Skip to main content

अरण्यकाण्ड · सर्ग 40

रावण की चेतावनी

सर्ग 39सर्ग-सूचीसर्ग 41

श्लोक 1 (aranya.40.1)

मारीचस्य तु तत् वाक्यम् क्षमम् युक्तम् च रावणः । उक्तो न प्रतिजग्राह मर्तु काम इव औषधम् ॥ 40.1 ॥

mārīcasya tu tat vākyam kṣamam yuktam ca rāvaṇaḥ | ukto na pratijagrāha martu kāma iva auṣadham || 40.1 ||

मारीच के उन उचित और युक्तिसंगत वचनों को सुनकर भी रावण ने उन्हें वैसे ही अस्वीकार कर दिया, जैसे मरने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति औषधि को अस्वीकार करता है।

श्लोक 2 (aranya.40.2)

तम् पथ्य हित वक्तारम् मारीचम् राक्षसाधिपः । अब्रवीत् परुषम् वाक्यम् अयुक्तम् काल चोदितः ॥ 40.2 ॥

tam pathya hita vaktāram mārīcam rākṣasādhipaḥ | abravīt paruṣam vākyam ayuktam kāla coditaḥ || 40.2 ||

काल से प्रेरित होकर राक्षसों के उस स्वामी ने हितकर और कल्याणकारी वचन कहने वाले मारीच से कठोर और अनुचित शब्द कहे।

श्लोक 3 (aranya.40.3)

यत् किल एतत् अयुक्तार्थम् मारीच मयि कथ्यते । वाक्यम् निष्फलम् अत्यर्थम् बीजम् उप्तम् इव ऊषरे ॥ 40.3 ॥

yat kila etat ayuktārtham mārīca mayi kathyate | vākyam niṣphalam atyartham bījam uptam iva ūṣare || 40.3 ||

"हे मारीच! तुमने मुझसे जो यह निरर्थक बात कही है, वह ऊसर भूमि में बोए गए बीज के समान पूर्णतः निष्फल है।

श्लोक 4 (aranya.40.4)

त्वत् वाक्यैः न तु माम् शक्यम् भेतुम् रामस्य संयुगे । पाप शीलस्य मूर्खस्य मानुषस्य विशेषतः ॥ 40.4 ॥

tvat vākyaiḥ na tu mām śakyam bhetum rāmasya saṃyuge | pāpa śīlasya mūrkhasya mānuṣasya viśeṣataḥ || 40.4 ||

तुम्हारे इन वचनों से मुझे राम के साथ युद्ध से डराना संभव नहीं है, विशेषकर उस पाप-स्वभाव वाले, मूर्ख और साधारण मनुष्य के भय से।

श्लोक 5 (aranya.40.5)

यः त्यक्त्वा सुहृदो राज्यम् मातरम् पितरम् तथा । स्त्री वाक्यम् प्राकृतम् श्रुत्वा वनम् एक पदे गतः ॥ 40.5 ॥

yaḥ tyaktvā suhṛdo rājyam mātaram pitaram tathā | strī vākyam prākṛtam śrutvā vanam eka pade gataḥ || 40.5 ||

जिसने एक स्त्री का साधारण वचन सुनते ही अपने मित्रों, राज्य, माता और पिता को त्यागकर तत्काल वन का मार्ग पकड़ लिया,

श्लोक 6 (aranya.40.6)

अवश्यम् तु मया तस्य संयुगे खर घातिनः । प्राणैः प्रियतरा सीता हर्तव्या तव संनिधौ ॥ 40.6 ॥

avaśyam tu mayā tasya saṃyuge khara ghātinaḥ | prāṇaiḥ priyatarā sītā hartavyā tava saṃnidhau || 40.6 ||

उस खर के वधकर्ता राम की, प्राणों से भी अधिक प्रिय सीता का हरण मैं तुम्हारी सहायता से अवश्य ही करूँगा।

श्लोक 7 (aranya.40.7)

एवम् मे निश्चिता बुद्धिः हृदि मारीच विद्यते । न व्यावर्तयितुम् शक्या स इन्द्रैः अपि सुर असुरैः ॥ 40.7 ॥

evam me niścitā buddhiḥ hṛdi mārīca vidyate | na vyāvartayitum śakyā sa indraiḥ api sura asuraiḥ || 40.7 ||

हे मारीच! मेरे हृदय में यह निश्चय दृढ़तापूर्वक बस चुका है; इसे इंद्र सहित देवताओं और असुरों से भी वापस नहीं मोड़ा जा सकता।

श्लोक 8 (aranya.40.8)

दोषम् गुणम् वा संपृष्टः त्वम् एवम् वक्तुम् अर्हसि । अपायम् वा अपि उपायम् वा कार्यस्य अस्य विनिश्चये ॥ 40.8 ॥

doṣam guṇam vā saṃpṛṣṭaḥ tvam evam vaktum arhasi | apāyam vā api upāyam vā kāryasya asya viniścaye || 40.8 ||

इस कार्य के निर्णय में यदि तुमसे इसके दोष-गुण, हानि अथवा उपाय के विषय में पूछा जाता, तो तुम्हारा इस प्रकार बोलना उचित होता।

श्लोक 9 (aranya.40.9)

संपृष्टेन तु वक्तव्यम् सचिवेन विपश्चिता । उद्यत अंजलिना राज्ञे य इच्छेत् भूतिम् आत्मनः ॥ 40.9 ॥

saṃpṛṣṭena tu vaktavyam sacivena vipaścitā | udyata aṃjalinā rājñe ya icchet bhūtim ātmanaḥ || 40.9 ||

बुद्धिमान मंत्री को, जो अपने कल्याण की इच्छा रखता हो, पूछे जाने पर ही हाथ जोड़कर राजा से अपनी बात कहनी चाहिए।

श्लोक 10 (aranya.40.10)

वाक्यम् अप्रतिकूलम् तु मृदु पूर्वम् शुभम् हितम् । उपचारेण युक्तम् च वक्तव्यो वसुधा अधिपः ॥ 40.10 ॥

vākyam apratikūlam tu mṛdu pūrvam śubham hitam | upacāreṇa yuktam ca vaktavyo vasudhā adhipaḥ || 40.10 ||

और राजा से भी अनुकूल, विनम्रतापूर्वक, शुभ, हितकर तथा शिष्टाचार से युक्त वचन ही कहने चाहिए।

श्लोक 11 (aranya.40.11)

स अवमर्दम् तु यत् वाक्यम् अथवा मारीच हितम् उच्यते । न अभिनंदति तत् राजा मानार्थी मान वर्जितम् ॥ 40.11 ॥

sa avamardam tu yat vākyam athavā mārīca hitam ucyate | na abhinaṃdati tat rājā mānārthī māna varjitam || 40.11 ||

हे मारीच! जो हितकर वचन भी तिरस्कारपूर्वक और सम्मान-रहित होकर कहा जाए, उसे सम्मान चाहने वाला राजा कदापि स्वीकार नहीं करता।

श्लोक 12 (aranya.40.12)

पंच रूपाणि राजानो धारयन्ति अमित ओजसः । अग्नेः इन्द्रस्य सोमस्य यमस्य वरुणस्य च ॥ 40.12 ॥

paṃca rūpāṇi rājāno dhārayanti amita ojasaḥ | agneḥ indrasya somasya yamasya varuṇasya ca || 40.12 ||

अपार तेज से युक्त राजा अग्नि, इंद्र, चंद्रमा, यम और वरुण - इन पाँचों के स्वरूपों को धारण करते हैं।

श्लोक 13 (aranya.40.13)

औष्ण्यम् तथा विक्रमम् च सौम्यम् दण्डम् प्रसन्नताम् । धारयन्ति महाताम्नो राजानः क्षणदाचर ॥ 40.13 ॥

auṣṇyam tathā vikramam ca saumyam daṇḍam prasannatām | dhārayanti mahātāmno rājānaḥ kṣaṇadācara || 40.13 ||

हे निशाचर! वे महान राजा अग्नि की उष्णता, इंद्र का पराक्रम, चंद्रमा की सौम्यता, यम का दंड और वरुण की प्रसन्नता - इन सबको धारण करते हैं।

श्लोक 14 (aranya.40.14)

तस्मात् सर्वासु अवस्थासु मान्याः पूज्याः च पार्थिवाः । त्वम् तु धर्मम् अविज्ञाय केवलम् मोहम् आश्रितः ॥ 40.14 ॥

tasmāt sarvāsu avasthāsu mānyāḥ pūjyāḥ ca pārthivāḥ | tvam tu dharmam avijñāya kevalam moham āśritaḥ || 40.14 ||

इसीलिए राजा सभी अवस्थाओं में सम्माननीय और पूजनीय होते हैं। परन्तु तुम धर्म को न जानकर केवल मोह के वशीभूत हो,

श्लोक 15 (aranya.40.15)

अभ्यागतम् माम् दौरात्म्यात् परुषम् वदसि ईदृशम् । गुण दोषौ न पृच्छामि क्षमम् च आत्मनि राक्षस ॥ 40.15 ॥

abhyāgatam mām daurātmyāt paruṣam vadasi īdṛśam | guṇa doṣau na pṛcchāmi kṣamam ca ātmani rākṣasa || 40.15 ||

दुष्टता के वशीभूत होकर अपने पास आए हुए मुझसे ऐसे कठोर वचन कह रहे हो। हे राक्षस! मैं तुमसे अपने गुण-दोष या अपने हित के विषय में नहीं पूछ रहा हूँ।

श्लोक 16 (aranya.40.16)

मया उक्तम् अपि च एतावत् त्वाम् प्रति अमितविक्रम । अस्मिन् तु स भवान् कृत्ये साहाय्यम् कर्तुम् अर्हसि ॥ 40.16 ॥

mayā uktam api ca etāvat tvām prati amitavikrama | asmin tu sa bhavān kṛtye sāhāyyam kartum arhasi || 40.16 ||

हे अमित पराक्रमी मारीच! मैंने तो तुमसे केवल इतना ही कहा था कि तुम्हें इस कार्य में सहायता करनी चाहिए।

श्लोक 17 (aranya.40.17)

श्रुणु तत् कर्म साहाय्ये यत् कार्यम् वचनात् मम । सौवर्णः त्वम् मृगो भूत्वा चित्रो रजत बिन्दुभिः ॥ 40.17 ॥

śruṇu tat karma sāhāyye yat kāryam vacanāt mama | sauvarṇaḥ tvam mṛgo bhūtvā citro rajata bindubhiḥ || 40.17 ||

मेरे कहने पर सहायता में तुम्हें जो करना है, वह सुनो - तुम चाँदी जैसी बूँदों से चित्रित सुनहरा मृग बनकर,

श्लोक 18 (aranya.40.18)

आश्रमे तस्य रामस्य सीतायाः प्रमुखे चर । प्रलोभयित्वा वैदेहीम् यथा इष्टम् गन्तुम् अर्हसि ॥ 40.18 ॥

āśrame tasya rāmasya sītāyāḥ pramukhe cara | pralobhayitvā vaidehīm yathā iṣṭam gantum arhasi || 40.18 ||

उस राम के आश्रम में सीता के सम्मुख विचरण करो, और वैदेही को लुभाकर तुम अपनी इच्छानुसार वहाँ से चले जाना।

श्लोक 19 (aranya.40.19)

त्वाम् हि माया मयम् दृष्ट्वा कांचनम् जात विस्मया । आनय एनम् इति क्षिप्रम् रामम् वक्ष्यति मैथिली ॥ 40.19 ॥

tvām hi māyā mayam dṛṣṭvā kāṃcanam jāta vismayā | ānaya enam iti kṣipram rāmam vakṣyati maithilī || 40.19 ||

उस मायामय सुनहरे मृग के रूप में तुम्हें देखकर आश्चर्यचकित हुई मैथिली शीघ्र ही राम से कहेगी - 'इसे शीघ्र ले आइए।'

श्लोक 20 (aranya.40.20)

अपक्रान्ते च काकुत्स्थे दूरम् च यात्वा अपि उदाहर । हा सीते लक्ष्मणे इति एवम् राम वाक्य अनुरूपकम् ॥ 40.20 ॥

apakrānte ca kākutsthe dūram ca yātvā api udāhara | hā sīte lakṣmaṇe iti evam rāma vākya anurūpakam || 40.20 ||

काकुत्स्थ राम के दूर चले जाने पर, तुम भी बहुत दूर जाकर राम की आवाज़ की नकल करते हुए पुकारना - 'हा सीते! हा लक्ष्मण!'

श्लोक 21 (aranya.40.21)

तत् श्रुत्वा राम पदवीम् सीताया च प्रचोदितः । अनुगच्छति संभ्रांतम् सौमित्रिः अपि सौहृदात् ॥ 40.21 ॥

tat śrutvā rāma padavīm sītāyā ca pracoditaḥ | anugacchati saṃbhrāṃtam saumitriḥ api sauhṛdāt || 40.21 ||

उसे सुनकर और सीता के द्वारा प्रेरित होकर, सौमित्र लक्ष्मण भी अपने सौहार्द के कारण घबराते हुए राम के मार्ग का अनुसरण करेंगे।

श्लोक 22 (aranya.40.22)

अपक्रान्ते च काकुत्स्थे लक्ष्मण च यथा सुखम् । आहरिष्यामि वैदेहीम् सहस्राक्षः शचीम् इव ॥ 40.22 ॥

apakrānte ca kākutsthe lakṣmaṇa ca yathā sukham | āhariṣyāmi vaidehīm sahasrākṣaḥ śacīm iva || 40.22 ||

काकुत्स्थ राम और लक्ष्मण दोनों के हट जाने पर, मैं सुखपूर्वक वैदेही का हरण कर लूँगा, जैसे सहस्राक्ष इंद्र ने शची का हरण किया था।

श्लोक 23 (aranya.40.23)

एवम् कृत्वा तु इदम् कार्यम् यथा इष्टम् गच्छ राक्षस । राज्यस्य अर्धम् प्रदास्यामि मारीच तव सुव्रत ॥ 40.23 ॥

evam kṛtvā tu idam kāryam yathā iṣṭam gaccha rākṣasa | rājyasya ardham pradāsyāmi mārīca tava suvrata || 40.23 ||

हे राक्षस! इस कार्य को इस प्रकार पूरा करके तुम अपनी इच्छानुसार चले जाना। हे सुव्रत मारीच! मैं तुम्हें अपने आधे राज्य का दान दूँगा।

श्लोक 24 (aranya.40.24)

गच्छ सौम्य शिवम् मार्गम् कार्यस्य अस्य विवृद्धये । अहम् तु अनुगमिष्यामि स रथो दण्डका वनम् ॥ 40.24 ॥

gaccha saumya śivam mārgam kāryasya asya vivṛddhaye | aham tu anugamiṣyāmi sa ratho daṇḍakā vanam || 40.24 ||

हे सौम्य! इस कार्य की सिद्धि के लिए तुम शुभ मार्ग से जाओ; मैं भी रथ सहित तुम्हारे पीछे-पीछे दंडकवन तक जाऊँगा।

श्लोक 25 (aranya.40.25)

प्राप्य सीताम् अयुद्धेन वंचयित्वा तु राघवम् । लंकाम् प्रति गमिष्यामि कृत कार्यः सह त्वया ॥ 40.25 ॥

prāpya sītām ayuddhena vaṃcayitvā tu rāghavam | laṃkām prati gamiṣyāmi kṛta kāryaḥ saha tvayā || 40.25 ||

राघव को छलकर, बिना युद्ध किए ही सीता को पाकर, अपना कार्य सिद्ध करके मैं तुम्हारे साथ लंका को लौट जाऊँगा।

श्लोक 26 (aranya.40.26)

नो चेत् करोषि मारीच हन्मि त्वाम् अहम् अद्य वै । एतत् कार्यम् अवश्यम् मे बलाद् अपि करिष्यसि । राज्ञो हि प्रतिकूलस्थो न जातु सुखम् एधते ॥ 40.26 ॥

no cet karoṣi mārīca hanmi tvām aham adya vai | etat kāryam avaśyam me balād api kariṣyasi | rājño hi pratikūlastho na jātu sukham edhate || 40.26 ||

और हे मारीच, यदि तुम यह नहीं करोगे, तो मैं आज ही तुम्हें मार डालूँगा। तुम्हें यह कार्य मेरे लिए बलपूर्वक भी अवश्य करना होगा, क्योंकि राजा का विरोध करने वाला कभी भी सुखपूर्वक नहीं रह पाता।

श्लोक 27 (aranya.40.27)

आसाद्या तम् जीवित संशयः ते मृत्युर् ध्रुवो हि अद्य मया विरुध्यतः । एतत् यथावत् परिगृह्य बुद्ध्या यत् अत्र पथ्यम् कुरु तत् तथा त्वम् ॥ 40.27 ॥

āsādyā tam jīvita saṃśayaḥ te mṛtyur dhruvo hi adya mayā virudhyataḥ | etat yathāvat parigṛhya buddhyā yat atra pathyam kuru tat tathā tvam || 40.27 ||

राम के पास पहुँचकर तो तुम्हारा जीवन संदिग्ध ही रहेगा, परन्तु आज मेरे विरोध में खड़े होने से तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। इसे भलीभाँति बुद्धि से समझकर, इसमें जो हितकर हो वही करो।" इस प्रकार रावण ने मारीच से कहा।

सर्ग 39सर्ग-सूचीसर्ग 41