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बालकाण्ड · सर्ग 12

यज्ञ की तैयारी

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श्लोक 1 (bala.12.1)

ततः काले बहुतिथे कस्मिंश्चित्सुमनोहरे । वसन्ते समनुप्राप्ते राज्ञो यष्टुं मनोऽभवत् ॥ 12.1 ॥

tataḥ kāle bahutithe kasmiṃścitsumanohare | vasante samanuprāpte rājño yaṣṭuṃ mano'bhavat

इसके पश्चात, कुछ समय बीतने पर, जब एक अत्यंत मनोहर वसंत ऋतु आई, राजा का मन यज्ञ करने की ओर प्रवृत्त हुआ।

श्लोक 2 (bala.12.2)

ततः प्रसाद्य शिरसा तं विप्रं देववर्णिनम् । यज्ञाय वरयामास संतानार्थं कुलस्य च ॥ 12.2 ॥

tataḥ prasādya śirasā taṃ vipraṃ devavarṇinam | yajñāya varayāmāsa saṃtānārthaṃ kulasya ca

तत्पश्चात सिर झुकाकर उन देवतुल्य ब्राह्मण ऋष्यशृंग को प्रसन्न कर, संतान और कुल की निरंतरता हेतु उन्हें यज्ञ के लिए चुना।

श्लोक 3 (bala.12.3)

तथेति च स राजानमुवाच च सुसत्कृतः । संभाराः संभ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम् ॥ 12.3 ॥

tatheti ca sa rājānamuvāca ca susatkṛtaḥ | saṃbhārāḥ saṃbhriyantāṃ te turagaśca vimucyatām

‘ऐसा ही हो,’ सम्मानित ऋषि ने राजा से कहा। ‘यज्ञ-सामग्री एकत्र की जाए और आपका यज्ञ-अश्व मुक्त छोड़ा जाए।’

श्लोक 4 (bala.12.4)

सरव्याश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम् । ततो नृपोऽब्रवीद्वाक्यं सुमन्त्रं मन्त्रिसत्तमम् ॥ 12.4 ॥

saravyāścottare tīre yajñabhūmirvidhīyatām | tato nṛpo'bravīdvākyaṃ sumantraṃ mantrisattamam

‘और सरयू के उत्तरी तट पर यज्ञभूमि तैयार की जाए।’ तत्पश्चात राजा ने मंत्रिश्रेष्ठ सुमंत्र से कहा:

श्लोक 5 (bala.12.5)

सुमंत्रावाहय क्षिप्रमृत्विजो ब्रह्मवादिनः । सुयज्ञं वामदेवं च जाबालिमथ काश्यपम् ॥ 12.5 ॥

sumaṃtrāvāhaya kṣipramṛtvijo brahmavādinaḥ | suyajñaṃ vāmadevaṃ ca jābālimatha kāśyapam

‘हे सुमंत्र! शीघ्र ही ब्रह्मवादी ऋत्विजों — सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि और कश्यप को बुलाओ,’

श्लोक 6 (bala.12.6)

पुरोहितं वसिष्ठं च ये चान्ये द्विजसत्तमाः । ततः सुमंत्रस्त्वरितं गत्वा त्वरितविक्रमः ॥ 12.6 ॥

purohitaṃ vasiṣṭhaṃ ca ye cānye dvijasattamāḥ | tataḥ sumaṃtrastvaritaṃ gatvā tvaritavikramaḥ

—तथा पुरोहित वसिष्ठ एवं अन्य जो भी श्रेष्ठ द्विज हों, उन्हें भी बुलाओ।’ तब वेगवान सुमंत्र शीघ्रता से जाकर

श्लोक 7 (bala.12.7)

समानयत्स तान्सर्वान् समस्तान्वेदपारगान् । तान् पूजयित्वा धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा ॥ 12.7 ॥

samānayatsa tānsarvān samastānvedapāragān | tān pūjayitvā dharmātmā rājā daśarathastadā

उन सभी वेदपारंगत विद्वानों को साथ ले आए। उन सबका सम्मान कर धर्मात्मा राजा दशरथ ने तब

श्लोक 8 (bala.12.8)

धर्मार्थसहितं युक्तं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत् । मम लालप्यमानस्य पुत्रार्थं नास्ति वै सुखम् ॥ 12.8 ॥

dharmārthasahitaṃ yuktaṃ ślakṣṇaṃ vacanamabravīt | mama lālapyamānasya putrārthaṃ nāsti vai sukham

धर्म और अर्थ से युक्त सौम्य वचन कहे: ‘पुत्र की कामना से व्याकुल मुझे कोई सुख नहीं मिलता।’

श्लोक 9 (bala.12.9)

तदर्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम । तदहं यष्टुमिच्छामि शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ 12.9 ॥

tadarthaṃ hayamedhena yakṣyāmīti matirmama | tadahaṃ yaṣṭumicchāmi śāstradṛṣṭena karmaṇā

‘इसी हेतु मैंने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया है। अतः मैं शास्त्रविधि के अनुसार उसे संपन्न करना चाहता हूँ।’

श्लोक 10 (bala.12.10)

ऋषिपुत्रप्रभावेण कामान्प्राप्स्यामि चाप्यहम् । ततः साध्विति तद्वाक्यं ब्राह्मणाः प्रत्यपूजयन् ॥ 12.10 ॥

ṛṣiputraprabhāveṇa kāmānprāpsyāmi cāpyaham | tataḥ sādhviti tadvākyaṃ brāhmaṇāḥ pratyapūjayan

‘और ऋषिपुत्र ऋष्यशृंग के प्रभाव से मैं अपनी कामना अवश्य प्राप्त करूँगा।’ तब ब्राह्मणों ने ‘उत्तम है, उत्तम है’ कहकर उस वचन की सराहना की।

श्लोक 11 (bala.12.11)

वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे पार्थिवस्य मुखाच्च्युतम् । ऋष्यशृङ्गपुरोगाश्च प्रत्यूचुर्नृपतिं तदा ॥ 12.11 ॥

vasiṣṭhapramukhāḥ sarve pārthivasya mukhāccyutam | ṛṣyaśṛṅgapurogāśca pratyūcurnṛpatiṃ tadā

वसिष्ठ आदि सभी ने राजा के मुख से निकले उन वचनों की सराहना की; और ऋष्यशृंग को आगे रखकर उन्होंने राजा को उत्तर दिया:

श्लोक 12 (bala.12.12)

संभाराः संभ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम् । सरव्याश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम् ॥ 12.12 ॥

saṃbhārāḥ saṃbhriyantāṃ te turagaśca vimucyatām | saravyāścottare tīre yajñabhūmirvidhīyatām

‘यज्ञ-सामग्री एकत्र की जाए, यज्ञ-अश्व को मुक्त छोड़ा जाए; तथा सरयू के उत्तरी तट पर यज्ञभूमि तैयार की जाए।’

श्लोक 13 (bala.12.13)

सर्वथा प्राप्यसे पुत्रांश्चतुरोऽमितविक्रमान् । यस्य ते धार्मिकी बुद्धिरियं पुत्रार्थमागता ॥ 12.13 ॥

sarvathā prāpyase putrāṃścaturo'mitavikramān | yasya te dhārmikī buddhiriyaṃ putrārthamāgatā

‘आपको निश्चय ही अपार पराक्रमी चार पुत्र प्राप्त होंगे, क्योंकि संतान हेतु यह धर्मपूर्ण संकल्प आपके मन में उदित हुआ है।’

श्लोक 14 (bala.12.14)

ततः प्रीतोऽभवद्राजा श्रुत्वा तत् द्विजभाषितम् । अमात्यांश्चाब्रवीद्राजा हर्षेणेदं शुभाक्षरम् ॥ 12.14 ॥

tataḥ prīto'bhavadrājā śrutvā tat dvijabhāṣitam | amātyāṃścābravīdrājā harṣeṇedaṃ śubhākṣaram

ब्राह्मणों के इन वचनों को सुनकर राजा अत्यंत प्रसन्न हुए; और हर्षपूर्वक उन्होंने अपने मंत्रियों से यह शुभ वचन कहा।

श्लोक 15 (bala.12.15)

गुरूणां वचनाच्छीघ्रं संभाराः संभ्रियन्तु मे । समर्थाधिष्ठितश्चाश्वः सोपाध्यायो विमुच्यताम् ॥ 12.15 ॥

gurūṇāṃ vacanācchīghraṃ saṃbhārāḥ saṃbhriyantu me | samarthādhiṣṭhitaścāśvaḥ sopādhyāyo vimucyatām

‘गुरुजनों के वचन के अनुसार मेरे लिए शीघ्र ही सामग्री एकत्र की जाए; और समर्थ पुरुषों की रक्षा में तथा आचार्यों सहित यज्ञ-अश्व को मुक्त छोड़ा जाए।’

श्लोक 16 (bala.12.16)

सरयव्याश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम् । शांतयश्चाभिवर्धन्तां यथाकल्पं यथाविधि ॥ 12.16 ॥

sarayavyāścottare tīre yajñabhūmirvidhīyatām | śāṃtayaścābhivardhantāṃ yathākalpaṃ yathāvidhi

‘सरयू के उत्तरी तट पर यज्ञभूमि तैयार की जाए, और शांति-कर्म विधिपूर्वक तथा नियमानुसार बढ़ाए जाएँ।’

श्लोक 17 (bala.12.17)

शक्यः कर्तुमयं यज्ञः सर्वेणापि महीक्षिता । नापराधो भवेत्कष्टो यद्यस्मिन् क्रतुसत्तमे ॥ 12.17 ॥

śakyaḥ kartumayaṃ yajñaḥ sarveṇāpi mahīkṣitā | nāparādho bhavetkaṣṭo yadyasmin kratusattame

‘यह यज्ञ किसी भी समर्थ राजा द्वारा संपन्न किया जा सकता है; किंतु इस श्रेष्ठतम यज्ञ में कोई गंभीर त्रुटि न हो।’

श्लोक 18 (bala.12.18)

छिद्रं हि मृगयन्तेऽत्र विद्वांसो ब्रह्मराक्षसाः । विघ्नितस्य हि यज्ञस्य सद्यः कर्ता विनश्यति ॥ 12.18 ॥

chidraṃ hi mṛgayante'tra vidvāṃso brahmarākṣasāḥ | vighnitasya hi yajñasya sadyaḥ kartā vinaśyati

‘क्योंकि विद्वान ब्रह्मराक्षस यहाँ छिद्र (त्रुटि) ढूँढ़ते रहते हैं; और यदि यज्ञ में विघ्न पड़ जाए तो उसका कर्ता तत्काल नष्ट हो जाता है।’

श्लोक 19 (bala.12.19)

तद्यथा विधिपूर्वं मे क्रतुरेष समाप्यते । तथा विधानं क्रियतां समर्थाः करणेष्विह ॥ 12.19 ॥

tadyathā vidhipūrvaṃ me kratureṣa samāpyate | tathā vidhānaṃ kriyatāṃ samarthāḥ karaṇeṣviha

‘अतः ऐसी व्यवस्था की जाए कि मेरा यह यज्ञ विधिपूर्वक संपन्न हो; और यहाँ प्रत्येक कार्य में समर्थ पुरुष नियुक्त किए जाएँ।’

श्लोक 20 (bala.12.20)

तथेति च ततः सर्वे मंत्रिणः प्रत्यपूजयन् । पार्थिवेन्द्रस्य तद्वाक्यं यथाज्ञप्तमकुर्वत ॥ 12.20 ॥

tatheti ca tataḥ sarve maṃtriṇaḥ pratyapūjayan | pārthivendrasya tadvākyaṃ yathājñaptamakurvata

‘ऐसा ही होगा,’ कहकर सभी मंत्रियों ने राजाधिराज के उस वचन का सम्मान किया; और उन्होंने उसे यथाआज्ञा पूर्ण किया।

श्लोक 21 (bala.12.21)

ततो द्विजास्ते धर्मज्ञमस्तुवन्पार्थिवर्षभम् । अनुज्ञातास्ततः सर्वे पुनर्जग्मुर्यथागतम् ॥ 12.21 ॥

tato dvijāste dharmajñamastuvanpārthivarṣabham | anujñātāstataḥ sarve punarjagmuryathāgatam

तब उन ब्राह्मणों ने धर्मज्ञ नरश्रेष्ठ राजा की प्रशंसा की; और अनुमति पाकर वे सभी जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

श्लोक 22 (bala.12.22)

गतेष्वथ द्विजाग्र्येषु मंत्रिणस्तान्नराधिपः । विसर्जयित्वा स्वं वेश्म प्रविवेश महाद्युतिः ॥ 12.22 ॥

gateṣvatha dvijāgryeṣu maṃtriṇastānnarādhipaḥ | visarjayitvā svaṃ veśma praviveśa mahādyutiḥ

उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों के जाने पर राजा ने अपने मंत्रियों को भी विदा किया, और वह महातेजस्वी नरेश अपने भवन में प्रविष्ट हुए।

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