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बालकाण्ड · सर्ग 17

वानरों की उत्पत्ति

सर्ग 16सर्ग-सूचीसर्ग 18

श्लोक 1 (bala.17.1)

पुत्रत्वं तु गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मनः । उवाच देवताः सर्वाः स्वयंभूर्भगवानिदम् ॥ १ ॥

putratvaṃ tu gate viṣṇau rājñastasya mahātmanaḥ | uvāca devatāḥ sarvāḥ svayaṃbhūrbhagavānidam

जब विष्णु उस महात्मा राजा के पुत्र रूप में जन्म लेने चले गए, तब स्वयंभू भगवान ब्रह्मा ने समस्त देवताओं से यह कहा।

श्लोक 2 (bala.17.2)

सत्यसंधस्य वीरस्य सर्वेषां नो हितैषिणः । विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वं कामरूपिणः ॥ २ ॥

satyasaṃdhasya vīrasya sarveṣāṃ no hitaiṣiṇaḥ | viṣṇoḥ sahāyān balinaḥ sṛjadhvaṃ kāmarūpiṇaḥ

"जो सत्यप्रतिज्ञ और वीर विष्णु हम सबका हित चाहते हैं, उनकी सहायता के लिए इच्छानुसार रूप धारण करने वाले बलवान सहायक उत्पन्न करो।"

श्लोक 3 (bala.17.3)

मायाविदश्च शूरांश्च वायुवेगसमान् जवे । नयज्ञान् बुद्धिसंपन्नान् विष्णुतुल्यपराक्रमान् ॥ ३ ॥

māyāvidaśca śūrāṃśca vāyuvegasamān jave | nayajñān buddhisaṃpannān viṣṇutulyaparākramān

"वे माया-विद्या में निपुण, शूरवीर, वायु के समान वेगवान्, नीतिज्ञ, बुद्धिमान् और विष्णु के समान पराक्रमी हों।"

श्लोक 4 (bala.17.4)

असंहार्यानुपायज्ञान् दिव्यसंहननान्वितान् । सर्वास्त्रगुणसंपन्नानमृतप्राशनानिव ॥ ४ ॥

asaṃhāryānupāyajñān divyasaṃhananānvitān | sarvāstraguṇasaṃpannānamṛtaprāśanāniva

"वे अजेय हों, उपायों को जानने वाले हों, दिव्य सुदृढ़ शरीर वाले हों, सभी अस्त्रों के गुणों से संपन्न हों, और मानो अमृतपान करने वालों के समान अथक हों।"

श्लोक 5 (bala.17.5)

अप्सरस्सु च मुख्यासु गन्धर्वीणां तनूषु च । यक्षपन्नगकन्यासु ऋक्षविद्याधरीषु च ॥ ५ ॥

apsarassu ca mukhyāsu gandharvīṇāṃ tanūṣu ca | yakṣapannagakanyāsu ṛkṣavidyādharīṣu ca

"श्रेष्ठ अप्सराओं में, गंधर्व-स्त्रियों के शरीरों में, यक्ष और नाग-कन्याओं में, तथा ऋक्षिणियों और विद्याधरियों में,"

श्लोक 6 (bala.17.6)

किंनरीणां च गात्रेषु वानरीणां तनूषु च । सृजध्वं हरिरूपेण पुत्रांस्तुल्यपराक्रमान् ॥ ६ ॥

kiṃnarīṇāṃ ca gātreṣu vānarīṇāṃ tanūṣu ca | sṛjadhvaṃ harirūpeṇa putrāṃstulyaparākramān

"और किन्नरियों के अंगों तथा वानरियों के शरीरों में वानर-रूप वाले, विष्णु के समान पराक्रमी पुत्र उत्पन्न करो।"

श्लोक 7 (bala.17.7)

पूर्वमेव मया सृष्टो जांबवानृक्षपुङ्गवः । जृंभमाणस्य सहसा मम वक्रादजायत ॥ ७ ॥

pūrvameva mayā sṛṣṭo jāṃbavānṛkṣapuṅgavaḥ | jṛṃbhamāṇasya sahasā mama vakrādajāyata

"श्रेष्ठ ऋक्षराज जाम्बवान् को तो मैंने पहले ही उत्पन्न कर दिया है, जो जृंभा लेते समय अचानक मेरे मुख से प्रकट हुआ था।"

श्लोक 8 (bala.17.8)

ते तथोक्ता भगवता तत् प्रतिश्रुत्य शासनम् । जनयामासुरेवं ते पुत्रान् वानररूपिणः ॥ ८ ॥

te tathoktā bhagavatā tat pratiśrutya śāsanam | janayāmāsurevaṃ te putrān vānararūpiṇaḥ

भगवान ब्रह्मा द्वारा इस प्रकार आदेश दिए जाने पर उन्होंने उस आज्ञा को स्वीकार कर वानर-रूपधारी पुत्र उत्पन्न करने आरंभ किए।

श्लोक 9 (bala.17.9)

ऋषयश्च महात्मानः सिद्धविद्याधरोरगाः । चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिणः ॥ ९ ॥

ṛṣayaśca mahātmānaḥ siddhavidyādharoragāḥ | cāraṇāśca sutān vīrān sasṛjurvanacāriṇaḥ

महात्मा ऋषियों, सिद्धों, विद्याधरों, नागों और चारणों ने वीर और वनचारी पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 10 (bala.17.10)

वानरेन्द्रं महेद्राभमिन्द्रो वालिनमात्मजम् । सुग्रीवं जनयामास तपनस्तपतां वरः ॥ १० ॥

vānarendraṃ mahedrābhamindro vālinamātmajam | sugrīvaṃ janayāmāsa tapanastapatāṃ varaḥ

इन्द्र ने महेन्द्र पर्वत के समान तेजस्वी अपने पुत्र वानरराज वालि को उत्पन्न किया, और तेजस्वियों में श्रेष्ठ सूर्य ने सुग्रीव को उत्पन्न किया।

श्लोक 11 (bala.17.11)

बृहस्पतिस्त्वजनयत्तारं नाम महाकपिम् । सर्ववानरमुख्यानां बुद्धिमन्तमनुत्तमम् ॥ ११ ॥

bṛhaspatistvajanayattāraṃ nāma mahākapim | sarvavānaramukhyānāṃ buddhimantamanuttamam

बृहस्पति ने तार नामक महाकपि को उत्पन्न किया, जो समस्त प्रमुख वानरों में बुद्धि की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ था।

श्लोक 12 (bala.17.12)

धनदस्य सुतः श्रीमान् वानरो गन्धमादनः । विश्वकर्मा त्वजनयन्नलं नाम महाकपिम् ॥ १२ ॥

dhanadasya sutaḥ śrīmān vānaro gandhamādanaḥ | viśvakarmā tvajanayannalaṃ nāma mahākapim

कुबेर के पुत्र थे तेजस्वी वानर गंधमादन, और विश्वकर्मा ने नल नामक महाकपि को उत्पन्न किया।

श्लोक 13 (bala.17.13)

पावकस्य सुतः श्रीमान्नीलोऽग्नि सदृशप्रभः । तेजसा यशसा वीर्यादत्यरिच्यत वानरान् ॥ १३ ॥

pāvakasya sutaḥ śrīmānnīlo'gni sadṛśaprabhaḥ | tejasā yaśasā vīryādatyaricyata vānarān

अग्निदेव के पुत्र तेजस्वी नील अग्नि के समान कांतिमान थे, और वे तेज, यश तथा पराक्रम में अन्य सभी वानरों से बढ़कर थे।

श्लोक 14 (bala.17.14)

रूपद्रविणसंपन्नावश्विनौ रूपसंमतौ । मैन्दं च द्विविदं चैव जनयामासतुः स्वयम् ॥ १४ ॥

rūpadraviṇasaṃpannāvaśvinau rūpasaṃmatau | maindaṃ ca dvividaṃ caiva janayāmāsatuḥ svayam

सौंदर्यरूपी संपत्ति से युक्त दोनों अश्विनीकुमारों ने स्वयं सुंदर रूपवाले मैंद और द्विविद को उत्पन्न किया।

श्लोक 15 (bala.17.15)

वरुणो जनयामास सुषेणं नाम वानरम् । शरभं जनयामास पर्जन्यस्तु महाबलम् ॥ १५ ॥

varuṇo janayāmāsa suṣeṇaṃ nāma vānaram | śarabhaṃ janayāmāsa parjanyastu mahābalam

वरुण ने सुषेण नामक वानर को उत्पन्न किया, और पर्जन्य ने महाबली शरभ को उत्पन्न किया।

श्लोक 16 (bala.17.16)

मारुतस्यौरसः श्रीमान् हनुमान्नाम वानरः । वज्रसंहननोपेतो वैनतेयसमो जवे ॥ १६ ॥

mārutasyaurasaḥ śrīmān hanumānnāma vānaraḥ | vajrasaṃhananopeto vainateyasamo jave

वायुदेव के औरस पुत्र तेजस्वी वानर हनुमान थे, जो वज्र के समान सुदृढ़ शरीरवाले और वेग में गरुड़ के समान थे।

श्लोक 17 (bala.17.17)

सर्ववानरमुख्येषु बुद्धिमान् बलवानपि । ते सृष्टा बहुसाहस्रा दशग्रीववधोद्यताः ॥ १७ ॥

sarvavānaramukhyeṣu buddhimān balavānapi | te sṛṣṭā bahusāhasrā daśagrīvavadhodyatāḥ

वे समस्त प्रमुख वानरों में बुद्धिमान् होने के साथ-साथ बलवान् भी थे। इस प्रकार दशग्रीव के वध के लिए कटिबद्ध हजारों वानर उत्पन्न किए गए।

श्लोक 18 (bala.17.18)

अप्रमेयबला वीरा विक्रान्ताः कामरूपिणः । ते गजाचलसंकाशा वपुष्मंतो महाबलाः ॥ १८ ॥

aprameyabalā vīrā vikrāntāḥ kāmarūpiṇaḥ | te gajācalasaṃkāśā vapuṣmaṃto mahābalāḥ

वे अपरिमित बलवाले, वीर, पराक्रमी और इच्छानुसार रूप धारण करने वाले थे; उनके विशाल शरीर हाथी और पर्वत के समान थे और वे महान् बलशाली थे।

श्लोक 19 (bala.17.19)

ऋक्षवानरगोपुच्छाः क्षिप्रमेवाभिजज्ञिरे । यस्य देवस्य यद्रूपं वेषो यश्च पराक्रमः ॥ १९ ॥

ṛkṣavānaragopucchāḥ kṣipramevābhijajñire | yasya devasya yadrūpaṃ veṣo yaśca parākramaḥ

वे शीघ्र ही ऋक्ष, वानर और गोपुच्छ के रूप में उत्पन्न हुए। जिस देवता का जैसा रूप, वेश और पराक्रम था,

श्लोक 20 (bala.17.20)

अजायत समं तेन तस्य तस्य पृथक् पृथक् । गोलांगूलीषु चोत्पन्नाः केचिदुन्नतविक्रमाः ॥ २० ॥

ajāyata samaṃ tena tasya tasya pṛthak pṛthak | golāṃgūlīṣu cotpannāḥ kecidunnatavikramāḥ

वैसा ही रूप उस-उस देवता की संतान में पृथक्-पृथक् उत्पन्न हुआ। कुछ अत्यंत पराक्रमी वानर गोलांगूल जाति की मादाओं से उत्पन्न हुए,

श्लोक 21 (bala.17.21)

ऋक्षीषु च तथा जाता वानराः किंनरीषु च । देवा महर्षिगन्धर्वास्तार्क्ष्या यक्षा यशस्विनः ॥ २१ ॥

ṛkṣīṣu ca tathā jātā vānarāḥ kiṃnarīṣu ca | devā maharṣigandharvāstārkṣyā yakṣā yaśasvinaḥ

और इसी प्रकार ऋक्षिणियों तथा किन्नरियों से भी वानर उत्पन्न हुए, देवताओं, महर्षियों, गंधर्वों, गरुड़ों तथा यशस्वी यक्षों द्वारा।

श्लोक 22 (bala.17.22)

नागाः किंपुरुषाश्चैव सिद्धविद्याधरोरगाः । बहवो जनयामासुर्हृष्टास्तत्र सहस्रशः ॥ २२ ॥

nāgāḥ kiṃpuruṣāścaiva siddhavidyādharoragāḥ | bahavo janayāmāsurhṛṣṭāstatra sahasraśaḥ

नागों, किंपुरुषों, सिद्धों, विद्याधरों और उरगों ने भी वहाँ प्रसन्नतापूर्वक हजारों की संख्या में उन्हें उत्पन्न किया।

श्लोक 23 (bala.17.23)

चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिणः । वानरान् सुमहाकायान् सर्वान् वै वनचारिणः ॥ २३ ॥

cāraṇāśca sutān vīrān sasṛjurvanacāriṇaḥ | vānarān sumahākāyān sarvān vai vanacāriṇaḥ

चारणों ने भी वीर और वनचारी पुत्र उत्पन्न किए; वे सभी विशालकाय वानर वनों में विचरण करने वाले थे।

श्लोक 24 (bala.17.24)

अप्सरस्सु च मुख्यासु तदा विद्यधरीषु च । नागकन्यासु च तथा गन्धर्वीणां तनूषु च । कामरूपबलोपेता यथाकामं विचारिणः ॥ २४ ॥

apsarassu ca mukhyāsu tadā vidyadharīṣu ca | nāgakanyāsu ca tathā gandharvīṇāṃ tanūṣu ca | kāmarūpabalopetā yathākāmaṃ vicāriṇaḥ

श्रेष्ठ अप्सराओं से, विद्याधरियों से, नाग-कन्याओं से तथा गंधर्व-स्त्रियों के शरीरों से भी इच्छानुसार रूप बदलने की शक्ति रखने वाले और स्वच्छंद विचरण करने वाले वानर उत्पन्न हुए।

श्लोक 25 (bala.17.25)

सिंहशार्दूलसदृशा दर्पेण च बलेन च । शिलाप्रहरणाः सर्वे सर्वे पादपयोधिनः ॥ २५ ॥

siṃhaśārdūlasadṛśā darpeṇa ca balena ca | śilāpraharaṇāḥ sarve sarve pādapayodhinaḥ

वे मद और बल में सिंह तथा व्याघ्र के समान थे; वे सभी शिलाओं से प्रहार करने वाले और वृक्षों से युद्ध करने वाले थे।

श्लोक 26 (bala.17.26)

नखदंष्ट्रायुधाः सर्वे सर्वे सर्वास्त्रकोविदाः । विचालयेयुः शैलेन्द्रान् भेदयेयुः स्थिरान् द्रुमान् ॥ २६ ॥

nakhadaṃṣṭrāyudhāḥ sarve sarve sarvāstrakovidāḥ | vicālayeyuḥ śailendrān bhedayeyuḥ sthirān drumān

उन सबके नख और दाँत ही अस्त्र थे, और वे सभी समस्त शस्त्रों में निपुण थे। वे बड़े-बड़े पर्वतों को हिला सकते थे और सुदृढ़ वृक्षों को भी उखाड़ सकते थे।

श्लोक 27 (bala.17.27)

क्षोभयेयुश्च वेगेन समुद्रं सरितां पतिम् । दारयेयुः क्षितिं पद्भ्यामाप्लवेयुर्महार्णवम् ॥ २७ ॥

kṣobhayeyuśca vegena samudraṃ saritāṃ patim | dārayeyuḥ kṣitiṃ padbhyāmāplaveyurmahārṇavam

वे अपने वेग से नदियों के स्वामी समुद्र को भी क्षुब्ध कर सकते थे; वे अपने पैरों से पृथ्वी को विदीर्ण कर सकते थे और विशाल महासागर को लांघ सकते थे।

श्लोक 28 (bala.17.28)

नभस्थलं विशेयुश्च गृह्णीयुरपि तोयदान् । गृह्णीयुरपि मातंगान् मत्तान् प्रव्रजतो वने ॥ २८ ॥

nabhasthalaṃ viśeyuśca gṛhṇīyurapi toyadān | gṛhṇīyurapi mātaṃgān mattān pravrajato vane

वे आकाश में विचरण कर मेघों को भी पकड़ सकते थे; वे वन में विचरते हुए मदमस्त हाथियों को भी पकड़ सकते थे।

श्लोक 29 (bala.17.29)

नर्दमानाश्च नादेन पातयेयुर्विहंगमान् । ईदृशानां प्रसूतानि हरीणां कामरूपिणाम् ॥ २९ ॥

nardamānāśca nādena pātayeyurvihaṃgamān | īdṛśānāṃ prasūtāni harīṇāṃ kāmarūpiṇām

वे केवल अपनी गर्जना से आकाश में उड़ते पक्षियों को भी गिरा सकते थे। इस प्रकार के इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वानरों की संतानें,

श्लोक 30 (bala.17.30)

शतं शतसहस्राणि यूथपानां महात्मनाम् । ते प्रधानेषु यूथेषु हरीणां हरियूथपाः ॥ ३० ॥

śataṃ śatasahasrāṇi yūthapānāṃ mahātmanām | te pradhāneṣu yūtheṣu harīṇāṃ hariyūthapāḥ

सैकड़ों और लाखों महान् आत्मावाले सेनानायक उत्पन्न हुए; और वानरों के प्रमुख यूथों में वे ही यूथपति बने।

श्लोक 31 (bala.17.31)

बभूवुर्यूथपश्रेष्ठा वीरांश्चाजनयन् हरीन् । अन्ये ऋक्षवतः प्रस्थानुपतस्थुः सहस्रशः ॥ ३१ ॥

babhūvuryūthapaśreṣṭhā vīrāṃścājanayan harīn | anye ṛkṣavataḥ prasthānupatasthuḥ sahasraśaḥ

वे सेनानायकों में श्रेष्ठ बने और उन्होंने भी वीर वानरों को उत्पन्न किया। अन्य हजारों वानर ऋक्षवत् पर्वत की चोटियों पर जा बसे।

श्लोक 32 (bala.17.32)

अन्ये नानाविधान् शैलान् काननानि च भेजिरे । सूर्यपुत्रं च सुग्रीवं शक्रपुत्रं च वालिनम् ॥ ३२ ॥

anye nānāvidhān śailān kānanāni ca bhejire | sūryaputraṃ ca sugrīvaṃ śakraputraṃ ca vālinam

अन्य वानर विभिन्न पर्वतों और वनों में जा बसे। सूर्यपुत्र सुग्रीव और इन्द्रपुत्र वालि, दोनों भाइयों की,

श्लोक 33 (bala.17.33)

भ्रातरावुपतस्थुस्ते सर्वे च हरियूथपाः । नलं नीलं हनूमन्तमन्यांश्च हरियूथपान् ॥ ३३ ॥

bhrātarāvupatasthuste sarve ca hariyūthapāḥ | nalaṃ nīlaṃ hanūmantamanyāṃśca hariyūthapān

सेवा में वे सभी वानर-सेनापति उपस्थित रहते थे, साथ ही नल, नील, हनुमान् तथा अन्य वानर-सेनानायक भी।

श्लोक 34 (bala.17.34)

ते तार्क्ष्यबलसंपन्नाः सर्वे युद्धविशारदाः । विचरन्तोऽर्दयन् दर्पात् सिंहव्याघ्रमहोरगान् ॥ ३४ ॥

te tārkṣyabalasaṃpannāḥ sarve yuddhaviśāradāḥ | vicaranto'rdayan darpāt siṃhavyāghramahoragān

गरुड़ के समान बलशाली और युद्धकला में निपुण वे सभी वानर वन में विचरते हुए अपने मद के कारण सिंहों, व्याघ्रों और बड़े-बड़े सर्पों को भी सताते थे।

श्लोक 35 (bala.17.35)

महाबलो महाबाहुर्वाली विपुलविक्रमः । जुगोप भुजवीर्येण ऋक्षगोपुच्छवानरान् ॥ ३५ ॥

mahābalo mahābāhurvālī vipulavikramaḥ | jugopa bhujavīryeṇa ṛkṣagopucchavānarān

महान् बलशाली, विशाल भुजाओं वाले और अपार पराक्रमी वालि ने अपनी भुजाओं के बल से ऋक्षों, गोपुच्छों तथा वानरों की रक्षा की।

श्लोक 36 (bala.17.36)

तैरियं पृथिवी शूरैः सपर्वतवनार्णवा । कीर्णा विविधसंस्थानैर्नानाव्यंजनलक्षणैः ॥ ३६ ॥

tairiyaṃ pṛthivī śūraiḥ saparvatavanārṇavā | kīrṇā vividhasaṃsthānairnānāvyaṃjanalakṣaṇaiḥ

पर्वतों, वनों और समुद्रों सहित यह समस्त पृथ्वी उन विविध आकृतियों और भाँति-भाँति के चिह्नों वाले शूरवीरों से भर गई।

श्लोक 37 (bala.17.37)

तैर्मेघबृन्दाचलकूटसंनिभैः महाबलैर्वानरयूथपाधिपैः । बभूव भूर्भीमशरीररूपैः समावृता रामसहायहेतोः ॥ ३७ ॥

tairmeghabṛndācalakūṭasaṃnibhaiḥ mahābalairvānarayūthapādhipaiḥ | babhūva bhūrbhīmaśarīrarūpaiḥ samāvṛtā rāmasahāyahetoḥ

बादलों के समूहों और पर्वत-शिखरों के समान विशालकाय, भयंकर शरीरवाले उन महाबली वानर-सेनापतियों से समस्त पृथ्वी आच्छादित हो गई; यह सब राम की सहायता के लिए हुआ।

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