अरण्यकाण्ड · सर्ग 45
सीता का लक्ष्मण को कटु वचन
श्लोक 1 (aranya.45.1)
आर्तस्वरम् तु तम् भर्तुः विज्ञाय सदृशम् वने । उवाच लक्ष्मणम् सीता गच्छ जानीहि राघवम् ॥ 45.1 ॥
ārtasvaram tu tam bhartuḥ vijñāya sadṛśam vane | uvāca lakṣmaṇam sītā gaccha jānīhi rāghavam || 45.1 ||
वन में गूँजते उस पीड़ा भरे स्वर को अपने पति के स्वर के समान पहचानकर सीता ने लक्ष्मण से कहा - "जाओ, राघव का पता लगाओ।"
श्लोक 2 (aranya.45.2)
न हि मे जीवितम् स्थाने हृदयम् वा अवतिष्ठते । क्रोशतः परम आर्तस्य श्रुतः शब्दो मया भृशम् ॥ 45.2 ॥
na hi me jīvitam sthāne hṛdayam vā avatiṣṭhate | krośataḥ parama ārtasya śrutaḥ śabdo mayā bhṛśam || 45.2 ||
"मेरा जीवन, या यों कहूँ मेरा हृदय, अपने स्थान पर स्थिर नहीं रह पा रहा; मैंने अभी-अभी अत्यंत पीड़ा से भरा हुआ प्रबल स्वर स्पष्ट सुना है।
श्लोक 3 (aranya.45.3)
आक्रन्दमानम् तु वने भ्रातरम् त्रातुम् अर्हसि । तम् क्षिप्रम् अभिधाव त्वम् भ्रातरम् शरण एषिणम् ॥ 45.3 ॥
ākrandamānam tu vane bhrātaram trātum arhasi | tam kṣipram abhidhāva tvam bhrātaram śaraṇa eṣiṇam || 45.3 ||
वन में चीत्कार करते हुए अपने भाई की रक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य है; शीघ्र ही उस शरण चाहने वाले अपने भाई की ओर दौड़ो।
श्लोक 4 (aranya.45.4)
रक्षसाम् वशम् आपन्नम् सिंहानाम् इव गोवृषम् । न जगाम तथा उक्तः तु भ्रातुः आज्ञाय शासनम् ॥ 45.4 ॥
rakṣasām vaśam āpannam siṃhānām iva govṛṣam | na jagāma tathā uktaḥ tu bhrātuḥ ājñāya śāsanam || 45.4 ||
"वह राक्षसों के वश में पड़ गया होगा, जैसे बैल सिंहों के चंगुल में फँस जाता है।" परन्तु इस प्रकार कहे जाने पर भी लक्ष्मण अपने भाई की आज्ञा का स्मरण करते हुए वहाँ से नहीं गए।
श्लोक 5 (aranya.45.5)
तम् उवाच ततः तत्र क्षुभिता जनक आत्मजा । सौमित्रे मित्र रूपेण भ्रातुः त्वम् असि शत्रुवत् ॥ 45.5 ॥
tam uvāca tataḥ tatra kṣubhitā janaka ātmajā | saumitre mitra rūpeṇa bhrātuḥ tvam asi śatruvat || 45.5 ||
तब क्षुब्ध हुई जनकनंदिनी ने उससे कहा - "हे सौमित्र! तुम मित्र के वेश में अपने भाई के शत्रु के समान हो,
श्लोक 6 (aranya.45.6)
यः त्वम् अस्याम् अवस्थायाम् भ्रातरम् न अभिपद्यसे । इच्छसि त्वम् विनश्यन्तम् रामम् लक्ष्मण मत् कृते ॥ 45.6 ॥
yaḥ tvam asyām avasthāyām bhrātaram na abhipadyase | icchasi tvam vinaśyantam rāmam lakṣmaṇa mat kṛte || 45.6 ||
क्योंकि इस संकट की घड़ी में भी तुम अपने भाई की ओर नहीं बढ़ रहे हो। हे लक्ष्मण! मेरे ही कारण तुम चाहते हो कि राम नष्ट हो जाएँ।
श्लोक 7 (aranya.45.7)
लोभात् तु मत् कृतम् नूनम् न अनुगच्छसि राघवम् । व्यसनम् ते प्रियम् मन्ये स्नेहो भ्रातरि न अस्ति ते ॥ 45.7 ॥
lobhāt tu mat kṛtam nūnam na anugacchasi rāghavam | vyasanam te priyam manye sneho bhrātari na asti te || 45.7 ||
निश्चय ही मेरे प्रति लोभ के कारण तुम राघव के पीछे नहीं जा रहे हो। मुझे लगता है कि राम की विपत्ति तुम्हें प्रिय है; तुम्हारे मन में भाई के प्रति स्नेह नहीं है।
श्लोक 8 (aranya.45.8)
तेन तिष्ठसि विस्रब्धः तम् अपश्यन् महाद्युतिम् । किम् हि संशयम् आपन्ने तस्मिन् इह मया भवेत् ॥ 45.8 ॥
tena tiṣṭhasi visrabdhaḥ tam apaśyan mahādyutim | kim hi saṃśayam āpanne tasmin iha mayā bhavet || 45.8 ||
इसीलिए तुम उस तेजस्वी राम को न देखकर भी इतने निश्चिंत बने खड़े हो। अब जब वे संकट में पड़े हैं, तो यहाँ तुम्हारे साथ रहने से मुझे क्या प्रयोजन?
श्लोक 9 (aranya.45.9)
कर्तव्यम् इह तिष्ठन्त्या यत् प्रधानः त्वम् आगतः । एवम् ब्रुवाणम् वैदेहीम् बाष्प शोक समन्वितम् ॥ 45.9 ॥
kartavyam iha tiṣṭhantyā yat pradhānaḥ tvam āgataḥ | evam bruvāṇam vaidehīm bāṣpa śoka samanvitam || 45.9 ||
जिसके लिए तुम यहाँ आए हो, वही जब संकट में है, तो मेरे यहाँ ठहरने का क्या प्रयोजन?" आँसुओं और शोक से व्याकुल इस प्रकार बोलती हुई वैदेही से,
श्लोक 10 (aranya.45.10)
अब्रवीत् लक्ष्मणः त्रस्ताम् सीताम् मृग वधूम् इव । पन्नग असुर गन्धर्व देव दानव राक्षसैः ॥ 45.10 ॥
abravīt lakṣmaṇaḥ trastām sītām mṛga vadhūm iva | pannaga asura gandharva deva dānava rākṣasaiḥ || 45.10 ||
मृगी के समान भयभीत सीता से लक्ष्मण ने कहा - "हे सीते, तुम्हारे पति को नाग, असुर, गंधर्व, देव, दानव अथवा राक्षस कोई भी पराजित नहीं कर सकता,
श्लोक 11 (aranya.45.11)
अशक्यः तव वैदेही भर्ता जेतुम् न संशयः । देवि देव मनुष्येषु गन्धर्वेषु पतत्रिषु ॥ 45.11 ॥
aśakyaḥ tava vaidehī bhartā jetum na saṃśayaḥ | devi deva manuṣyeṣu gandharveṣu patatriṣu || 45.11 ||
इसमें कोई संदेह नहीं, हे देवि! देवताओं, मनुष्यों, गंधर्वों, पक्षियों,
श्लोक 12 (aranya.45.12)
राक्षसेषु पिशाचेषु किन्नरेषु मृगेषु च । दानवेषु च घोरेषु न स विद्येत शोभने ॥ 45.12 ॥
rākṣaseṣu piśāceṣu kinnareṣu mṛgeṣu ca | dānaveṣu ca ghoreṣu na sa vidyeta śobhane || 45.12 ||
राक्षसों, पिशाचों, किन्नरों, मृगों अथवा घोर दानवों में भी, हे शोभने! ऐसा कोई नहीं है,
श्लोक 13 (aranya.45.13)
यो रामम् प्रतियुध्येत समरे वासव उपमम् । अवध्यः समरे रामो न एवम् त्वम् वक्तुम् अर्हसि ॥ 45.13 ॥
yo rāmam pratiyudhyeta samare vāsava upamam | avadhyaḥ samare rāmo na evam tvam vaktum arhasi || 45.13 ||
जो युद्ध में इंद्र के समान राम का सामना कर सके - युद्ध में राम अवध्य हैं, तुम्हें इस प्रकार नहीं कहना चाहिए।
श्लोक 14 (aranya.45.14)
न त्वाम् अस्मिन् वने हातुम् उत्सहे राघवम् विना । अनिवार्यम् बलम् तस्य बलैः बलवताम् अपि ॥ 45.14 ॥
na tvām asmin vane hātum utsahe rāghavam vinā | anivāryam balam tasya balaiḥ balavatām api || 45.14 ||
राघव के बिना मैं तुम्हें इस वन में अकेला छोड़ने का साहस नहीं कर सकता। उनके बल को बड़े-बड़े बलवानों की सेनाएँ भी नहीं रोक सकतीं।
श्लोक 15 (aranya.45.15)
त्रिभिः लोकैः समुदितैः स ईश्वरैः स अमरैः अपि । हृदयम् निर्वृतम् ते अस्तु संतापः त्यज्यताम् तव ॥ 45.15 ॥
tribhiḥ lokaiḥ samuditaiḥ sa īśvaraiḥ sa amaraiḥ api | hṛdayam nirvṛtam te astu saṃtāpaḥ tyajyatām tava || 45.15 ||
तीनों लोक अपने स्वामियों और देवताओं सहित एक साथ भी उठ खड़े हों, तो भी उनका बल नहीं रोका जा सकता। तुम अपने हृदय को शांत करो, यह संताप त्याग दो।
श्लोक 16 (aranya.45.16)
आगमिष्यति ते भर्ता शीघ्रम् हत्वा मृगोत्तमम् । न सस् तस्य स्वरो व्यक्तम् न कश्चित् अपि दैवतः ॥ 45.16 ॥
āgamiṣyati te bhartā śīghram hatvā mṛgottamam | na sas tasya svaro vyaktam na kaścit api daivataḥ || 45.16 ||
तुम्हारे पति उस असाधारण मृग को मारकर शीघ्र ही लौट आएँगे। वह स्वर स्पष्टतः न तो उनका था और न ही किसी देवता का।
श्लोक 17 (aranya.45.17)
गन्धर्व नगर प्रख्या माया तस्य च रक्षसः । न्यास भूता असि वैदेहि न्यस्ता मयि महात्मना ॥ 45.17 ॥
gandharva nagara prakhyā māyā tasya ca rakṣasaḥ | nyāsa bhūtā asi vaidehi nyastā mayi mahātmanā || 45.17 ||
यह उस राक्षस की माया मात्र है, गंधर्वनगर के समान मिथ्या। हे वैदेही! तुम उन महात्मा राम द्वारा मुझे सौंपी गई धरोहर हो।
श्लोक 18 (aranya.45.18)
रामेण त्वम् वरारोहे न त्वाम् त्यक्तुम् इह उत्सहे । कृत वैराः च कल्याणि वयम् एतैः निशाचरैः ॥ 45.18 ॥
rāmeṇa tvam varārohe na tvām tyaktum iha utsahe | kṛta vairāḥ ca kalyāṇi vayam etaiḥ niśācaraiḥ || 45.18 ||
हे सुंदरी! मैं तुम्हें यहाँ अकेला छोड़ने का साहस नहीं कर सकता। हे कल्याणी! हमने इन निशाचरों से पहले ही शत्रुता मोल ले रखी है,
श्लोक 19 (aranya.45.19)
खरस्य निधने देवि जनस्थान वधम् प्रति । राक्षसा विविधा वाचो व्यवहरन्ति महावने ॥ 45.19 ॥
kharasya nidhane devi janasthāna vadham prati | rākṣasā vividhā vāco vyavaharanti mahāvane || 45.19 ||
खर के वध और जनस्थान के विनाश के कारण, हे देवि! इस महावन में विचरने वाले राक्षस तरह-तरह के स्वर बना सकते हैं -
श्लोक 20 (aranya.45.20)
हिंसा विहारा वैदेहि न चिन्तयितुम् अर्हसि । लक्ष्मणेन एवम् उक्ता तु क्रुद्धा संरक्त लोचना ॥ 45.20 ॥
hiṃsā vihārā vaidehi na cintayitum arhasi | lakṣmaṇena evam uktā tu kruddhā saṃrakta locanā || 45.20 ||
क्योंकि हिंसा ही इनका खेल है, हे वैदेही! तुम्हें इसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।" लक्ष्मण के इन वचनों को सुनकर सीता क्रोध से भर उठी, उसकी आँखें लाल हो गईं,
श्लोक 21 (aranya.45.21)
अब्रवीत् परुषम् वाक्यम् लक्ष्मणम् सत्य वादिनम् । अनार्य करुणारंभ नृशंस कुल पांसन ॥ 45.21 ॥
abravīt paruṣam vākyam lakṣmaṇam satya vādinam | anārya karuṇāraṃbha nṛśaṃsa kula pāṃsana || 45.21 ||
और सत्यवादी लक्ष्मण से कठोर वचन कहने लगी - "तुम अनार्य हो, दया से रहित हो, क्रूर हो और अपने कुल के लिए कलंक हो,
श्लोक 22 (aranya.45.22)
अहम् तव प्रियम् मन्ये रामस्य व्यसनम् महत् । रामस्य व्यसन्म् दृष्ट्वा तेन एतानि प्रभाषसे ॥ 45.22 ॥
aham tava priyam manye rāmasya vyasanam mahat | rāmasya vyasanm dṛṣṭvā tena etāni prabhāṣase || 45.22 ||
मुझे लगता है कि राम की यह घोर विपत्ति तुम्हें प्रिय है; राम की इस विपत्ति को देखकर ही तुम मुझसे यह सब कह रहे हो।
श्लोक 23 (aranya.45.23)
न एव चित्रम् सपत्नेषु पापम् लक्ष्मण यत् भवेत् । त्वत् विधेषु नृशंसेषु नित्यम् प्रच्छन्न चारिषु ॥ 45.23 ॥
na eva citram sapatneṣu pāpam lakṣmaṇa yat bhavet | tvat vidheṣu nṛśaṃseṣu nityam pracchanna cāriṣu || 45.23 ||
हे लक्ष्मण! तुम्हारे जैसे क्रूर और सदा छिपकर काम करने वाले किसी सौतिया डाह रखने वाले में पाप उत्पन्न हो, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
श्लोक 24 (aranya.45.24)
सुदुष्टः त्वम् वने रामम् एकम् एको अनुगच्छसि । मम हेतोः प्रतिच्छन्नः प्रयुक्तो भरतेन वा ॥ 45.24 ॥
suduṣṭaḥ tvam vane rāmam ekam eko anugacchasi | mama hetoḥ praticchannaḥ prayukto bharatena vā || 45.24 ||
तुम अत्यंत दुष्ट हो - तुमने राम का अकेले वन में गुप्त रूप से इसलिए अनुसरण किया, या तो मेरे कारण या भरत द्वारा उकसाए जाने पर।
श्लोक 25 (aranya.45.25)
तत् न सिद्ध्यति सौमित्रे तव अपि भरतस्य वा । कथम् इंदीवर श्यामम् रामम् पद्म निभेक्षणम् ॥ 45.25 ॥
tat na siddhyati saumitre tava api bharatasya vā | katham iṃdīvara śyāmam rāmam padma nibhekṣaṇam || 45.25 ||
किन्तु हे सौमित्र! न तो तुम्हारा और न ही भरत का यह मंसूबा सफल होगा। नील कमल के समान श्याम वर्ण और कमल के समान नेत्रों वाले राम को -
श्लोक 26 (aranya.45.26)
उपसंश्रित्य भर्तारम् कामयेयम् पृथक् जनम् । समक्षम् तव सौमित्रे प्राणान् त्यक्ष्यामि असंशयम् ॥ 45.26 ॥
upasaṃśritya bhartāram kāmayeyam pṛthak janam | samakṣam tava saumitre prāṇān tyakṣyāmi asaṃśayam || 45.26 ||
अपना पति और आश्रय मानकर, फिर किसी साधारण पुरुष की कामना कर सकती हूँ? हे सौमित्र! तुम्हारे सामने ही मैं निःसंकोच अपने प्राण त्याग दूँगी।
श्लोक 27 (aranya.45.27)
रामम् विना क्षणम् अपि न एव जीवामि भू तले । इति उक्तः परुषम् वाक्यम् सीतया रोमहर्षणम् ॥ 45.27 ॥
rāmam vinā kṣaṇam api na eva jīvāmi bhū tale | iti uktaḥ paruṣam vākyam sītayā romaharṣaṇam || 45.27 ||
राम के बिना मैं इस पृथ्वी पर क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकती।" सीता के इन रोंगटे खड़े कर देने वाले कठोर वचनों को सुनकर,
श्लोक 28 (aranya.45.28)
अब्रवीत् लक्ष्मणः सीताम् प्रांजलिः विजितेन्द्रियः । उत्तरम् न उत्सहे वक्तुम् दैवतम् भवती मम ॥ 45.28 ॥
abravīt lakṣmaṇaḥ sītām prāṃjaliḥ vijitendriyaḥ | uttaram na utsahe vaktum daivatam bhavatī mama || 45.28 ||
जितेन्द्रिय लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर सीता से कहा - "मैं तुम्हें उत्तर देने का साहस नहीं करता, क्योंकि तुम मेरे लिए देवी के समान हो।
श्लोक 29 (aranya.45.29)
वाक्यम् अप्रतिरूपम् तु न चित्रम् स्त्रीषु मैथिलि । स्वभावः तु एष नारीणाम् एषु लोकेषु दृश्यते ॥ 45.29 ॥
vākyam apratirūpam tu na citram strīṣu maithili | svabhāvaḥ tu eṣa nārīṇām eṣu lokeṣu dṛśyate || 45.29 ||
किन्तु हे मैथिली! स्त्रियों का इस प्रकार अनुचित वचन कहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है; यह तो स्त्रियों का स्वभाव है, जो इस संसार में स्पष्ट देखा जाता है।
श्लोक 30 (aranya.45.30)
विमुक्त धर्माः चपलाः तीक्ष्णा भेदकराः स्त्रियः । न सहे हि ईदृशम् वाक्यम् वैदेही जनक आत्मजे ॥ 45.30 ॥
vimukta dharmāḥ capalāḥ tīkṣṇā bhedakarāḥ striyaḥ | na sahe hi īdṛśam vākyam vaidehī janaka ātmaje || 45.30 ||
स्त्रियाँ मर्यादा से मुक्त, चंचल, तीखी और फूट डालने वाली होती हैं; फिर भी हे जनकनंदिनी वैदेही! ऐसे वचन मुझसे सहन नहीं होते।
श्लोक 31 (aranya.45.31)
श्रोत्रयोः उभयोः मध्ये तप्त नाराच सन्निभम् । उपशृण्वंतु मे सर्वे साक्षिनो हि वनेचराः ॥ 45.31 ॥
śrotrayoḥ ubhayoḥ madhye tapta nārāca sannibham | upaśṛṇvaṃtu me sarve sākṣino hi vanecarāḥ || 45.31 ||
तुम्हारे ये वचन मेरे दोनों कानों के बीच तपे हुए लोहे के बाण के समान चुभते हैं। इस वन में विचरने वाले सभी प्राणी इसे सुनें और मेरे साक्षी बनें,
श्लोक 32 (aranya.45.32)
न्याय वादी यथा वाक्यम् उक्तो अहम् परुषम् त्वया । धिक् त्वाम् अद्य प्रणश्यन्तीम् यन् माम् एवम् विशंकसे ॥ 45.32 ॥
nyāya vādī yathā vākyam ukto aham paruṣam tvayā | dhik tvām adya praṇaśyantīm yan mām evam viśaṃkase || 45.32 ||
साक्षी बनें कि मैंने न्यायपूर्ण बात कही, फिर भी तुमने मुझसे इतने कठोर वचन कहे। धिक्कार है तुम पर, कि तुमने मुझ पर इस प्रकार संदेह किया!
श्लोक 33 (aranya.45.33)
स्त्रीत्वात् दुष्ट स्वभावेन गुरु वाक्ये व्यवस्थितम् । गमिष्ये यत्र काकुत्स्थः स्वस्ति ते अस्तु वरानने ॥ 45.33 ॥
strītvāt duṣṭa svabhāvena guru vākye vyavasthitam | gamiṣye yatra kākutsthaḥ svasti te astu varānane || 45.33 ||
अपने स्त्री-सुलभ चंचल स्वभाव के कारण ही तुम मुझ पर संदेह कर रही हो, जबकि मैं अपने बड़े भाई की आज्ञा पर दृढ़ता से खड़ा हूँ। अब मैं वहाँ जाता हूँ जहाँ काकुत्स्थ राम हैं; हे सुमुखी! तुम्हारा कल्याण हो।
श्लोक 34 (aranya.45.34)
रक्षन्तु त्वाम् विशालाक्षि समग्रा वन देवताः । निमित्तानि हि घोराणि यानि प्रादुर्भवन्ति मे । अपि त्वाम् सह रामेण पश्येयम् पुनरागतः ॥ 45.34 ॥
rakṣantu tvām viśālākṣi samagrā vana devatāḥ | nimittāni hi ghorāṇi yāni prādurbhavanti me | api tvām saha rāmeṇa paśyeyam punarāgataḥ || 45.34 ||
हे विशाल नेत्रों वाली! वन की समस्त देवताएँ तुम्हारी रक्षा करें। मुझे जो भयंकर अपशकुन दिखाई दे रहे हैं, उन्हें देखते हुए मुझे नहीं पता कि लौटने पर मैं तुम्हें राम के साथ फिर देख भी पाऊँगा या नहीं।" ऐसा कहकर लक्ष्मण वहाँ से चल पड़े।
श्लोक 35 (aranya.45.35)
लक्ष्मणेन एवम् उक्ता तु रुदती जनकाअत्मजा । प्रत्युवाच ततो वाक्यम् तीव्रम् बाष्प परिप्लुता ॥ 45.35 ॥
lakṣmaṇena evam uktā tu rudatī janakāatmajā | pratyuvāca tato vākyam tīvram bāṣpa pariplutā || 45.35 ||
लक्ष्मण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, रोती हुई और आँसुओं से भीगी जनकनंदिनी ने तीखे वचनों में उत्तर दिया।
श्लोक 36 (aranya.45.36)
गोदावरीम् प्रवेक्ष्यामि हीना रामेण लक्ष्मण । आबन्धिष्ये अथवा त्यक्ष्ये विषमे देहम् आत्मनः ॥ 45.36 ॥
godāvarīm pravekṣyāmi hīnā rāmeṇa lakṣmaṇa | ābandhiṣye athavā tyakṣye viṣame deham ātmanaḥ || 45.36 ||
"राम के बिना, हे लक्ष्मण! मैं गोदावरी में कूद पडूँगी, या फाँसी लगा लूँगी, अथवा किसी ऊँचे स्थान से अपना शरीर गिरा दूँगी।
श्लोक 37 (aranya.45.37)
पिबामि वा विषम् तीक्ष्णम् प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् । न तु अहम् राघवात् अन्यम् कदाअपि पुरुषम् स्पृशे ॥ 45.37 ॥
pibāmi vā viṣam tīkṣṇam pravekṣyāmi hutāśanam | na tu aham rāghavāt anyam kadāapi puruṣam spṛśe || 45.37 ||
अथवा तीक्ष्ण विष पी लूँगी या धधकती अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी; परन्तु राघव के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष को कभी स्पर्श नहीं करूँगी।
श्लोक 38 (aranya.45.38)
इति लक्ष्मणम् आश्रुत्य सीता दुह्ख समन्विता । पाणिभ्याम् रुदती दुह्खाद् उदरम् प्रजघान ह ॥ 45.38 ॥
iti lakṣmaṇam āśrutya sītā duhkha samanvitā | pāṇibhyām rudatī duhkhād udaram prajaghāna ha || 45.38 ||
लक्ष्मण से यह कहकर, दुःख से व्याकुल सीता रोते हुए अपने दोनों हाथों से अपना पेट पीटने लगी।
श्लोक 39 (aranya.45.39)
ताम् आर्त रूपाम् विमना रुदन्तीम् । सौमित्रिः आलोक्य विशाल नेत्राम् । आश्वासयामास न चैव भर्तुः । तम् भ्रातरम् किंचित् उवाच सीता ॥ 45.39 ॥
tām ārta rūpām vimanā rudantīm | saumitriḥ ālokya viśāla netrām | āśvāsayāmāsa na caiva bhartuḥ | tam bhrātaram kiṃcit uvāca sītā || 45.39 ||
पीड़ा से व्याकुल, विशाल नेत्रों वाली रोती हुई सीता को देखकर उदास सौमित्र ने उसे सांत्वना देने का प्रयास किया; परन्तु सीता ने अपने पति के भाई से एक शब्द भी नहीं कहा।
श्लोक 40 (aranya.45.40)
ततः तु सीताम् अभिवाद्य लक्ष्मणः । कृत अन्जलिः किंचिद् अभिप्रणम्य । अवेक्षमाणो बहुशः स मैथिलीम् । जगाम रामस्य समीपम् आत्मवान् ॥ 45.40 ॥
tataḥ tu sītām abhivādya lakṣmaṇaḥ | kṛta anjaliḥ kiṃcid abhipraṇamya | avekṣamāṇo bahuśaḥ sa maithilīm | jagāma rāmasya samīpam ātmavān || 45.40 ||
तत्पश्चात् संयमी लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर सीता को प्रणाम किया, और बार-बार मैथिली की ओर देखते हुए राम की दिशा में चल पड़े।