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अरण्यकाण्ड · सर्ग 25

युद्ध का आरंभ

सर्ग 24सर्ग-सूचीसर्ग 26

श्लोक 1 (aranya.25.1)

अवष्टब्ध धनुम् रामम् क्रुद्धम् च रिपु घातिनम् | ददर्श आश्रमम् आगम्य खरः सह पुरःसरैः ॥ 3.25.1 ॥

avaṣṭabdha dhanum rāmam kruddham ca ripu ghātinam | dadarśa āśramam āgamya kharaḥ saha puraḥsaraiḥ || 25.1 ||

आश्रम में अपने अग्रगामी सैनिकों सहित पहुँचकर खर ने धनुष ताने हुए, क्रुद्ध, शत्रुघाती राम को देखा।

श्लोक 2 (aranya.25.2)

तम् दृष्ट्वा सगुणम् चापम् उद्यम्य खर निःस्वनम् | रामस्य अभिमुखम् सूतम् चोद्यताम् इति अचोदयत् ॥ 3.25.2 ॥

tam dṛṣṭvā saguṇam cāpam udyamya khara niḥsvanam | rāmasya abhimukham sūtam codyatām iti acodayat || 25.2 ||

उसे देखकर खर ने अपना डोरी चढ़ा हुआ, कर्कश ध्वनि करने वाला धनुष उठाया और अपने सारथी को आदेश दिया - “राम के सम्मुख रथ बढ़ाओ!”

श्लोक 3 (aranya.25.3)

स खरस्य आज्ञया सूतः तुरगान् समचोदयत् | यत्र रामो महाबाहुः एको धुन्वन् धनुः स्थितः ॥ 3.25.3 ॥

sa kharasya ājñayā sūtaḥ turagān samacodayat | yatra rāmo mahābāhuḥ eko dhunvan dhanuḥ sthitaḥ || 25.3 ||

खर की आज्ञा से सारथी ने घोड़ों को वहाँ हाँका, जहाँ महाबाहु राम अकेले अपना धनुष हिलाते हुए खड़े थे।

श्लोक 4 (aranya.25.4)

तम् तु निष्पतितम् दृष्ट्वा सर्वे ते रजनी चराः | मुंचमाना महानादम् सचिवाः पर्यवारयन् ॥ 3.25.4 ॥

tam tu niṣpatitam dṛṣṭvā sarve te rajanī carāḥ | muṃcamānā mahānādam sacivāḥ paryavārayan || 25.4 ||

उसे आगे बढ़ते देखकर उसके सभी सहचर निशाचर महाध्वनि करते हुए उसे चारों ओर से घेरकर चलने लगे।

श्लोक 5 (aranya.25.5)

स तेषाम् यातुधानानाम् मध्ये रथः गतः खरः | बभूव मध्ये ताराणाम् लोहिताङ्ग इव उदितः ॥ 3.25.5 ॥

sa teṣām yātudhānānām madhye rathaḥ gataḥ kharaḥ | babhūva madhye tārāṇām lohitāṅga iva uditaḥ || 25.5 ||

उन राक्षसों के बीच रथ पर सवार खर तारों के बीच उदित हुए लोहिताङ्ग (मंगल) ग्रह के समान प्रतीत हो रहा था।

श्लोक 6 (aranya.25.6)

ततः शर सहस्रेन रामम् अप्रतिम ओजसम् | अर्दयित्वाअ महानादम् ननाद समरे खरः ॥ 3.25.6 ॥

tataḥ śara sahasrena rāmam apratima ojasam | ardayitvāa mahānādam nanāda samare kharaḥ || 25.6 ||

तब अद्वितीय तेजस्वी राम को सहस्र बाणों से पीड़ित करते हुए खर ने युद्ध में महानाद किया।

श्लोक 7 (aranya.25.7)

ततः तम् भीम धन्वानम् क्रुद्धाः सर्वे निशाचराः | रामम् नाना विधैः शस्त्रैः अभ्यवर्षन्त दुर्जयम् ॥ 3.25.7 ॥

tataḥ tam bhīma dhanvānam kruddhāḥ sarve niśācarāḥ | rāmam nānā vidhaiḥ śastraiḥ abhyavarṣanta durjayam || 25.7 ||

तब समस्त क्रुद्ध निशाचरों ने भयंकर धनुर्धारी, दुर्जय राम पर विविध प्रकार के शस्त्रों की वर्षा कर दी।

श्लोक 8 (aranya.25.8)

मुद्गरैः आयसैः शूलैः प्रासैः खड्गैः परश्वधैः | राक्षसाः समरे रामम् निजघ्नू रोष तत्पराः ॥ 3.25.8 ॥

mudgaraiḥ āyasaiḥ śūlaiḥ prāsaiḥ khaḍgaiḥ paraśvadhaiḥ | rākṣasāḥ samare rāmam nijaghnū roṣa tatparāḥ || 25.8 ||

लोहे के मुद्गरों, शूलों, प्रासों, तलवारों और फरसों से क्रोधपरायण राक्षसों ने युद्ध में राम पर प्रहार किया।

श्लोक 9 (aranya.25.9)

ते वलाहक संकाशा महाकाया महाबलाः | अभ्यधावन्त काकुत्स्थम् रथैः वाजिभिः एव च ॥ 3.25.9 ॥

te valāhaka saṃkāśā mahākāyā mahābalāḥ | abhyadhāvanta kākutstham rathaiḥ vājibhiḥ eva ca || 25.9 ||

बादलों के समान विशालकाय और महाबली वे राक्षस रथों और घोड़ों पर सवार होकर काकुत्स्थ राम की ओर दौड़ पड़े,

श्लोक 10 (aranya.25.10)

गजैः पर्वत कूट अभैः रामम् युद्धे जिंघासवः | ते रामे शर वर्षाणि व्यसृजन् रक्षसाम् गणाः ॥ 3.25.10 ॥

gajaiḥ parvata kūṭa abhaiḥ rāmam yuddhe jiṃghāsavaḥ | te rāme śara varṣāṇi vyasṛjan rakṣasām gaṇāḥ || 25.10 ||

-और कुछ पर्वत-शिखर जैसे हाथियों पर सवार होकर, युद्ध में राम को मार डालने की इच्छा से। उन राक्षस-समूहों ने राम पर बाणों की वर्षा की,

श्लोक 11 (aranya.25.11)

शैलेन्द्रम् इव धाराभिर् वर्षमाणा महाधनाः | सर्वैः परिवृतो रामो राक्षसैः कॄरदर्शिनैः ॥ 3.25.11 ॥

śailendram iva dhārābhir varṣamāṇā mahādhanāḥ | sarvaiḥ parivṛto rāmo rākṣasaiḥ kṝradarśinaiḥ || 25.11 ||

-मानो विशाल मेघ पर्वतराज पर जलधाराएँ बरसा रहे हों। उन क्रूरदर्शी राक्षसों से चारों ओर से घिरे हुए राम...

श्लोक 12 (aranya.25.12)

तिथिषु इव महादेवो वृतः पारिषदाम् गणैः | तानि मुक्तानि शस्त्राणि यातुधानैः स राघवः ॥ 3.25.12 ॥

tithiṣu iva mahādevo vṛtaḥ pāriṣadām gaṇaiḥ | tāni muktāni śastrāṇi yātudhānaiḥ sa rāghavaḥ || 25.12 ||

-वैसे ही दिखाई दे रहे थे जैसे पर्व के दिनों में अपने गणों से घिरे महादेव। राक्षसों द्वारा छोड़े गए उन शस्त्रों को राघव ने...

श्लोक 13 (aranya.25.13)

प्रतिजग्राह विशिखैः नदि ओघान् इव सागरः | स तैः प्रहरणैः घोरैः भिन्न गात्रो न विव्यथे ॥ 3.25.13 ॥

pratijagrāha viśikhaiḥ nadi oghān iva sāgaraḥ | sa taiḥ praharaṇaiḥ ghoraiḥ bhinna gātro na vivyathe || 25.13 ||

-अपने बाणों से उसी प्रकार रोक लिया जैसे समुद्र नदियों के प्रवाह को समा लेता है। उन भयंकर शस्त्रों से शरीर छिन्न-भिन्न होने पर भी वे विचलित नहीं हुए,

श्लोक 14 (aranya.25.14)

रामः प्रदीप्तैर् बहुभिर् वज्रैर् इव महा अचलः | स विद्धः क्षतज दिग्धः सर्व गात्रेषु राघवः ॥ 3.25.14 ॥

rāmaḥ pradīptair bahubhir vajrair iva mahā acalaḥ | sa viddhaḥ kṣataja digdhaḥ sarva gātreṣu rāghavaḥ || 25.14 ||

-मानो अनेक प्रज्वलित वज्रों से आघातित होकर भी अडिग महापर्वत हों। सम्पूर्ण अंगों में बिंधे और रक्त से सने हुए राघव...

श्लोक 15 (aranya.25.15)

बभूव रामः सन्ध्य अभ्रैः दिवाकर इव आवृतः | विषेदुर् देव गन्धर्वाः सिद्धाः च परम ऋषयः ॥ 3.25.15 ॥

babhūva rāmaḥ sandhya abhraiḥ divākara iva āvṛtaḥ | viṣedur deva gandharvāḥ siddhāḥ ca parama ṛṣayaḥ || 25.15 ||

-संध्याकालीन मेघों से घिरे सूर्य के समान दिखाई देने लगे। देवता, गंधर्व, सिद्ध और परम ऋषिगण विषाद से भर उठे,

श्लोक 16 (aranya.25.16)

एकम् सहस्रैः बहुभिः तदा दृष्ट्वा समावृतम् | ततो रामः तु सुसंक्रुद्धो मण्डली कृत कार्मुकः ॥ 3.25.16 ॥

ekam sahasraiḥ bahubhiḥ tadā dṛṣṭvā samāvṛtam | tato rāmaḥ tu susaṃkruddho maṇḍalī kṛta kārmukaḥ || 25.16 ||

-उस एक राम को हज़ारों से घिरा देखकर। तब अत्यंत क्रुद्ध होकर राम ने अपने धनुष को मंडलाकार कर लिया,

श्लोक 17 (aranya.25.17)

ससर्ज निशितान् बाणान् शतशः अथ सहस्रशः | दुरवारान् दुर्विषहान् कालपाश उपमान् रणे ॥ 3.25.17 ॥

sasarja niśitān bāṇān śataśaḥ atha sahasraśaḥ | duravārān durviṣahān kālapāśa upamān raṇe || 25.17 ||

-और युद्ध में सैकड़ों-हजारों तीक्ष्ण बाण छोड़े, जो अजेय, असह्य और कालपाश के समान थे।

श्लोक 18 (aranya.25.18)

मुमोच लीलया रामः कंकपत्रान् कांचन भूषणान् | ते शराः शत्रु सैन्येषु मुक्ता रामेण लीलया ॥ 3.25.18 ॥

mumoca līlayā rāmaḥ kaṃkapatrān kāṃcana bhūṣaṇān | te śarāḥ śatru sainyeṣu muktā rāmeṇa līlayā || 25.18 ||

राम ने मानो खेल-खेल में ही बाज़ के पंखों वाले, स्वर्ण से अलंकृत बाण छोड़े। राम द्वारा लीलापूर्वक शत्रु-सेना में छोड़े गए वे बाण...

श्लोक 19 (aranya.25.19)

आददू रक्षसाम् प्राणान् पाशाः कालकृता इव | भित्त्वा राक्षस देहान् ताम् ते शरा रुधिर आप्लुताः ॥ 3.25.19 ॥

ādadū rakṣasām prāṇān pāśāḥ kālakṛtā iva | bhittvā rākṣasa dehān tām te śarā rudhira āplutāḥ || 25.19 ||

-राक्षसों के प्राण उसी प्रकार हर लेते थे जैसे काल के बनाए हुए पाश। राक्षसों के शरीरों को भेदकर रक्त से लथपथ वे बाण...

श्लोक 20 (aranya.25.20)

अंतरिक्ष गता रेजुः दीप्त अग्नि सम तेजसः | असंख्येयाः तु रामस्य सायकाः चाप मण्डलात् ॥ 3.25.20 ॥

aṃtarikṣa gatā rejuḥ dīpta agni sama tejasaḥ | asaṃkhyeyāḥ tu rāmasya sāyakāḥ cāpa maṇḍalāt || 25.20 ||

-आकाश में जाकर प्रज्वलित अग्नि के समान तेज से चमकने लगे। राम के धनुष के मंडल से निकले असंख्य बाण...

श्लोक 21 (aranya.25.21)

विनिष्पेतुः अतीव उग्रा रक्षः प्राण अपहारिणः | तैः धनूंषि ध्वज अग्राणि चर्माणि च शिरांसि च ॥ 3.25.21 ॥

viniṣpetuḥ atīva ugrā rakṣaḥ prāṇa apahāriṇaḥ | taiḥ dhanūṃṣi dhvaja agrāṇi carmāṇi ca śirāṃsi ca || 25.21 ||

-अत्यंत भीषण होकर राक्षसों के प्राण हरते हुए निकलते थे। उन बाणों से धनुष, ध्वजाओं के अग्रभाग, ढालें और सिर...

श्लोक 22 (aranya.25.22)

बहून् स हस्त आभरणान् ऊरून् करि कर उपमान् | चिछ्हेद रामः समरे शतशः अथ सहस्रशः ॥ 3.25.22 ॥

bahūn sa hasta ābharaṇān ūrūn kari kara upamān | cichheda rāmaḥ samare śataśaḥ atha sahasraśaḥ || 25.22 ||

-तथा आभूषणयुक्त अनेक भुजाओं और हाथी की सूँड जैसी जंघाओं को भी राम ने युद्ध में सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में काट डाला।

श्लोक 23 (aranya.25.23)

हयान् कांचन सन्नाहान् रथ युक्तान् स सारथीन् | गजाम् च स गज आरोहान् स हयान् सारधिनः तदा ॥ 3.25.23 ॥

hayān kāṃcana sannāhān ratha yuktān sa sārathīn | gajām ca sa gaja ārohān sa hayān sāradhinaḥ tadā || 25.23 ||

स्वर्ण-साजों से सुसज्जित, रथों में जुते हुए घोड़ों को उनके सारथियों सहित; हाथियों को उनके महावतों सहित; और घोड़ों को उनके सवारों सहित...

श्लोक 24 (aranya.25.24)

चिछ्हिदुः बिभिदुः च एव राम बाणा गुण च्युताः | पदातीन् समरे हत्वा हि अनयत् यम सदनम् ॥ 3.25.24 ॥

cichhiduḥ bibhiduḥ ca eva rāma bāṇā guṇa cyutāḥ | padātīn samare hatvā hi anayat yama sadanam || 25.24 ||

-राम के प्रत्यंचा से छूटे बाणों ने काट डाला और बींध डाला; और युद्ध में पैदल सैनिकों को मारकर उन्हें यमलोक भेज दिया।

श्लोक 25 (aranya.25.25)

ततो नालीक नाराचैः तीक्ष्ण अग्रैः विकर्णिभिः | भीमम् आर्त स्वरम् चक्रुः छ्हिद्यमाना निशाचराः ॥ 3.25.25 ॥

tato nālīka nārācaiḥ tīkṣṇa agraiḥ vikarṇibhiḥ | bhīmam ārta svaram cakruḥ chhidyamānā niśācarāḥ || 25.25 ||

तब नालीक, नाराच, तीक्ष्ण अग्रभाग वाले और पंखयुक्त बाणों से छिन्न-भिन्न होते हुए निशाचर भयंकर पीड़ा से चीत्कार करने लगे।

श्लोक 26 (aranya.25.26)

तत् सैन्यम् निशितैः बाणैः अर्दितम् मर्म भेदिभिः | न रामेण सुखम् लेभे शुष्कम् वनम् इव अग्निना ॥ 3.25.26 ॥

tat sainyam niśitaiḥ bāṇaiḥ arditam marma bhedibhiḥ | na rāmeṇa sukham lebhe śuṣkam vanam iva agninā || 25.26 ||

मर्मभेदी तीक्ष्ण बाणों से पीड़ित वह सेना राम के हाथों वैसे ही सुख नहीं पा सकी जैसे सूखा वन अग्नि से जलकर नहीं बच पाता।

श्लोक 27 (aranya.25.27)

केचिद् भीम बलाः शूराः प्रासान् शूलान् परश्वधान् | चिक्षिपुः परम क्रुद्धा रामाय रजनीचराः ॥ 3.25.27 ॥

kecid bhīma balāḥ śūrāḥ prāsān śūlān paraśvadhān | cikṣipuḥ parama kruddhā rāmāya rajanīcarāḥ || 25.27 ||

कुछ भयंकर बलशाली, शूरवीर निशाचरों ने अत्यंत क्रोध में आकर राम पर प्रास, शूल और फरसे फेंके।

श्लोक 28 (aranya.25.28)

तेषाम् बाणैः महाबाहुः शस्त्राणि आवार्य वीर्यवान् | जहार समरे प्राणान् चिच्छ्हेद च शिरो धरान् ॥ 3.25.28 ॥

teṣām bāṇaiḥ mahābāhuḥ śastrāṇi āvārya vīryavān | jahāra samare prāṇān cicchheda ca śiro dharān || 25.28 ||

महाबाहु, पराक्रमी राम ने अपने बाणों से उनके शस्त्रों को रोककर युद्ध में उनके प्राण हर लिए और उनके सिर काट डाले।

श्लोक 29 (aranya.25.29)

ते छ्हिन्न शिरसः पेतुः छ्हिन्न चर्म शरासनाः | सुपर्ण वात विक्षिप्ता जगत्याम् पादपा यथा ॥ 3.25.29 ॥

te chhinna śirasaḥ petuḥ chhinna carma śarāsanāḥ | suparṇa vāta vikṣiptā jagatyām pādapā yathā || 25.29 ||

उनके सिर कटकर गिर पड़े, ढालें और धनुष टूट गए, मानो गरुड़ के पंखों से उठी आँधी से वृक्ष धरती पर बिखर गए हों।

श्लोक 30 (aranya.25.30)

अवशिष्टाः च ये तत्र विषण्णाः ते निशाचराः | खरम् एव अभ्यधावन्त शरणार्थम् शर आहताः ॥ 3.25.30 ॥

avaśiṣṭāḥ ca ye tatra viṣaṇṇāḥ te niśācarāḥ | kharam eva abhyadhāvanta śaraṇārtham śara āhatāḥ || 25.30 ||

जो निशाचर वहाँ शेष बचे थे, वे विषण्ण होकर और बाणों से आहत होकर शरण के लिए खर की ओर ही दौड़े।

श्लोक 31 (aranya.25.31)

तान् सर्वान् धनुर् आदाय समाश्वास्य च दूषणः | अभ्यधावत सुसंक्रुद्धः क्रुद्धः क्रुद्ध इव अन्तकः ॥ 3.25.31 ॥

tān sarvān dhanur ādāya samāśvāsya ca dūṣaṇaḥ | abhyadhāvata susaṃkruddhaḥ kruddhaḥ kruddha iva antakaḥ || 25.31 ||

उन सबको धीरज बंधाकर और धनुष उठाकर दूषण अत्यंत क्रुद्ध होकर क्रुद्ध राम की ओर वैसे ही झपटा जैसे क्रुद्ध यमराज।

श्लोक 32 (aranya.25.32)

निवृत्ताः तु पुनः सर्वे दूषण आश्रय निर्भयाः | रामम् एव अभ्यधावन्त साल ताल शिल आयुधाः ॥ 3.25.32 ॥

nivṛttāḥ tu punaḥ sarve dūṣaṇa āśraya nirbhayāḥ | rāmam eva abhyadhāvanta sāla tāla śila āyudhāḥ || 25.32 ||

तब दूषण की शरण पाकर निर्भय हुए वे सभी राक्षस पुनः लौट आए और साल, ताल वृक्षों तथा शिलाओं को शस्त्र बनाकर राम पर ही टूट पड़े।

श्लोक 33 (aranya.25.33)

शूल मुद्गर हस्ताः च पाश हस्ता महाबलाः | सृजन्तः शर वर्षाणि शस्त्र वर्षाणि संयुगे ॥ 3.25.33 ॥

śūla mudgara hastāḥ ca pāśa hastā mahābalāḥ | sṛjantaḥ śara varṣāṇi śastra varṣāṇi saṃyuge || 25.33 ||

शूल, मुद्गर और पाश हाथों में लिए वे महाबली राक्षस युद्ध में बाणों और शस्त्रों की वर्षा करते हुए,

श्लोक 34 (aranya.25.34)

द्रुम वर्षाणि मुंचन्तः शिला वर्षाणि राक्षसाः | तद् बभूव अद्भुतम् युद्धम् तुमुलम् रोम हर्षणम् ॥ 3.25.34 ॥

druma varṣāṇi muṃcantaḥ śilā varṣāṇi rākṣasāḥ | tad babhūva adbhutam yuddham tumulam roma harṣaṇam || 25.34 ||

-तथा वृक्षों और शिलाओं की वर्षा करने लगे। वह युद्ध अत्यंत अद्भुत, तुमुल और रोमांचकारी हो उठा,

श्लोक 35 (aranya.25.35)

रामस्य अस्य महाघोरम् पुनः तेषाम् च रक्षसाम् | ते समन्तात् अभिक्रुद्धा राघवम् पुनर् आर्दयन् ॥ 3.25.35 ॥

rāmasya asya mahāghoram punaḥ teṣām ca rakṣasām | te samantāt abhikruddhā rāghavam punar ārdayan || 25.35 ||

-इस राम और उन राक्षसों के बीच पुनः अत्यंत भयंकर हो उठा। चारों ओर से क्रुद्ध होकर वे राघव को पुनः पीड़ित करने लगे।

श्लोक 36 (aranya.25.36)

ततः सर्वा दिशो दृष्ट्वा प्रदिशाः च समावृताः | राक्षसैः सर्वतः प्राप्तैः शर वर्षाभिः आवृतः ॥ 3.25.36 ॥

tataḥ sarvā diśo dṛṣṭvā pradiśāḥ ca samāvṛtāḥ | rākṣasaiḥ sarvataḥ prāptaiḥ śara varṣābhiḥ āvṛtaḥ || 25.36 ||

तब सभी दिशाओं और उपदिशाओं को राक्षसों से भरा हुआ देखकर, जो चारों ओर से आकर बाणों की वर्षा कर रहे थे,

श्लोक 37 (aranya.25.37)

स कृत्वा भैरवम् नादम् अस्त्रम् परम भास्वरम् | समयोजयत् गान्धर्वम् राक्षसेषु महाबलः ॥ 3.25.37 ॥

sa kṛtvā bhairavam nādam astram parama bhāsvaram | samayojayat gāndharvam rākṣaseṣu mahābalaḥ || 25.37 ||

-उस महाबली राम ने भयंकर गर्जना करते हुए राक्षसों पर परम तेजस्वी गांधर्व-अस्त्र का प्रयोग किया।

श्लोक 38 (aranya.25.38)

ततः शर सहस्राणि निर्ययुः चाप मण्डलात् | सर्वा दश दिशो बानैः आपूर्यन्त समागतैः ॥ 3.25.38 ॥

tataḥ śara sahasrāṇi niryayuḥ cāpa maṇḍalāt | sarvā daśa diśo bānaiḥ āpūryanta samāgataiḥ || 25.38 ||

तब उनके धनुष के मंडल से हज़ारों बाण निकल पड़े, और समस्त दस दिशाएँ उन एकत्र हुए बाणों से भर गईं।

श्लोक 39 (aranya.25.39)

न आददानाम् शरान् घोरान् विमुंचंतम् शर उत्तमान् | विकर्षमाणम् पश्यन्ति राक्षसाः ते शर आर्दिताः ॥ 3.25.39 ॥

na ādadānām śarān ghorān vimuṃcaṃtam śara uttamān | vikarṣamāṇam paśyanti rākṣasāḥ te śara ārditāḥ || 25.39 ||

उन बाणों से पीड़ित राक्षस यह भी नहीं देख पा रहे थे कि वे भयंकर बाण कब निकाले जा रहे हैं, कब चढ़ाए जा रहे हैं और कब छोड़े जा रहे हैं।

श्लोक 40 (aranya.25.40)

शर अन्धकारम् आकाशम् आवृणोत् स दिवाकरम् | बभूव अवस्थितो रामः प्रक्षिपन् इव तान् शरान् ॥ 3.25.40 ॥

śara andhakāram ākāśam āvṛṇot sa divākaram | babhūva avasthito rāmaḥ prakṣipan iva tān śarān || 25.40 ||

बाणों के अंधकार ने सूर्यसहित आकाश को ढँक दिया, और राम मानो निरंतर उन बाणों की वर्षा करते हुए स्थिर खड़े रहे।

श्लोक 41 (aranya.25.41)

युगपत् पतमानैः च युगपच्च हतैः भ्रिशम् | युगपत् पतितैः चैव विकीर्णा वसुधा अभवत् ॥ 3.25.41 ॥

yugapat patamānaiḥ ca yugapacca hataiḥ bhriśam | yugapat patitaiḥ caiva vikīrṇā vasudhā abhavat || 25.41 ||

एक साथ गिरते हुए, एक साथ मारे गए और एक साथ पड़े हुए राक्षसों से समस्त पृथ्वी बिखर गई।

श्लोक 42 (aranya.25.42)

निहताः पतिताः क्षीणा च्छ्हिन्न भिन्न विदारिताः | तत्र तत्र स्म दृश्यन्ते राक्षसाः ते सहस्रशः ॥ 3.25.42 ॥

nihatāḥ patitāḥ kṣīṇā cchhinna bhinna vidāritāḥ | tatra tatra sma dṛśyante rākṣasāḥ te sahasraśaḥ || 25.42 ||

मारे गए, गिरे हुए, क्षीण, कटे-फटे और विदीर्ण राक्षस वहाँ-वहाँ हज़ारों की संख्या में दिखाई देने लगे।

श्लोक 43 (aranya.25.43)

स उष्णीषैः उत्तम अंगैः च स अंगदैः बाहुभिः तथा | ऊरुभिः बाहुभिः च्छ्हिन्नैः नाना रूपैः विभूषणैः ॥ 3.25.43 ॥

sa uṣṇīṣaiḥ uttama aṃgaiḥ ca sa aṃgadaiḥ bāhubhiḥ tathā | ūrubhiḥ bāhubhiḥ cchhinnaiḥ nānā rūpaiḥ vibhūṣaṇaiḥ || 25.43 ||

-पगड़ी सहित सिर, अंगद सहित भुजाएँ, तथा कटी हुई जंघाएँ और भुजाएँ, नाना प्रकार के आभूषणों से युक्त,

श्लोक 44 (aranya.25.44)

हयैः च द्विप मुख्यैः च रथैः भिन्नैः अनेकशः | चामर व्यजनैः छ्हत्रैः ध्वजैः नाना विधैः अपि ॥ 3.25.44 ॥

hayaiḥ ca dvipa mukhyaiḥ ca rathaiḥ bhinnaiḥ anekaśaḥ | cāmara vyajanaiḥ chhatraiḥ dhvajaiḥ nānā vidhaiḥ api || 25.44 ||

-अनेक प्रकार से टूटे हुए घोड़ों, श्रेष्ठ हाथियों और रथों के साथ, तथा चंवरों, पंखों, छत्रों और विविध ध्वजाओं के साथ,

श्लोक 45 (aranya.25.45)

रामेण बाण अभिहतैः विच्छ्हिन्नैः शूल पट्टिशैः | खड्गैः खण्डीकृतैः प्रासैः विकीर्णैः च पश्वधैः ॥ 3.25.45 ॥

rāmeṇa bāṇa abhihataiḥ vicchhinnaiḥ śūla paṭṭiśaiḥ | khaḍgaiḥ khaṇḍīkṛtaiḥ prāsaiḥ vikīrṇaiḥ ca paśvadhaiḥ || 25.45 ||

-राम के बाणों से आहत होकर टूटे हुए शूल और पट्टिश, खंड-खंड हुई तलवारें, और बिखरे हुए प्रास और फरसे,

श्लोक 46 (aranya.25.46)

चूणिताभिः शिलाभिः च शरैः चित्रैः अनेकशः | विच्छ्हिन्नैः समरे भूमिः विस्तीर्णा आभूत् भयंकरा ॥ 3.25.46 ॥

cūṇitābhiḥ śilābhiḥ ca śaraiḥ citraiḥ anekaśaḥ | vicchhinnaiḥ samare bhūmiḥ vistīrṇā ābhūt bhayaṃkarā || 25.46 ||

-और चूर-चूर हुई शिलाओं तथा अनेक टूटे-फूटे सुंदर बाणों से भरकर वह विस्तृत रणभूमि अत्यंत भयंकर दिखाई देने लगी।

श्लोक 47 (aranya.25.47)

तान् दृष्ट्वा निहतान् सर्वे रक्षसाः परम आतुराः | न तत्र चलितुम् शक्ता रामम् पर पुरंजयम् ॥ 3.25.47 ॥

tān dṛṣṭvā nihatān sarve rakṣasāḥ parama āturāḥ | na tatra calitum śaktā rāmam para puraṃjayam || 25.47 ||

उन सभी मारे गए राक्षसों को देखकर शेष बचे राक्षस अत्यंत व्याकुल हो उठे और शत्रु-नगरों के विजेता राम के सामने हिलने तक में असमर्थ हो गए।

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