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अरण्यकाण्ड · सर्ग 73

पम्पा और ऋष्यमूक का मार्ग

सर्ग 72सर्ग-सूचीसर्ग 74

श्लोक 1 (aranya.73.1)

दर्शयित्वा तु रामाय सीतायाः परिमार्गणे । वाक्यमन्वर्थमर्थज्ञः कबन्धः पुनरब्रवीत् ॥ 73.1 ॥

darśayitvā tu rāmāya sītāyāḥ parimārgaṇe | vākyamanvarthamarthajñaḥ kabandhaḥ punarabravīt || 73.1 ||

सीता की खोज का मार्ग राम को दिखाकर, अर्थ के मर्मज्ञ कबन्ध ने पुनः यह सारगर्भित वचन कहा—

श्लोक 2 (aranya.73.2)

एष राम शिवः पन्था यत्रैते पुष्पिता द्रुमाः । प्रतीचीं दिशमाश्रित्य प्रकाशन्ते मनोरमाः ॥ 73.2 ॥

eṣa rāma śivaḥ panthā yatraite puṣpitā drumāḥ | pratīcīṃ diśamāśritya prakāśante manoramāḥ || 73.2 ||

"हे राम, यही शुभ मार्ग है, जहाँ पश्चिम दिशा की ओर स्थित ये मनोहर, पुष्पित वृक्ष सुशोभित होते हैं —

श्लोक 3 (aranya.73.3)

जम्बूप्रियालपनसा न्यग्रोधप्लक्षतिन्दुकाः । अश्वत्थाः कर्णिकाराश्च चूताश्चान्ये च पादपाः ॥ 73.3 ॥

jambūpriyālapanasā nyagrodhaplakṣatindukāḥ | aśvatthāḥ karṇikārāśca cūtāścānye ca pādapāḥ || 73.3 ||

जामुन, प्रियाल, कटहल, न्यग्रोध, प्लक्ष, तिन्दुक, पीपल, कर्णिकार, आम तथा अन्य वृक्ष,

श्लोक 4 (aranya.73.4)

धन्वना नागवृक्षाश्च तिलका नक्तमालकाः । नीलाशोकाः कदम्बाश्च करवीराश्च पुष्पिताः ॥ 73.4 ॥

dhanvanā nāgavṛkṣāśca tilakā naktamālakāḥ | nīlāśokāḥ kadambāśca karavīrāśca puṣpitāḥ || 73.4 ||

धन्वन, नागवृक्ष, तिलक, नक्तमाल, नीलाशोक, कदम्ब और पुष्पित करवीर वृक्ष —

श्लोक 5 (aranya.73.5)

अग्निमुख्या अशोकाश्च सुरक्ताः पारिभद्रकाः । तानारुह्याथवा भूमौ पातयित्वा च तान् बलात् ॥ 73.5 ॥

agnimukhyā aśokāśca suraktāḥ pāribhadrakāḥ | tānāruhyāthavā bhūmau pātayitvā ca tān balāt || 73.5 ||

अग्निमुखी वृक्ष, अशोक, गहरे लाल रंग के तथा पारिभद्रक वृक्ष। इन पर चढ़कर, अथवा बलपूर्वक उन्हें भूमि पर गिराकर,

श्लोक 6 (aranya.73.6)

फलान्यमृतकल्पानि भक्षयित्वा गमिष्यथः । तदतिक्रम्य काकुत्स्थ वनं पुष्पितपादपम् ॥ 73.6 ॥

phalānyamṛtakalpāni bhakṣayitvā gamiṣyathaḥ | tadatikramya kākutstha vanaṃ puṣpitapādapam || 73.6 ||

उनके अमृततुल्य फलों को खाकर तुम आगे बढ़ोगे। हे काकुत्स्थ, उस पुष्पित वृक्षों वाले वन को पार करके,

श्लोक 7 (aranya.73.7)

नन्दनप्रतिमं चान्यत् कुरवस्तूत्तरा इव । सर्वकालफला यत्र पादपा मधुरस्रवाः ॥ 73.7 ॥

nandanapratimaṃ cānyat kuravastūttarā iva | sarvakālaphalā yatra pādapā madhurasravāḥ || 73.7 ||

वहाँ नंदनवन के समान और उत्तर कुरु प्रदेश के तुल्य एक अन्य उपवन मिलेगा, जहाँ वृक्ष सभी ऋतुओं में फल देते हैं और मधुर रस टपकाते हैं,

श्लोक 8 (aranya.73.8)

सर्वे च ऋतवस्तत्र वने चैत्ररथे यथा । फलभारनतास्तत्र महाविटपधारिणः ॥ 73.8 ॥

sarve ca ṛtavastatra vane caitrarathe yathā | phalabhāranatāstatra mahāviṭapadhāriṇaḥ || 73.8 ||

जहाँ चैत्ररथ वन के समान सभी ऋतुएँ एक साथ विद्यमान रहती हैं; वहाँ विशाल शाखाओं वाले वृक्ष फलों के भार से झुके रहते हैं,

श्लोक 9 (aranya.73.9)

शोभन्ते सर्वतस्तत्र मेघपर्वतसंनिभाः । तानारुह्याथवा भूमौ पातयित्वाथवा सुखम् ॥ 73.9 ॥

śobhante sarvatastatra meghaparvatasaṃnibhāḥ | tānāruhyāthavā bhūmau pātayitvāthavā sukham || 73.9 ||

जो सर्वत्र मेघों और पर्वतों के समान सुशोभित रहते हैं। उन पर चढ़कर, अथवा सुखपूर्वक भूमि पर गिराकर,

श्लोक 10 (aranya.73.10)

फलान्यमृतकल्पानि लक्ष्मणस्ते प्रदास्यति । चङ्क्रमन्तौ वरान् शैलान् शैलाच्छैलं वनाद् वनम् ॥ 73.10 ॥

phalānyamṛtakalpāni lakṣmaṇaste pradāsyati | caṅkramantau varān śailān śailācchailaṃ vanād vanam || 73.10 ||

लक्ष्मण तुम्हें उनके अमृततुल्य फल देंगे। और उत्तम पर्वतों पर, पर्वत से पर्वत, वन से वन तक विचरण करते हुए,

श्लोक 11 (aranya.73.11)

ततः पुष्करिणीं वीरौ पम्पां नाम गमिष्यथः । अशर्करामविभ्रंशां समतीर्थामशैवलाम् ॥ 73.11 ॥

tataḥ puṣkariṇīṃ vīrau pampāṃ nāma gamiṣyathaḥ | aśarkarāmavibhraṃśāṃ samatīrthāmaśaivalām || 73.11 ||

तत्पश्चात् तुम दोनों वीर पंपा नामक कमलों से भरे सरोवर तक पहुँचोगे — जो कंकड़रहित, फिसलनरहित, समतल घाटों वाला और शैवाल से रहित है,

श्लोक 12 (aranya.73.12)

राम संजातवालूकां कमलोत्पलशोभिताम् । तत्र हंसाः प्लवाः क्रौञ्चाः कुरराश्चैव राघव ॥ 73.12 ॥

rāma saṃjātavālūkāṃ kamalotpalaśobhitām | tatra haṃsāḥ plavāḥ krauñcāḥ kurarāścaiva rāghava || 73.12 ||

हे राम, वहाँ स्वाभाविक बालुका तट हैं और वह लाल-नीले कमलों से सुशोभित है। हे राघव, वहाँ हंस, जलचर पक्षी, क्रौंच और कुरर,

श्लोक 13 (aranya.73.13)

वल्गुस्वरा निकूजन्ति पम्पासलिलगोचराः । नोद्विजन्ते नरान् दृष्ट्वा वधस्याकोविदाः शुभाः ॥ 73.13 ॥

valgusvarā nikūjanti pampāsalilagocarāḥ | nodvijante narān dṛṣṭvā vadhasyākovidāḥ śubhāḥ || 73.13 ||

पंपा के जल में रहने वाले ये पक्षी मधुर स्वर में कूजते हैं। वध से अनजान वे शुभ पक्षी मनुष्यों को देखकर भयभीत नहीं होते;

श्लोक 14 (aranya.73.14)

घृतपिण्डोपमान् स्थूलांस्तान् द्विजान् भक्षयिष्यथः । रोहितान् वक्रतुण्डांश्च नलमीनांश्च राघव ॥ 73.14 ॥

ghṛtapiṇḍopamān sthūlāṃstān dvijān bhakṣayiṣyathaḥ | rohitān vakratuṇḍāṃśca nalamīnāṃśca rāghava || 73.14 ||

उन घी के पिंड के समान स्थूल पक्षियों को तुम खा सकते हो। और हे राघव, लाल रोहित मछलियाँ, टेढ़े मुख वाली मछलियाँ और नल मछलियाँ —

श्लोक 15 (aranya.73.15)

पम्पायामिषुभिर्मत्स्यांस्तत्र राम वरान् हतान् । निस्त्वक्पक्षानयस्तप्तानकृशानैककण्टकान् ॥ 73.15 ॥

pampāyāmiṣubhirmatsyāṃstatra rāma varān hatān | nistvakpakṣānayastaptānakṛśānaikakaṇṭakān || 73.15 ||

पंपा में हे राम, बाणों से मारी गई उत्तम मछलियाँ, जिन्हें छीलकर, लौह शलाका पर भूनकर, जो हृष्ट-पुष्ट और कांटों से रहित होंगी,

श्लोक 16 (aranya.73.16)

तव भक्त्या समायुक्तो लक्ष्मणः सम्प्रदास्यति । भृशं तान् खादतो मत्स्यान् पम्पायाः पुष्पसंचये ॥ 73.16 ॥

tava bhaktyā samāyukto lakṣmaṇaḥ sampradāsyati | bhṛśaṃ tān khādato matsyān pampāyāḥ puṣpasaṃcaye || 73.16 ||

लक्ष्मण भक्तिपूर्वक तुम्हें अर्पित करेंगे। और जब तुम पंपा के पुष्पसमूह के बीच उन मछलियों को तृप्त होकर खा रहे होगे,

श्लोक 17 (aranya.73.17)

पद्मगन्धि शिवं वारि सुखशीतमनामयम् । उद्धृत्य स तदाक्लिष्टं रूप्यस्फटिकसंनिभम् ॥ 73.17 ॥

padmagandhi śivaṃ vāri sukhaśītamanāmayam | uda‍dhṛtya sa tadākliṣṭaṃ rūpyasphaṭikasaṃnibham || 73.17 ||

तब लक्ष्मण कमल की सुगंध वाले, पवित्र, सुखद-शीतल और निर्दोष जल को — जो निर्मल तथा चाँदी और स्फटिक के समान चमकीला है —

श्लोक 18 (aranya.73.18)

अथ पुष्करपर्णेन लक्ष्मणः पाययिष्यति । स्थूलान् गिरिगुहाशय्यान् वानरान् वनचारिणः ॥ 73.18 ॥

atha puṣkaraparṇena lakṣmaṇaḥ pāyayiṣyati | sthūlān giriguhāśayyān vānarān vanacāriṇaḥ || 73.18 ||

कमल के पत्ते में भरकर तुम्हें पिलाएँगे। और हे राम, संध्या के समय विचरण करते हुए, लक्ष्मण तुम्हें पर्वत-गुफाओं में शयन करने वाले हृष्ट-पुष्ट, वनचारी वानरों को दिखाएँगे,

श्लोक 19 (aranya.73.19)

सायाह्ने विचरन् राम दर्शयिष्यति लक्ष्मणः । अपां लोभादुपावृत्तान् वृषभानिव नर्दतः ॥ 73.19 ॥

sāyāhne vicaran rāma darśayiṣyati lakṣmaṇaḥ | apāṃ lobhādupāvṛttān vṛṣabhāniva nardataḥ || 73.19 ||

जो जल के लोभ से समीप आकर बैलों की भाँति गरजते हैं।

श्लोक 20 (aranya.73.20)

स्थूलान् पीतांश्च पम्पायां द्रक्ष्यसि त्वं नरोत्तम । सायाह्ने विचरन् राम विटपी माल्यधारिणः ॥ 73.20 ॥

sthūlān pītāṃśca pampāyāṃ drakṣyasi tvaṃ narottama | sāyāhne vicaran rāma viṭapī mālyadhāriṇaḥ || 73.20 ||

हे नरोत्तम, संध्या के समय विचरण करते हुए तुम पंपा में हृष्ट-पुष्ट, पीतवर्ण वानरों को देखोगे, हे राम, तथा माला धारण किए हुए वृक्षों को भी।

श्लोक 21 (aranya.73.21)

शिवोदकं च पम्पायां दृष्ट्वा शोकं विहास्यसि । सुमनोभिश्चितास्तत्र तिलका नक्तमालकाः ॥ 73.21 ॥

śivodakaṃ ca pampāyāṃ dṛṣṭvā śokaṃ vihāsyasi | sumanobhiścitāstatra tilakā naktamālakāḥ || 73.21 ||

पंपा के मंगलमय जल को देखकर तुम अपना शोक त्याग दोगे। वहाँ सुंदर पुष्पों से लदे हुए तिलक और नक्तमाल वृक्ष,

श्लोक 22 (aranya.73.22)

उत्पलानि च फुल्लानि पङ्कजानि च राघव । न तानि कश्चिन्माल्यानि तत्रारोपयिता नरः ॥ 73.22 ॥

utpalāni ca phullāni paṅkajāni ca rāghava | na tāni kaścinmālyāni tatrāropayitā naraḥ || 73.22 ||

तथा खिले हुए नीले और लाल कमल भी हैं, हे राघव। वहाँ उन फूलों की माला बनाने वाला कोई मनुष्य नहीं है,

श्लोक 23 (aranya.73.23)

न च वै म्लानतां यान्ति न च शीर्यन्ति राघव । मतङ्गशिष्यास्तत्रासन्नृषयः सुसमाहिताः ॥ 73.23 ॥

na ca vai mlānatāṃ yānti na ca śīryanti rāghava | mataṅgaśiṣyāstatrāsannṛṣayaḥ susamāhitāḥ || 73.23 ||

फिर भी, हे राघव, वे न तो कभी मुरझाते हैं और न झड़ते हैं। वहाँ कभी अत्यंत एकाग्रचित्त, मतंग ऋषि के शिष्य, ऋषिगण रहते थे —

श्लोक 24 (aranya.73.24)

तेषां भाराभितप्तानां वन्यमाहरतां गुरोः । ये प्रपेतुर्महीं तूर्णं शरीरात् स्वेदबिन्दवः ॥ 73.24 ॥

teṣāṃ bhārābhitaptānāṃ vanyamāharatāṃ guroḥ | ye prapeturmahīṃ tūrṇaṃ śarīrāt svedabindavaḥ || 73.24 ||

और जब वे अपने गुरु के लिए वन्य सामग्री ढोते हुए उसके भार से थक गए, तब उनके शरीर से जो पसीने की बूँदें शीघ्रता से पृथ्वी पर गिरीं —

श्लोक 25 (aranya.73.25)

तानि माल्यानि जातानि मुनीनां तपसा तदा । स्वेदबिन्दुसमुत्थानि न विनश्यन्ति राघव ॥ 73.25 ॥

tāni mālyāni jātāni munīnāṃ tapasā tadā | svedabindusamutthāni na vinaśyanti rāghava || 73.25 ||

वे ही उन मुनियों की तपस्या के प्रभाव से पुष्पमालाओं में परिणत हो गईं; और हे राघव, चूँकि वे स्वेदबिंदुओं से उत्पन्न हुई हैं, इसलिए वे कभी नष्ट नहीं होतीं।

श्लोक 26 (aranya.73.26)

तेषां गतानामद्यापि दृश्यते परिचारिणी । श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी ॥ 73.26 ॥

teṣāṃ gatānāmadyāpi dṛśyate paricāriṇī | śramaṇī śabarī nāma kākutstha cirajīvinī || 73.26 ||

उन ऋषियों के चले जाने पर भी, हे काकुत्स्थ, उनकी सेविका आज भी वहाँ दिखाई देती है — शबरी नामक एक चिरंजीवी तपस्विनी।

श्लोक 27 (aranya.73.27)

त्वां तु धर्मे स्थिता नित्यं सर्वभूतनमस्कृतम् । दृष्ट्वा देवोपमं राम स्वर्गलोकं गमिष्यति ॥ 73.27 ॥

tvāṃ tu dharme sthitā nityaṃ sarvabhūtanamaskṛtam | dṛṣṭvā devopamaṃ rāma svargalokaṃ gamiṣyati || 73.27 ||

वह सदा धर्म में स्थिर रहने वाली शबरी, हे राम, तुम्हें — जो सब प्राणियों द्वारा वंदित और देवतुल्य हो — देखकर स्वर्गलोक को प्राप्त होगी।

श्लोक 28 (aranya.73.28)

ततस्तद्राम पम्पायास्तीरमाश्रित्य पश्चिमम् । आश्रमस्थानमतुलं गुह्यं काकुत्स्थ पश्यसि ॥ 73.28 ॥

tatastadrāma pampāyāstīramāśritya paścimam | āśramasthānamatulaṃ guhyaṃ kākutstha paśyasi || 73.28 ||

तत्पश्चात्, हे राम, पंपा के पश्चिमी तट का आश्रय लेकर, हे काकुत्स्थ, तुम एक अनुपम और गुप्त आश्रमस्थान देखोगे,

श्लोक 29 (aranya.73.29)

न तत्राक्रमितुं नागाः शक्नुवन्ति तदाश्रमे । ऋषेस्तस्य मतङ्गस्य विधानात् तच्च काननम् ॥ 73.29 ॥

na tatrākramituṃ nāgāḥ śaknuvanti tadāśrame | ṛṣestasya mataṅgasya vidhānāt tacca kānanam || 73.29 ||

जहाँ महर्षि मतंग की विधि-व्यवस्था के कारण उस आश्रम और वन में हाथी भी प्रवेश नहीं कर सकते।

श्लोक 30 (aranya.73.30)

मतङ्गवनमित्येव विश्रुतं रघुनन्दन । तस्मिन् नन्दनसंकाशे देवारण्योपमे वने ॥ 73.30 ॥

mataṅgavanamityeva viśrutaṃ raghunandana | tasmin nandanasaṃkāśe devāraṇyopame vane || 73.30 ||

हे रघुनंदन, वह मतंगवन के नाम से ही विख्यात है। नंदनवन के समान और देववन के तुल्य उस वन में,

श्लोक 31 (aranya.73.31)

नानाविहगसंकीर्णे रंस्यसे राम निर्वृतः । ऋष्यमूकस्तु पम्पायाः पुरस्तात् पुष्पितद्रुमः ॥ 73.31 ॥

nānāvihagasaṃkīrṇe raṃsyase rāma nirvṛtaḥ | ṛṣyamūkastu pampāyāḥ purastāt puṣpitadrumaḥ || 73.31 ||

जो अनेक प्रकार के पक्षियों से भरा हुआ है, वहाँ हे राम, तुम आनंदपूर्वक विश्राम करोगे। और पंपा के सम्मुख पुष्पित वृक्षों वाला ऋष्यमूक पर्वत है,

श्लोक 32 (aranya.73.32)

सुदुःखारोहणश्चैव शिशुनागाभिरक्षितः । उदारो ब्रह्मणा चैव पूर्वकालेऽभिनिर्मितः ॥ 73.32 ॥

suduḥkhārohaṇaścaiva śiśunāgābhirakṣitaḥ | udāro brahmaṇā caiva pūrvakāle'bhinirmitaḥ || 73.32 ||

जिस पर चढ़ना अत्यंत कठिन है, जो बाल-गजों द्वारा सुरक्षित है, तथा जो उदार और प्राचीनकाल में स्वयं ब्रह्मा द्वारा निर्मित है।

श्लोक 33 (aranya.73.33)

शयानः पुरुषो राम तस्य शैलस्य मूर्धनि । यत् स्वप्नं लभते वित्तं तत् प्रबुद्धोऽधिगच्छति ॥ 73.33 ॥

śayānaḥ puruṣo rāma tasya śailasya mūrdhani | yat svapnaṃ labhate vittaṃ tat prabuddho'dhigacchati || 73.33 ||

हे राम, उस पर्वत की चोटी पर सोया हुआ पुरुष स्वप्न में जो धन प्राप्त करता है, जागने पर वह उसी धन को पा लेता है।

श्लोक 34 (aranya.73.34)

यस्त्वेनं विषमाचारः पापकर्माधिरोहति । तत्रैव प्रहरन्त्येनं सुप्तमादाय राक्षसाः ॥ 73.34 ॥

yastvenaṃ viṣamācāraḥ pāpakarmādhirohati | tatraiva praharantyenaṃ suptamādāya rākṣasāḥ || 73.34 ||

किंतु जो कोई दुराचारी और पापकर्मा उस पर चढ़ता है, उसे राक्षस सोते समय पकड़कर वहीं मार डालते हैं।

श्लोक 35 (aranya.73.35)

तत्रापि शिशुनागानामाक्रन्दः श्रूयते महान् । क्रीडतां राम पम्पायां मतङ्गाश्रमवासिनाम् ॥ 73.35 ॥

tatrāpi śiśunāgānāmākrandaḥ śrūyate mahān | krīḍatāṃ rāma pampāyāṃ mataṅgāśramavāsinām || 73.35 ||

वहाँ भी हे राम, मतंगाश्रम में रहने वाले तथा पंपा में क्रीड़ा करने वाले बाल-गजों की महान् चिंघाड़ सुनाई देती है,

श्लोक 36 (aranya.73.36)

सक्ता रुधिरधाराभिः संहत्य परमद्विपाः । प्रचरन्ति पृथक्कीर्णा मेघवर्णास्तरस्विनः ॥ 73.36 ॥

saktā rudhiradhārābhiḥ saṃhatya paramadvipāḥ | pracaranti pṛthakkīrṇā meghavarṇāstarasvinaḥ || 73.36 ||

जब वे मेघवर्ण, वेगवान् और महान् गजराज परस्पर टकराकर रक्तधाराओं से भीगकर अलग-अलग बिखर कर विचरण करते हैं।

श्लोक 37 (aranya.73.37)

ते तत्र पीत्वा पानीयं विमलं चारु शोभनम् । अत्यन्तसुखसंस्पर्शं सर्वगन्धसमन्वितम् ॥ 73.37 ॥

te tatra pītvā pānīyaṃ vimalaṃ cāru śobhanam | atyantasukhasaṃsparśaṃ sarvagandhasamanvitam || 73.37 ||

वहाँ वे निर्मल, सुंदर, अत्यंत सुखद स्पर्श वाले और सब सुगंधों से युक्त जल को पीकर,

श्लोक 38 (aranya.73.38)

निर्वृत्ताः संविगाहन्ते वनानि वनगोचराः । ऋक्षांश्च द्वीपिनश्चैव नीलकोमलकप्रभान् ॥ 73.38 ॥

nirvṛttāḥ saṃvigāhante vanāni vanagocarāḥ | ṛkṣāṃśca dvīpinaścaiva nīlakomalakaprabhān || 73.38 ||

वे वनचर गज तृप्त होकर वनों में पुनः लौट जाते हैं। और वहाँ भालुओं, चीतों तथा नील-कोमल कांतिवाले हरिणों को देखकर,

श्लोक 39 (aranya.73.39)

रुरूनपेतानजयान् दृष्ट्वा शोकं प्रहास्यसि । राम तस्य तु शैलस्य महती शोभते गुहा ॥ 73.39 ॥

rurūnapetānajayān dṛṣṭvā śokaṃ prahāsyasi | rāma tasya tu śailasya mahatī śobhate guhā || 73.39 ||

जो निडर और अपराजित हैं, तुम्हारा शोक दूर हो जाएगा, हे राम। और उसी पर्वत पर एक विशाल गुफा सुशोभित है,

श्लोक 40 (aranya.73.40)

शिलापिधाना काकुत्स्थ दुःखं चास्याः प्रवेशनम् । तस्या गुहायाः प्राग्द्वारे महान् शीतोदको ह्रदः ॥ 73.40 ॥

śilāpidhānā kākutstha duḥkhaṃ cāsyāḥ praveśanam | tasyā guhāyāḥ prāgdvāre mahān śītodako hradaḥ || 73.40 ||

जो शिला से ढकी हुई है, हे काकुत्स्थ, और जिसमें प्रवेश करना कठिन है। उस गुफा के पूर्वी द्वार पर शीतल जल वाला एक विशाल सरोवर है,

श्लोक 41 (aranya.73.41)

बहुमूलफलो रम्यो नानानगसमाकुलः । तस्यां वसति धर्मात्मा सुग्रीवः सह वानरैः ॥ 73.41 ॥

bahumūlaphalo ramyo nānānagasamākulaḥ | tasyāṃ vasati dharmātmā sugrīvaḥ saha vānaraiḥ || 73.41 ||

जो मनोरम है, कंदमूल-फलों से भरपूर तथा अनेक वृक्षों से आकीर्ण है। उस गुफा में धर्मात्मा सुग्रीव वानरों के साथ निवास करता है,

श्लोक 42 (aranya.73.42)

कदाचिच्छिखरे तस्य पर्वतस्यापि तिष्ठति । कबन्धस्त्वनुशास्यैवं तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥ 73.42 ॥

kadācicchikhare tasya parvatasyāpi tiṣṭhati | kabandhastvanuśāsyaivaṃ tāvubhau rāmalakṣmaṇau || 73.42 ||

और कभी-कभी वह उस पर्वत के शिखर पर भी रहता है।" इस प्रकार राम और लक्ष्मण दोनों को उपदेश देकर कबन्ध,

श्लोक 43 (aranya.73.43)

स्रग्वी भास्करवर्णाभः खे व्यरोचत वीर्यवान् । तं तु खस्थं महाभागं तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥ 73.43 ॥

sragvī bhāskaravarṇābhaḥ khe vyarocata vīryavān | taṃ tu khasthaṃ mahābhāgaṃ tāvubhau rāmalakṣmaṇau || 73.43 ||

माला धारण किए हुए, पराक्रमी और सूर्य के समान वर्णवाला वह आकाश में देदीप्यमान हुआ। तब राम और लक्ष्मण ने आकाश में स्थित उस महाभाग कबन्ध से,

श्लोक 44 (aranya.73.44)

प्रस्थितौ त्वं व्रजस्वेति वाक्यमूचतुरन्तिके । गम्यतां कार्यसिद्ध्यर्थमिति तावब्रवीत् स च ॥ 73.44 ॥

prasthitau tvaṃ vrajasveti vākyamūcaturantike | gamyatāṃ kāryasiddhyarthamiti tāvabravīt sa ca || 73.44 ||

जो स्वयं प्रस्थान करने को उद्यत थे, समीप ही यह वचन कहा — "तुम भी जाओ।" और उसने भी उन दोनों से कहा — "कार्यसिद्धि के लिए तुम भी जाओ।"

श्लोक 45 (aranya.73.45)

सुप्रीतौ तावनुज्ञाप्य कबन्धः प्रस्थितस्तदा ॥ 73.45 ॥

suprītau tāvanujñāpya kabandhaḥ prasthitastadā || 73.45 ||

तब अत्यंत प्रसन्न हुए उन दोनों से विदा लेकर कबन्ध चल पड़ा।

श्लोक 46 (aranya.73.46)

स तत् कबन्धः प्रतिपद्य रूपं वृतः श्रिया भास्वरसर्वदेहः । निदर्शयन् राममवेक्ष्य खस्थः सख्यं कुरुष्वेति तदाभ्युवाच ॥ 73.46 ॥

sa tat kabandhaḥ pratipadya rūpaṃ vṛtaḥ śriyā bhāsvarasarvadehaḥ | nidarśayan rāmamavekṣya khasthaḥ sakhyaṃ kuruṣveti tadābhyuvāca || 73.46 ||

अपने वास्तविक रूप को पुनः प्राप्त कर, श्री से मंडित तथा सारे शरीर में देदीप्यमान वह कबन्ध, आकाश में स्थित होकर राम की ओर देखते हुए, मार्ग दिखाते हुए पुनः बोला — "सुग्रीव से मित्रता करना," और यह कहकर वह अंतर्धान हो गया।

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