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अरण्यकाण्ड · सर्ग 30

खर-वध

सर्ग 29सर्ग-सूचीसर्ग 31

श्लोक 1 (aranya.30.1)

भित्त्वा तु तां गदां बाणै राघवो धर्मवत्सलः। स्मयमान इदं वाक्यं संरब्धमिदमब्रवीत् ॥ 30.1 ॥

bhittvā tu tāṃ gadāṃ bāṇai rāghavo dharmavatsalaḥ | smayamāna idaṃ vākyaṃ saṃrabdhamidamabravīt || 30.1 ||

उस गदा को बाणों से चूर-चूर कर, धर्म के प्रति स्नेह रखने वाले राघव ने मुस्कुराते हुए क्रोधित खर से यह वचन कहा -

श्लोक 2 (aranya.30.2)

एतत् ते बलसर्वस्वं दर्शितं राक्षसाधम। शक्तिहीनतरो मत्तो वृथा त्वमुपगर्जसि ॥ 30.2 ॥

etat te balasarvasvaṃ darśitaṃ rākṣasādhama | śaktihīnataro matto vṛthā tvamupagarjasi || 30.2 ||

"अरे नीच राक्षस! यही तेरे और तेरी सेना का समस्त बल था, जो अब पूरी तरह प्रकट हो गया। मेरी तुलना में तू अत्यंत शक्तिहीन है, फिर भी व्यर्थ गरज रहा है।

श्लोक 3 (aranya.30.3)

एषा बाणविनिर्भिन्ना गदा भूमितलं गता। अभिधानप्रगल्भस्य तव प्रत्ययघातिनी ॥ 30.3 ॥

eṣā bāṇavinirbhinnā gadā bhūmitalaṃ gatā | abhidhānapragalbhasya tava pratyayaghātinī || 30.3 ||

जिस गदा पर तुझे इतना घमंड था, वह बाणों से चूर-चूर होकर धरती पर गिर चुकी है, और साथ ही तेरा वह अहंकार भी।

श्लोक 4 (aranya.30.4)

यत् त्वयोक्तं विनष्टानामिदमश्रुप्रमार्जनम्। राक्षसानां करोमीति मिथ्या तदपि ते वचः ॥ 30.4 ॥

yat tvayoktaṃ vinaṣṭānāmidamaśrupramārjanam | rākṣasānāṃ karomīti mithyā tadapi te vacaḥ || 30.4 ||

तूने जो कहा था कि 'मैं मारे गए राक्षसों के आँसू पोंछूँगा', वह भी तेरा झूठा वचन ही है।

श्लोक 5 (aranya.30.5)

नीचस्य क्षुद्रशीलस्य मिथ्यावृत्तस्य रक्षसः। प्राणानपहरिष्यामि गरुत्मानमृतं यथा ॥ 30.5 ॥

nīcasya kṣudraśīlasya mithyāvṛttasya rakṣasaḥ | prāṇānapahariṣyāmi garutmānamṛtaṃ yathā || 30.5 ||

नीच, क्षुद्र स्वभाव वाले और मिथ्याचारी ऐसे राक्षस, तेरे प्राण मैं वैसे ही हर लूँगा जैसे गरुड़ ने अमृत हर लिया था।

श्लोक 6 (aranya.30.6)

अद्य ते भिन्नकण्ठस्य फेनबुद्बुदभूषितम्। विदारितस्य मद्बाणैर्मही पास्यति शोणितम् ॥ 30.6 ॥

adya te bhinnakaṇṭhasya phenabudbudabhūṣitam | vidāritasya madbāṇairmahī pāsyati śoṇitam || 30.6 ||

आज मेरे बाणों से तेरा कंठ चीरकर पृथ्वी फेन और बुलबुलों से सुसज्जित तेरा रक्त पी जाएगी।

श्लोक 7 (aranya.30.7)

पांसुरूषितसर्वाङ्गः स्रस्तन्यस्तभुजद्वयः। स्वप्स्यसे गां समाश्लिष्य दुर्लभां प्रमदामिव ॥ 30.7 ॥

pāṃsurūṣitasarvāṅgaḥ srastanyastabhujadvayaḥ | svapsyase gāṃ samāśliṣya durlabhāṃ pramadāmiva || 30.7 ||

धूल से लिपटे सारे अंगों और शिथिल पड़ी दोनों भुजाओं के साथ तू पृथ्वी को वैसे ही आलिंगन कर सोएगा जैसे कोई दुर्लभ प्रेयसी को आलिंगन करता है।

श्लोक 8 (aranya.30.8)

प्रवृद्धनिद्रे शयिते त्वयि राक्षसपांसने। भविष्यन्ति शरण्यानां शरण्या दण्डका इमे ॥ 30.8 ॥

pravṛddhanidre śayite tvayi rākṣasapāṃsane | bhaviṣyanti śaraṇyānāṃ śaraṇyā daṇḍakā ime || 30.8 ||

हे राक्षसाधम! जब तू इस गहरी नींद में सो जाएगा, तब यह दंडकारण्य फिर से शरणागतों के लिए सच्ची शरणस्थली बन जाएगा।

श्लोक 9 (aranya.30.9)

जनस्थाने हतस्थाने तव राक्षस मच्छरैः। निर्भया विचरिष्यन्ति सर्वतो मुनयो वने ॥ 30.9 ॥

janasthāne hatasthāne tava rākṣasa maccharaiḥ | nirbhayā vicariṣyanti sarvato munayo vane || 30.9 ||

हे राक्षस! मेरे बाणों से तेरे जनस्थान का गढ़ नष्ट हो जाने पर, मुनि इस वन में सर्वत्र निर्भय होकर विचरण करेंगे।

श्लोक 10 (aranya.30.10)

अद्य विप्रसरिष्यन्ति राक्षस्यो हतबान्धवाः। बाष्पार्द्रवदना दीना भयादन्यभयावहाः ॥ 30.10 ॥

adya viprasariṣyanti rākṣasyo hatabāndhavāḥ | bāṣpārdravadanā dīnā bhayādanyabhayāvahāḥ || 30.10 ||

आज वे राक्षसियाँ, जो दूसरों को भयभीत करती थीं, अपने बांधवों के मारे जाने पर आँसुओं से भीगे मुख लिए स्वयं भयभीत होकर इधर-उधर भागेंगी।

श्लोक 11 (aranya.30.11)

अद्य शोकरसज्ञास्ता भविष्यन्ति निरर्थिकाः। अनुरूपकुलाः पत्न्यो यासां त्वं पतिरीदृशः ॥ 30.11 ॥

adya śokarasajñāstā bhaviṣyanti nirarthikāḥ | anurūpakulāḥ patnyo yāsāṃ tvaṃ patirīdṛśaḥ || 30.11 ||

आज तेरे जैसे पति की योग्य पत्नियाँ, जो तेरे ही समान कुल की हैं, शोक का स्वाद चखेंगी - उनका जीवन अब निरर्थक हो जाएगा।

श्लोक 12 (aranya.30.12)

नृशंसशील क्षुद्रात्मन् नित्यं ब्राह्मणकण्टक। त्वत्कृते शङ्कितैरग्नौ मुनिभिः पात्यते हविः ॥ 30.12 ॥

nṛśaṃsaśīla kṣudrātman nityaṃ brāhmaṇakaṇṭaka | tvatkṛte śaṅkitairagnau munibhiḥ pātyate haviḥ || 30.12 ||

हे क्रूर स्वभाव वाले, क्षुद्र आत्मा वाले, ब्राह्मणों के लिए सदा काँटे के समान! तेरे ही कारण भयभीत मुनियों को यज्ञ में हवि शीघ्रता से डालनी पड़ती है।"

श्लोक 13 (aranya.30.13)

तमेवमभिसंरब्धं ब्रुवाणं राघवं वने। खरो निर्भर्त्सयामास रोषात् खरतरस्वरः ॥ 30.13 ॥

tamevamabhisaṃrabdhaṃ bruvāṇaṃ rāghavaṃ vane | kharo nirbhartsayāmāsa roṣāt kharatarasvaraḥ || 30.13 ||

वन में इस प्रकार अत्यंत क्रोध से बोलते हुए राघव को सुनकर खर भी क्रोध में अपनी कर्कश वाणी से उन्हें फटकारने लगा।

श्लोक 14 (aranya.30.14)

दृढं खल्ववलिप्तोऽसि भयेष्वपि च निर्भयः। वाच्यावाच्यं ततो हि त्वं मृत्योर्वश्यो न बुध्यसे ॥ 30.14 ॥

dṛḍhaṃ khalvavalipto'si bhayeṣvapi ca nirbhayaḥ | vācyāvācyaṃ tato hi tvaṃ mṛtyorvaśyo na budhyase || 30.14 ||

"तू निश्चय ही अत्यंत अहंकारी है, भय के स्थान पर भी निर्भय बना हुआ है; इसीलिए मृत्यु के वश में पड़कर तुझे यह भी ज्ञान नहीं रहा कि क्या कहने योग्य है और क्या नहीं।

श्लोक 15 (aranya.30.15)

कालपाशपरिक्षिप्ता भवन्ति पुरुषा हि ये। कार्याकार्यं न जानन्ति ते निरस्तषडिन्द्रियाः ॥ 30.15 ॥

kālapāśaparikṣiptā bhavanti puruṣā hi ye | kāryākāryaṃ na jānanti te nirastaṣaḍindriyāḥ || 30.15 ||

जिन पुरुषों को काल का पाश जकड़ लेता है, वे यह भी नहीं जान पाते कि क्या करना उचित है और क्या अनुचित, क्योंकि उनकी छहों इंद्रियाँ शक्तिहीन हो जाती हैं।"

श्लोक 16 (aranya.30.16)

एवमुक्त्वा ततो रामं संरुध्य भृकुटिं ततः। स ददर्श महासालमविदूरे निशाचरः ॥ 30.16 ॥

evamuktvā tato rāmaṃ saṃrudhya bhṛkuṭiṃ tataḥ | sa dadarśa mahāsālamavidūre niśācaraḥ || 30.16 ||

इस प्रकार राम से कहकर वह निशाचर भौंहें चढ़ाकर, समीप ही एक विशाल साल वृक्ष को देखने लगा।

श्लोक 17 (aranya.30.17)

रणे प्रहरणस्यार्थे सर्वतो ह्यवलोकयन्। स तमुत्पाटयामास संदष्टदशनच्छदम् ॥ 30.17 ॥

raṇe praharaṇasyārthe sarvato hyavalokayan | sa tamutpāṭayāmāsa saṃdaṣṭadaśanacchadam || 30.17 ||

युद्ध में प्रहार करने के लिए शस्त्र ढूँढ़ते हुए, वह होंठ भींचकर उस वृक्ष को जड़ से उखाड़ने लगा।

श्लोक 18 (aranya.30.18)

तं समुत्क्षिप्य बाहुभ्यां विनर्दित्वा महाबलः। राममुद्दिश्य चिक्षेप हतस्त्वमिति चाब्रवीत् ॥ 30.18 ॥

taṃ samutkṣipya bāhubhyāṃ vinarditvā mahābalaḥ | rāmamuddiśya cikṣepa hatastvamiti cābravīt || 30.18 ||

उस महाबली ने दोनों भुजाओं से उसे उठाकर, जोर से गरजते हुए राम को लक्ष्य बनाकर फेंक दिया और चिल्लाया - "अब तू मारा गया!"

श्लोक 19 (aranya.30.19)

तमापतन्तं बाणौघैश्छित्त्वा रामः प्रतापवान्। रोषमाहारयत् तीव्रं निहन्तुं समरे खरम् ॥ 30.19 ॥

tamāpatantaṃ bāṇaughaiśchittvā rāmaḥ pratāpavān | roṣamāhārayat tīvraṃ nihantuṃ samare kharam || 30.19 ||

प्रतापी राम ने आते हुए उस वृक्ष को बाणों की झड़ी से काट डाला, और युद्ध में खर का वध करने के लिए उनके भीतर तीव्र क्रोध उमड़ पड़ा।

श्लोक 20 (aranya.30.20)

जातस्वेदस्ततो रामो रोषरक्तान्तलोचनः। निर्बिभेद सहस्रेण बाणानां समरे खरम् ॥ 30.20 ॥

jātasvedastato rāmo roṣaraktāntalocanaḥ | nirbibheda sahasreṇa bāṇānāṃ samare kharam || 30.20 ||

तब पसीने से तर, क्रोध से लाल हुए नेत्रों के कोनों वाले राम ने युद्ध में सहस्र बाणों से खर को छलनी कर डाला।

श्लोक 21 (aranya.30.21)

तस्य बाणान्तराद् रक्तं बहु सुस्राव फेनिलम्। गिरेः प्रस्रवणस्येव धाराणां च परिस्रवः ॥ 30.21 ॥

tasya bāṇāntarād raktaṃ bahu susrāva phenilam | gireḥ prasravaṇasyeva dhārāṇāṃ ca parisravaḥ || 30.21 ||

बाणों से बने घावों से खर का प्रचुर, झागयुक्त रक्त वैसे ही बहने लगा जैसे किसी पर्वत की ढलानों से जलधाराएँ बह निकलती हैं।

श्लोक 22 (aranya.30.22)

विकलः स कृतो बाणैः खरो रामेण संयुगे। मत्तो रुधिरगन्धेन तमेवाभ्यद्रवद् द्रुतम् ॥ 30.22 ॥

vikalaḥ sa kṛto bāṇaiḥ kharo rāmeṇa saṃyuge | matto rudhiragandhena tamevābhyadravad drutam || 30.22 ||

राम के बाणों से विकल होकर तथा अपने ही रक्त की गंध से उन्मत्त होकर खर फिर भी वेग से राम की ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 23 (aranya.30.23)

तमापतन्तं संक्रुद्धं कृतास्त्रो रुधिराप्लुतम्। अपासर्पद् द्वित्रिपदं किंचित्त्वरितविक्रमः ॥ 30.23 ॥

tamāpatantaṃ saṃkruddhaṃ kṛtāstro rudhirāplutam | apāsarpad dvitripadaṃ kiṃcittvaritavikramaḥ || 30.23 ||

रक्त से लथपथ, क्रोध से भरे उसे आते देखकर, अस्त्रविद्या में निपुण, फुर्तीले राम दो-तीन कदम पीछे हट गए।

श्लोक 24 (aranya.30.24)

ततः पावकसंकाशं वधाय समरे शरम्। खरस्य रामो जग्राह ब्रह्मदण्डमिवापरम् ॥ 30.24 ॥

tataḥ pāvakasaṃkāśaṃ vadhāya samare śaram | kharasya rāmo jagrāha brahmadaṇḍamivāparam || 30.24 ||

तब राम ने खर के वध के लिए अग्नि के समान तेजस्वी, मानो ब्रह्मदंड के समान एक अन्य बाण उठा लिया।

श्लोक 25 (aranya.30.25)

स तद् दत्तं मघवता सुरराजेन धीमता। संदधे च स धर्मात्मा मुमोच च खरं प्रति ॥ 30.25 ॥

sa tad dattaṃ maghavatā surarājena dhīmatā | saṃdadhe ca sa dharmātmā mumoca ca kharaṃ prati || 30.25 ||

उस धर्मात्मा राम ने बुद्धिमान देवराज इंद्र द्वारा दिए गए उसी बाण को धनुष पर चढ़ाकर खर की ओर छोड़ दिया।

श्लोक 26 (aranya.30.26)

स विमुक्तो महाबाणो निर्घातसमनिःस्वनः। रामेण धनुरायम्य खरस्योरसि चापतत् ॥ 30.26 ॥

sa vimukto mahābāṇo nirghātasamaniḥsvanaḥ | rāmeṇa dhanurāyamya kharasyorasi cāpatat || 30.26 ||

राम द्वारा धनुष को कान तक खींचकर छोड़ा गया वह वज्रपात के समान गर्जना करता विशाल बाण खर की छाती में जा घुसा।

श्लोक 27 (aranya.30.27)

स पपात खरो भूमौ दह्यमानः शराग्निना। रुद्रेणेव विनिर्दग्धः श्वेतारण्ये यथान्धकः ॥ 30.27 ॥

sa papāta kharo bhūmau dahyamānaḥ śarāgninā | rudreṇeva vinirdagdhaḥ śvetāraṇye yathāndhakaḥ || 30.27 ||

उस बाण की अग्नि से जलता हुआ खर पृथ्वी पर वैसे ही गिर पड़ा जैसे श्वेतारण्य में रुद्र द्वारा पूर्णतः भस्म किया गया अंधक गिरा था।

श्लोक 28 (aranya.30.28)

स वृत्र इव वज्रेण फेनेन नमुचिर्यथा। बलो वेन्द्राशनिहतो निपपात हतः खरः ॥ 30.28 ॥

sa vṛtra iva vajreṇa phenena namuciryathā | balo vendrāśanihato nipapāta hataḥ kharaḥ || 30.28 ||

जैसे वृत्रासुर वज्र से, नमुचि फेन से, अथवा बल इंद्र के वज्र से मारे गए थे, वैसे ही खर भी मारा जाकर गिर पड़ा।

श्लोक 29 (aranya.30.29)

एतस्मिन्नन्तरे देवाश्चारणैः सह संगताः। दुन्दुभींश्चाभिनिघ्नन्तः पुष्पवर्षं समन्ततः ॥ 30.29 ॥

etasminnantare devāścāraṇaiḥ saha saṃgatāḥ | dundubhīṃścābhinighnantaḥ puṣpavarṣaṃ samantataḥ || 30.29 ||

इसी बीच देवगण चारणों के साथ एकत्र होकर चारों ओर दुंदुभियाँ बजाते हुए पुष्पों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 30 (aranya.30.30)

रामस्योपरि संहृष्टा ववर्षुर्विस्मितास्तदा। अर्धाधिकमुहूर्तेन रामेण निशितैः शरैः ॥ 30.30 ॥

rāmasyopari saṃhṛṣṭā vavarṣurvismitāstadā | ardhādhikamuhūrtena rāmeṇa niśitaiḥ śaraiḥ || 30.30 ||

वे अत्यंत हर्षित और विस्मित होकर राम पर पुष्प बरसाते रहे, यह सोचकर कि डेढ़ मुहूर्त से भी कम समय में राम ने अपने तीक्ष्ण बाणों से,

श्लोक 31 (aranya.30.31)

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां कामरूपिणाम्। खरदूषणमुख्यानां निहतानि महामृधे ॥ 30.31 ॥

caturdaśa sahasrāṇi rakṣasāṃ kāmarūpiṇām | kharadūṣaṇamukhyānāṃ nihatāni mahāmṛdhe || 30.31 ||

खर और दूषण जैसे प्रमुख नायकों सहित इच्छानुसार रूप बदलने वाले चौदह हजार राक्षसों को उस महासंग्राम में मार गिराया।

श्लोक 32 (aranya.30.32)

अहो बत महत्कर्म रामस्य विदितात्मनः। अहो वीर्यमहो दार्ढ्यं विष्णोरिव हि दृश्यते ॥ 30.32 ॥

aho bata mahatkarma rāmasya viditātmanaḥ | aho vīryamaho dārḍhyaṃ viṣṇoriva hi dṛśyate || 30.32 ||

"अहा! विदितात्मा राम का यह कैसा महान कर्म है! अहा, कैसा पराक्रम, कैसी दृढ़ता! सचमुच यह तो साक्षात् विष्णु के समान प्रतीत होता है!"

श्लोक 33 (aranya.30.33)

इत्येवमुक्त्वा ते सर्वे ययुर्देवा यथागतम्। ततो राजर्षयः सर्वे संगताः परमर्षयः ॥ 30.33 ॥

ityevamuktvā te sarve yayurdevā yathāgatam | tato rājarṣayaḥ sarve saṃgatāḥ paramarṣayaḥ || 30.33 ||

ऐसा कहकर वे सभी देवता जैसे आए थे वैसे ही लौट गए। तत्पश्चात् अगस्त्य सहित सभी राजर्षि और परम ऋषिगण एकत्र होकर,

श्लोक 34 (aranya.30.34)

सभाज्य मुदिता रामं सागस्त्या इदमब्रुवन्। एतदर्थं महातेजा महेन्द्रः पाकशासनः ॥ 30.34 ॥

sabhājya muditā rāmaṃ sāgastyā idamabruvan | etadarthaṃ mahātejā mahendraḥ pākaśāsanaḥ || 30.34 ||

प्रसन्न होकर राम का सम्मान करते हुए यह बोले - "इसी प्रयोजन से महातेजस्वी, पाक-दैत्य के दमनकर्ता, पुरंदर महेंद्र,

श्लोक 35 (aranya.30.35)

शरभङ्गाश्रमं पुण्यमाजगाम पुरंदरः। आनीतस्त्वमिमं देशमुपायेन महर्षिभिः ॥ 30.35 ॥

śarabhaṅgāśramaṃ puṇyamājagāma puraṃdaraḥ | ānītastvamimaṃ deśamupāyena maharṣibhiḥ || 30.35 ||

शरभंग के पुण्य आश्रम में आए थे। महर्षियों ने ही उपाय द्वारा तुम्हें इस प्रदेश में लाया है,

श्लोक 36 (aranya.30.36)

एषां वधार्थं शत्रूणां रक्षसां पापकर्मणाम्। तदिदं नः कृतं कार्यं त्वया दशरथात्मज ॥ 30.36 ॥

eṣāṃ vadhārthaṃ śatrūṇāṃ rakṣasāṃ pāpakarmaṇām | tadidaṃ naḥ kṛtaṃ kāryaṃ tvayā daśarathātmaja || 30.36 ||

पापकर्मी शत्रु राक्षसों के वध के लिए ही। हे दशरथनंदन! हमारा वह कार्य आज तुमने ही पूर्ण कर दिया है।

श्लोक 37 (aranya.30.37)

स्वधर्मं प्रचरिष्यन्ति दण्डकेषु महर्षयः। एतस्मिन्नन्तरे वीरो लक्ष्मणः सह सीतया ॥ 30.37 ॥

svadharmaṃ pracariṣyanti daṇḍakeṣu maharṣayaḥ | etasminnantare vīro lakṣmaṇaḥ saha sītayā || 30.37 ||

अब महर्षिगण दंडकारण्य में निर्बाध रूप से अपने-अपने धर्म का आचरण करेंगे।" इसी बीच वीर लक्ष्मण सीता सहित,

श्लोक 38 (aranya.30.38)

गिरिदुर्गाद् विनिष्क्रम्य संविवेशाश्रमे सुखी ततो रामस्तु विजयी पूज्यमानो महर्षिभिः ॥ 30.38 ॥

giridurgād viniṣkramya saṃviveśāśrame sukhī tato rāmastu vijayī pūjyamāno maharṣibhiḥ || 30.38 ||

पर्वत की गुफा से बाहर निकलकर सुखपूर्वक आश्रम में लौट आए। तत्पश्चात् महर्षियों द्वारा पूजित विजयी राम भी,

श्लोक 39 (aranya.30.39)

प्रविवेशाश्रमं वीरो लक्ष्मणेनाभिपूजितः। तं दृष्ट्वा शत्रुहन्तारं महर्षीणां सुखावहम् ॥ 30.39 ॥

praviveśāśramaṃ vīro lakṣmaṇenābhipūjitaḥ | taṃ dṛṣṭvā śatruhantāraṃ maharṣīṇāṃ sukhāvaham || 30.39 ||

लक्ष्मण द्वारा सादर स्वागत किए जाकर आश्रम में प्रविष्ट हुए। शत्रुओं के संहारक तथा महर्षियों को सुख देने वाले उन्हें देखकर,

श्लोक 40 (aranya.30.40)

बभूव हृष्टा वैदेही भर्तारं परिषस्वजे। मुदा परमया युक्ता दृष्ट्वा रक्षोगणान् हतान्। रामं चैवाव्ययं दृष्ट्वा तुतोष जनकात्मजा ॥ 30.40 ॥

babhūva hṛṣṭā vaidehī bhartāraṃ pariṣasvaje | mudā paramayā yuktā dṛṣṭvā rakṣogaṇān hatān | rāmaṃ caivāvyayaṃ dṛṣṭvā tutoṣa janakātmajā || 30.40 ||

वैदेही अत्यंत हर्षित होकर अपने पति से लिपट गईं। राक्षस-समूह को मारा गया देखकर और राम को भी सर्वथा अक्षत देखकर, जनकनंदिनी परम आनंद से भर उठीं।

श्लोक 41 (aranya.30.41)

ततस्तु तं राक्षससङ्घमर्दनं सम्पूज्यमानं मुदितैर्महात्मभिः। पुनः परिष्वज्य मुदान्वितानना बभूव हृष्टा जनकात्मजा तदा ॥ 30.41 ॥

tatastu taṃ rākṣasasaṅghamardanaṃ sampūjyamānaṃ muditairmahātmabhiḥ | punaḥ pariṣvajya mudānvitānanā babhūva hṛṣṭā janakātmajā tadā || 30.41 ||

तत्पश्चात् प्रसन्न महात्माओं द्वारा सम्मानित, राक्षस-समूह के संहारक उस राम को हर्षित मुख वाली जनकनंदिनी सीता ने पुनः आलिंगन किया और वे अत्यंत आनंदित हो उठीं।

सर्ग 29सर्ग-सूचीसर्ग 31