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अरण्यकाण्ड · सर्ग 36

रावण की मारीच से सहायता-याचना

सर्ग 35सर्ग-सूचीसर्ग 37

श्लोक 1 (aranya.36.1)

मारीच श्रूयताम् तात वचनम् मम भाषतः । आर्तो अस्मि मम च आर्तस्य भवान् हि परमा गतिः ॥ 36.1 ॥

mārīca śrūyatām tāta vacanam mama bhāṣataḥ | ārto asmi mama ca ārtasya bhavān hi paramā gatiḥ || 36.1 ||

"हे तात मारीच! मेरे कहे हुए वचन को ध्यान से सुनो। मैं अत्यंत व्याकुल हूँ, और व्याकुल जन के लिए तुम्हीं परम आश्रय हो।" इस प्रकार रावण ने मारीच को संबोधित किया।

श्लोक 2 (aranya.36.2)

जानीषे त्वम् जनस्थाने भ्राता यत्र खरो मम । दूषणः च महाबाहुः स्वसा शूर्पणखा च मे ॥ 36.2 ॥

jānīṣe tvam janasthāne bhrātā yatra kharo mama | dūṣaṇaḥ ca mahābāhuḥ svasā śūrpaṇakhā ca me || 36.2 ||

"तुम जानते हो कि जनस्थान में मेरा भाई खर, महाबाहु दूषण और मेरी बहन शूर्पणखा निवास करते हैं।

श्लोक 3 (aranya.36.3)

त्रिशिराः च महातेजा राक्षसः पिशित अशनः । अन्ये च बहवः शूरा लब्ध लक्षा निशाचराः ॥ 36.3 ॥

triśirāḥ ca mahātejā rākṣasaḥ piśita aśanaḥ | anye ca bahavaḥ śūrā labdha lakṣā niśācarāḥ || 36.3 ||

और महातेजस्वी मांस-भक्षी राक्षस त्रिशिरा भी वहीं है, तथा और भी बहुत-से शूरवीर निशाचर हैं जो अपने लक्ष्य को अचूक भेदते हैं।

श्लोक 4 (aranya.36.4)

वसन्ति मत् नियोगेन अधिवासम् च राक्षसः । बाधमाना महारण्ये मुनीन् ये धर्म चारिणः ॥ 36.4 ॥

vasanti mat niyogena adhivāsam ca rākṣasaḥ | bādhamānā mahāraṇye munīn ye dharma cāriṇaḥ || 36.4 ||

वे राक्षस मेरी ही आज्ञा से वहाँ निवास किए हुए हैं, और उस विशाल वन में धर्मपरायण मुनियों को निरंतर सताते रहते हैं।

श्लोक 5 (aranya.36.5)

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसाम् भीम कर्मणाम् । शूराणाम् लब्ध लक्षाणाम् खर चित्त अनुवर्तिनाम् ॥ 36.5 ॥

caturdaśa sahasrāṇi rakṣasām bhīma karmaṇām | śūrāṇām labdha lakṣāṇām khara citta anuvartinām || 36.5 ||

तुम यह भी जानते हो कि चौदह हजार भयंकर कर्मों वाले, शूरवीर, अचूक निशानेबाज राक्षस, जो खर की इच्छा का अनुसरण करते थे, वहाँ रहते थे —

श्लोक 6 (aranya.36.6)

ते तु इदानीम् जनस्थाने वसमाना महाबलाः । संगताः परम आयत्ता रामेण सह संयुगे ॥ 36.6 ॥

te tu idānīm janasthāne vasamānā mahābalāḥ | saṃgatāḥ parama āyattā rāmeṇa saha saṃyuge || 36.6 ||

वे ही महाबली राक्षस, जो उस समय जनस्थान में निवास कर रहे थे, अत्यंत उद्यत होकर राम के साथ युद्ध में जा भिड़े।

श्लोक 7 (aranya.36.7)

नाना शस्त्र प्रहरणाः खर प्रमुख राक्षसः । तेन संजात रोषेण रामेण रण मूर्धनि ॥ 36.7 ॥

nānā śastra praharaṇāḥ khara pramukha rākṣasaḥ | tena saṃjāta roṣeṇa rāmeṇa raṇa mūrdhani || 36.7 ||

खर आदि राक्षस नाना प्रकार के शस्त्रों और आयुधों से सुसज्जित होकर युद्ध के अग्रभाग में डटे थे; तभी क्रोध से भरे हुए राम ने,

श्लोक 8 (aranya.36.8)

अनुक्त्वा परुषम् किंचित् शरैर् व्यापारितम् धनुः । चतुर्दश सहस्राणि रक्षसाम् उग्र तेजसाम् ॥ 36.8 ॥

anuktvā paruṣam kiṃcit śarair vyāpāritam dhanuḥ | caturdaśa sahasrāṇi rakṣasām ugra tejasām || 36.8 ||

बिना कोई कठोर वचन कहे, अपने धनुष को बाणों से सक्रिय कर दिया, और उन चौदह हजार भयंकर तेजस्वी राक्षसों को,

श्लोक 9 (aranya.36.9)

निहतानि शरैः दीप्तैः मानुषेण पदातिना । खरः च निहतः संख्ये दूषणः च निपातितः ॥ 36.9 ॥

nihatāni śaraiḥ dīptaiḥ mānuṣeṇa padātinā | kharaḥ ca nihataḥ saṃkhye dūṣaṇaḥ ca nipātitaḥ || 36.9 ||

उस अकेले पैदल मनुष्य ने अपने प्रज्वलित बाणों से मार गिराया। खर भी उस युद्ध में मारा गया और दूषण भी धराशायी कर दिया गया।

श्लोक 10 (aranya.36.10)

हत्वा त्रिशिरसम् च अपि निर्भया दण्डकाः कृताः । पित्रा निरस्तः क्रुद्धेन स भार्यः क्षीण जीवितः ॥ 36.10 ॥

hatvā triśirasam ca api nirbhayā daṇḍakāḥ kṛtāḥ | pitrā nirastaḥ kruddhena sa bhāryaḥ kṣīṇa jīvitaḥ || 36.10 ||

त्रिशिरा को भी मारकर उसने दंडकवन को सर्वथा निर्भय बना दिया। वही राम, जिसे क्रुद्ध पिता ने त्याग दिया था, अपनी पत्नी सहित क्षीण होते जीवन को लिए वहाँ आया है,

श्लोक 11 (aranya.36.11)

स हन्ता तस्य सैन्यस्य रामः क्षत्रिय पांसनः । अशीलः कर्कशः तीक्ष्णो मूर्खो लुब्धो अजित इन्द्रियः ॥ 36.11 ॥

sa hantā tasya sainyasya rāmaḥ kṣatriya pāṃsanaḥ | aśīlaḥ karkaśaḥ tīkṣṇo mūrkho lubdho ajita indriyaḥ || 36.11 ||

वही राम, क्षत्रिय-कुल का कलंक, मेरी उस सेना का संहारक है। वह दुःशील, कठोर, उग्र, मूर्ख, लोभी और अजितेन्द्रिय है।

श्लोक 12 (aranya.36.12)

त्यक्त धर्मः तु अधर्म आत्मा भूतानाम् अहिते रतः । येन वैरम् विना अरण्ये सत्त्वम् आश्रित्य केवलम् ॥ 36.12 ॥

tyakta dharmaḥ tu adharma ātmā bhūtānām ahite rataḥ | yena vairam vinā araṇye sattvam āśritya kevalam || 36.12 ||

उसने धर्म को त्यागकर अधर्मात्मा का रूप ले लिया है, और सब प्राणियों के अहित में ही रत रहता है — वही, जिसने बिना किसी वैर के, केवल अपने बल के भरोसे उस वन में,

श्लोक 13 (aranya.36.13)

कर्ण नास अपहारेण भगिनी मे विरूपिता । तस्य भार्याम् जनस्थानात् सीताम् सुर सुत उपमाम् ॥ 36.13 ॥

karṇa nāsa apahāreṇa bhaginī me virūpitā | tasya bhāryām janasthānāt sītām sura suta upamām || 36.13 ||

मेरी बहन के कान और नाक काटकर उसे विरूप कर दिया। उसी की पत्नी सीता को, जो देवकन्या के समान सुंदर है, मैं जनस्थान से,

श्लोक 14 (aranya.36.14)

आनयिष्यामि विक्रम्य सहायः तत्र मे भव । त्वया हि अहम् सहायेन पार्श्वस्थेन महाबल ॥ 36.14 ॥

ānayiṣyāmi vikramya sahāyaḥ tatra me bhava | tvayā hi aham sahāyena pārśvasthena mahābala || 36.14 ||

बलपूर्वक हर लाऊँगा; उस कार्य में तुम मेरे सहायक बनो। हे महाबली, तुम्हें अपने साथ सहायक के रूप में पाकर,

श्लोक 15 (aranya.36.15)

भ्रातृभिः च सुरान् युद्धे समग्रान् न अभिचिंतये । तत् सहायो भव त्वम् मे समर्थो हि असि राक्षस ॥ 36.15 ॥

bhrātṛbhiḥ ca surān yuddhe samagrān na abhiciṃtaye | tat sahāyo bhava tvam me samartho hi asi rākṣasa || 36.15 ||

और अपने भाइयों को साथ लेकर, मैं युद्ध में समस्त देवताओं की भी कोई परवाह नहीं करता। इसलिए हे राक्षस, तुम मेरे सहायक बनो, क्योंकि तुम इसमें पूर्णतः समर्थ हो।

श्लोक 16 (aranya.36.16)

वीर्ये युद्धे च दर्पे च न हि अस्ति सदृशः तव । उपायतो महान् शूरो महा माय विशारदः ॥ 36.16 ॥

vīrye yuddhe ca darpe ca na hi asti sadṛśaḥ tava | upāyato mahān śūro mahā māya viśāradaḥ || 36.16 ||

पराक्रम में, युद्ध में और तेज में तुम्हारे समान कोई नहीं है। तुम उपायों में महान शूरवीर और माया-विद्या के परम ज्ञाता हो।

श्लोक 17 (aranya.36.17)

एतत् अर्थम् अहम् प्राप्तः त्वत् समीपम् निशाचर । शृणु तत् कर्म साहाय्ये यत् कार्यम् वचनात् मम ॥ 36.17 ॥

etat artham aham prāptaḥ tvat samīpam niśācara | śṛṇu tat karma sāhāyye yat kāryam vacanāt mama || 36.17 ||

हे निशाचर, इसी प्रयोजन से मैं तुम्हारे पास आया हूँ। मेरे कहने पर सहायता में तुम्हें जो कार्य करना है, उसे सुनो।

श्लोक 18 (aranya.36.18)

सौवर्णः त्वम् मृगो भूत्वा चित्रो रजत बिन्दुभिः । आश्रमे तस्य रामस्य सीतायाः प्रमुखे चर ॥ 36.18 ॥

sauvarṇaḥ tvam mṛgo bhūtvā citro rajata bindubhiḥ | āśrame tasya rāmasya sītāyāḥ pramukhe cara || 36.18 ||

तुम चाँदी जैसी बूँदों से चित्रित सुनहरा मृग बनकर, उस राम के आश्रम में सीता के सम्मुख विचरण करो।

श्लोक 19 (aranya.36.19)

त्वाम् तु निःसंशयम् सीता दृष्ट्वा तु मृग रूपिणम् । गृह्यताम् इति भर्तारम् लक्ष्मणम् च अभिधास्यति ॥ 36.19 ॥

tvām tu niḥsaṃśayam sītā dṛṣṭvā tu mṛga rūpiṇam | gṛhyatām iti bhartāram lakṣmaṇam ca abhidhāsyati || 36.19 ||

मृग-रूपधारी तुम्हें देखकर सीता निःसंदेह अपने पति से और लक्ष्मण से कहेगी — 'इसे पकड़ लो'।

श्लोक 20 (aranya.36.20)

ततः तयोः अपाये तु शून्ये सीताम् यथा सुखम् । निराबाधो हरिष्यामि राहुः चन्द्र प्रभाम् इव ॥ 36.20 ॥

tataḥ tayoḥ apāye tu śūnye sītām yathā sukham | nirābādho hariṣyāmi rāhuḥ candra prabhām iva || 36.20 ||

फिर उन दोनों के वहाँ से हट जाने पर, उस निर्जन स्थान में, मैं बिना किसी बाधा के सुखपूर्वक सीता का हरण कर लूँगा, जैसे राहु चंद्रमा की प्रभा को हर लेता है।

श्लोक 21 (aranya.36.21)

ततः पश्चात् सुखम् रामे भार्या आहरण कर्शिते । विस्रब्धम् प्रहरिष्यामि कृत अर्थेन अन्तर् आत्मना ॥ 36.21 ॥

tataḥ paścāt sukham rāme bhāryā āharaṇa karśite | visrabdham prahariṣyāmi kṛta arthena antar ātmanā || 36.21 ||

उसके पश्चात्, जब राम अपनी पत्नी के हरण से क्षीण और व्याकुल हो जाएगा, तब मैं अपने भीतर के मनोरथ को पूर्ण करके, निश्चिंत और सुखपूर्वक उस पर प्रहार करूँगा।" इस प्रकार रावण ने मारीच से निवेदन किया।

श्लोक 22 (aranya.36.22)

तस्य राम कथाम् श्रुत्वा मारीचस्य महात्मनः । शुष्कम् समभवत् वक्त्रम् परित्रस्तो बभूव च ॥ 36.22 ॥

tasya rāma kathām śrutvā mārīcasya mahātmanaḥ | śuṣkam samabhavat vaktram paritrasto babhūva ca || 36.22 ||

राम की यह बात सुनकर महात्मा मारीच का मुख पूरी तरह सूख गया और वह अत्यंत भयभीत हो गया।

श्लोक 23 (aranya.36.23)

ओष्टौ परिलिहन् शुष्कौ नेत्रैः अनिमिषैः इव । मृत भूत इव आर्तः तु रावणम् समुत् ईक्षतः ॥ 36.23 ॥

oṣṭau parilihan śuṣkau netraiḥ animiṣaiḥ iva | mṛta bhūta iva ārtaḥ tu rāvaṇam samut īkṣataḥ || 36.23 ||

वह अपने सूखे होठों को बार-बार जीभ से चाटते हुए, बिना पलक झपकाए दृष्टि से देखते हुए, मानो मृतक के समान व्याकुल होकर रावण की ओर ऊपर उठाकर देखने लगा।

श्लोक 24 (aranya.36.24)

स रावणम् त्रस्त विषण्ण चेता महावने राम पराक्रमज्ञः । कृत अंजलिः तत्त्वम् उवाच वाक्यम् हितम् च तस्मै हितम् आत्मनः च ॥ 36.24 ॥

sa rāvaṇam trasta viṣaṇṇa cetā mahāvane rāma parākramajñaḥ | kṛta aṃjaliḥ tattvam uvāca vākyam hitam ca tasmai hitam ātmanaḥ ca || 36.24 ||

भय और खेद से व्याकुल-हृदय, तथा उस विशाल वन में राम के पराक्रम को भलीभाँति जानने वाला वह मारीच, हाथ जोड़कर रावण से यथार्थ वचन कहने लगा, जो रावण के लिए भी हितकर था और स्वयं उसके अपने लिए भी।

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