṣya raṇe tu rākṣasān pradhāvitā śūrpaṇakhā punaḥ tataḥ | vadham ca teṣām nikhilena rakṣasām śaśaṃsa sarvam bhaginī kharasya sā || 20.25 ||

युद्ध में उन राक्षसों को गिरा हुआ देखकर शूर्पणखा वहाँ से पुनः भाग खड़ी हुई, और खर की वह बहन उन राक्षसों के सम्पूर्ण विनाश का सारा वृत्तान्त उसे सुना गई।

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