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बालकाण्ड · सर्ग 18

राजकुमारों का जन्म और बाल्यकाल

सर्ग 17सर्ग-सूचीसर्ग 19

श्लोक 1 (bala.18.1)

निर्वृत्ते तु क्रतौ तस्मिन् हयमेधे महात्मनः । प्रतिगृह्य सुरा भागान् प्रतिजग्मुर्यथागतम् ॥ १ ॥

nirvṛtte tu kratau tasmin hayamedhe mahātmanaḥ | pratigṛhya surā bhāgān pratijagmuryathāgatam

जब उस महात्मा राजा का वह अश्वमेध यज्ञ संपन्न हो गया, तब देवगण अपना-अपना भाग ग्रहण करके जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

श्लोक 2 (bala.18.2)

समाप्तदीक्षानियमः पत्नीगणसमन्वितः । प्रविवेश पुरीं राजा सभृत्यबलवाहनः ॥ २ ॥

samāptadīkṣāniyamaḥ patnīgaṇasamanvitaḥ | praviveśa purīṃ rājā sabhṛtyabalavāhanaḥ

दीक्षा के नियमों को पूर्ण करके राजा अपनी रानियों, सेवकों, सेना और वाहनों के साथ नगर में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 3 (bala.18.3)

यथार्हं पूजितास्तेन राज्ञा च पृथिवीश्वराः । मुदिताः प्रययुर्देशान् प्रणम्य मुनिपुंगवम् ॥ ३ ॥

yathārhaṃ pūjitāstena rājñā ca pṛthivīśvarāḥ | muditāḥ prayayurdeśān praṇamya munipuṃgavam

राजा द्वारा यथोचित सम्मान पाए हुए पृथ्वी के अन्य राजा मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने देशों को चले गए।

श्लोक 4 (bala.18.4)

श्रीमतां गच्छतां तेषां स्वगृहाणि पुरात्ततः । बलानि राज्ञां शुभ्राणि प्रहृष्टानि चकाशिरे ॥ ४ ॥

śrīmatāṃ gacchatāṃ teṣāṃ svagṛhāṇi purāttataḥ | balāni rājñāṃ śubhrāṇi prahṛṣṭāni cakāśire

उन तेजस्वी राजाओं के नगर से अपने-अपने घरों को लौटते समय उनकी शुभ्र और प्रफुल्लित सेनाएँ अत्यंत सुशोभित हो रही थीं।

श्लोक 5 (bala.18.5)

गतेषु पृथिवीशेषु राजा दशरथस्तदा । प्रविवेश पुरीं श्रीमान् पुरस्कृत्य द्विजोत्तमान् ॥ ५ ॥

gateṣu pṛthivīśeṣu rājā daśarathastadā | praviveśa purīṃ śrīmān puraskṛtya dvijottamān

पृथ्वी के अन्य राजाओं के चले जाने पर तेजस्वी राजा दशरथ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को आगे करके नगर में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 6 (bala.18.6)

शांतया प्रययौ सार्धमृष्यशृङ्गः सुपूजितः । अनुगम्यमानो राज्ञा च सानुयात्रेण धीमता ॥ ६ ॥

śāṃtayā prayayau sārdhamṛṣyaśṛṅgaḥ supūjitaḥ | anugamyamāno rājñā ca sānuyātreṇa dhīmatā

भलीभाँति सम्मानित ऋष्यशृंग शांता के साथ प्रस्थान कर गए, और बुद्धिमान राजा भी अपने अनुचरों के साथ उनके पीछे-पीछे चले।

श्लोक 7 (bala.18.7)

एवं विसृज्य तान् सर्वान् राजा संपूर्णमानसः । उवास सुखितस्तत्र पुत्रोत्पत्तिं विचिंतयन् ॥ ७ ॥

evaṃ visṛjya tān sarvān rājā saṃpūrṇamānasaḥ | uvāsa sukhitastatra putrotpattiṃ viciṃtayan

इस प्रकार उन सबको विदा करके राजा संतुष्ट हृदय से पुत्र-प्राप्ति का चिंतन करते हुए वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे।

श्लोक 8 (bala.18.8)

ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः । ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ॥ ८ ॥

tato yajñe samāpte tu ṛtūnāṃ ṣaṭ samatyayuḥ | tataśca dvādaśe māse caitre nāvamike tithau

यज्ञ की समाप्ति के पश्चात् छह ऋतुएँ बीत गईं; तत्पश्चात् बारहवें महीने में, चैत्र मास की नवमी तिथि को,

श्लोक 9 (bala.18.9)

नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु । ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविंदुना सह ॥ ९ ॥

nakṣatre'ditidaivatye svoccasaṃstheṣu paṃcasu | graheṣu karkaṭe lagne vākpatāviṃdunā saha

अदिति देवता वाले नक्षत्र में, पाँच ग्रहों के अपनी उच्च राशि में स्थित होने पर, कर्क लग्न में तथा बृहस्पति के चंद्रमा के साथ होने पर,

श्लोक 10 (bala.18.10)

प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् । कौसल्याजनयद्रामं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥ १० ॥

prodyamāne jagannāthaṃ sarvalokanamaskṛtam | kausalyājanayadrāmaṃ sarvalakṣaṇasaṃyutam

दिन के उदय होते समय कौसल्या ने सर्वलोकवंद्य, सभी शुभ लक्षणों से युक्त जगन्नाथ राम को जन्म दिया।

श्लोक 11 (bala.18.11)

विष्णोरर्धं महाभागं पुत्रमैक्ष्वाकुनंदनम् । लोहिताक्षं महाबाहुं रक्तौष्ठं दुंदुभिस्वनम् ॥ ११ ॥

viṣṇorardhaṃ mahābhāgaṃ putramaikṣvākunaṃdanam | lohitākṣaṃ mahābāhuṃ raktauṣṭhaṃ duṃdubhisvanam

वे विष्णु के अर्धांश स्वरूप, इक्ष्वाकु वंश के आनंददाता, महाभाग्यशाली पुत्र थे; लाल नेत्रों वाले, विशाल भुजाओं वाले, लाल होंठों वाले तथा दुंदुभि के समान गंभीर स्वर वाले।

श्लोक 12 (bala.18.12)

कौसल्या शुशुभे तेन पुत्रेणामिततेजसा । यथा वरेण देवानामदितिर्वज्रपाणिना ॥ १२ ॥

kausalyā śuśubhe tena putreṇāmitatejasā | yathā vareṇa devānāmaditirvajrapāṇinā

कौसल्या उस असीम तेजस्वी पुत्र से वैसे ही सुशोभित हुईं जैसे अदिति वज्रधारी इंद्र नामक श्रेष्ठ पुत्र से सुशोभित हुई थीं।

श्लोक 13 (bala.18.13)

भरतो नाम कैकेय्यां जज्ञे सत्यपराक्रमः । साक्षाद्विष्णोश्चतुर्भागः सर्वैः समुदितो गुणैः ॥ १३ ॥

bharato nāma kaikeyyāṃ jajñe satyaparākramaḥ | sākṣādviṣṇoścaturbhāgaḥ sarvaiḥ samudito guṇaiḥ

कैकेयी से सत्यपराक्रमी भरत नामक पुत्र उत्पन्न हुए, जो साक्षात् विष्णु के चतुर्थांश स्वरूप और समस्त गुणों से संपन्न थे।

श्लोक 14 (bala.18.14)

अथ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्राजनयत् सुतौ । वीरौ सर्वास्त्रकुशलौ विष्णोरर्धसमन्वितौ ॥ १४ ॥

atha lakṣmaṇaśatrughnau sumitrājanayat sutau | vīrau sarvāstrakuśalau viṣṇorardhasamanvitau

तत्पश्चात् सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न नामक दो पुत्रों को जन्म दिया, जो दोनों वीर, सभी अस्त्रों में निपुण और विष्णु के शेष अर्धांश से युक्त थे।

श्लोक 15 (bala.18.15)

पुष्ये जातस्तु भरतो मीनलग्ने प्रसन्नधीः । सार्पे जातौ तु सौमित्री कुळीरेऽभ्युदिते रवौ ॥ १५ ॥

puṣye jātastu bharato mīnalagne prasannadhīḥ | sārpe jātau tu saumitrī kuḻīre'bhyudite ravau

शांत बुद्धिवाले भरत का जन्म पुष्य नक्षत्र में मीन लग्न में हुआ; और सुमित्रा के दोनों पुत्रों का जन्म आश्लेषा नक्षत्र में, सूर्योदय के समय कर्क लग्न में हुआ।

श्लोक 16 (bala.18.16)

राज्ञः पुत्रा महात्मानश्चत्वारो जज्ञिरे पृथक् । गुणवंतोऽनुरूपाश्च रुच्या प्रोष्ठपदोपमाः ॥ १६ ॥

rājñaḥ putrā mahātmānaścatvāro jajñire pṛthak | guṇavaṃto'nurūpāśca rucyā proṣṭhapadopamāḥ

इस प्रकार राजा के चार महात्मा पुत्र अलग-अलग उत्पन्न हुए, जो सभी गुणवान, एक-दूसरे के अनुरूप और पूर्वा-उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों के समान कांतिमान थे।

श्लोक 17 (bala.18.17)

जगुः कलं च गंधर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः । देवदुंदुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खात्पतत् ॥ १७ ॥

jaguḥ kalaṃ ca gaṃdharvā nanṛtuścāpsarogaṇāḥ | devaduṃdubhayo neduḥ puṣpavṛṣṭiśca khātpatat

गंधर्वों ने मधुर गीत गाए, अप्सराओं के समूहों ने नृत्य किया, दिव्य दुंदुभियाँ बज उठीं और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।

श्लोक 18 (bala.18.18)

उत्सवश्च महानासीदयोध्यायां जनाकुलः । रथ्याश्च जनसंबाधा नटनर्तकसंकुलाः ॥ १८ ॥

utsavaśca mahānāsīdayodhyāyāṃ janākulaḥ | rathyāśca janasaṃbādhā naṭanartakasaṃkulāḥ

अयोध्या में जनसमूह से भरा हुआ एक महान उत्सव हुआ; नगर की गलियाँ लोगों से भरी हुई थीं और नट-नर्तकों से गुलजार थीं।

श्लोक 19 (bala.18.19)

गायनैश्च विराविण्यो वादनैश्च तथापरैः । विरेजुर्विपुलास्तत्र सर्वरत्नसमन्विताः ॥ १९ ॥

gāyanaiśca virāviṇyo vādanaiśca tathāparaiḥ | virejurvipulāstatra sarvaratnasamanvitāḥ

वहाँ गायकों तथा विभिन्न वाद्यों के वादकों की ध्वनि से गूँजती हुई, सभी प्रकार के रत्नों से सुशोभित विशाल गलियाँ अत्यंत शोभायमान हो रही थीं।

श्लोक 20 (bala.18.20)

प्रदेयांश्च ददौ राजा सूतमागधवंदिनाम् । ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं गोधनानि सहस्रशः ॥ २० ॥

pradeyāṃśca dadau rājā sūtamāgadhavaṃdinām | brāhmaṇebhyo dadau vittaṃ godhanāni sahasraśaḥ

राजा ने सूतों, मागधों और वंदीजनों को उचित उपहार दिए, और ब्राह्मणों को धन तथा हजारों गौएँ प्रदान कीं।

श्लोक 21 (bala.18.21)

अतीत्यैकादशाहं तु नामकर्म तथाकरोत् । ज्येष्ठं रामं महात्मानं भरतं कैकयीसुतम् ॥ २१ ॥

atītyaikādaśāhaṃ tu nāmakarma tathākarot | jyeṣṭhaṃ rāmaṃ mahātmānaṃ bharataṃ kaikayīsutam

ग्यारह दिन बीत जाने पर उन्होंने नामकरण संस्कार किया, जिसमें महात्मा ज्येष्ठ पुत्र का नाम राम और कैकेयी के पुत्र का नाम भरत रखा,

श्लोक 22 (bala.18.22)

सौमित्री लक्ष्मणमिति शत्रुघ्नमपरं तथा । वसिष्ठः परमप्रीतो नामानि कुरुते तदा ॥ २२ ॥

saumitrī lakṣmaṇamiti śatrughnamaparaṃ tathā | vasiṣṭhaḥ paramaprīto nāmāni kurute tadā

तथा सुमित्रा के पुत्रों में से एक का नाम लक्ष्मण और दूसरे का नाम शत्रुघ्न रखा; इन नामों को अत्यंत प्रसन्न वसिष्ठ ने उस समय निर्धारित किया।

श्लोक 23 (bala.18.23)

ब्राह्मणान् भोजयामास पौरान् जानपदानपि । अददद्ब्राह्मणानां च रत्नौघममितं बहु ॥ २३ ॥

brāhmaṇān bhojayāmāsa paurān jānapadānapi | adadadbrāhmaṇānāṃ ca ratnaughamamitaṃ bahu

उन्होंने ब्राह्मणों, नगरवासियों तथा जनपदवासियों को भोजन कराया, और ब्राह्मणों को अपार मात्रा में रत्नों का दान दिया।

श्लोक 24 (bala.18.24)

तेषां जन्मक्रियादीनि सर्वकर्माण्यकारयत् । तेषां केतुरिव ज्येष्ठो रामो रतिकरः पितुः ॥ २४ ॥

teṣāṃ janmakriyādīni sarvakarmāṇyakārayat | teṣāṃ keturiva jyeṣṭho rāmo ratikaraḥ pituḥ

उन सबके जन्म-संबंधी सभी संस्कार विधिपूर्वक संपन्न कराए गए। उनमें से ज्येष्ठ राम मानो ध्वजा के समान, अपने पिता के आनंद के कारण थे,

श्लोक 25 (bala.18.25)

बभूव भूयो भूतानां स्वयंभूरिव सम्मतः । सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे लोकहिते रताः ॥ २५ ॥

babhūva bhūyo bhūtānāṃ svayaṃbhūriva sammataḥ | sarve vedavidaḥ śūrāḥ sarve lokahite ratāḥ

और वे स्वयंभू ब्रह्मा के समान समस्त प्राणियों के प्रिय बन गए। चारों राजकुमार वेदों के ज्ञाता, शूरवीर और लोकहित में रत थे।

श्लोक 26 (bala.18.26)

सर्वे ज्ञानोपसंपन्नाः सर्वे समुदिता गुणैः । तेषामपि महातेजा रामः सत्यपराक्रमः ॥ २६ ॥

sarve jñānopasaṃpannāḥ sarve samuditā guṇaiḥ | teṣāmapi mahātejā rāmaḥ satyaparākramaḥ

वे सभी ज्ञान से संपन्न और गुणों से युक्त थे; फिर भी उन सबमें महातेजस्वी और सत्यपराक्रमी राम,

श्लोक 27 (bala.18.27)

इष्टः सर्वस्य लोकस्य शशांक इव निर्मलः । गजस्कन्धेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु सम्मतः ॥ २७ ॥

iṣṭaḥ sarvasya lokasya śaśāṃka iva nirmalaḥ | gajaskandhe'śvapṛṣṭhe ca rathacaryāsu sammataḥ

संपूर्ण जगत् को अत्यंत प्रिय, चंद्रमा के समान निर्मल, तथा हाथी की पीठ पर, घोड़े की सवारी में और रथचालन में निपुण थे।

श्लोक 28 (bala.18.28)

धनुर्वेदे च निरतः पितृशुश्रूषणे रतः । बाल्यात् प्रभृति सुस्निग्धो लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धनः ॥ २८ ॥

dhanurvede ca nirataḥ pitṛśuśrūṣaṇe rataḥ | bālyāt prabhṛti susnigdho lakṣmaṇo lakṣmivardhanaḥ

वे धनुर्विद्या में तत्पर और पिता की सेवा में रत रहते थे। बचपन से ही शोभा बढ़ाने वाले लक्ष्मण उनसे अत्यंत स्नेह रखते थे।

श्लोक 29 (bala.18.29)

रामस्य लोकरामस्य भ्रातुर्ज्येष्ठस्य नित्यशः । सर्वप्रियकरस्तस्य रामस्यापि शरीरतः ॥ २९ ॥

rāmasya lokarāmasya bhrāturjyeṣṭhasya nityaśaḥ | sarvapriyakarastasya rāmasyāpi śarīrataḥ

संसार को आनंदित करने वाले अपने ज्येष्ठ भ्राता राम के प्रति वे सदैव समर्पित रहते और उनकी प्रसन्नता के लिए सब कुछ करते, मानो वे राम के अपने शरीर का ही अंग हों।

श्लोक 30 (bala.18.30)

लक्ष्मणो लक्ष्मिसंपन्नो बहिःप्राण इवापरः । न च तेन विना निद्रां लभते पुरुषोत्तमः ॥ ३० ॥

lakṣmaṇo lakṣmisaṃpanno bahiḥprāṇa ivāparaḥ | na ca tena vinā nidrāṃ labhate puruṣottamaḥ

शोभासंपन्न लक्ष्मण मानो राम के बाह्य प्राण ही थे; और वे पुरुषोत्तम राम लक्ष्मण के बिना निद्रा भी प्राप्त नहीं करते थे।

श्लोक 31 (bala.18.31)

मृष्टमन्नमुपानीतमश्नाति न हि तं विना । यदा हि हयमारूढो मृगयां याति राघवः ॥ ३१ ॥

mṛṣṭamannamupānītamaśnāti na hi taṃ vinā | yadā hi hayamārūḍho mṛgayāṃ yāti rāghavaḥ

उनके सामने लाया गया स्वादिष्ट भोजन भी वे लक्ष्मण के बिना ग्रहण नहीं करते थे। जब कभी राघव घोड़े पर सवार होकर मृगया के लिए जाते,

श्लोक 32 (bala.18.32)

तदैनं पृष्ठतोऽभ्येति स धनुः परिपालयन् । भरतस्यापि शत्रुघ्नो लक्ष्मणावरजो हि सः ॥ ३२ ॥

tadainaṃ pṛṣṭhato'bhyeti sa dhanuḥ paripālayan | bharatasyāpi śatrughno lakṣmaṇāvarajo hi saḥ

तब लक्ष्मण धनुष धारण किए उनकी रक्षा करते हुए पीछे-पीछे चलते। इसी प्रकार लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न भरत के प्रति समर्पित थे।

श्लोक 33 (bala.18.33)

प्राणैः प्रियतरो नित्यं तस्य चासीत्तथा प्रियः । स चतुर्भिर्महाभागैः पुत्रैर्दशरथः प्रियैः ॥ ३३ ॥

prāṇaiḥ priyataro nityaṃ tasya cāsīttathā priyaḥ | sa caturbhirmahābhāgaiḥ putrairdaśarathaḥ priyaiḥ

वे भरत को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थे, और भरत भी उन्हें उतने ही प्रिय थे। इस प्रकार राजा दशरथ अपने चारों महाभाग्यशाली और प्रिय पुत्रों के साथ,

श्लोक 34 (bala.18.34)

बभूव परमप्रीतो देवैरिव पितामहः । ते यदा ज्ञानसंपन्नाः सर्वे समुदिता गुणैः ॥ ३४ ॥

babhūva paramaprīto devairiva pitāmahaḥ | te yadā jñānasaṃpannāḥ sarve samuditā guṇaiḥ

देवताओं के मध्य पितामह ब्रह्मा के समान परम प्रसन्न रहते थे। जब वे सभी ज्ञान से संपन्न और गुणों से युक्त होकर,

श्लोक 35 (bala.18.35)

ह्रीमन्तः कीर्तिमन्तश्च सर्वज्ञा दीर्घदर्शिनः । तेषामेवं प्रभावाणां सर्वेषां दीप्ततेजसाम् ॥ ३५ ॥

hrīmantaḥ kīrtimantaśca sarvajñā dīrghadarśinaḥ | teṣāmevaṃ prabhāvāṇāṃ sarveṣāṃ dīptatejasām

विनम्र, यशस्वी, सर्वज्ञ और दूरदर्शी बन गए; इस प्रकार प्रभावशाली और तेजस्वी उन सबको देखकर,

श्लोक 36 (bala.18.36)

पिता दशरथो हृष्टो ब्रह्मा लोकाधिपो यथा । ते चापि मनुजव्याघ्रा वैदिकाध्ययने रताः ॥ ३६ ॥

pitā daśaratho hṛṣṭo brahmā lokādhipo yathā | te cāpi manujavyāghrā vaidikādhyayane ratāḥ

उनके पिता दशरथ लोकाधिपति ब्रह्मा के समान हर्षित होते थे। वे नरश्रेष्ठ राजकुमार भी वैदिक अध्ययन में रत रहते थे,

श्लोक 37 (bala.18.37)

पितृशुश्रूषणरता धनुर्वेदे च निष्ठिताः । अथ राजा दशरथस्तेषां दारक्रियां प्रति ॥ ३७ ॥

pitṛśuśrūṣaṇaratā dhanurvede ca niṣṭhitāḥ | atha rājā daśarathasteṣāṃ dārakriyāṃ prati

पिता की सेवा में तत्पर और धनुर्विद्या में निष्णात थे। इसके बाद राजा दशरथ उनके विवाह के विषय में,

श्लोक 38 (bala.18.38)

चिंतयामास धर्मात्मा सोपाध्यायः सबान्धवः । तस्य चिन्तयमानस्य मन्त्रि मध्ये महात्मनः ॥ ३८ ॥

ciṃtayāmāsa dharmātmā sopādhyāyaḥ sabāndhavaḥ | tasya cintayamānasya mantri madhye mahātmanaḥ

उस धर्मात्मा राजा ने अपने गुरुजनों और बंधु-बांधवों के साथ विचार-विमर्श करना आरंभ किया। इस प्रकार अपने मंत्रियों के मध्य विचार करते हुए उस महात्मा राजा के समक्ष,

श्लोक 39 (bala.18.39)

अभ्यागच्छन्महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः । स राज्ञो दर्शनाकांक्षी द्वाराध्यक्षानुवाच ह ॥ ३९ ॥

abhyāgacchanmahātejā viśvāmitro mahāmuniḥ | sa rājño darśanākāṃkṣī dvārādhyakṣānuvāca ha

महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र वहाँ आ पहुँचे। राजा से मिलने की इच्छा रखते हुए उन्होंने द्वारपाल से यह कहा।

श्लोक 40 (bala.18.40)

शीघ्रमाख्यात मां प्राप्तं कौशिकं गाधिनः सुतम् । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य राज्ञो वेश्म प्रदुद्रुवुः ॥ ४० ॥

śīghramākhyāta māṃ prāptaṃ kauśikaṃ gādhinaḥ sutam | tacchrutvā vacanaṃ tasya rājño veśma pradudruvuḥ

"शीघ्र जाकर राजा को सूचित करो कि गाधि के पुत्र कौशिक आए हैं।" उनका यह वचन सुनकर द्वारपाल राजमहल की ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 41 (bala.18.41)

संभ्रान्तमनसः सर्वे तेन वाक्येन चोदिताः । ते गत्वा राजभवनं विश्वामित्रमृषिं तदा ॥ ४१ ॥

saṃbhrāntamanasaḥ sarve tena vākyena coditāḥ | te gatvā rājabhavanaṃ viśvāmitramṛṣiṃ tadā

उनके इस वचन से प्रेरित होकर उद्विग्न मन वाले वे सभी द्वारपाल राजभवन जाकर,

श्लोक 42 (bala.18.42)

प्राप्तमावेदयामासुर्नृपायेक्ष्वाकवे तदा । तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सपुरोधाः समाहितः ॥ ४२ ॥

prāptamāvedayāmāsurnṛpāyekṣvākave tadā | teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā sapurodhāḥ samāhitaḥ

इक्ष्वाकुवंशी राजा दशरथ को महर्षि विश्वामित्र के आगमन की सूचना दी। उनका यह वचन सुनकर राजा अपने पुरोहित के साथ संयत होकर,

श्लोक 43 (bala.18.43)

प्रत्युज्जगाम संहृष्टो ब्रह्माणमिव वासवः । तं दृष्ट्वा ज्वलितं दीप्त्या तापसं संशितव्रतम् ॥ ४३ ॥

pratyujjagāma saṃhṛṣṭo brahmāṇamiva vāsavaḥ | taṃ dṛṣṭvā jvalitaṃ dīptyā tāpasaṃ saṃśitavratam

प्रसन्नतापूर्वक उनकी अगवानी के लिए निकल पड़े, जैसे इंद्र ब्रह्मा की अगवानी के लिए जाते हैं। तेजस्वी और कठोर व्रतधारी उस तपस्वी को देखकर,

श्लोक 44 (bala.18.44)

प्रहृष्टवदनो राजा ततोऽर्घ्यमुपहारयत् । स राज्ञः प्रतिगृह्यार्घ्यं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ४४ ॥

prahṛṣṭavadano rājā tato'rghyamupahārayat | sa rājñaḥ pratigṛhyārghyaṃ śāstradṛṣṭena karmaṇā

प्रसन्नमुख राजा ने उन्हें अर्घ्य अर्पित किया। राजा से शास्त्रविधि के अनुसार अर्घ्य ग्रहण करके,

श्लोक 45 (bala.18.45)

कुशलं चाव्ययं चैव पर्यपृच्छन्नराधिपम् । पुरे कोशे जनपदे बान्धवेषु सुहृत्सु च ॥ ४५ ॥

kuśalaṃ cāvyayaṃ caiva paryapṛcchannarādhipam | pure kośe janapade bāndhaveṣu suhṛtsu ca

विश्वामित्र ने राजा से उनके नगर, कोश, जनपद, बंधु-बांधवों तथा मित्रों की कुशलता और समृद्धि के विषय में पूछा।

श्लोक 46 (bala.18.46)

कुशलं कौशिको राज्ञः पर्यपृच्छत् सुधार्मिकः । अपि ते संनताः सर्वे सामन्ता रिपवो जिताः ॥ ४६ ॥

kuśalaṃ kauśiko rājñaḥ paryapṛcchat sudhārmikaḥ | api te saṃnatāḥ sarve sāmantā ripavo jitāḥ

उस परम धर्मात्मा कौशिक ने राजा से उनकी कुशलता पूछी: "क्या सभी सामंत राजा आपके अधीन हैं और शत्रु पराजित हो चुके हैं?

श्लोक 47 (bala.18.47)

दैवं च मानुषं चैव कर्म ते साध्वनुष्ठितम् । वसिष्ठं च समागम्य कुशलं मुनिपुंगवः ॥ ४७ ॥

daivaṃ ca mānuṣaṃ caiva karma te sādhvanuṣṭhitam | vasiṣṭhaṃ ca samāgamya kuśalaṃ munipuṃgavaḥ

क्या आपके दैविक और मानविक कर्तव्य भलीभाँति सम्पन्न हो रहे हैं?" तत्पश्चात् उन मुनिश्रेष्ठ ने वसिष्ठ से मिलकर,

श्लोक 48 (bala.18.48)

ऋषींश्च तान् यथान्यायं महाभागानुवाच ह । ते सर्वे हृष्टमनसस्तस्य राज्ञो निवेशनम् ॥ ४८ ॥

ṛṣīṃśca tān yathānyāyaṃ mahābhāgānuvāca ha | te sarve hṛṣṭamanasastasya rājño niveśanam

यथोचित रीति से उन अन्य महाभाग्यशाली ऋषियों का भी कुशल-क्षेम पूछा। तत्पश्चात् वे सभी प्रसन्नचित्त होकर राजा के निवास में प्रविष्ट हुए,

श्लोक 49 (bala.18.49)

विविशुः पूजितास्तेन निषेदुश्च यथार्हतः । अथ हृष्टमना राजा विश्वामित्रं महामुनिम् ॥ ४९ ॥

viviśuḥ pūjitāstena niṣeduśca yathārhataḥ | atha hṛṣṭamanā rājā viśvāmitraṃ mahāmunim

और राजा द्वारा सम्मानित होकर यथायोग्य आसनों पर बैठे। तब प्रसन्नचित्त राजा ने महामुनि विश्वामित्र से,

श्लोक 50 (bala.18.50)

उवाच परमोदारो हृष्टस्तमभिपूजयन् । यथामृतस्य संप्राप्तिर्यथा वर्षमनूदके ॥ ५० ॥

uvāca paramodāro hṛṣṭastamabhipūjayan | yathāmṛtasya saṃprāptiryathā varṣamanūdake

अत्यंत उदार और हर्षित होकर उनका सम्मान करते हुए यह कहा: "आपका आगमन मेरे लिए वैसा ही है जैसे अमृत की प्राप्ति, अथवा सूखी भूमि पर वर्षा,

श्लोक 51 (bala.18.51)

यथा सदृशदारेषु पुत्रजन्माप्रजस्य वै । प्रणष्टस्य यथा लाभो यथा हर्षो महोदये ॥ ५१ ॥

yathā sadṛśadāreṣu putrajanmāprajasya vai | praṇaṣṭasya yathā lābho yathā harṣo mahodaye

जैसे संतानहीन व्यक्ति को उपयुक्त पत्नी से पुत्र की प्राप्ति हो, जैसे खोई हुई वस्तु फिर मिल जाए, अथवा जैसे किसी महान शुभ अवसर पर हर्ष होता है, वैसा ही यह है।

श्लोक 52 (bala.18.52)

तथैवागमनं मन्ये स्वागतं ते महामुने । कं च ते परमं कामं करोमि किमु हर्षितः ॥ ५२ ॥

tathaivāgamanaṃ manye svāgataṃ te mahāmune | kaṃ ca te paramaṃ kāmaṃ karomi kimu harṣitaḥ

हे महामुने! मैं आपके आगमन को इसी प्रकार मानता हूँ; आपका स्वागत है। आपकी वह सर्वोच्च इच्छा क्या है, जिसे मैं हर्षित होकर पूर्ण करूँ?

श्लोक 53 (bala.18.53)

पात्रभूतोऽसि मे ब्रह्मन् दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद । अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम् ॥ ५३ ॥

pātrabhūto'si me brahman diṣṭyā prāpto'si mānada | adya me saphalaṃ janma jīvitaṃ ca sujīvitam

हे ब्रह्मन्! आप मेरे लिए योग्य पात्र हैं; हे मानद! सौभाग्य से ही आप यहाँ पधारे हैं। आज मेरा जन्म सफल हुआ और मेरा जीवन सचमुच सार्थक हुआ,

श्लोक 54 (bala.18.54)

यस्माद् विप्रेन्द्रमद्राक्षं सुप्रभाता निशा मम । पूर्वं राजर्षिशब्देन तपसा द्योतितप्रभः ॥ ५४ ॥

yasmād viprendramadrākṣaṃ suprabhātā niśā mama | pūrvaṃ rājarṣiśabdena tapasā dyotitaprabhaḥ

क्योंकि मैंने आपको, हे विप्रेंद्र, देख लिया है; मेरे लिए तो रात्रि उज्ज्वल प्रभात में बदल गई है। पहले आप राजर्षि की उपाधि से विख्यात थे, तप के तेज से देदीप्यमान होकर,

श्लोक 55 (bala.18.55)

ब्रह्मर्षित्वमनुप्राप्तः पूज्योऽसि बहुधा मया । तदद्भुतमभूत् विप्र पवित्रं परमं मम ॥ ५५ ॥

brahmarṣitvamanuprāptaḥ pūjyo'si bahudhā mayā | tadadbhutamabhūt vipra pavitraṃ paramaṃ mama

और अब आप ब्रह्मर्षि पद को प्राप्त हो चुके हैं, इसलिए आप मेरे लिए अनेक प्रकार से पूजनीय हैं। हे विप्र! यह मेरे लिए अत्यंत अद्भुत और परम पवित्र घटना है,

श्लोक 56 (bala.18.56)

शुभक्षेत्रगतश्चाहं तव संदर्शनात् प्रभो । ब्रूहि यत् प्रार्थितं तुभ्यं कार्यमागमनं प्रति ॥ ५६ ॥

śubhakṣetragataścāhaṃ tava saṃdarśanāt prabho | brūhi yat prārthitaṃ tubhyaṃ kāryamāgamanaṃ prati

हे प्रभो! आपके दर्शन मात्र से मानो मैं किसी पवित्र तीर्थ में पहुँच गया हूँ। जिस प्रयोजन से आप यहाँ पधारे हैं, वह कार्य मुझे बताइए,

श्लोक 57 (bala.18.57)

इच्छाम्यनुगृहीतोऽहं त्वदर्थं परिवृद्धये । कार्यस्य न विमर्शं च गंतुमर्हसि सुव्रत ॥ ५७ ॥

icchāmyanugṛhīto'haṃ tvadarthaṃ parivṛddhaye | kāryasya na vimarśaṃ ca gaṃtumarhasi suvrata

क्योंकि आपकी कृपा से अनुगृहीत होकर मैं आपके प्रयोजन की सिद्धि और अभिवृद्धि चाहता हूँ। हे सुव्रत! इस कार्य के संभव होने की शंका करने की आवश्यकता नहीं है,

श्लोक 58 (bala.18.58)

कर्ता चाहमशेषेण दैवतं हि भवान् मम । मम चायमनुप्राप्तो महानभ्युदयो द्विज । तवागमनजः कृत्स्नो धर्मश्चानुत्तमो द्विज ॥ ५८ ॥

kartā cāhamaśeṣeṇa daivataṃ hi bhavān mama | mama cāyamanuprāpto mahānabhyudayo dvija | tavāgamanajaḥ kṛtsno dharmaścānuttamo dvija

क्योंकि मैं इसे पूर्णतः संपन्न करूँगा, आप तो मेरे लिए देवता के समान हैं। हे द्विज! आपके आगमन से मुझे यह महान सौभाग्य प्राप्त हुआ है; हे द्विज! आपके पधारने से उत्पन्न यह धर्म पूर्ण और सर्वश्रेष्ठ है।"

श्लोक 59 (bala.18.59)

इति हृदयसुखं निशम्य वाक्यम् श्रुतिसुखमात्मवता विनीतमुक्तम् । प्रथितगुणयशा गुणैर्विशिष्टः परमऋषिः परमं जगाम हर्षम् ॥ ५९ ॥

iti hṛdayasukhaṃ niśamya vākyam śrutisukhamātmavatā vinītamuktam | prathitaguṇayaśā guṇairviśiṣṭaḥ paramaṛṣiḥ paramaṃ jagāma harṣam

हृदय को सुख देने वाले और कानों को प्रिय लगने वाले, आत्मसंयमी राजा के इस विनम्र वचन को सुनकर, यशस्वी गुणों से विशिष्ट वे परम ऋषि अत्यंत हर्षित हो उठे।

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