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अरण्यकाण्ड · सर्ग 47

रावण का प्रकट रूप

सर्ग 46सर्ग-सूचीसर्ग 48

श्लोक 1 (aranya.47.1)

रावणेन तु वैदेही तदा पृष्टा जिहीर्षुणा । परिव्राजक रूपेण शशंस आत्मानम् आत्मना ॥ 47.1 ॥

rāvaṇena tu vaidehī tadā pṛṣṭā jihīrṣuṇā | parivrājaka rūpeṇa śaśaṃsa ātmānam ātmanā || 47.1 ||

हरण की इच्छा रखने वाले उस रावण द्वारा परिव्राजक के वेश में इस प्रकार पूछे जाने पर, वैदेही ने अपने विषय में स्वयं ही बता दिया।

श्लोक 2 (aranya.47.2)

ब्राह्मणः च अतिथिः च एष अनुक्तो हि शपेत माम् । इति ध्यात्वा मुहूर्तम् तु सीता वचनम् अब्रवीत् ॥ 47.2 ॥

brāhmaṇaḥ ca atithiḥ ca eṣa anukto hi śapeta mām | iti dhyātvā muhūrtam tu sītā vacanam abravīt || 47.2 ||

यह ब्राह्मण भी है और अतिथि भी, यदि इसे उत्तर न दिया तो यह मुझे शाप दे सकता है — क्षणभर ऐसा सोचकर सीता यह वचन बोलीं।

श्लोक 3 (aranya.47.3)

दुहिता जनकस्य अहम् मैथिलस्य महात्मनः । सीता नाम्ना अस्मि भद्रम् ते रामस्य महिषी प्रिया ॥ 47.3 ॥

duhitā janakasya aham maithilasya mahātmanaḥ | sītā nāmnā asmi bhadram te rāmasya mahiṣī priyā || 47.3 ||

"मैं मिथिला के महात्मा राजा जनक की पुत्री हूँ; मेरा नाम सीता है, और मैं राम की प्रिय महिषी हूँ। तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 4 (aranya.47.4)

उषित्वा द्वा दश समाः इक्ष्वाकूणाम् निवेशने । भुंजाना मानुषान् भोगान् सर्व काम समृद्धिनी ॥ 47.4 ॥

uṣitvā dvā daśa samāḥ ikṣvākūṇām niveśane | bhuṃjānā mānuṣān bhogān sarva kāma samṛddhinī || 47.4 ||

इक्ष्वाकुओं के भवन में बारह वर्षों तक निवास करते हुए मैं समस्त मानवीय सुख भोगती और अपनी सब इच्छाओं की समृद्धि में रहती थी।

श्लोक 5 (aranya.47.5)

तत्र त्रयो दशे वर्षे राज अमंत्र्यत प्रभुः । अभिषेचयितुम् रामम् समेतो राज मन्त्रिभिः ॥ 47.5 ॥

tatra trayo daśe varṣe rāja amaṃtryata prabhuḥ | abhiṣecayitum rāmam sameto rāja mantribhiḥ || 47.5 ||

वहाँ तेरहवें वर्ष में महाराज ने अपने राजमंत्रियों सहित मिलकर राम का राज्याभिषेक करने का विचार किया।

श्लोक 6 (aranya.47.6)

तस्मिन् संभ्रियमाणे तु राघवस्य अभिषेचने । कैकेयी नाम भर्तारम् मम आर्या याचते वरम् ॥ 47.6 ॥

tasmin saṃbhriyamāṇe tu rāghavasya abhiṣecane | kaikeyī nāma bhartāram mama āryā yācate varam || 47.6 ||

जब राघव के अभिषेक की तैयारियाँ हो रही थीं, तभी मेरी आर्या सास कैकेयी ने अपने पति से एक वर माँगा।

श्लोक 7 (aranya.47.7)

प्रतिगृह्य तु कैकेयी श्वशुरम् सुकृतेन मे । मम प्रव्राजनम् भर्तुर् भरतस्य अभिषेचनम् ॥ 47.7 ॥

pratigṛhya tu kaikeyī śvaśuram sukṛtena me | mama pravrājanam bhartur bharatasya abhiṣecanam || 47.7 ||

पहले किए गए किसी उपकार के बदले मेरे श्वसुर को बाध्य करके कैकेयी ने

श्लोक 8 (aranya.47.8)

द्वौ अयाचत भर्तारम् सत्यसंधम् नृपोत्तमम् । न अद्य भोक्ष्ये न च स्वप्स्ये न पास्ये कदाचन ॥ 47.8 ॥

dvau ayācata bhartāram satyasaṃdham nṛpottamam | na adya bhokṣye na ca svapsye na pāsye kadācana || 47.8 ||

उस सत्यप्रतिज्ञ श्रेष्ठ राजा से दो वर माँगे — मेरे पति का वनवास और भरत का राज्याभिषेक। उसने कहा, 'मैं आज से न कुछ खाऊँगी, न सोऊँगी, न कभी जल ग्रहण करूँगी,

श्लोक 9 (aranya.47.9)

एष मे जीवितस्य अन्तो रामो यदि अभिषिच्यते । इति ब्रुवाणाम् कैकेयीम् श्वशुरो मे स पार्थिवः ॥ 47.9 ॥

eṣa me jīvitasya anto rāmo yadi abhiṣicyate | iti bruvāṇām kaikeyīm śvaśuro me sa pārthivaḥ || 47.9 ||

यदि राम का अभिषेक हुआ तो यही मेरे जीवन का अंत होगा।' इस प्रकार बोलती हुई कैकेयी को मेरे श्वसुर उस राजा ने

श्लोक 10 (aranya.47.10)

अयाचत अर्थैः अन्वर्थैः न च यांचाम् चकार सा । मम भर्ता महातेजा वयसा पंच विंशकः ॥ 47.10 ॥

ayācata arthaiḥ anvarthaiḥ na ca yāṃcām cakāra sā | mama bhartā mahātejā vayasā paṃca viṃśakaḥ || 47.10 ||

अनेक युक्तियुक्त और सार्थक वचनों से समझाने का प्रयत्न किया, परन्तु वह अपनी माँग से न डिगी। मेरे महातेजस्वी पति उस समय पच्चीस वर्ष के थे,

श्लोक 11 (aranya.47.11)

अष्टा दश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते । राम इति प्रथितो लोके सत्यवान् शीलवान् शुचिः ॥ 47.11 ॥

aṣṭā daśa hi varṣāṇi mama janmani gaṇyate | rāma iti prathito loke satyavān śīlavān śuciḥ || 47.11 ||

और मेरे जन्म से अठारह वर्ष गिने जाते हैं। संसार में राम के नाम से विख्यात वे सत्यवादी, शीलवान और पवित्र हैं,

श्लोक 12 (aranya.47.12)

विशालाक्षो महाबाहुः सर्व भूत हिते रतः । कामार्तः च महाराजः पिता दशरथः स्वयम् ॥ 47.12 ॥

viśālākṣo mahābāhuḥ sarva bhūta hite rataḥ | kāmārtaḥ ca mahārājaḥ pitā daśarathaḥ svayam || 47.12 ||

विशाल नेत्रों वाले, महाबाहु और सब प्राणियों के हित में रत हैं। परन्तु स्वयं महाराज दशरथ, कैकेयी के प्रति कामासक्त होकर,

श्लोक 13 (aranya.47.13)

कैकेय्याः प्रिय कामार्थम् तम् रामम् न अभिषेचयत् । अभिषेकाय तु पितुः समीपम् रामम् आगतम् ॥ 47.13 ॥

kaikeyyāḥ priya kāmārtham tam rāmam na abhiṣecayat | abhiṣekāya tu pituḥ samīpam rāmam āgatam || 47.13 ||

कैकेयी की मनचाही इच्छा पूरी करने के लिए उन्होंने राम का अभिषेक नहीं किया। और जब राम अपने अभिषेक के लिए पिता के समीप आए,

श्लोक 14 (aranya.47.14)

कैकेयी मम भर्तारम् इति उवाच द्रुतम् वचः । तव पित्रा समाज्ञप्तम् मम इदम् शृणु राघव ॥ 47.14 ॥

kaikeyī mama bhartāram iti uvāca drutam vacaḥ | tava pitrā samājñaptam mama idam śṛṇu rāghava || 47.14 ||

कैकेयी ने मेरे पति से तुरंत यह वचन कहा — 'हे राघव! सुनो, यह वही है जो तुम्हारे पिता ने मेरे द्वारा घोषित करवाया है —

श्लोक 15 (aranya.47.15)

भरताय प्रदातव्यम् इदम् राज्यम् अकण्टकम् । त्वया तु खलु वस्तव्यम् नव वर्षाणि पंच च ॥ 47.15 ॥

bharatāya pradātavyam idam rājyam akaṇṭakam | tvayā tu khalu vastavyam nava varṣāṇi paṃca ca || 47.15 ||

यह निष्कंटक राज्य भरत को दिया जाना है, और तुम्हें निश्चय ही चौदह वर्षों तक वन में रहना होगा —

श्लोक 16 (aranya.47.16)

वने प्रव्रज काकुत्स्थ पितरम् मोचय अनृतात् । तथा इति उवाच ताम् रामः कैकेयीम् अकुतो भयः ॥ 47.16 ॥

vane pravraja kākutstha pitaram mocaya anṛtāt | tathā iti uvāca tām rāmaḥ kaikeyīm akuto bhayaḥ || 47.16 ||

हे काकुत्स्थ! वन को चले जाओ और अपने पिता को असत्य के दोष से मुक्त करो।' किसी से भी भयभीत न होने वाले राम ने कैकेयी से 'ऐसा ही होगा' कहकर

श्लोक 17 (aranya.47.17)

चकार तत् वचः तस्या मम भर्ता दृढ व्रतः । दद्यात् न प्रतिगृह्णीयात् सत्यम् ब्रूयात् न च अनृतम् ॥ 47.17 ॥

cakāra tat vacaḥ tasyā mama bhartā dṛḍha vrataḥ | dadyāt na pratigṛhṇīyāt satyam brūyāt na ca anṛtam || 47.17 ||

उसकी उस बात को पूरा कर दिखाया, क्योंकि मेरे पति दृढ़प्रतिज्ञ हैं। वे देते हैं, लेते नहीं; सत्य ही बोलते हैं, असत्य कभी नहीं —

श्लोक 18 (aranya.47.18)

एतत् ब्राह्मण रामस्य व्रतम् ध्रुवम् अनुत्तमम् । तस्य भ्राता तु वैमात्रो लक्ष्मणो नाम वीर्यवान् ॥ 47.18 ॥

etat brāhmaṇa rāmasya vratam dhruvam anuttamam | tasya bhrātā tu vaimātro lakṣmaṇo nāma vīryavān || 47.18 ||

हे ब्राह्मण! यही राम का अटल और सर्वोत्तम व्रत है। उनका एक सौतेला भाई है, जिसका नाम लक्ष्मण है, वह अत्यंत पराक्रमी है,

श्लोक 19 (aranya.47.19)

रामस्य पुरुषव्याघ्रः सहायः समरे अरिहा । स भ्राता लक्ष्मणो नाम धर्म चारी दृढ व्रतः ॥ 47.19 ॥

rāmasya puruṣavyāghraḥ sahāyaḥ samare arihā | sa bhrātā lakṣmaṇo nāma dharma cārī dṛḍha vrataḥ || 47.19 ||

पुरुषों में सिंह के समान, राम के सहायक और युद्ध में शत्रुओं का नाश करने वाला। वह भाई लक्ष्मण, धर्म का अनुसरण करने वाला और दृढ़व्रती,

श्लोक 20 (aranya.47.20)

अन्वगच्छत् धनुष् पाणिः प्रव्रजंतम् मया सह । जटी तापस रूपेण मया सह सह अनुजः ॥ 47.20 ॥

anvagacchat dhanuṣ pāṇiḥ pravrajaṃtam mayā saha | jaṭī tāpasa rūpeṇa mayā saha saha anujaḥ || 47.20 ||

मेरे साथ वन जाते हुए राम के पीछे धनुष हाथ में लिए चल पड़ा। जटाधारी तपस्वी के वेश में, अपने अनुज सहित,

श्लोक 21 (aranya.47.21)

प्रविष्टो दँडकारण्यम् धर्म नित्यो धृढ व्रतः । ते वयम् प्रच्युता राज्यात् कैकेय्याः तु कृते त्रयः ॥ 47.21 ॥

praviṣṭo da~ḍakāraṇyam dharma nityo dhṛḍha vrataḥ | te vayam pracyutā rājyāt kaikeyyāḥ tu kṛte trayaḥ || 47.21 ||

सदा धर्मपरायण और दृढ़व्रती राम ने इस प्रकार दंडकारण्य में प्रवेश किया। इस तरह हम तीनों, कैकेयी के कारण राज्य से च्युत होकर,

श्लोक 22 (aranya.47.22)

विचराम द्विज श्रेष्ठ वनम् गंभीरम् ओजसा । समाश्वस मुहूर्तम् तु शक्यम् वस्तुम् इह त्वया ॥ 47.22 ॥

vicarāma dvija śreṣṭha vanam gaṃbhīram ojasā | samāśvasa muhūrtam tu śakyam vastum iha tvayā || 47.22 ||

हे द्विजश्रेष्ठ! अपने ही बल पर इस घने वन में विचरण करते हैं। कुछ क्षण के लिए यहीं धैर्य धारण करो, तुम यहाँ ठहर सकते हो,

श्लोक 23 (aranya.47.23)

आगमिष्यति मे भर्ता वन्यम् आदाय पुष्कलम् । रुरून् गोधान् वराहान् च हत्वा आदाय अमिषान् बहु ॥ 47.23 ॥

āgamiṣyati me bhartā vanyam ādāya puṣkalam | rurūn godhān varāhān ca hatvā ādāya amiṣān bahu || 47.23 ||

क्योंकि मेरे पति शीघ्र ही प्रचुर वन्य फल-मूल तथा कृष्णमृग, गोह और वराह आदि का शिकार करके बहुत सा मांस लेकर लौट आएँगे।

श्लोक 24 (aranya.47.24)

सः त्वम् नाम च गोत्रम् च कुलम् आचक्ष्व तत्त्वतः । एकः च दण्डकारण्ये किम् अर्थम् चरसि द्विज ॥ 47.24 ॥

saḥ tvam nāma ca gotram ca kulam ācakṣva tattvataḥ | ekaḥ ca daṇḍakāraṇye kim artham carasi dvija || 47.24 ||

अतः तुम अपना नाम, गोत्र और कुल यथार्थ रूप से बताओ, हे द्विज! और यह भी बताओ कि तुम अकेले दंडकारण्य में किस प्रयोजन से विचरण कर रहे हो?

श्लोक 25 (aranya.47.25)

एवम् ब्रुवत्याम् सीतायाम् राम पत्नीआम् महाबलः । प्रत्युवाच उत्तरम् तीव्रम् रावणो राक्षसाधिपः ॥ 47.25 ॥

evam bruvatyām sītāyām rāma patnīām mahābalaḥ | pratyuvāca uttaram tīvram rāvaṇo rākṣasādhipaḥ || 47.25 ||

राम की पत्नी सीता के इस प्रकार कहते ही, महाबली राक्षसराज रावण ने उन्हें कठोर उत्तर दिया।

श्लोक 26 (aranya.47.26)

येन वित्रासिता लोकाः स देव असुर मानुषा । अहम् सः रावणो नाम सीते रक्षो गण ईश्वरः ॥ 47.26 ॥

yena vitrāsitā lokāḥ sa deva asura mānuṣā | aham saḥ rāvaṇo nāma sīte rakṣo gaṇa īśvaraḥ || 47.26 ||

"हे सीते! मैं वही हूँ जिससे देवता, असुर और मनुष्य — सब लोक भयभीत रहते हैं। मैं वही रावण नामक राक्षसगणों का स्वामी हूँ।

श्लोक 27 (aranya.47.27)

त्वाम् तु कांचन वर्ण आभाम् दृष्ट्वा कौशेय वासिनीम् । रतिम् स्वकेषु दारेषु न अधिगच्छामि अनिन्दिते ॥ 47.27 ॥

tvām tu kāṃcana varṇa ābhām dṛṣṭvā kauśeya vāsinīm | ratim svakeṣu dāreṣu na adhigacchāmi anindite || 47.27 ||

हे निष्पाप सुंदरी! तुम्हें, जो स्वर्ण के समान कांतिमयी और रेशमी वस्त्र पहने हो, देखकर अब मुझे अपनी रानियों में कोई रस नहीं रह गया है।

श्लोक 28 (aranya.47.28)

बह्वीनाम् उत्तम स्त्रीणाम् आहृतानाम् इतः ततः । सर्वासाम् एव भद्रम् ते मम अग्र महिषी भव ॥ 47.28 ॥

bahvīnām uttama strīṇām āhṛtānām itaḥ tataḥ | sarvāsām eva bhadram te mama agra mahiṣī bhava || 47.28 ||

मैंने जहाँ-तहाँ से जिन अनेक उत्तम स्त्रियों को लाकर रखा है, तुम उन सबकी अग्रमहिषी बन जाओ — तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 29 (aranya.47.29)

लंका नाम समुद्रस्य मध्ये मम महापुरी । सागरेण परिक्षिप्ता निविष्टा गिरि मूर्धनि ॥ 47.29 ॥

laṃkā nāma samudrasya madhye mama mahāpurī | sāgareṇa parikṣiptā niviṣṭā giri mūrdhani || 47.29 ||

मेरी महानगरी लंका समुद्र के मध्य, सागर से घिरी हुई, एक पर्वत-शिखर पर बसी है।

श्लोक 30 (aranya.47.30)

तत्र सीते मया सार्धम् वनेषु विचरिष्यसि । न च अस्य वन वासस्य स्पृहयिष्यसि भामिनि ॥ 47.30 ॥

tatra sīte mayā sārdham vaneṣu vicariṣyasi | na ca asya vana vāsasya spṛhayiṣyasi bhāmini || 47.30 ||

वहाँ, हे सीते! तुम मेरे साथ उपवनों में विचरण करोगी, और हे भामिनि! तुम्हें फिर इस वनवास की याद तक न आएगी।

श्लोक 31 (aranya.47.31)

पंच दास्यः सहस्राणि सर्व आभरण भूषिताः । सीते परिचरिष्यन्ति भार्या भवसि मे यदि ॥ 47.31 ॥

paṃca dāsyaḥ sahasrāṇi sarva ābharaṇa bhūṣitāḥ | sīte paricariṣyanti bhāryā bhavasi me yadi || 47.31 ||

हे सीते! यदि तुम मेरी पत्नी बन जाओ, तो सर्वाभूषणों से सुसज्जित पाँच हजार दासियाँ तुम्हारी सेवा में रहेंगी।" रावण ने सीता से ऐसा कहा।

श्लोक 32 (aranya.47.32)

रावणेन एवम् उक्ता तु कुपिता जनक आत्मजा । प्रत्युवाच अनवद्यांगी तम् अनादृत्य राक्षसम् ॥ 47.32 ॥

rāvaṇena evam uktā tu kupitā janaka ātmajā | pratyuvāca anavadyāṃgī tam anādṛtya rākṣasam || 47.32 ||

रावण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, अनिंद्य अंगों वाली जनकपुत्री क्रोधित हो उठीं और उस राक्षस का तिरस्कार करते हुए उत्तर दिया।

श्लोक 33 (aranya.47.33)

महा गिरिम् इव अकंप्यम् महेन्द्र सदृशम् पतिम् । महा उदधिम् इव अक्षोभ्यम् अहम् रामम् अनुव्रता ॥ 47.33 ॥

mahā girim iva akaṃpyam mahendra sadṛśam patim | mahā udadhim iva akṣobhyam aham rāmam anuvratā || 47.33 ||

"मैं उन राम की अनुव्रता हूँ, जो विशाल पर्वत के समान अडिग, महेन्द्र के समान तेजस्वी और महासागर के समान अक्षुब्ध हैं।

श्लोक 34 (aranya.47.34)

सर्व लक्षण संपन्नम् न्यग्रोध परि मण्डलम् । सत्य संधम् महाभागम् रामम् अनुव्रता ॥ 47.34 ॥

sarva lakṣaṇa saṃpannam nyagrodha pari maṇḍalam | satya saṃdham mahābhāgam rāmam anuvratā || 47.34 ||

मैं उन राम की अनुव्रता हूँ, जो समस्त शुभ लक्षणों से संपन्न, वटवृक्ष के समान सुडौल शरीर वाले, सत्यप्रतिज्ञ और परम सौभाग्यशाली हैं।

श्लोक 35 (aranya.47.35)

महाबाहुम् महोरस्कम् सिंह विक्रांत गामिनम् । नृसिंहम् सिंह संकाशम् अहम् रामम् अनुव्रता ॥ 47.35 ॥

mahābāhum mahoraskam siṃha vikrāṃta gāminam | nṛsiṃham siṃha saṃkāśam aham rāmam anuvratā || 47.35 ||

मैं उन राम की अनुव्रता हूँ, जो महाबाहु, विशाल वक्षस्थल वाले, सिंह के समान चाल चलने वाले, नरसिंह और सिंह के समान तेजस्वी हैं।

श्लोक 36 (aranya.47.36)

पूर्ण चन्द्र आननम् वीरम् राज वत्सम् जितेन्द्रियम् । पृथु कीर्तिम् महाबाहुम् अहम् रामम् अनुव्रता ॥ 47.36 ॥

pūrṇa candra ānanam vīram rāja vatsam jitendriyam | pṛthu kīrtim mahābāhum aham rāmam anuvratā || 47.36 ||

मैं उन राम की अनुव्रता हूँ, जिनका मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान है, जो वीर, राजपुत्र, जितेन्द्रिय, विशाल कीर्तिवान और महाबाहु हैं।

श्लोक 37 (aranya.47.37)

त्वम् पुनः जंबुकः सिंहीम् माम् इह इच्छसि दुर्लभाम् । न अहम् शक्या त्वया स्प्रष्टुम् आदित्यस्य प्रभा यथा ॥ 47.37 ॥

tvam punaḥ jaṃbukaḥ siṃhīm mām iha icchasi durlabhām | na aham śakyā tvayā spraṣṭum ādityasya prabhā yathā || 47.37 ||

परन्तु तुम तो एक सियार हो, जो मुझ दुर्लभ सिंहनी को पाना चाहते हो! मुझे छूना तुम्हारे लिए वैसे ही असंभव है, जैसे सूर्य की प्रभा को छूना।

श्लोक 38 (aranya.47.38)

पादपान् कांचनान् नूनम् बहून् पश्यसि मंदभाक् । राघवस्य प्रियाम् भार्याम् यः त्वम् इच्छसि राक्षस ॥ 47.38 ॥

pādapān kāṃcanān nūnam bahūn paśyasi maṃdabhāk | rāghavasya priyām bhāryām yaḥ tvam icchasi rākṣasa || 47.38 ||

हे राक्षस! तुम जो राघव की प्रिय पत्नी की कामना करते हो, निश्चय ही अभागे हो, और भ्रमवश तुम्हें चारों ओर स्वर्ण के वृक्ष दिखाई देते होंगे।

श्लोक 39 (aranya.47.39)

क्षुधितस्य च सिंहस्य मृग शत्रोः तरस्विनः । आशी विषस्य वदनात् दम्ष्ट्राम् आदातुम् इच्छसि ॥ 47.39 ॥

kṣudhitasya ca siṃhasya mṛga śatroḥ tarasvinaḥ | āśī viṣasya vadanāt damṣṭrām ādātum icchasi || 47.39 ||

तुम मानो किसी विषधर सर्प के मुख से, या पशुओं के शत्रु उस क्षुधित और वेगवान सिंह के मुख से, उसकी दाढ़ उखाड़ना चाहते हो।

श्लोक 40 (aranya.47.40)

मंदरम् पर्वत श्रेष्ठम् पाणिना हर्तुम् इच्छसि । काल कूटम् विषम् पीत्वा स्वस्तिमान् गंतुम् इच्छसि ॥ 47.40 ॥

maṃdaram parvata śreṣṭham pāṇinā hartum icchasi | kāla kūṭam viṣam pītvā svastimān gaṃtum icchasi || 47.40 ||

तुम अपने हाथ से पर्वतश्रेष्ठ मंदराचल को उठा ले जाना चाहते हो, तथा कालकूट विष पीकर भी सकुशल बच निकलना चाहते हो।

श्लोक 41 (aranya.47.41)

अक्षि सूच्या प्रमृजसि जिह्वया लेढि च क्षुरम् । राघवस्य प्रियाम् भार्याम् अधिगंतुम् त्वम् इच्छसि ॥ 47.41 ॥

akṣi sūcyā pramṛjasi jihvayā leḍhi ca kṣuram | rāghavasya priyām bhāryām adhigaṃtum tvam icchasi || 47.41 ||

राघव की प्रिय पत्नी को पाने की इच्छा करके तुम मानो सुई से अपनी आँख कुरेद रहे हो और जीभ से छुरे को चाट रहे हो।

श्लोक 42 (aranya.47.42)

अवसज्य शिलाम् कण्ठे समुद्रम् तर्तुम् इच्छसि । सूर्या चन्द्रमसौ च उभौ प्राणिभ्याम् हर्तुम् इच्छसि ॥ 47.42 ॥

avasajya śilām kaṇṭhe samudram tartum icchasi | sūryā candramasau ca ubhau prāṇibhyām hartum icchasi || 47.42 ||

तुम गले में शिला बाँधकर समुद्र पार करना चाहते हो, तथा अपने दोनों हाथों से सूर्य और चन्द्रमा दोनों को छीन लेना चाहते हो।

श्लोक 43 (aranya.47.43)

यो रामस्य प्रियाम् भार्याम् प्रधर्षयितुम् इच्छसि । अग्निम् प्रज्वलितम् दृष्ट्वा वस्त्रेण आहर्तुम् इच्छसि ॥ 47.43 ॥

yo rāmasya priyām bhāryām pradharṣayitum icchasi | agnim prajvalitam dṛṣṭvā vastreṇa āhartum icchasi || 47.43 ||

तुम जो राम की प्रिय पत्नी को स्पर्श करना चाहते हो, वह मानो प्रज्वलित अग्नि को देखकर भी उसे वस्त्र में लपेटकर ले जाना चाहते हो।

श्लोक 44 (aranya.47.44)

कल्याण वृत्ताम् यो भार्याम् रामस्य हर्तुम् इच्छसि । अयो मुखानाम् शूलानाम् अग्रे चरितुम् इच्छसि । रामस्य सदृशीम् भार्याम् यो अधिगंतुम् त्वम् इच्छसि ॥ 47.44 ॥

kalyāṇa vṛttām yo bhāryām rāmasya hartum icchasi | ayo mukhānām śūlānām agre caritum icchasi | rāmasya sadṛśīm bhāryām yo adhigaṃtum tvam icchasi || 47.44 ||

तुम जो राम की सुशील पत्नी का हरण करना चाहते हो, वह मानो लोहे के नुकीले भालों की नोक पर चलना चाहते हो — तुम जो राम के योग्य इस पत्नी को पाना चाहते हो।

श्लोक 45 (aranya.47.45)

यद् अंतरम् सिंह शृगालयोः वने यद् अंतरम् स्यन्दनिका समुद्रयोः । सुर अग्र्य सौवीरकयोः यद् अंतरम् तद् अंतरम् दाशरथेः तव एव च ॥ 47.45 ॥

yad aṃtaram siṃha śṛgālayoḥ vane yad aṃtaram syandanikā samudrayoḥ | sura agrya sauvīrakayoḥ yad aṃtaram tad aṃtaram dāśaratheḥ tava eva ca || 47.45 ||

वन में सिंह और सियार के बीच जो अंतर है, नाले और समुद्र के बीच जो अंतर है, तथा उत्तम सुरा और खट्टी माँड़ के बीच जो अंतर है, वही अंतर दशरथनंदन राम और तुम्हारे बीच है।

श्लोक 46 (aranya.47.46)

यद् अंतरम् कांचन सीस लोहयोः यद् अंतरम् चन्दन वारि पंकयोः । यद् अंतरम् हस्ति बिडालयोः वने तद् अंतरम् दशरथेः तव एव च ॥ 47.46 ॥

yad aṃtaram kāṃcana sīsa lohayoḥ yad aṃtaram candana vāri paṃkayoḥ | yad aṃtaram hasti biḍālayoḥ vane tad aṃtaram daśaratheḥ tava eva ca || 47.46 ||

सोने और सीसे के बीच जो अंतर है, चंदन-मिश्रित जल और कीचड़ के बीच जो अंतर है, तथा वन में हाथी और बिलाव के बीच जो अंतर है, वही अंतर दशरथनंदन और तुम्हारे बीच है।

श्लोक 47 (aranya.47.47)

यद् अंतरम् वायस वैनतेययोः यद् अंतरम् मद्गु मयूरयोः अपि । यद् अंतरम् हंस गृध्रयोः वने तद् अंतरम् दाशरथेः तव एव च ॥ 47.47 ॥

yad aṃtaram vāyasa vainateyayoḥ yad aṃtaram madgu mayūrayoḥ api | yad aṃtaram haṃsa gṛdhrayoḥ vane tad aṃtaram dāśaratheḥ tava eva ca || 47.47 ||

कौवे और वैनतेय गरुड़ के बीच जो अंतर है, जलकाग और मोर के बीच जो अंतर है, तथा वन में हंस और गिद्ध के बीच जो अंतर है, वही अंतर दशरथनंदन और तुम्हारे बीच है।

श्लोक 48 (aranya.47.48)

तस्मिन् सहस्राक्ष सम प्रभावे रामे स्थिते कार्मुक बाण पाणौ । हृता अपि ते अहम् न जराम् गमिष्ये वज्रम् यथा मक्षिकया अवगीर्णम् ॥ 47.48 ॥

tasmin sahasrākṣa sama prabhāve rāme sthite kārmuka bāṇa pāṇau | hṛtā api te aham na jarām gamiṣye vajram yathā makṣikayā avagīrṇam || 47.48 ||

"हे रावण! भले ही तुम मुझे अभी हर ले जाओ, परन्तु जब सहस्राक्ष इन्द्र के समान पराक्रमी राम धनुष-बाण लिए खड़े होंगे, तब मैं तुम्हारे लिए वैसे ही अपच्य सिद्ध होऊँगी, जैसे मक्खी के साथ निगला हुआ वज्र कभी पच नहीं पाता।" इस प्रकार सीता ने अपने तिरस्कार को प्रकट किया।

श्लोक 49 (aranya.47.49)

इति इव तत् वाक्यम् अदुष्ट भावा सुदुष्टम् उक्त्वा रजनी चरम् तम् । गात्र प्रकंपात् व्यथिता बभूव वात उद्धता सा कदली इव तन्वी ॥ 47.49 ॥

iti iva tat vākyam aduṣṭa bhāvā suduṣṭam uktvā rajanī caram tam | gātra prakaṃpāt vyathitā babhūva vāta uddhatā sā kadalī iva tanvī || 47.49 ||

इस प्रकार निर्मल हृदया सीता ने उस अत्यंत दुष्ट निशाचर से कठोर वचन कहकर, अपने अंगों में कंपन के कारण व्याकुल हो उठीं, मानो आँधी से हिलती हुई कोमल केले की पौध हों।

श्लोक 50 (aranya.47.50)

ताम् वेपमानाम् उपलक्ष्य सीताम् स रावणो मृत्यु सम प्रभावः । कुलम् बलम् नाम च कर्म च आत्मनः समाचचक्षे भय कारण अर्थम् ॥ 47.50 ॥

tām vepamānām upalakṣya sītām sa rāvaṇo mṛtyu sama prabhāvaḥ | kulam balam nāma ca karma ca ātmanaḥ samācacakṣe bhaya kāraṇa artham || 47.50 ||

सीता को इस प्रकार काँपते देखकर, मृत्यु के समान प्रभावशाली रावण ने उन्हें भयभीत करने के उद्देश्य से अपने कुल, बल, नाम और पराक्रम के विषय में विस्तार से बताना आरंभ किया।

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