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अरण्यकाण्ड · सर्ग 37

मारीच का हितोपदेश

सर्ग 36सर्ग-सूचीसर्ग 38

श्लोक 1 (aranya.37.1)

तत् श्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्य वाक्यम् वाक्य विशारदः । प्रत्युवाच महाप्राज्ञो मारीचो राक्षसेश्वरम् ॥ 37.1 ॥

tat śrutvā rākṣasendrasya vākyam vākya viśāradaḥ | pratyuvāca mahāprājño mārīco rākṣaseśvaram || 37.1 ||

राक्षसराज रावण की यह बात सुनकर, वाणी में निपुण और महाबुद्धिमान मारीच ने राक्षसों के उस स्वामी को उत्तर दिया।

श्लोक 2 (aranya.37.2)

सुलभाः पुरुषा राजन् सततम् प्रिय वादिनः । अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥ 37.2 ॥

sulabhāḥ puruṣā rājan satatam priya vādinaḥ | apriyasya ca pathyasya vaktā śrotā ca durlabhaḥ || 37.2 ||

"हे राजन्! सदैव मीठी बातें कहने वाले लोग सहज ही मिल जाते हैं, परन्तु अप्रिय होते हुए भी हितकर वचन कहने वाला, और उसे सुनने वाला दोनों ही दुर्लभ हैं।

श्लोक 3 (aranya.37.3)

न नूनम् बुध्यसे रामम् महावीर्यम् गुण उन्नतम् । अयुक्त चारः चपलो महेन्द्र वरुण उपमम् ॥ 37.3 ॥

na nūnam budhyase rāmam mahāvīryam guṇa unnatam | ayukta cāraḥ capalo mahendra varuṇa upamam || 37.3 ||

अपने गुप्तचरों के प्रति असावधान और चंचल-स्वभाव होने के कारण तुम निश्चय ही उस राम को नहीं पहचानते, जो महापराक्रमी, गुणों में उन्नत तथा इंद्र और वरुण के समान तेजस्वी है।

श्लोक 4 (aranya.37.4)

अपि स्वस्ति भवेत् तात सर्वेषाम् भुवि रक्षसाम् । अपि रामो न संक्रुद्धः कुर्यात् लोकम् अराक्षसम् ॥ 37.4 ॥

api svasti bhavet tāta sarveṣām bhuvi rakṣasām | api rāmo na saṃkruddhaḥ kuryāt lokam arākṣasam || 37.4 ||

हे तात! क्या पृथ्वी के समस्त राक्षसों का कल्याण हो सकेगा? कहीं क्रुद्ध हुआ राम इस संसार को राक्षस-रहित ही न बना दे!

श्लोक 5 (aranya.37.5)

अपि ते जीवित अंताय न उत्पन्ना जनकात्मजा । अपि सीता निमित्तम् च न भवेत् व्यसनम् महत् ॥ 37.5 ॥

api te jīvita aṃtāya na utpannā janakātmajā | api sītā nimittam ca na bhavet vyasanam mahat || 37.5 ||

कहीं यह जनकनंदिनी सीता तुम्हारे जीवन का अंत करने के लिए ही तो नहीं जन्मी है? कहीं इस सीता के कारण कोई बड़ा संकट न आ खड़ा हो!

श्लोक 6 (aranya.37.6)

अपि त्वाम् ईश्वरम् प्राप्य काम वृत्तम् निरंकुशम् । न विनश्येत् पुरी लंका त्वया सह स राक्षसा ॥ 37.6 ॥

api tvām īśvaram prāpya kāma vṛttam niraṃkuśam | na vinaśyet purī laṃkā tvayā saha sa rākṣasā || 37.6 ||

स्वेच्छाचारी और उच्छृंखल तुम्हें ही स्वामी पाकर, कहीं राक्षसों सहित यह लंका नगरी तुम्हारे साथ ही नष्ट न हो जाए!

श्लोक 7 (aranya.37.7)

त्वत् विधः काम वृत्तो हि दुःशीलः पाप मंत्रितः । आत्मानम् स्व जनम् राष्ट्रम् स राजा हन्ति दुर्मतिः ॥ 37.7 ॥

tvat vidhaḥ kāma vṛtto hi duḥśīlaḥ pāpa maṃtritaḥ | ātmānam sva janam rāṣṭram sa rājā hanti durmatiḥ || 37.7 ||

तुम्हारे समान स्वेच्छाचारी, दुष्ट-स्वभाव वाला, पाप की सलाह से प्रेरित और दुर्बुद्धि राजा वस्तुतः स्वयं को, अपने परिजनों को और अपने राष्ट्र को ही नष्ट करता है।

श्लोक 8 (aranya.37.8)

न च पित्रा परित्यक्तो न अमर्यादः कथंचन । न लुब्धो न च दुःशीलो न च क्षत्रिय पांसनः ॥ 37.8 ॥

na ca pitrā parityakto na amaryādaḥ kathaṃcana | na lubdho na ca duḥśīlo na ca kṣatriya pāṃsanaḥ || 37.8 ||

वह राम न तो अपने पिता द्वारा त्यागा हुआ है, न किसी भी प्रकार मर्यादाहीन है; न लोभी है, न दुष्ट-स्वभाव वाला है, और न ही क्षत्रिय-कुल पर कलंक है।

श्लोक 9 (aranya.37.9)

न च धर्म गुणैर् हीनैः कौसल्या आनंद वर्धनः । न च तीक्ष्णो हि भूतानाम् सर्व भूत हिते रतः ॥ 37.9 ॥

na ca dharma guṇair hīnaiḥ kausalyā ānaṃda vardhanaḥ | na ca tīkṣṇo hi bhūtānām sarva bhūta hite rataḥ || 37.9 ||

कौसल्या के आनंद को बढ़ाने वाला वह राम धर्म के गुणों से रहित भी नहीं है, और न ही प्राणियों के प्रति क्रूर है; वह तो सब भूतों के हित में ही रत रहता है।

श्लोक 10 (aranya.37.10)

वंचितम् पितरम् दृष्ट्वा कैकेय्या सत्य वादिनम् । करिष्यामि इति धर्मात्मा ततः प्रव्रजितो वनम् ॥ 37.10 ॥

vaṃcitam pitaram dṛṣṭvā kaikeyyā satya vādinam | kariṣyāmi iti dharmātmā tataḥ pravrajito vanam || 37.10 ||

सत्यवादी अपने पिता को कैकेयी द्वारा छला गया देखकर, 'मैं इसे सत्य करके दिखाऊँगा' यह सोचकर वह धर्मात्मा राम अयोध्या से वन के लिए निकल पड़ा।

श्लोक 11 (aranya.37.11)

कैकेय्याः प्रिय कामार्थम् पितुर् दशरथस्य च । हित्वा राज्यम् च भोगान् च प्रविष्टो दण्डका वनम् ॥ 37.11 ॥

kaikeyyāḥ priya kāmārtham pitur daśarathasya ca | hitvā rājyam ca bhogān ca praviṣṭo daṇḍakā vanam || 37.11 ||

कैकेयी की प्रिय कामना और अपने पिता दशरथ की प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए ही उसने राज्य और समस्त भोगों को त्यागकर दंडकवन में प्रवेश किया।

श्लोक 12 (aranya.37.12)

न रामः कर्कशः तात न अविद्वान् न अजित इन्द्रियः । अनृतम् न श्रुतम् चैव नैव त्वम् वक्तुम् अर्हसि ॥ 37.12 ॥

na rāmaḥ karkaśaḥ tāta na avidvān na ajita indriyaḥ | anṛtam na śrutam caiva naiva tvam vaktum arhasi || 37.12 ||

हे तात! राम न तो कठोर है, न अज्ञानी है, और न ही अजितेन्द्रिय है। यह मिथ्या और अनसुनी बात है, तुम्हें ऐसा कहना शोभा नहीं देता।

श्लोक 13 (aranya.37.13)

रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्य पराक्रमः । राजा सर्वस्य लोकस्य देवानाम् इव वासवः ॥ 37.13 ॥

rāmo vigrahavān dharmaḥ sādhuḥ satya parākramaḥ | rājā sarvasya lokasya devānām iva vāsavaḥ || 37.13 ||

राम साक्षात् धर्म की मूर्ति है, सज्जन है, और सत्य ही जिसका पराक्रम है; वह इस संपूर्ण जगत् का राजा है, जैसे देवताओं में इंद्र है।

श्लोक 14 (aranya.37.14)

कथम् नु तस्य वैदेहीम् रक्षिताम् स्वेन तेजसा । इच्छसे प्रसभम् हर्तुम् प्रभाम् इव विवस्वतः ॥ 37.14 ॥

katham nu tasya vaidehīm rakṣitām svena tejasā | icchase prasabham hartum prabhām iva vivasvataḥ || 37.14 ||

जो वैदेही स्वयं उसके अपने तेज से सुरक्षित है, उसे बलपूर्वक हर लेने की इच्छा तुम कैसे करते हो - मानो सूर्य से उसकी प्रभा ही छीन लेना चाहते हो!

श्लोक 15 (aranya.37.15)

शर अर्चिषम् अनाधृष्यम् चाप खड्ग इन्धनम् रणे । राम अग्निम् सहसा दीप्तम् न प्रवेष्टुम् त्वम् अर्हसि ॥ 37.15 ॥

śara arciṣam anādhṛṣyam cāpa khaḍga indhanam raṇe | rāma agnim sahasā dīptam na praveṣṭum tvam arhasi || 37.15 ||

बाण जिसकी ज्वालाएँ हैं, धनुष और खड्ग जिसका ईंधन है, ऐसी अजेय राम-रूपी अग्नि में, जो युद्ध में सहसा प्रज्वलित हो उठती है, तुम्हें प्रवेश नहीं करना चाहिए।

श्लोक 16 (aranya.37.16)

धनुर् व्यादित दीप्त आस्यम् शर अर्चिषम् अमर्षणम् । चाप बाण धरम् तीक्ष्णम् शत्रु सेना अपहारिणम् ॥ 37.16 ॥

dhanur vyādita dīpta āsyam śara arciṣam amarṣaṇam | cāpa bāṇa dharam tīkṣṇam śatru senā apahāriṇam || 37.16 ||

जिसका धनुष खुला हुआ प्रज्वलित मुख है, बाण ही जिसकी ज्वालाएँ हैं, जो असहनशील है, जो धनुष-बाण धारण किए हुए है, तथा जो शत्रु-सेनाओं का संहारक है -

श्लोक 17 (aranya.37.17)

राज्यम् सुखम् च संत्यज्य जीवितम् च इष्टम् आत्मनः । न अति आसादयितुम् तात राम अंतकम् इह अर्हसि ॥ 37.17 ॥

rājyam sukham ca saṃtyajya jīvitam ca iṣṭam ātmanaḥ | na ati āsādayitum tāta rāma aṃtakam iha arhasi || 37.17 ||

हे तात! अपने राज्य, सुख और अपने प्रिय जीवन को त्यागकर, तुम्हें उस काल-स्वरूप राम के अत्यंत निकट जाने का साहस नहीं करना चाहिए।

श्लोक 18 (aranya.37.18)

अप्रमेयम् हि तत् तेजो यस्य सा जनकात्मजा । न त्वम् समर्थः ताम् हर्तुम् राम चाप आश्रयाम् वने ॥ 37.18 ॥

aprameyam hi tat tejo yasya sā janakātmajā | na tvam samarthaḥ tām hartum rāma cāpa āśrayām vane || 37.18 ||

जिसका वह तेज अपरिमेय है, उसी की पत्नी है यह जनकनंदिनी; वन में राम के धनुष के आश्रय में रहने वाली उस सीता का हरण करने में तुम समर्थ नहीं हो।

श्लोक 19 (aranya.37.19)

तस्य वै नर सिंहस्य सिंह उरस्कस्य भामिनी । प्राणेभ्यो अपि प्रियतरा भार्या नित्यम् अनुव्रता ॥ 37.19 ॥

tasya vai nara siṃhasya siṃha uraskasya bhāminī | prāṇebhyo api priyatarā bhāryā nityam anuvratā || 37.19 ||

सिंह के समान वक्षस्थल वाले उस नरसिंह राम की वह पत्नी, जो उसे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय है, सदैव उसी के अनुगमन का व्रत लिए हुए है।

श्लोक 20 (aranya.37.20)

न सा धर्षयितुम् शक्या मैथिली ओजस्विनः प्रिया । दीप्तस्य इव हुत आशस्य शिखा सीता सुमध्यमा ॥ 37.20 ॥

na sā dharṣayitum śakyā maithilī ojasvinaḥ priyā | dīptasya iva huta āśasya śikhā sītā sumadhyamā || 37.20 ||

उस तेजस्वी राम की प्रिया, सुंदर कटि वाली मैथिली सीता को छूना भी असंभव है, जैसे प्रज्वलित हवन-अग्नि की शिखा को छूना असंभव है।

श्लोक 21 (aranya.37.21)

किम् उद्यमम् व्यर्थम् इमम् कृत्वा ते राक्षसाधिप । दृष्टः चेत् त्वम् रणे तेन तत् अंतम् तव जीवितम् ॥ 37.21 ॥

kim udyamam vyartham imam kṛtvā te rākṣasādhipa | dṛṣṭaḥ cet tvam raṇe tena tat aṃtam tava jīvitam || 37.21 ||

हे राक्षसाधिप! यह व्यर्थ प्रयास करके तुम्हें क्या मिलेगा? यदि युद्ध में वह तुम्हें देख भी ले, तो वही दृष्टि तुम्हारे जीवन का अंत कर देगी।

श्लोक 22 (aranya.37.22)

जीवितम् च सुखम् चैव राज्यम् चैव सुदुर्लभम् । यत् इच्छसि चिरम् भोक्तुम् मा कृथा राम विप्रियम् ॥ 37.22 ॥

jīvitam ca sukham caiva rājyam caiva sudurlabham | yat icchasi ciram bhoktum mā kṛthā rāma vipriyam || 37.22 ||

यदि तुम अपने जीवन, सुख और इस अत्यंत दुर्लभ राज्य को दीर्घकाल तक भोगना चाहते हो, तो राम का अप्रिय मत करो।

श्लोक 23 (aranya.37.23)

स सर्वैः सचिवैः सार्धम् विभीषण पुरस्कृतैः । मंत्रयित्वा तु धर्मिष्ठैः कृत्वा निश्चयम् आत्मनः । दोषाणाम् च गुणानाम् च संप्रधार्य बल अबलम् ॥ 37.23 ॥

sa sarvaiḥ sacivaiḥ sārdham vibhīṣaṇa puraskṛtaiḥ | maṃtrayitvā tu dharmiṣṭhaiḥ kṛtvā niścayam ātmanaḥ | doṣāṇām ca guṇānām ca saṃpradhārya bala abalam || 37.23 ||

तुम विभीषण को आगे रखकर, धर्मपरायण अपने सभी मंत्रियों के साथ मिलकर विचार-विमर्श करो, फिर स्वयं अपना निश्चय करो, तथा दोषों और गुणों को, और अपने बल-निर्बल को भलीभाँति तौलकर,

श्लोक 24 (aranya.37.24)

आत्मनः च बलम् ज्ञात्वा राघवस्य च तत्त्वतः । हितम् हि तव निश्चित्य क्षमम् त्वम् कर्तुम् अर्हसि ॥ 37.24 ॥

ātmanaḥ ca balam jñātvā rāghavasya ca tattvataḥ | hitam hi tava niścitya kṣamam tvam kartum arhasi || 37.24 ||

और अपने बल को तथा राघव के बल को यथार्थ रूप से जानकर, अपने लिए जो हितकर हो उसे निश्चित करके, तुम्हें वही उचित कार्य करना चाहिए।

श्लोक 25 (aranya.37.25)

अहम् तु मन्ये तव न क्षमम् रणे समागमम् कोसल राज सूनुना । इदम् हि भूयः शृणु वाक्यम् उत्तमम् क्षमम् च युक्तम् च निशाचर अधिप ॥ 37.25 ॥

aham tu manye tava na kṣamam raṇe samāgamam kosala rāja sūnunā | idam hi bhūyaḥ śṛṇu vākyam uttamam kṣamam ca yuktam ca niśācara adhipa || 37.25 ||

हे निशाचरों के स्वामी! मैं तो यही मानता हूँ कि तुम्हारा उस कोसल-राजकुमार के साथ युद्ध में सामना करना उचित नहीं है। इसलिए मेरा यह उत्तम, उचित और युक्तिसंगत वचन एक बार फिर सुनो।"

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