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अरण्यकाण्ड · सर्ग 9

सीता का धनुष-विषयक उपदेश

सर्ग 8सर्ग-सूचीसर्ग 10

श्लोक 1 (aranya.9.1)

सुतीक्ष्णेनाभ्यनुज्ञातं प्रस्थितं रघुनन्दनम् । हृद्यया स्निग्धया वाचा भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ 9.1 ॥

sutīkṣṇenābhyanujñātaṃ prasthitaṃ raghunandanam hṛdyayā snigdhayā vācā bhartāramidamabravīt || 9.1 ||

सुतीक्ष्ण से अनुमति पाकर प्रस्थान करते हुए रघुनन्दन राम से सीता ने हृदयस्पर्शी, स्नेहपूर्ण वाणी में अपने पति से यह कहा—

श्लोक 2 (aranya.9.2)

अधर्मं तु सुसूक्ष्मेण विधिना प्राप्यते महान् । निवृत्तेन च शक्योऽयं व्यसनात् कामजादिह ॥ 9.2 ॥

adharmaṃ tu susūkṣmeṇa vidhinā prāpyate mahān nivṛttena ca śakyo'yaṃ vyasanāt kāmajādiha || 9.2 ||

"अत्यन्त सूक्ष्म विधि से भी महान् अधर्म प्राप्त हो सकता है; किन्तु काम से उत्पन्न इस व्यसन से निवृत्त होकर इससे बचा जा सकता है।

श्लोक 3 (aranya.9.3)

त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत । मिथ्यावाक्यं तु परमं तस्माद् गुरुतरावुभौ ॥ 9.3 ॥

trīṇyeva vyasanānyatra kāmajāni bhavantyuta mithyāvākyaṃ tu paramaṃ tasmād gurutarāvubhau || 9.3 ||

काम से उत्पन्न होने वाले व्यसन तीन ही हैं; इनमें मिथ्या वचन सबसे गम्भीर है, तथापि उससे भी अधिक गुरुतर शेष दोनों हैं।

श्लोक 4 (aranya.9.4)

परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता । मिथ्यावाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव ॥ 9.4 ॥

paradārābhigamanaṃ vinā vairaṃ ca raudratā mithyāvākyaṃ na te bhūtaṃ na bhaviṣyati rāghava || 9.4 ||

पराई स्त्री की कामना, और बिना वैर के क्रूरता—यही वे दो हैं। मिथ्या वचन तो हे राघव! न कभी आपमें रहा है, न रहेगा।

श्लोक 5 (aranya.9.5)

कुतोऽभिलषणं स्त्रीणां परेषां धर्मनाशनम् । तव नास्ति मनुष्येन्द्र न चाभूत् ते कदाचन ॥ 9.5 ॥

kuto'bhilaṣaṇaṃ strīṇāṃ pareṣāṃ dharmanāśanam tava nāsti manuṣyendra na cābhūt te kadācana || 9.5 ||

हे नरेन्द्र! धर्म का नाश करने वाली पराई स्त्रियों की कामना आपमें कहाँ से हो सकती है? यह न कभी आपमें है, न कभी थी।

श्लोक 6 (aranya.9.6)

मनस्यपि तथा राम न चैतद् विद्यते क्वचित् । स्वदारनिरतश्चैव नित्यमेव नृपात्मज ॥ 9.6 ॥

manasyapi tathā rāma na caitad vidyate kvacit svadāranirataścaiva nityameva nṛpātmaja || 9.6 ||

हे राम! यह तो आपके मन में भी कहीं नहीं है; आप तो सदा केवल अपनी ही पत्नी में अनुरक्त रहते हैं, हे राजपुत्र!

श्लोक 7 (aranya.9.7)

धर्मिष्ठः सत्यसंधश्च पितुर्निर्देशकारकः । त्वयि धर्मश्च सत्यं च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ 9.7 ॥

dharmiṣṭhaḥ satyasaṃdhaśca piturnirdeśakārakaḥ tvayi dharmaśca satyaṃ ca tvayi sarvaṃ pratiṣṭhitam || 9.7 ||

आप परम धर्मात्मा, सत्यप्रतिज्ञ तथा सदा पिता की आज्ञा का पालन करने वाले हैं; आपमें ही धर्म, सत्य और सब कुछ प्रतिष्ठित है।

श्लोक 8 (aranya.9.8)

तच्च सर्वं महाबाहो शक्यं वोढुं जितेन्द्रियैः । तव वश्येन्द्रियत्वं च जानामि शुभदर्शन ॥ 9.8 ॥

tacca sarvaṃ mahābāho śakyaṃ voḍhuṃ jitendriyaiḥ tava vaśyendriyatvaṃ ca jānāmi śubhadarśana || 9.8 ||

हे महाबाहो! यह सब केवल जितेन्द्रिय पुरुष ही निभा सकते हैं, और हे शुभदर्शन! मैं जानती हूँ कि आपकी इन्द्रियाँ पूर्णतः वश में हैं।

श्लोक 9 (aranya.9.9)

तृतीयं यदिदं रौद्रं परप्राणाभिहिंसनम् । निर्वैरं क्रियते मोहात् तच्च ते समुपस्थितम् ॥ 9.9 ॥

tṛtīyaṃ yadidaṃ raudraṃ paraprāṇābhihiṃsanam nirvairaṃ kriyate mohāt tacca te samupasthitam || 9.9 ||

किन्तु तीसरा जो यह क्रूर कर्म है—बिना वैर के, केवल मोहवश दूसरे के प्राणों का वध—वह अब आपके सामने उपस्थित हो गया है।

श्लोक 10 (aranya.9.10)

प्रतिज्ञातस्त्वया वीर दण्डकारण्यवासिनाम् । ऋषीणां रक्षणार्थाय वधः संयति रक्षसाम् ॥ 9.10 ॥

pratijñātastvayā vīra daṇḍakāraṇyavāsinām ṛṣīṇāṃ rakṣaṇārthāya vadhaḥ saṃyati rakṣasām || 9.10 ||

हे वीर! आपने दण्डकारण्यवासी ऋषियों की रक्षा के लिए युद्ध में राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की है।

श्लोक 11 (aranya.9.11)

एतन्निमित्तं च वनं दण्डका इति विश्रुतम् । प्रस्थितस्त्वं सह भ्रात्रा धृतबाणशरासनः ॥ 9.11 ॥

etannimittaṃ ca vanaṃ daṇḍakā iti viśrutam prasthitastvaṃ saha bhrātrā dhṛtabāṇaśarāsanaḥ || 9.11 ||

इसी कारण से आप बाण और धनुष धारण करके अपने भाई के साथ दण्डक नाम से विख्यात इस वन के लिए चल पड़े हैं।

श्लोक 12 (aranya.9.12)

ततस्त्वां प्रस्थितं दृष्ट्वा मम चिन्ताकुलं मनः । त्वद्वृत्तं चिन्तयन्त्या वै भवेन्निःश्रेयसं हितम् ॥ 9.12 ॥

tatastvāṃ prasthitaṃ dṛṣṭvā mama cintākulaṃ manaḥ tvadvṛttaṃ cintayantyā vai bhavenniḥśreyasaṃ hitam || 9.12 ||

आपको इस प्रकार प्रस्थान करते देखकर मेरा मन चिन्ता से व्याकुल हो उठा है; आपके इस निश्चय पर विचार करते हुए मैं जो कल्याणकारी बात है, वह कहती हूँ।

श्लोक 13 (aranya.9.13)

नहि मे रोचते वीर गमनं दण्डकान् प्रति । कारणं तत्र वक्ष्यामि वदन्त्याः श्रूयतां मम ॥ 9.13 ॥

nahi me rocate vīra gamanaṃ daṇḍakān prati kāraṇaṃ tatra vakṣyāmi vadantyāḥ śrūyatāṃ mama || 9.13 ||

हे वीर! मुझे दण्डकवन जाना अच्छा नहीं लगता। मैं इसका कारण बताती हूँ, कृपया सुनिए।

श्लोक 14 (aranya.9.14)

त्वं हि बाणधनुष्पाणिर्भ्रात्रा सह वनं गतः । दृष्ट्वा वनचरान् सर्वान् कच्चित् कुर्याः शरव्ययम् ॥ 9.14 ॥

tvaṃ hi bāṇadhanuṣpāṇirbhrātrā saha vanaṃ gataḥ dṛṣṭvā vanacarān sarvān kaccit kuryāḥ śaravyayam || 9.14 ||

आप बाण-धनुष हाथ में लेकर भाई के साथ वन में जाकर, वहाँ के समस्त वनचर प्राणियों को देखकर कदाचित् व्यर्थ ही बाणों का प्रयोग कर बैठें।

श्लोक 15 (aranya.9.15)

क्षत्रियाणामिह धनुर्हुताशस्येन्धनानि च । समीपतः स्थितं तेजोबलमुच्छ्रयते भृशम् ॥ 9.15 ॥

kṣatriyāṇāmiha dhanurhutāśasyendhanāni ca samīpataḥ sthitaṃ tejobalamucchrayate bhṛśam || 9.15 ||

क्षत्रिय के लिए धनुष मानो अग्नि में ईंधन के समान है; समीप ईंधन पाकर उसका तेज और भी अधिक भड़क उठता है।

श्लोक 16 (aranya.9.16)

पुरा किल महाबाहो तपस्वी सत्यवान् शुचिः । कस्मिंश्चिदभवत् पुण्ये वने रतमृगद्विजे ॥ 9.16 ॥

purā kila mahābāho tapasvī satyavān śuciḥ kasmiṃścidabhavat puṇye vane ratamṛgadvije || 9.16 ||

हे महाबाहो! प्राचीन काल में किसी पवित्र वन में मृग-पक्षियों से प्रसन्न रहने वाला, सत्यवादी और शुद्ध हृदय वाला एक तपस्वी रहता था।

श्लोक 17 (aranya.9.17)

तस्यैव तपसो विघ्नं कर्तुमिन्द्रः शचीपतिः । खड्गपाणिरथागच्छदाश्रमं भटरूपधृक् ॥ 9.17 ॥

tasyaiva tapaso vighnaṃ kartumindraḥ śacīpatiḥ khaḍgapāṇirathāgacchadāśramaṃ bhaṭarūpadhṛk || 9.17 ||

उसी की तपस्या में विघ्न डालने के लिए इन्द्र हाथ में तलवार लेकर सैनिक का रूप धारण करके उसके आश्रम में आए।

श्लोक 18 (aranya.9.18)

तस्मिंस्तदाश्रमपदे निहितः खड्ग उत्तमः । स न्यासविधिना दत्तः पुण्ये तपसि तिष्ठतः ॥ 9.18 ॥

tasmiṃstadāśramapade nihitaḥ khaḍga uttamaḥ sa nyāsavidhinā dattaḥ puṇye tapasi tiṣṭhataḥ || 9.18 ||

उस आश्रम-स्थल में वह उत्तम खड्ग रख दिया गया, तपस्या में लीन उस तपस्वी को धरोहर के रूप में सौंपा गया।

श्लोक 19 (aranya.9.19)

स तच्छस्त्रमनुप्राप्य न्यासरक्षणतत्परः । वने तु विचरत्येव रक्षन् प्रत्ययमात्मनः ॥ 9.19 ॥

sa tacchastramanuprāpya nyāsarakṣaṇatatparaḥ vane tu vicaratyeva rakṣan pratyayamātmanaḥ || 9.19 ||

उस अस्त्र को पाकर, धरोहर की रक्षा में तत्पर वह अपना विश्वास बनाए रखने के लिए उसे साथ लिए ही वन में विचरण करने लगा।

श्लोक 20 (aranya.9.20)

यत्र गच्छत्युपादातुं मूलानि च फलानि च । न विना याति तं खड्गं न्यासरक्षणतत्परः ॥ 9.20 ॥

yatra gacchatyupādātuṃ mūlāni ca phalāni ca na vinā yāti taṃ khaḍgaṃ nyāsarakṣaṇatatparaḥ || 9.20 ||

जहाँ भी वह मूल-फल लेने जाता, धरोहर की रक्षा में तत्पर वह उस खड्ग के बिना कभी नहीं जाता था।

श्लोक 21 (aranya.9.21)

नित्यं शस्त्रं परिवहन् क्रमेण स तपोधनः । चकार रौद्रीं स्वां बुद्धिं त्यक्त्वा तपसि निश्चयम् ॥ 9.21 ॥

nityaṃ śastraṃ parivahan krameṇa sa tapodhanaḥ cakāra raudrīṃ svāṃ buddhiṃ tyaktvā tapasi niścayam || 9.21 ||

उस तपोधन ने निरन्तर अस्त्र धारण करते हुए धीरे-धीरे अपनी बुद्धि को क्रूर बना लिया और तपस्या में अपने दृढ़ निश्चय को त्याग दिया।

श्लोक 22 (aranya.9.22)

ततः स रौद्राभिरतः प्रमत्तोऽधर्मकर्षितः । तस्य शस्त्रस्य संवासाज्जगाम नरकं मुनिः ॥ 9.22 ॥

tataḥ sa raudrābhirataḥ pramatto'dharmakarṣitaḥ tasya śastrasya saṃvāsājjagāma narakaṃ muniḥ || 9.22 ||

तत्पश्चात् हिंसा में रत, प्रमादी और अधर्म की ओर आकृष्ट होकर वह मुनि उस अस्त्र के दीर्घकालीन संसर्ग के कारण नरक को प्राप्त हुआ।

श्लोक 23 (aranya.9.23)

एवमेतत् पुरावृत्तं शस्त्रसंयोगकारणम् । अग्निसंयोगवद्धेतुः शस्त्रसंयोग उच्यते ॥ 9.23 ॥

evametat purāvṛttaṃ śastrasaṃyogakāraṇam agnisaṃyogavaddhetuḥ śastrasaṃyoga ucyate || 9.23 ||

इस प्रकार यह प्राचीन घटना अस्त्र के संसर्ग के कारण घटी थी; अस्त्र का संसर्ग अग्नि के संसर्ग के समान ही कारणभूत कहा जाता है।

श्लोक 24 (aranya.9.24)

स्नेहाच्च बहुमानाच्च स्मारये त्वां न शिक्षये । न कथंचन सा कार्या गृहीतधनुषा त्वया ॥ 9.24 ॥

snehācca bahumānācca smāraye tvāṃ na śikṣaye na kathaṃcana sā kāryā gṛhītadhanuṣā tvayā || 9.24 ||

स्नेह और आदर के कारण ही मैं आपको स्मरण कराती हूँ, शिक्षा नहीं देती—कि धनुष हाथ में लेकर आपको किसी भी दशा में यह कार्य नहीं करना चाहिए।

श्लोक 25 (aranya.9.25)

बुद्धिर्वैरं विना हन्तुं राक्षसान् दण्डकाश्रितान् । अपराधं विना हन्तुं लोको वीर न कामये ॥ 9.25 ॥

buddhirvairaṃ vinā hantuṃ rākṣasān daṇḍakāśritān aparādhaṃ vinā hantuṃ loko vīra na kāmaye || 9.25 ||

हे वीर! बिना किसी अपराध के, केवल शत्रुता के बिना ही दण्डकवासी राक्षसों को मार डालने की यह इच्छा मुझे उचित नहीं लगती।

श्लोक 26 (aranya.9.26)

क्षत्रियाणां तु वीराणां वनेषु नियतात्मनाम् । धनुषा कार्यमेतावदार्तानामभिरक्षणम् ॥ 9.26 ॥

kṣatriyāṇāṃ tu vīrāṇāṃ vaneṣu niyatātmanām dhanuṣā kāryametāvadārtānāmabhirakṣaṇam || 9.26 ||

वन में रहने वाले संयमी और वीर क्षत्रियों के लिए धनुष का प्रयोजन केवल इतना ही है—पीड़ितों की रक्षा करना।

श्लोक 27 (aranya.9.27)

क्व च शस्त्रं क्व च वनं क्व च क्षात्रं तपः क्व च । व्याविद्धमिदमस्माभिर्देशधर्मस्तु पूज्यताम् ॥ 9.27 ॥

kva ca śastraṃ kva ca vanaṃ kva ca kṣātraṃ tapaḥ kva ca vyāviddhamidamasmābhirdeśadharmastu pūjyatām || 9.27 ||

कहाँ अस्त्र और कहाँ वन-निवास, कहाँ क्षात्र-धर्म और कहाँ तपस्या! हमने इन्हें आपस में गड्डमड्ड कर दिया है; अब तो इस स्थान के धर्म का ही आदर होना चाहिए।

श्लोक 28 (aranya.9.28)

कदर्यकलुषा बुद्धिर्जायते शस्त्रसेवनात् । पुनर्गत्वा त्वयोध्यायां क्षत्रधर्मं चरिष्यसि ॥ 9.28 ॥

kadaryakaluṣā buddhirjāyate śastrasevanāt punargatvā tvayodhyāyāṃ kṣatradharmaṃ cariṣyasi || 9.28 ||

अस्त्रों के प्रयोग से बुद्धि दूषित और नीच हो जाती है। पुनः अयोध्या लौटकर आप वहाँ क्षत्रिय-धर्म का पालन कीजिएगा।

श्लोक 29 (aranya.9.29)

अक्षया तु भवेत् प्रीतिः श्वश्रूश्वशुरयोर्मम । यदि राज्यं हि संन्यस्य भवेस्त्वं निरतो मुनिः ॥ 9.29 ॥

akṣayā tu bhavet prītiḥ śvaśrūśvaśurayormama yadi rājyaṃ hi saṃnyasya bhavestvaṃ nirato muniḥ || 9.29 ||

यदि आप राज्य का त्याग करके तपस्या में लीन मुनि बन जाएँ, तो मेरे सास-ससुर की तथा मेरी भी प्रसन्नता अक्षय हो जाएगी।

श्लोक 30 (aranya.9.30)

धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम् । धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत् ॥ 9.30 ॥

dharmādarthaḥ prabhavati dharmāt prabhavate sukham dharmeṇa labhate sarvaṃ dharmasāramidaṃ jagat || 9.30 ||

धर्म से अर्थ की उत्पत्ति होती है, धर्म से ही सुख उत्पन्न होता है, धर्म से ही सब कुछ प्राप्त होता है—यह सारा जगत् धर्म को ही सार मानता है।

श्लोक 31 (aranya.9.31)

आत्मानं नियमैस्तैस्तैः कर्षयित्वा प्रयत्नतः । प्राप्यते निपुणैर्धर्मो न सुखाल्लभते सुखम् ॥ 9.31 ॥

ātmānaṃ niyamaistaistaiḥ karṣayitvā prayatnataḥ prāpyate nipuṇairdharmo na sukhāllabhate sukham || 9.31 ||

अनेक नियमों से प्रयत्नपूर्वक अपने आपको तपाकर ही निपुण पुरुष धर्म को प्राप्त करते हैं; सुख से सुख कभी प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 32 (aranya.9.32)

नित्यं शुचिमतिः सौम्य चर धर्मं तपोवने । सर्वं तु विदितं तुभ्यं त्रैलोक्यामपि तत्त्वतः ॥ 9.32 ॥

nityaṃ śucimatiḥ saumya cara dharmaṃ tapovane sarvaṃ tu viditaṃ tubhyaṃ trailokyāmapi tattvataḥ || 9.32 ||

हे सौम्य! सदा शुद्ध बुद्धि रखते हुए इस तपोवन में धर्माचरण कीजिए—यद्यपि त्रैलोक्य का सब तत्त्व आपको पहले से ही ज्ञात है।

श्लोक 33 (aranya.9.33)

स्त्रीचापलादेतदुपाहृतं मे । धर्मं च वक्तुं तव कः समर्थः ॥ विचार्य बुद्ध्या तु सहानुजेन । यद् रोचते तत् कुरु माचिरेण ॥ 9.33 ॥

strīcāpalādetadupāhṛtaṃ me dharmaṃ ca vaktuṃ tava kaḥ samarthaḥ vicārya buddhyā tu sahānujena yad rocate tat kuru mācireṇa || 9.33 ||

यह सब मैंने स्त्री-सुलभ चपलता के कारण ही कह दिया है; आपको धर्म का उपदेश देने में भला कौन समर्थ है? फिर भी अपनी बुद्धि से और अनुज के साथ विचार करके जो उचित लगे, वही कीजिए—केवल विलम्ब न कीजिए।

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