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बालकाण्ड · सर्ग 16

दिव्य पायस

सर्ग 15सर्ग-सूचीसर्ग 17

श्लोक 1 (bala.16.1)

ततो नारायणो विष्णुः नियुक्तः सुरसत्तमैः । जानन्नपि सुरानेवं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

tato nārāyaṇo viṣṇuḥ niyuktaḥ surasattamaiḥ | jānannapi surānevaṃ ślakṣṇaṃ vacanamabravīt

तब देवताओं में श्रेष्ठ देवगणों द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर भगवान नारायण विष्णु ने, सब कुछ पहले से जानते हुए भी, उनसे कोमल वचन कहे।

श्लोक 2 (bala.16.2)

उपायः को वधे तस्य राक्षसाधिपतेः सुराः । यमहं तं समास्थाय निहन्यामृषिकण्टकम् ॥ २ ॥

upāyaḥ ko vadhe tasya rākṣasādhipateḥ surāḥ | yamahaṃ taṃ samāsthāya nihanyāmṛṣikaṇṭakam

"हे देवगण! उस राक्षसराज के वध का क्या उपाय है, जिसे अपनाकर मैं ऋषियों के इस कंटक को नष्ट कर सकूँ?"

श्लोक 3 (bala.16.3)

एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्विष्णुमव्ययम् । मानुषं रूपमास्थाय रावणं जहि संयुगे ॥ ३ ॥

evamuktāḥ surāḥ sarve pratyūcurviṣṇumavyayam | mānuṣaṃ rūpamāsthāya rāvaṇaṃ jahi saṃyuge

यह सुनकर सभी देवताओं ने अविनाशी विष्णु से कहा, "मनुष्य रूप धारण करके युद्ध में रावण का वध कीजिए।"

श्लोक 4 (bala.16.4)

स हि तेपे तपस्तीव्रं दीर्घकालमरिंदम । येन तुष्टोऽभवद्ब्रह्मा लोककृल्लोकपूर्वजः ॥ ४ ॥

sa hi tepe tapastīvraṃ dīrghakālamariṃdama | yena tuṣṭo'bhavadbrahmā lokakṛllokapūrvajaḥ

"हे शत्रुदमन! उस रावण ने दीर्घकाल तक घोर तप किया, जिससे लोकों के रचयिता और सबसे पहले उत्पन्न ब्रह्मा उससे प्रसन्न हो गए।"

श्लोक 5 (bala.16.5)

सन्तुष्टः प्रददौ तस्मै राक्षसाय वरं प्रभुः । नानाविधेभ्यो भूतेभ्यो भयं नान्यत्र मानुषात् ॥ ५ ॥

santuṣṭaḥ pradadau tasmai rākṣasāya varaṃ prabhuḥ | nānāvidhebhyo bhūtebhyo bhayaṃ nānyatra mānuṣāt

प्रसन्न होकर प्रभु ब्रह्मा ने उस राक्षस को यह वरदान दिया कि उसे मनुष्य के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार के प्राणी से भय न हो।

श्लोक 6 (bala.16.6)

अवज्ञाताः पुरा तेन वरदाने हि मानवाः । एवं पितामहात्तस्माद्वरदानेन गर्वितः ॥ ६ ॥

avajñātāḥ purā tena varadāne hi mānavāḥ | evaṃ pitāmahāttasmādvaradānena garvitaḥ

वरदान माँगते समय रावण ने मनुष्यों को तुच्छ समझा था; इस प्रकार पितामह ब्रह्मा के उस वरदान से घमंडी होकर,

श्लोक 7 (bala.16.7)

उत्सादयति लोकांस्त्रीन् स्त्रियश्चाप्यपकर्षति । तस्मात्तस्य वधो दृष्टो मानुषेभ्यः परन्तप ॥ ७ ॥

utsādayati lokāṃstrīn striyaścāpyapakarṣati | tasmāttasya vadho dṛṣṭo mānuṣebhyaḥ parantapa

वह अब तीनों लोकों को पीड़ित करता है और स्त्रियों का अपहरण करता है। इसलिए, हे शत्रुसंतापी! उसका वध मनुष्य के हाथों ही निश्चित हुआ है।

श्लोक 8 (bala.16.8)

इत्येतद्वचनं श्रुत्वा सुराणां विष्णुरात्मवान् । पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम् ॥ ८ ॥

ityetadvacanaṃ śrutvā surāṇāṃ viṣṇurātmavān | pitaraṃ rocayāmāsa tadā daśarathaṃ nṛpam

देवताओं के इस वचन को सुनकर आत्मसंयमी भगवान विष्णु ने उस समय राजा दशरथ को अपने पिता के रूप में चुना।

श्लोक 9 (bala.16.9)

स चाप्यपुत्रो नृपतिस्तस्मिन् काले महाद्युतिः । अयजत् पुत्रियामिष्टिं पुत्रेप्सुररिसूदनः ॥ ९ ॥

sa cāpyaputro nṛpatistasmin kāle mahādyutiḥ | ayajat putriyāmiṣṭiṃ putrepsurarisūdanaḥ

उसी समय वह परम तेजस्वी और शत्रुनाशक राजा, जो पुत्रहीन था, पुत्र पाने की कामना से पुत्रकामेष्टि यज्ञ कर रहा था।

श्लोक 10 (bala.16.10)

स कृत्वा निश्चयं विष्णुरामन्त्र्य च पितामहम् । अन्तर्धानं गतो देवैः पूज्यमानो महर्षिभिः ॥ १० ॥

sa kṛtvā niścayaṃ viṣṇurāmantrya ca pitāmaham | antardhānaṃ gato devaiḥ pūjyamāno maharṣibhiḥ

यह निश्चय करके विष्णु ने पितामह ब्रह्मा से विदा ली और देवताओं तथा महर्षियों द्वारा पूजित होते हुए अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 11 (bala.16.11)

ततो वै यजमानस्य पावकादतुलप्रभम् । प्रादुर्भूतं महद्भूतं महावीर्यं महाबलम् ॥ ११ ॥

tato vai yajamānasya pāvakādatulaprabham | prādurbhūtaṃ mahadbhūtaṃ mahāvīryaṃ mahābalam

तत्पश्चात् यजमान की उस यज्ञाग्नि से अनुपम तेजवाला, महान बलशाली और पराक्रमी एक महान प्राणी प्रकट हुआ।

श्लोक 12 (bala.16.12)

कृष्णं रक्ताम्बरधरं रक्तास्यं दुन्दुभिस्वनम् । स्निग्धहर्यक्षतनुजश्मश्रुप्रवरमूर्धजम् ॥ १२ ॥

kṛṣṇaṃ raktāmbaradharaṃ raktāsyaṃ dundubhisvanam | snigdhaharyakṣatanujaśmaśrupravaramūrdhajam

वह श्यामवर्ण था, लाल वस्त्र धारण किए था, उसका मुख लाल था और स्वर दुंदुभि के समान गंभीर था; उसकी मूंछें और केश सिंह के अयाल के समान चिकने एवं सुंदर थे।

श्लोक 13 (bala.16.13)

शुभलक्षणसंपन्नं दिव्याभरणभूषितम् । शैलशृङ्गसमुत्सेधं दृप्तशार्दूलविक्रमम् ॥ १३ ॥

śubhalakṣaṇasaṃpannaṃ divyābharaṇabhūṣitam | śailaśṛṅgasamutsedhaṃ dṛptaśārdūlavikramam

वह शुभ लक्षणों से युक्त और दिव्य आभूषणों से सुशोभित था; ऊँचाई में पर्वत-शिखर के समान और पराक्रम में मदमस्त व्याघ्र के समान था।

श्लोक 14 (bala.16.14)

दिवाकरसमाकारं दीप्तानलशिखोपमम् । तप्तजाम्बूनदमयीं राजतान्तपरिच्छदाम् ॥ १४ ॥

divākarasamākāraṃ dīptānalaśikhopamam | taptajāmbūnadamayīṃ rājatāntaparicchadām

वह सूर्य के समान तेजस्वी और प्रज्वलित अग्निशिखा के समान चमकीला था; वह तपाए हुए शुद्ध सोने से बना, जिसका किनारा चाँदी से मढ़ा था,

श्लोक 15 (bala.16.15)

दिव्यपायससंपूर्णां पात्रीं पत्नीमिव प्रियाम् । प्रगृह्य विपुलां दोर्भ्यां स्वयं मायामयीमिव ॥ १५ ॥

divyapāyasasaṃpūrṇāṃ pātrīṃ patnīmiva priyām | pragṛhya vipulāṃ dorbhyāṃ svayaṃ māyāmayīmiva

दिव्य खीर से भरा हुआ वह विशाल पात्र, मानो अपनी प्रिय पत्नी हो, अपनी दोनों भुजाओं में इस प्रकार थामे हुए था मानो वह पात्र माया से रचा गया हो।

श्लोक 16 (bala.16.16)

समवेक्ष्याब्रवीद्वाक्यमिदं दशरथं नृपम् । प्राजापत्यं नरं विद्धि मामिहाभ्यागतं नृप ॥ १६ ॥

samavekṣyābravīdvākyamidaṃ daśarathaṃ nṛpam | prājāpatyaṃ naraṃ viddhi māmihābhyāgataṃ nṛpa

राजा दशरथ को देखकर उसने यह वचन कहा, "हे राजन्! मुझे प्रजापति द्वारा यहाँ भेजा गया पुरुष समझो।"

श्लोक 17 (bala.16.17)

ततः परं तदा राजा प्रत्युवाच कृताञ्जलिः । भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किमहं करवाणि ते ॥ १७ ॥

tataḥ paraṃ tadā rājā pratyuvāca kṛtāñjaliḥ | bhagavan svāgataṃ te'stu kimahaṃ karavāṇi te

तब राजा ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, "हे भगवन्! आपका स्वागत है; मैं आपके लिए क्या करूँ?"

श्लोक 18 (bala.16.18)

अथो पुनरिदं वाक्यं प्राजापत्यो नरोऽब्रवीत् । राजन्नर्चयता देवानद्य प्राप्तमिदं त्वया ॥ १८ ॥

atho punaridaṃ vākyaṃ prājāpatyo naro'bravīt | rājannarcayatā devānadya prāptamidaṃ tvayā

तब प्रजापति के उस पुरुष ने पुनः यह वचन कहा, "हे राजन्! देवताओं की आराधना करने के कारण आपने आज यह प्राप्त किया है।"

श्लोक 19 (bala.16.19)

इदं तु नृपशार्दूल पायसं देवनिर्मितम् । प्रजाकरं गृहाण त्वं धन्यमारोग्य वर्धनम् ॥ १९ ॥

idaṃ tu nṛpaśārdūla pāyasaṃ devanirmitam | prajākaraṃ gṛhāṇa tvaṃ dhanyamārogya vardhanam

"हे नृपश्रेष्ठ! देवताओं द्वारा निर्मित इस खीर को ग्रहण कीजिए; यह पवित्र है, संतानदायक है और आरोग्य बढ़ाने वाली है।"

श्लोक 20 (bala.16.20)

भार्याणामनुरूपाणामश्नीतेति प्रयच्छ वै । तासु त्वं लप्स्यसे पुत्रान् यदर्थं यजसे नृप ॥ २० ॥

bhāryāṇāmanurūpāṇāmaśnīteti prayaccha vai | tāsu tvaṃ lapsyase putrān yadarthaṃ yajase nṛpa

"इसे अपनी सुयोग्य पत्नियों को खिलाइए; उनके द्वारा आपको वे पुत्र प्राप्त होंगे जिनके लिए आपने यह यज्ञ किया है, हे राजन्।"

श्लोक 21 (bala.16.21)

तथेति नृपतिः प्रीतः शिरसा प्रतिगृह्य ताम् । पात्रीं देवान्नसंपूर्णां देवदत्तां हिरण्मयीम् ॥ २१ ॥

tatheti nṛpatiḥ prītaḥ śirasā pratigṛhya tām | pātrīṃ devānnasaṃpūrṇāṃ devadattāṃ hiraṇmayīm

"ऐसा ही होगा" कहकर प्रसन्न राजा ने सिर झुकाकर देवताओं द्वारा दिया गया वह स्वर्णपात्र, जो दिव्य अन्न से भरा था, ग्रहण किया।

श्लोक 22 (bala.16.22)

अभिवाद्य च तद् भूतमद्भुतं प्रियदर्शनम् । मुदा परमया युक्तश्चकाराभिप्रदक्षिणम् ॥ २२ ॥

abhivādya ca tad bhūtamadbhutaṃ priyadarśanam | mudā paramayā yuktaścakārābhipradakṣiṇam

फिर उस अद्भुत और मनोहर प्राणी को प्रणाम करके उसने अत्यंत हर्षित होकर उसकी प्रदक्षिणा की।

श्लोक 23 (bala.16.23)

ततो दशरथः प्राप्य पायसं देवनिर्मितम् । बभूव परमप्रीतः प्राप्य वित्तमिवाधनः ॥ २३ ॥

tato daśarathaḥ prāpya pāyasaṃ devanirmitam | babhūva paramaprītaḥ prāpya vittamivādhanaḥ

तब देवताओं द्वारा बनाई गई वह खीर पाकर दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए, जैसे कोई निर्धन व्यक्ति अचानक धन पाकर हर्षित हो जाता है।

श्लोक 24 (bala.16.24)

ततस्तदद्भुतप्रख्यं भूतं परमभास्वरम् । संवर्तयित्वा तत्कर्म तत्रैवान्तरधीयत ॥ २४ ॥

tatastadadbhutaprakhyaṃ bhūtaṃ paramabhāsvaram | saṃvartayitvā tatkarma tatraivāntaradhīyata

तत्पश्चात् वह अद्भुत और परम तेजस्वी प्राणी अपना कार्य पूर्ण करके वहीं अंतर्धान हो गया।

श्लोक 25 (bala.16.25)

हर्षरश्मिभिरुद्द्योतं तस्यान्तःपुरमाबभौ । शारदस्याभिरामस्य चंद्रस्येव नभोंशुभिः ॥ २५ ॥

harṣaraśmibhiruddyotaṃ tasyāntaḥpuramābabhau | śāradasyābhirāmasya caṃdrasyeva nabhoṃśubhiḥ

उसका अंतःपुर हर्ष की किरणों से इस प्रकार प्रकाशित हो उठा जैसे शरद ऋतु का आकाश सुंदर चंद्रमा की किरणों से जगमगा उठता है।

श्लोक 26 (bala.16.26)

सोऽन्तःपुरं प्रविश्यैव कौसल्यामिदमब्रवीत् । पायसं प्रतिगृह्णीष्व पुत्रीयमिदमात्मनः ॥ २६ ॥

so'ntaḥpuraṃ praviśyaiva kausalyāmidamabravīt | pāyasaṃ pratigṛhṇīṣva putrīyamidamātmanaḥ

अंतःपुर में प्रवेश करते ही उन्होंने कौसल्या से कहा, "अपने लिए संतान देने वाली इस खीर को ग्रहण करो।"

श्लोक 27 (bala.16.27)

कौसल्यायै नरपतिः पायसार्धं ददौ तदा । अर्धादर्धं ददौ चापि सुमित्रायै नराधिपः ॥ २७ ॥

kausalyāyai narapatiḥ pāyasārdhaṃ dadau tadā | ardhādardhaṃ dadau cāpi sumitrāyai narādhipaḥ

राजा ने उस समय आधी खीर कौसल्या को दी, और शेष आधी में से आधी सुमित्रा को दी।

श्लोक 28 (bala.16.28)

कैकेय्यै चावशिष्टार्धं ददौ पुत्रार्थकारणात् । प्रददौ चावशिष्टार्धं पायसस्यामृतोपमम् ॥ २८ ॥

kaikeyyai cāvaśiṣṭārdhaṃ dadau putrārthakāraṇāt | pradadau cāvaśiṣṭārdhaṃ pāyasasyāmṛtopamam

शेष बचे हुए भाग में से आधा उन्होंने पुत्र-प्राप्ति की कामना से कैकेयी को दिया; और उस अमृततुल्य खीर का जो शेष भाग बचा था,

श्लोक 29 (bala.16.29)

अनुचिन्त्य सुमित्रायै पुनरेव महीपतिः । एवं तासां ददौ राजा भार्याणां पायसं पृथक् ॥ २९ ॥

anucintya sumitrāyai punareva mahīpatiḥ | evaṃ tāsāṃ dadau rājā bhāryāṇāṃ pāyasaṃ pṛthak

कुछ देर विचार करके राजा ने वह भाग भी पुनः सुमित्रा को ही दे दिया। इस प्रकार राजा ने अपनी रानियों को अलग-अलग खीर बाँटी।

श्लोक 30 (bala.16.30)

ताश्चैवं पायसं प्राप्य नरेन्द्रस्योत्तमाः स्त्रियः । सम्मानं मेनिरे सर्वाः प्रहर्षोदितचेतसः ॥ ३० ॥

tāścaivaṃ pāyasaṃ prāpya narendrasyottamāḥ striyaḥ | sammānaṃ menire sarvāḥ praharṣoditacetasaḥ

इस प्रकार खीर पाकर राजा की वे सभी श्रेष्ठ रानियाँ हर्ष से भरे हृदय के साथ इसे अपना सम्मान मानने लगीं।

श्लोक 31 (bala.16.31)

ततस्तु ताः प्राश्य तदुत्तमस्त्रियो महीपतेरुत्तमपायसं पृथक् । हुताशनादित्यसमानतेजसोऽचिरेण गर्भान् प्रतिपेदिरे तदा ॥ ३१ ॥

tatastu tāḥ prāśya taduttamastriyo mahīpateruttamapāyasaṃ pṛthak | hutāśanādityasamānatejaso'cireṇa garbhān pratipedire tadā

तत्पश्चात् राजा की उस उत्तम खीर को अलग-अलग ग्रहण करके अग्नि और सूर्य के समान तेजस्विनी वे श्रेष्ठ रानियाँ शीघ्र ही गर्भवती हो गईं।

श्लोक 32 (bala.16.32)

ततस्तु राजा प्रतिवीक्ष्य ताः स्त्रियः प्ररूढगर्भाः प्रतिलब्धमानसः । बभूव हृष्टस्त्रिदिवे यथा हरिः सुरेन्द्रसिद्धर्षिगणाभिपूजितः ॥ ३२ ॥

tatastu rājā prativīkṣya tāḥ striyaḥ prarūḍhagarbhāḥ pratilabdhamānasaḥ | babhūva hṛṣṭastridive yathā hariḥ surendrasiddharṣigaṇābhipūjitaḥ

तब अपनी रानियों को गर्भधारण किए हुए देखकर राजा का मन कृतार्थ हो गया, और वे उसी प्रकार आनंदित हुए जैसे स्वर्ग में देवताओं, सिद्धों और ऋषियों द्वारा सम्मानित इंद्र आनंदित होते हैं।

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