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अरण्यकाण्ड · सर्ग 74

शबरी की मुक्ति

सर्ग 73सर्ग-सूचीसर्ग 75

श्लोक 1 (aranya.74.1)

तौ कबन्धेन तं मार्गं पम्पाया दर्शितं वने । आतस्थतुर्दिशं गृह्य प्रतीचीं नृवरात्मजौ ॥ 74.1 ॥

tau kabandhena taṃ mārgaṃ pampāyā darśitaṃ vane | ātasthaturdiśaṃ gṛhya pratīcīṃ nṛvarātmajau || 74.1 ||

उन दोनों श्रेष्ठ राजा के पुत्रों ने कबन्ध द्वारा दिखाए गए उस मार्ग को अपनाकर, वन में पश्चिम दिशा की ओर पंपा की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 2 (aranya.74.2)

तौ शैलेष्वाचितानेकान् क्षौद्रपुष्पफलद्रुमान् । वीक्षन्तौ जग्मतुर्द्रष्टुं सुग्रीवं रामलक्ष्मणौ ॥ 74.2 ॥

tau śaileṣvācitānekān kṣaudrapuṣpaphaladrumān | vīkṣantau jagmaturdraṣṭuṃ sugrīvaṃ rāmalakṣmaṇau || 74.2 ||

राम और लक्ष्मण, पर्वतों पर सघन रूप से खड़े मधु-पुष्प और फलों से लदे अनेक वृक्षों को निहारते हुए, सुग्रीव को देखने के लिए आगे बढ़े।

श्लोक 3 (aranya.74.3)

कृत्वा तु शैलपृष्ठे तु तौ वासं रघुनन्दनौ । पम्पायाः पश्चिमं तीरं राघवावुपतस्थतुः ॥ 74.3 ॥

kṛtvā tu śailapṛṣṭhe tu tau vāsaṃ raghunandanau | pampāyāḥ paścimaṃ tīraṃ rāghavāvupatasthatuḥ || 74.3 ||

पर्वत की चोटी पर रात्रि-विश्राम करके, रघुकुल के वे दोनों आनंददायी राघव पंपा के पश्चिमी तट के निकट पहुँचे।

श्लोक 4 (aranya.74.4)

तौ पुष्करिण्याः पम्पायास्तीरमासाद्य पश्चिमम् । अपश्यतां ततस्तत्र शबर्या रम्यमाश्रमम् ॥ 74.4 ॥

tau puṣkariṇyāḥ pampāyāstīramāsādya paścimam | apaśyatāṃ tatastatra śabaryā ramyamāśramam || 74.4 ||

कमलों से भरे पंपा सरोवर के पश्चिमी तट पर पहुँचकर, उन्होंने वहाँ शबरी के मनोरम आश्रम को देखा।

श्लोक 5 (aranya.74.5)

तौ तमाश्रममासाद्य द्रुमैर्बहुभिरावृतम् । सुरम्यमभिवीक्षन्तौ शबरीमभ्युपेयतुः ॥ 74.5 ॥

tau tamāśramamāsādya drumairbahubhirāvṛtam | suramyamabhivīkṣantau śabarīmabhyupeyatuḥ || 74.5 ||

अनेक वृक्षों से घिरे उस आश्रम तक पहुँचकर और उस अत्यंत रमणीय स्थान को निहारते हुए, वे दोनों शबरी के समीप पहुँचे।

श्लोक 6 (aranya.74.6)

तौ दृष्ट्वा तु तदा सिद्धा समुत्थाय कृताञ्जलिः । पादौ जग्राह रामस्य लक्ष्मणस्य च धीमतः ॥ 74.6 ॥

tau dṛṣṭvā tu tadā siddhā samutthāya kṛtāñjaliḥ | pādau jagrāha rāmasya lakṣmaṇasya ca dhīmataḥ || 74.6 ||

उन्हें देखते ही वह सिद्ध शबरी तुरंत उठ खड़ी हुई, हाथ जोड़कर उसने राम और बुद्धिमान लक्ष्मण के चरण पकड़ लिए।

श्लोक 7 (aranya.74.7)

पाद्यमाचमनीयं च सर्वं प्रादाद् यथाविधि । तामुवाच ततो रामः श्रमणीं धर्मसंस्थिताम् ॥ 74.7 ॥

pādyamācamanīyaṃ ca sarvaṃ prādād yathāvidhi | tāmuvāca tato rāmaḥ śramaṇīṃ dharmasaṃsthitām || 74.7 ||

उसने विधिपूर्वक पाद्य, आचमन तथा सब कुछ अर्पित किया। तत्पश्चात् राम ने धर्म में स्थित उस तपस्विनी से कहा—

श्लोक 8 (aranya.74.8)

कच्चित्ते निर्जिता विघ्नाः कच्चित्ते वर्धते तपः । कच्चित्ते नियतः कोप आहारश्च तपोधने ॥ 74.8 ॥

kaccitte nirjitā vighnāḥ kaccitte vardhate tapaḥ | kaccitte niyataḥ kopa āhāraśca tapodhane || 74.8 ||

"हे तपोधने, क्या तुम्हारे विघ्न दूर हो गए हैं? क्या तुम्हारी तपस्या बढ़ रही है? क्या तुम्हारा क्रोध और आहार नियंत्रित है?

श्लोक 9 (aranya.74.9)

कच्चित्ते नियमाः प्राप्ताः कच्चित्ते मनसः सुखम् । कच्चित्ते गुरुशुश्रूषा सफला चारुभाषिणि ॥ 74.9 ॥

kaccitte niyamāḥ prāptāḥ kaccitte manasaḥ sukham | kaccitte guruśuśrūṣā saphalā cārubhāṣiṇi || 74.9 ||

क्या तुम्हारे नियम पूर्ण हुए हैं? क्या तुम्हारा मन सुखी है? और हे मधुरभाषिणी, क्या गुरुजनों की तुम्हारी सेवा सफल हुई है?"

श्लोक 10 (aranya.74.10)

रामेण तापसी पृष्टा सा सिद्धा सिद्धसम्मता । शशंस शबरी वृद्धा रामाय प्रत्यवस्थिता ॥ 74.10 ॥

rāmeṇa tāpasī pṛṣṭā sā siddhā siddhasammatā | śaśaṃsa śabarī vṛddhā rāmāya pratyavasthitā || 74.10 ||

राम द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, सिद्धों से सम्मानित वह वृद्धा सिद्ध शबरी, राम के सम्मुख खड़ी होकर बोली—

श्लोक 11 (aranya.74.11)

अद्य प्राप्ता तपःसिद्धिस्तव संदर्शनान्मया । अद्य मे सफलं जन्म गुरवश्च सुपूजिताः ॥ 74.11 ॥

adya prāptā tapaḥsiddhistava saṃdarśanānmayā | adya me saphalaṃ janma guravaśca supūjitāḥ || 74.11 ||

"आज तुम्हारे दर्शन मात्र से मैंने तपस्या की सिद्धि प्राप्त कर ली है। आज मेरा जन्म सफल हुआ और मेरे गुरुजन भी सुपूजित हो गए।

श्लोक 12 (aranya.74.12)

अद्य मे सफलं तप्तं स्वर्गश्चैव भविष्यति । त्वयि देववरे राम पूजिते पुरुषर्षभ ॥ 74.12 ॥

adya me saphalaṃ taptaṃ svargaścaiva bhaviṣyati | tvayi devavare rāma pūjite puruṣarṣabha || 74.12 ||

हे पुरुषश्रेष्ठ राम, आज मेरी तपस्या सफल हुई और मुझे स्वर्ग भी प्राप्त होगा, क्योंकि मैंने देवताओं में श्रेष्ठ तुम्हारी पूजा की है।

श्लोक 13 (aranya.74.13)

तवाहं चक्षुषा सौम्य पूता सौम्येन मानद । गमिष्याम्यक्षयांल्लोकांस्त्वत्प्रसादादरिंदम ॥ 74.13 ॥

tavāhaṃ cakṣuṣā saumya pūtā saumyena mānada | gamiṣyāmyakṣayāṃllokāṃstvatprasādādariṃdama || 74.13 ||

हे सौम्य, तुम्हारी सौम्य दृष्टि से मैं पवित्र हो गई हूँ, हे मानदाता; हे शत्रुदमन, तुम्हारे प्रसाद से मैं अक्षय लोकों को प्राप्त करूँगी।

श्लोक 14 (aranya.74.14)

चित्रकूटं त्वयि प्राप्ते विमानैरतुलप्रभैः । इतस्ते दिवमारूढा यानहं पर्यचारिषम् ॥ 74.14 ॥

citrakūṭaṃ tvayi prāpte vimānairatulaprabhaiḥ | itaste divamārūḍhā yānahaṃ paryacāriṣam || 74.14 ||

जब तुम चित्रकूट पहुँचे, तब मैं जिनकी सेवा किया करती थी, वे अनुपम तेजयुक्त विमानों में यहीं से स्वर्ग को उठ गए।

श्लोक 15 (aranya.74.15)

तैश्चाहमुक्ता धर्मज्ञैर्महाभागैर्महर्षिभिः । आगमिष्यति ते रामः सुपुण्यमिममाश्रमम् ॥ 74.15 ॥

taiścāhamuktā dharmajñairmahābhāgairmaharṣibhiḥ | āgamiṣyati te rāmaḥ supuṇyamimamāśramam || 74.15 ||

और उन धर्मज्ञ, महाभाग महर्षियों ने मुझसे कहा था — "राम तुम्हारे इस अत्यंत पुण्य आश्रम में आएँगे,

श्लोक 16 (aranya.74.16)

स ते प्रतिग्रहीतव्यः सौमित्रिसहितोऽतिथिः । तं च दृष्ट्वा वरांल्लोकानक्षयांस्त्वं गमिष्यसि ॥ 74.16 ॥

sa te pratigrahītavyaḥ saumitrisahito'tithiḥ | taṃ ca dṛṣṭvā varāṃllokānakṣayāṃstvaṃ gamiṣyasi || 74.16 ||

सौमित्र के सहित; तुम्हें उन्हें अतिथि रूप में ग्रहण करना चाहिए, और उन्हें देखकर तुम श्रेष्ठ अक्षय लोकों को प्राप्त होगी।"

श्लोक 17 (aranya.74.17)

एवमुक्ता महाभागैस्तदाहं पुरुषर्षभ । मया तु संचितं वन्यं विविधं पुरुषर्षभ ॥ 74.17 ॥

evamuktā mahābhāgaistadāhaṃ puruṣarṣabha | mayā tu saṃcitaṃ vanyaṃ vividhaṃ puruṣarṣabha || 74.17 ||

हे पुरुषर्षभ, उन महाभाग ऋषियों के इस प्रकार कहने पर, हे पुरुषश्रेष्ठ, मैंने तुम्हारे लिए ये विविध वन्य पदार्थ एकत्र किए हैं,

श्लोक 18 (aranya.74.18)

तवार्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायास्तीरसम्भवम् । एवमुक्तः स धर्मात्मा शबर्या शबरीमिदम् ॥ 74.18 ॥

tavārthe puruṣavyāghra pampāyāstīrasambhavam | evamuktaḥ sa dharmātmā śabaryā śabarīmidam || 74.18 ||

जो पंपा के तट पर उगते हैं।" शबरी द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, उन धर्मात्मा राम ने शबरी से यह कहा —

श्लोक 19 (aranya.74.19)

राघवः प्राह विज्ञाने तां नित्यमबहिष्कृताम् । दनोः सकाशात् तत्त्वेन प्रभावं ते महात्मनाम् ॥ 74.19 ॥

rāghavaḥ prāha vijñāne tāṃ nityamabahiṣkṛtām | danoḥ sakāśāt tattvena prabhāvaṃ te mahātmanām || 74.19 ||

जो सच्चे ज्ञान से कभी वंचित नहीं रही, उस शबरी से राघव ने कहा — "दनुपुत्र कबन्ध से मैंने तुम्हारे और तुम्हारे महात्मा गुरुजनों के प्रभाव को तत्त्वतः सुना है;

श्लोक 20 (aranya.74.20)

श्रुतं प्रत्यक्षमिच्छामि संद्रष्टुं यदि मन्यसे । एतत्तु वचनं श्रुत्वा रामवक्त्रविनिःसृतम् ॥ 74.20 ॥

śrutaṃ pratyakṣamicchāmi saṃdraṣṭuṃ yadi manyase | etattu vacanaṃ śrutvā rāmavaktraviniḥsṛtam || 74.20 ||

यदि तुम उचित समझो, तो जो मैंने सुना है, उसे मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।" राम के मुख से निकले हुए इन वचनों को सुनकर,

श्लोक 21 (aranya.74.21)

शबरी दर्शयामास तावुभौ तद्वनं महत् । पश्य मेघघनप्रख्यं मृगपक्षिसमाकुलम् ॥ 74.21 ॥

śabarī darśayāmāsa tāvubhau tadvanaṃ mahat | paśya meghaghanaprakhyaṃ mṛgapakṣisamākulam || 74.21 ||

शबरी ने उन दोनों को उस विशाल वन को दिखाया — "देखो, यह मेघों के समान सघन तथा मृगों और पक्षियों से भरा हुआ वन,

श्लोक 22 (aranya.74.22)

मतङ्गवनमित्येव विश्रुतं रघुनन्दन । इह ते भावितात्मानो गुरवो मे महाद्युते । जुहवांचक्रिरे नीडं मन्त्रवन्मन्त्रपूजितम् ॥ 74.22 ॥

mataṅgavanamityeva viśrutaṃ raghunandana | iha te bhāvitātmāno guravo me mahādyute | juhavāṃcakrire nīḍaṃ mantravanmantrapūjitam || 74.22 ||

हे रघुनंदन, यह मतंगवन के नाम से विख्यात है। हे महातेजस्वी, यहीं मेरे भावनाशील गुरुजनों ने मंत्रों से पूजित इस पवित्र स्थान पर हवन किया करते थे।

श्लोक 23 (aranya.74.23)

इयं प्रत्यक्स्थली वेदी यत्र ते मे सुसत्कृताः । पुष्पोपहारं कुर्वन्ति श्रमादुद्वेपिभिः करैः ॥ 74.23 ॥

iyaṃ pratyaksthalī vedī yatra te me susatkṛtāḥ | puṣpopahāraṃ kurvanti śramādudvepibhiḥ karaiḥ || 74.23 ||

यह वह पश्चिमी वेदी है जहाँ मेरे उन अत्यंत आदरणीय गुरुजन थकान से काँपते हाथों से पुष्पों की भेंट चढ़ाया करते थे।

श्लोक 24 (aranya.74.24)

तेषां तपःप्रभावेण पश्याद्यापि रघूत्तम । द्योतयन्ती दिशः सर्वाः श्रिया वेद्यतुलप्रभा ॥ 74.24 ॥

teṣāṃ tapaḥprabhāveṇa paśyādyāpi raghūttama | dyotayantī diśaḥ sarvāḥ śriyā vedyatulaprabhā || 74.24 ||

हे रघूत्तम, देखो, उनकी तपस्या के प्रभाव से आज भी ये अनुपम कांतिवाली वेदियाँ अपनी शोभा से समस्त दिशाओं को प्रकाशित करती हैं।

श्लोक 25 (aranya.74.25)

अशक्नुवद्भिस्तैर्गन्तुमुपवासश्रमालसैः । चिन्तितेनागतान् पश्य समेतान् सप्त सागरान् ॥ 74.25 ॥

aśaknuvadbhistairgantumupavāsaśramālasaiḥ | cintitenāgatān paśya sametān sapta sāgarān || 74.25 ||

उपवास के श्रम से शिथिल हुए वे ऋषि जाने में असमर्थ थे; इसलिए देखो, उनके मात्र विचार से ही सातों समुद्र यहाँ एकत्र आ गए थे।

श्लोक 26 (aranya.74.26)

कृताभिषेकैस्तैर्न्यस्ता वल्कलाः पादपेष्विह । अद्यापि न विशुष्यन्ति प्रदेशे रघुनन्दन ॥ 74.26 ॥

kṛtābhiṣekaistairnyastā valkalāḥ pādapeṣviha | adyāpi na viśuṣyanti pradeśe raghunandana || 74.26 ||

हे रघुनंदन, स्नान करके उन्होंने यहाँ इन वृक्षों पर जो वल्कल वस्त्र फैलाए थे, वे आज भी इस स्थान पर सूखे नहीं हैं।

श्लोक 27 (aranya.74.27)

देवकार्याणि कुर्वद्भिर्यानीमानि कृतानि वै । पुष्पैः कुवलयैः सार्धं म्लानत्वं न तु यान्ति वै ॥ 74.27 ॥

devakāryāṇi kurvadbhiryānīmāni kṛtāni vai | puṣpaiḥ kuvalayaiḥ sārdhaṃ mlānatvaṃ na tu yānti vai || 74.27 ||

देवकार्य करते हुए उन्होंने नीलकमल और अन्य पुष्पों से जो ये मालाएँ बनाई थीं, वे आज भी कभी मुरझाती नहीं हैं।

श्लोक 28 (aranya.74.28)

कृत्स्नं वनमिदं दृष्टं श्रोतव्यं च श्रुतं त्वया । तद् इच्छाम्य् अभ्यनुज्ञाता त्यक्ष्याम्य् एतत् कलेवरम् ॥ 74.28 ॥

kṛtsnaṃ vanamidaṃ dṛṣṭaṃ śrotavyaṃ ca śrutaṃ tvayā | tad icchāmy abhyanujñātā tyakṣyāmy etat kalevaram || 74.28 ||

तुमने इस समूचे वन को देख लिया और जो सुनने योग्य था, वह सुन भी लिया। इसलिए अब मैं तुमसे अनुमति लेकर इस शरीर का त्याग करना चाहती हूँ।

श्लोक 29 (aranya.74.29)

तेषामिच्छाम्यहं गन्तुं समीपं भावितात्मनाम् । मुनीनामाश्रमो येषामहं च परिचारिणी ॥ 74.29 ॥

teṣāmicchāmyahaṃ gantuṃ samīpaṃ bhāvitātmanām | munīnāmāśramo yeṣāmahaṃ ca paricāriṇī || 74.29 ||

जिन मुनियों का यह आश्रम है और जिनकी मैं सेविका रही हूँ, उन्हीं भावनाशील ऋषियों के समीप जाने की मेरी इच्छा है।

श्लोक 30 (aranya.74.30)

धर्मिष्ठं तु वचः श्रुत्वा राघवः सहलक्ष्मणः । प्रहर्षमतुलं लेभे आश्चर्यमिति चाब्रवीत् ॥ 74.30 ॥

dharmiṣṭhaṃ tu vacaḥ śrutvā rāghavaḥ sahalakṣmaṇaḥ | praharṣamatulaṃ lebhe āścaryamiti cābravīt || 74.30 ||

उस धर्मानुकूल वचन को सुनकर लक्ष्मण सहित राघव को अपार हर्ष हुआ, और उन्होंने कहा — "यह तो अद्भुत है!"

श्लोक 31 (aranya.74.31)

तामुवाच ततो रामः शबरीं संशितव्रताम् । अर्चितोऽहं त्वया भद्रे गच्छ कामं यथासुखम् ॥ 74.31 ॥

tāmuvāca tato rāmaḥ śabarīṃ saṃśitavratām | arcito'haṃ tvayā bhadre gaccha kāmaṃ yathāsukham || 74.31 ||

तब राम ने अपने व्रत में दृढ़ उस शबरी से कहा — "हे भद्रे, तुमने मेरी अच्छी सेवा की; अब तुम अपनी इच्छानुसार सुखपूर्वक जाओ।"

श्लोक 32 (aranya.74.32)

इत्येवमुक्ता जटिला चीरकृष्णाजिनाम्बरा । अनुज्ञाता तु रामेण हुत्वाऽऽत्मानं हुताशने ॥ 74.32 ॥

ityevamuktā jaṭilā cīrakṛṣṇājināmbarā | anujñātā tu rāmeṇa hutvā''tmānaṃ hutāśane || 74.32 ||

राम की इस प्रकार आज्ञा पाकर, जटाधारी और वल्कल-कृष्णाजिन वस्त्रधारिणी शबरी ने अपने को अग्नि में समर्पित कर दिया,

श्लोक 33 (aranya.74.33)

ज्वलत्पावकसंकाशा स्वर्गमेव जगाम ह । दिव्याभरणसंयुक्ता दिव्यमाल्यानुलेपना ॥ 74.33 ॥

jvalatpāvakasaṃkāśā svargameva jagāma ha | divyābharaṇasaṃyuktā divyamālyānulepanā || 74.33 ||

और प्रज्वलित अग्नि के समान चमकती हुई वह सीधे स्वर्ग को चली गई — दिव्य आभूषणों, दिव्य मालाओं और दिव्य अनुलेपन से युक्त होकर,

श्लोक 34 (aranya.74.34)

दिव्याम्बरधरा तत्र बभूव प्रियदर्शना । विराजयन्ती तं देशं विद्युत्सौदामनी यथा ॥ 74.34 ॥

divyāmbaradharā tatra babhūva priyadarśanā | virājayantī taṃ deśaṃ vidyutsaudāmanī yathā || 74.34 ||

दिव्य वस्त्र धारण किए हुए, वहाँ वह अत्यंत मनोहर दिखाई देने लगी, और उस प्रदेश को बिजली की चमक के समान प्रकाशित करने लगी।

श्लोक 35 (aranya.74.35)

यत्र ते सुकृतात्मानो विहरन्ति महर्षयः । तत् पुण्यं शबरी स्थानं जगामात्मसमाधिना ॥ 74.35 ॥

yatra te sukṛtātmāno viharanti maharṣayaḥ | tat puṇyaṃ śabarī sthānaṃ jagāmātmasamādhinā || 74.35 ||

अपनी आत्म-समाधि के बल से शबरी उस पुण्य स्थान को प्राप्त हुई, जहाँ वे पुण्यात्मा महर्षि आनंदपूर्वक विचरण करते हैं।

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