बालकाण्ड · सर्ग 11
अयोध्या में ऋष्यशृंग का आगमन
श्लोक 1 (bala.11.1)
भूय एव हि राजेन्द्र शृणु मे वचनं हितम् । यथा स देवप्रवरः कथयामास बुद्धिमान् ॥ 11.1 ॥
bhūya eva hi rājendra śṛṇu me vacanaṃ hitam | yathā sa devapravaraḥ kathayāmāsa buddhimān
“हे राजेन्द्र! मेरी हितकारी बात पुनः सुनिए, जैसी उन बुद्धिमान देवश्रेष्ठ सनत्कुमार ने पूर्वकाल में कहा था।”
श्लोक 2 (bala.11.2)
इक्ष्वाकूणां कुले जातो भविष्यति सुधार्मिकः । नाम्ना दशरथो राजा श्रीमान्सत्यप्रतिश्रवः ॥ 11.2 ॥
ikṣvākūṇāṃ kule jāto bhaviṣyati sudhārmikaḥ | nāmnā daśaratho rājā śrīmānsatyapratiśravaḥ
“इक्ष्वाकु वंश में एक अत्यंत धर्मपरायण राजा जन्म लेगा, जिसका नाम दशरथ होगा — वह तेजस्वी होगा और अपनी प्रतिज्ञा में सदैव सत्यवादी रहेगा।”
श्लोक 3 (bala.11.3)
अङ्गराजेन सख्यं च तस्य राज्ञो भविष्यति । कन्या चास्य महाभागा शांता नाम भविष्यति ॥ 11.3 ॥
aṅgarājena sakhyaṃ ca tasya rājño bhaviṣyati | kanyā cāsya mahābhāgā śāṃtā nāma bhaviṣyati
“उस राजा की अंगराज से मित्रता होगी, और अंगराज को शांता नामक एक परम सौभाग्यशालिनी कन्या प्राप्त होगी।”
श्लोक 4 (bala.11.4)
पुत्रस्तु सोऽङ्गराजस्य रोमपाद इति श्रुतः । तं स राजा दशरथो गमिष्यति महायशाः ॥ 11.4 ॥
putrastu so'ṅgarājasya romapāda iti śrutaḥ | taṃ sa rājā daśaratho gamiṣyati mahāyaśāḥ
“उस अंगराज के पुत्र का नाम रोमपाद होगा; और वहां वह यशस्वी राजा दशरथ स्वयं जाएंगे।”
श्लोक 5 (bala.11.5)
अनपत्योऽस्मि धर्मात्मन् शांताभर्ता मम क्रतुम् । आहरेत त्वयाज्ञप्तः संतानार्थं कुलस्य च ॥ 11.5 ॥
anapatyo'smi dharmātman śāṃtābhartā mama kratum | āhareta tvayājñaptaḥ saṃtānārthaṃ kulasya ca
“हे धर्मात्मन्! मैं संतानहीन हूँ; आपकी आज्ञा से शांता के पति मेरे कुल की संतान-प्राप्ति हेतु वह यज्ञ संपन्न करें।”
श्लोक 6 (bala.11.6)
श्रुत्वा राज्ञोऽथ तद्वाक्यं मनसा स विचिंत्य च । प्रदास्यते पुत्रवन्तं शांताभर्तारमात्मवान् ॥ 11.6 ॥
śrutvā rājño'tha tadvākyaṃ manasā sa viciṃtya ca | pradāsyate putravantaṃ śāṃtābhartāramātmavān
राजा की यह बात सुनकर मन में विचार कर वे बुद्धिमान रोमपाद अपनी पुत्री शांता को उसके पति सहित भेजने हेतु सहमत हो जाएंगे।
श्लोक 7 (bala.11.7)
प्रतिगृह्य च तं विप्रं स राजा विगतज्वरः । आहरिष्यति तं यज्ञं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ 11.7 ॥
pratigṛhya ca taṃ vipraṃ sa rājā vigatajvaraḥ | āhariṣyati taṃ yajñaṃ prahṛṣṭenāntarātmanā
उस ब्राह्मण को ग्रहण कर वह राजा अपनी चिंता से मुक्त होकर प्रसन्न अंतःकरण से उस यज्ञ को संपन्न करेंगे।
श्लोक 8 (bala.11.8)
तं च राजा दशरथो यष्टुकामः कृतांजलिः । ऋष्यशृङ्गं द्विजश्रेष्ठं वरयिष्यति धर्मवित् ॥ 11.8 ॥
taṃ ca rājā daśaratho yaṣṭukāmaḥ kṛtāṃjaliḥ | ṛṣyaśṛṅgaṃ dvijaśreṣṭhaṃ varayiṣyati dharmavit
यज्ञ करने के इच्छुक धर्मज्ञ राजा दशरथ हाथ जोड़कर द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग को आमंत्रित करेंगे।
श्लोक 9 (bala.11.9)
यज्ञार्थं प्रसवार्थं च स्वर्गार्थं च नरेश्वरः । लभते च स तं कामं द्विजमुख्याद्विशांपतिः ॥ 11.9 ॥
yajñārthaṃ prasavārthaṃ ca svargārthaṃ ca nareśvaraḥ | labhate ca sa taṃ kāmaṃ dvijamukhyādviśāṃpatiḥ
यज्ञ, संतान और स्वर्ग-प्राप्ति के लिए वह नरेश्वर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के द्वारा अपनी मनोकामना पूर्ण करेंगे।
श्लोक 10 (bala.11.10)
पुत्राश्चास्य भविष्यन्ति चत्वारोऽमितविक्रमाः । वंशप्रतिष्ठानकराः सर्वभूतेषु विश्रुताः ॥ 11.10 ॥
putrāścāsya bhaviṣyanti catvāro'mitavikramāḥ | vaṃśapratiṣṭhānakarāḥ sarvabhūteṣu viśrutāḥ
उसके अपार पराक्रमी चार पुत्र होंगे, जो वंश की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाले और समस्त प्राणियों में विख्यात होंगे।
श्लोक 11 (bala.11.11)
एवं स देवप्रवरः पूर्वं कथितवान्कथाम् । सनत्कुमारो भगवान्पुरा देवयुगे प्रभुः ॥ 11.11 ॥
evaṃ sa devapravaraḥ pūrvaṃ kathitavānkathām | sanatkumāro bhagavānpurā devayuge prabhuḥ
इस प्रकार देवताओं में श्रेष्ठ भगवान सनत्कुमार ने पूर्वकाल में, देवयुग में, यह कथा सुनाई थी।
श्लोक 12 (bala.11.12)
स त्वं पुरुषशार्दूल तमानय सुसत्कृतम् । स्वयमेव महाराज गत्वा सबलवाहनः ॥ 11.12 ॥
sa tvaṃ puruṣaśārdūla tamānaya susatkṛtam | svayameva mahārāja gatvā sabalavāhanaḥ
“अतः हे पुरुषश्रेष्ठ महाराज! आप स्वयं सेना और वाहन सहित वहां जाकर उन्हें सम्मानपूर्वक यहाँ ले आइए।”
श्लोक 13 (bala.11.13)
सुमंत्रस्य वचः श्रुत्वा हृष्टो दशरथोऽभवत् । अनुमान्य वसिष्ठं च सूतवाक्यं निशम्य च ॥ 11.13 ॥
sumaṃtrasya vacaḥ śrutvā hṛṣṭo daśaratho'bhavat | anumānya vasiṣṭhaṃ ca sūtavākyaṃ niśamya ca
सुमंत्र की यह बात सुनकर दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए, और वसिष्ठ से परामर्श कर तथा सूत के वचन पर विचार कर—
श्लोक 14 (bala.11.14)
सान्तःपुरः सहामात्यः प्रययौ यत्र स द्विजः । वनानि सरितश्चैव व्यतिक्रम्य शनैः शनैः ॥ 11.14 ॥
sāntaḥpuraḥ sahāmātyaḥ prayayau yatra sa dvijaḥ | vanāni saritaścaiva vyatikramya śanaiḥ śanaiḥ
—वे अपनी रानियों और मंत्रियों सहित उस स्थान की ओर चल पड़े जहाँ वह ब्राह्मण रहते थे, धीरे-धीरे वनों और नदियों को पार करते हुए।
श्लोक 15 (bala.11.15)
अभिचक्राम तं देशं यत्र वै मुनिपुंगवः । आसाद्य तं द्विजश्रेष्ठं रोमपादसमीपगम् ॥ 11.15 ॥
abhicakrāma taṃ deśaṃ yatra vai munipuṃgavaḥ | āsādya taṃ dvijaśreṣṭhaṃ romapādasamīpagam
वे उस देश में पहुंचे जहाँ वे श्रेष्ठ मुनि निवास करते थे, और रोमपाद के समीप रहने वाले उन द्विजश्रेष्ठ के पास गए।
श्लोक 16 (bala.11.16)
ऋषिपुत्रं ददर्शाथो दीप्यमानमिवानलम् । ततो राजा यथायोग्यं पूजां चक्रे विशेषतः ॥ 11.16 ॥
ṛṣiputraṃ dadarśātho dīpyamānamivānalam | tato rājā yathāyogyaṃ pūjāṃ cakre viśeṣataḥ
वहाँ उन्होंने ऋषिपुत्र को प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी देखा, और राजा ने विशेष रूप से उनका यथोचित सम्मान किया।
श्लोक 17 (bala.11.17)
सखित्वात्तस्य वै राज्ञः प्रहृष्टेनान्तरात्मना । रोमपादेन चाख्यातमृषिपुत्राय धीमते ॥ 11.17 ॥
sakhitvāttasya vai rājñaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā | romapādena cākhyātamṛṣiputrāya dhīmate
उस राजा के साथ मित्रता के कारण अत्यंत प्रसन्न हृदय से रोमपाद ने बुद्धिमान ऋषिपुत्र को यह समाचार दिया—
श्लोक 18 (bala.11.18)
सख्यं संबन्धकं चैव तदा तं प्रत्यपूजयत् । एवं सुसत्कृतस्तेन सहोषित्वा नरर्षभः ॥ 11.18 ॥
sakhyaṃ saṃbandhakaṃ caiva tadā taṃ pratyapūjayat | evaṃ susatkṛtastena sahoṣitvā nararṣabhaḥ
—मित्रता और संबंध की बात; तब ऋषिपुत्र ने भी दशरथ का सत्कार किया। इस प्रकार सम्मानित होकर वह नरश्रेष्ठ दशरथ रोमपाद के साथ रहे—
श्लोक 19 (bala.11.19)
सप्ताष्टदिवसान् राजा राजानमिदमब्रवीत् । शांता तव सुता राजन् सह भर्त्रा विशांपते ॥ 11.19 ॥
saptāṣṭadivasān rājā rājānamidamabravīt | śāṃtā tava sutā rājan saha bhartrā viśāṃpate
—सात-आठ दिनों तक; तत्पश्चात राजा दशरथ ने राजा रोमपाद से कहा: “हे राजन्! हे प्रजापालक! आपकी पुत्री शांता अपने पति सहित—”
श्लोक 20 (bala.11.20)
मदीयं नगरं यातु कार्यं हि महदुद्यतम् । तथेति राजा संश्रुत्य गमनं तस्य धीमतः ॥ 11.20 ॥
madīyaṃ nagaraṃ yātu kāryaṃ hi mahadudyatam | tatheti rājā saṃśrutya gamanaṃ tasya dhīmataḥ
—मेरे नगर चलें, क्योंकि एक महान कार्य संपन्न होने वाला है।” “ऐसा ही हो,” कहकर राजा ने उन बुद्धिमान ऋषिपुत्र के प्रस्थान की सहमति देकर—
श्लोक 21 (bala.11.21)
उवाच वचनं विप्रं गच्छ त्वं सह भार्यया । ऋषिपुत्रः प्रतिश्रुत्य तथेत्याह नृपं तदा ॥ 11.21 ॥
uvāca vacanaṃ vipraṃ gaccha tvaṃ saha bhāryayā | ṛṣiputraḥ pratiśrutya tathetyāha nṛpaṃ tadā
—उस ब्राह्मण से कहा: “तुम अपनी पत्नी सहित जाओ।” ऋषिपुत्र ने भी स्वीकार करते हुए राजा से कहा “एसा ही होगा।”
श्लोक 22 (bala.11.22)
स नृपेणाभ्यनुज्ञातः प्रययौ सह भार्यया । तावन्योन्यांजलिं कृत्वा स्नेहात्संश्लिष्य चोरसा ॥ 11.22 ॥
sa nṛpeṇābhyanujñātaḥ prayayau saha bhāryayā | tāvanyonyāṃjaliṃ kṛtvā snehātsaṃśliṣya corasā
राजा की अनुमति पाकर वे अपनी पत्नी सहित चल पड़े। तब दोनों राजाओं ने परस्पर हाथ जोड़कर तथा स्नेहवश एक-दूसरे को हृदय से लगाकर—
श्लोक 23 (bala.11.23)
ननंदतुर्दशरथो रोमपादश्च वीर्यवान् । ततः सुहृदमापृच्छ्य प्रस्थितो रघुनन्दनः ॥ 11.23 ॥
nanaṃdaturdaśaratho romapādaśca vīryavān | tataḥ suhṛdamāpṛcchya prasthito raghunandanaḥ
—दशरथ और पराक्रमी रोमपाद दोनों अत्यंत हर्षित हुए। तत्पश्चात अपने मित्र से विदा लेकर रघुकुलनंदन दशरथ प्रस्थान कर गए।
श्लोक 24 (bala.11.24)
पौरेभ्यः प्रेषयामास दूतान्वै शीघ्रगामिनः । क्रियतां नगरं सर्वं क्षिप्रमेव स्वलंकृतम् ॥ 11.24 ॥
paurebhyaḥ preṣayāmāsa dūtānvai śīghragāminaḥ | kriyatāṃ nagaraṃ sarvaṃ kṣiprameva svalaṃkṛtam
उन्होंने नगरवासियों के पास वेगवान दूत भेजे, यह आदेश देते हुए कि “सम्पूर्ण नगर शीघ्र ही भलीभाँति सजाया जाए—”
श्लोक 25 (bala.11.25)
धूपितं सिक्तसम्मृष्टं पताकाभिरलंकृतम् । ततः प्रहृष्टाः पौरास्ते श्रुत्वा राजानमागतम् ॥ 11.25 ॥
dhūpitaṃ siktasammṛṣṭaṃ patākābhiralaṃkṛtam | tataḥ prahṛṣṭāḥ paurāste śrutvā rājānamāgatam
—धूप से सुगंधित, जल से सिंचित एवं स्वच्छ बनाकर, पताकाओं से अलंकृत किया जाए।” राजा के आगमन का समाचार सुनकर हर्षित नगरवासियों ने—
श्लोक 26 (bala.11.26)
तथा प्रचक्रुस्तत्सर्वं राज्ञा यत्प्रेषितं तदा । ततः स्वलंकृतं राजा नगरं प्रविवेश ह ॥ 11.26 ॥
tathā pracakrustatsarvaṃ rājñā yatpreṣitaṃ tadā | tataḥ svalaṃkṛtaṃ rājā nagaraṃ praviveśa ha
—राजा द्वारा भेजे गए उस समस्त आदेश का पालन किया। तत्पश्चात राजा ने उस सुसज्जित नगर में प्रवेश किया।
श्लोक 27 (bala.11.27)
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैः पुरस्कृत्य द्विजर्षभम् । ततः प्रमुदिताः सर्वे दृष्ट्वा तं नागरा द्विजम् ॥ 11.27 ॥
śaṅkhadundubhinirghoṣaiḥ puraskṛtya dvijarṣabham | tataḥ pramuditāḥ sarve dṛṣṭvā taṃ nāgarā dvijam
शंख और दुंदुभियों की ध्वनि के बीच द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग को आगे कर राजा नगर में प्रविष्ट हुए; और उन ब्राह्मण को देखकर समस्त नगरवासी अत्यंत हर्षित हुए—
श्लोक 28 (bala.11.28)
प्रवेश्यमानं सत्कृत्य नरेन्द्रेणेन्द्रकर्मणा । यथा दिवि सुरेन्द्रेण सहस्राक्षेण काश्यपम् ॥ 11.28 ॥
praveśyamānaṃ satkṛtya narendreṇendrakarmaṇā | yathā divi surendreṇa sahasrākṣeṇa kāśyapam
—क्योंकि इंद्र के समान पराक्रमी राजा दशरथ उनका सत्कार करते हुए उन्हें नगर में ला रहे थे — ठीक वैसे ही जैसे स्वर्ग में सहस्रनेत्रधारी इंद्र कश्यप मुनि का सम्मान करते हैं।
श्लोक 29 (bala.11.29)
अन्तःपुरं प्रवेश्यैनं पूजां कृत्वा च शास्त्रतः । कृतकृत्यं तदात्मानं मेने तस्योपवाहनात् ॥ 11.29 ॥
antaḥpuraṃ praveśyainaṃ pūjāṃ kṛtvā ca śāstrataḥ | kṛtakṛtyaṃ tadātmānaṃ mene tasyopavāhanāt
उन्हें अंतःपुर में ले जाकर शास्त्रविधि से उनकी पूजा की; और उन्हें वहाँ लाकर ही दशरथ ने स्वयं को कृतकृत्य माना।
श्लोक 30 (bala.11.30)
अन्तःपुरस्त्रियः सर्वाः शांतां दृष्ट्वा तथागताम् । सह भर्त्रा विशालाक्षीं प्रीत्यानंदमुपागमन् ॥ 11.30 ॥
antaḥpurastriyaḥ sarvāḥ śāṃtāṃ dṛṣṭvā tathāgatām | saha bhartrā viśālākṣīṃ prītyānaṃdamupāgaman
अंतःपुर की समस्त स्त्रियाँ अपने पति सहित आई हुई उन विशाललोचना शांता को देखकर स्नेहपूर्ण आनंद से भर उठीं।
श्लोक 31 (bala.11.31)
पूज्यमाना तु ताभिः सा राज्ञा चैव विशेषतः । उवास तत्र सुखिता कञ्चित्कालं सहर्त्विजा ॥ 11.31 ॥
pūjyamānā tu tābhiḥ sā rājñā caiva viśeṣataḥ | uvāsa tatra sukhitā kañcitkālaṃ sahartvijā
उन सबके द्वारा और विशेष रूप से राजा के द्वारा सम्मानित होकर, शांता अपने ऋत्विक् पति के साथ वहाँ कुछ समय तक सुखपूर्वक रहीं।