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अरण्यकाण्ड · सर्ग 38

मारीच की आत्मकथा

सर्ग 37सर्ग-सूचीसर्ग 39

श्लोक 1 (aranya.38.1)

कदाचित् अपि अहम् वीर्यात् पर्यटन् पृथिवीम् इमाम् । बलम् नाग सहस्रस्य धारयन् पर्वतोपमः ॥ 38.1 ॥

kadācit api aham vīryāt paryaṭan pṛthivīm imām | balam nāga sahasrasya dhārayan parvatopamaḥ || 38.1 ||

"एक समय मैं भी अपने पराक्रम के मद में इस पृथ्वी पर विचरण करता था, सहस्र हाथियों का बल धारण किए हुए, पर्वत के समान विशालकाय।

श्लोक 2 (aranya.38.2)

नील जीमूत संकाशः तप्त कांचन कुण्डलः । भयम् लोकस्य जनयन् किरीटी परिघ आयुधः ॥ 38.2 ॥

nīla jīmūta saṃkāśaḥ tapta kāṃcana kuṇḍalaḥ | bhayam lokasya janayan kirīṭī parigha āyudhaḥ || 38.2 ||

मैं काले बादल के समान वर्ण का था, तपाए हुए सोने के कुंडल पहने था, मुकुट धारण किए और परिघ नामक आयुध लिए हुए सारे संसार में भय उत्पन्न करता था,

श्लोक 3 (aranya.38.3)

व्यचरम् दण्डक अरण्यम् ऋषि मांसानि भक्षयन् । विश्वामित्रो अथ धर्मात्मा मत् वित्रस्तो महामुनिः ॥ 38.3 ॥

vyacaram daṇḍaka araṇyam ṛṣi māṃsāni bhakṣayan | viśvāmitro atha dharmātmā mat vitrasto mahāmuniḥ || 38.3 ||

और ऋषियों का मांस खाते हुए दंडकवन में विचरण करता था। तब मुझसे अत्यंत भयभीत हुए धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्र,

श्लोक 4 (aranya.38.4)

स्वयम् गत्वा दशरथम् नरेन्द्रम् इदम् अब्रवीत् । अयम् रक्षतु माम् रामः पर्व काले समाहितः ॥ 38.4 ॥

svayam gatvā daśaratham narendram idam abravīt | ayam rakṣatu mām rāmaḥ parva kāle samāhitaḥ || 38.4 ||

स्वयं राजा दशरथ के पास जाकर उनसे बोले - 'यह राम सावधान होकर यज्ञ के अवसर पर मेरी रक्षा करें।

श्लोक 5 (aranya.38.5)

मारीचात् मे भयम् घोरम् समुत्पन्नम् नरेश्वर । इति एवम् उक्तो धर्मात्मा राजा दशरथः तदा ॥ 38.5 ॥

mārīcāt me bhayam ghoram samutpannam nareśvara | iti evam ukto dharmātmā rājā daśarathaḥ tadā || 38.5 ||

हे नरेश्वर! मुझे मारीच से घोर भय उत्पन्न हो गया है।' इस प्रकार कहे जाने पर धर्मात्मा राजा दशरथ ने तब

श्लोक 6 (aranya.38.6)

प्रत्युवाच महाभागम् विश्वामित्रम् महामुनिम् । ऊन द्वादश वर्षो अयम् अकृत अस्त्रः च राघवः ॥ 38.6 ॥

pratyuvāca mahābhāgam viśvāmitram mahāmunim | ūna dvādaśa varṣo ayam akṛta astraḥ ca rāghavaḥ || 38.6 ||

उन महाभाग महामुनि विश्वामित्र को उत्तर दिया - 'यह राघव अभी बारह वर्ष से भी कम आयु का है और शस्त्र-विद्या में अनभ्यस्त है;

श्लोक 7 (aranya.38.7)

कामम् तु मम यत् सैन्यम् मया सह गमिष्यति । बलेन चतुरंगेण स्वयम् एत्य निशाचरम् ॥ 38.7 ॥

kāmam tu mama yat sainyam mayā saha gamiṣyati | balena caturaṃgeṇa svayam etya niśācaram || 38.7 ||

यदि आप चाहें तो मेरी जो सेना है वह मेरे साथ चल सकती है; चतुरंगिणी सेना सहित मैं स्वयं वहाँ जाकर उस निशाचर का,

श्लोक 8 (aranya.38.8)

एवम् उक्तः स तु मुनी राजानम् इदम् अब्रवीत् । रामात् न अन्यत् बलम् लोके पर्याप्तम् तस्य रक्षसः ॥ 38.8 ॥

evam uktaḥ sa tu munī rājānam idam abravīt | rāmāt na anyat balam loke paryāptam tasya rakṣasaḥ || 38.8 ||

हे श्रेष्ठ मुनि, आपकी इच्छा के अनुसार आपके उस शत्रु का वध करूँगा।' इस प्रकार कहे जाने पर उस मुनि विश्वामित्र ने राजा से यह कहा -

श्लोक 9 (aranya.38.9)

रामात् न अन्यत् बलम् लोके पर्याप्तम् तस्य रक्षसः । देवतानाम् अपि भवान् समरेषु अभिपालकः ॥ 38.9 ॥

rāmāt na anyat balam loke paryāptam tasya rakṣasaḥ | devatānām api bhavān samareṣu abhipālakaḥ || 38.9 ||

'राम के अतिरिक्त संसार में कोई अन्य बल उस राक्षस के लिए पर्याप्त नहीं है। हे राजन्, आप तो युद्धों में देवताओं के भी रक्षक रहे हैं,

श्लोक 10 (aranya.38.10)

आसीत् तव कृते कर्म त्रिलोक विदितम् नृप । कामम् अस्ति महत् सैन्यम् तिष्टतु इह परंतप ॥ 38.10 ॥

āsīt tava kṛte karma triloka viditam nṛpa | kāmam asti mahat sainyam tiṣṭatu iha paraṃtapa || 38.10 ||

आपके किए गए कर्म तीनों लोकों में विख्यात हैं, हे नृप। हे परंतप, भले ही आपकी विशाल सेना हो, वह यहीं ठहरी रहे;

श्लोक 11 (aranya.38.11)

बालो अपि एष महातेजाः समर्थः तस्य निग्रहे । गमिष्ये रामम् आदाय स्वस्ति ते अस्तु परंतपः ॥ 38.11 ॥

bālo api eṣa mahātejāḥ samarthaḥ tasya nigrahe | gamiṣye rāmam ādāya svasti te astu paraṃtapaḥ || 38.11 ||

यह महातेजस्वी बालक ही उस राक्षस के दमन में समर्थ है। मैं राम को ही साथ लेकर जाऊँगा; हे परंतप, आपका कल्याण हो।'

श्लोक 12 (aranya.38.12)

इति एवम् उक्त्वा स मुनिः तम् आदाय नृपात्मजम् । जगाम परम प्रीतो विश्वामित्रः स्वम् आश्रमम् ॥ 38.12 ॥

iti evam uktvā sa muniḥ tam ādāya nṛpātmajam | jagāma parama prīto viśvāmitraḥ svam āśramam || 38.12 ||

इस प्रकार कहकर वे मुनि विश्वामित्र उस राजकुमार को साथ लेकर अत्यंत प्रसन्न होते हुए अपने आश्रम को चले गए।

श्लोक 13 (aranya.38.13)

तम् तदा दण्डकारण्ये यज्ञम् उद्दिश्य दीक्षितम् । बभूव उपस्थितो रामः चित्रम् विस्फारयन् धनुः ॥ 38.13 ॥

tam tadā daṇḍakāraṇye yajñam uddiśya dīkṣitam | babhūva upasthito rāmaḥ citram visphārayan dhanuḥ || 38.13 ||

तब दंडकवन में यज्ञ की दीक्षा लिए हुए उन विश्वामित्र के पास राम अपने अद्भुत धनुष की टंकार करते हुए उपस्थित रहते थे।

श्लोक 14 (aranya.38.14)

अजात व्यंजनः श्रीमान् बालः श्यामः शुभेक्षणः । एक वस्त्र धरो धन्वी शिखी कनक मालया ॥ 38.14 ॥

ajāta vyaṃjanaḥ śrīmān bālaḥ śyāmaḥ śubhekṣaṇaḥ | eka vastra dharo dhanvī śikhī kanaka mālayā || 38.14 ||

जिसकी मूँछ-दाढ़ी अभी नहीं उगी थी, ऐसा वह श्रीमान् श्याम-वर्ण, सुंदर नेत्रों वाला बालक, एक ही वस्त्र पहने, धनुष धारण किए, शिखा और स्वर्ण-माला से सुशोभित,

श्लोक 15 (aranya.38.15)

शोभयन् दण्डकारण्यम् दीप्तेन स्वेन तेजसा । अदृश्यत तदा रामो बाल चन्द्र इव उदितः ॥ 38.15 ॥

śobhayan daṇḍakāraṇyam dīptena svena tejasā | adṛśyata tadā rāmo bāla candra iva uditaḥ || 38.15 ||

अपने ही तेज से चमकते हुए दंडकवन को सुशोभित करता था; उस समय राम नवोदित बाल-चंद्रमा के समान दिखाई देते थे।

श्लोक 16 (aranya.38.16)

ततो अहम् मेघ संकाशः तप्त कांचन कुण्डलः । बली दत्त वरो दर्पात् आजगाम आश्रम अंतरम् ॥ 38.16 ॥

tato aham megha saṃkāśaḥ tapta kāṃcana kuṇḍalaḥ | balī datta varo darpāt ājagāma āśrama aṃtaram || 38.16 ||

तब मैं, जो बादल के समान वर्ण का, तपाए सोने के कुंडलों वाला, बलवान और वरदान-प्राप्त था, अहंकारवश उस आश्रम के भीतर जा पहुँचा।

श्लोक 17 (aranya.38.17)

तेन दृष्टः प्रविष्टो अहम् सहसा एव उद्यत आयुधः । माम् तु दृष्ट्वा धनुः सज्यम् असम्भ्रान्तः चकार ह ॥ 38.17 ॥

tena dṛṣṭaḥ praviṣṭo aham sahasā eva udyata āyudhaḥ | mām tu dṛṣṭvā dhanuḥ sajyam asambhrāntaḥ cakāra ha || 38.17 ||

आयुध उठाए हुए मैंने प्रवेश किया ही था कि तुरंत उसने मुझे देख लिया; मुझे देखकर वह बिना विचलित हुए ही अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने लगा।

श्लोक 18 (aranya.38.18)

अवजानन् अहम् मोहात् बालो अयम् इति राघवम् । विश्वामित्रस्य ताम् वेदिम् अभ्यधावम् कृत त्वरः ॥ 38.18 ॥

avajānan aham mohāt bālo ayam iti rāghavam | viśvāmitrasya tām vedim abhyadhāvam kṛta tvaraḥ || 38.18 ||

मैं मोहवश उस राघव को 'यह तो केवल एक बालक है' समझकर तुच्छ मानते हुए, शीघ्रता करके विश्वामित्र की उस यज्ञ-वेदी की ओर दौड़ा।

श्लोक 19 (aranya.38.19)

तेन मुक्तः ततो बाणः शितः शत्रु निबर्हणः । तेन अहम् ताडितः क्षिप्तः समुद्रे शत योजने ॥ 38.19 ॥

tena muktaḥ tato bāṇaḥ śitaḥ śatru nibarhaṇaḥ | tena aham tāḍitaḥ kṣiptaḥ samudre śata yojane || 38.19 ||

तब उसने शत्रु का नाश करने वाला एक तीक्ष्ण बाण छोड़ा; उससे आहत होकर मैं सौ योजन दूर समुद्र में जा गिरा।

श्लोक 20 (aranya.38.20)

न इच्छता तात माम् हन्तुम् तदा वीरेण रक्षितः । रामस्य शर वेगेन निरस्तो भ्रान्त चेतनः ॥ 38.20 ॥

na icchatā tāta mām hantum tadā vīreṇa rakṣitaḥ | rāmasya śara vegena nirasto bhrānta cetanaḥ || 38.20 ||

हे तात! उस वीर ने मुझे मारने की इच्छा न रखते हुए ही मुझे बचा लिया, परन्तु राम के बाण के वेग से मेरी चेतना भ्रमित हो गई और मैं अचेत हो गया।

श्लोक 21 (aranya.38.21)

पातितो अहम् तदा तेन गंभीरे सागर अंभसि । प्राप्य संज्ञाम् चिरात् तात लंकाम् प्रति गतः पुरीम् ॥ 38.21 ॥

pātito aham tadā tena gaṃbhīre sāgara aṃbhasi | prāpya saṃjñām cirāt tāta laṃkām prati gataḥ purīm || 38.21 ||

इस प्रकार उसके द्वारा गहरे समुद्र के जल में गिराया गया मैं, बहुत समय बाद चेत में आकर, हे तात, लंका नगरी की ओर लौट गया।

श्लोक 22 (aranya.38.22)

एवम् अस्मि तदा मुक्तः सहायाः ते निपातिताः । अकृत अस्त्रेण रामेण बालेन अक्लिष्ट कर्मणा ॥ 38.22 ॥

evam asmi tadā muktaḥ sahāyāḥ te nipātitāḥ | akṛta astreṇa rāmeṇa bālena akliṣṭa karmaṇā || 38.22 ||

इस प्रकार, शस्त्र-विद्या में अनभ्यस्त होते हुए भी सहज ही महान कर्म करने वाले उस बालक राम ने मुझे तो छोड़ दिया, परन्तु मेरे साथियों को मार डाला।

श्लोक 23 (aranya.38.23)

तत् मया वार्यमाणः त्वम् यदि रामेण विग्रहम् । करिष्यसि आपदम् घोराम् क्षिप्रम् प्राप्य न शिष्यसि ॥ 38.23 ॥

tat mayā vāryamāṇaḥ tvam yadi rāmeṇa vigraham | kariṣyasi āpadam ghorām kṣipram prāpya na śiṣyasi || 38.23 ||

इसलिए, मेरे द्वारा रोके जाने पर भी यदि तुम राम से विरोध करोगे, तो शीघ्र ही घोर विपत्ति में पड़कर नष्ट हो जाओगे।

श्लोक 24 (aranya.38.24)

क्रीडा रति विधिज्ञानाम् समाज उत्सव शालिनाम् । रक्षसाम् चैव संतापम् अनर्थम् च आहरिष्यसि ॥ 38.24 ॥

krīḍā rati vidhijñānām samāja utsava śālinām | rakṣasām caiva saṃtāpam anartham ca āhariṣyasi || 38.24 ||

क्रीड़ा और रति-विधि के जानकार, उत्सवों में रमने वाले उन राक्षसों के लिए भी तुम केवल संताप और अनर्थ ही ले आओगे।

श्लोक 25 (aranya.38.25)

हर्म्य प्रासाद संबाधाम् नाना रत्न विभूउषिताम् । द्रक्ष्यसि त्वम् पुरीम् लंकाम् विनष्टाम् मैथिली कृते ॥ 38.25 ॥

harmya prāsāda saṃbādhām nānā ratna vibhūuṣitām | drakṣyasi tvam purīm laṃkām vinaṣṭām maithilī kṛte || 38.25 ||

अनेक भवनों और प्रासादों से सघन तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित इस लंका नगरी को तुम मैथिली के ही कारण नष्ट हुआ देखोगे।

श्लोक 26 (aranya.38.26)

अकुर्वन्तो अपि पापानि शुचयः पाप संश्रयात् । पर पापैः विनश्यन्ति मत्स्या नाग ह्रदे यथा ॥ 38.26 ॥

akurvanto api pāpāni śucayaḥ pāpa saṃśrayāt | para pāpaiḥ vinaśyanti matsyā nāga hrade yathā || 38.26 ||

पाप न करने वाले निष्पाप लोग भी पापियों की संगति के कारण नष्ट हो जाते हैं, जैसे सर्पों के ह्रद में मछलियाँ दूसरे के पाप से नष्ट हो जाती हैं।

श्लोक 27 (aranya.38.27)

दिव्य चंदन दिग्ध अंगान् दिव्य आभरण भूषितान् । द्रक्ष्यसि अभिहतान् भूमौ तव दोषात् तु राक्षसान् ॥ 38.27 ॥

divya caṃdana digdha aṃgān divya ābharaṇa bhūṣitān | drakṣyasi abhihatān bhūmau tava doṣāt tu rākṣasān || 38.27 ||

दिव्य चंदन से लिप्त अंगों वाले, दिव्य आभूषणों से सुशोभित उन राक्षसों को भी तुम अपने ही अपराध के कारण भूमि पर मारे गए देखोगे।

श्लोक 28 (aranya.38.28)

हृत दारान् स दारान् च दश विद्रवतो दिशः । हत शेषान् अशरणान् द्रक्ष्यसि त्वम् निशाचरान् ॥ 38.28 ॥

hṛta dārān sa dārān ca daśa vidravato diśaḥ | hata śeṣān aśaraṇān drakṣyasi tvam niśācarān || 38.28 ||

जिनकी पत्नियाँ छिन गई हैं और जो अपनी पत्नियों सहित बचे हैं, ऐसे शरणहीन शेष निशाचरों को मारे जाने के पश्चात् तुम दसों दिशाओं में भागते हुए देखोगे।

श्लोक 29 (aranya.38.29)

शर जाल परिक्षिप्ताम् अग्नि ज्वाला समावृताम् । प्रदग्ध भवनाम् लंकाम् द्रक्ष्यसि त्वम् असंशयम् ॥ 38.29 ॥

śara jāla parikṣiptām agni jvālā samāvṛtām | pradagdha bhavanām laṃkām drakṣyasi tvam asaṃśayam || 38.29 ||

बाणों के जाल से घिरी हुई, अग्नि की ज्वालाओं से आवृत, और अपने भवनों को जलती हुई इस लंका को तुम निःसंदेह देखोगे।

श्लोक 30 (aranya.38.30)

पर दार अभिमर्षात् तु न अनयत् पाप तरम् महत् । प्रमदानाम् सहस्राणि तव राजन् परिग्रहे ॥ 38.30 ॥

para dāra abhimarṣāt tu na anayat pāpa taram mahat | pramadānām sahasrāṇi tava rājan parigrahe || 38.30 ||

हे राजन्! पराई स्त्री को स्पर्श करने से बढ़कर घोर पाप और कुछ नहीं है, और वह भी तब जब तुम्हारे स्वयं के अधिकार में सहस्रों स्त्रियाँ पहले से ही हैं।

श्लोक 31 (aranya.38.31)

भव स्व दार निरतः स्व कुलम् रक्ष राक्षस । मानम् वृद्धिम् च राज्यम् च जीवितम् च इष्टम् आत्मनः ॥ 38.31 ॥

bhava sva dāra nirataḥ sva kulam rakṣa rākṣasa | mānam vṛddhim ca rājyam ca jīvitam ca iṣṭam ātmanaḥ || 38.31 ||

हे राक्षस, अपनी ही पत्नियों में संतुष्ट रहो, अपने कुल की रक्षा करो, और इस प्रकार अपने सम्मान, समृद्धि, राज्य तथा अपने प्रिय जीवन की भी रक्षा करो।

श्लोक 32 (aranya.38.32)

कलत्राणि च सौम्यानि मित्र वर्गम् तथैव च । यदि इच्छसि चिरम् भोक्तुम् मा कृथा राम विप्रियम् ॥ 38.32 ॥

kalatrāṇi ca saumyāni mitra vargam tathaiva ca | yadi icchasi ciram bhoktum mā kṛthā rāma vipriyam || 38.32 ||

यदि तुम अपनी सुंदर पत्नियों और अपने मित्र-समूह के साथ चिरकाल तक सुख भोगना चाहते हो, तो राम का अप्रिय मत करो।

श्लोक 33 (aranya.38.33)

निवार्यमाणः सुहृदा मया भृशम् प्रसह्य सीताम् यदि धर्षयिष्यसि । गमिष्यसि क्षीण बलः स बान्धवो यम क्षयम् राम शर आत्त जीवितः ॥ 38.33 ॥

nivāryamāṇaḥ suhṛdā mayā bhṛśam prasahya sītām yadi dharṣayiṣyasi | gamiṣyasi kṣīṇa balaḥ sa bāndhavo yama kṣayam rāma śara ātta jīvitaḥ || 38.33 ||

यदि तुम्हारे इस शुभचिंतक द्वारा बार-बार रोके जाने पर भी बलपूर्वक सीता को स्पर्श करोगे, तो तुम्हारा बल क्षीण हो जाएगा, और राम के बाण से तुम्हारा जीवन हरकर तुम अपने बांधवों सहित यमलोक को चले जाओगे।" इस प्रकार मारीच ने रावण से कहा।

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