Skip to main content

अरण्यकाण्ड · सर्ग 27

त्रिशिरा-वध

सर्ग 26सर्ग-सूचीसर्ग 28

श्लोक 1 (aranya.27.1)

खरं तु रामाभिमुखं प्रयान्तं वाहिनीपतिः। राक्षसस्त्रिशिरा नाम संनिपत्येदमब्रवीत् ॥ 27.1 ॥

kharaṃ tu rāmābhimukhaṃ prayāntaṃ vāhinīpatiḥ | rākṣasastriśirā nāma saṃnipatyedamabravīt || 27.1 ||

जब खर राम के सम्मुख आगे बढ़ने ही वाला था, तब सेनापति त्रिशिरा नामक राक्षस उसके निकट जाकर यह बोला -

श्लोक 2 (aranya.27.2)

मां नियोजय विक्रान्तं त्वं निवर्तस्व साहसात्। पश्य रामं महाबाहुं संयुगे विनिपातितम् ॥ 27.2 ॥

māṃ niyojaya vikrāntaṃ tvaṃ nivartasva sāhasāt | paśya rāmaṃ mahābāhuṃ saṃyuge vinipātitam || 27.2 ||

"साहस से हटकर मुझ पराक्रमी को इस कार्य में लगाइए। अभी देखिए, मैं महाबाहु राम को युद्ध में गिराकर दिखाता हूँ।

श्लोक 3 (aranya.27.3)

प्रतिजानामि ते सत्यमायुधं चाहमालभे। यथा रामं वधिष्यामि वधार्हं सर्वरक्षसाम् ॥ 27.3 ॥

pratijānāmi te satyamāyudhaṃ cāhamālabhe | yathā rāmaṃ vadhiṣyāmi vadhārhaṃ sarvarakṣasām || 27.3 ||

मैं अपने अस्त्र की शपथ लेकर आपसे सत्य वचन देता हूँ कि जो राम समस्त राक्षसों द्वारा वध्य है, उसका वध मैं ही करूँगा।

श्लोक 4 (aranya.27.4)

अहं वास्य रणे मृत्युरेष वा समरे मम। विनिवर्त्य रणोत्साहं मुहूर्तं प्राश्निको भव ॥ 27.4 ॥

ahaṃ vāsya raṇe mṛtyureṣa vā samare mama | vinivartya raṇotsāhaṃ muhūrtaṃ prāśniko bhava || 27.4 ||

अपने युद्ध के उत्साह को रोककर आप कुछ क्षण के लिए साक्षी बन जाइए - या तो युद्ध में मैं उसकी मृत्यु बनूँगा, या वह मेरी।

श्लोक 5 (aranya.27.5)

प्रहृष्टो वा हते रामे जनस्थानं प्रयास्यसि। मयि वा निहते रामं संयुगाय प्रयास्यसि ॥ 27.5 ॥

prahṛṣṭo vā hate rāme janasthānaṃ prayāsyasi | mayi vā nihate rāmaṃ saṃyugāya prayāsyasi || 27.5 ||

यदि राम मारा गया तो आप प्रसन्न होकर जनस्थान लौट जाइएगा, और यदि मैं मारा गया तो आप स्वयं राम से युद्ध करने आ जाइएगा।" ऐसा त्रिशिरा ने खर से कहा।

श्लोक 6 (aranya.27.6)

खरस्त्रिशिरसा तेन मृत्युलोभात् प्रसादितः। गच्छ युध्येत्यनुज्ञातो राघवाभिमुखो ययौ ॥ 27.6 ॥

kharastriśirasā tena mṛtyulobhāt prasāditaḥ | gaccha yudhyetyanujñāto rāghavābhimukho yayau || 27.6 ||

मृत्यु के लोभी उस त्रिशिरा के आग्रह से मनाया गया खर ने "जाओ, युद्ध करो" कहकर उसे अनुमति दे दी, और वह राघव के सम्मुख चल पड़ा।

श्लोक 7 (aranya.27.7)

त्रिशिरास्तु रथेनैव वाजियुक्तेन भास्वता। अभ्यद्रवद् रणे रामं त्रिशृङ्ग इव पर्वतः ॥ 27.7 ॥

triśirāstu rathenaiva vājiyuktena bhāsvatā | abhyadravad raṇe rāmaṃ triśṛṅga iva parvataḥ || 27.7 ||

त्रिशिरा घोड़ों से युक्त अपने चमकते रथ पर सवार होकर युद्ध में राम की ओर वैसे ही दौड़ा, जैसे तीन शिखरों वाला कोई पर्वत बढ़ रहा हो।

श्लोक 8 (aranya.27.8)

शरधारासमूहान् स महामेघ इवोत्सृजन्। व्यसृजत् सदृशं नादं जलार्द्रस्येव दुन्दुभेः ॥ 27.8 ॥

śaradhārāsamūhān sa mahāmegha ivotsṛjan | vyasṛjat sadṛśaṃ nādaṃ jalārdrasyeva dundubheḥ || 27.8 ||

वह विशाल मेघ के समान बाणों की धाराएँ बरसाता हुआ, जल से भीगे हुए नगाड़े की सी ध्वनि गुँजा रहा था।

श्लोक 9 (aranya.27.9)

आगच्छन्तं त्रिशिरसं राक्षसं प्रेक्ष्य राघवः। धनुषा प्रतिजग्राह विधुन्वन् सायकान् शितान् ॥ 27.9 ॥

āgacchantaṃ triśirasaṃ rākṣasaṃ prekṣya rāghavaḥ | dhanuṣā pratijagrāha vidhunvan sāyakān śitān || 27.9 ||

आते हुए राक्षस त्रिशिरा को देखकर राघव ने धनुष से तीक्ष्ण बाण चलाते हुए उसका स्वागत किया।

श्लोक 10 (aranya.27.10)

स सम्प्रहारस्तुमुलो रामत्रिशिरसोस्तदा। सम्बभूवातिबलिनोः सिंहकुञ्जरयोरिव ॥ 27.10 ॥

sa samprahārastumulo rāmatriśirasostadā | sambabhūvātibalinoḥ siṃhakuñjarayoriva || 27.10 ||

तब राम और त्रिशिरा के बीच वह घमासान संग्राम वैसा ही हुआ जैसा किसी अत्यंत बलवान सिंह और गजराज के बीच होता है।

श्लोक 11 (aranya.27.11)

ततस्त्रिशिरसा बाणैर्ललाटे ताडितस्त्रिभिः। अमर्षी कुपितो रामः संरब्ध इदमब्रवीत् ॥ 27.11 ॥

tatastriśirasā bāṇairlalāṭe tāḍitastribhiḥ | amarṣī kupito rāmaḥ saṃrabdha idamabravīt || 27.11 ||

तत्पश्चात् त्रिशिरा द्वारा तीन बाणों से ललाट पर आहत होकर, पहले से ही क्रुद्ध राम का क्रोध और भी बढ़ गया, और वह क्षुब्ध होकर यह बोले -

श्लोक 12 (aranya.27.12)

अहो विक्रमशूरस्य राक्षसस्येदृशं बलम्। पुष्पैरिव शरैर्योऽहं ललाटेऽस्मि परिक्षतः ॥ 27.12 ॥

aho vikramaśūrasya rākṣasasyedṛśaṃ balam | puṣpairiva śarairyo'haṃ lalāṭe'smi parikṣataḥ || 27.12 ||

"अहो! इस पराक्रमी राक्षस का बल तो देखो - जिसके बाण मेरे ललाट को मानो फूलों के समान हलका सा छू भर रहे हैं!

श्लोक 13 (aranya.27.13)

ममापि प्रतिगृह्णीष्व शरांश्चापगुणाच्च्युतान्। एवमुक्त्वा सुसंरब्धः शरानाशीविषोपमान् ॥ 27.13 ॥

mamāpi pratigṛhṇīṣva śarāṃścāpaguṇāccyutān | evamuktvā susaṃrabdhaḥ śarānāśīviṣopamān || 27.13 ||

अब मेरे धनुष की डोरी से छूटते हुए बाणों को भी सहन करो।" ऐसा कहकर अत्यंत क्षुब्ध राम ने विषधर सर्पों के समान चौदह बाण त्रिशिरा की छाती पर मारे,

श्लोक 14 (aranya.27.14)

त्रिशिरोवक्षसि क्रुद्धो निजघान चतुर्दश। चतुर्भिस्तुरगानस्य शरैः संनतपर्वभिः ॥ 27.14 ॥

triśirovakṣasi kruddho nijaghāna caturdaśa | caturbhisturagānasya śaraiḥ saṃnataparvabhiḥ || 27.14 ||

और क्रोध में त्रिशिरा की छाती पर चौदह बाण मारे, तथा चार मुड़े हुए फल वाले बाणों से उसके रथ के चार घोड़ों को भी मार गिराया।

श्लोक 15 (aranya.27.15)

न्यपातयत तेजस्वी चतुरस्तस्य वाजिनः। अष्टभिः सायकैः सूतं रथोपस्थे न्यपातयत् ॥ 27.15 ॥

nyapātayata tejasvī caturastasya vājinaḥ | aṣṭabhiḥ sāyakaiḥ sūtaṃ rathopasthe nyapātayat || 27.15 ||

तेजस्वी राम ने उसके चारों घोड़ों को गिरा दिया, तथा आठ बाणों से सारथी को रथ की सीट से नीचे गिरा दिया।

श्लोक 16 (aranya.27.16)

रामश्चिच्छेद बाणेन ध्वजं चास्य समुच्छ्रितम्। ततो हतरथात् तस्मादुत्पतन्तं निशाचरम् ॥ 27.16 ॥

rāmaściccheda bāṇena dhvajaṃ cāsya samucchritam | tato hatarathāt tasmādutpatantaṃ niśācaram || 27.16 ||

राम ने एक बाण से उसकी ऊँची फहराती हुई ध्वजा को भी काट डाला। तत्पश्चात् टूटे हुए रथ से कूदते हुए उस निशाचर को,

श्लोक 17 (aranya.27.17)

चिच्छेद रामस्तं बाणैर्हृदये सोऽभवज्जडः। सायकैश्चाप्रमेयात्मा सामर्षस्तस्य रक्षसः ॥ 27.17 ॥

ciccheda rāmastaṃ bāṇairhṛdaye so'bhavajjaḍaḥ | sāyakaiścāprameyātmā sāmarṣastasya rakṣasaḥ || 27.17 ||

राम ने बाणों से हृदय में बींध डाला, जिससे वह जड़वत् हो गया। तदुपरांत अतुलनीय सामर्थ्यवान राम ने उस राक्षस पर क्रुद्ध होकर,

श्लोक 18 (aranya.27.18)

शिरांस्यपातयत् त्रीणि वेगवद्भिस्त्रिभिः शरैः। स धूमशोणितोद्गारी रामबाणाभिपीडितः ॥ 27.18 ॥

śirāṃsyapātayat trīṇi vegavadbhistribhiḥ śaraiḥ | sa dhūmaśoṇitodgārī rāmabāṇābhipīḍitaḥ || 27.18 ||

तीन वेगवान तीक्ष्ण बाणों से उसके तीनों सिर काट गिराए। रामबाणों से अत्यंत पीड़ित वह निशाचर,

श्लोक 19 (aranya.27.19)

न्यपतत् पतितैः पूर्वं समरस्थो निशाचरः। हतशेषास्ततो भग्ना राक्षसाः खरसंश्रयाः ॥ 27.19 ॥

nyapatat patitaiḥ pūrvaṃ samarastho niśācaraḥ | hataśeṣāstato bhagnā rākṣasāḥ kharasaṃśrayāḥ || 27.19 ||

धुएँ के साथ रक्त उगलता हुआ, युद्धभूमि में खड़ा-खड़ा ही, अभी-अभी गिरे हुए अपने ही सिरों के बीच गिर पड़ा। इसके बाद खर के आश्रय में बचे राक्षस, अपना साहस खोकर,

श्लोक 20 (aranya.27.20)

द्रवन्ति स्म न तिष्ठन्ति व्याघ्रत्रस्ता मृगा इव। तान् खरो द्रवतो दृष्ट्वा निवर्त्य रुषितस्त्वरन्। राममेवाभिदुद्राव राहुश्चन्द्रमसं यथा ॥ 27.20 ॥

dravanti sma na tiṣṭhanti vyāghratrastā mṛgā iva | tān kharo dravato dṛṣṭvā nivartya ruṣitastvaran | rāmamevābhidudrāva rāhuścandramasaṃ yathā || 27.20 ||

बाघ से डरे हुए हिरणों की भाँति भागने लगे और ठहरे नहीं। भागते हुए उन्हें देखकर क्रुद्ध खर ने उन्हें रोककर शीघ्रता से लौटाया, और स्वयं वैसे ही राम की ओर झपटा जैसे राहु चंद्रमा की ओर झपटता है।

सर्ग 26सर्ग-सूचीसर्ग 28