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बालकाण्ड · सर्ग 10

ऋष्यशृंग का अंगदेश-आगमन

सर्ग 9सर्ग-सूचीसर्ग 11

श्लोक 1 (bala.10.1)

सुमंत्रश्चोदितो राज्ञा प्रोवाचेदं वचस्तदा । यथर्ऋष्यशृङ्गस्त्वानीतो येनोपायेन मंत्रिभिः । तन्मे निगदितं सर्वं शृणु मे मंत्रिभिः सह ।। १०.१ ।।

sumaṃtraḥ codito rājñā provāca idam vacaḥ tadā | yathā ṛṣyaśṛṅgaḥ tu ānīto yena upāyena maṃtribhiḥ | tanme nigaditam sarvam śṛṇu me maṃtribhiḥ saha || 10.1 ||

राजा द्वारा इस प्रकार प्रेरित किए जाने पर सुमन्त्र ने तब यह वचन कहा—'जिस उपाय से मन्त्रियों ने ऋष्यशृंग को लाया, वह सब मैं बताता हूँ; मन्त्रियों सहित मुझसे सुनिए।'

श्लोक 2 (bala.10.2)

रोमपादमुवाचेदं सहामात्यः पुरोहितः । उपायो निरपायोऽयमस्माभिरभिचिन्तितः ।। १०.२ ।।

romapādam uvāca idam saha amātyaḥ purohitaḥ | upāyo nirapāyo ayam asmābhiḥ abhicintitaḥ || 10.2 ||

पुरोहित ने मन्त्रियों के साथ रोमपाद से यह कहा—'यह हमारा भलीभाँति विचारा हुआ, निर्दोष उपाय है।'

श्लोक 3 (bala.10.3)

ऋष्यशृङ्गो वनचरस्तपःस्वाध्यायसंयुतः । अनभिज्ञस्तु नारीणां विषयाणां सुखस्य च ।। १०.३ ।।

ṛṣyaśṛṅgo vanacaraḥ tapaḥ svādhyāya saṃyutaḥ | anabhijñaḥ tu nārīṇām viṣayāṇām sukhasya ca || 10.3 ||

'ऋष्यशृंग वनवासी हैं, तप और स्वाध्याय में सतत लगे हुए हैं; वे स्त्रियों को, विषय-भोगों को अथवा सुख को भी नहीं जानते —'

श्लोक 4 (bala.10.4)

इन्द्रियार्थैरभिमतैर्नरचित्तप्रमाथिभिः । पुरमानाययिष्यामः क्षिप्रं चाध्यवसीयताम् ।। १०.४ ।।

indriyārthaiḥ abhimataiḥ naracitta pramāthibhi | puram ānāyayiṣyāmaḥ kṣipram ca adhyavasīyatām || 10.4 ||

'— मनुष्यों के चित्त को चंचल करने वाले मनोहर विषय-भोगों के द्वारा हम उन्हें नगर में ले आएँगे; इसका शीघ्र निश्चय किया जाए।'

श्लोक 5 (bala.10.5)

गणिकास्तत्र गच्छन्तु रूपवत्यः स्वलंकृताः । प्रलोभ्य विविधोपायैरानेष्यन्तीह सत्कृताः ।। १०.५ ।।

gaṇikāḥ tatra gacchantu rūpavatyaḥ svalaṃkṛtāḥ | pralobhya vividha upāyaiḥ āneṣyanti iha satkṛtāḥ || 10.5 ||

'वहाँ सुन्दर और सुसज्जित गणिकाएँ जाएँ; अनेक उपायों से लुभाकर तथा भलीभाँति पुरस्कृत होकर वे उन्हें यहाँ ले आएँगी।'

श्लोक 6 (bala.10.6)

श्रुत्वा तथेति राजा च प्रत्युवाच पुरोहितम् । पुरोहितो मंत्रिणश्च तथा चक्रुश्च ते तदा ।। १०.६ ।।

śrutvā tathā iti rājā ca pratyuvāca purohitam | purohito maṃtriṇaḥ ca tathā cakruḥ ca te tathā || 10.6 ||

यह सुनकर राजा ने पुरोहित से कहा—'ऐसा ही हो,' और तब पुरोहित तथा मन्त्रियों ने उसी प्रकार वह कार्य किया।

श्लोक 7 (bala.10.7)

वारमुख्यास्तु तच्छ्रुत्वा वनं प्रविविशुर्महत् । आश्रमस्याविदूरेऽस्मिन्यत्नं कुर्वन्ति दर्शने ।। १०.७ ।।

vāramukhyāḥ tu tat śrutvā vanam praviviśuḥ mahat | āśramasya avidūre asmin yatnam kurvanti da^^rśane || 10.7 ||

यह सुनकर वे प्रमुख गणिकाएँ उस विशाल वन में गईं, और उस आश्रम से कुछ ही दूर रहकर मुनि की दृष्टि में आने का प्रयत्न करने लगीं।

श्लोक 8 (bala.10.8)

ऋषेः पुत्रस्य धीरस्य नित्यमाश्रमवासिनः । पितुः स नित्यसंतुष्टो नातिचक्राम चाश्रमात् ।। १०.८ ।।

ṛṣeḥ putrasya dhīrasya nityam āśrama vāsinaḥ | pituḥ sa nitya saṃtuṣṭo na aticakrāma ca āśramāt || 10.8 ||

उस धीर ऋषिपुत्र ने, जो सदा आश्रम में ही रहते थे, अपने पिता से सदा सन्तुष्ट रहकर कभी आश्रम से बाहर पग नहीं रखा।

श्लोक 9 (bala.10.9)

न तेन जन्मप्रभृति दृष्टपूर्वं तपस्विना । स्त्री वा पुमान्वा यच्चान्यत्सत्त्वं नगरराष्ट्रजम् ।। १०.९ ।।

na tena janma prabhṛti dṛṣṭa pūrvam tapasvinā | strī vā pumān vā yacca anyat sattvam nagara rāṣṭrajam || 10.9 ||

उस तपस्वी ने जन्म से लेकर आज तक न कभी किसी स्त्री को देखा था, न किसी पुरुष को, और न ही नगर या राष्ट्र से सम्बद्ध किसी अन्य प्राणी को।

श्लोक 10 (bala.10.10)

ततः कदाचित्तं देशमाजगाम यदृच्छया । विभाण्डकसुतस्तत्र ताश्चापश्यद्वरांगनाः ।। १०.१० ।।

tataḥ kadācit tam deśam ājagāma yadṛcchayā | vibhāṇḍaka sutaḥ tatra tāḥ ca apaśyat varāṃganāḥ || 10.10 ||

तब एक दिन वे संयोगवश उस स्थान पर आ पहुँचे, और वहाँ विभाण्डक-पुत्र ने उन सुन्दरियों को देखा।

श्लोक 11 (bala.10.11)

ताश्चित्रवेषाः प्रमदा गायंत्यो मधुरस्वरम् । ऋषिपुत्रमुपागम्य सर्वा वचनमब्रुवन् ।। १०.११ ।।

tāḥ citra veṣāḥ pramadā gāyaṃtyo madhura svaram | ṛṣi putram upāgaṃya sarvā vacanam abruvan || 10.11 ||

विचित्र वेष धारण किए हुए वे रमणियाँ मधुर स्वर में गाती हुईं ऋषिपुत्र के निकट आकर सभी ने यह वचन कहा —

श्लोक 12 (bala.10.12)

कस्त्वं किं वर्तसे ब्रह्मन् ज्ञातुमिच्छामहे वयम् । एकस्त्वं विजने घोरे वने चरसि शंस नः ।। १०.१२ ।।

kaḥ tvam kim vartase brahman jñātum icchāmahe vayam | ekaḥ tvam vijane dūre vane carasi śaṃsa naḥ || 10.12 ||

'हे ब्रह्मन्, आप कौन हैं और यहाँ कैसे रहते हैं? हम यह जानना चाहती हैं। बताइए, आप इस निर्जन और भयानक वन में अकेले क्यों विचरते हैं?'

श्लोक 13 (bala.10.13)

अदृष्टरूपास्तास्तेन काम्यरूपा वने स्त्रियः । हार्दात्तस्य मतिर्जाता ह्याख्यातुं पितरं स्वकम् ।। १०.१३ ।।

adṛṣṭa rūpāḥ tāḥ tena kāṃya rūpā vane striyaḥ | hārdāt tasya matiḥ jātā akhyātum pitaram svakam || 10.13 ||

उसने ऐसे रूप पहले कभी नहीं देखे थे, क्योंकि वन में वे स्त्रियाँ अत्यन्त कमनीय रूप वाली थीं; और स्नेहवश उसके मन में अपने पिता के विषय में बताने की इच्छा जागी।

श्लोक 14 (bala.10.14)

पिता विभाण्डकोऽस्माकं तस्याहं सुत औरसः । ऋष्यशृङ्ग इति ख्यातं नामकर्म च मे भुवि ।। १०.१४ ।।

pitā vibhāṇḍako asmākam tasya aham suta aurasaḥ | ṛṣyaśṛṅga iti khyātam nāma karma ca me bhuvi || 10.14 ||

'हमारे पिता विभाण्डक हैं, और मैं उन्हीं का औरस पुत्र हूँ। मेरा नाम और मेरे जन्म की कथा इस पृथ्वी पर ऋष्यशृंग के नाम से विख्यात है।'

श्लोक 15 (bala.10.15)

इहाश्रमपदोऽस्माकं समीपे शुभदर्शनाः । करिष्ये वोऽत्र पूजां वै सर्वेषां विधिपूर्वकम् ।। १०.१५ ।।

iha āśrama pado.asmākam samīpe śubha darśanāḥ | kariṣye vo.atra pūjām vai sarveṣām vidhi pūrvakam || 10.15 ||

'यहीं समीप हमारा आश्रम है, हे शुभदर्शना देवियो; मैं वहाँ विधिपूर्वक आप सबकी पूजा करूँगा।'

श्लोक 16 (bala.10.16)

ऋषिपुत्रवचः श्रुत्वा सर्वासां मतिरास वै । तदाश्रमपदं द्रष्टुं जग्मुः सर्वास्ततोऽङ्गनाः ।। १०.१६ ।।

ṛṣi putra vacaḥ śrutvā sarvāsām matirāsa vai | tat āśrama padam draṣṭum jagmuḥ sarvāḥ tato aṃganaḥ || 10.16 ||

ऋषिपुत्र के वचन सुनकर उन सब स्त्रियों के मन में उस आश्रम को देखने की इच्छा जागी, और तब वे सभी रमणियाँ वहाँ चल पड़ीं।

श्लोक 17 (bala.10.17)

गतानां तु ततः पूजां ऋषिपुत्रश्चकार ह । इदमर्घ्यमिदं पाद्यमिदं मूलं फलं च नः ।। १०.१७ ।।

gatānām tu tataḥ pūjām ṛṣi putraḥ cakāra ha | idam arghyam idam pādyam idam mūlam phalam ca naḥ || 10.17 ||

उनके वहाँ पहुँचने पर ऋषिपुत्र ने उनका सत्कार करते हुए कहा—'यह हमारा अर्घ्य है, यह पाद्य है, ये हमारे कन्द हैं और ये फल हैं।'

श्लोक 18 (bala.10.18)

प्रतिगृह्य तु तां पूजां सर्वा एव समुत्सुकाः । ऋषेर्भीताश्च शीघ्रं तु गमनाय मतिं दधुः ।। १०.१८ ।।

pratigṛhya tu tām pūjām sarvā eva samutsukāḥ | ṛṣer bhītāḥ ca śīghram tu gamanāya matim dadhuḥ || 10.18 ||

यद्यपि वे सब उत्सुकतापूर्वक उस सत्कार को ग्रहण करती रहीं, तथापि ऋषि (विभाण्डक) के भय से उन्होंने शीघ्र ही वहाँ से चले जाने का विचार किया।

श्लोक 19 (bala.10.19)

अस्माकमपि मुख्यानि फलानीमानि वै द्विज । गृहाण विप्र भद्रं ते भक्षयस्व च मा चिरम् ।। १०.१९ ।।

asmākam api mukhyāni phalāni imāni he dvija | gṛhāṇa vipra bhadram te bhakṣayasva ca mā aciram || 10.19 ||

'हे द्विज, हमारे भी ये उत्तम फल ग्रहण कीजिए; आपका कल्याण हो, हे विप्र, विलम्ब न करके इन्हें खाइए।'

श्लोक 20 (bala.10.20)

ततस्तास्तं समालिंग्य सर्वा हर्षसमन्विताः । मोदकान्प्रददुस्तस्मै भक्ष्यांश्च विविधान् शुभान् ।। १०.२० ।।

tataḥ tāḥ tam samāliṃgya sarvā harṣa samanvitāḥ | modakān pradaduḥ tasmai bhakṣyām ca vividhān śubhān || 10.20 ||

तब वे सब हर्ष से भरकर उसे आलिंगन करते हुए उसे मोदक तथा नाना प्रकार के उत्तम मिष्ठान्न देने लगीं।

श्लोक 21 (bala.10.21)

तानि चास्वाद्य तेजस्वी फलानीति स्म मन्यते । अनास्वादितपूर्वाणि वने नित्यनिवासिनाम् ।। १०.२१ ।।

tāni ca āsvādya tejasvī phalāni iti sma manyate | anāsvādita pūrvāṇi vane nitya nivāsinām || 10.21 ||

उन्हें चखकर वह तेजस्वी ऋषिकुमार उन्हें फल ही समझने लगा, क्योंकि सदा वन में ही रहने के कारण उसने ऐसी वस्तुओं का स्वाद पहले कभी नहीं चखा था।

श्लोक 22 (bala.10.22)

आपृच्छ्य च तदा विप्रं व्रतचर्यां निवेद्य च । गच्छन्ति स्मापदेशात्ताः भीतास्तस्य पितुः स्त्रियः ।। १०.२२ ।।

āpṛcchya ca tadā vipram vrata caryām nivedya ca | gacchanti sma apadeśāt tā bhītāḥ tasya pituḥ striyaḥ || 10.22 ||

तब उस ब्राह्मण से विदा लेकर और अपने व्रत-आचरण की बात बताकर वे स्त्रियाँ, उसके पिता से भयभीत होकर, उसी बहाने वहाँ से चली गईं।

श्लोक 23 (bala.10.23)

गतासु तासु सर्वासु काश्यपस्यात्मजो द्विजः । अस्वस्थहृदयश्चासीद् दुःखाच्च परिवर्तते ।। १०.२३ ।।

gatāsu tāsu sarvāsu kāśyapasya ātmajo dvijaḥ | asvastha hṛdayaḥ ca āsīt duḥkhāt ca parivartate || 10.23 ||

उन सबके चले जाने पर काश्यप के वंशज उस ब्राह्मण का हृदय अस्वस्थ हो उठा, और वह दुःख से व्याकुल होकर इधर-उधर घूमने लगा।

श्लोक 24 (bala.10.24)

ततोऽपरेद्युस्तं देशमाजगाम स वीर्यवान् । विभाण्डकसुतः श्रीमान्मनसा चिन्तयन्मुहुः ।। १०.२४ ।।

tato.apare dyuḥ tam deśam ājagāma sa vīryavān | vibhāṇḍaka sutaḥ śrīmān manasā vicintayan muhuḥ || 10.24 ||

तब दूसरे दिन वे पराक्रमी और श्रीमान विभाण्डक-पुत्र मन में बार-बार उनका ही चिन्तन करते हुए पुनः उसी स्थान पर आए —

श्लोक 25 (bala.10.25)

मनोज्ञा यत्र ता दृष्टा वारमुख्याः स्वलंकृताः । दृष्टैव च ततो विप्रमायान्तं हृष्टमानसाः ।। १०.२५ ।।

manojñā yatra tā dṛṣṭā vāramukhyāḥ svalaṃkṛtāḥ | dṛṣṭvā eva ca tato vipram āyāntam hṛṣṭa mānasāḥ || 10.25 ||

— जहाँ उन्होंने उन मनोज्ञ, सुसज्जित गणिकाओं को देखा था; और उस ब्राह्मण को आते देखकर वे भी हृदय से प्रसन्न हो उठीं।

श्लोक 26 (bala.10.26)

उपसृत्य ततः सर्वास्तास्तमूचुरिदं वचः । एह्याश्रमपदं सौम्य ह्यस्माकमिति चाब्रुवन् ।। १०.२६ ।।

upasṛtya tataḥ sarvāḥ tāḥ tam ūcur idam vacaḥ | ehi āśrama padam sauṃya asmākam iti ca abruvan || 10.26 ||

तब वे सब निकट आकर उससे यह वचन बोलीं—'हे सौम्य, हमारे आश्रम पर पधारिए,' ऐसा उन्होंने कहा।

श्लोक 27 (bala.10.27)

चित्राण्यत्र बहूनि स्युर्मूलानि च फलनि च । तत्राप्येष विशेषेण विधिर्हि भविता ध्रुवम् ।। १०.२७ ।।

citrāṇi atra bahūni syuḥ mūlāni ca phalani ca | tatra api eṣa viśeṣeṇa vidhiḥ hi bhavitā dhruvam || 10.27 ||

'वहाँ अनेक विचित्र कन्द और फल उपलब्ध हैं, और वहाँ आपका विशेष रूप से आतिथ्य-सत्कार निश्चय ही किया जाएगा।'

श्लोक 28 (bala.10.28)

श्रुत्वा तु वचनं तासां सर्वासां हृदयङ्गमम् । गमनाय मतिं चक्रे तं च निन्युस्तदा स्त्रियः ।। १०.२८ ।।

śrutvā tu vacanam tāsām sarvāsām hṛdayam gamam | gamanāya matim cakre tam ca ninyuḥ tathā striyaḥ || 10.28 ||

उन सबके उन हृदयग्राही वचनों को सुनकर उसने वहाँ जाने का मन बना लिया, और तब वे स्त्रियाँ उसे अपने साथ ले गईं।

श्लोक 29 (bala.10.29)

तत्र चानीयमाने तु विप्रे तस्मिन्महात्मनि । ववर्ष सहसा देवो जगत्प्रह्लादयंस्तदा ।। १०.२९ ।।

tatra ca ānīyamāne tu vipre tasmin mahātmani | vavarṣa sahasā devo jagat prahlādayan tadā || 10.29 ||

उस महात्मा ब्राह्मण के वहाँ लाए जाते समय, संसार को आनन्दित करते हुए वर्षा के देवता ने सहसा वहाँ वर्षा कर दी।

श्लोक 30 (bala.10.30)

वर्षेणैवागतं विप्रं विषयं स्वं नराधिपः । प्रत्युद्गम्य मुनिं प्रह्वः शिरसा च महीं गतः ।। १०.३० ।।

varṣeṇa eva āgatam vipram tāpasam sa narādhipaḥ | prati udgaṃya munim prahvaḥ śirasā ca mahīm gataḥ || 10.30 ||

अपने राज्य में उस ब्राह्मण के वर्षा सहित आगमन पर राजा उस मुनि के स्वागत के लिए आगे बढ़े, विनम्रतापूर्वक मस्तक झुकाकर भूमि तक प्रणाम किया —

श्लोक 31 (bala.10.31)

अर्घ्यं च प्रददौ तस्मै न्यायतः सुसमाहितः । वव्रे प्रसादं विप्रेन्द्रान्मा विप्रं मन्युराविशेत् ।। १०.३१ ।।

arghyam ca pradadau tasmai nyāyataḥ susamāhitaḥ | vavre prasādam vipreindrāt mā vipram manyuḥ āviśet || 10.31 ||

— और सावधानीपूर्वक विधिपूर्वक उन्हें अर्घ्य प्रदान किया, तथा उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से यह वर माँगा कि उनके पिता ब्राह्मण विभाण्डक को कभी क्रोध न आए।

श्लोक 32 (bala.10.32)

अन्तःपुरं प्रविश्यास्मै कन्यां दत्त्वा यथाविधि । शांतां शान्तेन मनसा राजा हर्षमवाप सः ।। १०.३२ ।।

antaḥpuram praveśya asmai kanyām dattvā yathāvidhi | śāṃtām śāntena manasā rājā harṣam avāpa saḥ || 10.32 ||

तब उसे अन्तःपुर में ले जाकर तथा विधिपूर्वक अपनी कन्या शान्ता का विवाह करके, राजा ने शान्त मन से आनन्द प्राप्त किया।

श्लोक 33 (bala.10.33)

एवं स न्यवसत्तत्र सर्वकामैः सुपूजितः । ऋष्यशृङ्गो महातेजाः शन्तया सह भार्यया ।। १०.३३ ।।

evam sa nyavasat tatra sarva kāmaiḥ supūjitaḥ | ṛṣyaśR^ṅgo mahātejā śantāyā saha bhāryayā || 10.33 ||

इस प्रकार वे महातेजस्वी ऋष्यशृंग वहाँ अपनी पत्नी शान्ता के साथ सब प्रकार से सम्मानित होते हुए, अपनी समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हुए निवास करने लगे।

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