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अरण्यकाण्ड · सर्ग 44

मारीच वध

सर्ग 43सर्ग-सूचीसर्ग 45

श्लोक 1 (aranya.44.1)

तथा तु तम् समादिश्य भ्रातरम् रघुनंदनः । बबन्ध असिम् महातेजा जांबूनदमयः त्सरुम् ॥ 44.1 ॥

tathā tu tam samādiśya bhrātaram raghunaṃdanaḥ | babandha asim mahātejā jāṃbūnadamayaḥ tsarum || 44.1 ||

अपने भाई को इस प्रकार आदेश देकर, महातेजस्वी रघुनंदन ने सुवर्ण-मूठ वाली तलवार को अपनी कमर में बाँध लिया।

श्लोक 2 (aranya.44.2)

ततः त्रि विनतम् चापम् आदाय आत्म विभूषणम् । आबध्य च कलापौ द्वौ जगाम उदग्र विक्रमः ॥ 44.2 ॥

tataḥ tri vinatam cāpam ādāya ātma vibhūṣaṇam | ābadhya ca kalāpau dvau jagāma udagra vikramaḥ || 44.2 ||

तत्पश्चात् अपने विशिष्ट चिह्न, त्रिवक्र धनुष को लेकर और दोनों तरकश बाँधकर, बढ़ते हुए पराक्रम वाले राम आगे बढ़े।

श्लोक 3 (aranya.44.3)

तम् वंचयानो राजेन्द्रम् आपतन्तम् निरीक्ष्य वै । बभूव अंतर्हितः त्रासात् पुनः संदर्शने अभवत् ॥ 44.3 ॥

tam vaṃcayāno rājendram āpatantam nirīkṣya vai | babhūva aṃtarhitaḥ trāsāt punaḥ saṃdarśane abhavat || 44.3 ||

उस श्रेष्ठ राजा राम को अपनी ओर आते देखकर, वह मृग उसे छलने के लिए मानो भय से अंतर्धान हो गया, और फिर पुनः दिखाई देने लगा।

श्लोक 4 (aranya.44.4)

बद्ध असिः धनुः आदाय प्रदुद्राव यतो मृगः । तम् स्म पश्यति रूपेण द्योतमानम् इव अग्रतः ॥ 44.4 ॥

baddha asiḥ dhanuḥ ādāya pradudrāva yato mṛgaḥ | tam sma paśyati rūpeṇa dyotamānam iva agrataḥ || 44.4 ||

तलवार बाँधे और धनुष हाथ में लिए राम उस दिशा में दौड़े जहाँ मृग गया था, और उन्हें वह मृग अपने सामने अपने रूप से जगमगाता हुआ-सा दिखाई दिया।

श्लोक 5 (aranya.44.5)

अवेक्ष्य अवेक्ष्य धावन्तम् धनुष् पाणिः महावने । अतिवृत्तम् इषोः पातात् लोभयानम् कदाचन ॥ 44.5 ॥

avekṣya avekṣya dhāvantam dhanuṣ pāṇiḥ mahāvane | ativṛttam iṣoḥ pātāt lobhayānam kadācana || 44.5 ||

धनुर्धारी राम बार-बार उस महावन में दौड़ते हुए मृग को देखते रहे - वह कभी बाण की पहुँच से बाहर रहकर मानो उन्हें ललचाता रहा,

श्लोक 6 (aranya.44.6)

शंकितम् तु समुद् भ्रान्तम् उत्पतन्तम् इव अंबरे । दृअश्यमानम् अदृश्यम् च वन उद्देशेषु केषुचित् ॥ 44.6 ॥

śaṃkitam tu samud bhrāntam utpatantam iva aṃbare | dṛaśyamānam adṛśyam ca vana uddeśeṣu keṣucit || 44.6 ||

और भयभीत तथा अत्यंत विचलित होकर मानो आकाश में उछल पड़ता, कहीं दिखाई देता और वन के किसी भाग में अदृश्य हो जाता,

श्लोक 7 (aranya.44.7)

चिन्न अभ्रैः इव संवीतम् शारदम् चन्द्र मण्डलम् । मुहूर्तात् एव ददृशे मुहुर् दूरात् प्रकाशते ॥ 44.7 ॥

cinna abhraiḥ iva saṃvītam śāradam candra maṇḍalam | muhūrtāt eva dadṛśe muhur dūrāt prakāśate || 44.7 ||

मानो कटे-फटे बादलों से ढका शरद ऋतु का चंद्रमंडल हो - कभी क्षणभर के लिए पास दिखाई देता तो कभी दूर से चमकता।

श्लोक 8 (aranya.44.8)

दर्शन अदर्शनेन एव सः अपाकर्षत राघवम् । सुदूरम् आश्रमस्य अस्य मारिचो मृगताम् गतः ॥ 44.8 ॥

darśana adarśanena eva saḥ apākarṣata rāghavam | sudūram āśramasya asya mārico mṛgatām gataḥ || 44.8 ||

इस प्रकार दिखाई देने और अदृश्य होने के इस खेल से, मृगरूपधारी उस मारीच ने राघव को अपने आश्रम से बहुत दूर खींच लिया।

श्लोक 9 (aranya.44.9)

आसीत् क्रुद्धः तु काकुत्स्थो विवशः तेन मोहितः । अथ अवतस्थे सुश्रान्तः च्छायाम् आश्रित्य शाद्वले ॥ 44.9 ॥

āsīt kruddhaḥ tu kākutstho vivaśaḥ tena mohitaḥ | atha avatasthe suśrāntaḥ cchāyām āśritya śādvale || 44.9 ||

काकुत्स्थ राम उससे मोहित और असहाय होकर क्रुद्ध हो उठे; फिर अत्यंत थके हुए वे एक हरे मैदान में छाया का सहारा लेकर कुछ देर ठहर गए।

श्लोक 10 (aranya.44.10)

स तम् उन्मादयामास मृगरूपो निशाचर । मृगैः परिवृतो अथ वन्यैः अदूरात् प्रत्यदृश्यत ॥ 44.10 ॥

sa tam unmādayāmāsa mṛgarūpo niśācara | mṛgaiḥ parivṛto atha vanyaiḥ adūrāt pratyadṛśyata || 44.10 ||

मृगरूपधारी वह निशाचर मारीच उन्हें और भी विचलित करता हुआ, वन्य मृगों से घिरा हुआ पुनः पास ही दिखाई देने लगा।

श्लोक 11 (aranya.44.11)

ग्रहीतु कामम् दृष्ट्वा तम् पुनः एव अभ्यधावत । तत् क्षणात् एव संत्रासात् पुनर् अंतर्हितो अभवत् ॥ 44.11 ॥

grahītu kāmam dṛṣṭvā tam punaḥ eva abhyadhāvata | tat kṣaṇāt eva saṃtrāsāt punar aṃtarhito abhavat || 44.11 ||

उसे पकड़ने की इच्छा से राम उसे देखते ही पुनः उसकी ओर दौड़े; परन्तु उसी क्षण मानो अत्यंत भयभीत होकर वह पुनः अंतर्धान हो गया।

श्लोक 12 (aranya.44.12)

पुनर् एव ततो दूरात् वृक्ष खण्डात् विनिःसृतः । दृष्ट्वा रामो महातेजाः तम् हन्तुम् कृत निश्चयः ॥ 44.12 ॥

punar eva tato dūrāt vṛkṣa khaṇḍāt viniḥsṛtaḥ | dṛṣṭvā rāmo mahātejāḥ tam hantum kṛta niścayaḥ || 44.12 ||

फिर वह दूर के एक वृक्षों के झुरमुट से पुनः निकला; उसे देखकर तेजस्वी राम ने उसे मार डालने का निश्चय कर लिया।

श्लोक 13 (aranya.44.13)

भूयः तु शरम् उद्धृत्य कुपितः तत्र राघवः । सूर्य रश्मि प्रतीकाशम् ज्वलंतम् अरि मर्दनम् ॥ 44.13 ॥

bhūyaḥ tu śaram uddhṛtya kupitaḥ tatra rāghavaḥ | sūrya raśmi pratīkāśam jvalaṃtam ari mardanam || 44.13 ||

तब अत्यंत क्रोधित राघव ने सूर्य की किरणों के समान तेजयुक्त, जाज्वल्यमान और शत्रुनाशक एक और बाण निकाला,

श्लोक 14 (aranya.44.14)

संधाय सुदृढे चापे विकृष्य बलवत् बली । तम् एव मृगम् उद्दिश्य श्वसंतम् इव पन्नगम् ॥ 44.14 ॥

saṃdhāya sudṛḍhe cāpe vikṛṣya balavat balī | tam eva mṛgam uddiśya śvasaṃtam iva pannagam || 44.14 ||

उसे अपने सुदृढ़ धनुष पर चढ़ाकर और बलपूर्वक प्रत्यंचा खींचकर, उस बलवान राघव ने सर्प के समान फुफकारते हुए उस बाण को उसी मृग पर लक्ष्य करके,

श्लोक 15 (aranya.44.15)

मुमोच ज्वलितम् दीप्तम् अस्त्रम् ब्रह्म विनिर्मितम् । शरीरम् मृग रूपस्य विनिर्भिद्य शरोत्तमः ॥ 44.15 ॥

mumoca jvalitam dīptam astram brahma vinirmitam | śarīram mṛga rūpasya vinirbhidya śarottamaḥ || 44.15 ||

ब्रह्मा द्वारा निर्मित उस जाज्वल्यमान और देदीप्यमान अस्त्र को छोड़ दिया; और उस श्रेष्ठ बाण ने मृगरूप के शरीर को गहराई से बींधते हुए,

श्लोक 16 (aranya.44.16)

मारीचस्य एव हृदयम् विभेद अशनि संनिभः । ताल मात्रम् अथ उत्प्लुत्य न्यपतत् स भृश आतुरः ॥ 44.16 ॥

mārīcasya eva hṛdayam vibheda aśani saṃnibhaḥ | tāla mātram atha utplutya nyapatat sa bhṛśa āturaḥ || 44.16 ||

वज्र के समान वह बाण मारीच के हृदय को ही बींध गया; और अत्यंत पीड़ा से व्याकुल होकर वह ताड़ वृक्ष जितनी ऊँचाई तक उछला और फिर गिर पड़ा।

श्लोक 17 (aranya.44.17)

व्यनदत् भैरवम् नादम् धरण्याम् अल्प जीवितः । म्रियमाणः तु मारीचो जहौ ताम् कृत्रिमाम् तनुम् ॥ 44.17 ॥

vyanadat bhairavam nādam dharaṇyām alpa jīvitaḥ | mriyamāṇaḥ tu mārīco jahau tām kṛtrimām tanum || 44.17 ||

क्षीण होते जीवन के साथ उसने पृथ्वी पर गिरते हुए एक भयंकर और भीषण चीत्कार किया; और मरते-मरते मारीच ने उस कृत्रिम मृग-देह को त्याग दिया।

श्लोक 18 (aranya.44.18)

स्मृत्वा तत् वचनम् रक्षो दध्यौ केन तु लक्ष्मणम् । इह प्रस्थापयेत् सीता ताम् शून्ये रावणे हरेत् ॥ 44.18 ॥

smṛtvā tat vacanam rakṣo dadhyau kena tu lakṣmaṇam | iha prasthāpayet sītā tām śūnye rāvaṇe haret || 44.18 ||

रावण के उस वचन का स्मरण करते हुए वह राक्षस सोचने लगा - "किस उपाय से सीता लक्ष्मण को यहाँ भेज दे, ताकि इस सूने स्थान में रावण उसका हरण कर सके?"

श्लोक 19 (aranya.44.19)

स प्राप्त कालम् अज्ञाय चकार च ततः स्वरम् । सदृशम् राघवस्य एव हा सीते लक्ष्मण इति च ॥ 44.19 ॥

sa prāpta kālam ajñāya cakāra ca tataḥ svaram | sadṛśam rāghavasya eva hā sīte lakṣmaṇa iti ca || 44.19 ||

अपने अंतिम समय को जानकर उसने राघव के स्वर के समान ही स्वर बनाकर पुकारा - "हा सीते! हा लक्ष्मण!"

श्लोक 20 (aranya.44.20)

तेन मर्मणि निर्विद्धम् शरेण अनुपमेन हि । मृग रूपम् तु तत् त्यक्त्वा राक्षसम् रूपम् आस्थितः ॥ 44.20 ॥

tena marmaṇi nirviddham śareṇa anupamena hi | mṛga rūpam tu tat tyaktvā rākṣasam rūpam āsthitaḥ || 44.20 ||

उस अनुपम बाण से हृदय में गहरी चोट खाकर, मारीच ने उस मृगरूप को त्यागकर अपना राक्षस रूप धारण कर लिया,

श्लोक 21 (aranya.44.21)

चक्रे स सुमहा कायम् मारीचो जीवितम् त्यजन् । तम् दृष्ट्वा पतितम् भूमौ राक्षसम् भीम दर्शनम् ॥ 44.21 ॥

cakre sa sumahā kāyam mārīco jīvitam tyajan | tam dṛṣṭvā patitam bhūmau rākṣasam bhīma darśanam || 44.21 ||

और प्राण त्यागते हुए मारीच का शरीर विशालकाय हो गया। भूमि पर गिरे हुए उस भयंकर राक्षस को देखकर,

श्लोक 22 (aranya.44.22)

रामो रुधिर सिक्त अंगम् चेष्टमानम् महीतले । जगाम मनसा सीताम् लक्ष्मणस्य वचः स्मरन् ॥ 44.22 ॥

rāmo rudhira sikta aṃgam ceṣṭamānam mahītale | jagāma manasā sītām lakṣmaṇasya vacaḥ smaran || 44.22 ||

रक्त से लथपथ अंगों वाले उस पृथ्वी पर तड़पते राक्षस को देखकर राम का मन तुरंत सीता की ओर दौड़ा, और उन्हें लक्ष्मण के वचन याद आ गए।

श्लोक 23 (aranya.44.23)

मारीचस्य तु माय एषा पूर्व उक्तम् लक्ष्मणेन तु । तत् तदा हि अभवत् च अद्य मारीचो अयम् मया हतः ॥ 44.23 ॥

mārīcasya tu māya eṣā pūrva uktam lakṣmaṇena tu | tat tadā hi abhavat ca adya mārīco ayam mayā hataḥ || 44.23 ||

"यह तो निश्चय ही मारीच की वही माया है, जिसकी बात लक्ष्मण ने पहले ही कही थी - और वह सच हो गई, क्योंकि आज मैंने जिसे मारा है, वह मारीच ही है।

श्लोक 24 (aranya.44.24)

हा सीते लक्ष्मण इति एवम् आक्रुश्य तु महा स्वनम् । ममार राक्षसः सो अयम् श्रुत्वा सीता कथम् भवेत् ॥ 44.24 ॥

hā sīte lakṣmaṇa iti evam ākruśya tu mahā svanam | mamāra rākṣasaḥ so ayam śrutvā sītā katham bhavet || 44.24 ||

"वह राक्षस 'हा सीते! हा लक्ष्मण!' इस प्रकार जोर से चीत्कार करते हुए मर गया - परन्तु इसे सुनकर सीता का क्या होगा?

श्लोक 25 (aranya.44.25)

लक्ष्मणः च महाबाहुः काम् अवस्थाम् गमिष्यति । इति संचिन्त्य धर्माअत्मा रामो हृष्ट तनू रुहः ॥ 44.25 ॥

lakṣmaṇaḥ ca mahābāhuḥ kām avasthām gamiṣyati | iti saṃcintya dharmāatmā rāmo hṛṣṭa tanū ruhaḥ || 44.25 ||

और महाबाहु लक्ष्मण किस स्थिति में पड़ जाएंगे?" ऐसा सोचते हुए धर्मात्मा राम का रोम-रोम भय से खड़ा हो गया।

श्लोक 26 (aranya.44.26)

तत्र रामम् भयम् तीव्रम् आविवेश विषादजम् । राक्षसम् मृग रूपम् तम् हत्वा श्रुत्वा च तत् स्वनम् ॥ 44.26 ॥

tatra rāmam bhayam tīvram āviveśa viṣādajam | rākṣasam mṛga rūpam tam hatvā śrutvā ca tat svanam || 44.26 ||

उस मृगरूपधारी राक्षस को मारकर और उसकी वह चीत्कार सुनकर, राम को विषाद से उत्पन्न तीव्र भय ने घेर लिया।

श्लोक 27 (aranya.44.27)

निहत्य पृषतम् च अन्यम् मांसम् आदाय राघवः । त्वरमाणो जनस्थानम् ससार अभिमुखः तदा ॥ 44.27 ॥

nihatya pṛṣatam ca anyam māṃsam ādāya rāghavaḥ | tvaramāṇo janasthānam sasāra abhimukhaḥ tadā || 44.27 ||

तब राघव ने एक और चित्तीदार मृग को मारकर उसका मांस लिया और शीघ्रता से जनस्थान की ओर लौट चले।

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