बालकाण्ड · सर्ग 2
प्रथम श्लोक की उत्पत्ति
श्लोक 1 (bala.2.1)
नारदस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा वाक्यविशारदः । पूजयामास धर्मात्मा सहशिष्यो महामुनिः ॥ 2.1 ॥
nāradasya tu tadvākyam śrutvā vākya viśāradaḥ | pūjayāmāsa dharmātmā saha śiṣyo mahāmuniḥ
नारद के उन वचनों को सुनकर, वाणी में निपुण, धर्मात्मा महामुनि वाल्मीकि ने अपने शिष्यों सहित उनकी पूजा की।
श्लोक 2 (bala.2.2)
यथावत्पूजितस्तेन देवर्षिर्नारदस्तथा । आपृच्छैवाभ्यनुज्ञातः स जगाम विहायसम् ॥ 2.2 ॥
yathāvat pūjitaḥ tena devarṣiḥ nāradaḥ tathā | āpṛcchaiva abhyanujñātaḥ sa jagāma vihāyasam
इस प्रकार यथोचित पूजित होकर देवर्षि नारद ने विदा माँगी, और अनुमति पाकर वे आकाश-मार्ग से चले गए।
श्लोक 3 (bala.2.3)
स मुहूर्तं गते तस्मिन्देवलोकं मुनिस्तदा । जगाम तमसातीरं जाह्नव्यास्त्वविदूरतः ॥ 2.3 ॥
sa muhūrtaṃ gate tasmin devalokam muniḥ tadā | jagāma tamasā tīram jāhnavyāt avidūrataḥ
नारद के देवलोक चले जाने के कुछ ही क्षण पश्चात् मुनि वाल्मीकि गंगा से न अधिक दूर तमसा नदी के तट पर गए।
श्लोक 4 (bala.2.4)
स तु तीरं समासाद्य तमसाया महामुनिः । शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम् ॥ 2.4 ॥
sa tu tīram samāsādya tamasāyā muniḥ tadā | śiṣyam āha sthitam pārśve dṛṣṭvā tīrtham akardamam
तमसा के तट पर पहुँचकर और कीचड़रहित घाट को देखकर, महामुनि ने अपने पास खड़े शिष्य से कहा।
श्लोक 5 (bala.2.5)
अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय । रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यमनो यथा ॥ 2.5 ॥
akardamam idam tīrtham bharadvāja niśāmaya | ramaṇīyam prasanna ambu san manuṣya mano yathā
"हे भरद्वाज, देखो यह घाट — कीचड़रहित, रमणीय, और सज्जन के मन के समान निर्मल जल वाला है।"
श्लोक 6 (bala.2.6)
न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम । इदमेवावगाहिष्ये तमसातीर्थमुत्तमम् ॥ 2.6 ॥
nyasyatām kalaśaḥ tāta dīyatām valkalam mama | idam eva avagāhiṣye tamasā tīrtham uttamam
"हे तात, कलश रख दो और मुझे वल्कल वस्त्र दो। मैं इसी उत्तम तमसा-तीर्थ में स्नान करूँगा।"
श्लोक 7 (bala.2.7)
एवमुक्तो भरद्वाजो वाल्मीकेन महात्मना । प्रायच्छत मुनेस्तस्य वल्कलं नियतो गुरोः ॥ 2.7 ॥
evam ukto bharadvājo vālmīkena mahātmanā | prayacchata muneḥ tasya valkalam niyataḥ guroḥ
महात्मा वाल्मीकि द्वारा ऐसा कहे जाने पर, अपने गुरु के प्रति सदैव आज्ञाकारी भरद्वाज ने उन्हें वल्कल वस्त्र दे दिया।
श्लोक 8 (bala.2.8)
स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रियः । विचचार ह पश्यंस्तत्सर्वतो विपुलं वनम् ॥ 2.8 ॥
sa śiṣya hastāt ādāya valkalam niyatendriyaḥ | vicacāra ha paśyan tat sarvato vipulam vanam
संयतेन्द्रिय मुनि ने शिष्य के हाथ से वल्कल लेकर, चारों ओर विस्तृत वन को निहारते हुए विचरण किया।
श्लोक 9 (bala.2.9)
तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम् । ददर्श भगवांस्तत्र क्रौञ्चयोश्चारुनिःस्वनम् ॥ 2.9 ॥
tasya abhyāśe tu mithunam carantam anapāyinam | dadarśa bhagavān tatra krauṅcayoḥ cāru nisvanam
वहीं समीप में उस भगवान् मुनि ने साथ-साथ विचरते हुए, मधुर स्वर में बोलते हुए क्रौंच पक्षियों के एक जोड़े को देखा।
श्लोक 10 (bala.2.10)
तस्मात्तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चयः । जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यतः ॥ 2.10 ॥
tasmāt tu mithunāt ekam pumāṃsam pāpa niścayaḥ | jaghāna vairanilayo niṣādaḥ tasya paśyataḥ
उस जोड़े में से नर पक्षी को, मुनि के देखते-देखते ही, पापी बुद्धि वाले और वैर के आश्रयभूत निषाद ने मार डाला।
श्लोक 11 (bala.2.11)
तं शोणितपरीताङ्गं वेष्टमानं महीतले । भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम् ॥ 2.11 ॥
tam śoṇita parītāṅgam ceṣṭamānam mahītale | bhāryā tu nihatam dṛṣṭvā rurāva karuṇām giram
रक्त से लथपथ शरीर वाले, धरती पर तड़पते हुए अपने पति को मरा हुआ देखकर उसकी पत्नी करुण स्वर में विलाप करने लगी।
श्लोक 12 (bala.2.12)
वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा । ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्रिणा सहितेन वै ॥ 2.12 ॥
viyuktā patinā tena dvijena sahacāriṇā | tāmra śīrṣeṇa mattena patriṇā sahitena vai
— उस ताम्रशीर्ष, आनंदमग्न और सदैव साथ रहने वाले सहचर पक्षी से अब वह वियुक्त हो चुकी थी।
श्लोक 13 (bala.2.13)
तथाविधं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् । ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत ॥ 2.13 ॥
tathā vidhim dvijam dṛṣṭvā niṣādena nipātitam | ṛśeḥ dharmātmānaḥ tasya kāruṇyam samapadyata
उस प्रकार निषाद द्वारा गिराए गए पक्षी को देखकर उस धर्मात्मा ऋषि के मन में करुणा उत्पन्न हुई।
श्लोक 14 (bala.2.14)
ततः करुणवेदित्वादधर्मोऽयमिति द्विजः । निशाम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ 2.14 ॥
tataḥ karuṇa veditvāt adharmo ayam iti dvijaḥ | niśāṃya rudatīm krauncīm idam vacanam abraiit
तब उस करुणा से प्रेरित होकर और इसे अधर्म मानते हुए, विलाप करती क्रौंची को सुनकर मुनि ने यह वचन कहा।
श्लोक 15 (bala.2.15)
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥ 2.15 ॥
mā niṣāda pratiṣṭhāmtva | magamaḥ śāśvatīḥ samāḥ | yat krauṅca mithunāt eka | mavadhīḥ kāma mohitam
"हे निषाद, तूने काम-मोहित क्रौंच-युगल में से एक को मार डाला, इसलिए तुझे अनंत वर्षों तक कहीं भी स्थिरता प्राप्त नहीं होगी।"
श्लोक 16 (bala.2.16)
तस्यैवं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्षतः । शोकार्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतं मया ॥ 2.16 ॥
tasya evam bruvataḥ cintā babhūva hṛdi vīkṣataḥ | śokārtena asya śakuneḥ kim idam vyāhṛtam mayā
ऐसा कहते ही उसके हृदय में यह विचार उठा: "शोकाकुल होकर मैंने इस पक्षी के लिए यह क्या कह दिया?"
श्लोक 17 (bala.2.17)
चिन्तयन्स महाप्राज्ञश्चकार मतिमान्मतिम् । शिष्यञ्चैवाब्रवीद्वाक्यमिदं स मुनिपुङ्गवः ॥ 2.17 ॥
cintayan sa mahāprājñaḥ cakāra matimān matim | śiśyam ca eva abravīt vākyam idam sa munipuṅgavaḥ
यह सोचते हुए उस महाप्राज्ञ, बुद्धिमान मुनिश्रेष्ठ ने अपने मन को स्थिर किया और शिष्य से यह वचन कहा।
श्लोक 18 (bala.2.18)
पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः । शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा ॥ 2.18 ॥
pāda baddhaḥ akṣara samaḥ tantrī laya samanvitaḥ | śokārtasya pravṛtto me śloko bhavatu na anyathā
"शोक से उत्पन्न, चरणों में बँधी, समान अक्षरों वाली और वीणा-लय के अनुकूल जो यह वाणी मुझसे निकली है, वह श्लोक ही कहलाए, अन्यथा नहीं।"
श्लोक 19 (bala.2.19)
शिष्यस्तु तस्य ब्रुवतो मुनेर्वाक्यमनुत्तमम् । प्रतिजग्राह संतुष्टस्तस्य तुष्टोऽभवद्मुनिः ॥ 2.19 ॥
śiṣyaḥ tu tasya bruvato muner vākyam anuttamam | prati jagrāha saṃtuṣṭaḥ tasya tuṣṭoaḥ abhavat muniḥ
शिष्य ने प्रसन्न होकर मुनि के उस उत्कृष्ट वचन को ग्रहण किया, जिससे मुनि भी संतुष्ट हुए।
श्लोक 20 (bala.2.20)
सोऽभिषेकं ततः कृत्वा तीर्थे तस्मिन् यथाविधि । तमेव चिन्तयन्नर्थमुपावर्तत वै मुनिः ॥ 2.20 ॥
so.abhiṣekam tataḥ kṛtvā tīrthe tasmin yathāvidhi | tam eva cintayan artham upāvartata vai muniḥ
तत्पश्चात् उस तीर्थ में विधिपूर्वक स्नान करके, मुनि उसी विषय पर विचार करते हुए वापस लौट पड़े।
श्लोक 21 (bala.2.21)
भरद्वाजस्ततः शिष्यो विनीतः श्रुतवान् गुरोः । कलशं पूर्णमादाय पृष्ठतोऽनुजगाम ह ॥ 2.21 ॥
bharadvājaḥ tataḥ śiṣyo vinītaḥ śrutavān guroḥ | kalaśam pūrṇamādāya pṛṣṭhataḥ anujagāma ha
तब उनके विनम्र और विद्वान शिष्य भरद्वाज जल से भरा कलश लेकर गुरु के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 22 (bala.2.22)
स प्रविश्याश्रमपदं शिष्येण सह धर्मवित् । उपविष्टः कथाश्चान्याश्चकार ध्यानमास्थितः ॥ 2.22 ॥
sa praviśya āśrama padam śiṣyeṇa saha dharmavit | upaviṣṭaḥ kathāḥ ca anyāḥ cakāra dhyānamāsthitaḥ
वह धर्मज्ञ मुनि शिष्य सहित आश्रम में प्रवेश करके बैठ गए; अन्य बातें करते हुए भी वे उसी विचार में लीन रहे।
श्लोक 23 (bala.2.23)
आजगाम ततो ब्रह्म लोककर्ता स्वयं प्रभुः । चतुर्मुखो महातेजा द्रष्टुं तं मुनिपुङ्गवम् ॥ 2.23 ॥
ājagāma tataḥ brahmo lokakartā svayam prabhuḥ | catur mukho mahātejā draṣṭum tam munipuṅgavam
तत्पश्चात् लोकों के रचयिता, स्वयं प्रभु, चतुर्मुख और महातेजस्वी ब्रह्मा उस मुनिश्रेष्ठ के दर्शन हेतु वहाँ पधारे।
श्लोक 24 (bala.2.24)
वाल्मीकिरथ तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय वाग्यतः । प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा तस्थौ परमविस्मितः ॥ 2.24 ॥
vālmīkiḥ atha tam dṛṣṭvā sahasā utthāya vāj~nataḥ | prānjaliḥ prayato bhūtvā tasthau parama vismitaḥ
वाल्मीकि उन्हें देखते ही तुरंत उठ खड़े हुए, मौन होकर हाथ जोड़े, अत्यंत विस्मित होकर खड़े रहे।
श्लोक 25 (bala.2.25)
पूजयामास तं देवं पाद्यार्घ्यासनवन्दनैः । प्रणम्य विधिवच्चैनं पृष्ट्वानामयमव्ययम् ॥ 2.25 ॥
pūjayāmāsa tam devam pādya arghya āsana vandanaiḥ | praṇaṃya vidhivat ca enam pṛṣṭvā ca eva nirāmayam
उन्होंने उस देवता का पाद्य, अर्घ्य, आसन और वंदन से पूजन किया; और विधिपूर्वक प्रणाम करके उनके कुशल-क्षेम की जिज्ञासा की।
श्लोक 26 (bala.2.26)
अथोपविश्य भगवानासने परमार्चिते । वाल्मीकये च ऋषये सन्दिदेशासनं ततः ॥ 2.26 ॥
atha upaviśya bhagavān āsane parama arcite | vālmīkaye ca ṛṣaye sandideśa āsanam tataḥ
तत्पश्चात् उस परम पूजित आसन पर बैठे हुए भगवान् ब्रह्मा ने ऋषि वाल्मीकि को भी आसन ग्रहण करने का आदेश दिया।
श्लोक 27 (bala.2.27)
ब्रह्मणा समनुज्ञातः सोऽप्युपाविशदासने । उपविष्टे तदा तस्मिन्साक्षाल्लोकपितामहे ॥ 2.27 ॥
brahmaṇā samanujñātaḥ so.api upāviśat āsane | upaviṣṭe tadā tasmin sākṣāt loka pitāmahe
ब्रह्मा की आज्ञा पाकर वाल्मीकि भी अपने आसन पर बैठ गए। और साक्षात् लोकपितामह के समक्ष बैठे हुए भी उनका मन—
श्लोक 28 (bala.2.28)
तद्गतेनैव मनसा वाल्मीकिर्ध्यानमास्थितः ॥ पापात्मना कृतं कष्टं वैरग्रहणबुद्धिना ॥ 2.28 ॥
tat gatena eva manasā vālmīkiḥ dhyānam āsthitaḥ || pāpātmanā kṛtam kaṣṭam vaira grahaṇa buddhinā
— उसी विषय में लगा हुआ वाल्मीकि ध्यानमग्न रहे, यह सोचते हुए कि "उस पापी और वैरभाव से ग्रस्त बुद्धि वाले ने यह क्रूर कर्म किया है—"
श्लोक 29 (bala.2.29)
यस्तादृशं चारुरवं क्रौञ्चं हन्यादकारणात् ॥ शोचन्नेव मुहुः क्रौञ्चीमुपश्लोकमिमं पुनः ॥ 2.29 ॥
yat tādṛśam cāruravam krauncam hanyāt akāraṇāt || śocan eva punaḥ krauncīm upa ślokam imam jagau
"—जिसने बिना किसी कारण के इतने मधुर स्वर वाले क्रौंच पक्षी को मार डाला।" इस प्रकार क्रौंची के लिए बार-बार शोक करते हुए उन्होंने उसी श्लोक को पुनः दोहराया,
श्लोक 30 (bala.2.30)
जगावन्तर्गतमना भूत्वा शोकपरायणः ॥ तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन्मुनिपुङ्गवम् । श्लोक एव त्वया बद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥ 2.30 ॥
punar antargata manā bhūtvā śoka parāyaṇaḥ || tam uvāca tato brahmā prahasan munipuṃgavam
शोक में डूबे हुए उन्होंने मन ही मन उसे गुनगुनाया। तब ब्रह्मा ने मुस्कराते हुए उस मुनिश्रेष्ठ से कहा: "तुमने एक श्लोक ही रचा है, इसमें विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।"
श्लोक 31 (bala.2.31)
मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती । रामस्य चरितं सर्वं कुरु त्वमृषिसत्तम ॥ 2.31 ॥
śloka evāstvayām baddho na atra kāryā vicāraṇā || mat cchandāt eva te brahman pravṛtte ayam sarasvatī
"हे ब्राह्मण, मेरी ही इच्छा से यह वाणी तुमसे प्रकट हुई है। अब हे ऋषिश्रेष्ठ, तुम राम का संपूर्ण चरित्र रचो।"
श्लोक 32 (bala.2.32)
धर्मात्मनो गुणवतो लोके रामस्य धीमतः । वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् ॥ 2.32 ॥
rāmasya caritam kṛtsnam kuru tvam ṛṣisattama | dharmātmano bhagavato loke rāmasya dhīmataḥ
"इस संसार में धर्मात्मा, गुणवान, बुद्धिमान और धैर्यशाली राम का चरित्र वैसे ही कहो, जैसा तुमने नारद से सुना है।"
श्लोक 33 (bala.2.33)
रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमतः । रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां च सर्वशः ॥ 2.33 ॥
vṛttam kathaya dhīrasya yathā te nāradāt śrutam | rahasyam ca prakāśam ca yad vṛttam tasya dhīmataḥ
"उस बुद्धिमान राम का लक्ष्मण सहित तथा राक्षसों का जो कुछ भी वृत्तांत हुआ हो, चाहे वह गुप्त हो या प्रकट—"
श्लोक 34 (bala.2.34)
वैदेह्याश्चापि यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः । तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति ॥ 2.34 ॥
rāmasya saha saumitre rākṣasānām ca sarvaśaḥ | vaidehyāḥ ca eva yad vṛttam prakāśam yadi vā rahaḥ
"—और वैदेही सीता का भी जो कुछ हुआ हो, प्रकट हो या गुप्त — वह सब, यद्यपि अभी तुम्हें ज्ञात नहीं, तुम्हें ज्ञात हो जाएगा।"
श्लोक 35 (bala.2.35)
न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति । कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम् ॥ 2.35 ॥
tat ca api aviditam sarvam viditam te bhaviṣyati | na te vāk anṛtā kāvye kācit atra bhaviṣyati
"इस काव्य में तुम्हारा कोई भी वचन असत्य नहीं होगा। राम की पुण्य और मनोरम कथा को श्लोकबद्ध करो।"
श्लोक 36 (bala.2.36)
यावत्स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले । तावद्रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति ॥ 2.36 ॥
kuru rāma kathām puṇyām śloka baddhām manoramām | yāvat sthāsyanti girayaḥ saritaḥ ca mahītale
"जब तक पृथ्वी पर पर्वत और नदियाँ रहेंगी, तब तक रामायण की कथा लोकों में प्रचलित रहेगी।"
श्लोक 37 (bala.2.37)
यावद्रामायणकथा त्वत्कृता प्रचरिष्यति । तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मल्लोकेषु निवत्स्यसि ॥ 2.37 ॥
tāvat rāmāyaṇa kathā lokeṣu pracariṣyati | yāvat rāmasya ca kathā tvat kṛtā pracariṣyati
"जब तक तुम्हारे द्वारा रचित यह रामायण-कथा प्रचलित रहेगी, तब तक तुम ऊर्ध्व और अधोलोकों में तथा मेरे लोकों में भी निवास करोगे।"
श्लोक 38 (bala.2.38)
इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत । ततः सशिष्यो भगवान्मुनिर्विस्मयमाययौ ॥ 2.38 ॥
tāvat ūrdhvam adhaḥ ca tvam mat lokeṣu nivatsyasi | iti uktvā bhagavān brahmā tatra eva antaradhīyata | tataḥ sa śiṣyo bhagavān muniḥ vismayam āyayau
यह कहकर भगवान् ब्रह्मा उसी क्षण अंतर्धान हो गए। तत्पश्चात् भगवान् मुनि अपने शिष्यों सहित आश्चर्यचकित हो गए।
श्लोक 39 (bala.2.39)
तस्य शिष्यास्ततः सर्वे जगुः श्लोकमिमं पुनः । मुहुर्महुः प्रीयमाणाः प्राहुश्च भृशविस्मिताः ॥ 2.39 ॥
tasya śiṣyāḥ tataḥ sarve jaguḥ ślokam imam punaḥ | muhur muhuḥ prīyamāṇāḥ prāhuḥ ca bhṛśa vismitāḥ
तब उनके सभी शिष्यों ने बार-बार उस श्लोक को प्रसन्नतापूर्वक गाया, और अत्यंत विस्मित होकर आपस में उसे दोहराया।
श्लोक 40 (bala.2.40)
समाक्षरैश्चतुर्भिर्यः पादैर्गीतो महर्षिणा । सोऽनुव्याहरणाद् भूयः श्लोकः श्लोकत्वमागतः ॥ 2.40 ॥
samākṣaraiḥ caturbhiḥ yaḥ pādaiḥ gīto maharṣiṇā | saḥ anuvyāharaṇāt bhūyaḥ śokaḥ ślokatvam āgataḥ
महर्षि द्वारा समान अक्षरों वाले चार चरणों में गाया गया वह वचन, इस प्रकार बार-बार दोहराए जाने से सचमुच "श्लोक" कहलाया।
श्लोक 41 (bala.2.41)
तस्य बुद्धिरियं जाता महर्षेर्भावितात्मनः । कृत्स्नं रामायणं काव्यमीदृशैः करवाण्यहम् ॥ 2.41 ॥
tasya buddhiḥ iyam jātā maharṣeḥ bhāvitātmanaḥ | kṛtsnam rāmāyaṇam kāvyam īdṛśaiḥ karavāṇyaham
तब उस पवित्रात्मा महर्षि के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ: "मैं संपूर्ण रामायण काव्य को इसी प्रकार के श्लोकों में रचूँगा।"
श्लोक 42 (bala.2.42)
उदारवृत्तार्थपदैर्मनोरमैः तदास्य रामस्य चकार कीर्तिमान् । समाक्षरैः श्लोकशतैर्यशस्विनो यशस्करं काव्यमुदारधीर्मुनिः ॥ 2.42 ॥
udāra vṛtta artha padaiḥ manoramaiḥ tadā asya rāmasya cakāra kīrtimān | sama akṣaraiḥ śloka śataiḥ yaśasvino yaśaskaram kāvyam udāra darśanaḥ
तब उस यशस्वी और उदार बुद्धि वाले मुनि ने सुंदर छंद, अर्थपूर्ण और मनोहर पदों से युक्त सैकड़ों समान-अक्षर श्लोकों में यशस्वी राम की कीर्ति बढ़ाने वाला वह काव्य रचा।
श्लोक 43 (bala.2.43)
तदुपगतसमाससन्धियोगं सममधुरोपनतार्थवाक्यबद्धम् । रघुवरचरितं मुनिप्रणीतं दशशिरसश्च वधं निशामयध्वम् ॥ 2.43 ॥
tad upagata samāsa sandhi yogam sama madhuropanata artha vākya baddham | raghuvara caritam munipraṇītam daśa śirasaḥ ca vadham niśāmaya adhvam
उपयुक्त समास और संधियों से युक्त, सम और मधुर अर्थपूर्ण वाक्यों में गुँथा हुआ, मुनि द्वारा रचित रघुश्रेष्ठ राम का यह चरित्र तथा दशमुख रावण के वध की यह कथा — इसे सुनिए।