Skip to main content

अरण्यकाण्ड · सर्ग 28

खर-राम युद्ध

सर्ग 27सर्ग-सूचीसर्ग 29

श्लोक 1 (aranya.28.1)

निहतं दूषणं दृष्ट्वा रणे त्रिशिरसा सह। खरस्याप्यभवत् त्रासो दृष्ट्वा रामस्य विक्रमम् ॥ 28.1 ॥

nihataṃ dūṣaṇaṃ dṛṣṭvā raṇe triśirasā saha | kharasyāpyabhavat trāso dṛṣṭvā rāmasya vikramam || 28.1 ||

युद्ध में त्रिशिरा सहित दूषण को मारा गया देखकर तथा राम के पराक्रम को देखकर, खर भी भयभीत हो उठा।

श्लोक 2 (aranya.28.2)

स दृष्ट्वा राक्षसं सैन्यमविषह्यं महाबलम्। हतमेकेन रामेण दूषणस्त्रिशिरा अपि ॥ 28.2 ॥

sa dṛṣṭvā rākṣasaṃ sainyamaviṣahyaṃ mahābalam | hatamekena rāmeṇa dūṣaṇastriśirā api || 28.2 ||

उस असहनीय एवं महाबली राक्षस-सेना को, तथा दूषण और त्रिशिरा को भी अकेले राम द्वारा मारा गया देखकर,

श्लोक 3 (aranya.28.3)

तद्बलं हतभूयिष्ठं विमनाः प्रेक्ष्य राक्षसः। आससाद खरो रामं नमुचिर्वासवं यथा ॥ 28.3 ॥

tadbalaṃ hatabhūyiṣṭhaṃ vimanāḥ prekṣya rākṣasaḥ | āsasāda kharo rāmaṃ namucirvāsavaṃ yathā || 28.3 ||

और अपनी उस सेना को लगभग पूर्णतः नष्ट देखकर, उदास मन वाला राक्षस खर राम की ओर वैसे ही बढ़ा जैसे नमुचि इंद्र की ओर बढ़ा था।

श्लोक 4 (aranya.28.4)

विकृष्य बलवच्चापं नाराचान् रक्तभोजनान्। खरश्चिक्षेप रामाय क्रुद्धानाशीविषानिव ॥ 28.4 ॥

vikṛṣya balavaccāpaṃ nārācān raktabhojanān | kharaścikṣepa rāmāya kruddhānāśīviṣāniva || 28.4 ||

अपने बलशाली धनुष को खींचकर, खर ने राम पर रक्त-भक्षी लौह-बाण छोड़े, मानो वे क्रुद्ध विषैले सर्प हों।

श्लोक 5 (aranya.28.5)

ज्यां विधुन्वन् सुबहुशः शिक्षयास्त्राणि दर्शयन्। चचार समरे मार्गान् शरै रथगतः खरः ॥ 28.5 ॥

jyāṃ vidhunvan subahuśaḥ śikṣayāstrāṇi darśayan | cacāra samare mārgān śarai rathagataḥ kharaḥ || 28.5 ||

बार-बार धनुष की डोरी को झंकृत करते हुए, अपनी अस्त्र-विद्या का प्रदर्शन करते हुए, रथ पर सवार खर बाणों की कुशलता दिखाते हुए युद्धभूमि में इधर-उधर घूमने लगा।

श्लोक 6 (aranya.28.6)

स सर्वाश्च दिशो बाणैः प्रदिशश्च महारथः। पूरयामास तं दृष्ट्वा रामोऽपि सुमहद् धनुः ॥ 28.6 ॥

sa sarvāśca diśo bāṇaiḥ pradiśaśca mahārathaḥ | pūrayāmāsa taṃ dṛṣṭvā rāmo'pi sumahad dhanuḥ || 28.6 ||

उस महारथी ने अपने बाणों से समस्त दिशाओं और विदिशाओं को भर दिया; यह देखकर राम ने भी अपना विशाल धनुष उठा लिया।

श्लोक 7 (aranya.28.7)

स सायकैर्दुर्विषहैर्विस्फुलिङ्गैरिवाग्निभिः। नभश्चकाराविवरं पर्जन्य इव वृष्टिभिः ॥ 28.7 ॥

sa sāyakairdurviṣahairvisphuliṅgairivāgnibhiḥ | nabhaścakārāvivaraṃ parjanya iva vṛṣṭibhiḥ || 28.7 ||

राम ने असहनीय, चिंगारियाँ बिखेरती अग्नि के समान बाणों से आकाश को वैसे ही निःशेष भर दिया जैसे मेघ वर्षा की धाराओं से भर देता है।

श्लोक 8 (aranya.28.8)

तद् बभूव शितैर्बाणैः खररामविसर्जितैः। पर्याकाशमनाकाशं सर्वतः शरसंकुलम् ॥ 28.8 ॥

tad babhūva śitairbāṇaiḥ khararāmavisarjitaiḥ | paryākāśamanākāśaṃ sarvataḥ śarasaṃkulam || 28.8 ||

खर और राम दोनों द्वारा छोड़े गए तीक्ष्ण बाणों से आकाश-मंडल, जो पहले खुला था, अब सब ओर से बाणों से इस प्रकार भर गया कि उसमें कोई रिक्त स्थान न रहा।

श्लोक 9 (aranya.28.9)

शरजालावृतः सूर्यो न तदा स्म प्रकाशते। अन्योन्यवधसंरम्भादुभयोः सम्प्रयुध्यतोः ॥ 28.9 ॥

śarajālāvṛtaḥ sūryo na tadā sma prakāśate | anyonyavadhasaṃrambhādubhayoḥ samprayudhyatoḥ || 28.9 ||

एक-दूसरे के वध की उत्कंठा में परस्पर युद्ध करते हुए दोनों के बाणों के जाल से आवृत सूर्य उस समय प्रकाशित नहीं हो रहा था।

श्लोक 10 (aranya.28.10)

ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः। आजघान रणे रामं तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥ 28.10 ॥

tato nālīkanārācaistīkṣṇāgraiśca vikarṇibhiḥ | ājaghāna raṇe rāmaṃ totrairiva mahādvipam || 28.10 ||

तब नालीक, नाराच तथा तीक्ष्ण नोक वाले विकर्णी बाणों से खर ने युद्ध में राम पर वैसे ही प्रहार किया जैसे किसी विशाल हाथी पर अंकुश से प्रहार किया जाता है।

श्लोक 11 (aranya.28.11)

तं रथस्थं धनुष्पाणिं राक्षसं पर्यवस्थितम्। ददृशुः सर्वभूतानि पाशहस्तमिवान्तकम् ॥ 28.11 ॥

taṃ rathasthaṃ dhanuṣpāṇiṃ rākṣasaṃ paryavasthitam | dadṛśuḥ sarvabhūtāni pāśahastamivāntakam || 28.11 ||

रथ पर खड़े, हाथ में धनुष लिए युद्ध के लिए तत्पर उस राक्षस को देखकर समस्त प्राणियों को वह मानो हाथ में पाश लिए साक्षात् काल जैसा प्रतीत हुआ।

श्लोक 12 (aranya.28.12)

हन्तारं सर्वसैन्यस्य पौरुषे पर्यवस्थितम्। परिश्रान्तं महासत्त्वं मेने रामं खरस्तदा ॥ 28.12 ॥

hantāraṃ sarvasainyasya pauruṣe paryavasthitam | pariśrāntaṃ mahāsattvaṃ mene rāmaṃ kharastadā || 28.12 ||

खर ने उस समय यह समझ लिया कि जिस महाबली राम ने अपना पौरुष दिखाकर समस्त सेना का संहार किया है, वह अब तक अत्यंत थक चुका होगा।

श्लोक 13 (aranya.28.13)

तं सिंहमिव विक्रान्तं सिंहविक्रान्तगामिनम्। दृष्ट्वा नोद्विजते रामः सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥ 28.13 ॥

taṃ siṃhamiva vikrāntaṃ siṃhavikrāntagāminam | dṛṣṭvā nodvijate rāmaḥ siṃhaḥ kṣudramṛgaṃ yathā || 28.13 ||

परंतु सिंह के समान पराक्रमी और सिंह की ही चाल से बढ़ते हुए खर को देखकर भी राम विचलित नहीं हुए, जैसे सिंह किसी तुच्छ पशु को देखकर विचलित नहीं होता।

श्लोक 14 (aranya.28.14)

ततः सूर्यनिकाशेन रथेन महता खरः। आससादाथ तं रामं पतङ्ग इव पावकम् ॥ 28.14 ॥

tataḥ sūryanikāśena rathena mahatā kharaḥ | āsasādātha taṃ rāmaṃ pataṅga iva pāvakam || 28.14 ||

तत्पश्चात् सूर्य के समान तेजस्वी अपने विशाल रथ पर खर उस राम के निकट वैसे ही पहुँचा जैसे पतंगा अग्नि के निकट पहुँचता है।

श्लोक 15 (aranya.28.15)

ततोऽस्य सशरं चापं मुष्टिदेशे महात्मनः। खरश्चिच्छेद रामस्य दर्शयन् हस्तलाघवम् ॥ 28.15 ॥

tato'sya saśaraṃ cāpaṃ muṣṭideśe mahātmanaḥ | kharaściccheda rāmasya darśayan hastalāghavam || 28.15 ||

तत्पश्चात् हाथ की फुर्ती दिखाते हुए खर ने महात्मा राम के धनुष को बाण सहित मुट्ठी के स्थान पर ही काट डाला।

श्लोक 16 (aranya.28.16)

स पुनस्त्वपरान् सप्त शरानादाय मर्मणि। निजघान रणे क्रुद्धः शक्राशनिसमप्रभान् ॥ 28.16 ॥

sa punastvaparān sapta śarānādāya marmaṇi | nijaghāna raṇe kruddhaḥ śakrāśanisamaprabhān || 28.16 ||

फिर भी क्रुद्ध होकर उसने इंद्र के वज्र के समान तेजस्वी सात और बाण लेकर युद्ध में राम के कवच पर प्रहार किया।

श्लोक 17 (aranya.28.17)

ततः शरसहस्रेण राममप्रतिमौजसम्। अर्दयित्वा महानादं ननाद समरे खरः ॥ 28.17 ॥

tataḥ śarasahasreṇa rāmamapratimaujasam | ardayitvā mahānādaṃ nanāda samare kharaḥ || 28.17 ||

तत्पश्चात् अनुपम तेजस्वी राम को सहस्र बाणों से पीड़ित कर, खर ने युद्धभूमि में जोर से गर्जना की।

श्लोक 18 (aranya.28.18)

ततस्तत्प्रहतं बाणैः खरमुक्तैः सुपर्वभिः। पपात कवचं भूमौ रामस्यादित्यवर्चसम् ॥ 28.18 ॥

tatastatprahataṃ bāṇaiḥ kharamuktaiḥ suparvabhiḥ | papāta kavacaṃ bhūmau rāmasyādityavarcasam || 28.18 ||

खर द्वारा छोड़े गए सुदृढ़ बाणों की चोट से आहत होकर राम का सूर्य के समान तेजस्वी कवच टूटकर भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 19 (aranya.28.19)

स शरैरर्पितः क्रुद्धः सर्वगात्रेषु राघवः। रराज समरे रामो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ 28.19 ॥

sa śarairarpitaḥ kruddhaḥ sarvagātreṣu rāghavaḥ | rarāja samare rāmo vidhūmo'gniriva jvalan || 28.19 ||

सभी अंगों में बाणों से बिंधकर क्रुद्ध हुए राघव राम युद्ध में धुआँरहित प्रज्वलित अग्नि के समान देदीप्यमान हो उठे।

श्लोक 20 (aranya.28.20)

ततो गम्भीरनिर्ह्रादं रामः शत्रुनिबर्हणः। चकारान्ताय स रिपोः सज्यमन्यन्महद्धनुः ॥ 28.20 ॥

tato gambhīranirhrādaṃ rāmaḥ śatrunibarhaṇaḥ | cakārāntāya sa ripoḥ sajyamanyanmahaddhanuḥ || 28.20 ||

तब शत्रुओं का नाश करने वाले राम ने शत्रु का अंत करने के लिए गंभीर गर्जना करने वाला एक और विशाल धनुष धारण किया।

श्लोक 21 (aranya.28.21)

सुमहद् वैष्णवं यत् तदतिसृष्टं महर्षिणा। वरं तद् धनुरुद्यम्य खरं समभिधावत ॥ 28.21 ॥

sumahad vaiṣṇavaṃ yat tadatisṛṣṭaṃ maharṣiṇā | varaṃ tad dhanurudyamya kharaṃ samabhidhāvata || 28.21 ||

महर्षि (अगस्त्य) द्वारा प्रदान किए गए उस अत्यंत श्रेष्ठ वैष्णव धनुष को उठाकर, राम खर की ओर वेग से दौड़े।

श्लोक 22 (aranya.28.22)

ततः कनकपुङ्खैस्तु शरैः संनतपर्वभिः। चिच्छेद रामः संक्रुद्धः खरस्य समरे ध्वजम् ॥ 28.22 ॥

tataḥ kanakapuṅkhaistu śaraiḥ saṃnataparvabhiḥ | ciccheda rāmaḥ saṃkruddhaḥ kharasya samare dhvajam || 28.22 ||

तब अत्यंत क्रुद्ध राम ने सुवर्ण-दंडयुक्त, मुड़ी हुई गाँठों वाले बाणों से युद्ध में खर की ध्वजा काट डाली।

श्लोक 23 (aranya.28.23)

स दर्शनीयो बहुधा विच्छिन्नः काञ्चनो ध्वजः। जगाम धरणीं सूर्यो देवतानामिवाज्ञया ॥ 28.23 ॥

sa darśanīyo bahudhā vicchinnaḥ kāñcano dhvajaḥ | jagāma dharaṇīṃ sūryo devatānāmivājñayā || 28.23 ||

वह सुंदर सुवर्ण ध्वज कई टुकड़ों में कटकर धरती पर इस प्रकार गिरा मानो देवताओं की आज्ञा से सूर्य ही पृथ्वी पर गिर पड़ा हो।

श्लोक 24 (aranya.28.24)

तं चतुर्भिः खरः क्रुद्धो रामं गात्रेषु मार्गणैः। विव्याध हृदि मर्मज्ञो मातङ्गमिव तोमरैः ॥ 28.24 ॥

taṃ caturbhiḥ kharaḥ kruddho rāmaṃ gātreṣu mārgaṇaiḥ | vivyādha hṛdi marmajño mātaṅgamiva tomaraiḥ || 28.24 ||

क्रुद्ध होकर तथा मर्मस्थलों का ज्ञाता खर ने चार बाणों से राम की छाती और अंगों पर वैसे ही प्रहार किया जैसे किसी हाथी को भालों से बींधा जाता है।

श्लोक 25 (aranya.28.25)

स रामो बहुभिर्बाणैः खरकार्मुकनिःसृतैः। विद्धो रुधिरसिक्ताङ्गो बभूव रुषितो भृशम् ॥ 28.25 ॥

sa rāmo bahubhirbāṇaiḥ kharakārmukaniḥsṛtaiḥ | viddho rudhirasiktāṅgo babhūva ruṣito bhṛśam || 28.25 ||

खर के धनुष से छूटे अनेक बाणों से बिंधकर, रक्त से सने अंगों वाले राम अत्यंत क्षुब्ध हो उठे।

श्लोक 26 (aranya.28.26)

स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठः संगृह्य परमाहवे। मुमोच परमेष्वासः षट् शरानभिलक्षितान् ॥ 28.26 ॥

sa dhanurdhanvināṃ śreṣṭhaḥ saṃgṛhya paramāhave | mumoca parameṣvāsaḥ ṣaṭ śarānabhilakṣitān || 28.26 ||

तब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ, महान धनुर्धर राम ने उस भीषण युद्ध में अपना धनुष उठाकर छह सुनिश्चित लक्ष्य वाले बाण छोड़े।

श्लोक 27 (aranya.28.27)

शिरस्येकेन बाणेन द्वाभ्यां बाह्वोरथार्पयत् । त्रिभिश्चन्द्रार्धवक्त्रैश्च वक्षस्यभिजघान ह ॥ 28.27 ॥

śirasyekena bāṇena dvābhyāṃ bāhvorathārpayat | tribhiścandrārdhavaktraiśca vakṣasyabhijaghāna ha || 28.27 ||

एक बाण से खर के सिर पर, दो बाणों से उसकी भुजाओं पर प्रहार किया, तथा तीन अर्धचंद्राकार बाणों से उसकी छाती पर वार किया।

श्लोक 28 (aranya.28.28)

ततः पश्चान्महातेजा नाराचान् भास्करोपमान्। जघान राक्षसं क्रुद्धस्त्रयोदश शिलाशितान् ॥ 28.28 ॥

tataḥ paścānmahātejā nārācān bhāskaropamān | jaghāna rākṣasaṃ kruddhastrayodaśa śilāśitān || 28.28 ||

तत्पश्चात् महातेजस्वी राम ने क्रुद्ध होकर उस राक्षस के वध हेतु सूर्य के समान तेजस्वी, पत्थर पर तेज किए गए तेरह लौह-बाण छोड़े।

श्लोक 29 (aranya.28.29)

रथस्य युगमेकेन चतुर्भिः शबलान् हयान्। षष्ठेन च शिरः संख्ये चिच्छेद खरसारथेः ॥ 28.29 ॥

rathasya yugamekena caturbhiḥ śabalān hayān | ṣaṣṭhena ca śiraḥ saṃkhye ciccheda kharasāratheḥ || 28.29 ||

एक बाण से रथ के जुए को, चार बाणों से चार चितकबरे घोड़ों को, तथा छठे बाण से युद्ध में खर के सारथी का सिर काट डाला।

श्लोक 30 (aranya.28.30)

त्रिभिस्त्रिवेणून् बलवान् द्वाभ्यामक्षं महाबलः। द्वादशेन तु बाणेन खरस्य सशरं धनुः ॥ 28.30 ॥

tribhistriveṇūn balavān dvābhyāmakṣaṃ mahābalaḥ | dvādaśena tu bāṇena kharasya saśaraṃ dhanuḥ || 28.30 ||

उस महाबली ने तीन बाणों से रथ की त्रिवेणी को, दो बाणों से धुरी को, तथा बारहवें बाण से खर के धनुष को उस पर चढ़े बाण सहित काट डाला।

श्लोक 31 (aranya.28.31)

छित्त्वा वज्रनिकाशेन राघवः प्रहसन्निव। त्रयोदशेनेन्द्रसमो बिभेद समरे खरम् ॥ 28.31 ॥

chittvā vajranikāśena rāghavaḥ prahasanniva | trayodaśenendrasamo bibheda samare kharam || 28.31 ||

इस प्रकार धनुष को काटकर, इंद्र के समान पराक्रमी राघव ने मानो मुस्कुराते हुए, तेरहवें वज्र-तुल्य बाण से युद्ध में खर को बींध डाला।

श्लोक 32 (aranya.28.32)

प्रभग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः। गदापाणिरवप्लुत्य तस्थौ भूमौ खरस्तदा ॥ 28.32 ॥

prabhagnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ | gadāpāṇiravaplutya tasthau bhūmau kharastadā || 28.32 ||

धनुष टूट चुका था, रथ नष्ट हो चुका था, घोड़े और सारथी मारे जा चुके थे - तब खर गदा हाथ में लेकर रथ से कूद पड़ा और भूमि पर दृढ़ता से खड़ा हो गया।

श्लोक 33 (aranya.28.33)

तत् कर्म रामस्य महारथस्य समेत्य देवाश्च महर्षयश्च। अपूजयन् प्राञ्जलयः प्रहृष्टा- स्तदा विमानाग्रगताः समेताः ॥ 28.33 ॥

tat karma rāmasya mahārathasya sametya devāśca maharṣayaśca | apūjayan prāñjalayaḥ prahṛṣṭā- stadā vimānāgragatāḥ sametāḥ || 28.33 ||

उस समय देवगण और महर्षिगण अपने विमानों के अग्रभाग में एकत्र होकर, अत्यंत हर्षित होकर, हाथ जोड़कर उस महारथी राम के उस पराक्रम की वंदना करने लगे।

सर्ग 27सर्ग-सूचीसर्ग 29