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अरण्यकाण्ड · सर्ग 67

घायल जटायु

सर्ग 66सर्ग-सूचीसर्ग 68

श्लोक 1 (aranya.67.1)

पूर्वजो अपि उक्त मात्रः तु लक्ष्मणेन सुभाषितम् । सार ग्राही महासारम् प्रतिजग्राह राघवः ॥ 67.1 ॥

pūrvajo api ukta mātraḥ tu lakṣmaṇena subhāṣitam | sāra grāhī mahāsāram pratijagrāha rāghavaḥ || 67.1 ||

यद्यपि राघव अग्रज थे, तथापि सार को ग्रहण करने वाले उन्होंने लक्ष्मण के कहते ही उनके सुभाषित वचनों का महान सार ग्रहण कर लिया।

श्लोक 2 (aranya.67.2)

स निगृह्य महाबाहुः प्रवृद्धम् रोषम् आत्मनः । अवष्टभ्य धनुः चित्रम् रामो लक्ष्मणम् अब्रवीत् ॥ 67.2 ॥

sa nigṛhya mahābāhuḥ pravṛddham roṣam ātmanaḥ | avaṣṭabhya dhanuḥ citram rāmo lakṣmaṇam abravīt || 67.2 ||

उन महाबाहु राम ने अपने बढ़ते हुए क्रोध को रोककर और अपने अद्भुत धनुष का सहारा लेकर लक्ष्मण से कहा।

श्लोक 3 (aranya.67.3)

किम् करिष्यावहे वत्स क्व वा गच्छाव लक्ष्मण । केन उपायेन पश्येयम् सीताम् इह विचिन्तय ॥ 67.3 ॥

kim kariṣyāvahe vatsa kva vā gacchāva lakṣmaṇa | kena upāyena paśyeyam sītām iha vicintaya || 67.3 ||

"हे वत्स लक्ष्मण! हम क्या करें, कहाँ जायें? किस उपाय से मैं सीता को देख सकूँ, इस पर विचार करो।"

श्लोक 4 (aranya.67.4)

तम् तथा परिताप आर्तम् लक्ष्मणो रामम् अब्रवीत् । इदम् एव जनस्थानम् त्वम् अन्वेषितुम् अर्हसि ॥ 67.4 ॥

tam tathā paritāpa ārtam lakṣmaṇo rāmam abravīt | idam eva janasthānam tvam anveṣitum arhasi || 67.4 ||

उस प्रकार परिताप से पीड़ित राम से लक्ष्मण ने कहा -- "आपको इसी जनस्थान में खोज करनी चाहिए,

श्लोक 5 (aranya.67.5)

राक्षसैः बहुभिः कीर्णम् नाना द्रुम लता आयुतम् । सन्ति इह गिरि दुर्गाणि निर्दराः कंदराणि च ॥ 67.5 ॥

rākṣasaiḥ bahubhiḥ kīrṇam nānā druma latā āyutam | santi iha giri durgāṇi nirdarāḥ kaṃdarāṇi ca || 67.5 ||

जो बहुत से राक्षसों से भरा हुआ है और अनेक वृक्षों-लताओं से आच्छादित है। यहाँ दुर्गम पर्वत, गहरी घाटियाँ और गुफाएँ हैं,

श्लोक 6 (aranya.67.6)

गुहाः च विविधा घोरा नाना मृग गण आकुलाः । आवासाः किन्नराणाम् च गन्धर्व भवनानि च ॥ 67.6 ॥

guhāḥ ca vividhā ghorā nānā mṛga gaṇa ākulāḥ | āvāsāḥ kinnarāṇām ca gandharva bhavanāni ca || 67.6 ||

तथा नाना प्रकार की भयानक गुफाएँ जो विविध पशु-समूहों से भरी हैं, किन्नरों के निवास और गन्धर्वों के भवन भी यहाँ हैं।

श्लोक 7 (aranya.67.7)

तानि युक्तो मया सार्धम् समन्वेषितुम् अर्हसि । त्वत् विधा बुद्धि संपन्ना माहात्मानो नरर्षभ ॥ 67.7 ॥

tāni yukto mayā sārdham samanveṣitum arhasi | tvat vidhā buddhi saṃpannā māhātmāno nararṣabha || 67.7 ||

हे नरश्रेष्ठ! आपको मेरे साथ स्थिर होकर उन स्थानों में भलीभाँति खोज करनी चाहिए; आपके समान बुद्धिसम्पन्न महात्मा पुरुष

श्लोक 8 (aranya.67.8)

आपत्सु न प्रकंपन्ते वायु वेगैः इव अचलाः । इति उक्तः तत् वनम् सर्वम् विचचार स लक्ष्मणः ॥ 67.8 ॥

āpatsu na prakaṃpante vāyu vegaiḥ iva acalāḥ | iti uktaḥ tat vanam sarvam vicacāra sa lakṣmaṇaḥ || 67.8 ||

विपत्तियों में उसी प्रकार विचलित नहीं होते जैसे पर्वत तेज वायु के झोंकों से विचलित नहीं होते।" ऐसा कहे जाने पर राम ने लक्ष्मण के साथ उस सम्पूर्ण वन में विचरण किया।

श्लोक 9 (aranya.67.9)

क्रुद्धो रामः शरम् घोरम् संधाय धनुषि क्षुरम् । ततः पर्वत कूट आभम् महा भागम् द्विज उत्तमम् ॥ 67.9 ॥

kruddho rāmaḥ śaram ghoram saṃdhāya dhanuṣi kṣuram | tataḥ parvata kūṭa ābham mahā bhāgam dvija uttamam || 67.9 ||

क्रोधित राम ने धनुष पर एक भयानक क्षुरधार बाण चढ़ाकर, तत्पश्चात् पर्वत-शिखर के समान महाभाग, श्रेष्ठ पक्षी को देखा,

श्लोक 10 (aranya.67.10)

ददर्श पतितम् भूमौ क्षतज आर्द्रम् जटायुषम् । तम् दृष्ट्वा गिरि शृंग आभम् रामो लक्ष्मणम् अब्रवीत् ॥ 67.10 ॥

dadarśa patitam bhūmau kṣataja ārdram jaṭāyuṣam | tam dṛṣṭvā giri śṛṃga ābham rāmo lakṣmaṇam abravīt || 67.10 ||

जटायु को भूमि पर पड़ा हुआ और रक्त से भीगा हुआ देखा। पर्वत-शिखर के समान उस पक्षी को देखकर राम ने लक्ष्मण से कहा,

श्लोक 11 (aranya.67.11)

अनेन सीता वैदेही भक्षिता न अत्र संशयः । गृध्र रूपम् इदम् व्यक्तम् रक्षो भ्रमति काननम् ॥ 67.11 ॥

anena sītā vaidehī bhakṣitā na atra saṃśayaḥ | gṛdhra rūpam idam vyaktam rakṣo bhramati kānanam || 67.11 ||

"निश्चय ही इसने विदेहनन्दिनी सीता को खा लिया है, इसमें कोई संदेह नहीं है। यह स्पष्ट रूप से गृद्ध का रूप धारण किये हुए एक राक्षस है जो वन में विचरण कर रहा है,

श्लोक 12 (aranya.67.12)

भक्षयित्वा विशालाक्षीम् आस्ते सीताम् यथा सुखम् । एनम् वधिष्ये दीप्त अग्रैः घोरैः बाणैः अजिह्मगैः ॥ 67.12 ॥

bhakṣayitvā viśālākṣīm āste sītām yathā sukham | enam vadhiṣye dīpta agraiḥ ghoraiḥ bāṇaiḥ ajihmagaiḥ || 67.12 ||

और उस विशाल नेत्रों वाली सीता को खाकर यह सुखपूर्वक बैठा है। मैं इसे प्रज्वलित अग्रभाग वाले, सीधे जाने वाले भयंकर बाणों से मार डालूँगा!"

श्लोक 13 (aranya.67.13)

इति उक्त्वा अभ्यपतत् गृध्रम् सन्धाय धनुषि क्षुरम् । क्रुद्धो रामः समुद्र अन्ताम् चालयन् इव मेदिनीम् ॥ 67.13 ॥

iti uktvā abhyapatat gṛdhram sandhāya dhanuṣi kṣuram | kruddho rāmaḥ samudra antām cālayan iva medinīm || 67.13 ||

ऐसा कहकर धनुष पर क्षुरधार बाण चढ़ाकर क्रोधित राम मानो समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी को कँपाते हुए उस गृद्ध की ओर झपटे।

श्लोक 14 (aranya.67.14)

तम् दीन दीनया वाचा स फेनम् रुधिरम् वमन् । अभ्यभाषत पक्षी तु रामम् दशरथ आत्मजम् ॥ 67.14 ॥

tam dīna dīnayā vācā sa phenam rudhiram vaman | abhyabhāṣata pakṣī tu rāmam daśaratha ātmajam || 67.14 ||

किन्तु फेनयुक्त रक्त वमन करते हुए उस पक्षी ने अत्यन्त करुण वाणी में दशरथनन्दन राम को सम्बोधित किया।

श्लोक 15 (aranya.67.15)

याम् ओषधिम् इव आयुष्मन् अन्वेषसि महा वने । सा देवी मम च प्राणा रावणेन उभयम् हृतम् ॥ 67.15 ॥

yām oṣadhim iva āyuṣman anveṣasi mahā vane | sā devī mama ca prāṇā rāvaṇena ubhayam hṛtam || 67.15 ||

"हे आयुष्मन्! जिस औषधि के समान आप इस महावन में खोज रहे हैं, उन देवी को और मेरे प्राणों को -- दोनों को ही रावण हर ले गया है।

श्लोक 16 (aranya.67.16)

त्वया विरहिता देवी लक्ष्मणेन च राघव । ह्रियमाणा मया दृष्टा रावणेन बलीयसा ॥ 67.16 ॥

tvayā virahitā devī lakṣmaṇena ca rāghava | hriyamāṇā mayā dṛṣṭā rāvaṇena balīyasā || 67.16 ||

हे राघव! आपसे और लक्ष्मण से विलग हुई उन देवी को बलशाली रावण द्वारा हरण किये जाते हुए मैंने देखा।

श्लोक 17 (aranya.67.17)

सीताम् अभ्यवपन्नो अहम् रावणः च रणे मया । विध्वंसित रथः च अत्र पातितो धरणी तले ॥ 67.17 ॥

sītām abhyavapanno aham rāvaṇaḥ ca raṇe mayā | vidhvaṃsita rathaḥ ca atra pātito dharaṇī tale || 67.17 ||

मैंने सीता की रक्षा का प्रयत्न किया, और युद्ध में मैंने रावण को उसके ध्वस्त रथ सहित यहाँ पृथ्वी पर गिरा दिया था।

श्लोक 18 (aranya.67.18)

एतत् अस्य धनुः भग्नम् एतत् अस्य शरावरम् । अयम् अस्य रणे राम भग्नः सांग्रामिको रथः ॥ 67.18 ॥

etat asya dhanuḥ bhagnam etat asya śarāvaram | ayam asya raṇe rāma bhagnaḥ sāṃgrāmiko rathaḥ || 67.18 ||

यह रहा उसका टूटा हुआ धनुष, यह उसका तरकश है; और हे राम, यह रहा युद्ध में मेरे द्वारा तोड़ा गया उसका संग्रामिक रथ।

श्लोक 19 (aranya.67.19)

अयम् तु सारथिः तस्य मत् पक्ष निहतो भुविः । परिश्रान्तस्य मे पक्षौ छित्त्वा खड्गेन रावणः ॥ 67.19 ॥

ayam tu sārathiḥ tasya mat pakṣa nihato bhuviḥ | pariśrāntasya me pakṣau chittvā khaḍgena rāvaṇaḥ || 67.19 ||

यह रहा उसका सारथि, जो मेरे पंखों की चोट से भूमि पर मारा गया; किन्तु जब मैं थक गया, तब रावण ने तलवार से मेरे दोनों पंख काट डाले,

श्लोक 20 (aranya.67.20)

सीताम् आदाय वैदेहीम् उत्पपात विहायसम् । रक्षसा निहतम् पूर्वम् न माम् हन्तुम् त्वम् अर्हसि ॥ 67.20 ॥

sītām ādāya vaidehīm utpapāta vihāyasam | rakṣasā nihatam pūrvam na mām hantum tvam arhasi || 67.20 ||

और वैदेही सीता को लेकर वह आकाश में उड़ गया। मैं पहले ही राक्षस द्वारा मारा जा चुका हूँ, अतः मुझे मारना आपको उचित नहीं है।"

श्लोक 21 (aranya.67.21)

रामः तस्य तु विज्ञाय सीता सक्ताम् प्रियाम् कथाम् । गृध्र राजम् परिष्वज्य परित्यज्य महत् धनुः ॥ 67.21 ॥

rāmaḥ tasya tu vijñāya sītā saktām priyām kathām | gṛdhra rājam pariṣvajya parityajya mahat dhanuḥ || 67.21 ||

सीता के विषय में उस प्रिय समाचार को जानकर राम ने अपना विशाल धनुष त्यागकर गृद्धराज जटायु का आलिंगन किया।

श्लोक 22 (aranya.67.22)

निपपात अवशो भूमौ रुरोद सह लक्ष्मण । द्विगुणीकृत ताप आर्तो रामो धीरतरो अपि सन् ॥ 67.22 ॥

nipapāta avaśo bhūmau ruroda saha lakṣmaṇa | dviguṇīkṛta tāpa ārto rāmo dhīrataro api san || 67.22 ||

यद्यपि राम अधिक धैर्यवान थे, तथापि वे अवश होकर भूमि पर गिर पड़े और लक्ष्मण के साथ रो पड़े, क्योंकि उनकी पीड़ा अब दुगुनी हो गयी थी।

श्लोक 23 (aranya.67.23)

एकम् एक अयने कृच्छ्रे निःश्वसन्तम् मुहुर् मुहुः । समीक्ष्य दुःखितो रामः सौमित्रिम् इदम् अब्रवीत् ॥ 67.23 ॥

ekam eka ayane kṛcchre niḥśvasantam muhur muhuḥ | samīkṣya duḥkhito rāmaḥ saumitrim idam abravīt || 67.23 ||

उस संकरे और कष्टप्रद मार्ग पर अकेले पड़े हुए, बार-बार लम्बी साँस लेते जटायु को देखकर दुःखी राम ने सौमित्र से यह कहा।

श्लोक 24 (aranya.67.24)

राज्यम् भ्रष्टम् वने वासः सीता नष्टा मृते द्विजः । ईदृशी इयम् मम अलक्ष्मीः दहेत् अपि पावकम् ॥ 67.24 ॥

rājyam bhraṣṭam vane vāsaḥ sītā naṣṭā mṛte dvijaḥ | īdṛśī iyam mama alakṣmīḥ dahet api pāvakam || 67.24 ||

"राज्य से भ्रष्ट होना, वन में निवास, सीता का खो जाना और अब इस पक्षी की मृत्यु -- मेरा ऐसा दुर्भाग्य तो साक्षात् अग्नि को भी जला सकता है।

श्लोक 25 (aranya.67.25)

संपूर्णम् अपि चेत् अद्य प्रतरेयम् महोदधिम् । सो अपि नूनम् मम अलक्ष्म्या विशुष्येत् सरिताम् पतिः ॥ 67.25 ॥

saṃpūrṇam api cet adya pratareyam mahodadhim | so api nūnam mama alakṣmyā viśuṣyet saritām patiḥ || 67.25 ||

यदि मैं आज उस परिपूर्ण महासागर को भी पार करने चलूँ, तो मेरे दुर्भाग्य से वह नदियों का स्वामी सागर भी निश्चय ही सूख जाएगा।

श्लोक 26 (aranya.67.26)

न अस्ति अभाग्यतरो लोके मत्तो अस्मिन् स चराचरे । येन इयम् महती प्राप्ता मया व्यसन वागुरा ॥ 67.26 ॥

na asti abhāgyataro loke matto asmin sa carācare | yena iyam mahatī prāptā mayā vyasana vāgurā || 67.26 ||

इस चराचर संसार में मुझसे अधिक अभागा कोई नहीं है, जिसके कारण विपत्तियों का यह इतना बड़ा जाल मुझ पर आ पड़ा है।

श्लोक 27 (aranya.67.27)

अयम् पितृ वयस्यो मे गृध्र राजो जरा अन्वितः । शेते विनिहतो भूमौ मम भाग्य विपर्ययात् ॥ 67.27 ॥

ayam pitṛ vayasyo me gṛdhra rājo jarā anvitaḥ | śete vinihato bhūmau mama bhāgya viparyayāt || 67.27 ||

मेरे पिता के यह वृद्ध मित्र, गृद्धराज जटायु, केवल मेरे भाग्य की विपरीतता के कारण घायल होकर भूमि पर पड़े हैं।"

श्लोक 28 (aranya.67.28)

इति एवम् उक्त्वा बहुशो राघवः सह लक्ष्मणः । जटायुषम् च पस्पर्श पितृ स्नेहम् निदर्शयन् ॥ 67.28 ॥

iti evam uktvā bahuśo rāghavaḥ saha lakṣmaṇaḥ | jaṭāyuṣam ca pasparśa pitṛ sneham nidarśayan || 67.28 ||

इस प्रकार बार-बार विलाप करते हुए राघव ने लक्ष्मण के साथ पितृतुल्य स्नेह प्रकट करते हुए जटायु के शरीर का स्पर्श किया।

श्लोक 29 (aranya.67.29)

निकृत्त पक्षम् रुधिर अवसिक्तम् तम् गृध्र राजम् परिरभ्य रामः । क्व मैथिलि प्राण समा मम इति विमुच्य वाचम् निपपात भूमौ ॥ 67.29 ॥

nikṛtta pakṣam rudhira avasiktam tam gṛdhra rājam parirabhya rāmaḥ | kva maithili prāṇa samā mama iti vimucya vācam nipapāta bhūmau || 67.29 ||

जिनके पंख कटे हुए थे और जो रक्त से लथपथ थे, उन गृद्धराज को आलिंगन करके राम ने केवल इतना ही कहा -- "हे मैथिली, मेरे प्राणों के समान प्रिय तुम कहाँ हो?" -- और भूमि पर गिर पड़े।

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